स्वास्थ्य

Doctors reviewing brain MRI and CT scans as neuroimaging use rises sharply across Europe
नई MRCP तकनीक से Primary Sclerosing Cholangitis के खतरे का बेहतर अंदाजा, स्टडी में बड़ा दावा

Primary Sclerosing Cholangitis (PSC) जैसी गंभीर लिवर बीमारी के जोखिम का पहले से ज्यादा सटीक अनुमान लगाने में अब नई इमेजिंग तकनीक मदद कर सकती है। एक अंतरराष्ट्रीय मल्टी-सेंटर स्टडी में दावा किया गया है कि Quantitative MRCP यानी मैग्नेटिक रेजोनेंस कोलांजियोपैंक्रियाटोग्राफी आधारित नई तकनीक PSC मरीजों में बीमारी की गंभीरता और भविष्य के जोखिम को बेहतर तरीके से पहचान सकती है। क्या है PSC बीमारी? Primary Sclerosing Cholangitis एक क्रॉनिक लिवर डिजीज है, जिसमें बाइल डक्ट्स यानी पित्त नलिकाओं में सूजन और फाइब्रोसिस होने लगता है। इससे धीरे-धीरे: लिवर को नुकसान पहुंचता है बाइल डक्ट्स संकरी हो जाती हैं और कैंसर का खतरा बढ़ जाता है इस बीमारी में: Cholangiocarcinoma (बाइल डक्ट कैंसर) और Gallbladder Carcinoma (गॉलब्लैडर कैंसर) का जोखिम भी बढ़ जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक PSC का पता चलने के बाद मरीजों में लिवर ट्रांसप्लांट या मृत्यु तक का औसत समय लगभग 13 से 21 साल माना जाता है। फिलहाल लिवर ट्रांसप्लांट ही इसका एकमात्र स्थायी इलाज है। स्टडी में क्या सामने आया? इस रिसर्च में 457 PSC मरीजों के Quantitative MRCP डेटा का विश्लेषण किया गया। इनमें से 320 मरीजों पर विस्तृत प्रोग्नोस्टिक एनालिसिस किया गया। शोधकर्ताओं ने एक नया रिस्क मॉडल तैयार किया जिसमें: MRCP इमेजिंग डेटा उम्र Inflammatory Bowel Disease की स्थिति लिवर बायोकेमिस्ट्री और बाइल डक्ट्स में बदलाव जैसे फैक्टर्स शामिल किए गए। पुराने स्कोरिंग सिस्टम से बेहतर निकला मॉडल रिसर्च में पाया गया कि Quantitative MRCP आधारित नया मॉडल PSC के जोखिम का अनुमान लगाने में मौजूदा कई स्कोरिंग सिस्टम्स से बेहतर साबित हुआ। यह मॉडल: MayoRisk Score और अन्य पारंपरिक प्रोग्नोस्टिक मॉडल्स से ज्यादा सटीक पाया गया। Bootstrap analysis में qmAOM मॉडल का प्रदर्शन: qmAOM: 0.82 AOM: 0.75 M+BA: 0.70 रिकॉर्ड किया गया। डॉक्टरों को कैसे मिलेगा फायदा? अभी तक PSC की जांच में इस्तेमाल होने वाले कई रेडियोलॉजिकल स्कोरिंग सिस्टम डॉक्टरों की विजुअल व्याख्या पर निर्भर करते हैं। इससे अलग-अलग विशेषज्ञों के बीच रिपोर्टिंग में अंतर आ सकता है। लेकिन नई MRCP+ तकनीक: एल्गोरिदम आधारित है ऑब्जेक्टिव डेटा देती है और इंटरऑब्जर्वर वैरिएशन कम करती है यानी मरीज की स्थिति का ज्यादा भरोसेमंद आकलन संभव हो सकता है। दवा रिसर्च में भी मिल सकती है मदद शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में: PSC के लिए नई दवाओं के ट्रायल क्लिनिकल रिसर्च और प्रोग्नोस्टिक टूल्स को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।  

surbhi मई 20, 2026 0
Doctors reviewing brain MRI and CT scans as neuroimaging use rises sharply across Europe
यूरोप में तेजी से बढ़ा Neuroimaging का इस्तेमाल, CT और MRI स्कैन में 40% से ज्यादा उछाल

यूरोप में न्यूरोइमेजिंग यानी दिमाग और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों की जांच के लिए इस्तेमाल होने वाले CT और MRI स्कैन का उपयोग पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। नई स्टडी के मुताबिक 2015 से 2022 के बीच यूरोप के 29 देशों में CT और MRI जांचों की संख्या 40% से ज्यादा बढ़ गई। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बढ़ती निर्भरता जहां बेहतर डायग्नोसिस की ओर इशारा करती है, वहीं दूसरी तरफ हेल्थकेयर सिस्टम पर बढ़ते दबाव और रेडियोलॉजिस्ट्स में बर्नआउट जैसी चिंताएं भी सामने ला रही है। किन बीमारियों में बढ़ा इस्तेमाल? Neuroimaging का इस्तेमाल खासतौर पर इन बीमारियों की पहचान और निगरानी में किया जाता है: Stroke Brain Tumor Multiple Sclerosis CT और MRI स्कैन में कितनी बढ़ोतरी हुई? स्टडी में Eurostat और OECD के डेटा का विश्लेषण किया गया। CT स्कैन 2015 में: प्रति 1 लाख आबादी पर 10,872 स्कैन 2022 में: बढ़कर 15,312 स्कैन कुल वृद्धि: 40.8% MRI स्कैन 2015 में: प्रति 1 लाख आबादी पर 5,746 स्कैन 2022 में: बढ़कर 8,244 स्कैन कुल वृद्धि: 43.5% स्कैन मशीनों की संख्या उतनी तेजी से नहीं बढ़ी जहां स्कैनिंग की मांग तेजी से बढ़ी, वहीं इंफ्रास्ट्रक्चर उतनी रफ्तार से नहीं बढ़ पाया। CT स्कैनर 2015: प्रति 1 लाख आबादी पर 2.3 मशीनें 2022: बढ़कर 2.68 MRI स्कैनर 2015: 1.43 मशीनें 2022: बढ़कर 2.11 रिपोर्ट के मुताबिक: पश्चिमी यूरोप में सबसे ज्यादा स्कैनिंग हुई जबकि पूर्वी यूरोप में सबसे तेज ग्रोथ दर्ज की गई हालांकि कोविड-19 महामारी के दौरान 2020 में स्कैनिंग गतिविधियों में अस्थायी गिरावट देखी गई थी। क्यों बढ़ रही है Neuroimaging की जरूरत? विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं: 1. बदलते इलाज के तरीके अब स्ट्रोक जैसी बीमारियों में: मल्टीमोडल इमेजिंग और परफ्यूजन स्टडीज का इस्तेमाल बढ़ गया है। 2. उम्रदराज आबादी यूरोपीय यूनियन की 20% से ज्यादा आबादी अब 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र की है। बढ़ती उम्र के साथ दिमाग और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बढ़ता है। 3. बेहतर तकनीक नई इमेजिंग तकनीक: ज्यादा तेज ज्यादा सटीक और पहले से ज्यादा आसानी से उपलब्ध हो गई है, जिससे डॉक्टर ज्यादा स्कैन लिख रहे हैं। बढ़ती चिंता: रेडियोलॉजिस्ट्स पर दबाव स्टडी में चेतावनी दी गई है कि स्कैन की संख्या इंफ्रास्ट्रक्चर और वर्कफोर्स की तुलना में तेजी से बढ़ रही है। इससे: वेटिंग टाइम बढ़ सकता है डॉक्टरों पर काम का दबाव बढ़ सकता है और बर्नआउट का खतरा बढ़ सकता है रिपोर्ट के अनुसार रेडियोलॉजी क्षेत्र में बर्नआउट की दर 33% से 88% तक देखी गई है। “Low-Value Imaging” पर भी सवाल रिसर्चर्स ने “Low-Value Imaging” को लेकर भी चिंता जताई। इसका मतलब ऐसे स्कैन से है जिनका मरीज को बहुत कम या कोई वास्तविक क्लिनिकल फायदा नहीं होता। अनुमान है कि दुनियाभर में: 20% से 50% तक इमेजिंग टेस्ट कम उपयोगी या अनावश्यक हो सकते हैं। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि यूरोप में Evidence-Based Imaging Guidelines को और मजबूत करने की जरूरत है ताकि संसाधनों का सही इस्तेमाल हो सके और मरीजों को बेहतर देखभाल मिलती रहे।  

surbhi मई 20, 2026 0
Copper Water Bottle
हेल्दी समझकर न करें ये गलती, कॉपर बोतल का गलत इस्तेमाल पड़ सकता है भारी

नई दिल्ली, एजेंसियां। Copper Water Bottle में रखा पानी पीना आजकल लोगों की हेल्दी लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुका है। आयुर्वेद में भी तांबे के बर्तन में रखा पानी स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना गया है। माना जाता है कि इससे पाचन बेहतर होता है, इम्यूनिटी मजबूत होती है और शरीर को डिटॉक्स करने में मदद मिलती है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि कॉपर बोतल का गलत इस्तेमाल फायदे की जगह नुकसान भी पहुंचा सकता है।   एसिडिक चीजें मिलाना पड़ सकता है भारी कई लोग कॉपर बोतल के पानी में नींबू या अन्य खट्टी चीजें मिलाकर पीते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह सबसे बड़ी गलती है। नींबू में मौजूद एसिड तांबे के साथ रिएक्शन कर सकता है, जिससे शरीर पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इससे उल्टी, मतली और पेट खराब जैसी समस्याएं हो सकती हैं।   बहुत गर्म या ठंडा पानी रखना सही नहीं विशेषज्ञ बताते हैं कि कॉपर बोतल में बहुत ज्यादा गर्म या अत्यधिक ठंडा पानी नहीं रखना चाहिए। तापमान में अत्यधिक बदलाव तांबे के गुणों को प्रभावित कर सकता है। इससे पानी की गुणवत्ता पर असर पड़ता है और बोतल भी जल्दी खराब हो सकती है।   पूरे दिन कॉपर वॉटर पीना नुकसानदायक कुछ लोग पूरे दिन सिर्फ कॉपर बोतल का पानी पीते रहते हैं, लेकिन जरूरत से ज्यादा कॉपर शरीर में पहुंचने पर नुकसान हो सकता है। शरीर में तांबे की अधिक मात्रा बढ़ने से मतली, उल्टी, पेट दर्द और संक्रमण जैसी दिक्कतें हो सकती हैं।   कितना पानी पीना है सही? विशेषज्ञों के मुताबिक रातभर कॉपर बोतल में पानी स्टोर करके सुबह पीना ज्यादा फायदेमंद माना जाता है। पूरे दिन में करीब 250 से 500 मिलीलीटर कॉपर वॉटर पर्याप्त माना जाता है। कॉपर बोतल का सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो यह सेहत के लिए लाभकारी हो सकता है, लेकिन लापरवाही नुकसान का कारण भी बन सकती है।

Anjali Kumari मई 20, 2026 0
Summer berries benefits
गर्मी में जामुन खाने से मिलेंगे कई फायदे, जानिए किसके लिए है सबसे असरदार

नई दिल्ली, एजेंसियां। गर्मी के मौसम में बाजार में मिलने वाला जामुन स्वाद के साथ-साथ सेहत का भी खजाना माना जाता है। हल्के खट्टे-मीठे स्वाद वाला यह मौसमी फल शरीर को ठंडक देने के साथ कई बीमारियों से बचाने में मदद करता है। जामुन में आयरन, कैल्शियम, पोटैशियम, फाइबर, विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और पाचन सुधारने में सहायक होते हैं।   डायबिटीज मरीजों के लिए बेहद फायदेमंद जामुन को डायबिटीज के मरीजों के लिए काफी लाभकारी माना जाता है। इसमें मौजूद प्राकृतिक तत्व ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखने में मदद करते हैं। खासतौर पर जामुन के बीजों का पाउडर पारंपरिक रूप से शुगर कंट्रोल करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सीमित मात्रा में नियमित सेवन से ग्लूकोज लेवल संतुलित रखने में मदद मिल सकती है।   पाचन और इम्यूनिटी को करता है मजबूत जिन लोगों को कब्ज, गैस, अपच या एसिडिटी जैसी समस्याएं रहती हैं, उनके लिए जामुन काफी फायदेमंद माना जाता है। इसमें मौजूद फाइबर पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है। वहीं विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर की इम्यूनिटी मजबूत कर संक्रमण और मौसमी बीमारियों से बचाने में मदद करते हैं।   लू और कमजोरी से बचाने में मददगार गर्मी में लू लगने का खतरा ज्यादा रहता है। ऐसे में जामुन शरीर को अंदर से ठंडक पहुंचाकर हाइड्रेट रखने में मदद करता है। आयरन से भरपूर होने के कारण यह शरीर में हीमोग्लोबिन बढ़ाने और खून की कमी दूर करने में भी सहायक माना जाता है। कमजोरी और थकान महसूस करने वाले लोगों के लिए इसका सेवन लाभदायक हो सकता है।   वजन और त्वचा के लिए भी फायदेमंद कम कैलोरी और अधिक फाइबर वाला जामुन वजन कम करने वालों के लिए अच्छा विकल्प है। इसे खाने से लंबे समय तक पेट भरा रहता है। साथ ही इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स त्वचा को हेल्दी, साफ और चमकदार बनाए रखने में मदद करते हैं।

Anjali Kumari मई 20, 2026 0
curry leaves storage
फ्रिज में भी जल्दी खराब हो जाते हैं करी पत्ते? अपनाएं ये आसान ट्रिक्स, हफ्तों तक रहेंगे ताजे और खुशबूदार

नई दिल्ली, एजेंसियां। करी पत्ते भारतीय रसोई का अहम हिस्सा हैं। दक्षिण भारतीय व्यंजनों से लेकर दाल और सब्जियों तक, इनकी खुशबू खाने का स्वाद कई गुना बढ़ा देती है। लेकिन अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि बाजार से ताजे करी पत्ते लाने के बाद वे एक-दो दिन में ही सूख जाते हैं या काले पड़ने लगते हैं। कई बार फ्रिज में रखने के बावजूद उनकी खुशबू खत्म हो जाती है। खासकर गर्मी और बारिश के मौसम में यह समस्या और बढ़ जाती है। हालांकि कुछ आसान किचन ट्रिक्स अपनाकर करी पत्तों को लंबे समय तक फ्रेश और सुगंधित रखा जा सकता है।   टिश्यू पेपर वाला तरीका सबसे असरदार करी पत्तों को लंबे समय तक ताजा रखने के लिए सबसे पहले उन्हें अच्छी तरह धोकर पूरी तरह सुखा लें। पत्तों में जरा भी पानी नहीं रहना चाहिए। इसके बाद एक एयरटाइट कंटेनर लें और उसके नीचे टिश्यू पेपर बिछाएं। अब करी पत्तों को फैलाकर रखें और ऊपर से फिर टिश्यू पेपर से ढक दें। कंटेनर बंद करके फ्रिज में रख दें। टिश्यू पेपर अतिरिक्त नमी को सोख लेता है, जिससे पत्ते जल्दी खराब नहीं होते।   प्लास्टिक बैग में रखने का सही तरीका कई लोग करी पत्तों को सीधे प्लास्टिक बैग में बंद करके फ्रिज में रख देते हैं, जिससे अंदर नमी जमा हो जाती है और पत्ते सड़ने लगते हैं। अगर प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल करना है, तो उसमें छोटे-छोटे छेद जरूर करें ताकि हवा आती-जाती रहे। साथ ही बैग के अंदर एक सूखा टिश्यू पेपर रखें, जो अतिरिक्त मॉइस्चर को सोख लेगा।   महीनों तक स्टोर करने के लिए फ्रीजर का इस्तेमाल अगर करी पत्तों को लंबे समय तक सुरक्षित रखना है, तो उन्हें धोकर पूरी तरह सुखाने के बाद जिप लॉक बैग या एयरटाइट कंटेनर में भरकर फ्रीजर में रखें। जरूरत पड़ने पर सीधे निकालकर खाने में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे उनका स्वाद और खुशबू लंबे समय तक बनी रहती है।   धूप और नमी से बचाना जरूरी करी पत्तों को हमेशा ठंडी और सूखी जगह पर रखें। धूप या गैस के पास रखने से वे जल्दी सूख जाते हैं, जबकि ज्यादा नमी फंगस का कारण बन सकती है। साफ और सूखे कंटेनर का इस्तेमाल करने से करी पत्ते लंबे समय तक ताजे बने रहते हैं।

Anjali Kumari मई 19, 2026 0
Scientific illustration showing histamine activity in the human brain linked to memory, emotions and mental health disorders.
दिमाग में मौजूद Histamine का मानसिक स्वास्थ्य से गहरा संबंध! नई रिसर्च में सामने आए चौंकाने वाले संकेत

King’s College London और University of Porto के वैज्ञानिकों की नई रिसर्च में यह सामने आया है कि दिमाग में मौजूद Histamine केवल एलर्जी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य, याददाश्त, भावनाओं और व्यवहार को भी गहराई से प्रभावित कर सकता है। शोधकर्ताओं ने पहली बार ऐसा विस्तृत “Brain Histamine Map” तैयार किया है, जो यह दिखाता है कि जीवन के अलग-अलग चरणों में Histamine से जुड़े जीन दिमाग के विकास, सोचने-समझने की क्षमता और मानसिक बीमारियों से कैसे जुड़े होते हैं। Histamine सिर्फ एलर्जी तक सीमित नहीं आमतौर पर Histamine को एलर्जी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार यह दिमाग में एक महत्वपूर्ण न्यूरोमॉड्यूलेटर की तरह काम करता है। यह कई जरूरी कार्यों में भूमिका निभाता है, जैसे: भावनाओं को नियंत्रित करना नींद और जागने का चक्र याददाश्त व्यवहारिक लचीलापन सीखने की क्षमता लाखों डेटा पॉइंट्स का किया गया विश्लेषण इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने कई आधुनिक तकनीकों और डेटा सेट्स का इस्तेमाल किया। अध्ययन में शामिल थे: 49,495 brain cell nuclei का RNA sequencing analysis 24 से 57 वर्ष की उम्र के postmortem brain samples गर्भावस्था के 8 सप्ताह से लेकर 40 वर्ष तक के developmental brain data PET imaging और neurotransmitter receptor mapping इन सभी डेटा को मिलाकर वैज्ञानिकों ने दिमाग में Histamine सिस्टम का विस्तृत अध्ययन किया। मानसिक बीमारियों से मिला सीधा संबंध रिसर्च में पाया गया कि Histamine receptors का संबंध कई मानसिक और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से हो सकता है। वैज्ञानिकों ने Histamine expression patterns को इन स्थितियों से जुड़ा पाया: Attention Deficit Hyperactivity Disorder Major Depressive Disorder Schizophrenia Anorexia Nervosa शोधकर्ताओं के अनुसार दिमाग के frontal और limbic क्षेत्रों में Histamine activity ज्यादा देखी गई, जबकि occipital cortex में इसका स्तर कम पाया गया। उम्र के साथ बदलता है Histamine सिस्टम अध्ययन में यह भी सामने आया कि: Histidine decarboxylase नामक enzyme का स्तर शुरुआती विकास में सबसे ज्यादा था जबकि H3 receptor expression उम्र बढ़ने के साथ adulthood तक बढ़ता गया इससे संकेत मिलता है कि Histamine सिस्टम जीवनभर दिमाग के विकास और कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है। भविष्य में नई मानसिक स्वास्थ्य थेरेपी का रास्ता वैज्ञानिकों का मानना है कि यह रिसर्च मानसिक बीमारियों के इलाज में नई संभावनाएं खोल सकती है। यह “Brain Histamine Atlas” भविष्य में: Depression ADHD Schizophrenia Neurodevelopmental disorders के लिए targeted therapies विकसित करने में मदद कर सकता है। हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि अभी और रिसर्च की जरूरत है, ताकि यह समझा जा सके कि Histamine signaling को नियंत्रित करके मानसिक स्वास्थ्य उपचार को कितना बेहतर बनाया जा सकता है।  

surbhi मई 19, 2026 0
Doctor explaining Dupilumab treatment benefits for Prurigo Nodularis patients suffering from severe itching and skin lesions.
Prurigo Nodularis मरीजों के लिए राहत की उम्मीद, Dupilumab से खुजली और जीवन गुणवत्ता में सुधार

Dupilumab पर हुई एक नई स्टडी में सामने आया है कि यह दवा Prurigo Nodularis (PN) से पीड़ित मरीजों को पहले से कहीं अधिक व्यापक लाभ दे सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, भले ही कुछ मरीज क्लीनिकल ट्रायल के सबसे सख्त ट्रीटमेंट लक्ष्य तक नहीं पहुंचे, फिर भी उनमें खुजली, त्वचा के घावों और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया। क्या है Prurigo Nodularis? Prurigo Nodularis एक गंभीर और लंबे समय तक रहने वाली त्वचा संबंधी बीमारी है, जिसमें शरीर पर बेहद खुजली वाले गांठदार घाव (nodules) बन जाते हैं। यह बीमारी मरीजों की: नींद मानसिक स्वास्थ्य दैनिक जीवन सामाजिक गतिविधियों पर गहरा असर डाल सकती है। दो बड़े क्लीनिकल ट्रायल्स का विश्लेषण यह नई स्टडी LIBERTY-PN PRIME और PRIME2 नामक दो बड़े क्लीनिकल ट्रायल्स के डेटा पर आधारित थी। पहले के परिणामों में पाया गया था कि 24 सप्ताह के इलाज के बाद: Dupilumab लेने वाले 35.3% मरीजों में खुजली और त्वचा दोनों में बड़ा सुधार हुआ जबकि placebo समूह में यह आंकड़ा केवल 8.9% था लेकिन वैज्ञानिक यह जानना चाहते थे कि जो मरीज “optimal response” तक नहीं पहुंचे, क्या उन्हें भी फायदा मिला? लक्ष्य पूरा न होने पर भी मरीजों को मिला फायदा नई स्टडी में उन मरीजों का विश्लेषण किया गया जो 24 सप्ताह बाद भी ट्रायल के सबसे सख्त लक्ष्य तक नहीं पहुंचे थे। इसके बावजूद Dupilumab लेने वाले कई मरीजों में महत्वपूर्ण सुधार देखे गए: 61% से अधिक मरीजों की जीवन गुणवत्ता में बड़ा सुधार 55.8% मरीजों ने अपनी बीमारी को “हल्का” या “न के बराबर” बताया आधे से ज्यादा मरीजों में 75% तक त्वचा के घाव भर गए इन सभी परिणामों की तुलना placebo समूह से की गई और अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण पाया गया। सिर्फ “पूर्ण इलाज” ही सफलता नहीं शोधकर्ताओं का कहना है कि किसी इलाज की सफलता को केवल कठोर ट्रायल एंडपॉइंट्स से नहीं मापना चाहिए। कई मरीजों को: खुजली से राहत त्वचा में सुधार बेहतर नींद रोजमर्रा की जिंदगी में आसानी जैसे फायदे मिले, भले ही वे “पूर्ण या लगभग पूर्ण” सुधार की श्रेणी में नहीं आए। लंबी अवधि की रणनीति पर जोर विशेषज्ञों ने कहा कि यह अध्ययन PN के इलाज में “Treat-to-Target” यानी लंबे समय तक लक्ष्य आधारित उपचार रणनीति की जरूरत को मजबूत करता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, आंशिक सुधार वाले मरीजों में भी Dupilumab का इलाज जारी रखने से लंबे समय में और बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।  

surbhi मई 19, 2026 0
Healthy early dinner setup with vegetables and balanced meal supporting better metabolic and circadian health
बेहतर मेटाबॉलिक हेल्थ के लिए रात का खाना कब खाना चाहिए? विशेषज्ञ ने बताया सही समय

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अक्सर देर रात खाना खाते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि डिनर का समय हमारी मेटाबॉलिक हेल्थ, नींद और लंबी उम्र पर बड़ा असर डाल सकता है। हाल ही में longevity और regenerative medicine विशेषज्ञ Dr Saranya Wyles ने बताया कि शाम को जल्दी खाना खाना शरीर की प्राकृतिक circadian rhythm के साथ बेहतर तालमेल बनाता है और इससे overall health को फायदा मिल सकता है। शाम 6 बजे से पहले डिनर को माना बेहतर Mayo Clinic में cellular ageing और regenerative medicine विशेषज्ञ डॉ. सारन्या वायल्स का कहना है कि वह अपने परिवार के साथ नियमित समय पर डिनर करने को प्राथमिकता देती हैं। उनके अनुसार, आदर्श रूप से शाम का खाना 6 बजे से पहले खा लेना चाहिए। वहीं रविवार को उनके घर में डिनर का समय और जल्दी, यानी करीब 4:30 बजे रखा जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जल्दी खाना खाने से शरीर की प्राकृतिक जैविक घड़ी यानी circadian rhythm सही तरीके से काम करती है, जिससे digestion और metabolic health बेहतर बनी रहती है। क्या है Circadian Rhythm? Circadian rhythm शरीर की 24 घंटे चलने वाली जैविक प्रक्रिया है, जो सूरज की रोशनी और दिन-रात के चक्र से प्रभावित होती है। यही प्रक्रिया तय करती है कि शरीर में कौन-से हार्मोन कब रिलीज होंगे, नींद कैसी होगी और ऊर्जा का स्तर कैसा रहेगा। Nutritionist और hormone विशेषज्ञ Hannah Alderson के अनुसार cortisol hormone, जिसे stress hormone भी कहा जाता है, सुबह सबसे अधिक सक्रिय होता है और दिनभर धीरे-धीरे कम होता जाता है। ऐसे में देर रात भारी भोजन करना शरीर को भ्रमित कर सकता है, क्योंकि उस समय शरीर आराम की तैयारी कर रहा होता है, न कि digestion की। देर रात खाना क्यों हो सकता है नुकसानदायक? विशेषज्ञों के मुताबिक: देर रात भारी भोजन करने से digestion प्रभावित हो सकता है नींद की गुणवत्ता खराब हो सकती है इंसुलिन sensitivity कम हो सकती है शरीर का metabolic balance बिगड़ सकता है हालांकि बहुत ज्यादा भूखे पेट सोना भी नींद को प्रभावित कर सकता है, इसलिए संतुलन बनाए रखना जरूरी माना जाता है। हेल्दी डिनर के लिए अपनाती हैं ‘Modular Dinner’ तरीका डॉ. सारन्या वायल्स ने अपने व्यस्त शेड्यूल में healthy eating बनाए रखने के लिए “Modular Dinner” strategy अपनाई हुई है। इसका मतलब है कि सप्ताहांत में खाने की बेसिक तैयारी कर ली जाए और फिर सप्ताह के दिनों में कुछ ही मिनटों में भोजन तैयार किया जा सके। इसके तहत वह पहले से तैयार रखती हैं: कटे हुए गाजर, खीरा, टमाटर और सेलरी स्ट्रॉबेरी और ब्लूबेरी जैसे फल चिकन या टोफू जैसे प्रोटीन स्रोत क्विनोआ जैसे whole grains उनका कहना है कि slow cooker का इस्तेमाल समय बचाने में काफी मदद करता है। रंग-बिरंगे भोजन को देती हैं प्राथमिकता एक dermatologist और longevity expert होने के नाते डॉ. वायल्स खाने में रंगों की विविधता को बेहद महत्वपूर्ण मानती हैं। उनके अनुसार अलग-अलग रंगों वाली सब्जियां और फल शरीर को phytonutrients प्रदान करते हैं, जो कोशिकाओं की सुरक्षा में मदद करते हैं। वह खास तौर पर इन खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल करने की सलाह देती हैं: बैंगनी शकरकंद ब्रोकली कद्दू हरी पत्तेदार सब्जियां Gut Health पर भी ध्यान जरूरी विशेषज्ञों के अनुसार अच्छी metabolic health के लिए gut health भी महत्वपूर्ण है। इसके लिए डॉ. वायल्स प्रोबायोटिक और fermented foods को डाइट में शामिल करती हैं, जैसे: दही Kimchi Sauerkraut इसके अलावा Omega-3 से भरपूर खाद्य पदार्थ जैसे: Salmon Sardines Avocado और olive oil, turmeric, salt और pepper जैसे मसालों और healthy dressings को भी वह जरूरी मानती हैं। क्या कहती है यह रिसर्च? विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि लंबी उम्र और बेहतर स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक सख्त नियमों से ज्यादा जरूरी है consistency यानी नियमितता। समय पर भोजन करना, संतुलित डाइट लेना और शरीर की प्राकृतिक जैविक घड़ी के अनुसार जीवनशैली अपनाना metabolic health को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकता है।  

surbhi मई 18, 2026 0
Researchers study Daraxonrasib targeted therapy showing promising survival results in advanced pancreatic cancer patients.
Daraxonrasib थेरेपी से अग्नाशय कैंसर मरीजों की जीवन अवधि बढ़ने की उम्मीद, नई रिसर्च में मिले सकारात्मक परिणाम

अग्नाशय कैंसर (Pancreatic Cancer) के इलाज में एक नई लक्षित चिकित्सा (Targeted Therapy) ने उम्मीद की नई किरण दिखाई है। हाल ही में सामने आए एक Phase I/II क्लीनिकल ट्रायल में पाया गया कि Daraxonrasib नामक दवा ने एडवांस स्टेज अग्नाशय कैंसर के मरीजों में बेहतर सर्वाइवल और ट्यूमर नियंत्रण के परिणाम दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज दुनिया के सबसे घातक कैंसरों में से एक माने जाने वाले अग्नाशय कैंसर के उपचार में बड़ा बदलाव ला सकती है। KRAS म्यूटेशन को माना जाता था इलाज से बाहर Pancreatic Ductal Adenocarcinoma (PDAC) के 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में KRAS म्यूटेशन पाया जाता है। लंबे समय तक वैज्ञानिक KRAS म्यूटेशन को “इलाज से बाहर” यानी ऐसा लक्ष्य मानते रहे, जिस पर दवा प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकती थी। यही वजह रही कि अग्नाशय कैंसर के अधिकांश मरीजों के लिए अब तक कीमोथेरेपी ही मुख्य उपचार विकल्प बनी हुई थी। हालांकि हाल के वर्षों में मॉलिक्यूलर टार्गेटेड थेरेपी के क्षेत्र में हुई प्रगति ने RAS inhibition strategy को लेकर नई संभावनाएं पैदा की हैं। Daraxonrasib इसी दिशा में विकसित की गई एक Pan-RAS inhibitor दवा है, जिसे विभिन्न प्रकार के RAS म्यूटेशन को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है। क्या था अध्ययन? इस Phase I/II क्लीनिकल ट्रायल में पहले से उपचार प्राप्त कर चुके एडवांस RAS-म्यूटेंट अग्नाशय कैंसर के 168 मरीजों को शामिल किया गया। मरीजों को प्रतिदिन Daraxonrasib की मौखिक खुराक दी गई, जिसकी मात्रा 300 मिलीग्राम तक रखी गई। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य दवा की सुरक्षा (Safety) का मूल्यांकन करना था, जबकि ट्यूमर रिस्पॉन्स और सर्वाइवल परिणामों को द्वितीयक मापदंड के रूप में जांचा गया। ट्यूमर नियंत्रण में दिखा सकारात्मक असर शोधकर्ताओं के अनुसार: 300mg खुराक लेने वाले और पहले एक बार उपचार प्राप्त कर चुके लगभग 30 प्रतिशत मरीजों में ट्यूमर का आकार कम होने का स्पष्ट प्रभाव देखा गया। लगभग 90 प्रतिशत मरीजों में बीमारी नियंत्रित रही, यानी ट्यूमर या तो सिकुड़ गया या स्थिर बना रहा। कुछ मरीज समूहों में उपचार का प्रभाव 8 महीने से अधिक समय तक बना रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि अग्नाशय कैंसर जैसे आक्रामक कैंसर में इस तरह का परिणाम चिकित्सकीय रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। जीवन अवधि में भी सुधार अलग से सामने आए Phase III topline data में सर्वाइवल परिणाम और भी उत्साहजनक रहे। अध्ययन के अनुसार: Daraxonrasib लेने वाले मरीजों की औसत Overall Survival 13.2 महीने रही। जबकि सामान्य कीमोथेरेपी लेने वाले मरीजों में यह केवल 6.7 महीने दर्ज की गई। यह अंतर संकेत देता है कि RAS-targeted therapy भविष्य में अग्नाशय कैंसर के इलाज की दिशा बदल सकती है। साइड इफेक्ट्स भी रहे चुनौती हालांकि इस थेरेपी ने सकारात्मक परिणाम दिखाए, लेकिन कुछ दुष्प्रभाव भी सामने आए। सबसे आम साइड इफेक्ट्स में शामिल थे: त्वचा पर चकत्ते (Rash) मतली (Nausea) थकान (Fatigue) मुंह में सूजन या छाले (Mucositis) करीब 30 प्रतिशत मरीजों में Grade 3 या उससे अधिक गंभीर दुष्प्रभाव दर्ज किए गए। अब जारी है बड़ा Phase III ट्रायल Daraxonrasib की प्रभावशीलता को और बेहतर तरीके से समझने के लिए फिलहाल Phase III RASolute 302 ट्रायल चल रहा है। इस अध्ययन में मेटास्टेटिक अग्नाशय कैंसर मरीजों में इस नई थेरेपी की तुलना standard second-line chemotherapy से की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़े क्लीनिकल ट्रायल में भी ऐसे ही सकारात्मक परिणाम मिलते हैं, तो यह थेरेपी अग्नाशय कैंसर मरीजों के लिए लंबे समय से प्रतीक्षित बड़ी सफलता साबित हो सकती है। क्यों महत्वपूर्ण है यह रिसर्च? अग्नाशय कैंसर दुनिया के सबसे घातक कैंसरों में गिना जाता है, क्योंकि अधिकतर मामलों का पता बीमारी के अंतिम चरण में चलता है और मरीजों की जीवित रहने की संभावना बेहद कम होती है। ऐसे में targeted therapy का सफल होना कैंसर रिसर्च के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। Daraxonrasib से जुड़े शुरुआती परिणाम यह संकेत देते हैं कि भविष्य में कैंसर का इलाज अधिक व्यक्तिगत (Personalized) और म्यूटेशन-आधारित उपचार पद्धतियों की ओर बढ़ सकता है।  

surbhi मई 18, 2026 0
Scientists analyzing asthma blood biomarkers through metabolomic profiling to identify hidden biological asthma subtypes.
Metabolomic Profiling से सामने आए अस्थमा के छिपे हुए सबटाइप, लक्षण समान लेकिन बीमारी की प्रकृति अलग

अस्थमा को अब तक मुख्य रूप से मरीज के लक्षणों और हालिया अटैक (exacerbation) के आधार पर नियंत्रित या स्थिर माना जाता रहा है। लेकिन एक नई रिसर्च ने इस धारणा को चुनौती देते हुए दिखाया है कि समान लक्षणों वाले अस्थमा मरीजों के शरीर में बीमारी की जैविक गतिविधियां पूरी तरह अलग हो सकती हैं। हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने मेटाबोलोमिक्स-आधारित ब्लड एनालिसिस के जरिए अस्थमा के ऐसे छिपे हुए जैविक सबटाइप (endotypes) की पहचान की है, जो सामान्य क्लिनिकल जांच में दिखाई नहीं देते। यह रिसर्च भविष्य में अस्थमा के इलाज को अधिक व्यक्तिगत और सटीक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। क्या था अध्ययन का उद्देश्य? यह एक prospective observational study थी, जिसमें उन वयस्क मरीजों को शामिल किया गया जो नियमित inhaled corticosteroid therapy ले रहे थे और जिनका अस्थमा क्लिनिकली “well-controlled” माना जा रहा था। शोधकर्ताओं का उद्देश्य यह जानना था कि क्या खून में मौजूद मेटाबोलाइट्स की प्रोफाइलिंग के जरिए बीमारी के भीतर चल रही अलग-अलग जैविक प्रक्रियाओं को पहचाना जा सकता है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने liquid chromatography–tandem mass spectrometry तकनीक का उपयोग करते हुए untargeted plasma metabolomic profiling की। इसके बाद consensus clustering analysis के माध्यम से मरीजों को तीन अलग-अलग जैविक समूहों में वर्गीकृत किया गया। तीन अलग-अलग अस्थमा एंडोटाइप की पहचान अध्ययन में पाया गया कि भले ही सभी मरीजों में लक्षण और हालिया अटैक लगभग समान थे, लेकिन फेफड़ों की कार्यक्षमता, एयरवे की संरचना और इम्यून सिस्टम की गतिविधियों में बड़ा अंतर मौजूद था। 1. “Remodeling-Prone” समूह (C1) इस समूह के मरीजों में glycerophospholipid-related metabolites की मात्रा अधिक पाई गई। इन मरीजों में: Post-bronchodilator FEV1 कम था एयरवे वॉल्स अधिक मोटी थीं Innate lymphoid cells का स्तर बढ़ा हुआ था वैज्ञानिकों के अनुसार यह संकेत देता है कि मरीजों में लक्षण नियंत्रित होने के बावजूद फेफड़ों की संरचना में बदलाव और एयरवे remodeling की प्रक्रिया जारी रह सकती है। 2. “Biologically Stable” समूह (C2) यह समूह सबसे अधिक स्थिर माना गया। इन मरीजों में: एयरवे वॉल्स पतली थीं Post-bronchodilator FEV1 बेहतर था फेफड़ों की संरचना अपेक्षाकृत सामान्य बनी हुई थी रिसर्चर्स का मानना है कि यह समूह वास्तव में नियंत्रित बीमारी वाले मरीजों का प्रतिनिधित्व कर सकता है। 3. “T2-High” समूह (C3) इस समूह में type-2 inflammation से जुड़े मेटाबोलाइट्स की पहचान हुई। इन मरीजों में: Fractional exhaled nitric oxide (FeNO) का स्तर अधिक था Blood eosinophil counts बढ़े हुए थे हालांकि, इनकी एयरवे संरचना अभी काफी हद तक सुरक्षित बनी हुई थी। क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज? अब तक अस्थमा नियंत्रण का मूल्यांकन मुख्य रूप से लक्षणों और हालिया अटैक पर आधारित रहा है। लेकिन यह अध्ययन दिखाता है कि केवल लक्षण देखकर बीमारी की वास्तविक स्थिति को समझना संभव नहीं है। कई मरीज बाहर से स्थिर दिख सकते हैं, जबकि उनके फेफड़ों में सूजन, airway remodeling या इम्यून एक्टिविटी लगातार जारी हो सकती है। यही कारण है कि भविष्य में कुछ मरीजों में बीमारी अचानक गंभीर रूप ले सकती है। Precision Medicine की दिशा में बड़ा कदम विशेषज्ञों का मानना है कि यह रिसर्च precision medicine आधारित अस्थमा उपचार को मजबूत करेगी। यदि मेटाबोलोमिक प्रोफाइलिंग को भविष्य में नियमित क्लिनिकल प्रैक्टिस में शामिल किया जाता है, तो डॉक्टर: बीमारी के वास्तविक जैविक स्वरूप को पहचान सकेंगे हाई-रिस्क मरीजों की पहले से पहचान कर सकेंगे अधिक targeted therapies चुन सकेंगे लंबे समय में फेफड़ों की क्षति को कम कर सकेंगे हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि अभी और बड़े अध्ययन की जरूरत है ताकि यह पता लगाया जा सके कि ये metabolite-defined subgroups भविष्य में बीमारी की प्रगति और इलाज के प्रति प्रतिक्रिया को किस तरह प्रभावित करते हैं।  

surbhi मई 18, 2026 0
PMOS
PCOS अब PMOS: नाम बदलने से 17 करोड़ महिलाओं के इलाज और पहचान में आएगा बड़ा बदलाव, जानिए  कैसे ?

नई दिल्ली, एजेंसियां। महिलाओं में तेजी से बढ़ रही हार्मोनल समस्या पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) का नाम अब बदलकर पॉलीएंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS) कर दिया गया है। मेडिकल जर्नल The Lancet में प्रकाशित नए अध्ययन के अनुसार यह बदलाव सिर्फ नाम का नहीं, बल्कि बीमारी को समझने के नजरिए में बड़ा परिवर्तन माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया भर की करीब 17 करोड़ महिलाओं पर इसका सीधा असर पड़ेगा, क्योंकि लंबे समय से PCOS को केवल ओवरी या सिस्ट से जुड़ी समस्या माना जा रहा था, जबकि यह शरीर के कई हार्मोनल और मेटाबॉलिक बदलावों से जुड़ी जटिल स्थिति है।   क्यों बदला गया नाम? डॉक्टरों और शोधकर्ताओं का मानना है कि “पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम” नाम कई मामलों में भ्रम पैदा करता था। अक्सर यह माना जाता था कि यदि महिला की ओवरी में सिस्ट नहीं है तो उसे PCOS नहीं हो सकता। लेकिन हालिया शोधों में सामने आया कि कई महिलाएं बिना सिस्ट के भी इस बीमारी से प्रभावित होती हैं। इसी वजह से बीमारी की पहचान और इलाज में देरी होती थी। नई परिभाषा में “एंडोक्राइन” और “मेटाबॉलिक” शब्द जोड़कर यह स्पष्ट किया गया है कि यह केवल प्रजनन तंत्र की समस्या नहीं, बल्कि हार्मोन, इंसुलिन, वजन, मानसिक स्वास्थ्य और त्वचा से भी जुड़ी बीमारी है।   हर 8 में से 1 महिला प्रभावित अध्ययन के मुताबिक दुनिया में हर आठ में से एक महिला इस समस्या से जूझ रही है। PMOS महिलाओं की फर्टिलिटी, पीरियड्स, वजन, मानसिक स्थिति और हार्मोनल संतुलन पर गहरा असर डाल सकता है। कई महिलाओं को लंबे समय तक यह पता ही नहीं चल पाता कि उनके शरीर में जो बदलाव हो रहे हैं, वे इसी बीमारी के संकेत हैं।   किन लक्षणों के आधार पर होगा निदान? अब PMOS की पहचान केवल ओवरी सिस्ट से नहीं होगी। डॉक्टर कई अन्य संकेतों को भी ध्यान में रखेंगे। इनमें अनियमित पीरियड्स, ओवुलेशन की समस्या, चेहरे पर अधिक बाल आना, मुंहासे, वजन बढ़ना, हाई ब्लड शुगर, हाई ब्लड प्रेशर, टाइप-2 डायबिटीज, डिप्रेशन, एंग्जायटी और बाल झड़ना जैसे लक्षण शामिल हैं। 20 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में कम से कम दो प्रमुख लक्षण होने पर बीमारी की पुष्टि की जा सकती है, जबकि किशोरियों में हार्मोनल और ओवुलेशन संबंधी संकेतों को प्राथमिक आधार माना जाएगा।   इलाज और जागरूकता में मिलेगी मदद विशेषज्ञों का मानना है कि नए नाम से बीमारी की समझ अधिक व्यापक होगी। इससे डॉक्टर समय रहते सही जांच कर सकेंगे और महिलाओं को जल्दी इलाज मिल सकेगा। साथ ही यह बदलाव उन महिलाओं के लिए भी राहत भरा हो सकता है जो वर्षों तक सही निदान का इंतजार करती रही हैं।

Anjali Kumari मई 16, 2026 0
Sweet Recipes
अब दूध फटे तो फेंके नहीं, बनाएं 6 लाजवाब देसी स्वीट्स

नई दिल्ली, एजेंसियां। गर्मियों में अक्सर दूध फट जाना एक आम समस्या होती है। कई लोग इसे खराब समझकर फेंक देते हैं, लेकिन यही फटा दूध स्वादिष्ट मिठाइयों का बेहतरीन आधार बन सकता है। फटे दूध से मिलने वाला छेना भारतीय मिठाइयों की जान माना जाता है। सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो इससे ऐसी मिठाइयां तैयार की जा सकती हैं, जिन्हें देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा पाएगा कि वे फटे दूध से बनी हैं।   रसगुल्ला और रसमलाई जैसे स्वादिष्ट विकल्प रसगुल्ला फटे दूध से बनने वाली सबसे लोकप्रिय मिठाइयों में से एक है। ताजे छेना को अच्छी तरह गूंथकर छोटे गोले बनाए जाते हैं और फिर चाशनी में पकाया जाता है। इससे मुलायम और स्पंजी रसगुल्ले तैयार होते हैं। अगर आपको क्रीमी मिठाइयां पसंद हैं, तो रसमलाई बेहतरीन विकल्प हो सकती है। इसमें छेना के टुकड़ों को चाशनी में पकाने के बाद केसर और इलायची वाले गाढ़े दूध में डाला जाता है। ऊपर से ड्राई फ्रूट्स डालने से इसका स्वाद और बढ़ जाता है।   संदेश और चमचम का अलग स्वाद संदेश हल्की और कम सामग्री में बनने वाली मिठाई है। छेना में चीनी और इलायची मिलाकर इसे अलग-अलग आकार दिया जाता है। इसमें केसर, आम या गुलाब का फ्लेवर भी मिलाया जा सकता है। वहीं चमचम दिखने में जितनी आकर्षक होती है, खाने में उतनी ही स्वादिष्ट लगती है। इसे नारियल या मावा से सजाकर खास मौके पर परोसा जाता है।   कलाकंद और छेना मुर्की भी करें ट्राय कलाकंद बनाने के लिए छेना को गाढ़े दूध के साथ धीमी आंच पर पकाया जाता है। इसका दानेदार स्वाद लोगों को खूब पसंद आता है। इसके अलावा छेना मुर्की भी एक अलग तरह की मिठाई है, जिसमें छेना के टुकड़ों को चाशनी में लपेटकर तैयार किया जाता है। अगली बार दूध फटे तो उसे फेंकने की बजाय इन स्वादिष्ट मिठाइयों में बदलकर घर में मिठास घोल सकते हैं।

Anjali Kumari मई 16, 2026 0
Stay Fit Naturally
महंगे पेट्रोल से घटेगा वजन! रोज की ये आदतें बना देंगी शरीर फिट

नई दिल्ली, एजेंसियां। देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी ने आम लोगों के बजट पर असर डाला है। अमेरिका-ईरान तनाव और वैश्विक तेल संकट के कारण ईंधन महंगा हुआ है। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति को फिटनेस सुधारने के अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है। छोटी दूरी के लिए बाइक या कार छोड़कर पैदल चलना और साइकिल का इस्तेमाल करना न केवल खर्च कम करेगा, बल्कि शरीर को भी फिट बनाएगा।   पैदल चलने से तेजी से बर्न होती है कैलोरी विशेषज्ञों के अनुसार रोजाना 1 से 2 किलोमीटर पैदल चलने की आदत वजन घटाने में मददगार हो सकती है। नियमित वॉकिंग से शरीर का मेटाबॉलिज्म बेहतर होता है और फैट तेजी से बर्न होने लगता है। फिटनेस एक्सपर्ट्स बताते हैं कि 30 मिनट तेज गति से चलने पर करीब 120 से 200 कैलोरी तक बर्न की जा सकती है। इससे मोटापा कम करने और शरीर को एक्टिव रखने में मदद मिलती है।   साइकिलिंग से दिल और मांसपेशियां रहेंगी मजबूत Cycling को सबसे प्रभावी कार्डियो एक्सरसाइज में से एक माना जाता है। 30 मिनट साइकिल चलाने से लगभग 200 से 300 कैलोरी तक बर्न हो सकती है। इससे पैरों, जांघों और पेट की मांसपेशियां मजबूत होती हैं और दिल की सेहत में सुधार होता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि नियमित साइकिलिंग करने वाले लोगों में मोटापा और Type 2 Diabetes का खतरा कम हो सकता है।   फिट रहने के लिए लाइफस्टाइल में बदलाव जरूरी स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि केवल व्यायाम ही नहीं, बल्कि संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और तनाव नियंत्रण भी जरूरी है। कम नींद और ज्यादा तनाव शरीर में ऐसे हार्मोन बढ़ाते हैं जो वजन बढ़ाने का कारण बन सकते हैं। गर्मियों में तला-भुना भोजन और शक्कर वाली ड्रिंक्स कम लेकर पानी, फल और हल्का भोजन अपनाने से शरीर अधिक स्वस्थ और सक्रिय रह सकता है।

Anjali Kumari मई 16, 2026 0
Fresh coconut water served in summer highlighting hydration and health benefits during hot weather
गर्मियों में नारियल पानी पीने का सही समय क्या है? एक्सपर्ट्स ने बताए बड़े फायदे

भीषण गर्मी, पसीना और डिहाइड्रेशन के बीच नारियल पानी एक नेचुरल एनर्जी ड्रिंक बनकर उभर रहा है। इलेक्ट्रोलाइट्स, पोटैशियम और मैग्नीशियम से भरपूर नारियल पानी शरीर को हाइड्रेट रखने के साथ-साथ पाचन और स्किन हेल्थ के लिए भी फायदेमंद माना जाता है। अब एक्सपर्ट्स ने बताया है कि इसे किस समय पीना सबसे ज्यादा असरदार हो सकता है। सुबह खाली पेट पीना क्यों फायदेमंद? इंटीग्रेटिव न्यूट्रिशनिस्ट्स के मुताबिक, सुबह खाली पेट नारियल पानी पीने से शरीर को नेचुरल डिटॉक्स सपोर्ट मिलता है। यह पाचन को बेहतर बनाने, शरीर का pH बैलेंस बनाए रखने और दिनभर की हाइड्रेशन जरूरत पूरी करने में मदद कर सकता है। क्लिनिकल डाइटिशियन वेदिका प्रेमानी के अनुसार, गर्मियों में शरीर से पसीने के जरिए तेजी से इलेक्ट्रोलाइट्स निकलते हैं। ऐसे में नारियल पानी उन्हें प्राकृतिक तरीके से रिप्लेस करने में मदद करता है। इससे स्किन हाइड्रेटेड रहती है और थकान भी कम महसूस होती है। वर्कआउट और गर्मी के बाद भी असरदार एक्सपर्ट्स का मानना है कि तेज धूप, लंबे सफर या वर्कआउट के बाद नारियल पानी पीना शरीर को जल्दी रिकवर करने में मदद कर सकता है। यह बाजार में मिलने वाले शुगर-लोडेड ड्रिंक्स की तुलना में हल्का और ज्यादा हेल्दी विकल्प माना जाता है। कितना नारियल पानी पीना सही? विशेषज्ञों के मुताबिक, सामान्य परिस्थितियों में दिन में 1 से 2 गिलास यानी करीब 200-300ml नारियल पानी पर्याप्त माना जाता है। हालांकि, ज्यादा गर्मी या भारी फिजिकल एक्टिविटी के दौरान इसकी मात्रा बढ़ाई जा सकती है। लेकिन जरूरत से ज्यादा सेवन नुकसानदायक भी हो सकता है। खासकर किडनी रोग या डायबिटीज से जूझ रहे लोगों को डॉक्टर की सलाह के बाद ही नियमित सेवन करना चाहिए, क्योंकि इसमें पोटैशियम और नेचुरल शुगर मौजूद होती है। स्वाद और फायदे बढ़ाने के आसान तरीके एक्सपर्ट्स नारियल पानी में चिया सीड्स, नींबू या खीरा मिलाने की सलाह भी देते हैं। इससे फाइबर, विटामिन C और अतिरिक्त हाइड्रेशन का फायदा मिल सकता है। नारियल पानी के प्रमुख फायदे शरीर को तेजी से हाइड्रेट करता है इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस बनाए रखने में मदद पाचन और पेट की समस्याओं में राहत स्किन हेल्थ को सपोर्ट वर्कआउट के बाद रिकवरी में मदद गर्मियों में शरीर को ठंडक पहुंचाता है शुगर ड्रिंक्स का हेल्दी विकल्प

surbhi मई 16, 2026 0
Air pollution haze over city skyline highlighting risks to brain health and cognitive decline
हवा का प्रदूषण और दिमागी सेहत पर असर: नई कनाडाई स्टडी में चौंकाने वाले निष्कर्ष

कनाडा में की गई एक नई जनसंख्या-आधारित स्टडी में यह सामने आया है कि अपेक्षाकृत कम स्तर का वायु प्रदूषण भी दिमागी सेहत पर नकारात्मक असर डाल सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, लंबे समय तक फाइन पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) के संपर्क में रहने से संज्ञानात्मक क्षमता (cognitive performance) कमजोर हो सकती है और मस्तिष्क में “छुपी हुई” वेस्कुलर क्षति का खतरा बढ़ सकता है। क्या कहती है यह रिसर्च? यह अध्ययन Canadian Alliance for Healthy Hearts and Minds Cohort Study के डेटा पर आधारित है, जिसमें 2014 से 2018 के बीच 5 प्रांतों के 6,878 वयस्कों को शामिल किया गया। प्रतिभागियों की औसत उम्र लगभग 57.6 वर्ष थी, जिनमें 55% से अधिक महिलाएं थीं। शोध में वायु प्रदूषण के 5 साल के औसत एक्सपोजर को मापा गया और उसका असर दिमागी टेस्ट और MRI स्कैन पर देखा गया। प्रदूषण और दिमागी प्रदर्शन के बीच संबंध स्टडी में पाया गया कि: PM2.5 के हर 5 μg/m³ बढ़ने पर MoCA स्कोर में गिरावट देखी गई इसी तरह NO₂ के बढ़ने से भी मानसिक क्षमता परीक्षण के स्कोर कम हुए कार्य-आधारित स्मृति और स्पीड टेस्ट (Digit Symbol Substitution Test) पर भी नकारात्मक असर पाया गया शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि NO₂ के संपर्क से “covert vascular brain injury” यानी छुपी हुई मस्तिष्क रक्तवाहिका क्षति का जोखिम बढ़ सकता है। खास बात: कम प्रदूषण में भी असर यह अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें शामिल क्षेत्रों में प्रदूषण स्तर अपेक्षाकृत कम था। इसके बावजूद दिमागी कार्यक्षमता पर असर देखा गया। इससे संकेत मिलता है कि: केवल अत्यधिक प्रदूषण ही नहीं, बल्कि कम स्तर का लंबे समय का संपर्क भी जोखिम पैदा कर सकता है अन्य फैक्टरों का सीमित असर स्टडी में यह भी देखा गया कि: कार्डियोवैस्कुलर रिस्क फैक्टर और ग्रीन स्पेस (हरियाली) इनका इस संबंध पर कोई बड़ा असर नहीं दिखा। सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए क्या संकेत? शोधकर्ताओं का कहना है कि यह निष्कर्ष इस ओर इशारा करते हैं कि: वायु प्रदूषण केवल फेफड़ों या दिल तक सीमित समस्या नहीं है यह सीधे तौर पर ब्रेन हेल्थ को भी प्रभावित कर सकता है लंबे समय में यह डिमेंशिया और अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है आगे की जरूरत वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि: लंबी अवधि के (longitudinal) अध्ययन जरूरी हैं यह समझना जरूरी है कि प्रदूषण कम करने से क्या वास्तव में ब्रेन डिक्लाइन को रोका जा सकता है

surbhi मई 16, 2026 0
Scientific illustration of gut microbiota linked with diabetes and heart disease research findings
डायबिटीज और दिल की बीमारी में गट माइक्रोबायोटा का बड़ा खुलासा, नई स्टडी में मिले संभावित बायोमार्कर

हाल ही में सामने आई एक पायलट स्टडी में टाइप-2 डायबिटीज मेलिटस (T2DM) और कोरोनरी आर्टेरियोस्क्लेरोटिक हार्ट डिजीज के बीच गट माइक्रोबायोटा और मेटाबोलिक बदलावों को लेकर महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आए हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि ये बदलाव कार्डियोमेटाबोलिक बीमारियों के संभावित बायोमार्कर हो सकते हैं। स्टडी में क्या किया गया अध्ययन? शोधकर्ताओं ने कुल 30 प्रतिभागियों के फीकल और प्लाज्मा सैंपल का विश्लेषण किया, जिनमें शामिल थे— 10 स्वस्थ व्यक्ति 10 टाइप-2 डायबिटीज मरीज 10 ऐसे मरीज जिनमें डायबिटीज के साथ हार्ट डिजीज भी थी इस दौरान मेटाजीनोमिक सीक्वेंसिंग और लिक्विड क्रोमैटोग्राफी–मास स्पेक्ट्रोमेट्री (LC-MS) तकनीक का उपयोग किया गया। गट माइक्रोबायोटा में क्या बदलाव मिले? स्टडी में कई बैक्टीरियल स्पीशीज में अंतर पाया गया, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं: Prevotella disiens Bacteroides sp._CAG_875 Sutterella wadsworthensis Paraprevotella clara Anaerobutyricum hallii शोधकर्ताओं के अनुसार, खासकर Bacteroides sp._CAG_875 एक महत्वपूर्ण संभावित बायोमार्कर के रूप में उभरा, जो स्वस्थ व्यक्तियों और T2DM-CAD मरीजों के बीच स्पष्ट अंतर दिखाने में सक्षम रहा। हालांकि कुल माइक्रोबायोटा विविधता में बड़ा अंतर नहीं पाया गया, लेकिन विशिष्ट बैक्टीरिया में महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए। मेटाबोलिक बदलाव और संभावित संकेत शोध में 42 अलग-अलग मेटाबोलाइट्स की पहचान की गई, जिनमें शामिल हैं: फ्रक्टोज गैलिक एसिड पाइरोग्लूटामिक एसिड एडिपिक एसिड सबेरिक एसिड 12-ketolithocholic acid (12-ketoLCA) इनमें 12-ketoLCA को सबसे अहम संभावित बायोमार्कर माना गया, जो बाइल एसिड मेटाबॉलिज्म और मेटाबोलिक डिसफंक्शन से जुड़ा हो सकता है। “गट-हार्ट एक्सिस” पर बड़ा संकेत स्टडी में यह भी पाया गया कि गट माइक्रोब्स और मेटाबोलाइट्स के बीच गहरा संबंध है, जो “gut–heart axis” की ओर संकेत करता है। यह डायबिटीज से जुड़ी हार्ट बीमारियों में एक अहम भूमिका निभा सकता है। इसके अलावा अमीनो एसिड, लिनोलिक एसिड और ग्लूटामेट मेटाबॉलिज्म जैसे पाथवे में भी बदलाव देखे गए, जो इंसुलिन रेजिस्टेंस और कार्डियोवस्कुलर डिजीज से जुड़े हैं। सीमाएं और आगे की जरूरत शोधकर्ताओं ने माना कि यह एक छोटा पायलट अध्ययन था, इसलिए निष्कर्षों को अभी शुरुआती स्तर का माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि: सैंपल साइज छोटा था मेकैनिज्म की पुष्टि बाकी है बड़े और लंबे समय के अध्ययन की जरूरत है

surbhi मई 16, 2026 0
Watermelon vs Melon
गर्मी में तरबूज या खरबूज? जानें कौन सा फल रखेगा शरीर को ज्यादा हाइड्रेट

नई दिल्ली, एजेंसियां। गर्मियों के मौसम में शरीर में पानी की कमी होना आम समस्या है। तेज धूप और गर्म हवाओं के कारण डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में तरबूज और खरबूजा दोनों ही शरीर को ठंडक और ऊर्जा देने वाले बेहतरीन फल माने जाते हैं। हालांकि, दोनों के पोषण और गुणों में बड़ा अंतर होता है।   तरबूज: शरीर को जल्दी ठंडक और पानी तरबूज को गर्मियों का “हाइड्रेशन किंग” कहा जाता है। इसमें लगभग 91 प्रतिशत पानी होता है, जो शरीर को तेजी से हाइड्रेट करने में मदद करता है। 100 ग्राम तरबूज में करीब 30 कैलोरी होती है, इसलिए यह हल्का और ताजगी देने वाला फल माना जाता है।   तरबूज में लाइकोपीन नामक एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है, जो त्वचा को सूरज की हानिकारक किरणों से बचाने में मदद करता है। इसके अलावा इसमें एल-सिट्रुलिन तत्व भी मौजूद होता है, जो एक्सरसाइज के बाद मांसपेशियों के दर्द को कम करने में सहायक माना जाता है। गर्मी, लू और शरीर में पानी की कमी से बचाव के लिए तरबूज बेहद लाभकारी है।   खरबूजा: पोषण और इम्यूनिटी का खजाना खरबूजे में पानी की मात्रा तरबूज से थोड़ी कम होती है, लेकिन इसमें पोषक तत्व ज्यादा पाए जाते हैं। 100 ग्राम खरबूजे में करीब 34 कैलोरी होती है। इसमें विटामिन A, विटामिन C, पोटैशियम और फाइबर भरपूर मात्रा में मिलते हैं। खरबूजा आंखों की रोशनी, त्वचा और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में मदद करता है। इसका फाइबर पाचन सुधारने और कब्ज से राहत दिलाने में भी फायदेमंद माना जाता है।   कौन है बेहतर विकल्प? अगर आपका लक्ष्य शरीर को ठंडा और हाइड्रेट रखना है, तो तरबूज बेहतर विकल्प है। वहीं बेहतर पोषण, पाचन और इम्यूनिटी के लिए खरबूजा ज्यादा फायदेमंद माना जाता है। दोनों फलों को संतुलित मात्रा में खाने से गर्मियों में शरीर स्वस्थ और तरोताजा बना रह सकता है।

Anjali Kumari मई 16, 2026 0
Pregnant woman consulting doctor about CMV screening and antiviral treatment during prenatal care
गर्भावस्था में CMV स्क्रीनिंग बढ़ी, Valacyclovir इलाज से बदली तस्वीर: नई स्टडी में बड़ा खुलासा

फ्रांस में नई रिसर्च के बाद गर्भवती महिलाओं में बढ़ी Cytomegalovirus जांच और एंटीवायरल इलाज गर्भावस्था के दौरान होने वाले संक्रमणों को लेकर एक नई स्टडी में अहम जानकारी सामने आई है। रिसर्च के मुताबिक, Cytomegalovirus Infection की जांच और इलाज में फ्रांस में पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव देखा गया है। 2020 में प्रकाशित एक बड़े क्लिनिकल ट्रायल के बाद गर्भवती महिलाओं में CMV स्क्रीनिंग और Valacyclovir उपचार का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। खास बात यह रही कि जांच बढ़ने के बावजूद गर्भपात (Termination of Pregnancy) के मामलों में वृद्धि नहीं हुई। क्या है Cytomegalovirus (CMV)? Cytomegalovirus Infection एक वायरल संक्रमण है, जो नवजात बच्चों में सुनने की क्षमता कम होने, न्यूरोलॉजिकल समस्याओं और मानसिक विकास में देरी जैसी गंभीर दिक्कतों का कारण बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार: फ्रांस में लगभग 0.4% नवजात congenital CMV infection से प्रभावित होते हैं गर्भावस्था की शुरुआती तिमाही में संक्रमण होने पर खतरा ज्यादा बढ़ जाता है स्क्रीनिंग में बड़ा उछाल स्टडी में 2017 से 2023 के बीच 451 गर्भावस्थाओं के डेटा का विश्लेषण किया गया। रिसर्च में पाया गया कि: 2017-2020 के बीच CMV स्क्रीनिंग दर 22% थी 2021-2023 में यह बढ़कर 40% हो गई वहीं महिलाओं द्वारा खुद टेस्ट की मांग करने के मामलों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। Valacyclovir इलाज से क्या फायदा मिला? 2020 की स्टडी में पाया गया था कि गर्भावस्था की शुरुआती अवस्था में Valacyclovir देने से मां से बच्चे में संक्रमण फैलने का खतरा लगभग दो-तिहाई तक कम हो सकता है। इसके बाद: एंटीवायरल थेरेपी का इस्तेमाल 27.7% से बढ़कर 59.8% हो गया यूरोप के कई विशेषज्ञ समूहों ने शुरुआती गर्भावस्था में CMV संक्रमण होने पर Valacyclovir इस्तेमाल की सिफारिश भी की। MRI और अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट ने तय किए फैसले स्टडी में पाया गया कि जिन मामलों में: MRI या अल्ट्रासाउंड में दिमाग से जुड़ी गंभीर असामान्यताएं दिखीं, उन्हीं मामलों में गर्भपात के फैसले लिए गए। इन समस्याओं में शामिल थीं: Microcephaly Ventriculomegaly Brain calcifications Cerebellar hypoplasia गर्भपात के मामलों में आई कमी शुरुआती CMV संक्रमण वाले मामलों में कुल Termination Rate 20.7% रही। हालांकि 2020 के बाद इसमें गिरावट देखी गई: पहले: 25.9% बाद में: 13% रिसर्च में यह भी सामने आया कि जिन महिलाओं को Valacyclovir नहीं मिला, उनमें गर्भपात की संभावना ज्यादा रही। अब भी बने हुए हैं कई सवाल हालांकि फ्रांस ने मई 2025 में ही राष्ट्रीय स्तर पर CMV स्क्रीनिंग की सिफारिशें लागू की हैं, लेकिन पूरे यूरोप में अभी भी अलग-अलग नीतियां अपनाई जा रही हैं। विशेषज्ञों की कुछ चिंताएं अब भी बनी हुई हैं: गर्भवती महिलाओं में मानसिक तनाव हाई-डोज Valacyclovir के संभावित साइड इफेक्ट्स जरूरत से ज्यादा मेडिकल हस्तक्षेप फिर भी रिसर्चर्स का मानना है कि अब CMV जांच और इलाज को नियमित गर्भावस्था देखभाल का हिस्सा बनाने की दिशा में स्वीकार्यता बढ़ रही है।  

surbhi मई 15, 2026 0
Orforglipron weight loss pill shown with measuring tape highlighting long-term obesity management research
वजन घटाने के बाद फिर बढ़ते वजन पर लग सकती है रोक? नई Orforglipron पिल पर रिसर्च में मिले बड़े संकेत

इंजेक्शन बंद करने के बाद भी वजन कंट्रोल रखने में मददगार साबित हुई नई ओरल GLP-1 दवा मोटापे और वजन घटाने की दवाओं को लेकर नई रिसर्च में अहम जानकारी सामने आई है। एक नए क्लिनिकल ट्रायल में पाया गया कि Orforglipron नाम की ओरल दवा उन लोगों में वजन को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखने में मदद कर सकती है, जिन्होंने पहले GLP-1 इंजेक्शन थेरेपी से वजन कम किया था। ATTAIN-MAINTAIN ट्रायल के निष्कर्षों के अनुसार, जिन मरीजों ने इंजेक्शन बंद करने के बाद रोजाना Orforglipron पिल ली, उनमें वजन दोबारा बढ़ने की संभावना काफी कम रही। क्या था ट्रायल? इस स्टडी में अमेरिका के 376 प्रतिभागियों को शामिल किया गया था। ये सभी लोग पहले: Tirzepatide या Semaglutide जैसी इंजेक्टेबल GLP-1 दवाओं का इस्तेमाल कर चुके थे और एक साल से ज्यादा समय में उनका वजन कम हुआ था। इसके बाद प्रतिभागियों को एक साल तक: Orforglipron पिल या Placebo (डमी दवा) दी गई। Tirzepatide लेने वालों में क्या रहा असर? जिन लोगों ने पहले Tirzepatide इंजेक्शन लिया था और बाद में Orforglipron पिल शुरू की: उन्होंने अपने पहले घटे वजन का 74.7% तक बनाए रखा वहीं placebo लेने वालों में यह आंकड़ा केवल 49.2% रहा। Semaglutide ग्रुप में और बेहतर नतीजे Semaglutide इंजेक्शन बंद करने वाले मरीजों में: Orforglipron लेने वालों ने 79.3% वजन घटाव बनाए रखा Placebo ग्रुप में यह केवल 37.6% रहा यानी दोनों समूहों के बीच लगभग 41.7% का बड़ा अंतर देखा गया। रिसर्चर्स ने क्या कहा? विशेषज्ञों का कहना है कि कई मरीज और कुछ डॉक्टर यह मान लेते हैं कि एक बार वजन कम हो जाने के बाद मोटापे की दवाएं बंद की जा सकती हैं। लेकिन दवा बंद करने के बाद वजन दोबारा बढ़ना आम समस्या है। रिसर्चर्स के अनुसार: वजन दोबारा बढ़ने से cardiometabolic फायदे कम हो सकते हैं वजन में बार-बार उतार-चढ़ाव स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकता है ऐसे में Orforglipron जैसी दवाएं लंबे समय तक वजन नियंत्रित रखने में मददगार हो सकती हैं। कितनी हुई औसत वजन में कमी? ट्रायल में Orforglipron लेने वाले प्रतिभागियों में: Tirzepatide ग्रुप: औसतन 5 किलोग्राम अतिरिक्त वजन कम हुआ Semaglutide ग्रुप: लगभग 1 किलोग्राम वजन कम हुआ क्यों खास मानी जा रही है यह दवा? अब तक GLP-1 आधारित अधिकतर लोकप्रिय वजन घटाने वाली दवाएं इंजेक्शन के रूप में उपलब्ध हैं। लेकिन Orforglipron एक ओरल पिल है, जिसे रोजाना लिया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि: गोली के रूप में दवा लेना कई मरीजों के लिए आसान होगा यह बड़े स्तर पर उपलब्ध कराना ज्यादा सरल हो सकता है लंबे समय तक वजन प्रबंधन में यह नई उम्मीद बन सकती है फिलहाल यह दवा अमेरिका में उपलब्ध है और जल्द ही ब्रिटेन में भी लॉन्च हो सकती है।    

surbhi मई 15, 2026 0
Medical illustration of psoriasis treatment showing IL-17 inhibitors reducing risk of psoriatic arthritis in patients
IL-17 Inhibitors से Psoriatic Arthritis का खतरा कम, नई स्टडी में बड़ा दावा

Psoriatic Arthritis के खतरे को लेकर नई रिसर्च में अहम खुलासा हुआ है। अध्ययन के मुताबिक, सोरायसिस मरीजों में बायोलॉजिक दवाओं के चयन और उनके क्रम (sequencing) का भविष्य में Psoriatic Arthritis विकसित होने के जोखिम पर असर पड़ सकता है। खासतौर पर IL-17 inhibitors लेने वाले मरीजों में बीमारी का खतरा कम पाया गया। बायोलॉजिक थेरेपी के क्रम पर बढ़ी रुचि Psoriasis से पीड़ित मरीजों में Psoriatic Arthritis होने का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में अधिक होता है। हालांकि अब तक यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं था कि अलग-अलग बायोलॉजिक थेरेपी इस जोखिम को कैसे प्रभावित करती हैं। पहले के कुछ अध्ययनों में संकेत मिले थे कि first-line IL-23p19 inhibitors Psoriatic Arthritis के खतरे को कम कर सकते हैं, लेकिन second-line बायोलॉजिक थेरेपी के प्रभाव को लेकर पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं थी। इसी को ध्यान में रखते हुए शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया। 20 साल के डेटा का विश्लेषण इस population-based cohort study में 2002 से 2022 के बीच सोरायसिस के लिए बायोलॉजिक थेरेपी शुरू करने वाले 2,819 मरीजों का विश्लेषण किया गया। मरीजों को अलग-अलग दवा समूहों में बांटा गया, जिनमें शामिल थे: Tumour Necrosis Factor (TNF) inhibitors IL-17 inhibitors IL-23p19 inhibitors IL-12/23 inhibitors शोधकर्ताओं ने first-line और second-line दोनों प्रकार की बायोलॉजिक थेरेपी का अलग-अलग विश्लेषण किया। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह देखना था कि कितने मरीजों में बाद में Psoriatic Arthritis विकसित हुआ। IL-17 Inhibitors में सबसे कम जोखिम अध्ययन में first-line biologic therapy लेने वाले 2,819 मरीजों में से 400 मरीजों (14.2%) में Psoriatic Arthritis विकसित हुआ। विश्लेषण में पाया गया कि first-line IL-23p19 inhibitors लेने वाले मरीजों में TNF inhibitors की तुलना में बीमारी का खतरा काफी कम था। वहीं second-line biologic therapy लेने वाले 1,246 मरीजों में से 125 मरीजों (10%) में Psoriatic Arthritis विकसित हुआ। Second-line treatment analysis में IL-17 inhibitors ही एकमात्र दवा वर्ग था, जिसने TNF inhibitors की तुलना में बीमारी के जोखिम को उल्लेखनीय रूप से कम किया। रिसर्च के अनुसार: IL-17 inhibitors से बीमारी का खतरा लगभग 63% तक कम देखा गया IL-12/23 inhibitors और IL-23p19 inhibitors में भी जोखिम कम होने के संकेत मिले, लेकिन परिणाम सांख्यिकीय रूप से पूरी तरह मजबूत नहीं थे इलाज की रणनीति बदल सकती है शोधकर्ताओं का मानना है कि यह अध्ययन भविष्य में सोरायसिस मरीजों के लिए बायोलॉजिक थेरेपी चुनने की रणनीति को प्रभावित कर सकता है। खासतौर पर TNF inhibitor therapy असफल होने के बाद IL-17 inhibitors बेहतर second-line विकल्प बन सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञों ने कहा कि इन निष्कर्षों की पुष्टि के लिए आगे prospective studies की जरूरत होगी, ताकि Psoriatic Arthritis की रोकथाम पर आधारित बेहतर treatment guidelines तैयार की जा सकें।  

surbhi मई 14, 2026 0
Doctor examining scalp psoriasis patient as study highlights effectiveness of Tildrakizumab in obese patients
मोटापे का Tildrakizumab के असर पर नहीं पड़ा प्रभाव, स्कैल्प सोरायसिस मरीजों पर स्टडी में बड़ा खुलासा

एक नई 52-सप्ताह की Phase 3b क्लिनिकल स्टडी में सामने आया है कि Tildrakizumab दवा का असर मोटापे से प्रभावित नहीं होता। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह दवा मध्यम से गंभीर स्कैल्प सोरायसिस से पीड़ित मरीजों में समान रूप से प्रभावी और सुरक्षित पाई गई, चाहे मरीज मोटापे से ग्रस्त हों या नहीं। यह अध्ययन ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जब लंबे समय से यह चिंता जताई जाती रही है कि मोटापा और शरीर में बढ़ी हुई सूजन बायोलॉजिक थेरेपी की प्रभावशीलता को कम कर सकती है। हालांकि इस शोध ने संकेत दिया है कि IL-23 को टारगेट करने वाली बायोलॉजिक थेरेपी मोटापे वाले मरीजों में भी असरदार बनी रह सकती है। 16वें सप्ताह में बेहतर परिणाम शोधकर्ताओं ने मरीजों को दो समूहों में बांटा। एक समूह को Tildrakizumab 100 mg दिया गया, जबकि दूसरे को प्लेसीबो। मरीजों को BMI के आधार पर मोटापे और गैर-मोटापे वाली श्रेणियों में विभाजित किया गया। अध्ययन में शामिल लगभग आधे मरीज मोटापे की श्रेणी में थे। 16वें सप्ताह तक दोनों समूहों में दवा लेने वाले मरीजों में बेहतर सुधार देखने को मिला। मोटापे वाले मरीजों में: 48.8% मरीजों ने स्कैल्प रिस्पॉन्स हासिल किया प्लेसीबो लेने वालों में यह आंकड़ा सिर्फ 10% रहा गैर-मोटापे वाले मरीजों में: 50% मरीजों में सकारात्मक सुधार देखा गया प्लेसीबो समूह में केवल 4.8% मरीजों को फायदा मिला PSSI 90 स्कोर में भी शानदार सुधार स्टडी में Psoriasis Scalp Severity Index (PSSI) 90 स्कोर में भी महत्वपूर्ण सुधार दर्ज किया गया। यह स्कोर स्कैल्प सोरायसिस में 90% तक सुधार को दर्शाता है। मोटापे वाले मरीजों में: 62.8% मरीजों ने PSSI 90 हासिल किया प्लेसीबो समूह में केवल 10% मरीज इस स्तर तक पहुंचे गैर-मोटापे वाले मरीजों में: 58.7% मरीजों ने PSSI 90 हासिल किया प्लेसीबो समूह में कोई भी मरीज इस लक्ष्य तक नहीं पहुंचा 52 सप्ताह तक बना रहा असर अध्ययन में यह भी सामने आया कि मरीजों में स्कैल्प की खुजली और प्रभावित हिस्से में उल्लेखनीय कमी आई। शोधकर्ताओं के अनुसार, Tildrakizumab का असर पूरे 52 सप्ताह तक स्थिर और प्रभावी बना रहा। सुरक्षा के लिहाज से भी दवा सुरक्षित पाई गई। मोटापे और गैर-मोटापे वाले मरीजों में किसी नए साइड इफेक्ट या गंभीर सुरक्षा जोखिम की पहचान नहीं हुई। सोरायसिस और मोटापे के संबंध पर नई उम्मीद Psoriasis को मोटापे से जुड़ी प्रमुख बीमारियों में से एक माना जाता है। पहले के कई अध्ययनों में यह दावा किया गया था कि मोटापे के कारण शरीर में बढ़ने वाली सूजन दवाओं के असर को कम कर सकती है। हालांकि इस नए अध्ययन ने संकेत दिया है कि Tildrakizumab जैसी आधुनिक बायोलॉजिक दवाएं BMI से प्रभावित हुए बिना लंबे समय तक प्रभावी रह सकती हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि यह उप-विश्लेषण सांख्यिकीय अंतर को पूरी तरह मापने के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया था, इसलिए भविष्य में बड़े स्तर पर और अध्ययन की जरूरत हो सकती है। इसके बावजूद विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि यह दवा मोटापे और गैर-मोटापे दोनों तरह के मरीजों में सुरक्षित और प्रभावी साबित हुई है।  

surbhi मई 14, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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