नई दिल्ली, एजेंसियां। देश में इस वर्ष मानसून की धीमी शुरुआत का असर अब साफ-साफ दिखाई दे रहा है। मौसम विभाग के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 पिछले 100 वर्षों का तीसरा सबसे सूखा जून बनने की ओर अग्रसर है। महीने के अंत तक देशभर में सामान्य से करीब 42% कम वर्षा दर्ज की गई है, जिससे खेती, जलाशयों और पेयजल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है। खेती पर सबसे ज्यादा असर कम बारिश का सबसे बड़ा असर खरीफ फसलों की बुआई पर पड़ा है। 25 जून तक खरीफ फसलों की बुआई पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 23% कम रही। धान, सोयाबीन, मक्का और कपास जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जुलाई में अच्छी बारिश नहीं हुई तो इस साल कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। कई राज्यों में गंभीर वर्षा की कमी मौसम विभाग के अनुसार पश्चिम, मध्य और उत्तर भारत के कई हिस्सों में सामान्य से काफी कम बारिश हुई है। हालांकि कुछ राज्यों में हाल के दिनों में बारिश बढ़ने से स्थिति में आंशिक सुधार देखने को मिला है, लेकिन देश के बड़े हिस्से में अब भी वर्षा का कम होना सबक बना हुआ है। जुलाई से सुधार की उम्मीद मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि जुलाई के पहले सप्ताह से मानसून के सक्रिय होने की संभावना है। यदि अगले कुछ दिनों में व्यापक और लगातार बारिश होती है तो वर्षा की कमी काफी हद तक पूरी हो सकती है और खरीफ सीजन को राहत मिल सकती है। सरकार और राज्यों की तैयारी कमजोर मानसून को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों ने कृषि एवं जल संसाधन विभागों को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं। किसानों को कम पानी वाली फसलों, जल संरक्षण और वैकल्पिक कृषि उपाय अपनाने की भी सलाह दी जा रही है ताकि संभावित नुकसान को कम किया जा सके।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत में मानसून की धीमी रफ्तार अब केवल मौसम का विषय नहीं रह गई है, बल्कि इसका असर खेती, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है। शुरुआती दौर में अच्छी शुरुआत करने वाला दक्षिण-पश्चिम मानसून जून के तीसरे सप्ताह में कमजोर पड़ गया, जिससे देश के कई राज्यों में सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज की गई। ऐसे समय में जब खरीफ फसलों की बुआई अपने चरम पर होती है, बारिश की कमी किसानों की चिंता बढ़ा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार विशेषज्ञों के अनुसार, धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, अरहर और बाजरा जैसी खरीफ फसलें काफी हद तक मानसूनी वर्षा पर निर्भर हैं। यदि जुलाई के पहले सप्ताह तक पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो बुआई प्रभावित हो सकती है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ने और पैदावार घटने का खतरा रहेगा। साथ ही जलाशयों और बांधों में पानी का स्तर भी कम रह सकता है, जिससे आगे सिंचाई संकट गहरा सकता है। आंकड़ों के मुताबिक मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक जून के तीसरे सप्ताह तक देश में सामान्य से लगभग 45 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई। हालांकि बाद के दिनों में स्थिति में कुछ सुधार हुआ, लेकिन बारिश अब भी सामान्य से काफी कम बनी हुई है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि फिलहाल अरब सागर से पर्याप्त नमी नहीं मिल रही है, जिससे बादलों का निर्माण कमजोर पड़ा है। इसके अलावा दक्षिण-पश्चिमी हवाओं की रफ्तार धीमी होने और बंगाल की खाड़ी में किसी मजबूत निम्न दबाव प्रणाली के विकसित नहीं होने से भी मानसून की गति प्रभावित हुई है। मौसम विशेषज्ञों का कहना मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में बंगाल की खाड़ी में कम दबाव का क्षेत्र बनता है और अरब सागर से नमी का प्रवाह बढ़ता है, तो मानसून फिर से सक्रिय हो सकता है। फिलहाल बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, विदर्भ और मध्य भारत के कई हिस्सों में गर्मी और उमस लोगों की परेशानी बढ़ा रही है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मानसून केवल बारिश नहीं, बल्कि करोड़ों किसानों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। ऐसे में आने वाले कुछ सप्ताह देश की कृषि और अर्थव्यवस्था के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
रांची। झारखंड सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों की महिला किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार ने 748 करोड़ रुपये की 'झारखंड की महिला समूहों द्वारा जलवायु अनुकूल बागवानी उद्यमिता परियोजना' तैयार की है। गुरुवार को विकास आयुक्त की अध्यक्षता वाली राज्य योजना प्राधिकृत समिति ने इस महत्वाकांक्षी योजना को सशर्त मंजूरी दे दी। अब बजट और विदेशी ऋण पर ब्याज दर को लेकर वित्त विभाग की सहमति तथा कैबिनेट की मंजूरी के बाद योजना लागू की जाएगी। 19 जिलों की 65 हजार महिला किसानों को मिलेगा लाभ परियोजना के दूसरे चरण में राज्य के 19 जिलों के 65 प्रखंडों की करीब 65 हजार महिला किसानों को लाभ पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। यह योजना आठ वर्षों तक संचालित होगी। लाभार्थियों का चयन स्थानीय संसाधनों, उत्पादन क्षमता, बाजार तक पहुंच और सखी मंडलों की सक्रियता के आधार पर किया जाएगा। बहुफसली खेती और आधुनिक तकनीक पर रहेगा जोर परियोजना का उद्देश्य महिला किसानों की आय बढ़ाने के साथ जलवायु अनुकूल खेती को बढ़ावा देना है। इसके तहत महिलाओं को 25 डिसमिल मॉडल पर एक फसल की जगह साल में दो से तीन फसल लेने का प्रशिक्षण दिया जाएगा। साथ ही माइक्रो ड्रिप सिंचाई, जल संरक्षण, आधुनिक कृषि तकनीक और बागवानी आधारित उद्यमिता को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे उनकी आय में स्थायी वृद्धि हो सके। पहले चरण में बढ़ी किसानों की आय परियोजना का पहला चरण वर्ष 2016-17 से 2024-25 तक नौ जिलों के 30 प्रखंडों में संचालित किया गया था। इस दौरान 31,819 किसानों को माइक्रो ड्रिप सिंचाई प्रणाली से जोड़ा गया और प्रति किसान औसतन 22 हजार रुपये वार्षिक आय में वृद्धि दर्ज की गई। इसके अलावा 300 कृषि यंत्र बैंक, 14 बहुउद्देश्यीय सामुदायिक केंद्र और 10 कोल्ड चैंबर भी स्थापित किए गए। इन महिलाओं को मिलेगी प्राथमिकता योजना का लाभ केवल सखी मंडल से जुड़ी महिलाओं को मिलेगा। लाभार्थी के पास कम से कम 25 डिसमिल भूमि होना अनिवार्य होगा। गरीब परिवारों और विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) की महिलाओं को प्राथमिकता दी जाएगी।
नई दिल्ली: होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के बीच भारत के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। उर्वरक और कच्चा माल लेकर भारत आ रहे करीब 10 से 12 मालवाहक जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा बंद होने से ठीक पहले इस रणनीतिक मार्ग को पार करने में सफल रहे हैं। इससे देश में संभावित खाद संकट फिलहाल टलता नजर आ रहा है। व्यापार जगत से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इन जहाजों में यूरिया, डीएपी और अमोनिया जैसे महत्वपूर्ण उर्वरक और कच्चा माल लदा हुआ है। इनकी समय पर आवाजाही से खरीफ सीजन के दौरान किसानों को राहत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। युद्ध की शुरुआत में फंस गए थे 16 जहाज ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के कारण भारत के लिए रवाना हुए कुल 16 जहाज प्रभावित हुए थे। इनमें शामिल थे— 8 जहाज यूरिया से लदे हुए 4 जहाज डीएपी (DAP) लेकर जा रहे थे 1 जहाज अमोनिया से भरा था 3 जहाज सल्फर लेकर आ रहे थे इन जहाजों के फंसने से भारत में उर्वरकों की आपूर्ति और कीमतों को लेकर चिंता बढ़ गई थी। खरीफ सीजन के लिए अहम है यह आपूर्ति पश्चिम एशिया भारत के लिए उर्वरकों और उनके कच्चे माल का प्रमुख स्रोत है। जून से शुरू होने वाले खरीफ सीजन के दौरान किसानों को पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध कराना बेहद जरूरी होता है। यदि यह आपूर्ति बाधित होती, तो किसानों के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो सकती थी और बाजार में खाद की कीमतों में भी तेजी आ सकती थी। घरेलू उत्पादन पर भी पड़ा था असर होर्मुज मार्ग में व्यवधान के कारण एलएनजी (LNG) की आपूर्ति प्रभावित हुई थी, जिससे देश में यूरिया उत्पादन भी धीमा पड़ गया था। स्थिति को संभालने के लिए सरकार ने अतिरिक्त एलएनजी की व्यवस्था की और वैश्विक बाजार से यूरिया खरीदने के लिए नए टेंडर जारी किए। कीमतों में मिल सकती है राहत विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए जहाजों की आवाजाही सामान्य बनी रहती है, तो अमोनिया और सल्फर जैसे कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ेगी। इससे उर्वरकों की कीमतों में धीरे-धीरे नरमी देखने को मिल सकती है। हालांकि, पूरी सप्लाई चेन के सामान्य होने में अभी कुछ समय लग सकता है।
तमिलनाडु में किसानों ने अपनी मांगों को लेकर मुख्यमंत्री C. Joseph Vijay की सरकार के खिलाफ आंदोलन का ऐलान कर दिया है। किसान संगठनों का आरोप है कि सरकार चुनावी घोषणा पत्र में किए गए फसल ऋण माफी के वादे से पीछे हट रही है। किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं की गईं, तो 30 जून को पूरे राज्य में भूख हड़ताल की जाएगी। 30 जून को राज्यव्यापी भूख हड़ताल का ऐलान किसान नेता P. R. Pandian ने कहा कि राज्य सरकार को किसानों की मांगों पर तत्काल निर्णय लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि सरकार ने फसल ऋण माफी से जुड़ी मांगों को स्वीकार नहीं किया, तो किसान 30 जून को पूरे तमिलनाडु में भूख हड़ताल कर विरोध प्रदर्शन करेंगे। उन्होंने कहा, "सरकार ने किसानों से जो वादे किए थे, उन्हें पूरा करना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो किसान राज्यव्यापी आंदोलन करने को मजबूर होंगे।" चुनावी घोषणा पत्र में किया था फसल ऋण माफी का वादा C. Joseph Vijay के नेतृत्व वाली Tamilaga Vettri Kazhagam (टीवीके) ने विधानसभा चुनाव के दौरान किसानों से कई बड़े वादे किए थे। इनमें सबसे प्रमुख वादा फसल ऋण माफी (Crop Loan Waiver) का था। किसान संगठनों का कहना है कि चुनाव प्रचार के दौरान विजय ने आश्वासन दिया था कि सरकार बनने के बाद सबसे पहले किसानों के कृषि ऋण माफ किए जाएंगे। क्या था टीवीके का चुनावी वादा? टीवीके के चुनावी घोषणा पत्र के अनुसार— 5 एकड़ से कम भूमि वाले किसानों का पूरा कृषि ऋण माफ किया जाएगा। 5 एकड़ से अधिक भूमि वाले किसानों का 50 प्रतिशत कृषि ऋण माफ किया जाएगा। लेकिन हाल ही में सरकार द्वारा जारी संशोधित नीति में केवल 75,000 रुपये तक का ऋण लेने वाले छोटे और सीमांत किसानों का पूरा कर्ज माफ करने की घोषणा की गई है। किसानों ने सरकार पर वादाखिलाफी का लगाया आरोप किसान संगठनों का कहना है कि सरकार ने अपने मूल वादे में बदलाव कर किसानों के साथ अन्याय किया है। उनका आरोप है कि सरकार अब बिना किसी सीमा के सभी किसानों के कृषि ऋण माफ करने की अपनी प्रतिबद्धता से पीछे हट रही है। किसान नेता पी.आर. पांडियन ने कहा कि किसान संगठन सभी कृषि ऋणों की पूर्ण माफी की मांग पर अड़े हुए हैं और जब तक सरकार स्पष्ट घोषणा नहीं करती, आंदोलन जारी रहेगा। सरकार के सामने बढ़ सकती है चुनौती तमिलनाडु में कृषि ऋण माफी का मुद्दा अब राजनीतिक रूप लेता दिख रहा है। यदि 30 जून को राज्यव्यापी भूख हड़ताल होती है, तो मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की सरकार के सामने अपनी पहली बड़ी किसान चुनौती खड़ी हो सकती है। आने वाले दिनों में सरकार और किसान संगठनों के बीच बातचीत इस विवाद की दिशा तय करेगी।
अलीराजपुर: मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले के कट्ठीवाड़ा क्षेत्र में उगने वाला दुर्लभ और विशालकाय नूरजहां आम एक बार फिर चर्चा में है। 'आमों की मलिका' के नाम से मशहूर इस खास किस्म का 3.30 किलोग्राम वजन वाला एक आम इस सीजन में 3,800 रुपये में बिका है। आम उत्पादकों का दावा है कि मौसम अनुकूल रहा तो कुछ फलों का वजन जून के अंत तक 4 किलोग्राम तक पहुंच सकता है। 3.30 किलो का आम बना लोगों के आकर्षण का केंद्र कट्ठीवाड़ा क्षेत्र के आम उत्पादक भरतराज सिंह जादव ने बताया कि इस साल नूरजहां आम की पैदावार अच्छी रही है। उनके बगीचे में इस सीजन का सबसे बड़ा नूरजहां आम 3.30 किलोग्राम वजन का रहा, जिसे 3,800 रुपये में बेचा गया। उन्होंने बताया कि पेड़ों पर अभी भी कई बड़े आकार के फल लगे हुए हैं, जिनका अंतिम वजन आम तोड़ने के बाद ही पता चल सकेगा। देश-विदेश में बढ़ रही है मांग नूरजहां आम की लोकप्रियता लगातार बढ़ती जा रही है। वर्तमान में मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात से इसकी अच्छी मांग आ रही है। हाल ही में तमिलनाडु से भी इस दुर्लभ आम के लिए पूछताछ की गई है। भरतराज सिंह जादव के मुताबिक, इस सीजन में उनके बगीचे के नूरजहां आम संयुक्त अरब अमीरात (UAE), अमेरिका और स्पेन तक पहुंचे हैं। इनका औपचारिक निर्यात नहीं हुआ, बल्कि लोग अपने परिचितों और रिश्तेदारों के माध्यम से इन्हें विदेश ले गए। क्या है नूरजहां आम की खासियत? नूरजहां आम अपनी विशालकाय आकार, बेहतरीन स्वाद और सीमित उत्पादन के कारण देश की सबसे दुर्लभ और महंगी आम की किस्मों में गिना जाता है। इसकी प्रमुख विशेषताएं: एक आम का वजन 3 से 4 किलोग्राम तक हो सकता है। यह मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के कट्ठीवाड़ा क्षेत्र में उगाया जाता है। स्वाद, आकार और दुर्लभता के कारण इसकी कीमत सामान्य आमों से कई गुना अधिक होती है। देश के साथ-साथ विदेशों में भी इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। जैविक तरीके से उगाए जाने के कारण इसकी गुणवत्ता विशेष मानी जाती है। 4 किलो तक पहुंच सकता है वजन कट्ठीवाड़ा के एक अन्य आम उत्पादक शिवराज जादव ने बताया कि उनके बगीचे में नूरजहां आम के छह पेड़ हैं, जिन पर फिलहाल करीब 3 किलोग्राम वजन के कई फल लगे हुए हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि जून के अंत तक कुछ फलों का वजन 4 किलोग्राम तक पहुंच सकता है, जो इस सीजन का नया रिकॉर्ड भी बन सकता है। जलवायु परिवर्तन का दिख रहा असर आम उत्पादकों के अनुसार, कुछ दशक पहले नूरजहां आम का अधिकतम वजन 4.50 किलोग्राम तक पहुंच जाता था। बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन के कारण अब इसका सामान्य वजन 3.50 से 3.80 किलोग्राम के बीच रह गया है। इसके बावजूद अपने विशाल आकार, सीमित उत्पादन और बेहतरीन स्वाद की वजह से नूरजहां आम आज भी देश की सबसे खास और महंगी आम प्रजातियों में शुमार है। जनवरी से शुरू होता है सफर, जून में बाजार तक पहुंचता है फल उत्पादकों के मुताबिक, नूरजहां आम के पेड़ों पर जनवरी में बौर आना शुरू हो जाता है। इसके बाद जून तक फल पूरी तरह पककर तैयार हो जाते हैं और बाजार में बिक्री के लिए पहुंचते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि नूरजहां आम केवल एक फल नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश की बागवानी विरासत और जैविक खेती की पहचान बन चुका है।
देहरादून: उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोमवार को अपने आवास नगला तराई स्थित खेत में स्वयं टिलर चलाकर खेती की जुताई की। इस दौरान उन्होंने खेत में गोबर की खाद भी डाली और किसानों को जैविक एवं पारंपरिक खेती अपनाने का संदेश दिया। उनके साथ उनकी मां बिशना देवी भी मौजूद रहीं। मुख्यमंत्री धामी की खेत में काम करते हुए तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। 'खेती भारतीय संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आत्मा' खेत में जुताई करने के बाद मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आत्मा है। उन्होंने कहा, "आधुनिक तकनीक के साथ पारंपरिक और प्राकृतिक खेती को अपनाकर कृषि को अधिक समृद्ध, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनाया जा सकता है।" गोबर खाद और प्राकृतिक खेती पर दिया जोर मुख्यमंत्री ने कहा कि गोबर की खाद जैसी प्राकृतिक पद्धतियां न केवल भूमि की उर्वरता बढ़ाती हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने किसानों से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और जैविक तथा प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ाने की अपील की। धामी ने कहा, "प्राकृतिक खेती से मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है, उत्पादन अधिक सुरक्षित बनता है और किसानों को दीर्घकालिक लाभ मिलता है।" किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार किसानों की आय बढ़ाने, कृषि क्षेत्र को आधुनिक बनाने और जैविक उत्पादों को प्रोत्साहित करने के लिए लगातार काम कर रही है। उन्होंने बताया कि सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से किसानों को तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण और विपणन सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दे रही है। कृषि और प्रकृति से जुड़ी है उत्तराखंड की पहचान सीएम धामी ने कहा कि उत्तराखंड की पहचान कृषि, ग्रामीण संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी हुई है। राज्य सरकार पारंपरिक खेती, बागवानी, प्राकृतिक कृषि और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं संचालित कर रही है। उन्होंने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों के स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने के लिए भी विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। युवाओं को खेती से जोड़ने की जरूरत मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि आज के समय में युवा पीढ़ी को खेती और ग्रामीण विकास से जोड़ना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक और नवाचार के जरिए कृषि क्षेत्र को रोजगार और उद्यमिता का मजबूत माध्यम बनाया जा सकता है। उन्होंने किसानों और युवाओं से प्राकृतिक एवं जैविक खेती को अपनाकर उत्तराखंड को कृषि के क्षेत्र में नई पहचान दिलाने का आह्वान किया।
नेपाल के पूर्वी पहाड़ी क्षेत्रों में उगने वाला रुद्राक्ष लंबे समय से धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक महत्व का प्रतीक माना जाता रहा है। भारत सहित कई देशों में इसकी बड़ी मांग है। हालांकि हाल के वर्षों में चीन से बढ़ती मांग ने रुद्राक्ष को एक बड़े अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक उत्पाद में बदल दिया है। इसके साथ ही रुद्राक्ष उत्पादन में रसायनों के बढ़ते उपयोग को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं। पारंपरिक खेती से वैश्विक कारोबार तक नेपाल के मकालू क्षेत्र सहित कई इलाकों में रुद्राक्ष की खेती दशकों से की जा रही है। स्थानीय किसान बताते हैं कि रुद्राक्ष उनके परिवारों की आय का प्रमुख स्रोत रहा है। एलिएओकार्पस गैनिट्रस प्रजाति के पेड़ों से प्राप्त होने वाले ये बीज धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व रखते हैं। पहले रुद्राक्ष का प्रमुख बाजार भारत था, जहां इसे भगवान शिव से जुड़ी आस्था के कारण खरीदा जाता था। लेकिन पिछले एक दशक में चीन से मांग बढ़ने के बाद इसका व्यापार तेजी से विस्तारित हुआ है। चीन की मांग ने बदली बाजार की प्राथमिकताएं भारतीय खरीदार जहां रुद्राक्ष को मुख्य रूप से धार्मिक दृष्टिकोण से देखते हैं, वहीं चीन में इसकी मांग सजावटी वस्तु और आभूषण के रूप में बढ़ी है। इसके चलते बड़े आकार, आकर्षक बनावट और चमकदार स्वरूप वाले रुद्राक्षों की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। स्थानीय व्यापारियों के अनुसार, बाजार की इसी मांग ने किसानों पर अधिक आकर्षक दिखने वाले रुद्राक्ष उत्पादन का दबाव बढ़ाया है। ग्रोथ रेगुलेटर के इस्तेमाल पर बढ़ी बहस कई किसानों का कहना है कि बेहतर आकार और आकर्षक स्वरूप पाने के लिए कुछ स्थानों पर प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर (PGR) जैसे रसायनों का उपयोग किया जा रहा है। इनका प्रयोग पेड़ों के विकास और फल के आकार को प्रभावित करने के उद्देश्य से किया जाता है। किसानों का एक वर्ग मानता है कि यह बाजार की मजबूरी बन गई है, जबकि अन्य लोग इसके दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर चिंतित हैं। पेड़ों और गुणवत्ता पर असर की आशंका कृषि विशेषज्ञों और स्थानीय किसानों का कहना है कि लंबे समय तक अत्यधिक रासायनिक उपयोग से पेड़ों की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है। कुछ किसानों ने दावा किया है कि लगातार रसायनों के इस्तेमाल से पेड़ों की सेहत कमजोर होने और बीजों की प्राकृतिक संरचना में बदलाव जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। इन दावों पर व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता बताई जा रही है। सरकारी मंजूरी और निगरानी पर सवाल रिपोर्टों के अनुसार, रुद्राक्ष उत्पादन में उपयोग किए जा रहे कुछ विशेष ग्रोथ रेगुलेटरों को लेकर नियामक स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इसी वजह से इनके उपयोग, मात्रा और संभावित प्रभावों पर बहस जारी है। स्थानीय प्रशासन का कहना है कि कृषि क्षेत्र में ग्रोथ रेगुलेटर का उपयोग असामान्य नहीं है, लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब इनका अत्यधिक या अनुचित मात्रा में प्रयोग किया जाता है। क्या उपभोक्ताओं को स्वास्थ्य संबंधी चिंता करनी चाहिए? वर्तमान में ऐसी कोई व्यापक वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है कि रुद्राक्ष पर उपयोग किए गए ग्रोथ रेगुलेटर सीधे तौर पर त्वचा रोग या स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा करते हैं। फिर भी विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि उपभोक्ता विश्वसनीय स्रोतों से रुद्राक्ष खरीदें और उपयोग से पहले उसे अच्छी तरह साफ करें। यदि किसी व्यक्ति को त्वचा संबंधी संवेदनशीलता या एलर्जी की समस्या है, तो रुद्राक्ष धारण करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित हो सकता है। आस्था, व्यापार और संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती नेपाल में रुद्राक्ष आज केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के निर्यात उद्योग का हिस्सा बन चुका है। बढ़ती अंतरराष्ट्रीय मांग किसानों के लिए आय के नए अवसर लेकर आई है, लेकिन इसके साथ प्राकृतिक गुणवत्ता, पारंपरिक खेती और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने की चुनौती भी सामने खड़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गुणवत्ता नियंत्रण, वैज्ञानिक निगरानी और टिकाऊ खेती के उपायों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो अल्पकालिक लाभ की दौड़ इस महत्वपूर्ण प्राकृतिक विरासत को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचा सकती है।
भारत के स्वादिष्ट और प्रीमियम आमों को दुनिया भर में पसंद किया जाता है, लेकिन अब जापान के लोग भारतीय आमों का स्वाद नहीं चख पाएंगे। जापान ने करीब 20 साल बाद भारतीय आमों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस फैसले से भारत के आम निर्यातकों और किसानों को बड़ा झटका लगा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जापान ने भारतीय आमों के निर्यात में इस्तेमाल होने वाली पेस्ट कंट्रोल और ट्रीटमेंट प्रक्रियाओं में खामियां पाए जाने के बाद यह कदम उठाया है। इसका असर अल्फोंसो, केसर, लंगड़ा और बंगनपल्ली जैसी लोकप्रिय भारतीय किस्मों पर पड़ा है। जापान ने क्यों लगाया भारतीय आमों पर प्रतिबंध? जानकारी के अनुसार, इस साल की शुरुआत में जापानी क्वारंटीन अधिकारियों ने भारत के वाष्प ताप उपचार (VHT) केंद्रों का निरीक्षण किया था। इस दौरान पेस्ट कंट्रोल और डिसइंफेक्शन प्रक्रिया में कुछ तकनीकी कमियां सामने आईं। इसी के बाद जापान ने भारतीय आमों की नई खेपों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अब तक भारत और जापान दोनों में से किसी भी पक्ष ने तकनीकी खामियों का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया है। क्या होता है VHT प्रोसेस? VHT यानी Vapor Heat Treatment एक विशेष प्रक्रिया है, जिसमें आमों को नियंत्रित गर्म और आर्द्र हवा के संपर्क में रखा जाता है। इसका उद्देश्य फल मक्खी और अन्य कीटों के लार्वा को खत्म करना होता है। जापान जैसे देशों में कृषि सुरक्षा को लेकर बेहद सख्त नियम हैं। वहां फल मक्खी जैसे कीटों के लिए “जीरो टॉलरेंस” नीति लागू है। इसलिए निर्यात से पहले हर खेप का सख्त परीक्षण किया जाता है। उत्तर प्रदेश के केंद्र में मिली थीं खामियां रिपोर्ट्स के अनुसार, मार्च 2026 में जापानी अधिकारियों ने उत्तर प्रदेश के रहमानपुर स्थित VHT केंद्र का निरीक्षण किया था। निरीक्षण के दौरान फ्यूमिगेशन और डिसइंफेक्शन से जुड़ी कमियां सामने आईं। इसके बाद जापान के योकोहामा प्लांट प्रोटेक्शन एसोसिएशन ने घोषणा की कि 25 मार्च 2026 के बाद जारी किए गए निरीक्षण प्रमाणपत्रों वाली भारतीय आमों की खेप स्वीकार नहीं की जाएगी। 2006 में हटाया गया था पिछला प्रतिबंध यह पहली बार नहीं है जब जापान ने भारतीय आमों पर रोक लगाई हो। इससे पहले भी फल मक्खी के खतरे को देखते हुए जापान ने भारतीय आमों पर प्रतिबंध लगाया था। बाद में भारत ने अपनी ट्रीटमेंट और क्वारंटीन व्यवस्था को मजबूत किया, जिसके बाद 2006 में यह प्रतिबंध हटा लिया गया था। लेकिन अब करीब दो दशक बाद फिर से भारतीय आमों पर रोक लगाई गई है। निर्यातकों और किसानों को बड़ा नुकसान जापान भारत के आमों का सबसे बड़ा आयातक नहीं है, लेकिन वहां भारतीय प्रीमियम आमों की अच्छी कीमत मिलती है। ऐसे में इस प्रतिबंध को निर्यातकों के लिए बड़ा आर्थिक झटका माना जा रहा है। भारत हर साल दुनिया में सबसे ज्यादा आम उत्पादन करता है। देश में करीब 28 करोड़ मीट्रिक टन आम की पैदावार होती है। हालांकि, इसका बड़ा हिस्सा घरेलू बाजार में ही खप जाता है। फिर भी जापान जैसे हाई-वैल्यू मार्केट भारतीय निर्यातकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। महाराष्ट्र के किसानों पर दोहरी मार इस फैसले का सबसे ज्यादा असर महाराष्ट्र के अल्फोंसो आम उत्पादकों पर पड़ सकता है। किसान पहले ही भीषण गर्मी और अल नीनो से जुड़े असामान्य मौसम की वजह से फसल नुकसान झेल रहे हैं। कुछ सरकारी सर्वेक्षणों में कई इलाकों में 85 से 90 प्रतिशत तक फसल खराब होने की आशंका जताई गई है। अब जापान के प्रतिबंध ने किसानों की चिंता और बढ़ा दी है। दूसरे देशों में भी बढ़ सकती है चिंता निर्यातकों को डर है कि जापान के इस फैसले का असर दूसरे अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी पड़ सकता है। अगर अन्य देश भी भारतीय कृषि गुणवत्ता मानकों पर सवाल उठाने लगे, तो आम निर्यात कारोबार को बड़ा नुकसान हो सकता है।
रांची। गर्मी का मौसम आते ही भारत में जिस चीज का सबसे ज्यादा इंतजार होता है, वह है आम। यह सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, स्वाद और भावनाओं से जुड़ा एक अहम हिस्सा है। आम की मिठास हर घर की यादों में बसी होती है। देश के अलग-अलग हिस्सों में आम की कई किस्में मिलती हैं। आज के एपिसोड में देश के एक ऐसे जगह की बात करेंगे , जिसे लोग दुनिया का “Mango Capital” कहते हैं। जब 'आमों के शहर' की बात आती है, तो दिमाग में सबसे पहले पश्चिम बंगाल के 'मालदा' का नाम आता है। मालदा बेशक अपनी 'फजली' किस्म के लिए मशहूर है और इसे भारत में मैंगो सिटी कहा जाता है, लेकिन जब बात "दुनिया की आम की राजधानी" की आती है, जो जवाब पूरी तरह बदल जाता है। और वो जगह 'आम की राजधानी' पश्चिम बंगाल का मालदा नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के राजधानी लखनऊ के पास स्थित छोटा सा कस्बा मलिहाबाद है। हालांकि, इस जगह के बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं। क्यों मलिहाबाद को दुनिया का Mango Capital कहा जाता है? मलिहाबाद में आम की खेती का इतिहास कई सौ साल पुराना माना जाता है। कहा जाता है कि नवाबों के समय से ही यहां बड़े पैमाने पर आम के बाग लगाए जाते थे। आज भी यह परंपरा जीवित है और हजारों एकड़ में फैले आम के बाग इस क्षेत्र की पहचान बानी हुई है। मलिहाबाद के आमों की सबसे बड़ी खासियत उनका स्वाद और खुशबू है। यहां की उपजाऊ मिट्टी और मौसम आम की खेती के लिए बेहद अच्छा माना जाता है। यहां के आमों में गजब की मिठास, रसदार गूदा और कम रेशे पाए जाते हैं। खासकर दशहरी आम अपनी मीठी खुशबू और मुलायम गूदे के लिए दुनियाभर में मशहूर है।आपको जानकर हैरानी होगी कि मलिहाबाद की शान माने जाने वाले 'दशहरी' आम का 200 साल पुराना 'मातृ वृक्ष' आज भी यहां शान से खड़ा है। मलिहाबाद की खासियत मलिहाबाद की पहचान सिर्फ दशहरी तक सीमित नहीं है। यहां के बागों में आम की कई ऐसी किस्में उगती हैं, जो देश-विदेश में पसंद की जाती हैं: • लंगड़ा आम: यह अपने हल्के खट्टे-मीठे स्वाद और हरे रंग के कारण जाना जाता है। • चौसा आम: यह बेहद रसदार और मीठा होता है, जिसे चूसकर खाने में अलग ही आनंद आता है। • सफेदा आम: इसका गूदा मलाईदार और स्वाद हल्का मीठा होता है। • आम्रपाली आम: यह एक हाइब्रिड किस्म है, जो अपने गहरे रंग और खास स्वाद के लिए मशहूर है। मलिहाबाद में बड़ी संख्या में परिवार पीढ़ियों से आम की खेती करते आ रहे हैं। यहां की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा आम के कारोबार पर निर्भर करता है। खेती से लेकर पैकिंग, व्यापार और एक्सपोर्ट तक हजारों लोगों को रोजगार मिलता है। यही कारण है कि आम यहां सिर्फ फल नहीं बल्कि लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। दुनिया में क्यों अलग पहचान रखता है मलिहाबाद? भारत, पाकिस्तान, थाईलैंड और मेक्सिको जैसे कई देश आम उत्पादन के लिए मशहूर हैं। लेकिन मलिहाबाद अपनी पुरानी परंपरा, बड़े स्तर पर खेती और दशहरी आम की वजह से खास पहचान रखता है। भले ही यह कोई आधिकारिक खिताब नहीं है, लेकिन अपनी लोकप्रियता और विरासत की वजह से मलिहाबाद को दुनिया का ‘Mango Capital’ माना जाता है।
रांची। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा है कि राज्य में बहने वाली नदियों के जल को यहीं संरक्षित करना चाहिए, जिससे सिंचाई के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध हो। जल संसाधन विभाग की समीक्षा बैठक करते हुए उन्होंने अधिकारियों से स्पष्ट रूप से कहा कि किसानों को खेती में पानी की समस्या नहीं होनी चाहिए। अधिकारी इस दृष्टिकोण से काम करें। कहा, कृषि कार्य में सिंचाई जल की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखें, इसमें कोई कोताही नहीं हो। खेतों तक पहुंचाये पानी मुख्यमंत्री ने खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए समर्पित और प्रभावी प्रयास करने के निर्देश दिए। पाइपलाइन आधारित सिंचाई योजनाओं की समीक्षा करते हुए मुख्यमंत्री ने इसके कार्यों में तेजी लाने को कहा। कहा कि इससे पेयजल आपूर्ति एवं सिंचाई दोनों उद्देश्यों की पूर्ति होगी। इन बिंदुओं पर भी दिये निर्देश बैठक में राज्य की सिंचाई योजनाओं, मेगा लिफ्ट परियोजनाओं, पाइपलाइन आधारित योजनाओं, बांधों एवं बहुउद्देश्यीय परियोजनाओं की विस्तृत समीक्षा की गई। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिया कि जल संसाधन विभाग की सभी योजनाओं को समय पर पूरा करें, जिससे राज्य के किसानों को सीधा लाभ मिल सके। उन्होंने कहा कि राज्य में सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से उत्पादन में वृद्धि होगी और किसानों की आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ होगी। इससे ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन पर भी रोक लगेगी। नदी जल संरक्षण पर जोर मुख्यमंत्री ने नदी जल संरक्षण पर विशेष बल दिया। उन्होंने स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप योजनाएं बनाने पर जोर दिया तथा नदी जल को छोटे-छोटे जलाशयों में लिफ्ट कर सिंचाई कार्यों में उपयोग करने के निर्देश दिए। तालाबों में जल उपलब्धता सुनिश्चित कर मत्स्य पालन को बढ़ावा देने की आवश्यकता मुख्यमंत्री ने बताई। मुख्यमंत्री को योजनाओं की स्थिति बताई गई जल संसाधन विभाग के सचिव प्रशांत कुमार ने इस मौके पर विभाग द्वारा संचालित परियोजनाओं की स्थिति से मुख्यमंत्री को अवगत कराया। बैठक में जल संसाधन विभाग के मंत्री हफीजुल हसन, मुख्य सचिव अविनाश कुमार, विकास आयुक्त अजय कुमार सिंह एवं विभागीय पदाधिकारी उपस्थित थे। इन योजनाओं को रिपर्ट तलब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने चांडिल बांध, खरकई बराज, ईंचा बांध, सोन-कनहर पाइपलाइन सिंचाई योजना, सिकटिया, मसलिया-रानीश्वर, पीरटांड़ मेगा लिफ्ट सिंचाई योजना पर अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी। पलामू पाइपलाइन सिंचाई योजना (पैकेज-1 एवं 2), भीमखंडा माइक्रो लिफ्ट योजना, खरकई बायी मेगा लिफ्ट योजना, भैरवा जलाशय, कोनार सिंचाई परियोजना, पुनासी जलाशय एवं गुमानी बराज योजना की प्रगति की भी समीक्षा की गई। बैठक में पलामू के लिए अमानत बराज योजना, गिरिडीह के लिए गांडेय मेगा लिफ्ट सिंचाई योजना, खूंटी के चाराडीह-उलीहातू योजना, सिमडेगा के कोनपाला मेगा लिफ्ट योजना, पूर्वी सिंहभूम के पटमदा-बोड़ाम मेगा लिफ्ट योजना तथा सरायकेला-खरसावां के नीमडीह-कुकड़ू मेगा लिफ्ट सिंचाई योजना पर चर्चा हुई।
नरेंद्र मोदी को इटली दौरे के दौरान रोम में संयुक्त राष्ट्र की संस्था Food and Agriculture Organization of the United Nations (FAO) की ओर से प्रतिष्ठित एग्रीकोला मेडल से सम्मानित किया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने यह सम्मान भारत के करोड़ों किसानों, पशुपालकों, मछली पालकों और कृषि क्षेत्र से जुड़े कामगारों को समर्पित किया। सम्मान ग्रहण करने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह पुरस्कार केवल उनके लिए नहीं, बल्कि भारत की उस सोच और प्रतिबद्धता का सम्मान है, जिसके केंद्र में मानव कल्याण, खाद्य सुरक्षा और सतत विकास शामिल हैं। किसानों और कृषि वैज्ञानिकों को समर्पित किया सम्मान पीएम मोदी ने कहा कि वह FAO के महानिदेशक के प्रति आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने उन्हें इस सम्मान से नवाजा। उन्होंने कहा कि यह मेडल भारत के अन्नदाताओं और कृषि वैज्ञानिकों की मेहनत का सम्मान है। उन्होंने कहा, “मैं इस मेडल को अत्यंत विनम्रता के साथ स्वीकार करता हूं और इसे भारत के किसानों को समर्पित करता हूं।” “धरती हमारी मां, किसान धरती पुत्र” एग्रीकोला मेडल सम्मान समारोह में प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय कृषि परंपरा का जिक्र करते हुए कहा कि भारत में खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति और जीवन मूल्यों का हिस्सा है। उन्होंने कहा, “हम धरती को मां कहते हैं और किसानों को धरती पुत्र। भारतीय संस्कृति में कृषि मनुष्य और प्रकृति के बीच पवित्र संबंध का प्रतीक है।” पीएम मोदी ने कहा कि हजारों साल पुरानी भारतीय कृषि परंपराएं आज भी देश को प्रेरित करती हैं और इन्हीं मूल्यों के आधार पर भारत आधुनिक कृषि सुधारों की दिशा में आगे बढ़ रहा है। विज्ञान और तकनीक आधारित खेती पर जोर प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत अब विज्ञान, तकनीक और नवाचार आधारित कृषि व्यवस्था की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है। सरकार का लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि टिकाऊ और जलवायु-अनुकूल कृषि इकोसिस्टम तैयार करना है। उन्होंने कहा कि देश में वैज्ञानिक खेती को मिशन मोड में आगे बढ़ाया जा रहा है। सॉइल हेल्थ कार्ड योजना के जरिए किसानों को मिट्टी की गुणवत्ता और पोषक तत्वों की जानकारी दी जा रही है, ताकि वे बेहतर उत्पादन कर सकें। माइक्रो इरिगेशन और “हर बूंद, ज्यादा फसल” पर फोकस पीएम मोदी ने कहा कि सरकार “हर बूंद, अधिक फसल” अभियान, माइक्रो-इरिगेशन और सटीक खेती जैसी योजनाओं को बढ़ावा दे रही है। इसका उद्देश्य कम पानी में अधिक उत्पादन हासिल करना और किसानों की आय बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि भारत भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए ऐसी कृषि व्यवस्था विकसित कर रहा है, जो टिकाऊ होने के साथ-साथ पर्यावरण के अनुकूल भी हो।
68.41 करोड़ की लागत से तैयार होगा आधुनिक बाजार, ई-नाम से जुड़कर देश-विदेश तक पहुंचेगा उत्पाद पटना: बिहार के किसानों के लिए बड़ी राहत की खबर है। राजधानी पटना के मुसल्लहपुर कृषि उत्पादन बाजार प्रांगण को अब हाईटेक मंडी के रूप में विकसित किया जा रहा है। इस परियोजना के पूरा होने के बाद किसानों और व्यापारियों को आधुनिक सुविधाओं से लैस एक सुव्यवस्थित बाजार मिलेगा। 68 करोड़ से होगा आधुनिकरण कृषि विभाग की ओर से इस प्रोजेक्ट के लिए 68.41 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई है। निर्माण कार्य बिहार राज्य पुल निर्माण निगम लिमिटेड के जरिए कराया जा रहा है। इस हाईटेक मंडी में पेयजल, शौचालय, बिजली, सुरक्षा, ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म और गोदाम जैसी सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। ई-नाम से जुड़ेगा बाजार इस मंडी को ई-नाम (e-NAM) प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाएगा, जिससे किसानों को अपने उत्पाद देश और विदेश की मंडियों में बेचने का मौका मिलेगा। इससे उन्हें फसल का बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ेगी और बिचौलियों पर निर्भरता भी कम होगी। किसानों और व्यापारियों को मिलेंगी खास सुविधाएं मंडी के आधुनिकीकरण के बाद यहां- कोल्ड स्टोरेज की सुविधा संतरा भंडारण के लिए विशेष चैंबर प्रदर्शनी हॉल जैसी आधुनिक व्यवस्थाएं उपलब्ध कराने की योजना है। इसके अलावा किसानों की गाड़ियों के आवागमन को आसान बनाने के लिए भी विशेष मांगें उठाई गई हैं। निर्माण कार्य 2026 के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य निर्माण एजेंसी के अनुसार, इस परियोजना को साल 2026 के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके बाद यह मंडी पूरी तरह आधुनिक स्वरूप में काम करने लगेगी। जमीन सीमांकन में आ रही दिक्कत हालांकि, बाजार परिसर के लगभग तीन-चौथाई हिस्से का सीमांकन अब तक पूरा नहीं हुआ है, जिससे चहारदीवारी निर्माण का काम शुरू नहीं हो सका है। प्रशासन ने संबंधित अधिकारियों को जल्द इस प्रक्रिया को पूरा करने का निर्देश दिया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।