मुंबई, एजेंसियां। मनोज बाजपेयी की बहुप्रतीक्षित फिल्म 'गवर्नर: द साइलेंट सेवियर' सिनेमाघरों में रिलीज होते ही दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बन गई है। वास्तविक घटनाओं से प्रेरित यह राजनीतिक और वित्तीय थ्रिलर भारत के 1990 के दशक के आर्थिक संकट और उससे देश को उबारने में भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर की भूमिका को बड़े पर्दे पर प्रस्तुत करती है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर फिल्म को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। मनोज बाजपेयी की दमदार एक्टिंग ने जीता दिल फिल्म में मनोज बाजपेयी के अभिनय की दर्शक खुलकर सराहना कर रहे हैं। एक यूजर ने फिल्म को "देसी धुरंधर" बताते हुए लिखा कि मनोज बाजपेयी ने अपने शानदार प्रदर्शन से किरदार में जान डाल दी है। कई दर्शकों का कहना है कि यह फिल्म इतिहास, नेतृत्व और एक गुमनाम नायक की प्रेरणादायक कहानी को प्रभावशाली तरीके से सामने लाती है। वहीं कुछ लोगों ने निर्देशक चिन्मय डी. मंडलेकर और निर्माता विपुल अमृतलाल शाह की विषय चयन की भी प्रशंसा की है। मार्केटिंग पर उठे सवाल जहां फिल्म की कहानी और अभिनय को सराहा जा रहा है, वहीं कुछ दर्शकों ने इसकी मार्केटिंग रणनीति पर सवाल उठाए हैं। सोशल मीडिया पर कई प्रतिक्रियाओं में कहा गया कि बेहतर प्रचार-प्रसार नहीं होने की वजह से फिल्म को रिलीज से पहले वह चर्चा नहीं मिल सकी, जिसकी वह हकदार थी। हालांकि दर्शकों का मानना है कि मजबूत कंटेंट के दम पर फिल्म अपनी पहचान बनाने में सफल हो सकती है। कम चर्चित नायक की कहानी पर आधारित है फिल्म 'गवर्नर: द साइलेंट सेवियर' भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर एस. वेंकिटारमनन के जीवन और 1990 के आर्थिक संकट के दौरान उनके नेतृत्व पर आधारित है। फिल्म में मनोज बाजपेयी के साथ अदा शर्मा, मधु और नौशाद मोहम्मद कुंजू भी अहम भूमिकाओं में हैं। फिल्म का निर्माण विपुल अमृतलाल शाह ने किया है। दर्शकों का मानना है कि यह सिर्फ एक राजनीतिक थ्रिलर नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक इतिहास के एक महत्वपूर्ण और कम चर्चित अध्याय को समझने का अवसर भी है।
मुंबई, एजेंसियां। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समीक्षा और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच शुक्रवार को घरेलू शेयर बाजार मामूली गिरावट के साथ बंद हुए। कारोबार के दौरान बाजार में उतार-चढ़ाव देखने को मिला, लेकिन दिन के अंत तक प्रमुख सूचकांक लाल निशान में बंद हुए। निवेशकों ने आरबीआई की नीतिगत घोषणाओं का आकलन करते हुए सतर्क रुख अपनाया। सेंसेक्स और निफ्टी में आई गिरावट नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का निफ्टी-50 सूचकांक 49.85 अंक यानी 0.21 प्रतिशत गिरकर 23,366.70 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का सेंसेक्स 116.67 अंक या 0.16 प्रतिशत फिसलकर 74,243.34 अंक पर पहुंच गया। शुरुआती कारोबार में दोनों सूचकांकों ने बढ़त बनाई थी, लेकिन बाद में बिकवाली का दबाव बढ़ने से बाजार नीचे आ गया। रेपो रेट यथावत, RBI का रुख रहा तटस्थ आरबीआई की छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने सर्वसम्मति से नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखने का फैसला किया। केंद्रीय बैंक ने आर्थिक विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए अपना "तटस्थ" रुख कायम रखा है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आरबीआई फिलहाल ब्याज दरों में किसी बड़े बदलाव के बजाय आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता दे रहा है। तकनीकी स्तरों पर निफ्टी की नजर विश्लेषकों के अनुसार निफ्टी के लिए 23,450 से 23,550 का दायरा मजबूत प्रतिरोध क्षेत्र बना हुआ है। यदि सूचकांक इस स्तर को पार कर स्थिरता बनाए रखता है, तो 23,750 से 23,800 तक की तेजी संभव है। वहीं गिरावट की स्थिति में 23,250 का स्तर महत्वपूर्ण समर्थन माना जा रहा है। आईटी और मेटल शेयरों में बिकवाली सेक्टोरल प्रदर्शन की बात करें तो आईटी और मेटल शेयरों में सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला। निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 0.35 प्रतिशत और स्मॉलकैप इंडेक्स 0.06 प्रतिशत कमजोर रहा। दूसरी ओर मीडिया सेक्टर ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए बढ़त दर्ज की। प्रमुख गिरावट वाले शेयरों में हिंदाल्को, विप्रो और ट्रेंट शामिल रहे। रुपये में शानदार मजबूती शेयर बाजार की सुस्ती के बीच विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपये ने मजबूत प्रदर्शन किया। डॉलर के मुकाबले रुपया 81 पैसे की तेजी के साथ 94.93 के स्तर पर बंद हुआ। यह मजबूती आरबीआई द्वारा विदेशी पूंजी प्रवाह बढ़ाने और फॉरेक्स लिक्विडिटी मजबूत करने के लिए उठाए गए कदमों के बाद देखने को मिली। विदेशी निवेश को बढ़ावा देने की पहल आरबीआई ने अनिवासी भारतीयों (NRI) और प्रवासी भारतीय नागरिकों (OCI) के लिए इक्विटी निवेश सीमा बढ़ाने के साथ-साथ फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) के तहत सरकारी प्रतिभूतियों का दायरा भी विस्तारित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन कदमों से विदेशी निवेश आकर्षित होगा और रुपये को आगे भी समर्थन मिल सकता है।
मुंबई, एजेंसियां। भारतीय शेयर बाजार आज शुक्रवार को मजबूत शुरुआत की। निवेशकों की खरीदारी और सकारात्मक वैश्विक संकेतों के बीच बीएसई सेंसेक्स तथा एनएसई निफ्टी दोनों प्रमुख सूचकांक बढ़त के साथ खुले। हालांकि बाजार की दिशा अब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के फैसले पर टिकी हुई है, जिसकी घोषणा सुबह 10 बजे होनी है। सेंसेक्स और निफ्टी की मजबूत शुरुआत सुबह 9:32 बजे तक सेंसेक्स 197.90 अंक यानी 0.26 प्रतिशत की बढ़त के साथ 74,557.91 पर कारोबार कर रहा था। वहीं निफ्टी 51.41 अंक या 0.22 प्रतिशत चढ़कर 23,467.95 के स्तर पर पहुंच गया। निफ्टी का 23,400 के ऊपर बने रहना बाजार की मजबूती का संकेत माना जा रहा है। इन्फोसिस और अदाणी पोर्ट्स बने बाजार के हीरो शुरुआती कारोबार में आईटी और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के शेयरों में अच्छी खरीदारी देखने को मिली। विशेष रूप से इन्फोसिस और अदाणी पोर्ट्स के शेयर लगभग 2-2 प्रतिशत तक उछले। इन बड़े शेयरों की तेजी ने बाजार को ऊपर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और निवेशकों का भरोसा मजबूत किया। निवेशकों की नजर RBI के फैसले पर विश्लेषकों का मानना है कि बाजार फिलहाल सीमित दायरे में कारोबार कर सकता है क्योंकि निवेशक RBI के नीति निर्णय का इंतजार कर रहे हैं। ब्याज दरों, महंगाई, आर्थिक वृद्धि और तरलता से जुड़े संकेत बाजार की आगे की दिशा तय करेंगे। यदि RBI की नीति बाजार की उम्मीदों के अनुरूप रहती है तो शेयर बाजार में और तेजी देखने को मिल सकती है। आगे क्या? आज का सबसे बड़ा ट्रिगर RBI की मौद्रिक नीति घोषणा है। निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों को उम्मीद है कि केंद्रीय बैंक की टिप्पणी से आने वाले महीनों में अर्थव्यवस्था और ब्याज दरों की दिशा को लेकर महत्वपूर्ण संकेत मिलेंगे। ऐसे में दिनभर बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।