AI investment

Google parent company Alphabet invests billions to expand AI infrastructure, data centers, and computing capacity
AI की दौड़ में Google का बड़ा दांव, 80 अरब डॉलर जुटाएगी Alphabet; इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार पर रहेगा फोकस

AI के लिए अरबों डॉलर जुटाने की तैयारी में Google आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां भारी निवेश कर रही हैं। अब Google की पैरेंट कंपनी Alphabet ने भी AI इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए 80 अरब डॉलर जुटाने की योजना का ऐलान किया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब AI मॉडल्स, क्लाउड सेवाओं और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग की मांग तेजी से बढ़ रही है। कंपनी का मानना है कि आने वाले वर्षों में AI सेवाओं की जरूरत मौजूदा क्षमता से कहीं अधिक बढ़ने वाली है। इसी वजह से Alphabet अपने डेटा सेंटर, कंप्यूटिंग क्षमता और AI चिप्स के विस्तार पर बड़ा निवेश करने जा रही है। Berkshire Hathaway भी करेगी 10 अरब डॉलर का निवेश रिपोर्ट के अनुसार, Alphabet की फंड जुटाने की योजना में 10 अरब डॉलर का निवेश Berkshire Hathaway की ओर से शामिल है। यह वही कंपनी है जिसे लंबे समय तक दिग्गज निवेशक Warren Buffett ने नेतृत्व दिया था। हालांकि बफेट अप्रैल में CEO पद से हट चुके हैं, लेकिन अभी भी कंपनी के चेयरमैन हैं। 80 अरब डॉलर के पैकेज में 40 अरब डॉलर का शेयर बिक्री कार्यक्रम और 30 अरब डॉलर के अंडरराइटेड शेयर एवं कन्वर्टिबल प्रेफर्ड स्टॉक ऑफरिंग भी शामिल हैं। आखिर Google को इतनी बड़ी रकम की जरूरत क्यों? Google पहले से ही दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनियों में शामिल है और उसका बाजार मूल्य लगभग 4.5 ट्रिलियन डॉलर बताया जा रहा है। इसके बावजूद कंपनी इतनी बड़ी राशि इसलिए जुटा रही है क्योंकि AI के लिए जरूरी कंप्यूटिंग क्षमता (Compute Power) की मांग लगातार बढ़ रही है। ChatGPT, Gemini, Claude और अन्य बड़े AI मॉडल्स को चलाने के लिए विशाल डेटा सेंटर और अत्याधुनिक प्रोसेसर की आवश्यकता होती है। AI सेवाओं के उपयोग में तेजी आने के कारण टेक कंपनियां पर्याप्त कंप्यूटिंग संसाधनों की कमी का सामना कर रही हैं। 2027 में और बढ़ सकता है निवेश Alphabet की मुख्य वित्तीय अधिकारी (CFO) Anat Ashkenazi ने पहले संकेत दिया था कि 2027 में कंपनी का पूंजीगत खर्च (Capital Expenditure) 2026 की तुलना में काफी अधिक होगा। कंपनी ने अप्रैल में अपने वार्षिक पूंजीगत निवेश अनुमान को बढ़ाकर 180 से 190 अरब डॉलर कर दिया था। यह वृद्धि मुख्य रूप से AI कंप्यूटिंग और डेटा सेंटर क्षमता बढ़ाने के लिए की गई है। Alphabet का कहना है कि एंटरप्राइज और उपभोक्ता दोनों स्तरों पर उसकी AI सेवाओं की मांग उपलब्ध क्षमता से ज्यादा हो चुकी है। इसलिए भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश जरूरी है। Nvidia को चुनौती देने की तैयारी Google सिर्फ AI मॉडल्स ही नहीं, बल्कि अपने स्वयं के AI हार्डवेयर पर भी बड़ा दांव लगा रहा है। कंपनी के Tensor Processing Units (TPUs) अब AI उद्योग में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। TPU चिप्स को Nvidia के AI प्रोसेसर का विकल्प माना जा रहा है। AI कंपनियों को बड़े पैमाने पर कंप्यूटिंग शक्ति की जरूरत होती है और Google इस बढ़ती मांग का लाभ उठाना चाहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि Google अपने TPU कारोबार का सफल विस्तार कर लेता है, तो वह AI इंफ्रास्ट्रक्चर बाजार में Nvidia को कड़ी चुनौती दे सकता है। AI सेक्टर में निवेश की होड़ तेज Google का यह कदम ऐसे समय आया है जब पूरी AI इंडस्ट्री में फंड जुटाने की होड़ मची हुई है। SpaceX ने हाल ही में IPO से जुड़ी योजनाओं के जरिए लगभग 1.75 ट्रिलियन डॉलर के मूल्यांकन का संकेत दिया है, जिसमें AI स्टार्टअप xAI भी शामिल है। वहीं Anthropic भी करीब 1 ट्रिलियन डॉलर के मूल्यांकन पर फंड जुटाने की तैयारी में है। इसके अलावा OpenAI को लेकर भी इस वर्ष IPO लाने की अटकलें तेज हैं। इससे साफ है कि AI की अगली दौड़ केवल बेहतर मॉडल बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें चलाने के लिए विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने की भी है। AI का भविष्य तय करेगा कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में AI सेक्टर में सफलता केवल सॉफ्टवेयर या मॉडल्स पर निर्भर नहीं रहेगी। जिन कंपनियों के पास सबसे ज्यादा डेटा सेंटर, कंप्यूटिंग क्षमता और उन्नत चिप्स होंगे, वही इस बाजार में बढ़त हासिल कर पाएंगी। Alphabet का 80 अरब डॉलर जुटाने का फैसला इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि AI की वैश्विक प्रतिस्पर्धा अब इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण के नए चरण में प्रवेश कर चुकी है।  

surbhi जून 2, 2026 0
Meta office with focus on AI technology and restructuring after layoffs
Meta में बड़ी छंटनी: Facebook और Reality Labs से सैकड़ों कर्मचारियों की छुट्टी, AI पर बढ़ा फोकस

टेक इंडस्ट्री में एक बार फिर बड़ी हलचल देखने को मिली है। Meta ने अपने प्रमुख प्लेटफॉर्म Facebook और Reality Labs डिवीजन में सैकड़ों कर्मचारियों की छंटनी कर दी है। हालांकि कंपनी में कुल करीब 78,000 कर्मचारी कार्यरत हैं और यह छंटनी कुल संख्या का छोटा हिस्सा है, लेकिन इसका असर कई महत्वपूर्ण टीमों पर पड़ा है।   AI पर बड़ा दांव, इसलिए कटौती Meta के CEO Mark Zuckerberg ने स्पष्ट किया है कि कंपनी अब तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर फोकस कर रही है। AI टेक्नोलॉजी में बड़े निवेश की तैयारी डेटा सेंटर और सर्वर इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बढ़ा 2026 में 115 से 135 अरब डॉलर तक निवेश का अनुमान कंपनी का मानना है कि AI भविष्य में उसके पूरे बिजनेस मॉडल को बदल देगा।   केवल छंटनी नहीं, स्ट्रक्चर में भी बदलाव Meta सिर्फ कर्मचारियों की संख्या कम नहीं कर रही, बल्कि: मैनेजमेंट लेयर घटाई जा रही है टीमों को ज्यादा कुशल बनाया जा रहा है काम करने के तरीकों को सरल किया जा रहा है कुछ कर्मचारियों को कंपनी के अंदर ही नई भूमिकाओं में शिफ्ट होने का मौका भी दिया जा रहा है।   पहले भी हो चुकी है बड़ी कटौती यह पहली बार नहीं है जब Meta ने बड़े स्तर पर छंटनी की हो: Reality Labs में पहले ही 1500 नौकरियां खत्म पिछले साल करीब 5% कर्मचारियों की छंटनी यह संकेत देता है कि कंपनी लगातार अपने संसाधनों को नए टेक्नोलॉजी क्षेत्रों में शिफ्ट कर रही है।   क्या है Reality Labs? Reality Labs Meta का वह डिवीजन है जो VR (Virtual Reality) और AR (Augmented Reality) टेक्नोलॉजी पर काम करता है। अब कंपनी यहां भी रणनीतिक बदलाव कर रही है, ताकि AI के साथ भविष्य की टेक्नोलॉजी को बेहतर तरीके से जोड़ा जा सके।   टेक इंडस्ट्री के लिए क्या संकेत? Meta का यह कदम दिखाता है कि: AI आने वाले समय में सबसे बड़ा फोकस रहेगा कंपनियां पारंपरिक रोल्स कम करके टेक-ड्रिवन जॉब्स बढ़ा रही हैं ग्लोबल लेवल पर जॉब स्ट्रक्चर तेजी से बदल रहा है

kalpana मार्च 26, 2026 0
Meta logo representing the company amidst AI investment and potential workforce cuts.
AI पर बढ़ते खर्च के बीच Meta में बड़े पैमाने पर छंटनी की तैयारी? रिपोर्ट में 20% कर्मचारियों की कटौती की चर्चा

  अमेरिकी टेक कंपनी Meta Platforms में एक बार फिर बड़े पैमाने पर छंटनी की संभावना जताई जा रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश की योजना के बीच अपने ऑपरेशन्स को अधिक कुशल बनाने के लिए कर्मचारियों की संख्या कम करने पर विचार कर रही है। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि वर्कफोर्स में करीब 20% तक कटौती पर चर्चा हुई है। अगर ऐसा होता है तो लगभग 16,000 कर्मचारियों की नौकरी प्रभावित हो सकती है। दिसंबर के अंत तक कंपनी में करीब 79,000 कर्मचारी काम कर रहे थे। हालांकि कंपनी के प्रवक्ता Andy Stone ने इन खबरों को “सैद्धांतिक संभावनाओं पर आधारित अटकलें” बताया है और कहा कि अभी तक छंटनी के पैमाने या समय को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों ने विभिन्न टीमों से यह आकलन करने को कहा है कि ऑपरेशन्स को कैसे और अधिक सुव्यवस्थित किया जा सकता है। दरअसल, कंपनी के सीईओ Mark Zuckerberg चाहते हैं कि Meta जनरेटिव AI क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को और तेज करे। इसी रणनीति के तहत कंपनी AI टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा निवेश कर रही है। यदि यह छंटनी होती है तो यह Meta के इतिहास में सबसे बड़ा पुनर्गठन होगा। इससे पहले कंपनी ने 2022 और 2023 में लागत घटाने के लिए कुल मिलाकर 21,000 से अधिक कर्मचारियों की छंटनी की थी। कंपनी ने आधिकारिक तौर पर किसी बड़े फैसले की पुष्टि नहीं की है, लेकिन रिपोर्ट के बाद टेक सेक्टर में संभावित छंटनी को लेकर चर्चा तेज हो गई है।  

surbhi मार्च 14, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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दिल्ली में 50 लाख की रंगदारी की साजिश का खुलासा, कारोबारी की पत्नी निकली मास्टरमाइंड

abhishek singh जून 30, 2026 0