नई दिल्ली, एजेंसियां। मेथी दाना भारतीय रसोई का एक आम मसाला होने के साथ-साथ आयुर्वेद में एक महत्वपूर्ण औषधि के रूप में भी जाना जाता है। इसमें मौजूद फाइबर, आयरन, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट शरीर को कई तरह के स्वास्थ्य लाभ प्रदान करते हैं। खासकर महिलाओं के लिए मेथी दाना पानी को बेहद फायदेमंद माना जाता है, जिसे अक्सर डॉक्टर और पोषण विशेषज्ञ भी सलाह देते हैं। ब्लड शुगर और पाचन के लिए लाभकारी विशेषज्ञों के अनुसार, मेथी दाना पानी ब्लड शुगर को नियंत्रित करने और पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। इसमें मौजूद घुलनशील फाइबर कब्ज, गैस और अपच जैसी समस्याओं से राहत दिलाने में सहायक होता है। महिलाओं के स्वास्थ्य में मददगार मेथी दाना पानी हार्मोनल संतुलन बनाए रखने में मदद कर सकता है। यह पीरियड्स से जुड़ी समस्याओं और पीसीओएस जैसी स्थितियों में राहत देने में उपयोगी माना जाता है। वजन घटाने और त्वचा-बालों के लिए फायदेमंद इसका सेवन लंबे समय तक पेट भरा रखने में मदद करता है, जिससे वजन नियंत्रित रहता है। साथ ही इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट त्वचा को स्वस्थ और बालों को मजबूत बनाने में सहायक हो सकते हैं। मेथी दाना पानी बनाने का तरीका एक गिलास पानी में 1–2 चम्मच मेथी दाना रातभर भिगो दें। सुबह इसे छानकर खाली पेट पिएं। चाहें तो भीगे हुए दानों को भी चबाया जा सकता है। सही समय और जरूरी सावधानी विशेषज्ञों के अनुसार, मेथी दाना पानी पीने का सबसे अच्छा समय सुबह खाली पेट है। इसका सेवन सीमित मात्रा में ही करें और यदि आप किसी बीमारी या दवा का सेवन कर रहे हैं तो डॉक्टर की सलाह जरूर लें।
रांची। रांची जिले के तमाड़ प्रखंड के बेलबेड़ा गांव में मलेरिया का संक्रमण तेजी से फैलने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने विशेष निगरानी और रोकथाम अभियान शुरू कर दिया है। अराहंगा पंचायत के टुंगरी टोला में 27 जून से चलाए जा रहे विशेष स्क्रीनिंग अभियान के तहत अब तक 336 लोगों की जांच की गई है, जिनमें 160 लोग मलेरिया पॉजिटिव पाए गए हैं। इनमें 16 मरीजों में बुखार, सिरदर्द, कमजोरी और अन्य लक्षण मिले हैं, जबकि बाकी संक्रमितों का भी नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और उपचार किया जा रहा है। मेडिकल टीम कर रही लगातार निगरानी सीएचसी प्रभारी डॉ. सावित्री कुजूर ने बताया कि संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह सतर्क है। मेडिकल टीम रोजाना प्रभावित गांवों का दौरा कर रही है और मौके पर ही मलेरिया रोधी दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि समय पर जांच और इलाज से बीमारी पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। बिना लक्षण वाले लोगों की भी हो रही जांच अराहंगा की सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचओ) अनुलता भुतकुंवर ने बताया कि मेडिकल टीम केवल बुखार या अन्य लक्षण वाले लोगों की ही नहीं, बल्कि बिना लक्षण वाले ग्रामीणों की भी जांच कर रही है। इसका उद्देश्य संक्रमण की शुरुआती अवस्था में पहचान कर समय रहते इलाज शुरू करना है। शुरुआत में कुछ ग्रामीण जांच से हिचकिचा रहे थे, लेकिन जागरूकता अभियान के बाद अब लोग स्वयं आगे आकर जांच करा रहे हैं। सावधानी बरतने की अपील स्वास्थ्य विभाग की टीम घर-घर जाकर दवा वितरण के साथ लोगों को मच्छरदानी के नियमित उपयोग, साफ-सफाई बनाए रखने और घर के आसपास पानी जमा नहीं होने देने की सलाह दे रही है। विभाग ने लोगों से अपील की है कि बुखार, ठंड लगना, सिरदर्द या कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में जांच कराएं। अधिकारियों के अनुसार, प्रभावित क्षेत्र में स्क्रीनिंग, निगरानी और उपचार अभियान तब तक जारी रहेगा, जब तक संक्रमण पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आ जाता।
रांची। झारखंड के लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में बड़ी सौगात मिली है। राजधानी रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) परिसर में अत्याधुनिक क्षेत्रीय नेत्र संस्थान (रीजनल आई इंस्टीट्यूट) का विधिवत उद्घाटन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने किया। इस संस्थान के शुरू होने से अब राज्य के मरीजों को आंखों की गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए दूसरे राज्यों का रुख नहीं करना पड़ेगा। अत्याधुनिक सुविधाओं से होगा इलाज उद्घाटन के बाद स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने कहा कि राज्य सरकार का लक्ष्य झारखंडवासियों को अपने ही राज्य में बेहतर और आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है। उन्होंने बताया कि संस्थान में मोतियाबिंद, रेटिना और आंखों से जुड़ी अन्य जटिल बीमारियों का इलाज एवं ऑपरेशन अत्याधुनिक तकनीक के साथ किया जाएगा। इससे मरीजों को बेहतर उपचार के साथ समय और खर्च दोनों की बचत होगी। मंत्री ने कहा कि सरकार लगातार रिम्स को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रही है और क्षेत्रीय नेत्र संस्थान राज्य के स्वास्थ्य ढांचे को नई मजबूती देगा। हजारों मरीजों को मिलेगा लाभ इस अवसर पर कांके विधायक एवं रिम्स शासी परिषद के सदस्य सुरेश बैठा ने कहा कि इस संस्थान के शुरू होने से राज्य के हजारों मरीजों को सीधा लाभ मिलेगा। अब बेहतर नेत्र चिकित्सा के लिए लोगों को राज्य से बाहर जाने की जरूरत नहीं होगी, जिससे आम लोगों को बड़ी राहत मिलेगी। सुरक्षा विवाद पर भी दी प्रतिक्रिया कार्यक्रम के दौरान वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर द्वारा सरकारी सुरक्षा और कारकेड लौटाने के मुद्दे पर पूछे गए सवाल पर डॉ. इरफान अंसारी ने कहा कि जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा महत्वपूर्ण है, विशेषकर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में। उन्होंने कहा कि यदि इस संबंध में कोई चिंता थी तो उसे कैबिनेट बैठक में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के समक्ष रखा जाना चाहिए था। मंत्री ने विश्वास जताया कि मुख्यमंत्री सभी मंत्रियों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर गंभीरता से निर्णय लेते हैं।
नई दिल्ली: अभिनेता अनिल कपूर की भाभी और बिजनेसमैन संजय कपूर की पत्नी महीप कपूर ने पहली बार खुलकर बताया कि कैसे टाइप 1 डायबिटीज की वजह से उनका वजन अचानक 15 किलोग्राम तक कम हो गया और शुरुआत में उन्होंने इसे कोविड-19 का असर समझ लिया। अभिनेत्री सोहा अली खान के पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान महीप ने अपनी बीमारी, गलतफहमी और समय पर इलाज न मिलने से जुड़ी पूरी कहानी साझा की। उन्होंने बताया कि बीमारी का पता चलने से पहले उनका शरीर लगातार संकेत दे रहा था, लेकिन कोविड महामारी के दौरान डॉक्टर के पास जाने से बचने और लक्षणों को वायरस का प्रभाव मान लेने के कारण सही समय पर बीमारी की पहचान नहीं हो सकी। हालात इतने गंभीर हो गए कि एक यात्रा के दौरान दिल्ली पहुंचते ही वह अचानक गिर पड़ीं और उन्हें तुरंत अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा। कोविड का असर समझती रहीं, लेकिन वजह थी डायबिटीज महीप कपूर ने बताया कि डायबिटीज का पता चलने से पहले उन्हें टाइफाइड भी हुआ था। इसके साथ ही उनके पीरियड्स अनियमित होने लगे, वजन तेजी से घटने लगा और उन्हें महसूस हो रहा था कि शरीर पहले जैसा नहीं रहा। उस समय वह पेरीमेनोपॉज के दौर से भी गुजर रही थीं, इसलिए कई बदलाव सामान्य हार्मोनल परिवर्तन जैसे लगे। कोविड-19 संक्रमण के बाद उनका वजन लगभग 15 किलोग्राम कम हो गया। उन्होंने इसे कोविड का साइड इफेक्ट समझ लिया और करीब तीन महीने तक लगातार काम और यात्रा करती रहीं। इस दौरान उनकी वास्तविक बीमारी लगातार बढ़ती रही। दिल्ली पहुंचते ही बिगड़ी तबीयत महीप ने बताया कि लगातार यात्रा के बाद जैसे ही वह दिल्ली पहुंचीं, उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और वह गिर पड़ीं। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाकर आईसीयू में भर्ती किया गया। जांच के बाद डॉक्टरों ने टाइप 1 डायबिटीज की पुष्टि की और इंसुलिन थेरेपी शुरू की। उन्होंने कहा कि अब वह अपनी सेहत को लेकर बेहद सतर्क रहती हैं और नियमित रूप से ब्लड शुगर की जांच करती हैं ताकि किसी भी तरह की जटिलता से बचा जा सके। उन्हें वर्ष 2022 में टाइप 1 डायबिटीज का निदान हुआ था। टाइप 1 डायबिटीज में वजन तेजी से क्यों घटता है? टाइप 1 डायबिटीज में शरीर पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता। इंसुलिन का काम रक्त में मौजूद ग्लूकोज को कोशिकाओं तक पहुंचाकर उसे ऊर्जा में बदलना होता है। जब इंसुलिन की कमी होती है, तो शरीर ग्लूकोज का उपयोग नहीं कर पाता। ऐसे में शरीर ऊर्जा की जरूरत पूरी करने के लिए फैट और मांसपेशियों को तोड़ना शुरू कर देता है। यही वजह है कि मरीज का वजन तेजी से कम होने लगता है। इसके अलावा, रक्त में बढ़ी हुई शुगर को बाहर निकालने के लिए किडनी अधिक मेहनत करती है, जिससे शरीर की ऊर्जा और तेजी से खर्च होती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति में कमजोरी, थकान और तेजी से वजन घटने जैसी समस्याएं दिखाई देने लगती हैं। क्या है टाइप 1 डायबिटीज? टाइप 1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून बीमारी है। इसमें शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से अग्न्याशय (Pancreas) की उन बीटा कोशिकाओं पर हमला कर देता है जो इंसुलिन बनाती हैं। जब ये कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं, तो शरीर में इंसुलिन का उत्पादन लगभग बंद हो जाता है और मरीज को जीवनभर इंसुलिन पर निर्भर रहना पड़ सकता है। क्या केवल बच्चों को होती है टाइप 1 डायबिटीज? आम धारणा है कि टाइप 1 डायबिटीज केवल बच्चों या किशोरों में होती है, लेकिन ऐसा पूरी तरह सही नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस बीमारी के कई मामले वयस्कों में भी सामने आते हैं। कई बार डॉक्टर भी शुरुआती लक्षणों को टाइप 2 डायबिटीज समझ लेते हैं, जिससे सही इलाज में देरी हो सकती है। कुछ मामलों में 70–80 वर्ष की उम्र में भी टाइप 1 डायबिटीज का पता चलता है। किन लक्षणों को नजरअंदाज न करें? बिना किसी स्पष्ट कारण के तेजी से वजन कम होना बार-बार प्यास लगना बार-बार पेशाब आना अत्यधिक थकान और कमजोरी धुंधला दिखाई देना लगातार भूख लगना यदि ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो तुरंत डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।
नई दिल्ली: गर्मियों में घंटों एयर कंडीशनर (AC) में रहने के बाद जब अचानक 40 डिग्री या उससे अधिक तापमान वाली तेज धूप में निकलते हैं, तो शरीर को कुछ ही सेकंड में खुद को नए तापमान के अनुसार ढालना पड़ता है। इस दौरान कई लोगों को सांस फूलना, दिल की धड़कन तेज होना, चक्कर आना, कमजोरी या सीने में बेचैनी जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, स्वस्थ लोगों में यह बदलाव अक्सर कुछ समय के लिए होता है, लेकिन हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, अस्थमा और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति गंभीर हो सकती है। ऐसे लक्षणों को हल्के में लेना सही नहीं है। AC से निकलते ही दिल पर क्यों बढ़ता है दबाव? जब कोई व्यक्ति 22–24°C तापमान वाले कमरे से निकलकर 40°C या उससे अधिक गर्म वातावरण में पहुंचता है, तो शरीर तुरंत खुद को ठंडा रखने की कोशिश शुरू कर देता है। इस प्रक्रिया में: त्वचा की रक्त वाहिकाएं फैलने लगती हैं। शरीर पसीने के जरिए तापमान कम करने की कोशिश करता है। हृदय को त्वचा तक ज्यादा रक्त पहुंचाने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है। इससे कुछ समय के लिए हार्ट रेट बढ़ सकती है और दिल पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, गर्म मौसम में शरीर को ठंडा रखने के लिए हृदय को सामान्य से ज्यादा काम करना पड़ता है। क्यों फूलने लगती है सांस? तेज गर्मी और उमस में शरीर को ऑक्सीजन की जरूरत बढ़ जाती है। यदि किसी व्यक्ति को पहले से हार्ट डिजीज, अस्थमा, COPD या अन्य श्वसन संबंधी बीमारी है, तो अचानक तापमान बदलने पर सांस लेने में दिक्कत महसूस हो सकती है। ब्लड प्रेशर पर भी पड़ सकता है असर तापमान बदलने से रक्त वाहिकाएं सिकुड़ने और फैलने लगती हैं। इसका असर ब्लड प्रेशर पर भी पड़ सकता है। कुछ लोगों में इसके कारण: चक्कर आना कमजोरी सिर भारी लगना घबराहट दिल की धड़कन तेज होना जैसी समस्याएं हो सकती हैं। किन लोगों को सबसे ज्यादा सावधान रहने की जरूरत? इन लोगों में जोखिम अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है: बुजुर्ग हाई ब्लड प्रेशर के मरीज हार्ट अटैक या हार्ट फेलियर का इतिहास रखने वाले लोग डायबिटीज के मरीज अस्थमा या फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति खुद को कैसे रखें सुरक्षित? AC से बाहर निकलने से पहले कुछ मिनट सामान्य तापमान वाले स्थान पर रहें। AC का तापमान 24–26°C के बीच रखें। पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें ताकि शरीर डिहाइड्रेट न हो। धूप में निकलते समय टोपी, छाता और हल्के रंग के कपड़े पहनें। दोपहर की तेज धूप में अनावश्यक बाहर निकलने से बचें। कब तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए? यदि AC से बाहर आने के बाद बार-बार ये लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें: सीने में दर्द या दबाव लगातार सांस फूलना बहुत तेज या अनियमित धड़कन चक्कर आना या बेहोशी जैसा महसूस होना अत्यधिक कमजोरी या पसीना आना ये लक्षण केवल गर्मी की वजह से ही नहीं, बल्कि किसी गंभीर हृदय समस्या का संकेत भी हो सकते हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। स्मार्टफोन, लैपटॉप और टीवी स्क्रीन आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। लंबे समय तक डिजिटल स्क्रीन के सामने रहने के कारण आंखों में थकान, जलन और सिरदर्द जैसी समस्याएं आम हो गई हैं। ऐसे में ब्लू लाइट फिल्टर वाले चश्मे (ब्लू लाइट ग्लासेस) तेजी से लोकप्रिय हुए हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ये चश्मे कुछ स्थितियों में राहत जरूर देते हैं, लेकिन आंखों को स्थायी रूप से नुकसान से बचाने या नजर की कमजोरी को ठीक करने का दावा सही नहीं है। कैसे काम करते हैं ब्लू लाइट ग्लासेस? ब्लू लाइट ग्लासेस कंप्यूटर, मोबाइल और अन्य डिजिटल स्क्रीन से निकलने वाली हाई-एनर्जी विजिबल ब्लू लाइट (HEV Blue Light) को आंशिक रूप से फिल्टर करने के लिए बनाए जाते हैं। इससे स्क्रीन की चकाचौंध कम महसूस हो सकती है और विशेष रूप से रात में स्क्रीन इस्तेमाल करने पर नींद के चक्र पर पड़ने वाला प्रभाव कुछ हद तक कम हो सकता है। क्या आंखों का तनाव और सिरदर्द कम होता है? विशेषज्ञों के अनुसार, स्क्रीन देखने के दौरान बार-बार पलकें न झपकाने से आंखें सूख जाती हैं, जिससे जलन और थकान बढ़ती है। गलत बैठने की मुद्रा और स्क्रीन की अधिक चमक भी सिरदर्द का कारण बन सकती है। ब्लू लाइट ग्लासेस कुछ लोगों को आराम दे सकते हैं, लेकिन ये इन समस्याओं का पूर्ण समाधान नहीं हैं। नंबर वाले चश्मे का विकल्प नहीं ब्लू लाइट वाले चश्मे मायोपिया, हाइपरमेट्रोपिया या एस्टिग्मेटिज्म जैसी दृष्टि संबंधी समस्याओं को ठीक नहीं करते। यदि किसी व्यक्ति की आंखों का नंबर है, तो उसे डॉक्टर द्वारा निर्धारित प्रिस्क्रिप्शन वाले चश्मे की ही जरूरत होगी। जरूरत पड़ने पर उन लेंसों पर ब्लू लाइट फिल्टर कोटिंग भी लगाई जा सकती है। आंखों की सुरक्षा के लिए अपनाएं ये आदतें विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखें, जिसे 20-20-20 नियम कहा जाता है। इसके अलावा बार-बार पलकें झपकाना, पर्याप्त रोशनी में काम करना और सोने से कम से कम दो घंटे पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करना आंखों और नींद दोनों के लिए फायदेमंद माना जाता है। ब्लू लाइट ग्लासेस सहायक हो सकते हैं, लेकिन स्वस्थ डिजिटल आदतों का कोई विकल्प नहीं हैं।
नई दिल्ली: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, बढ़ता तनाव, नींद की कमी और अनियमित खानपान ने माइग्रेन की समस्या को आम बना दिया है। यह केवल साधारण सिरदर्द नहीं, बल्कि एक ऐसी न्यूरोलॉजिकल समस्या है जो कई घंटों तक व्यक्ति की दिनचर्या पूरी तरह प्रभावित कर सकती है। माइग्रेन के दौरान सिर के एक हिस्से में तेज दर्द, मतली, उल्टी, तेज रोशनी और आवाज से परेशानी जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं। दवाओं के अलावा कुछ घरेलू उपाय भी माइग्रेन के लक्षणों को कम करने में मदद कर सकते हैं। इन्हीं में से एक है अजवाइन, जो लगभग हर भारतीय रसोई में आसानी से मिल जाती है। आयुर्वेद में लंबे समय से अजवाइन का उपयोग पाचन, गैस, सर्दी-जुकाम और सिरदर्द जैसी समस्याओं में किया जाता रहा है। क्यों होता है माइग्रेन? विशेषज्ञों के अनुसार माइग्रेन एक न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है, जिसमें सिर के एक हिस्से में बार-बार तेज दर्द होता है। यह दर्द 4 घंटे से लेकर 72 घंटे तक भी बना रह सकता है। इसके साथ कई लोगों को मतली, उल्टी, धुंधला दिखाई देना और चिड़चिड़ापन भी महसूस होता है। माइग्रेन के सामान्य ट्रिगर हैं: लगातार मानसिक तनाव पर्याप्त नींद न लेना हार्मोनल बदलाव लंबे समय तक भूखे रहना कुछ विशेष खाद्य पदार्थ तेज रोशनी और तेज आवाज माइग्रेन में कैसे फायदेमंद है अजवाइन? अजवाइन में थाइमोल (Thymol) नामक सक्रिय तत्व पाया जाता है। शोध के अनुसार इसमें एंटी-इन्फ्लेमेटरी, एंटीऑक्सीडेंट और दर्द कम करने वाले गुण मौजूद होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार अजवाइन में: पाचन शक्ति बढ़ाने वाले गुण वात और कफ को संतुलित करने की क्षमता गैस और अपच कम करने वाले तत्व पाए जाते हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से माइग्रेन के कुछ ट्रिगर्स को कम करने में मदद कर सकते हैं। माइग्रेन में अजवाइन के संभावित फायदे 1. तनाव कम करने में मदद अजवाइन में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में सहायक माने जाते हैं। तनाव कम होने से माइग्रेन के एपिसोड की तीव्रता भी कम हो सकती है। 2. पाचन सुधारकर राहत कई लोगों में गैस, अपच और पेट की गड़बड़ी माइग्रेन का कारण बनती है। अजवाइन पाचन को बेहतर बनाकर इस ट्रिगर को कम करने में मदद कर सकती है। 3. सूजन कम करने में सहायक शरीर में सूजन भी माइग्रेन के लक्षणों को बढ़ा सकती है। अजवाइन के एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुण सूजन कम करने में मदद कर सकते हैं। माइग्रेन में अजवाइन का इस्तेमाल कैसे करें? 1. अजवाइन की गर्म पोटली 2 से 4 चम्मच अजवाइन को तवे पर हल्का गर्म करें। इसे सूती कपड़े में बांधकर पोटली बना लें। समय-समय पर इसकी हल्की सुगंध लें। इससे बंद नाक खुलने, रक्त संचार बेहतर होने और सिरदर्द में कुछ राहत महसूस हो सकती है। 2. अजवाइन का पानी 2 कप पानी में 2 चम्मच अजवाइन डालें। इसे कुछ मिनट तक उबालें। छानकर सुबह और शाम हल्का गुनगुना पी सकते हैं। यह पाचन बेहतर रखने में मदद कर सकता है, जिससे माइग्रेन के कुछ ट्रिगर्स कम हो सकते हैं। माइग्रेन से बचने के लिए अपनाएं ये आदतें पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। रोज 7-8 घंटे की नींद लें। तेज रोशनी और तेज आवाज से बचें। लंबे समय तक खाली पेट न रहें। प्रोसेस्ड फूड और अत्यधिक कैफीन से दूरी बनाएं। योग, मेडिटेशन और नियमित व्यायाम करें। अपने माइग्रेन ट्रिगर्स की पहचान कर उनसे बचने की कोशिश करें।
नई दिल्ली: लंबे समय तक खड़े रहने, अधिक चलने या हल्की चोट लगने के बाद पैरों में सूजन आना आम बात है। लेकिन अगर बिना किसी स्पष्ट कारण के पैरों, टखनों या तलवों में लगातार सूजन बनी रहती है, तो इसे हल्के में लेना खतरनाक साबित हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह हार्ट फेलियर, किडनी की बीमारी, लिवर संबंधी समस्याओं या रक्त संचार में गड़बड़ी जैसी गंभीर बीमारियों का शुरुआती संकेत हो सकता है। सीनियर इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. एलेक्स मैथ्यू के अनुसार, जब शरीर के टिश्यू में अतिरिक्त तरल पदार्थ जमा होने लगता है, तो पैरों में सूजन यानी एडिमा (Edema) की समस्या होती है। यदि सूजन वाली जगह पर उंगली दबाने के बाद कुछ समय तक गड्ढा बना रहे, तो इसे पिटिंग एडिमा कहा जाता है, जो कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा संकेत हो सकता है। हार्ट फेलियर का शुरुआती संकेत हो सकती है सूजन जब हृदय शरीर में पर्याप्त मात्रा में रक्त पंप नहीं कर पाता, तो अतिरिक्त तरल पदार्थ पैरों और टखनों में जमा होने लगता है। इसे कंजेस्टिव हार्ट फेलियर कहा जाता है। इस स्थिति में आमतौर पर दोनों पैरों में सूजन के साथ-साथ ये लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं: सांस फूलना जल्दी थक जाना सीने में भारीपन रात में सांस लेने में परेशानी किडनी ठीक से काम न करे तो भी फूल सकते हैं पैर किडनी शरीर से अतिरिक्त पानी और विषैले तत्व बाहर निकालने का काम करती है। जब इसकी कार्यक्षमता कम हो जाती है, तो शरीर में पानी जमा होने लगता है। ऐसे मामलों में मरीज को दिखाई दे सकते हैं: पैरों और टखनों में सूजन चेहरे पर सूजन पेशाब में बदलाव लगातार थकान क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) के मरीजों में यह लक्षण काफी आम माना जाता है। लिवर की बीमारी भी बन सकती है वजह लिवर एल्ब्यूमिन नामक महत्वपूर्ण प्रोटीन बनाता है, जो रक्त वाहिकाओं में तरल पदार्थ को नियंत्रित रखने में मदद करता है। यदि लिवर सिरोसिस या अन्य गंभीर बीमारी से प्रभावित हो जाए, तो एल्ब्यूमिन कम बनने लगता है, जिससे: पैरों में सूजन पेट में पानी भरना शरीर में भारीपन जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। नसों में खून का थक्का भी हो सकता है कारण यदि किसी एक पैर में अचानक सूजन, दर्द, गर्माहट या लालिमा दिखाई दे, तो यह डीप वेन थ्रॉम्बोसिस (DVT) यानी नस में रक्त का थक्का बनने का संकेत हो सकता है। यह स्थिति गंभीर होती है और तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए क्योंकि थक्का फेफड़ों तक पहुंचकर जानलेवा भी बन सकता है। शरीर में प्रोटीन की कमी से भी आती है सूजन कुपोषण, किडनी रोग या लिवर की बीमारी के कारण शरीर में एल्ब्यूमिन का स्तर कम हो सकता है। ऐसे में रक्त से तरल पदार्थ बाहर निकलकर टिश्यू में जमा होने लगता है, जिससे पैरों में सूजन दिखाई देती है। कुछ दवाएं भी बढ़ा सकती हैं परेशानी विशेषज्ञों के अनुसार इन दवाओं के सेवन से भी पैरों में सूजन हो सकती है: हाई ब्लड प्रेशर की कुछ दवाएं स्टेरॉयड हार्मोनल दवाएं कुछ दर्द निवारक दवाएं डायबिटीज की कुछ दवाएं यदि नई दवा शुरू करने के बाद सूजन आने लगे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। पैरों की सूजन से बचने के आसान उपाय लंबे समय तक लगातार खड़े या बैठे न रहें। नमक का सेवन सीमित करें। पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। नियमित व्यायाम करें। वजन नियंत्रित रखें। बैठते समय पैरों को हल्का ऊंचा रखें। डॉक्टर की सलाह के बिना दवाओं में बदलाव न करें। कब तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए? यदि पैरों की सूजन के साथ इनमें से कोई लक्षण दिखाई दे, तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें: अचानक दोनों या एक पैर में तेज सूजन सांस लेने में तकलीफ सीने में दर्द तेज दर्द या लालिमा पेशाब कम होना कई दिनों तक सूजन का बने रहना
नई दिल्ली: अंडे को दुनिया के सबसे संपूर्ण और पौष्टिक खाद्य पदार्थों में गिना जाता है। इसमें हाई क्वालिटी प्रोटीन, विटामिन, मिनरल्स, हेल्दी फैट्स और कई जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जो शरीर के विभिन्न अंगों और कार्यों को बेहतर बनाए रखने में मदद करते हैं। यदि संतुलित आहार के साथ लगातार 30 दिनों तक रोज़ाना दो अंडे खाए जाएं, तो शरीर में कई सकारात्मक बदलाव महसूस किए जा सकते हैं। डाइटिशियन गिन्नी कालरा के अनुसार, अंडे कोई जादुई भोजन नहीं हैं, लेकिन नियमित और संतुलित मात्रा में सेवन करने से शरीर को आवश्यक पोषण मिलता है, जिससे मांसपेशियों, दिमाग, आंखों, हड्डियों और त्वचा की सेहत में सुधार देखने को मिल सकता है। मसल्स होंगे मजबूत, रिकवरी होगी तेज दो अंडों से लगभग 12–13 ग्राम उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन मिलता है। इसमें शरीर के लिए आवश्यक सभी नौ अमीनो एसिड मौजूद होते हैं, जो मांसपेशियों के विकास, टिश्यू रिपेयर और रिकवरी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नियमित व्यायाम करने वाले, बुजुर्ग और बीमारी से उबर रहे लोगों के लिए यह विशेष रूप से लाभदायक माना जाता है। देर तक नहीं लगेगी भूख अंडे में मौजूद प्रोटीन और हेल्दी फैट्स धीरे-धीरे पचते हैं, जिससे पेट लंबे समय तक भरा रहता है। अगर नाश्ते में दो अंडे शामिल किए जाएं तो बार-बार स्नैकिंग की आदत कम हो सकती है और वजन नियंत्रित रखने में भी मदद मिल सकती है। दिमाग रहेगा अधिक सक्रिय अंडों में कोलीन (Choline) नामक पोषक तत्व पाया जाता है, जो मस्तिष्क, याददाश्त और नर्वस सिस्टम के लिए बेहद जरूरी है। यह एसिटाइलकोलीन नामक न्यूरोट्रांसमीटर के निर्माण में मदद करता है, जिससे सीखने की क्षमता, एकाग्रता और मानसिक सतर्कता बेहतर हो सकती है। आंखों की सेहत को मिलेगा फायदा अंडे में मौजूद ल्यूटिन और जेक्सैंथिन जैसे एंटीऑक्सीडेंट आंखों की रेटिना की सुरक्षा करते हैं। ये बढ़ती उम्र और लंबे समय तक स्क्रीन देखने से होने वाले नुकसान को कम करने में सहायक माने जाते हैं। हड्डियां होंगी मजबूत अंडे प्राकृतिक रूप से विटामिन-डी का स्रोत हैं, जो शरीर में कैल्शियम के अवशोषण में मदद करता है। इससे हड्डियों और दांतों की मजबूती के साथ-साथ इम्यून सिस्टम को भी समर्थन मिलता है। हालांकि, केवल अंडों से पूरी विटामिन-डी की आवश्यकता पूरी नहीं होती, लेकिन यह कुल पोषण में महत्वपूर्ण योगदान देता है। त्वचा, बाल और नाखूनों में दिख सकता है सुधार अंडों में बायोटिन, सेलेनियम, विटामिन-बी कॉम्प्लेक्स और प्रोटीन मौजूद होते हैं, जो बालों, त्वचा और नाखूनों की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। संतुलित आहार के साथ नियमित सेवन करने पर कुछ सप्ताह में सकारात्मक बदलाव महसूस किए जा सकते हैं। क्या अंडे खाने से बढ़ता है कोलेस्ट्रॉल? यह सबसे आम सवालों में से एक है। हाल के वर्षों में हुई कई रिसर्च बताती हैं कि अधिकांश स्वस्थ लोगों में सीमित मात्रा में अंडे खाने से हृदय रोग का खतरा नहीं बढ़ता। शरीर स्वयं कोलेस्ट्रॉल के उत्पादन को नियंत्रित करता है और अंडों से मिलने वाला डाइटरी कोलेस्ट्रॉल पहले की तुलना में कम प्रभाव डालता है। हालांकि, जिन लोगों को अनियंत्रित डायबिटीज, फैमिलियल हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया या पहले से हृदय संबंधी गंभीर बीमारी है, उन्हें नियमित रूप से अंडे खाने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए। क्या रोज़ दो अंडे पर्याप्त हैं? विशेषज्ञों के अनुसार, अधिकांश स्वस्थ वयस्कों के लिए रोज़ाना दो अंडे पर्याप्त माने जाते हैं। इससे प्रोटीन, विटामिन, मिनरल्स और हेल्दी फैट्स की संतुलित मात्रा मिल जाती है। हालांकि, बेहतर परिणाम के लिए अंडों के साथ फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों को भी आहार में शामिल करना जरूरी है। ध्यान रहे कि 30 दिनों में कोई चमत्कारी परिवर्तन नहीं होता, लेकिन नियमित और संतुलित जीवनशैली के साथ दो अंडों का सेवन शरीर के समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में निश्चित रूप से सहायक हो सकता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। देशभर में आज 1 जुलाई को राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस (National Doctors' Day) मनाया जा रहा है। यह दिवस भारत के महान चिकित्सक, स्वतंत्रता सेनानी और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. बिधान चंद्र रॉय की जयंती और पुण्यतिथि की स्मृति में मनाया जाता है। इस अवसर पर अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों और स्वास्थ्य संस्थानों में डॉक्टरों को सम्मानित किया जा रहा है। इस वर्ष की थीम पर विशेष जोर इस वर्ष राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस की थीम "Behind the Mask: Who Heals the Healers?" रखी गई है। इसका उद्देश्य डॉक्टरों के मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करना है। विशेषज्ञों का कहना है कि मरीजों की लगातार सेवा करने वाले डॉक्टरों के स्वास्थ्य और कार्य-जीवन संतुलन पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है। स्वास्थ्य सेवाओं में डॉक्टरों के योगदान को किया गया याद राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने डॉक्टरों को चिकित्सक दिवस की शुभकामनाएं देते हुए उनके समर्पण, सेवा और मानवता के प्रति योगदान की सराहना की। देशभर के अस्पतालों में सम्मान समारोह, स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम और रक्तदान शिविरों का आयोजन भी किया जा रहा है। AI के दौर में भी मानवीय स्पर्श की अहमियत विशेषज्ञों का मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) स्वास्थ्य सेवाओं में तेजी से अपनी जगह बना रही है, लेकिन मरीजों के इलाज में डॉक्टरों का अनुभव, संवेदनशीलता और मानवीय व्यवहार आज भी सबसे महत्वपूर्ण है। चिकित्सक दिवस के अवसर पर स्वास्थ्य क्षेत्र में तकनीक और मानवीय देखभाल के संतुलन पर भी चर्चा हो रही है।
भारतीय रसोई में खाना बनाने के लिए अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरह के तेल का इस्तेमाल किया जाता है। उत्तर भारत में जहां सरसों का तेल सबसे ज्यादा लोकप्रिय है, वहीं दक्षिण भारत में नारियल तेल का उपयोग अधिक होता है। लेकिन अब इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने सलाह दी है कि लंबे समय तक सिर्फ एक ही प्रकार के तेल का इस्तेमाल करना बेहतर विकल्प नहीं है। ICMR की नई डाइटरी गाइडलाइंस के मुताबिक, बेहतर स्वास्थ्य के लिए खाना बनाने में समय-समय पर अलग-अलग खाद्य तेलों का इस्तेमाल करना चाहिए। इससे शरीर को विभिन्न प्रकार के आवश्यक फैटी एसिड और पोषक तत्व मिलते हैं। क्यों बदल-बदलकर इस्तेमाल करना चाहिए कुकिंग ऑयल? ICMR और FSSAI के अनुसार, कोई भी एक कुकिंग ऑयल सभी जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध नहीं कराता। हर खाद्य तेल की अपनी अलग पोषण संबंधी विशेषताएं होती हैं। ऐसे में यदि लोग अलग-अलग तेलों का संतुलित उपयोग करते हैं, तो शरीर को विभिन्न प्रकार के हेल्दी फैट्स और एंटीऑक्सीडेंट्स मिल सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि हेल्दी डाइट का मतलब तेल पूरी तरह छोड़ देना नहीं, बल्कि सही मात्रा और सही तरीके से उसका इस्तेमाल करना है। ICMR की हेल्दी ऑयल गाइडलाइन स्वस्थ रहने के लिए ICMR ने कुछ आसान सुझाव दिए हैं— एक ही तेल का लगातार इस्तेमाल करने के बजाय समय-समय पर तेल बदलें। तेल का उपयोग सीमित मात्रा में करें। एक बार इस्तेमाल किए गए तेल को दोबारा गर्म करने से बचें। ट्रांस फैट वाले खाद्य पदार्थों का सेवन कम करें। डीप फ्राई की बजाय स्टीम, ग्रिल या रोस्टेड भोजन को प्राथमिकता दें। कौन-सा तेल किसलिए फायदेमंद है? सरसों का तेल सरसों का तेल मोनोअनसैचुरेटेड फैटी एसिड और ओमेगा-3 फैटी एसिड का अच्छा स्रोत माना जाता है। यह हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हो सकता है और इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण भी पाए जाते हैं। तिल का तेल तिल के तेल में ओमेगा-6 फैटी एसिड और प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट्स मौजूद होते हैं। यह शरीर में सूजन कम करने और कोशिकाओं की सुरक्षा में मदद कर सकता है। नारियल तेल नारियल तेल में मीडियम चेन ट्राइग्लिसराइड्स (MCTs) पाए जाते हैं, जो शरीर को जल्दी ऊर्जा उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। हालांकि इसका सेवन भी सीमित मात्रा में करने की सलाह दी जाती है। पाम ऑयल ICMR के अनुसार, पाम ऑयल में टोकोफेरॉल्स, टोकोट्रिएनोल्स (विटामिन E के रूप) और कैरोटेनॉयड्स जैसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं। संतुलित मात्रा में उपयोग करने पर यह भी आहार का हिस्सा हो सकता है। हालांकि इसका अत्यधिक सेवन किसी भी अन्य तेल की तरह उचित नहीं माना जाता। सूरजमुखी का तेल सूरजमुखी का तेल विटामिन-E और पॉलीअनसैचुरेटेड फैटी एसिड से भरपूर होता है। यह त्वचा और हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभदायक माना जाता है। तेल की मात्रा कैसे करें कम? FSSAI के मुताबिक, यदि आप रोजाना इस्तेमाल होने वाले तेल की मात्रा में लगभग 10 प्रतिशत की कमी कर दें, तो इससे स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। इसके अलावा— डीप फ्राइड फूड्स कम खाएं। प्रोसेस्ड और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करें। घर में कम तेल वाले भोजन को प्राथमिकता दें। भोजन में फल, सब्जियां और साबुत अनाज की मात्रा बढ़ाएं। क्या है विशेषज्ञों की सलाह? विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ जीवनशैली के लिए किसी एक तेल को 'सबसे बेहतर' मानने के बजाय संतुलित और विविधतापूर्ण आहार अपनाना ज्यादा जरूरी है। अलग-अलग कुकिंग ऑयल का सीमित मात्रा में उपयोग, संतुलित खानपान और नियमित शारीरिक गतिविधि मिलकर हृदय और संपूर्ण स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत में हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension) और डायबिटीज के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आमतौर पर लोग हाई बीपी की वजह अधिक नमक, मोटापा, तनाव, धूम्रपान या खराब लाइफस्टाइल को मानते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार बार-बार बढ़ता ब्लड प्रेशर किसी हार्मोनल समस्या, खासकर थायरॉइड डिसऑर्डर का भी संकेत हो सकता है। कार्डियक विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ब्लड प्रेशर दवाइयों के बावजूद बार-बार बढ़ रहा है या नियंत्रित नहीं हो रहा, तो थायरॉइड की जांच जरूर करानी चाहिए। कैसे जुड़ा है थायरॉइड और हाई ब्लड प्रेशर? थायरॉइड ग्रंथि शरीर में बनने वाले T3 (Triiodothyronine) और T4 (Thyroxine) हार्मोन का उत्पादन करती है। ये हार्मोन शरीर के मेटाबॉलिज्म, दिल की धड़कन और रक्त वाहिकाओं के सामान्य कामकाज को नियंत्रित करते हैं। जब थायरॉइड हार्मोन कम बनने लगते हैं, जिसे हाइपोथायरॉइडिज्म (Hypothyroidism) कहा जाता है, तब रक्त वाहिकाएं धीरे-धीरे सख्त होने लगती हैं। इससे रक्त प्रवाह प्रभावित होता है और ब्लड प्रेशर, विशेष रूप से डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर (निचला स्तर), बढ़ सकता है। डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर क्यों बढ़ता है? हाइपोथायरॉइडिज्म में दिल की धड़कन सामान्य से धीमी हो जाती है। साथ ही रक्त वाहिकाओं का लचीलापन कम होने लगता है। यही कारण है कि शरीर में रक्त प्रवाह बनाए रखने के लिए दबाव बढ़ सकता है, जिससे डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर बढ़ने का खतरा रहता है। विशेषज्ञों का कहना है कि हाई बीपी और थायरॉइड के बीच संबंध को देखते हुए दोनों स्थितियों की जांच एक साथ करना बेहतर माना जाता है। कब करानी चाहिए थायरॉइड जांच? यदि आपको— बार-बार हाई ब्लड प्रेशर की समस्या हो, दवा लेने के बावजूद बीपी नियंत्रित न हो, लगातार थकान महसूस हो, वजन बढ़ रहा हो, ठंड ज्यादा लगती हो, दिल की धड़कन धीमी रहती हो, तो डॉक्टर की सलाह पर TSH, T3 और T4 टेस्ट जरूर करवाना चाहिए। हाइपोथायरॉइडिज्म में किन दवाओं में बरतें सावधानी? विशेषज्ञों के अनुसार, हाइपोथायरॉइडिज्म के मरीजों में पहले से ही दिल की धड़कन धीमी हो सकती है। ऐसे में कुछ बीपी की दवाएं, जैसे बीटा-ब्लॉकर्स और कुछ कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स, धड़कन को और धीमा कर सकती हैं। इसलिए कोई भी दवा डॉक्टर की सलाह के बिना शुरू या बंद नहीं करनी चाहिए। ब्लड प्रेशर कंट्रोल रखने के आसान उपाय हाई ब्लड प्रेशर और थायरॉइड दोनों स्थितियों में स्वस्थ जीवनशैली काफी मददगार साबित होती है। रोजाना कम से कम 30 मिनट व्यायाम करें। योग और कार्डियो एक्सरसाइज को दिनचर्या में शामिल करें। नमक का सेवन सीमित रखें। फल, सब्जियां और साबुत अनाज से भरपूर DASH डाइट अपनाएं। पोटैशियम युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन बढ़ाएं। धूम्रपान और शराब से दूरी बनाएं। नियमित रूप से ब्लड प्रेशर और थायरॉइड की जांच कराते रहें। डॉक्टर की सलाह विशेषज्ञों का कहना है कि हाई ब्लड प्रेशर और थायरॉइड की समस्या कई मामलों में एक-दूसरे से जुड़ी हो सकती हैं। इसलिए जिन लोगों को लगातार हाई बीपी की शिकायत रहती है, उन्हें थायरॉइड की जांच जरूर करानी चाहिए। वहीं थायरॉइड के मरीजों को भी समय-समय पर अपना ब्लड प्रेशर मॉनिटर करना चाहिए ताकि किसी गंभीर हृदय संबंधी समस्या से बचा जा सके।
नई दिल्ली, एजेंसियां। हर महीने होने वाला मासिक धर्म महिलाओं के शरीर की सामान्य जैविक प्रक्रिया है, लेकिन यदि पीरियड्स के दौरान दर्द असहनीय हो जाए और रोजमर्रा के कामकाज प्रभावित होने लगें, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक दर्द कई बार एंडोमेट्रियोसिस जैसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है, जो समय पर इलाज न मिलने पर प्रजनन क्षमता (फर्टिलिटी) को भी प्रभावित कर सकती है। क्या है एंडोमेट्रियोसिस? विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में प्रजनन आयु की लगभग 10 प्रतिशत महिलाएं और किशोरियां एंडोमेट्रियोसिस से प्रभावित हैं। इस स्थिति में गर्भाशय की अंदरूनी परत (एंडोमेट्रियम) जैसे ऊतक गर्भाशय के बाहर अंडाशय, फैलोपियन ट्यूब या पेट के अन्य हिस्सों में विकसित होने लगते हैं। मासिक चक्र के दौरान इन ऊतकों में भी रक्तस्राव और सूजन होती है, जिससे तेज दर्द, स्कारिंग और कई बार सिस्ट बनने जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि हर माह पीरियड्स के दौरान असहनीय दर्द हो, बार-बार दर्द निवारक दवाओं की जरूरत पड़े, पेल्विक हिस्से में लगातार दर्द बना रहे, संभोग, पेशाब या शौच के समय दर्द महसूस हो, अत्यधिक रक्तस्राव, थकान, पेट फूलना, कब्ज या दस्त जैसी समस्याएं हों, तो तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए। कई मामलों में बीमारी की पहचान वर्षों बाद हो पाती है क्योंकि इसके लक्षणों को सामान्य पीरियड्स का हिस्सा मान लिया जाता है। बांझपन का बढ़ सकता है खतरा अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्टेट्रिशियन एंड गायनेकोलॉजिस्ट (ACOG) के अनुसार, एंडोमेट्रियोसिस महिलाओं में बांझपन के प्रमुख कारणों में शामिल है। यह बीमारी अंडाणु और शुक्राणु के मिलन की प्रक्रिया में बाधा डाल सकती है, जिससे गर्भधारण कठिन हो जाता है। हालांकि समय पर जांच, उचित दवाओं, हार्मोनल उपचार और जीवनशैली में सुधार के जरिए इसके जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। समय पर जांच है सबसे बड़ा बचाव विशेषज्ञों का कहना है कि पीरियड्स के दौरान होने वाले अत्यधिक दर्द को सामान्य समझकर अनदेखा करना भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। इसलिए ऐसे किसी भी लक्षण के दिखने पर बिना देरी किए डॉक्टर से परामर्श लेना और आवश्यक जांच कराना ही सुरक्षित विकल्प है।
नई दिल्ली। चुकंदर को सेहत के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसका सही तरीके से सेवन करना जरूरी है ताकि शरीर को पूरा फायदा मिल सके। चुकंदर में आयरन, फोलेट, फाइबर, पोटैशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो खून की कमी दूर करने और इम्यूनिटी बढ़ाने में मदद करते हैं। 1. सुबह खाली पेट सेवन सबसे बेहतर स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, चुकंदर का सेवन सुबह खाली पेट करना अधिक फायदेमंद होता है, क्योंकि इससे शरीर पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से अवशोषित कर पाता है और ऊर्जा बनी रहती है। 2.जूस की बजाय सलाद है ज्यादा फायदेमंद विशेषज्ञों का मानना है कि चुकंदर को जूस की बजाय सलाद के रूप में खाना ज्यादा लाभकारी होता है, क्योंकि इसमें मौजूद फाइबर पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में मदद करता है। 3.गाजर और आंवला के साथ सेवन से बढ़ते हैं फायदे चुकंदर को गाजर और आंवला के साथ मिलाकर सेवन करने से इसके पोषक तत्व और एंटीऑक्सीडेंट्स का लाभ बढ़ जाता है, जो इम्यूनिटी मजबूत करने में सहायक हो सकता है। 4.सीमित मात्रा और सावधानी जरूरी विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि रोजाना 1 मध्यम आकार का चुकंदर या 150–200 मिलीलीटर जूस पर्याप्त है। अधिक सेवन से पेट संबंधी समस्या हो सकती है। किडनी स्टोन के मरीजों को इसका सेवन डॉक्टर की सलाह से ही करना चाहिए।
नई दिल्ली, एजेंसियां। आज की आरामदायक जिंदगी में डेस्क पर काम, कार में सफर और स्क्रीन के सामने आराम ने हमें शारीरिक रूप से बेहद सुस्त बना दिया है। वड़ोदरा के भाईलाल अमीन जनरल हॉस्पिटल की कंसल्टेंट मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. इति पारिख के अनुसार, दिन के 6 या उससे अधिक घंटे बैठे रहना और फिजिकल एक्टिविटी न करना कैंसर समेत कई गंभीर बीमारियों का बड़ा कारण बन रहा है। कैसे बढ़ता है कैंसर का खतरा? डॉ. पारिख के अनुसार फिजिकल इनएक्टिविटी से चार तरह से कैंसर का खतरा बढ़ता है। पहला, वजन बढ़ने और मोटापे से हार्मोन असंतुलन होता है। दूसरा, शरीर में लंबे समय तक सूजन रहने से DNA को नुकसान पहुंचता है। तीसरा, इंसुलिन और एस्ट्रोजन जैसे हार्मोन का स्तर बढ़ने से ब्रेस्ट और एंडोमेट्रियल कैंसर का जोखिम बढ़ता है। चौथा, इम्यून सिस्टम कमजोर होने से कैंसर सेल्स को पनपने का मौका मिलता है। छोटे बदलाव, बड़ा फर्क डॉ. पारिख बताती हैं कि बचाव के लिए बड़े बदलाव जरूरी नहीं। हर घंटे दो मिनट टहलें, हफ्ते में 150 मिनट मीडियम एक्सरसाइज करें, लिफ्ट की बजाय सीढ़ियां चुनें और स्क्रीन टाइम कम करें। बैलेंस्ड डाइट के साथ नियमित फिजिकल एक्टिविटी कैंसर के खतरे को काफी हद तक कम कर सकती है। 40% कैंसर रोके जा सकते हैं WHO के अनुसार लगभग 40 प्रतिशत कैंसर मामलों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर रोका जा सकता है। डॉ. पारिख कहती हैं कि फिजिकल एक्टिविटी न केवल कैंसर बल्कि दिल की सेहत, मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर बनाती है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में नींद से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। कई लोग रात में बार-बार नींद टूटने, खर्राटे आने या सुबह उठने के बाद भी थकान महसूस करने जैसी समस्याओं से जूझते हैं। अक्सर लोग इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA) जैसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है। स्लीप एपनिया केवल नींद की गुणवत्ता को प्रभावित नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे दिमाग की कार्यक्षमता, याददाश्त और मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डाल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इसका इलाज नहीं किया गया, तो यह ब्रेन टिश्यू को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ स्ट्रोक और डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ा सकता है। क्या है स्लीप एपनिया? ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें सोते समय श्वसन मार्ग बार-बार आंशिक या पूरी तरह बंद हो जाता है। इसके कारण सांस लेने में रुकावट आती है और व्यक्ति की नींद बार-बार टूटती रहती है। कई बार मरीज को इसका एहसास भी नहीं होता, लेकिन उसका शरीर पूरी रात इस समस्या से जूझता रहता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह रुकावट एक रात में दर्जनों या यहां तक कि सैकड़ों बार भी हो सकती है। दिमाग को कैसे पहुंचता है नुकसान? ऑक्सीजन की कमी बनती है सबसे बड़ा खतरा स्लीप एपनिया के दौरान शरीर और दिमाग को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। इस स्थिति को "इंटरमिटेंट हाइपोक्सिया" कहा जाता है। दिमाग को लगातार ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। जब बार-बार ऑक्सीजन की कमी होती है, तो मस्तिष्क की कोशिकाएं प्रभावित होने लगती हैं। खासकर वे हिस्से जो याददाश्त, ध्यान और निर्णय लेने की क्षमता को नियंत्रित करते हैं। रिसर्च में पाया गया है कि लंबे समय तक बिना इलाज वाले स्लीप एपनिया से हिप्पोकैम्पस और फ्रंटल कॉर्टेक्स जैसे महत्वपूर्ण ब्रेन क्षेत्रों में बदलाव हो सकते हैं। याददाश्त और सोचने की क्षमता पर असर स्लीप एपनिया से पीड़ित लोगों में अक्सर ये समस्याएं देखी जाती हैं— चीजें भूलना ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई निर्णय लेने में परेशानी मानसिक प्रतिक्रिया की गति धीमी होना पढ़ाई और काम में प्रदर्शन प्रभावित होना नींद की रिकवरी प्रक्रिया हो जाती है प्रभावित हर बार सांस रुकने पर शरीर हल्की अवस्था में जाग जाता है, जिसे मेडिकल भाषा में "अराउजल" कहा जाता है। इससे गहरी नींद और REM Sleep बार-बार बाधित होती है। यही वे चरण हैं जिनमें— दिमाग खुद की मरम्मत करता है यादें मजबूत होती हैं भावनात्मक संतुलन बनता है सीखने की क्षमता बेहतर होती है जब ये प्रक्रियाएं पूरी नहीं हो पातीं, तो व्यक्ति दिनभर थकान, चिड़चिड़ापन और सुस्ती महसूस करता है। बढ़ सकता है स्ट्रोक का खतरा विशेषज्ञों के अनुसार स्लीप एपनिया केवल नींद की बीमारी नहीं है, बल्कि यह रक्त वाहिकाओं को भी प्रभावित करता है। बार-बार ऑक्सीजन की कमी और फिर अचानक ऑक्सीजन मिलने की प्रक्रिया से— सूजन बढ़ती है ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ता है हृदय रोगों की संभावना बढ़ती है इन सभी कारणों से स्ट्रोक और मस्तिष्क संबंधी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है। अल्जाइमर और डिमेंशिया से भी जुड़ सकता है संबंध हाल के शोध बताते हैं कि लंबे समय तक अनुपचारित स्लीप एपनिया अल्जाइमर और अन्य न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के जोखिम को बढ़ा सकता है। नींद में लगातार व्यवधान आने से दिमाग में जमा होने वाले हानिकारक प्रोटीन, जैसे बीटा-एमिलॉयड, ठीक तरह से साफ नहीं हो पाते। यही प्रोटीन आगे चलकर डिमेंशिया और अल्जाइमर से जुड़े पाए गए हैं। किन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें? यदि आपको इनमें से कोई लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है— तेज खर्राटे आना रात में बार-बार नींद खुलना सोते समय सांस रुकने जैसा महसूस होना सुबह सिरदर्द होना दिनभर अत्यधिक नींद आना लगातार थकान महसूस होना ध्यान और याददाश्त कमजोर होना क्या है इसका इलाज? अच्छी बात यह है कि स्लीप एपनिया का इलाज संभव है। विशेषज्ञ इसके लिए कई उपाय सुझाते हैं— CPAP (Continuous Positive Airway Pressure) थेरेपी वजन नियंत्रित करना नियमित व्यायाम धूम्रपान और शराब से दूरी ओरल डिवाइस का उपयोग सोने की सही पोजीशन अपनाना समय पर पहचान और उपचार से न केवल नींद की गुणवत्ता बेहतर होती है, बल्कि दिमाग को होने वाले लंबे समय के नुकसान से भी बचा जा सकता है।
आज की व्यस्त जीवनशैली में महिलाएं अक्सर अपनी सेहत से जुड़े कई संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं। खासतौर पर पीरियड्स में होने वाली अनियमितता को तनाव, काम के दबाव या बदलती दिनचर्या का असर मानकर टाल दिया जाता है। लेकिन अगर आपकी पीरियड्स साइकिल लगातार 35 दिनों से ज्यादा लंबी हो रही है या मासिक धर्म कई महीनों तक नहीं आ रहा है, तो यह पॉलीएंडोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS) का शुरुआती संकेत हो सकता है। महिला स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, पहले जिसे PCOS (पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम) के नाम से जाना जाता था, अब कई विशेषज्ञ इसे PMOS के रूप में भी संदर्भित कर रहे हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें हार्मोनल असंतुलन महिलाओं की प्रजनन क्षमता, मेटाबॉलिज्म और संपूर्ण स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। क्या है PMOS? PMOS एक हार्मोनल और मेटाबोलिक समस्या है, जिसमें ओवरीज में कई छोटे फॉलिकल्स विकसित हो जाते हैं और ओव्यूलेशन की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इसके कारण पीरियड्स अनियमित हो सकते हैं, वजन बढ़ सकता है और शरीर में कई अन्य बदलाव दिखाई देने लगते हैं। नई दिल्ली स्थित कैपिटल हेल्थ क्लिनिक की डायरेक्टर और महिला स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. बिमलप्रीत मोहन के अनुसार, कई युवा महिलाएं पीरियड्स की अनियमितता को सामान्य मान लेती हैं, जबकि यह शरीर में चल रहे हार्मोनल असंतुलन का संकेत हो सकता है। PMOS के प्रमुख लक्षण 1. 35 दिनों से लंबी पीरियड्स साइकिल यह PMOS का सबसे सामान्य और शुरुआती संकेत माना जाता है। पीरियड्स के बीच का अंतर 35 दिनों से अधिक होना, महीनों तक मासिक धर्म न आना या ब्लीडिंग का पैटर्न अनियमित होना हार्मोनल गड़बड़ी का संकेत हो सकता है। 2. बिना वजह वजन बढ़ना विशेष रूप से पेट और कमर के आसपास तेजी से वजन बढ़ना PMOS से जुड़ा आम लक्षण है। कई बार डाइट और एक्सरसाइज के बावजूद वजन कम नहीं होता। 3. लगातार मुंहासे होना अगर टीनएज के बाद भी चेहरे पर बार-बार मुंहासे निकल रहे हैं, खासकर ठुड्डी और जॉलाइन के आसपास, तो यह हार्मोनल असंतुलन की ओर इशारा कर सकता है। 4. चेहरे और शरीर पर अनचाहे बाल होंठों के ऊपर, ठुड्डी, छाती, पेट या पीठ पर अत्यधिक बाल उगना शरीर में एंड्रोजन हार्मोन के बढ़े स्तर का संकेत हो सकता है। 5. बालों का झड़ना सिर के बाल पतले होना, हेयरलाइन चौड़ी होना या जरूरत से ज्यादा बाल झड़ना भी PMOS से जुड़ा महत्वपूर्ण लक्षण माना जाता है। 6. गर्भधारण में परेशानी अनियमित ओव्यूलेशन के कारण कई महिलाओं को कंसीव करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। हालांकि समय पर उपचार से इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए? यदि आपको निम्न में से कोई समस्या लगातार दिखाई दे रही है, तो तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए— तीन महीने से अधिक समय तक अनियमित पीरियड्स लगातार मुंहासों की समस्या चेहरे या शरीर पर अत्यधिक बाल बिना कारण तेजी से वजन बढ़ना बालों का अत्यधिक झड़ना गर्भधारण में कठिनाई क्या PMOS को रोका जा सकता है? हालांकि आनुवंशिक और हार्मोनल कारणों को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। नियमित व्यायाम करें संतुलित और पौष्टिक भोजन लें प्रोसेस्ड फूड्स से दूरी बनाएं तनाव कम करने के लिए योग और मेडिटेशन करें पर्याप्त नींद लें समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराएं विशेषज्ञों का मानना है कि PMOS का समय पर पता लगने और सही इलाज मिलने पर महिलाएं सामान्य और स्वस्थ जीवन जी सकती हैं। इसलिए पीरियड्स से जुड़े किसी भी असामान्य बदलाव को नजरअंदाज करना भविष्य में बड़ी समस्या का कारण बन सकता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। मानसून का मौसम गर्मी से राहत तो देता है, लेकिन अपने साथ कई तरह की बीमारियां भी लेकर आता है। बारिश के दौरान पानी जमा होने, नमी बढ़ने और दूषित भोजन एवं पानी के कारण संक्रमण का खतरा काफी बढ़ जाता है। बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों को बरसात के मौसम में विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है। आइए जानते हैं कि बरसात में कौन-कौन सी बीमारियां सबसे ज्यादा होती हैं और उनसे कैसे बचा जा सकता है। 1. डेंगू लक्षण तेज बुखार सिरदर्द आंखों के पीछे दर्द शरीर और जोड़ों में तेज दर्द त्वचा पर लाल चकत्ते बचाव घर के आसपास पानी जमा न होने दें। मच्छरदानी और मच्छर भगाने वाली क्रीम का उपयोग करें। पूरे बाजू के कपड़े पहनें। 2. मलेरिया लक्षण तेज बुखार ठंड लगना कंपकंपी पसीना आना कमजोरी बचाव साफ-सफाई रखें। मच्छरों से बचाव करें। पानी जमा न होने दें। 3. चिकनगुनिया लक्षण तेज बुखार जोड़ों में असहनीय दर्द सिरदर्द शरीर पर दाने बचाव मच्छरों से बचें। घर और आसपास सफाई रखें। 4. वायरल फीवर लक्षण बुखार गले में दर्द खांसी सिरदर्द कमजोरी बचाव भीगने के बाद तुरंत कपड़े बदलें। पर्याप्त आराम करें। गर्म पानी पिएं। 5. टाइफाइड लक्षण लगातार बुखार पेट दर्द भूख कम लगना कमजोरी बचाव केवल साफ और उबला हुआ पानी पिएं। बाहर का दूषित भोजन खाने से बचें। हाथ धोने की आदत रखें। 6. हैजा लक्षण बार-बार दस्त उल्टी शरीर में पानी की कमी कमजोरी बचाव स्वच्छ पानी पिएं। साफ-सुथरा भोजन करें। ORS का उपयोग करें और समय पर डॉक्टर से मिलें। 7. फूड पॉइजनिंग लक्षण उल्टी दस्त पेट दर्द बुखार बचाव बासी भोजन न खाएं। खुले में बिकने वाले खाद्य पदार्थों से बचें। फल और सब्जियां अच्छी तरह धोकर खाएं। 8. त्वचा संक्रमण लक्षण खुजली लाल चकत्ते फंगल इंफेक्शन दाद बचाव शरीर को सूखा रखें। भीगे कपड़े तुरंत बदलें। साफ कपड़े पहनें। 9. आंखों का संक्रमण लक्षण आंख लाल होना पानी आना जलन खुजली बचाव आंखों को बार-बार न छुएं। साफ तौलिया इस्तेमाल करें। संक्रमित व्यक्ति की चीजें साझा न करें। 10. सर्दी-खांसी और फ्लू लक्षण नाक बहना खांसी गले में दर्द हल्का बुखार बचाव बारिश में भीगने से बचें। गर्म पेय पदार्थ लें। हाथों की सफाई का ध्यान रखें। बरसात में स्वस्थ रहने के 10 जरूरी टिप्स केवल साफ और उबला हुआ पानी पिएं। बाहर का कटा हुआ फल और स्ट्रीट फूड कम खाएं। बारिश में भीगने के बाद तुरंत नहाकर सूखे कपड़े पहनें। घर के आसपास पानी जमा न होने दें। मच्छरों से बचाव के उपाय अपनाएं। ताजा और गर्म भोजन करें। हाथों को साबुन से बार-बार धोएं। पर्याप्त नींद लें और नियमित व्यायाम करें। बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें। बुखार, लगातार दस्त, सांस लेने में तकलीफ या अन्य गंभीर लक्षण होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। किन लोगों को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए? छोटे बच्चे गर्भवती महिलाएं बुजुर्ग मधुमेह (डायबिटीज) के मरीज हृदय रोगी कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोग
नई दिल्ली: बिना डॉक्टर की सलाह के दवा लेना भारत में एक आम आदत बन चुकी है, लेकिन यही लापरवाही कई बार गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार सेल्फ-मेडिकेशन से बचने की सलाह देते हैं, क्योंकि कुछ दवाओं के गलत कॉम्बिनेशन या अधिक मात्रा का सेवन शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसा ही एक कॉम्बिनेशन है पैरासिटामोल और निमेसुलाइड डिस्पर्सिबल टैबलेट, जिस पर भारत सरकार ने प्रतिबंध लगाया हुआ है। यह दवा पहले बुखार और शरीर दर्द में इस्तेमाल की जाती थी, लेकिन इसके संभावित दुष्प्रभावों को देखते हुए सरकार ने इसके निर्माण, बिक्री और उपयोग पर रोक लगा दी। क्या है पैरासिटामोल-निमेसुलाइड डिस्पर्सिबल टैबलेट? डिस्पर्सिबल टैबलेट वह दवा होती है जिसे सेवन से पहले पानी में घोलकर लिया जाता है, ताकि उसका असर जल्दी शुरू हो सके। लेकिन शोधों में पाया गया कि पैरासिटामोल और निमेसुलाइड का यह संयोजन डिस्पर्सिबल रूप में स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 की धारा 26A के तहत इस कॉम्बिनेशन पर प्रतिबंध लगाया है। बिना डॉक्टर की सलाह के नहीं खरीद सकते पहले यह दवा आसानी से मेडिकल स्टोर पर उपलब्ध थी, लेकिन अब इसे डॉक्टर की सलाह के बिना लेना सुरक्षित नहीं माना जाता। दवा खरीदते समय उसके ब्रांड नाम के साथ लिखे जेनेरिक साल्ट्स को पढ़ना जरूरी है, ताकि आपको पता चल सके कि उसमें कौन-कौन सी दवाएं शामिल हैं। 12 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित सरकार ने 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में निमेसुलाइड के किसी भी फॉर्मुलेशन के उपयोग पर पूरी तरह रोक लगा रखी है। विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में इस दवा के दुष्प्रभाव अधिक तेजी से और गंभीर रूप में सामने आ सकते हैं। 100 मिलीग्राम से अधिक डोज की अनुमति नहीं निमेसुलाइड एक नॉन-स्टेरॉइडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग (NSAID) है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से तीव्र दर्द में किया जाता है। सरकार ने दवा निर्माता कंपनियों को निर्देश दिया है कि किसी भी ओरल दवा में इसकी मात्रा 100 मिलीग्राम से अधिक नहीं होनी चाहिए। लिवर के लिए बन सकती है खतरा विभिन्न शोधों में निमेसुलाइड के संभावित दुष्प्रभावों पर चिंता जताई गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका गलत या लंबे समय तक इस्तेमाल लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है और कुछ मामलों में एक्यूट हेपेटाइटिस जैसी गंभीर स्थिति भी पैदा हो सकती है। इसी वजह से कई स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस दवा के अनियंत्रित उपयोग के खिलाफ चेतावनी देते रहे हैं। दवा लेने से पहले रखें ये बातें ध्यान में बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी दर्द निवारक दवा न लें। दवा के पैकेट पर लिखे साल्ट्स जरूर पढ़ें। बच्चों को किसी भी दवा का सेवन कराने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लें। निर्धारित डोज से अधिक दवा लेने से बचें। किसी भी प्रकार के साइड इफेक्ट दिखाई देने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
नई दिल्ली: गर्मियों के मौसम में रात के खाने के बाद ठंडी और मीठी आइसक्रीम खाना कई लोगों की पसंद होती है। कुछ लोग इसे दिनभर की थकान दूर करने का तरीका मानते हैं, तो कुछ के लिए यह डेजर्ट का अहम हिस्सा होती है। लेकिन क्या रोजाना डिनर के बाद आइसक्रीम खाना सेहत के लिए सही है? विशेषज्ञों के अनुसार, कभी-कभार सीमित मात्रा में आइसक्रीम खाना नुकसानदायक नहीं माना जाता, लेकिन अगर इसे रोजाना और अधिक मात्रा में खाया जाए तो इससे पाचन, वजन, ब्लड शुगर और नींद पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। डिनर के बाद आइसक्रीम खाने से शरीर पर क्या असर पड़ता है? आइसक्रीम में शुगर, सैचुरेटेड फैट और कैलोरी की मात्रा अधिक होती है। जब भारी भोजन के तुरंत बाद इसका सेवन किया जाता है, तो शरीर को एक साथ ज्यादा फैट और शुगर को पचाने में अधिक मेहनत करनी पड़ती है। रात के समय शरीर का मेटाबॉलिज्म दिन की तुलना में थोड़ा धीमा हो जाता है। ऐसे में अतिरिक्त कैलोरी और शुगर शरीर में जमा होने लगती है, जिससे कई तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं। पाचन प्रक्रिया हो सकती है धीमी अगर आपने ऑयली या भारी भोजन किया है और उसके तुरंत बाद आइसक्रीम खा लेते हैं, तो इससे: पेट भारी लगना गैस बनना ब्लोटिंग एसिडिटी पेट दर्द सुस्ती महसूस होना जैसी समस्याएं हो सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि फैट और शुगर पाचन प्रक्रिया को धीमा कर देते हैं, जिससे भोजन को पूरी तरह पचने में अधिक समय लग सकता है। ब्लड शुगर पर पड़ सकता है असर सामान्य आइसक्रीम में मौजूद अधिक शुगर ब्लड शुगर लेवल को तेजी से बढ़ा सकती है। खासकर डायबिटीज के मरीजों के लिए रात में मीठी आइसक्रीम का सेवन जोखिम बढ़ा सकता है। ब्लड शुगर अचानक बढ़ने और फिर गिरने की वजह से: देर रात भूख लगना थकान महसूस होना सुस्ती बढ़ना जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। नींद की गुणवत्ता भी हो सकती है प्रभावित रात में हाई-फैट और हाई-शुगर फूड खाने से नींद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। पेट में गैस, एसिडिटी या भारीपन की वजह से नींद बार-बार टूट सकती है। कुछ लोगों में ठंडी चीजें खाने के बाद शरीर की अलर्टनेस भी बढ़ जाती है, जिससे आसानी से नींद नहीं आती। किन लोगों को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए? रात में आइसक्रीम खाने से इन लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए: लैक्टोज इनटॉलरेंस से पीड़ित लोग डायबिटीज के मरीज मोटापे से परेशान लोग एसिडिटी या गैस की समस्या वाले लोग कमजोर पाचन वाले लोग क्या पूरी तरह आइसक्रीम छोड़ देनी चाहिए? विशेषज्ञों के अनुसार, डिनर के बाद कभी-कभार सीमित मात्रा में आइसक्रीम खाना सामान्य रूप से सुरक्षित माना जा सकता है। लेकिन रोजाना और ज्यादा मात्रा में इसका सेवन पाचन, वजन और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। अगर आपको पहले से डायबिटीज, मोटापा या पाचन संबंधी समस्या है, तो रात में हाई-कैलोरी और अधिक मीठे डेजर्ट से दूरी बनाना बेहतर विकल्प हो सकता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। हार्ट अटैक (Heart Attack) दुनिया भर में मौत के प्रमुख कारणों में से एक है। अच्छी बात यह है कि कई मामलों में शरीर हार्ट अटैक आने से पहले कुछ चेतावनी संकेत देता है। यदि इन लक्षणों को समय रहते पहचान लिया जाए और तुरंत डॉक्टर से संपर्क किया जाए, तो गंभीर स्थिति से बचा जा सकता है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि हर व्यक्ति में लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं और कुछ लोगों में बिना स्पष्ट चेतावनी के भी हार्ट अटैक हो सकता है। हार्ट अटैक क्या होता है? हार्ट अटैक तब होता है जब हृदय तक रक्त पहुंचाने वाली धमनियों (Coronary Arteries) में रुकावट आ जाती है। इससे हृदय की मांसपेशियों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती और उनका नुकसान शुरू हो जाता है। समय पर इलाज न मिलने पर यह जानलेवा साबित हो सकता है। Heart Attack से पहले दिखने वाले 10 प्रमुख संकेत 1. सीने में दर्द या दबाव यह हार्ट अटैक का सबसे सामान्य लक्षण है। सीने में भारीपन, जकड़न या दबाव महसूस होना। दर्द कुछ मिनट तक रह सकता है या बार-बार आ-जा सकता है। कई लोग इसे गैस या एसिडिटी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। 2. सांस लेने में तकलीफ यदि बिना किसी विशेष कारण के सांस फूलने लगे या हल्का काम करने पर भी सांस लेने में परेशानी हो, तो इसे गंभीरता से लें। 3. बाएं हाथ, कंधे, गर्दन या जबड़े में दर्द हार्ट अटैक का दर्द केवल सीने तक सीमित नहीं रहता। दर्द फैल सकता है: बाएं हाथ में दोनों कंधों में गर्दन जबड़े पीठ 4. अत्यधिक पसीना आना यदि ठंडे वातावरण में भी अचानक बहुत ज्यादा पसीना आने लगे और उसके साथ बेचैनी महसूस हो, तो यह हार्ट अटैक का संकेत हो सकता है। 5. अचानक कमजोरी या थकान कई लोगों, विशेषकर महिलाओं में, हार्ट अटैक से कुछ दिन या हफ्ते पहले असामान्य थकान महसूस हो सकती है। 6. मतली, उल्टी या अपच जैसा महसूस होना कुछ मरीजों को लगता है कि उन्हें गैस या एसिडिटी है, जबकि वास्तव में यह हार्ट अटैक का शुरुआती संकेत हो सकता है। 7. चक्कर आना अचानक चक्कर आना, बेहोशी जैसा महसूस होना या संतुलन बिगड़ना भी चेतावनी संकेत हो सकता है। 8. बेचैनी या घबराहट कुछ लोगों को हार्ट अटैक से पहले बिना किसी स्पष्ट कारण के बहुत ज्यादा बेचैनी या घबराहट महसूस होती है। 9. पीठ में दर्द महिलाओं में कभी-कभी हार्ट अटैक का दर्द पीठ या कंधे में भी महसूस हो सकता है। 10. नींद में परेशानी कुछ अध्ययनों के अनुसार हार्ट अटैक से पहले कई लोगों को लगातार नींद न आने या बेचैनी की समस्या हो सकती है। महिलाओं में हार्ट अटैक के लक्षण अलग हो सकते हैं महिलाओं में हमेशा सीने में तेज दर्द नहीं होता। इन लक्षणों पर भी ध्यान दें: अत्यधिक थकान सांस फूलना मतली गर्दन या जबड़े में दर्द पीठ दर्द इसी कारण महिलाओं में हार्ट अटैक की पहचान कई बार देर से होती है। किन लोगों को ज्यादा खतरा होता है? हाई ब्लड प्रेशर डायबिटीज हाई कोलेस्ट्रॉल धूम्रपान मोटापा नियमित व्यायाम न करना तनाव परिवार में हृदय रोग का इतिहास बढ़ती उम्र हार्ट अटैक से बचने के उपाय रोज़ कम से कम 30 मिनट पैदल चलें। धूम्रपान और तंबाकू से दूर रहें। संतुलित आहार लें। ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्रॉल की नियमित जांच कराएं। पर्याप्त नींद लें। तनाव कम करने के लिए योग या ध्यान करें। डॉक्टर की सलाह के बिना कोई दवा न लें। कब तुरंत अस्पताल जाएं? यदि इनमें से कोई लक्षण 5–10 मिनट से अधिक समय तक बना रहे या बढ़ता जाए, तो तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सेवा लें। स्वयं वाहन चलाकर अस्पताल जाने के बजाय एम्बुलेंस बुलाना अधिक सुरक्षित हो सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।