कोलकाता, एजेंसियां। तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी की मुश्किलें गाड़ी पर सुरक्षाकर्मियों के लटककर यात्रा करने के मामले में बढ़ती नजर आ रही हैं। कोलकाता पुलिस उनके द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों और जवाब से संतुष्ट नहीं है। ऐसे में पुलिस अब उन्हें एक नया नोटिस जारी करने की तैयारी में है, जिसमें स्पष्ट रूप से उन दस्तावेजों और जानकारियों का उल्लेख किया जाएगा, जो अब तक उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। कालीघाट थाना पुलिस ने मोटर व्हीकल एक्ट दरअसल, कालीघाट थाना पुलिस ने मोटर व्हीकल एक्ट के कथित उल्लंघन के मामले में अभिषेक बनर्जी को नोटिस भेजकर आवश्यक दस्तावेज जमा करने को कहा था। जवाब देने की समय-सीमा समाप्त होने के बाद अभिषेक ने अपने प्रतिनिधि के माध्यम से पुलिस को कुछ दस्तावेज सौंपे। हालांकि, जांच अधिकारियों का कहना है कि कई महत्वपूर्ण जानकारियां अब भी उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। यह मामला बागुईहाटी निवासी राजीव सरकार की शिकायत से जुड़ा है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि अभिषेक बनर्जी के काफिले में दो सुरक्षाकर्मी वाहन के दरवाजे से बाहर लटककर यात्रा कर रहे थे, जो मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 123 और धारा 184 का उल्लंघन है। शिकायतकर्ता ने इसे खतरनाक और कानून के विरुद्ध बताते हुए कार्रवाई की मांग की थी। जांच के दौरान जांच के दौरान पुलिस ने वाहन खरीदने की तारीख, चालक की पहचान और पता, तथा वाहन से लटक रहे सुरक्षाकर्मियों की पहचान संबंधी जानकारी मांगी थी। पुलिस का कहना है कि इन सवालों के संतोषजनक जवाब नहीं मिले हैं, इसलिए जल्द ही नया नोटिस जारी किया जाएगा। उधर, अभिषेक बनर्जी पहले से ही कई मामलों में जांच एजेंसियों के दायरे में हैं। उन पर विभिन्न भ्रष्टाचार मामलों में ईडी और सीबीआई की जांच चल रही है। इसके अलावा अन्य कानूनी मामलों में भी उनकी भूमिका की जांच जारी है। ऐसे में इस नए प्रकरण ने उनकी राजनीतिक और कानूनी चुनौतियों को और बढ़ा दिया है।
कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। उनकी गाड़ी के बाहर सुरक्षाकर्मियों के लटककर सफर करने के कथित मामले में कोलकाता पुलिस उनके जवाब से संतुष्ट नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, पुलिस अब उन्हें एक नया नोटिस जारी करने की तैयारी कर रही है, जिसमें मांगे गए दस्तावेजों का स्पष्ट उल्लेख किया जाएगा। पुलिस ने मांगे थे जरूरी दस्तावेज कालीघाट थाने की ओर से पहले जारी नोटिस में अभिषेक बनर्जी से मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) के कथित उल्लंघन से संबंधित आवश्यक दस्तावेज और जानकारी उपलब्ध कराने को कहा गया था। उन्हें शनिवार तक जवाब देने की समय-सीमा दी गई थी। हालांकि निर्धारित समय बीतने के बाद अभिषेक बनर्जी ने अपने प्रतिनिधि के माध्यम से कालीघाट थाने में कुछ दस्तावेज जमा कराए। जवाब को पुलिस ने बताया अधूरा पुलिस सूत्रों के अनुसार, अभिषेक बनर्जी की ओर से जमा कराए गए दस्तावेजों में वह सभी जानकारियां उपलब्ध नहीं कराई गईं, जिनकी मांग की गई थी। इसी वजह से जांच अधिकारी उनके जवाब से संतुष्ट नहीं हैं। सूत्रों का कहना है कि अब नया नोटिस जारी कर स्पष्ट रूप से उन दस्तावेजों और सूचनाओं का उल्लेख किया जाएगा, जो अब तक पुलिस को उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। क्या है पूरा मामला? यह मामला बागुईहाटी निवासी राजीव सरकार द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि अभिषेक बनर्जी की गाड़ी पर दो सुरक्षाकर्मी खतरनाक तरीके से बाहर लटककर यात्रा कर रहे थे, जो मोटर वाहन अधिनियम का उल्लंघन है। शिकायत में मोटर वाहन अधिनियम की धारा 123 का हवाला दिया गया है, जिसमें चलती गाड़ी से लटककर यात्रा करने पर रोक है। साथ ही धारा 184का भी उल्लेख किया गया है, जो खतरनाक तरीके से वाहन चलाने या यात्रा करने को दंडनीय अपराध मानती है। पुलिस ने मांगी थीं ये जानकारियां जांच के दौरान पुलिस ने अभिषेक बनर्जी से कई महत्वपूर्ण जानकारियां मांगी थीं, जिनमें शामिल हैं— वाहन खरीदने की तारीख। वाहन चालक (ड्राइवर) का नाम, पता और पहचान। गाड़ी के बाहर लटककर यात्रा करने वाले सुरक्षाकर्मियों की पहचान। घटना से जुड़े अन्य आवश्यक दस्तावेज। पुलिस का दावा है कि इन जानकारियों में से कई अब भी उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। जांच जारी कोलकाता पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है और सभी तथ्यों की जांच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। यदि आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती है, तो पुलिस आगे भी कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कर सकती है। गौरतलब है कि यह मामला अभी जांच के चरण में है और पुलिस की ओर से किसी भी प्रकार की कानूनी जिम्मेदारी तय नहीं की गई है। वहीं, अभिषेक बनर्जी की ओर से भी इस मामले पर विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को कलकत्ता हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने शहीद दिवस रैली से जुड़े कथित अवमानना मामले में दोनों नेताओं से जवाब तलब किया है। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि वे निर्धारित समय के भीतर अपना हलफनामा दाखिल करें। क्या है पूरा मामला? याचिकाकर्ता का आरोप है कि शहीद दिवस रैली के आयोजन के दौरान हाईकोर्ट के पहले जारी निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। इसी आधार पर अदालत में अवमानना याचिका दायर की गई थी। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा था। हाईकोर्ट ने मांगा हलफनामा सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी को निर्देश दिया कि वे आरोपों पर अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए हलफनामा दाखिल करें। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 17 अगस्त की नई तारीख भी तय की है, जहां दोनों पक्षों की दलीलें सुनी जाएंगी।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में राजनीतिक तनाव के बीच दक्षिण दिनाजपुर जिले के गंगारामपुर में शुक्रवार देर रात एक बस को रोककर भाजपा कार्यकर्ताओं ने हंगामा किया। कार्यकर्ताओं को शक था कि बस में सवार व्यक्ति तृणमूल कांग्रेस (TMC) नेता अभिषेक बनर्जी के निजी सहायक (PA) सुमित रॉय हैं। हालांकि पुलिस की जांच में यह आशंका गलत साबित हुई और मामला शांत हो गया। शक के आधार पर रोकी गई बस प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, भाजपा कार्यकर्ताओं ने सूचना मिलने के बाद बस को रोक लिया और एक यात्री से पूछताछ करते हुए उसके साथ बदसलूकी की। इस दौरान कुछ समय के लिए मौके पर तनाव की स्थिति बन गई। घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और संबंधित यात्री की पहचान की जांच शुरू की। पुलिस जांच में सामने आई सच्चाई पुलिस सूत्रों के अनुसार, जिस व्यक्ति को अभिषेक बनर्जी का PA समझा जा रहा था, वह सुमित रॉय नहीं बल्कि शरीफुल आलम निकला। पुलिस ने बताया कि शरीफुल आलम पहले अभिषेक बनर्जी की सुरक्षा में तैनात एक पुलिस अधिकारी रह चुके हैं। वर्तमान में वह दक्षिण दिनाजपुर जिले के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (Information & Cultural Affairs) में कार्यरत हैं। पहचान की पुष्टि होने के बाद पुलिस ने बस को आगे जाने की अनुमति दे दी और स्थिति सामान्य हो गई। भाजपा ने क्या कहा? गंगारामपुर नगर भाजपा अध्यक्ष वृंदावन घोष ने कहा कि स्थानीय लोगों को संदेह था कि वाहन में अभिषेक बनर्जी के करीबी सहयोगी सुमित रॉय मौजूद हैं। उन्होंने कहा, "जैसे ही हमें इसकी जानकारी मिली, हमने पुलिस प्रशासन को सूचित किया। जांच के दौरान पता चला कि वह व्यक्ति सुमित रॉय नहीं है, बल्कि पहले अभिषेक बनर्जी की सुरक्षा में तैनात अधिकारी रह चुका है। गलतफहमी दूर होने के बाद पुलिस ने वाहन को जाने दिया।" तनाव के बीच हुई घटना यह घटना ऐसे समय सामने आई है जब पश्चिम बंगाल में राजनीतिक माहौल पहले से ही काफी गर्म है। हाल के दिनों में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं और समर्थकों के बीच कई टकराव और विरोध-प्रदर्शन की घटनाएं सामने आई हैं। ऐसे माहौल में गंगारामपुर की यह घटना भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गई है। फिलहाल पुलिस ने स्पष्ट किया है कि जांच में किसी भी तरह की आपराधिक गतिविधि सामने नहीं आई है और पहचान की पुष्टि होने के बाद मामला समाप्त कर दिया गया।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। इस बीच पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद Abhishek Banerjee की चार्टर्ड फ्लाइट यात्राओं को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, पिछले चार वर्षों में तृणमूल कांग्रेस ने चार्टर्ड विमानों पर करीब 141 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। यह खुलासा ऐसे समय हुआ है जब चुनावी हार के बाद पार्टी के अंदर नेतृत्व और संसाधनों के उपयोग को लेकर सवाल उठने लगे हैं। चार वर्षों में कितना हुआ खर्च? तृणमूल कांग्रेस की ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक चार्टर्ड विमानों पर खर्च का ब्योरा इस प्रकार है: वर्ष खर्च 2022 35 करोड़ रुपये 2023 13 करोड़ रुपये 2024 56 करोड़ रुपये 2025 37 करोड़ रुपये चार वर्षों में कुल खर्च 141 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जिसे किसी क्षेत्रीय राजनीतिक दल द्वारा हवाई यात्रा पर किया गया असाधारण खर्च माना जा रहा है। बिजनेस क्लास के बजाय प्राइवेट जेट का इस्तेमाल रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जिन मार्गों पर बिजनेस क्लास का टिकट 15 से 20 हजार रुपये में उपलब्ध था, वहां भी चार्टर्ड विमानों का इस्तेमाल किया गया। आरोप है कि कई यात्राओं में एक बार की उड़ान पर करीब 5 लाख रुपये तक खर्च किए गए। कुणाल घोष ने जताई नाराजगी टीएमसी के वरिष्ठ नेता Kunal Ghosh ने इस मुद्दे पर खुलकर असंतोष व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि यदि चार्टर्ड विमानों पर खर्च किया गया पैसा पार्टी फंड से गया है, तो वह इसका समर्थन नहीं करते। कुणाल घोष ने कहा कि पार्टी के संसाधनों का उपयोग अधिक जिम्मेदारी और पारदर्शिता के साथ होना चाहिए। बीजेपी ने साधा निशाना भारतीय जनता पार्टी ने इस मुद्दे को लेकर तृणमूल कांग्रेस और बनर्जी परिवार पर हमला बोला है। भाजपा विधायक Sajal Ghosh ने तंज कसते हुए कहा कि जितनी राशि चार्टर्ड विमानों पर खर्च की गई, उतने पैसों में पार्टी अपना एक नया विमान खरीद सकती थी। उन्होंने आरोप लगाया कि आम कार्यकर्ताओं के पैसे का दुरुपयोग किया गया है और पार्टी नेतृत्व को इसका जवाब देना चाहिए। चुनावी हार के बाद बढ़ीं अभिषेक बनर्जी की मुश्किलें पश्चिम बंगाल की राजनीति में पहले से जारी अंदरूनी खींचतान के बीच चार्टर्ड फ्लाइट खर्च का यह विवाद अभिषेक बनर्जी के लिए नई चुनौती बन सकता है। पार्टी के भीतर उठते सवाल और विपक्ष के हमलों ने इस मुद्दे को राज्य की राजनीति का बड़ा विषय बना दिया है। अब देखने वाली बात यह होगी कि तृणमूल कांग्रेस इस विवाद पर क्या आधिकारिक स्पष्टीकरण देती है और क्या पार्टी के भीतर बढ़ता असंतोष किसी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम का कारण बनता है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में शिक्षक भर्ती घोटाले के बाद अब सरकारी नौकरियों के नाम पर कथित वसूली और धोखाधड़ी का एक और बड़ा मामला सामने आया है। इस बार जांच की आंच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव Abhishek Banerjee के निजी सहायक (PA) सुमित रॉय तक पहुंच गई है। मेदिनीपुर के पूर्व विधायक Sujay Hazra से पूछताछ के बाद डेबरा थाने में सुमित रॉय के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी की प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई है। नौकरी दिलाने के नाम पर लाखों रुपये की कथित ठगी मामला डेबरा निवासी प्रसेनजीत रॉय की शिकायत के आधार पर दर्ज किया गया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि विभिन्न सरकारी विभागों में 12 पदों पर नौकरी दिलाने के नाम पर प्रति उम्मीदवार साढ़े तीन लाख रुपये की मांग की गई थी। पीड़ितों का दावा है कि विश्वास जीतने के लिए उन्हें एक होटल में ‘आशिक’ नामक व्यक्ति से मिलवाया गया, जिसने खुद को राज्य सचिवालय नबान्न का कर्मचारी बताया। इसके बाद उम्मीदवारों को कथित तौर पर विकास भवन और खाद्य भवन ले जाकर मेडिकल परीक्षण भी कराया गया। 'अभिषेक बनर्जी के पीए को पैसे देने होंगे' कहकर मांगी गई अतिरिक्त रकम शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि बाद में उनसे यह कहकर और धन की मांग की गई कि रकम अभिषेक बनर्जी के निजी सहायक सुमित रॉय तक पहुंचानी है। इसके बाद उम्मीदवारों को कथित तौर पर असली नियुक्ति पत्र के बजाय रंगीन जेरॉक्स प्रतियां थमा दी गईं। जब अभ्यर्थियों को नौकरी नहीं मिली और उन्होंने अपने पैसे वापस मांगे, तो उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाने और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियां दी गईं। CID ने जारी किया लुकआउट सर्कुलर मामले की गंभीरता को देखते हुए Criminal Investigation Department, West Bengal (CID) ने सुमित रॉय के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर (LOC) जारी कर दिया है। जांच एजेंसियों के मुताबिक, सुमित रॉय के मोबाइल फोन की आखिरी टावर लोकेशन Kalighat स्थित अभिषेक बनर्जी के आवास के आसपास मिली थी। इसके बाद सालबनी थाने की पुलिस केंद्रीय बलों के साथ कालीघाट स्थित आवास पर पहुंची और लंबी प्रतीक्षा के बाद ताला तोड़कर परिसर के भीतर प्रवेश किया। सुमित रॉय वहां नहीं मिला। ससुराल में भी छापेमारी, आरोपी अब भी फरार पुलिस ने हुगली जिले के Serampore स्थित सुमित रॉय की ससुराल में भी छापेमारी की, लेकिन वहां भी उसका कोई सुराग नहीं मिला। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि कथित नौकरी घोटाले में कितने लोगों से धन वसूला गया और इसमें किन-किन लोगों की भूमिका रही। मामले में आगे और खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है। राजनीतिक हलकों में बढ़ी हलचल सुमित रॉय के खिलाफ FIR और CID की कार्रवाई के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। विपक्ष ने मामले को लेकर तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधना शुरू कर दिया है, जबकि पार्टी की ओर से अभी तक इस पूरे मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। जांच एजेंसियों का कहना है कि आरोपी की तलाश जारी है और मामले से जुड़े सभी पहलुओं की गहन जांच की जा रही है।
TMC के 3 बैंक अकाउंट फ्रीज, इनमें ₹440 करोड़ कोलकाता, एजेंसियां। कोलकाता एयरपोर्ट पर शुक्रवार रात भाजपा और तृणमूल कांग्रेस (TMC) कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हो गई, जिससे वहां अफरा-तफरी मच गई। इस दौरान एक महिला बेहोश हो गई। TMC कार्यकर्ता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी का स्वागत करने एयरपोर्ट पहुंचे थे, जो दिल्ली में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात कर लौट रहे थे। अभिषेक के एक समर्थक ने आरोप लगाया कि भाजपा से जुड़े कुछ लोग एयरपोर्ट पर आए और TMC कार्यकर्ताओं के साथ बदसलूकी करने लगे। समर्थक का दावा है कि उनके हाथों में अंडे थे और बाद में उन्होंने हथियार भी निकाले। उन्होंने सवाल उठाया कि एयरपोर्ट अथॉरिटी और सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद हथियार अंदर कैसे पहुंचे। 31 मई को भी अभिषेक के साथ मारपीट हुई थी इससे पहले भी 31 मई को पश्चिम बंगाल के सोनारपुर दक्षिण में अभिषेक से मारपीट हुई थी। यहां वे चुनाव के बाद हुई हिंसा के पीड़ित टीएमसी कार्यकर्ताओं से मिलने पहुंचे थे। TMC के 3 बैंक एकाउंट फ्रीज वहीं, शुक्रवार देर रात TMC के HDFC बैंक के 3 अकाउंट्स 50200059108322, 50200063079047, 50200063079034 को फ्रीज किया गया। इनमें कुल मिलाकर लगभग ₹440 करोड़ जमा हैं।
नई दिल्ली: लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 सांसदों के बागी रुख अपनाने और नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय के ऐलान के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इस बीच बागी सांसदों ने साफ किया है कि उनका संघर्ष ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर विकसित हुई कार्यशैली और नेतृत्व के तौर-तरीकों के खिलाफ है। 'ममता बनर्जी के प्रति सम्मान हमेशा रहेगा' लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद बागी गुट के एक वरिष्ठ सांसद ने कहा कि ममता बनर्जी उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं और उनके प्रति सम्मान हमेशा बना रहेगा। उन्होंने कहा, "ममता बनर्जी हमारी नेता रही हैं। उन्होंने कई नेताओं को राजनीति में आगे बढ़ने का अवसर दिया। उनके प्रति हमारे मन में सम्मान हमेशा रहेगा, लेकिन अब बंगाल के विकास और नई दिशा के लिए काम करने का समय है।" 'बंगाल के विकास के लिए दिल्ली के साथ मिलकर काम करना होगा' बागी सांसद ने कहा कि वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद राज्य के विकास को प्राथमिकता देना जरूरी हो गया है। उनका दावा है कि कई केंद्रीय योजनाओं का लाभ राज्य के लोगों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया। उन्होंने कहा कि बंगाल के विकास को गति देने के लिए केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है और अब दिल्ली के साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। 'लड़ाई ममता से नहीं, पार्टी के भीतर के कॉर्पोरेट कल्चर से' बागी गुट के नेताओं का कहना है कि उनका विरोध ममता बनर्जी से नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर कथित तौर पर विकसित हुए केंद्रीकृत और कॉर्पोरेट शैली के प्रबंधन से है। उनका आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के सांसदों और विधायकों की भूमिका सीमित हो गई थी और फैसलों में उनकी भागीदारी कम हो गई थी। अभिषेक बनर्जी के करीबियों पर भी उठाए सवाल बागी नेताओं ने दावा किया कि पार्टी के भीतर कुछ नेताओं और प्रभावशाली समूहों के बढ़ते प्रभाव से पुराने और वरिष्ठ नेताओं में असंतोष बढ़ रहा था। उनका कहना है कि यही असंतोष धीरे-धीरे बड़े राजनीतिक बदलाव का कारण बना। इन आरोपों पर टीएमसी की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में रविवार को उस समय बड़ा राजनीतिक भूचाल आ गया, जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का दावा कर दिया। यह वही पार्टी है, जिसने वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में ‘दलबदलुओं को नकारें’ के नारे के साथ चुनाव लड़ा था। अब एक छोटे और लगभग गुमनाम राजनीतिक दल का अचानक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आना कई सवाल खड़े कर रहा है। क्या है NCPI? नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है। निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक, पार्टी का पंजीकृत कार्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के संकराईल में स्थित है और इसकी अध्यक्ष शेउली कुंडू हैं। पार्टी लंबे समय तक राजनीतिक रूप से हाशिये पर रही और उसका प्रभाव किसी भी राज्य में उल्लेखनीय नहीं रहा। TMC के बागी सांसदों के विलय के दावे के बाद अचानक यह दल राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चाओं में आ गया है। ‘दलबदलुओं को नकारें’ था पार्टी का प्रमुख नारा NCPI ने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के दौरान अपने प्रचार अभियान में नारा दिया था: "अपने अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीतिक दलबदलुओं को नकारें, समाजसेवियों का समर्थन करें।" पार्टी ने खुद को राजनीतिक अवसरवाद और दल-बदल की राजनीति के खिलाफ एक विकल्प के रूप में पेश किया था। ऐसे में अब उसी पार्टी में बड़े पैमाने पर बागी सांसदों के शामिल होने का दावा राजनीतिक विडंबना के रूप में देखा जा रहा है। त्रिपुरा चुनाव में बेहद कमजोर रहा प्रदर्शन NCPI ने वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में महज चार सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। इनमें चावमानु, अंबासा और कैलाशहर जैसी सीटें शामिल थीं।
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी अंदरूनी संकट और बगावत के बीच पार्टी सांसद महुआ मोइत्रा ने वरिष्ठ नेता सुदीप बंद्योपाध्याय पर तीखा हमला बोला है। महुआ ने आरोप लगाया कि सुदीप बंद्योपाध्याय ने बीमारी का बहाना बनाकर पार्टी नेतृत्व को गुमराह किया और बाद में दिल्ली जाकर केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात की। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए महुआ मोइत्रा ने सुदीप बंद्योपाध्याय के पुराने राजनीतिक विवादों का जिक्र करते हुए उन पर विश्वासघात का आरोप लगाया। 'बीमारी का बहाना, दिल्ली में मुलाकात' महुआ मोइत्रा ने लिखा, "दादा सुदीप बंद्योपाध्याय, आपको 2017 में रोज वैली घोटाले में गिरफ्तार किया गया था। तब भी आपने बीमारी का सहारा लिया था। इस बार भी बीमारी का बहाना बनाकर दिल्ली जाकर गद्दारी की। तापस रॉय और कुणाल घोष आपके बारे में सही थे, गलती हमारी थी।" उन्होंने दावा किया कि सुदीप बंद्योपाध्याय ने पार्टी नेताओं को बताया था कि पेट संबंधी समस्या के कारण उन्हें कोलकाता के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। लेकिन बाद में उन्हें टीवी चैनलों पर दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर देखा गया। महुआ ने अपने पोस्ट में कटाक्ष करते हुए लिखा, "उनका मुखौटा और उनकी विग दोनों उतर गए। दादा, अब कम से कम अपना एक्स हैंडल बदलकर 'सुदीप बीजेपी बी टीम' कर लीजिए। हमारे नाम का इस्तेमाल मत कीजिए।" कुणाल घोष ने भी साधा निशाना टीएमसी नेता कुणाल घोष ने भी सुदीप बंद्योपाध्याय की आलोचना करते हुए कहा कि उनका राजनीतिक इतिहास दल बदलने से जुड़ा रहा है। उन्होंने कहा, "ममता दीदी ने इन लोगों को पद, सम्मान और पहचान दी, लेकिन बदले में उन्हें यही मिला। सुदीप बंद्योपाध्याय की राजनीति हमेशा ममता बनर्जी को गुमराह करने की रही है। मैंने पहले भी इस बारे में चेतावनी दी थी, जिसके कारण मुझे पार्टी से निलंबित तक होना पड़ा।" ममता को 'चीफ एडवाइजर' बनाने के बयान से बढ़ा विवाद विवाद तब और गहरा गया जब सुदीप बंद्योपाध्याय ने एक बांग्ला न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि टीएमसी के अधिकांश सांसद और विधायक चाहते हैं कि पार्टी का संगठन बचा रहे और ममता बनर्जी को 'मुख्य सलाहकार' (Chief Advisor) की भूमिका में रखा जाए। उन्होंने कहा कि बागी नेताओं ने उनसे आग्रह किया कि ममता बनर्जी को सम्मानपूर्वक मार्गदर्शक की भूमिका दी जाए, जिससे वह भावुक हो गए और बागी गुट के साथ जाने का फैसला किया। उनके इस बयान पर टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी ने भी नाराजगी जताई और कहा कि ममता बनर्जी ने ही सुदीप बंद्योपाध्याय को राजनीति में स्थापित किया, संकट के समय उनका साथ दिया और आज वही उन्हें 'सलाहकार' बनाने की बात कर रहे हैं। बागी सांसदों के दावे से बढ़ी सियासी हलचल टीएमसी में मतभेदों की खबरों के बीच यह दावा भी किया जा रहा है कि लोकसभा में पार्टी के 20 सांसदों ने अलग समूह बना लिया है और वे खुद को 'वास्तविक टीएमसी' का प्रतिनिधि बता रहे हैं। बागी सांसद काकोली घोष दस्तिदार ने दावा किया है कि 20 सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय कर लिया है और यह नया समूह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देगा। इन दावों और आरोपों पर सुदीप बंद्योपाध्याय की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं, टीएमसी के भीतर जारी सियासी उठापटक ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर जारी सियासी संकट अब संसद के गलियारों तक पहुंच गया है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि सदन में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) को केवल एक संयुक्त और एकल राजनीतिक दल के रूप में ही मान्यता दी जाए। अभिषेक बनर्जी का यह कदम ऐसे समय सामने आया है, जब पार्टी के भीतर बागी सांसदों के अलग गुट बनाने और स्वतंत्र पहचान की मांग के दावों से राजनीतिक हलचल तेज है। बागी गुट को मान्यता नहीं देने की मांग सूत्रों के मुताबिक, अपने पत्र में अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष से अनुरोध किया है कि सदन के भीतर किसी भी ऐसे समूह, धड़े या गुट को आधिकारिक मान्यता, दर्जा या सुविधाएं न दी जाएं, जो स्वयं को ‘असली टीएमसी’ बताने का दावा कर रहा हो। पत्र में कहा गया है कि लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व केवल पार्टी द्वारा अधिकृत नेता और आधिकारिक व्हिप के माध्यम से ही माना जाना चाहिए और पार्टी को एक एकीकृत संसदीय दल के रूप में देखा जाना चाहिए। संसद तक पहुंचा टीएमसी का अंदरूनी संकट पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बाद टीएमसी के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। बागी नेताओं के अलग संसदीय गुट बनाने की अटकलों के बीच अभिषेक बनर्जी का यह पत्र पार्टी नेतृत्व की ओर से एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि कोई बागी गुट संसद में अलग पहचान की मांग करता है, तो उसके संवैधानिक और संसदीय पहलुओं पर अंतिम फैसला लोकसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में होगा। स्पीकर के फैसले पर सबकी नजर अभिषेक बनर्जी के पत्र के बाद दिल्ली और कोलकाता के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कार्यालय की ओर से अभी तक इस पत्र पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। आने वाले दिनों में स्पीकर का रुख यह तय कर सकता है कि संसद में तृणमूल कांग्रेस एकजुट संसदीय दल के रूप में बनी रहती है या किसी संभावित बागी गुट को अलग पहचान मिलती है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की करारी हार के बाद पार्टी के भीतर मचा सियासी घमासान अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। पार्टी के वरिष्ठ सांसद और लंबे समय तक लोकसभा में टीएमसी संसदीय दल के नेता रहे सुदीप बंद्योपाध्याय के बागी खेमे में शामिल होने के दावों ने बंगाल की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। रिपोर्टों के मुताबिक, सुदीप बंद्योपाध्याय ने ममता बनर्जी को सक्रिय राजनीति से अलग कर उन्हें केवल ‘मुख्य सलाहकार’ (Chief Advisor) की भूमिका में रखने के प्रस्ताव का समर्थन किया है। इस घटनाक्रम को टीएमसी के अंदर चल रही नेतृत्व की लड़ाई में बड़ा झटका माना जा रहा है। ‘दीदी का सम्मान, लेकिन संगठन में बदलाव जरूरी’ एक बांग्ला समाचार चैनल को दिए इंटरव्यू में सुदीप बंद्योपाध्याय ने कथित तौर पर कहा कि पार्टी के कई सांसद और विधायक चाहते हैं कि संगठन का अस्तित्व बचाने के लिए नए नेतृत्व और नई कार्यशैली की जरूरत है। उन्होंने कहा कि बागी नेताओं ने उनसे संपर्क कर बताया कि वे ममता बनर्जी का सम्मान करते हैं और उन्हें पार्टी की ‘मुख्य सलाहकार’ बनाकर मार्गदर्शक की भूमिका में रखना चाहते हैं। सुदीप के मुताबिक, इस प्रस्ताव ने उन्हें प्रभावित किया और उन्होंने बागी खेमे के साथ जाने का फैसला किया। बागी गुट का दावा- 22 सांसद हुए साथ बागी गुट का दावा है कि दो और लोकसभा सांसद उनके साथ आ गए हैं, जिसके बाद विद्रोही सांसदों की संख्या बढ़कर 22 हो गई है। सूत्रों के अनुसार, यह गुट संसद में एक अलग संसदीय ब्लॉक के रूप में मान्यता हासिल करने की कोशिश में जुटा है। बताया जा रहा है कि बागी नेता जल्द ही लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर स्वतंत्र संसदीय समूह के तौर पर मान्यता की मांग कर सकते हैं। कल्याण बनर्जी का पलटवार सुदीप बंद्योपाध्याय के कथित फैसले पर टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी ने सुदीप बंद्योपाध्याय के राजनीतिक जीवन में हमेशा उनका साथ दिया और संकट के समय उनके लिए ढाल बनकर खड़ी रहीं। कल्याण बनर्जी ने आरोप लगाया कि जिन नेताओं को ममता बनर्जी ने आगे बढ़ाया, वही आज उन्हें केवल ‘सलाहकार’ बनाने की बात कर रहे हैं। उन्होंने इसे ‘राजनीतिक गद्दारी’ और ‘दीदी की पीठ में छुरा घोंपने’ जैसा बताया। टीएमसी में बढ़ सकती है अंदरूनी खींचतान राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बागी गुट के दावे सही साबित होते हैं, तो यह तृणमूल कांग्रेस के लिए अब तक का सबसे बड़ा आंतरिक संकट साबित हो सकता है। इससे पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और नेतृत्व को लेकर नई बहस छिड़ सकती है। इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है और पार्टी नेतृत्व की ओर से विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।
बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल, अभिषेक बनर्जी के आवास पर घंटों चली तलाशी पश्चिम बंगाल की राजनीति में शनिवार को उस समय हलचल मच गई जब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के कोलकाता स्थित आवास पर पुलिस ने कई घंटों तक तलाशी अभियान चलाया। इस कार्रवाई के बाद टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी भी तुरंत अपने भतीजे के घर पहुंचीं, जिससे राजनीतिक माहौल और गर्म हो गया। सूत्रों के अनुसार, यह कार्रवाई अभिषेक बनर्जी के करीबी सहयोगी और निजी सहायक माने जाने वाले सुमित रॉय से जुड़े एक मामले के सिलसिले में की गई। सुबह 3 बजे शुरू हुई कार्रवाई जानकारी के मुताबिक, शनिवार तड़के करीब 3 बजे पश्चिम मेदिनीपुर के शालबनी थाना की टीम कोलकाता पुलिस और केंद्रीय बलों की मौजूदगी में अभिषेक बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पहुंची। पुलिसकर्मियों ने घर के विभिन्न हिस्सों की जांच की और करीब चार घंटे से अधिक समय तक तलाशी अभियान जारी रखा। इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी रखी गई थी और घर के बाहर भारी पुलिस बल तैनात किया गया। तलाशी के बाद अभिषेक बनर्जी का पलटवार तलाशी पूरी होने के बाद मीडिया से बातचीत में अभिषेक बनर्जी ने जांच एजेंसियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर कुछ छिपाया गया होता तो एजेंसियां खुद बता सकती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने घर का ताला तोड़कर प्रवेश किया और सभी कमरों की जांच की। साथ ही उन्होंने यह भी खारिज कर दिया कि उनके सहयोगी को घर में छिपाकर रखा गया था। ममता बनर्जी की अचानक एंट्री तलाशी अभियान की खबर फैलते ही टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी सीधे अभिषेक बनर्जी के आवास पहुंचीं। बताया जा रहा है कि उन्होंने कुछ समय तक वहां मौजूद रहकर स्थिति की जानकारी ली। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ममता बनर्जी की यह त्वरित प्रतिक्रिया इस मामले की संवेदनशीलता और पार्टी के भीतर इसके राजनीतिक प्रभाव को दर्शाती है। टीएमसी ने बताया राजनीतिक बदले की कार्रवाई घटना के बाद तृणमूल कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए इस कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया। पार्टी ने आरोप लगाया कि विपक्षी ताकतें जांच एजेंसियों का इस्तेमाल कर टीएमसी नेताओं को निशाना बना रही हैं। सीआईडी जांच और कानूनी दबाव भी जारी यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब अभिषेक बनर्जी हाल ही में विधानसभा हस्ताक्षर जालसाजी मामले में सीआईडी के समक्ष कई घंटों तक पूछताछ का सामना कर चुके हैं। इस मामले में उन्हें अदालत से अंतरिम राहत मिली हुई है, लेकिन जांच अभी भी जारी है। सीआईडी अधिकारियों ने उन्हें आगे की पूछताछ के लिए फिर से बुलाने के संकेत दिए हैं। मदन मित्रा पर भी ईडी की कार्रवाई इसी बीच प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने टीएमसी विधायक मदन मित्रा से जुड़े कई ठिकानों पर भी छापेमारी की। यह कार्रवाई कथित नगर निकाय भर्ती घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग जांच से जुड़ी बताई जा रही है। जांच एजेंसियों का दावा है कि भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं और रिश्वतखोरी के आरोपों की जांच की जा रही है। पार्टी के भीतर भी बढ़ रहा दबाव टीएमसी पहले से ही आंतरिक मतभेदों और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही है। हाल के दिनों में पार्टी सांसद कल्याण बनर्जी द्वारा अभिषेक बनर्जी पर सार्वजनिक टिप्पणी किए जाने के बाद संगठन के भीतर असहज स्थिति बनी हुई है। हालांकि बाद में दोनों नेताओं ने विवाद को कम करने की कोशिश की, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी पर कानूनी और राजनीतिक दबाव लगातार बढ़ रहा है। आगे क्या? अभिषेक बनर्जी के घर पर हुई तलाशी, ईडी की समानांतर कार्रवाई और जारी जांचों ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में जांच एजेंसियों की अगली कार्रवाई और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।
कोलकता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल की राजनीति में शनिवार तड़के बड़ा घटनाक्रम सामने आया जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के कोलकाता स्थित कालीघाट आवास पर पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) की संयुक्त टीम ने छापेमारी की। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह कार्रवाई पश्चिम मेदिनीपुर जिले के शालबनी थाने में दर्ज एक मामले से जुड़ी थी। पुलिस का उद्देश्य उनके कार्यकारी सहायक सुमित रॉय की तलाश करना बताया गया, जो कथित तौर पर फरार हैं। तड़के 3 बजे शुरू हुई कार्रवाई जानकारी के मुताबिक, टीम सुबह करीब 3 बजे आवास पर पहुंची। शुरुआत में दरवाजा खटखटाया गया, लेकिन जवाब न मिलने पर घंटों इंतजार किया गया। इसके बाद राज्य आपदा प्रबंधन विभाग की मदद से मुख्य द्वार का ताला तोड़कर पुलिस घर के अंदर दाखिल हुई। इस दौरान बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी, महिला कर्मी और केंद्रीय बल तैनात रहे। टीएमसी का विरोध और आरोप टीएमसी ने इस कार्रवाई को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है। पार्टी का आरोप है कि पुलिस ने जबरन ताला तोड़कर घर में प्रवेश किया और तलाशी ली। छापेमारी के दौरान चार घंटे से अधिक समय तक कार्रवाई चली और सुबह तक सुरक्षा बल परिसर में मौजूद रहे। ममता बनर्जी मौके पर पहुंचीं घटना की जानकारी मिलते ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तुरंत अपने आवास से अभिषेक बनर्जी के घर पहुंचीं। कुछ देर बाद संयुक्त टीम वहां से रवाना हो गई। लगातार जांच एजेंसियों के समन अभिषेक बनर्जी को आने वाले दिनों में कई जांच एजेंसियों के सामने पेश होना है। 14 से 16 जून के बीच उन्हें विधानसभा से जुड़े कथित फर्जी हस्ताक्षर मामले, शिक्षक भर्ती घोटाले और अन्य मामलों में पूछताछ के लिए बुलाया गया है। यह घटना राज्य की सियासत में नए विवाद और तनाव का कारण बन गई है।
कोलकाता, एजेंसियां। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सांसद अभिषेक बनर्जी को हस्ताक्षर जालसाजी मामले में एक बार फिर पश्चिम बंगाल सीआईडी ने तलब किया है। गुरुवार को भवानी भवन स्थित सीआईडी मुख्यालय में उनसे करीब साढ़े पांच घंटे तक पूछताछ की गई, लेकिन जांच एजेंसी उनके जवाबों से संतुष्ट नहीं हुई। अधिकारियों के अनुसार, कई महत्वपूर्ण सवालों पर अभिषेक ने स्पष्ट जानकारी नहीं दी, जिसके चलते उन्हें 14 जून को दोपहर 12 बजे दोबारा पेश होने का नोटिस जारी किया गया है। जांच में सहयोग नहीं करने का आरोप सूत्रों के मुताबिक, सीआईडी अधिकारियों ने पूछताछ के दौरान विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से सवाल किए, लेकिन कई बार अभिषेक बनर्जी ने "मुझे नहीं पता", "मैं नहीं कह सकता" या "इस बारे में जानकारी नहीं है" जैसे जवाब दिए। जांच एजेंसी का मानना है कि उनके बयानों में विसंगतियां हैं और कई अहम सवालों के संतोषजनक उत्तर नहीं मिले। इसी कारण जांच को आगे बढ़ाने के लिए दोबारा पूछताछ आवश्यक समझी गई। कोर्ट की राहत के बाद हुए थे पेश सीआईडी ने इससे पहले भी अभिषेक बनर्जी को तीन बार समन भेजा था, लेकिन वे पेश नहीं हुए थे। मामला बाद में कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंचा। अदालत से राहत मिलने के बाद अभिषेक दिल्ली से कोलकाता लौटे और सीधे सीआईडी मुख्यालय पहुंचे, जहां उनसे लंबी पूछताछ की गई। पूछताछ समाप्त होने के बाद उन्होंने मीडिया के किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया और बिना कोई बयान दिए वहां से रवाना हो गए। पूछताछ के बाद ममता बनर्जी से की मुलाकात पूछताछ के बाद अभिषेक बनर्जी देर रात मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पहुंचे। वहां टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक हुई। हालांकि बैठक के विषय में किसी नेता ने आधिकारिक जानकारी नहीं दी। पार्टी नेताओं ने केवल इतना कहा कि मामला जांच के अधीन है और इस पर सार्वजनिक टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। अब सभी की नजर 14 जून को होने वाली अगली पूछताछ पर टिकी है, जहां सीआईडी उनसे दोबारा अहम सवाल पूछेगी।
पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में अंदरूनी मतभेदों को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी के हालिया बयान ने पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक रणनीति को लेकर चल रही बहस को नई दिशा दे दी है। अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर उठाए सवाल कल्याण बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से पार्टी की कार्यशैली और निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि नेतृत्व को संगठन के भविष्य को ध्यान में रखते हुए स्पष्ट दिशा तय करनी चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि पार्टी के भीतर पुराने नेताओं और नई पीढ़ी के नेतृत्व के बीच मतभेद बढ़ रहे हैं। उनके बयान को पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली पर अप्रत्यक्ष आलोचना के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, टीएमसी नेतृत्व की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। राजनीतिक गलियारों में बढ़ी चर्चा कल्याण बनर्जी के बयान के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई है कि पार्टी के भीतर विभिन्न गुटों के बीच मतभेद सामने आ रहे हैं। कुछ रिपोर्टों और राजनीतिक सूत्रों में दावा किया जा रहा है कि संगठन की रणनीति, विपक्षी दलों के साथ संबंधों और भविष्य की राजनीतिक दिशा को लेकर अलग-अलग राय मौजूद हैं। सांसदों और विधायकों की कथित बगावत या दल के भीतर बड़े पैमाने पर टूट की खबरों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। कांग्रेस से संबंधों पर भी उठे सवाल राजनीतिक चर्चाओं के बीच कांग्रेस नेतृत्व और टीएमसी नेताओं की हालिया बैठकों को भी जोड़कर देखा जा रहा है। कुछ सूत्रों का दावा है कि विपक्षी एकजुटता और संभावित राजनीतिक सहयोग को लेकर पार्टी के भीतर अलग-अलग मत हैं। हालांकि, टीएमसी या कांग्रेस की ओर से किसी संभावित विलय अथवा औपचारिक राजनीतिक समझौते की पुष्टि नहीं की गई है। महुआ मोइत्रा सहित कई नेता नेतृत्व के समर्थन में दूसरी ओर, पार्टी के कई नेता खुलकर ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के समर्थन में सामने आए हैं। टीएमसी का आधिकारिक रुख यही है कि पार्टी एकजुट है और संगठन को मजबूत करने के लिए काम कर रही है। आगे क्या? कल्याण बनर्जी के बयान ने यह संकेत जरूर दिया है कि टीएमसी के भीतर नेतृत्व, संगठन और राजनीतिक रणनीति को लेकर गंभीर चर्चा चल रही है। अब राजनीतिक नजरें ममता बनर्जी की अगली रणनीति और पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं, क्योंकि आने वाले समय में यह मुद्दा बंगाल की राजनीति को प्रभावित कर सकता है।
कोलकाता, एजेंसियां। कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर मतभेद उस समय खुलकर सामने आ गए जब पार्टी के वरिष्ठ सांसद और जाने-माने वकील कल्याण बनर्जी ने सांसद अभिषेक बनर्जी के किसी भी कानूनी मामले की पैरवी करने से इनकार कर दिया। कल्याण बनर्जी ने आरोप लगाया कि अभिषेक बनर्जी का व्यवहार अत्यधिक घमंडी है और इसी कारण उन्होंने उनसे जुड़े सभी मामलों से खुद को अलग करने का फैसला किया है। मामला उस याचिका से जुड़ा है जिसमें अभिषेक बनर्जी ने पश्चिम बंगाल पुलिस की सीआईडी द्वारा भेजे गए समन को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी है। यह समन विधायकों के हस्ताक्षर मिलान (सिग्नेचर मिसमैच) मामले से संबंधित बताया जा रहा है। साथ ही याचिका में गिरफ्तारी या किसी भी प्रकार की जबरन कार्रवाई से अंतरिम राहत की मांग की गई है। गुरुवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान अभिषेक की ओर से वकील अयान भट्टाचार्य अदालत में पेश हुए। कल्याण बनर्जी ने मीडिया से बातचीत में कहा कल्याण बनर्जी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्होंने न केवल इस मामले बल्कि भविष्य में भी अभिषेक बनर्जी के किसी कानूनी प्रकरण में शामिल न होने का निर्णय लिया है। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने स्वयं अदालत में मामले की तत्काल सुनवाई की मांग की थी, जिसके बाद सुनवाई की तारीख तय हुई। लेकिन बाद में उन्हें जानकारी मिली कि उनकी जगह किसी अन्य वकील को नियुक्त किया गया है। वरिष्ठ सांसद ने यह भी आरोप लगाया वरिष्ठ सांसद ने यह भी आरोप लगाया कि हालिया विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारणों में अभिषेक बनर्जी की भूमिका रही है, फिर भी उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। कल्याण बनर्जी ने कहा कि वह मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी से इस मुद्दे पर स्पष्ट निर्णय लेने का आग्रह करेंगे। उन्होंने कहा कि चार दशक से अधिक समय से कानूनी पेशे में रहने के बाद वह किसी भी प्रकार के अपमानजनक या अहंकारी व्यवहार को स्वीकार नहीं करेंगे। इस बयान के बाद टीएमसी के भीतर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है और पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर जारी उथल-पुथल के बीच पार्टी सांसद महुआ मोइत्रा ने बागी नेताओं पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने पार्टी छोड़कर जाने वाले नेताओं को संगठन के लिए नुकसान नहीं, बल्कि एक तरह की "सफाई प्रक्रिया" करार दिया। साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख Mamata Banerjee के प्रति अपनी निष्ठा दोहराते हुए कहा कि वह अंतिम समय तक उनके साथ खड़ी रहेंगी। बागी नेताओं पर साधा निशाना कृष्णानगर से लोकसभा सांसद Mahua Moitra ने कहा कि जो नेता कठिन समय में पार्टी का साथ छोड़ रहे हैं, वे कभी भी संगठन और उसकी विचारधारा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध नहीं थे। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों के जाने से पार्टी कमजोर नहीं होती, बल्कि संगठन और अधिक मजबूत तथा स्पष्ट दिशा में आगे बढ़ता है। महुआ ने दावा किया कि टीएमसी से अवसरवादी तत्वों के बाहर जाने को संकट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ममता बनर्जी के प्रति जताई अटूट निष्ठा महुआ मोइत्रा ने कहा कि राजनीतिक जीवन के कठिन दौर में पार्टी नेतृत्व ने हमेशा उन पर भरोसा जताया। उन्होंने कहा कि इसी विश्वास के कारण वह टीएमसी नेतृत्व के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनका राजनीतिक भविष्य तृणमूल कांग्रेस के साथ जुड़ा हुआ है और वह किसी अन्य राजनीतिक दल का हिस्सा बनने की कल्पना भी नहीं करतीं। अभिषेक बनर्जी के समर्थन में आईं सामने टीएमसी सांसद ने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव Abhishek Banerjee का भी बचाव किया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दबाव या जांच एजेंसियों की कार्रवाई से पार्टी नेतृत्व को कमजोर नहीं किया जा सकता। महुआ ने दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका मजबूती से निभाती रहेगी और नेतृत्व किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। कांग्रेस में विलय की चर्चाओं को बताया निराधार हाल के दिनों में ममता बनर्जी और कांग्रेस नेतृत्व के बीच हुई बैठकों के बाद टीएमसी और कांग्रेस के संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर कई चर्चाएं सामने आई थीं। महुआ मोइत्रा के बयान को इन चर्चाओं के जवाब के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि पार्टी की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बरकरार रहेगी और तृणमूल कांग्रेस अपने संगठनात्मक ढांचे और क्षेत्रीय आधार के साथ आगे बढ़ती रहेगी। टीएमसी में जारी है राजनीतिक खींचतान पश्चिम बंगाल में टीएमसी के भीतर बढ़ती गुटबाजी और नेताओं के अलग-अलग रुख ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दे दी है। एक ओर बागी गुट लगातार अपने समर्थन का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर महुआ मोइत्रा जैसे वरिष्ठ नेता खुलकर ममता बनर्जी के नेतृत्व के समर्थन में सामने आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में टीएमसी के भीतर शक्ति संतुलन और नेतृत्व को लेकर संघर्ष और तेज हो सकता है, जिसका असर पश्चिम बंगाल की राजनीति पर भी देखने को मिलेगा।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी उथल-पुथल के बीच तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बागी गुट ने अपनी ताकत बढ़ने का दावा किया है। बागी गुट के नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि उनके समर्थन वाले विधायकों की संख्या बढ़कर 64 हो गई है। साथ ही उन्होंने टीएमसी के कांग्रेस में विलय से जुड़े सभी कयासों को सिरे से खारिज कर दिया। बागी खेमे ने बढ़ते समर्थन का किया दावा रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि कुछ समय पहले तक उनके साथ 58 विधायक थे, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 64 हो चुकी है। उन्होंने दावा किया कि जल्द ही एक और विधायक उनके गुट में शामिल हो सकता है। उनके मुताबिक, बागी गुट को केवल विधायकों का ही नहीं बल्कि कई सांसदों, जिला स्तर के नेताओं और स्थानीय निकाय प्रतिनिधियों का भी समर्थन प्राप्त है। "असली तृणमूल कांग्रेस हमारे साथ" विधानसभा परिसर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि उनका गुट ही तृणमूल कांग्रेस की वास्तविक राजनीतिक विरासत और संगठनात्मक ताकत का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने कहा, "हम कांग्रेस में शामिल नहीं हो रहे हैं। हम ही असली तृणमूल कांग्रेस हैं और पार्टी के झंडे तथा विचारधारा के साथ आगे बढ़ते रहेंगे।" ममता-सोनिया मुलाकात के बाद तेज हुईं राजनीतिक चर्चाएं हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee और कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष Sonia Gandhi के बीच दिल्ली में हुई मुलाकात के बाद टीएमसी और कांग्रेस के रिश्तों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई थीं। इसके अलावा टीएमसी नेता Abhishek Banerjee और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच हुई बैठकों ने भी दोनों दलों के संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर कयासों को हवा दी थी। रीतब्रत बनर्जी ने स्पष्ट किया कि इन बैठकों का उनके गुट की राजनीतिक दिशा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा जाएगा नया समर्थन पत्र बागी गुट अब अपनी संख्या बल को आधिकारिक रूप से दर्ज कराने की तैयारी में है। सूत्रों के अनुसार, गुट जल्द ही विधानसभा अध्यक्ष को नया समर्थन पत्र सौंप सकता है, जिसमें उनके साथ खड़े विधायकों की अद्यतन संख्या दर्ज होगी। लोकसभा में NDA को समर्थन जारी रहेगा रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि उनके समर्थक सांसद लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का समर्थन जारी रखेंगे। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय राजनीति में उनका रुख पहले की तरह कायम रहेगा और वर्तमान परिस्थितियों में किसी बदलाव की संभावना नहीं है। टीएमसी के सामने गहराता संगठनात्मक संकट राजनीतिक जानकारों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस अपने 28 वर्षों के इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजर रही है। पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इस बीच, टीएमसी और कांग्रेस के बीच संभावित राजनीतिक नजदीकियों को लेकर चर्चाएं जारी हैं, लेकिन बागी गुट ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी प्रकार के विलय या राजनीतिक समझौते का हिस्सा नहीं बनने जा रहा और खुद को ही पार्टी का वास्तविक प्रतिनिधि मानता है।
ममता से अब तक 58 विधायक, 20 लोकसभा सांसद अलग हुए, अभिषेक राहुल से मिले नई दिल्ली, एजेंसियां। ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में लगातार टूट जारी है। बुधवार को राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने पार्टी और पद से इस्तीफा दे दिया। सभापति सीपी राधाकृष्णन ने उनका इस्तीफा मंजूर कर लिया है। पिछले 3 दिनों में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के दो राज्यसभा सांसद पार्टी छोड़ चुके हैं। इससे पहले 8 जून को सुखेंदु शेखर ने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया था, पार्टी भी छोड़ दी थी। इधर इस्तीफा देने के बाद सुष्मिता देव ने असम के मुख्यमंत्री हिमता बिस्वा सरमा से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद कयास लगाये जा रहे हैं कि वह भी बीजेपी से जुड़ सकती हैं। कुल 22 सांसद टीएमसी छोड़ चुके टीएमसी के लोकसभा में 28 में से 20 सांसद और राज्यसभा में 13 में से 2 सांसद यानी कुल 22 सांसद टूट चुके हैं। 3 जून को बंगाल के 80 में से 58 विधायक अलग गुट बना चुके हैं। इस गुट ने ऋतब्रत को अपना नेता बनाया है। ऋतब्रत ने बुधवार को कहा कि हमारे पास 64 विधायक हैं। ये लोग भी स्पीकर अपनी चिट्ठी सौंपेंगे। राहुल से मिले अभिषेक इस बीच ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने दिल्ली में राहुल गांधी से मुलाकात की। एक दिन पहले ममता सोनिया गांधी से मिलीं थीं। मुलाकात के बाद अब ममता कोलकाता लौट चुकी हैं।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में कथित फर्जी हस्ताक्षर मामले को लेकर नया घटनाक्रम सामने आया है। राज्य की आपराधिक जांच विभाग (CID) ने तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी को तीसरा समन जारी किया है। जांच एजेंसी की टीम ने उनके कोलकाता स्थित आवास पर पहुंचकर नोटिस सौंपा। सूत्रों के अनुसार, CID एक ऐसे मामले की जांच कर रही है, जिसमें विधानसभा से जुड़े एक दस्तावेज पर कुछ विधायकों के हस्ताक्षरों को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि संबंधित दस्तावेज में कुछ हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता संदिग्ध है। मामले की जांच जारी है और एजेंसी विभिन्न पक्षों से पूछताछ कर रही है। क्या है पूरा मामला? विवाद उस समय शुरू हुआ जब विधानसभा में विपक्ष के नेता के चयन से जुड़े एक दस्तावेज को लेकर सवाल उठे। कुछ विधायकों ने दावा किया कि दस्तावेज पर मौजूद हस्ताक्षर उनके नहीं हैं। इसके बाद मामले की शिकायत जांच एजेंसियों तक पहुंची और CID ने जांच शुरू की। जांच के दौरान कुछ विधायकों के बयान दर्ज किए गए हैं। एजेंसी दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर मामले की पड़ताल कर रही है। CID ने जारी किया तीसरा नोटिस जांच एजेंसी के अनुसार, अभिषेक बनर्जी को पहले भी पूछताछ के लिए नोटिस भेजे गए थे। निर्धारित तिथि पर उपस्थित न होने के बाद अब उन्हें तीसरा नोटिस जारी किया गया है। CID अधिकारियों का कहना है कि मामले से जुड़े सभी तथ्यों को स्पष्ट करने के लिए उनका बयान महत्वपूर्ण हो सकता है। तृणमूल कांग्रेस की ओर से अभी तक इस नए समन पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक विवाद भी तेज मामले को लेकर राज्य की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। विपक्षी दल इस घटना को गंभीर बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं, जबकि तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि जांच को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच यह मामला आने वाले दिनों में और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है। आगे क्या? अब सभी की नजर इस बात पर है कि अभिषेक बनर्जी जांच एजेंसी के समक्ष कब पेश होते हैं और CID की जांच में आगे क्या तथ्य सामने आते हैं। फिलहाल एजेंसी ने कहा है कि मामले की जांच जारी है और सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाएगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।