आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव (Stress) लगभग हर व्यक्ति की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। नौकरी का दबाव, आर्थिक चुनौतियां, पारिवारिक जिम्मेदारियां और सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव लोगों की मानसिक शांति को प्रभावित कर रहा है। हालांकि थोड़े समय का तनाव सामान्य माना जाता है, लेकिन जब यह लंबे समय तक बना रहता है तो मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार तनाव न केवल व्यक्ति के व्यवहार और सोचने की क्षमता को प्रभावित करता है, बल्कि यह हृदय, पाचन तंत्र, नींद और शरीर की कई अन्य महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं पर भी नकारात्मक असर डाल सकता है। तनाव का दिमाग पर क्या असर पड़ता है? 1. निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो सकती है लगातार तनाव के दौरान शरीर में कॉर्टिसोल (Cortisol) नामक हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है। यह हार्मोन दिमाग के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स को प्रभावित करता है, जो सोचने, समझने, निर्णय लेने और समस्याओं का समाधान खोजने के लिए जिम्मेदार होता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति छोटे-छोटे फैसले लेने में भी कठिनाई महसूस कर सकता है और गलत निर्णय लेने की संभावना बढ़ जाती है। 2. याददाश्त और सीखने की क्षमता प्रभावित होती है लंबे समय तक तनाव में रहने से दिमाग का हिप्पोकैम्पस हिस्सा प्रभावित हो सकता है, जो नई चीजें सीखने और याद रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस कारण व्यक्ति को बातें भूलने, ध्यान भटकने और नई जानकारी को याद रखने में परेशानी होने लगती है। 3. चिंता और डिप्रेशन का खतरा शुरुआत में तनाव केवल बेचैनी, चिड़चिड़ापन या चिंता के रूप में दिखाई देता है, लेकिन समय के साथ यह गंभीर मानसिक समस्याओं का रूप ले सकता है। लगातार तनाव के कारण: एंग्जायटी बढ़ सकती है डिप्रेशन का खतरा बढ़ सकता है आत्मविश्वास कम हो सकता है भावनात्मक संतुलन बिगड़ सकता है 4. प्रोडक्टिविटी में गिरावट जब दिमाग लगातार तनाव में रहता है तो किसी भी काम में ध्यान लगाना मुश्किल हो जाता है। व्यक्ति जल्दी थक जाता है और उसकी कार्यक्षमता पर असर पड़ता है। इसका प्रभाव नौकरी, पढ़ाई और व्यक्तिगत जीवन सभी पर दिखाई देने लगता है। नींद पर पड़ता है सीधा असर तनाव की स्थिति में व्यक्ति अक्सर एक ही समस्या के बारे में बार-बार सोचता रहता है। इससे रात में नींद आने में देर हो सकती है या बार-बार नींद टूट सकती है। खराब नींद के कारण: दिनभर थकान महसूस होती है ऊर्जा कम हो जाती है चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है मानसिक प्रदर्शन प्रभावित होता है तनाव का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है? 1. हृदय रोग का खतरा बढ़ सकता है तनाव के दौरान दिल की धड़कन तेज हो जाती है और रक्तचाप बढ़ सकता है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो हृदय संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। 2. मांसपेशियों में दर्द और अकड़न लगातार तनाव में रहने पर शरीर की मांसपेशियां तनावग्रस्त रहती हैं। इससे गर्दन, कंधों और पीठ में दर्द की समस्या हो सकती है। 3. पाचन तंत्र प्रभावित हो सकता है तनाव का असर सीधे हमारे पाचन तंत्र पर भी पड़ता है। इसके कारण: अपच गैस पेट दर्द कब्ज या दस्त जैसी समस्याएं उभर सकती हैं। 4. वजन बढ़ने का खतरा कई लोग तनाव के दौरान जरूरत से ज्यादा खाना खाने लगते हैं, जिसे इमोशनल ईटिंग कहा जाता है। इससे: कैलोरी का सेवन बढ़ता है वजन बढ़ सकता है मोटापे का खतरा बढ़ जाता है तनाव कम करने के आसान तरीके विशेषज्ञों के अनुसार तनाव को नियंत्रित करने के लिए कुछ सरल आदतें अपनाई जा सकती हैं: रोजाना 20-30 मिनट वॉक करें मेडिटेशन और योग का अभ्यास करें पर्याप्त नींद लें दोस्तों और परिवार से बातचीत करें पसंदीदा संगीत सुनें सोशल मीडिया का उपयोग सीमित करें प्रकृति के बीच समय बिताएं यदि तनाव लंबे समय तक बना रहे, रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे या चिंता और उदासी लगातार महसूस हो, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। तनाव केवल मन की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर को प्रभावित कर सकता है। इसलिए समय रहते इसके संकेतों को पहचानना और उचित कदम उठाना बेहद जरूरी है।
बाहर से सफल, अंदर से परेशान! जानिए हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी के 7 संकेत आज के कॉर्पोरेट दौर में व्यस्त रहना और लगातार बेहतर प्रदर्शन करना सफलता की निशानी माना जाता है। लेकिन कई बार यही सफलता अंदर ही अंदर मानसिक दबाव और चिंता को छिपा देती है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति बाहर से पूरी तरह सफल और आत्मविश्वासी दिखाई देता है, लेकिन भीतर लगातार चिंता, तनाव और असुरक्षा महसूस करता रहता है। हालांकि यह कोई आधिकारिक मेडिकल डायग्नोसिस नहीं है, फिर भी इसका असर व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा पड़ सकता है। आइए जानते हैं इसके प्रमुख संकेतों के बारे में। 1. हर बात को लेकर जरूरत से ज्यादा सोचना यदि आप मीटिंग, बातचीत या भेजे गए ईमेल को बार-बार दिमाग में दोहराते रहते हैं और सोचते हैं कि इसे बेहतर तरीके से कैसे किया जा सकता था, तो यह हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी का संकेत हो सकता है। लगातार ओवरथिंकिंग मानसिक थकान बढ़ाती है। 2. परफेक्शनिस्ट बनने की आदत ऐसे लोग छोटी-सी गलती से भी डरते हैं और हर काम को बिल्कुल परफेक्ट करना चाहते हैं। खुद की लगातार आलोचना करना और हर निर्णय पर संदेह करना भी इसी का हिस्सा हो सकता है। 3. काम खत्म होने के बाद भी दिमाग का एक्टिव रहना ऑफिस से घर आने के बाद भी यदि आपका दिमाग काम, टारगेट और अधूरे प्रोजेक्ट्स के बारे में सोचता रहता है, तो यह मानसिक तनाव का संकेत है। ऐसे लोगों को काम और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाने में कठिनाई होती है। 4. चिंता से बचने के लिए जरूरत से ज्यादा काम करना कई लोग तनाव और चिंता से बचने के लिए खुद को काम में पूरी तरह डुबो देते हैं। शुरुआत में यह उत्पादकता बढ़ाने जैसा लगता है, लेकिन धीरे-धीरे यही आदत बर्नआउट का कारण बन सकती है। 5. बार-बार होने वाले शारीरिक लक्षण मानसिक तनाव का असर शरीर पर भी दिखाई देता है। लगातार सिरदर्द, गर्दन या कंधों में दर्द, थकान, मांसपेशियों में तनाव और नींद की कमी जैसे लक्षण हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी से जुड़े हो सकते हैं। 6. हर चीज अपने नियंत्रण में रखने की इच्छा यदि आपको दूसरों को जिम्मेदारी सौंपने में परेशानी होती है और हर काम खुद मॉनिटर करने की जरूरत महसूस होती है, तो यह भी चिंता का संकेत हो सकता है। विशेष रूप से मैनेजमेंट या नेतृत्व की भूमिका निभाने वाले लोगों में यह व्यवहार अधिक देखा जाता है। 7. सफलता के बावजूद असफलता का डर कई बार व्यक्ति अच्छी नौकरी, प्रमोशन और उपलब्धियों के बावजूद खुद को योग्य नहीं मानता। उसे लगता है कि वह किसी भी समय असफल हो सकता है। इसे आमतौर पर "इम्पोस्टर सिंड्रोम" कहा जाता है, जो हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी का प्रमुख संकेत माना जाता है। क्यों नजर नहीं आती यह समस्या? समाज अक्सर केवल उपलब्धियों और परिणामों को महत्व देता है। ऐसे में जो लोग बाहर से सफल दिखाई देते हैं, उनकी मानसिक परेशानियां अक्सर अनदेखी रह जाती हैं। यही कारण है कि हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी को पहचानना मुश्किल हो जाता है। कब लेनी चाहिए विशेषज्ञ की मदद? यदि चिंता आपके दैनिक जीवन, रिश्तों, स्वास्थ्य या कामकाज को प्रभावित करने लगे, शारीरिक लक्षण लगातार बने रहें या आप भावनात्मक रूप से थका हुआ महसूस करें, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी हो सकता है। इन आसान तरीकों से करें प्रबंधन काम और निजी जीवन के बीच स्पष्ट सीमाएं तय करें। नियमित रूप से गहरी सांस लेने और रिलैक्सेशन तकनीकों का अभ्यास करें। ईमेल और मैसेज बार-बार चेक करने की आदत कम करें। पर्याप्त नींद और नियमित व्यायाम को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। जरूरत महसूस होने पर काउंसलिंग या थेरेपी की मदद लें। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी को समय रहते पहचानकर और सही कदम उठाकर बर्नआउट, तनाव और अन्य मानसिक समस्याओं से बचा जा सकता है।
नई दिल्ली: डिजिटल युग में स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसका अत्यधिक इस्तेमाल अब मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बनता जा रहा है। हाल ही में सामने आए एक अध्ययन में पाया गया है कि स्मार्टफोन की लत युवा छात्रों में चिंता (Anxiety) और अवसाद (Depression) के बढ़ते स्तर से जुड़ी हुई है। करीब 2,000 युवाओं पर किए गए इस शोध में 1,846 विश्वविद्यालय के छात्रों को शामिल किया गया, जिनकी औसत उम्र 19.6 वर्ष थी। अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ कि जिन छात्रों में स्मार्टफोन उपयोग की लत अधिक थी, उनमें मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी ज्यादा देखने को मिलीं। कैसे मापी गई स्मार्टफोन की लत? शोधकर्ताओं ने स्मार्टफोन एडिक्शन को मापने के लिए “Smartphone Addiction Scale” का इस्तेमाल किया, साथ ही चिंता और अवसाद के स्तर को आंकने के लिए मान्यता प्राप्त टूल्स का उपयोग किया गया। परिणामों में पाया गया कि जो छात्र बार-बार फोन चेक करते हैं, फोन से अलग नहीं रह पाते हैं और जिनकी दिनचर्या इससे प्रभावित होती है, उनमें चिंता और डिप्रेशन के लक्षण काफी अधिक थे। पढ़ाई पर नहीं पड़ा सीधा असर दिलचस्प बात यह रही कि इस अध्ययन में स्मार्टफोन की लत और शैक्षणिक प्रदर्शन (Academic Performance) के बीच कोई सीधा संबंध नहीं पाया गया। यानी छात्रों के नंबर भले प्रभावित न हों, लेकिन उनकी मानसिक और भावनात्मक स्थिति पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है। पब्लिक हेल्थ के लिए बढ़ती चिंता विशेषज्ञों का मानना है कि स्मार्टफोन की लत अब एक उभरती हुई सार्वजनिक स्वास्थ्य (Public Health) समस्या बनती जा रही है। युवा वर्ग, जो सबसे ज्यादा डिजिटल रूप से सक्रिय है, इस जोखिम के दायरे में सबसे आगे है। आज के समय में लगभग हर युवा के पास स्मार्टफोन है, ऐसे में यदि इसका मानसिक स्वास्थ्य पर थोड़ा भी नकारात्मक असर पड़ता है, तो यह बड़े स्तर पर गंभीर समस्या बन सकता है। शोध की सीमाएं भी समझना जरूरी हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि यह एक “क्रॉस-सेक्शनल स्टडी” है, इसलिए यह साबित नहीं किया जा सकता कि स्मार्टफोन की लत सीधे तौर पर चिंता और डिप्रेशन का कारण है। इसके पीछे अन्य कारण भी हो सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।