ढाका/नई दिल्ली: भारत ने बांग्लादेशी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा सेवा दोबारा शुरू करने का ऐलान किया है। भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने गुरुवार को ढाका स्थित भारतीय वीजा आवेदन केंद्र में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बताया कि 28 जून से बांग्लादेशी नागरिक फिर से भारत आने के लिए टूरिस्ट वीजा के लिए आवेदन कर सकेंगे। यह फैसला दोनों पड़ोसी देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। पिछले लगभग दो वर्षों से बांग्लादेशी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा सेवा बंद थी। राष्ट्रपति शहाबुद्दीन से मुलाकात के बाद हुई घोषणा इस घोषणा से पहले भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन से शिष्टाचार मुलाकात की। मुलाकात के बाद उन्होंने प्रेस वार्ता में कहा कि भारत और बांग्लादेश के बीच लोगों के आपसी संपर्क को बढ़ावा देने के लिए वीजा सेवाओं को फिर से शुरू किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि रविवार, 28 जून से पर्यटक वीजा के लिए आवेदन स्वीकार किए जाएंगे। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बंद हुई थी सेवा 5 अगस्त 2024 को तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के पतन और उसके बाद दोनों देशों के संबंधों में आए तनाव के चलते भारत ने बांग्लादेशी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा जारी करना बंद कर दिया था। इस दौरान मेडिकल और बिजनेस वीजा जारी किए जाते रहे। अब करीब दो साल बाद पर्यटक वीजा सेवा भी बहाल कर दी गई है। इन चार केंद्रों से जारी होंगे पर्यटक वीजा दिनेश त्रिवेदी ने बताया कि बांग्लादेश में स्थित ढाका, राजशाही, चटगांव और खुलना के भारतीय वीजा आवेदन केंद्रों से पर्यटक वीजा जारी किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि बेनापोल सीमा के रास्ते यात्रा करने वाले यात्रियों की सुविधा और दोनों देशों के बीच आवाजाही को आसान बनाने के उद्देश्य से यह निर्णय लिया गया है। अप्रैल में बने थे भारत के नए उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी को अप्रैल में बांग्लादेश में भारत का नया उच्चायुक्त नियुक्त किया गया था। वह इस पद पर नियुक्त होने वाले पहले भारतीय राजनेता हैं। उनसे पहले वरिष्ठ राजनयिक प्रणय वर्मा इस पद पर कार्यरत थे। भारत-बांग्लादेश संबंधों में सुधार की दिशा में अहम कदम विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यटक वीजा सेवा की बहाली से दोनों देशों के बीच पर्यटन, व्यापार, चिकित्सा यात्रा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिलेगा। इसे भारत और बांग्लादेश के रिश्तों को सामान्य बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
ढाका/बीजिंग: भारत की सुरक्षा और सामरिक हितों से जुड़े संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के करीब स्थित तीस्ता नदी परियोजना को लेकर चीन और बांग्लादेश के बीच सहयोग और गहरा होने जा रहा है। बीजिंग में हुई उच्चस्तरीय बैठक में दोनों देशों ने तीस्ता समेत अन्य नदियों के जल प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण और नदी पुनरुद्धार परियोजनाओं पर सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने चीन से तीस्ता परियोजना के लिए तकनीकी और वित्तीय सहायता मांगी, जिस पर बीजिंग ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। यह घटनाक्रम भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि तीस्ता नदी परियोजना भारत के अत्यंत संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर के नजदीक स्थित है, जो पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला एकमात्र संकरा भू-मार्ग है। बीजिंग में हुई अहम बैठक बांग्लादेश की सरकारी समाचार एजेंसी बीएसएस (Bangladesh Sangbad Sangstha) के अनुसार, चीन के जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग ने बीजिंग में प्रधानमंत्री तारिक रहमान से मुलाकात की। इस दौरान दोनों नेताओं ने तीस्ता और अन्य साझा नदियों के बेहतर प्रबंधन को लेकर सहयोग बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह तारिक रहमान का दूसरा विदेश दौरा है। इससे पहले उन्होंने मलेशिया की यात्रा की थी। चीन दौरे के दौरान उनकी मुलाकात राष्ट्रपति शी चिनफिंग, प्रधानमंत्री ली च्यांग और अन्य वरिष्ठ चीनी नेताओं से भी प्रस्तावित है। बाढ़ नियंत्रण और जल प्रबंधन में चीन से मांगी मदद बैठक के दौरान तारिक रहमान ने कहा कि उनकी सरकार देशभर में नदी पुनरुद्धार और खुदाई अभियान चला रही है ताकि बाढ़ की समस्या कम हो, पर्यावरण संरक्षण हो सके और जल संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित किया जा सके। उन्होंने चीन से— नदी किनारों के कटाव को रोकने, सिंचाई व्यवस्था को आधुनिक बनाने, अंतर्देशीय जल परिवहन मजबूत करने, तथा तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना के लिए तकनीकी और वित्तीय सहायता की मांग की। चीन ने दिया पूरा सहयोग का भरोसा चीनी जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग ने कहा कि चीन जल संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में बांग्लादेश को हरसंभव सहयोग देगा। उन्होंने वर्ष 2005 के दोनों देशों के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) और हाल के वर्षों में चीनी विशेषज्ञों की यात्राओं का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों देशों का सहयोग शोध और तकनीकी आधार पर आगे बढ़ रहा है। उन्होंने बांग्लादेश के जल विशेषज्ञों और अधिकारियों को प्रशिक्षण के लिए चीन आने का भी निमंत्रण दिया। भारत के लिए क्यों अहम है तीस्ता परियोजना? तीस्ता नदी पूर्वी हिमालय से निकलकर सिक्किम, पश्चिम बंगाल और फिर बांग्लादेश में प्रवेश करती है। बांग्लादेश में यह सिंचाई और कृषि के लिए जीवनरेखा मानी जाती है। रणनीतिक दृष्टि से इसकी सबसे बड़ी अहमियत यह है कि प्रस्तावित तीस्ता परियोजना भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के बेहद करीब स्थित है। लगभग 20-22 किलोमीटर चौड़ा यह गलियारा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को मुख्य भूमि से जोड़ता है। ऐसे में इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी को भारत की सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है। भारत की पेशकश ठुकरा चुका है बांग्लादेश भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल बंटवारे का मुद्दा लंबे समय से लंबित है। वर्ष 2024 में भारत ने तीस्ता बेसिन के संरक्षण और तकनीकी विकास में सहयोग देने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन बांग्लादेश ने इस दिशा में आगे बढ़ने के बजाय चीन के साथ सहयोग का रास्ता चुना। पिछले महीने बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने भी बीजिंग दौरे के दौरान औपचारिक रूप से चीन से तीस्ता नदी पुनरुद्धार परियोजना में सहयोग का अनुरोध किया था। गंगा जल संधि पर भी टिकी हैं निगाहें भारत और बांग्लादेश के बीच जल साझेदारी का एक और महत्वपूर्ण मुद्दा 1996 की गंगा जल संधि है, जिसकी 30 वर्षीय अवधि इस वर्ष पूरी हो रही है। यदि दोनों देश इसे आगे बढ़ाने पर सहमत नहीं होते, तो यह समझौता समाप्त हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में तीस्ता परियोजना और गंगा जल बंटवारा दोनों ही भारत-बांग्लादेश संबंधों के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक और कूटनीतिक मुद्दों में शामिल रहेंगे।
भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा सुरक्षा और समन्वय से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सोमवार से नई दिल्ली में उच्चस्तरीय वार्ता शुरू हो रही है। Border Security Force (बीएसएफ) और Border Guard Bangladesh (बीजीबी) के महानिदेशकों की 57वीं द्विवार्षिक बैठक 8 से 11 जून तक आयोजित की जाएगी। इस बैठक में सीमा प्रबंधन, सुरक्षा सहयोग और अवैध घुसपैठियों की वापसी जैसे संवेदनशील विषयों पर चर्चा होने की संभावना है। नई दिल्ली में जुटेंगे दोनों देशों के सीमा सुरक्षा प्रमुख चार दिवसीय सम्मेलन में बांग्लादेशी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व बीजीबी प्रमुख Mohammad Ashrafuzzaman Siddiqui करेंगे, जबकि भारतीय पक्ष की अगुवाई बीएसएफ महानिदेशक Praveen Kumar करेंगे। दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारी सीमा से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श करेंगे। अवैध प्रवासियों की वापसी रहेगा प्रमुख एजेंडा बैठक का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा भारत में रह रहे अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया को लेकर माना जा रहा है। बांग्लादेश ने इस विषय पर अपनी आपत्तियां जताई हैं और इसे वार्ता में प्रमुखता से उठाने की बात कही है। बांग्लादेश के गृह मामलों के सलाहकार Salahuddin Ahmed ने कहा है कि सीमा की मौजूदा स्थिति, द्विपक्षीय सहयोग और अवैध प्रवासियों की वापसी का मुद्दा बैठक में प्रमुख रूप से उठाया जाएगा। वहीं भारत का कहना है कि केवल सत्यापित अवैध घुसपैठियों को स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए बांग्लादेश भेजा जाता है। सीमा अपराध और तस्करी पर भी होगी बातचीत सम्मेलन में सीमा पार अपराध, मानव तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी, अवैध घुसपैठ और सीमा पर होने वाली अन्य आपराधिक गतिविधियों को रोकने के उपायों पर भी चर्चा की जाएगी। दोनों पक्ष सीमा क्षेत्रों में बेहतर समन्वय और विश्वास बढ़ाने के उपायों पर भी विचार कर सकते हैं। 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा बनी चुनौती भारत और Bangladesh के बीच लगभग 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। इसमें से करीब 860 किलोमीटर हिस्से में अभी भी बाड़ नहीं लगी है, जिसके कारण सुरक्षा एजेंसियों के सामने निगरानी और अवैध आवाजाही रोकने की चुनौती बनी रहती है। पांच दशक पुराना संवाद तंत्र भारत और बांग्लादेश के बीच महानिदेशक स्तर की सीमा वार्ताओं की शुरुआत 1975 में हुई थी। वर्ष 1975 से 1992 तक यह बैठक हर साल आयोजित की जाती थी, जबकि 1993 से इसे द्विवार्षिक स्वरूप दिया गया। सीमा से जुड़े मुद्दों के समाधान और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने में यह तंत्र दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
बांग्लादेश में अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के नाम पर रखा गया एक दुर्लभ एल्बिनो भैंसा इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है। ढाका के पास नारायणगंज जिले के एक एग्रो फार्म में पाले गए इस भैंसे को उसकी अनोखी हेयरस्टाइल और हल्के गुलाबी रंग की वजह से सोशल मीडिया पर खूब लोकप्रियता मिली। अब यह भैंसा ईद-उल-अजहा (बकरीद) से पहले बिक चुका है और इसकी कुर्बानी दी जाएगी। हेयरस्टाइल की वजह से पड़ा ‘डोनाल्ड ट्रंप’ नाम भैंसे के मालिक जियाउद्दीन मैरदा ने बताया कि उन्होंने यह दुर्लभ एल्बिनो भैंसा करीब 10 महीने पहले राजशाही सिटी हाट से खरीदा था। इसके सिर पर मौजूद सफेद और घुंघराले बाल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हेयरस्टाइल जैसे लगते थे। इसी वजह से उनके छोटे भाई ने मजाक में इसका नाम “डोनाल्ड ट्रंप” रख दिया। नाम सामने आने के बाद भैंसे की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गईं। बड़ी संख्या में लोग फार्म पर सिर्फ इस भैंसे को देखने पहुंचने लगे। फार्म मालिक का कहना है कि नाम केवल मजाक और पहचान के लिए रखा गया था। 700 किलो वजन, लाखों में हुआ सौदा चार साल के इस भैंसे का वजन करीब 700 किलोग्राम बताया गया है। इसे “लाइव वेट” यानी वजन के हिसाब से बेचा गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक इसकी कीमत 550 टका प्रति किलो तय हुई। भैंसे को ओल्ड ढाका के व्यापारी मोहम्मद शोरोन ने खरीदा है। उन्होंने इसे ईद-उल-अजहा पर कुर्बानी के लिए खरीदा है। हालांकि, मीडिया के पहुंचने पर खरीदार ने भैंसे को सार्वजनिक रूप से दिखाने से इनकार कर दिया। सोशल मीडिया वायरल होने के बाद बढ़ी चर्चा स्थानीय लोगों का मानना है कि सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद इस भैंसे को लेकर लोगों में काफी उत्सुकता बढ़ गई थी। फार्म पर भीड़ जुटने लगी थी, इसलिए अब खरीदार इसे सार्वजनिक तौर पर दिखाने से बच रहे हैं। बांग्लादेश में बकरीद से पहले बड़े और दुर्लभ जानवरों की खरीद-फरोख्त हमेशा चर्चा में रहती है, लेकिन “डोनाल्ड ट्रंप” नाम के इस एल्बिनो भैंसे ने इस बार सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी हैं।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान पर हमलों के बाद वैश्विक तेल संकट गहराता जा रहा है। होर्मुज खाड़ी में बाधाओं और सप्लाई चेन प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है। इसका असर सबसे ज्यादा दक्षिण एशियाई देशों पर देखने को मिल रहा है, जहां पेट्रोल-डीजल की कीमतों ने आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। हालांकि, पड़ोसी देशों की तुलना में India में ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी अपेक्षाकृत सीमित रही है। पाकिस्तान में पेट्रोल-डीजल के दाम रिकॉर्ड स्तर पर Pakistan में हालात सबसे ज्यादा गंभीर बताए जा रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले तीन महीनों में वहां पेट्रोल करीब 64 प्रतिशत और डीजल 61 प्रतिशत तक महंगा हो चुका है। फिलहाल पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमत 458.86 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर और डीजल 520.42 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है। बढ़ती कीमतों के कारण वहां आम लोगों पर भारी आर्थिक दबाव बढ़ गया है। स्थिति को संभालने के लिए पाकिस्तान सरकार ने चार दिन का वर्किंग वीक लागू किया है और कई स्कूलों को भी बंद करना पड़ा है। नेपाल में दक्षिण एशिया का सबसे महंगा पेट्रोल Nepal भी गंभीर ईंधन संकट का सामना कर रहा है। नेपाल अब दक्षिण एशिया में सबसे महंगा पेट्रोल बेचने वाला देश बन गया है। जनवरी 2026 में जहां पेट्रोल 137 नेपाली रुपये प्रति लीटर था, वहीं अब इसकी कीमत बढ़कर 219 नेपाली रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है। नेपाल पूरी तरह आयातित तेल पर निर्भर है, जिसके चलते परिवहन और रोजमर्रा के सामान की कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी हुई है। श्रीलंका में लागू हुई ईंधन राशनिंग Sri Lanka में भी हालात सामान्य नहीं हैं। वहां ऑटो डीजल की कीमतों में 26 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सरकार को हालात नियंत्रित करने के लिए ईंधन राशनिंग लागू करनी पड़ी है। कई सार्वजनिक कार्यक्रमों और स्कूल गतिविधियों पर भी प्रतिबंध लगाए गए हैं ताकि तेल की खपत कम की जा सके। बांग्लादेश में भी बढ़ा दबाव Bangladesh ने शुरुआत में सब्सिडी के जरिए कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश की, लेकिन लगातार बढ़ते बोझ के बाद सरकार को पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने पड़े। देश में कई जगह पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लग रही हैं और कुछ जिलों में ईंधन की कमी की खबरें भी सामने आई हैं। भारत में सीमित बढ़ोतरी से राहत इन हालातों के बीच भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी अपेक्षाकृत कम रही है। 15 मई 2026 तक पेट्रोल में करीब 3.14 रुपये प्रति लीटर और डीजल में 3.11 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि हुई है। विशेषज्ञों का मानना है that केंद्र सरकार और सरकारी तेल कंपनियों ने वैश्विक कीमतों के बड़े झटके का असर काफी हद तक खुद संभाला, जिससे आम जनता पर दबाव सीमित रहा। होर्मुज संकट का वैश्विक असर होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में गिना जाता है। दुनिया के करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल की सप्लाई इसी रास्ते से होती है। ऐसे में पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर केवल एशिया ही नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है।
West Bengal में राजनीतिक बदलाव के बाद अब अवैध घुसपैठ का मुद्दा फिर सुर्खियों में आ गया है. नई सरकार के शपथ ग्रहण से पहले ही भारत सरकार ने संकेत दे दिए हैं कि अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान कर उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया तेज की जाएगी. इस मुद्दे पर विदेश मंत्रालय ने भी अपना रुख साफ कर दिया है. विदेश मंत्रालय ने क्या कहा? विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Randhir Jaiswal ने कहा कि भारत में रह रहे अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान की जा रही है और सभी कानूनी प्रक्रियाओं के बाद उन्हें वापस भेजा जाएगा. उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए Bangladesh का सहयोग जरूरी है. उन्होंने यह भी बताया कि बांग्लादेश की ओर से 2,860 से अधिक नागरिकता सत्यापन आवेदन अब भी लंबित हैं. इनमें कई मामले पांच साल से ज्यादा समय से अटके हुए हैं. भारत ने उम्मीद जताई है कि ढाका जल्द इन आवेदनों का निपटारा करेगा ताकि निर्वासन प्रक्रिया सुचारू रूप से पूरी हो सके. भाजपा के चुनावी वादे के बाद बढ़ी चर्चा चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने कई रैलियों में कहा था कि अगर भाजपा सत्ता में आती है तो “घुसपैठियों को चुन-चुनकर बाहर किया जाएगा.” अब भाजपा सरकार बनने के बाद इस मुद्दे पर कार्रवाई की संभावना को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. बांग्लादेश ने जताई चिंता इस बीच बांग्लादेश के विदेश मंत्री Khalilur Rahman ने आशंका जताई थी कि भारत बड़ी संख्या में लोगों को बांग्लादेश भेज सकता है. उन्होंने कहा कि यदि ऐसा होता है तो ढाका भी इस पर सख्त कदम उठाएगा. हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों देश बातचीत के जरिए समाधान निकालेंगे. तीस्ता जल संधि पर भी बढ़ी उम्मीद भाजपा की जीत के बाद एक और बड़ा मुद्दा चर्चा में आ गया है – Teesta Water Treaty. बांग्लादेश की सत्तारूढ़ पार्टी बीएनपी के नेताओं का मानना है कि पहले राज्य सरकार के विरोध के कारण यह समझौता आगे नहीं बढ़ पा रहा था. अब नई राजनीतिक परिस्थितियों में इस पर प्रगति की उम्मीद जताई जा रही है. बीएनपी के सूचना सचिव Azizul Bari Helal ने कहा कि नई सरकार केंद्र के साथ बेहतर तालमेल में काम कर सकती है, जिससे भारत और बांग्लादेश के बीच लंबित मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ सकती है. क्या होगा आगे? विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले दिनों में: अवैध प्रवासियों की पहचान अभियान तेज हो सकता है सीमा प्रबंधन और नागरिकता सत्यापन पर फोकस बढ़ेगा भारत-बांग्लादेश संबंधों में नए कूटनीतिक समीकरण बन सकते हैं तीस्ता जल समझौते जैसे लंबित मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ सकती है नई सरकार के गठन के साथ अब सबकी नजर इस बात पर है कि केंद्र और राज्य मिलकर इस संवेदनशील मुद्दे पर किस तरह आगे बढ़ते हैं.
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और Strait of Hormuz पर संकट के बीच बांग्लादेश गंभीर ईंधन संकट का सामना कर रहा है। ऐसे मुश्किल समय में भारत ने एक बार फिर पड़ोसी देश का साथ देते हुए डीजल की आपूर्ति कर राहत पहुंचाई है। पाइपलाइन के जरिए डीजल सप्लाई भारत ने Bangladesh को Numaligarh Refinery से पाइपलाइन के माध्यम से लगभग 7,000 टन डीजल की नई खेप भेजी है। इससे पहले भी हाल के दिनों में कई खेप भेजी जा चुकी हैं, जिससे कुल आपूर्ति बढ़कर लगभग 15,000 टन तक पहुंच गई है। यह सप्लाई India-Bangladesh Friendship Pipeline के जरिए की जा रही है, जो दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग का एक अहम उदाहरण है। क्यों बढ़ा संकट? Iran और अमेरिका के बीच तनाव के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य पर असर पड़ा है, जिससे वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हुई है। बांग्लादेश जैसे देश, जो समुद्री आयात पर निर्भर हैं, इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। वहां ईंधन की कमी के साथ-साथ जमाखोरी भी एक बड़ी समस्या बन गई है। आंतरिक संकट ने बढ़ाई परेशानी बांग्लादेश में हालात और बिगड़ गए जब आठ जिलों में टैंकर कर्मचारियों ने हड़ताल शुरू कर दी। इससे दिनाजपुर, रंगपुर, निलफामारी समेत कई इलाकों में ईंधन आपूर्ति पूरी तरह ठप हो गई। इसका सीधा असर परिवहन व्यवस्था पर पड़ा है, जिससे आम लोगों की परेशानी बढ़ गई है। भारत-बांग्लादेश संबंधों की मिसाल भारत का यह कदम दोनों देशों के मजबूत रिश्तों को दर्शाता है। संकट के समय भारत ने त्वरित मदद देकर यह साबित किया है कि वह क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है। ऊर्जा आपूर्ति जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह सहयोग बांग्लादेश के लिए बड़ी राहत लेकर आया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।