भारत को वैश्विक आईटी सुरक्षा क्षेत्र में बड़ी जिम्मेदारी मिली है। India ने कॉमन क्राइटेरिया डेवलपमेंट बोर्ड (CCDB) का अध्यक्ष पद संभाल लिया है। यह जिम्मेदारी अप्रैल 2026 से अप्रैल 2028 तक के लिए भारत को सौंपी गई है। इसे अंतरराष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी सुरक्षा मानकों के क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका और तकनीकी क्षमता का बड़ा संकेत माना जा रहा है।
यह फैसला 14 से 16 अप्रैल 2026 के बीच जापान की राजधानी Tokyo में आयोजित कॉमन क्राइटेरिया रिकॉग्निशन अरेंजमेंट (CCRA) की पहली तिमाही बैठक में लिया गया।
कॉमन क्राइटेरिया रिकॉग्निशन अरेंजमेंट (CCRA) एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसके तहत आईटी सुरक्षा प्रमाणपत्रों को सदस्य देशों के बीच आपसी मान्यता दी जाती है। इसका उद्देश्य सुरक्षित आईटी उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को आसान बनाना और वैश्विक सुरक्षा मानकों को मजबूत करना है।
CCRA के तहत मूल्यांकित और प्रमाणित उत्पादों को सदस्य देशों में दोबारा प्रमाणन की जरूरत नहीं पड़ती। इससे टेक्नोलॉजी कंपनियों और आईटी उद्योग को बड़ा फायदा मिलता है।
कॉमन क्राइटेरिया डेवलपमेंट बोर्ड यानी CCDB, CCRA का तकनीकी केंद्र माना जाता है। यह बोर्ड आईटी सुरक्षा मूल्यांकन से जुड़े अंतरराष्ट्रीय तकनीकी मानकों और मूल्यांकन प्रक्रिया को संचालित करता है।
CCDB का मुख्य काम कॉमन क्राइटेरिया (CC) और कॉमन इवैल्यूएशन मेथडोलॉजी (CEM) के लिए वैश्विक तकनीकी कार्यक्रम तैयार करना और उन्हें अपडेट करना है। यह संस्था दुनिया भर में सुरक्षित आईटी उत्पादों के लिए मानक तय करने में अहम भूमिका निभाती है।
भारत 16 सितंबर 2013 से CCRA का सक्रिय सदस्य रहा है। देश में यह काम Ministry of Electronics and Information Technology और STQC महानिदेशालय के जरिए किया जाता है, जो आईटी सुरक्षा मूल्यांकन के लिए अधिकृत प्रमाणन संस्था है। फिलहाल CCRA में 20 सर्टिफिकेट-अथॉराइजिंग देश और 18 सर्टिफिकेट-कंज्यूमिंग देश शामिल हैं। ये सभी मिलकर वैश्विक आईटी सुरक्षा मानकों और प्रमाणन प्रणाली को मजबूत बनाने का काम करते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, CCDB की अध्यक्षता मिलने से भारत अब वैश्विक साइबर सुरक्षा और आईटी सुरक्षा मानकों को तय करने में अहम भूमिका निभाएगा। इससे भारत को उभरती तकनीकों के लिए अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा फ्रेमवर्क तैयार करने में प्रभाव बढ़ाने का मौका मिलेगा।
दो साल की इस अवधि में भारत वैश्विक आईटी सुरक्षा प्रमाणन व्यवस्था के भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों में निर्णायक भूमिका निभा सकेगा। इसे डिजिटल और साइबर सुरक्षा क्षेत्र में भारत की बड़ी कूटनीतिक और तकनीकी उपलब्धि माना जा रहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
कौशांबी, एजेंसियां। उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में 26 जून को हुए भीषण एलपीजी टैंकर हादसे का सीसीटीवी वीडियो सामने आने के बाद घटना एक बार फिर चर्चा में है। वायरल फुटेज में साफ दिखाई देता है कि एलपीजी गैस से भरा एक टैंकर तेज रफ्तार में टोल प्लाजा की ओर बढ़ता है और अचानक नियंत्रण खोकर डिवाइडर से टकराते हुए सीधे टोल बूथ में घुस जाता है। टक्कर के कुछ ही क्षण बाद टैंकर से गैस का रिसाव शुरू हो जाता है और फिर जोरदार विस्फोट से पूरा इलाका आग और धुएं की चपेट में आ जाता है। 24 सेकेंड के वीडियो में कैद हुआ खौफनाक मंजर करीब 24 सेकेंड के सीसीटीवी फुटेज में दो टैंकर टोल प्लाजा की ओर आते दिखाई देते हैं। इसी दौरान एक टैंकर अचानक अनियंत्रित होकर टोल बूथ से टकरा जाता है। टक्कर के बाद हुए गैस रिसाव ने कुछ ही सेकेंड में भयावह रूप ले लिया और भीषण धमाके के साथ आग की ऊंची लपटें उठने लगीं। विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि आसपास का पूरा इलाका धुएं से भर गया। पांच लोगों की मौत, राहत-बचाव में जुटा प्रशासन इस दर्दनाक हादसे में पांच लोगों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य गंभीर रूप से घायल हुए। विस्फोट के बाद लगी आग इतनी भीषण थी कि उसकी लपटें करीब दो किलोमीटर दूर से भी दिखाई दे रही थीं। आग पर काबू पाने के लिए जिले की सभी फायर ब्रिगेड की गाड़ियों को मौके पर भेजा गया। पुलिस, प्रशासन और राहत-बचाव दल ने तत्काल अभियान चलाकर घायलों को सुरक्षित बाहर निकाला और अस्पताल पहुंचाया। सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो हादसे का सीसीटीवी वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। कई लोगों ने इसे साझा करते हुए सड़क सुरक्षा और खतरनाक ज्वलनशील पदार्थों के सुरक्षित परिवहन पर गंभीर सवाल उठाए हैं। प्रशासन पूरे मामले की जांच कर रहा है और यह पता लगाया जा रहा है कि टैंकर के अनियंत्रित होने के पीछे तकनीकी खराबी, चालक की लापरवाही या कोई अन्य कारण जिम्मेदार था। यह हादसा भारी वाहनों के संचालन और सुरक्षा मानकों के पालन की आवश्यकता को एक बार फिर रेखांकित करता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में शामिल 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का एलान शुक्रवार शाम किया जाएगा। इन पुरस्कारों के तहत वर्ष 2024 में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) से प्रमाणित फिल्मों और कलाकारों को सम्मानित किया जाएगा। देशभर के फिल्म प्रेमियों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि इस बार सर्वश्रेष्ठ फिल्म, अभिनेता, अभिनेत्री और अन्य प्रमुख श्रेणियों में कौन बाजी मारता है। यहां देख सकेंगे लाइव घोषणा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के विजेताओं की घोषणा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के आधिकारिक एक्स (पूर्व में ट्विटर) और यूट्यूब चैनलों पर लाइव प्रसारित की जाएगी। पुरस्कारों के लिए 11 सदस्यीय जूरी ने फिल्मों का मूल्यांकन किया है, जिसकी अध्यक्षता फिल्म निर्माता जयराज ने की। इससे पहले भी वह वर्ष 2012 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की जूरी का हिस्सा रह चुके हैं। कई भाषाओं की फिल्मों में कड़ी टक्कर इस बार विभिन्न भारतीय भाषाओं की फिल्मों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है। खासकर मलयालम सिनेमा ने वर्ष 2024 में शानदार प्रदर्शन किया है। 'ब्रमायुगम', 'मंजुम्मेल बॉयज' और 'किष्किंधा कांडम' जैसी फिल्मों को समीक्षकों और दर्शकों दोनों का भरपूर समर्थन मिला, जिससे इन्हें प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। हिंदी और दक्षिण भारतीय फिल्मों पर भी नजर हिंदी सिनेमा में 'आर्टिकल 370', 'श्रीकांत' और 'चंदू चैंपियन' को संभावित दावेदार माना जा रहा है। वहीं दक्षिण भारतीय फिल्मों में तमिल की 'महाराजा', 'मेइयाझगन', 'अमरन' तथा तेलुगु की 'कल्कि 2898 AD', 'लकी भास्कर' और 'देवरा: पार्ट 1' भी पुरस्कारों की दौड़ में मानी जा रही हैं। हालांकि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में पहले से नामांकन सूची सार्वजनिक नहीं की जाती, लेकिन अभिनय श्रेणियों में ममूटी, शिवकार्तिकेयन, विजय सेतुपति, कार्थी और साई पल्लवी जैसे कलाकारों के नाम चर्चा में हैं। अब सभी की निगाहें शाम होने वाली आधिकारिक घोषणा पर टिकी हैं, जहां वर्ष 2024 के सर्वश्रेष्ठ सिनेमा का फैसला सामने आएगा।
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने देश में वर्ष 2011 की जनगणना के बाद हुए जनसांख्यिकीय (डेमोग्राफिक) बदलावों का वैज्ञानिक अध्ययन कराने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति (High-Level Committee on Demographic Changes - HLCDC) का गठन किया है। गृह मंत्रालय की ओर से गठित यह समिति अवैध घुसपैठ, असामान्य बसावट और जनसंख्या संरचना में आए बदलावों की जांच करेगी तथा एक वर्ष के भीतर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी। समिति का मुख्य उद्देश्य सीमावर्ती राज्यों, महानगरों और औद्योगिक क्षेत्रों में जनसंख्या परिवर्तन के कारणों का अध्ययन करना और आवश्यक नीति एवं कानूनी सुधारों की सिफारिश करना है। राज्यों को भेजी जाएगी विस्तृत प्रश्नावली समिति ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए विस्तृत प्रश्नावली तैयार की है। इसे मुख्य सचिवों, पुलिस महानिदेशकों (DGP) और संबंधित विभागों को भेजा जाएगा, ताकि दौरे से पहले आवश्यक आंकड़े और सूचनाएं जुटाई जा सकें। सरकार का मानना है कि इससे समिति को जमीनी स्तर पर तथ्यात्मक और व्यापक अध्ययन करने में मदद मिलेगी। सीमावर्ती राज्यों और बड़े शहरों पर रहेगा विशेष फोकस सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रकाश प्रभाकर नाओलेकर की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय समिति पश्चिम बंगाल, असम, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, मेघालय, बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान सहित कई सीमावर्ती राज्यों का दौरा करेगी। इसके अलावा समिति देश के प्रमुख महानगरों और औद्योगिक शहरों में भी जनसंख्या पैटर्न और बसावट का अध्ययन करेगी। अमित शाह ने जल्द रिपोर्ट सौंपने के दिए निर्देश केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने समिति को जल्द से जल्द अपनी सिफारिशें तैयार करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने गृह सचिव को भी समिति के कार्य और राज्यों के दौरों के दौरान हरसंभव सहयोग सुनिश्चित करने को कहा है। अवैध प्रवास पर बन सकती है नई नीति समिति अपने अध्ययन के दौरान अवैध प्रवास, असामान्य जनसंख्या वृद्धि और जनसांख्यिकीय बदलावों के संभावित कारणों का विश्लेषण करेगी। इसके आधार पर समिति निम्नलिखित विषयों पर सुझाव देगी: अवैध प्रवासियों की पहचान की प्रक्रिया हिरासत और निष्कासन की स्थायी व्यवस्था सीमा प्रबंधन को और मजबूत बनाने के उपाय केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय की रणनीति आवश्यक कानूनी और नीतिगत सुधार एक साल में सरकार को सौंपी जाएगी रिपोर्ट गृह मंत्रालय ने समिति को एक वर्ष के भीतर अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने का लक्ष्य दिया है। रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार अवैध घुसपैठ, सीमा सुरक्षा और जनसंख्या प्रबंधन से जुड़ी नीतियों में बदलाव पर विचार कर सकती है। सरकार का कहना है कि इस अध्ययन का उद्देश्य देश में जनसंख्या से जुड़े बदलावों का तथ्यात्मक और वैज्ञानिक विश्लेषण करना है, ताकि भविष्य की नीतियां सटीक आंकड़ों और वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर तैयार की जा सकें।