बिहार में मैट्रिक परीक्षा 2026 के परिणाम का इंतजार कर रहे लाखों छात्रों के लिए बड़ी खबर है। Bihar School Examination Board ने रिजल्ट जारी करने की अंतिम तैयारियां लगभग पूरी कर ली हैं। ताजा अपडेट के मुताबिक, बोर्ड ने संभावित टॉपर्स को वेरिफिकेशन के लिए पटना कार्यालय बुलाना शुरू कर दिया है, जिससे यह संकेत मिल रहा है कि परिणाम जल्द ही घोषित किया जा सकता है। 30-31 मार्च तक रिजल्ट की उम्मीद सूत्रों के अनुसार, बिहार बोर्ड 10वीं का रिजल्ट 30 या 31 मार्च 2026 को जारी किया जा सकता है। हालांकि बोर्ड की ओर से अभी आधिकारिक तारीख की घोषणा नहीं की गई है, लेकिन वेरिफिकेशन प्रक्रिया शुरू होने के बाद रिजल्ट में ज्यादा देर नहीं होती। टॉपर्स का वेरिफिकेशन क्यों जरूरी हर साल की तरह इस बार भी Bihar School Examination Board टॉपर्स का वेरिफिकेशन कर रहा है। टॉप 20 छात्रों को इंटरव्यू के लिए बुलाया जाता है, जहां उनकी कॉपियों, लिखावट और ज्ञान का मिलान किया जाता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य रिजल्ट में पारदर्शिता बनाए रखना और किसी भी तरह की गड़बड़ी या फर्जीवाड़े को रोकना है। 15 लाख से ज्यादा छात्रों ने दी परीक्षा इस वर्ष मैट्रिक परीक्षा में करीब 15.12 लाख छात्र-छात्राएं शामिल हुए थे। परीक्षाएं 17 फरवरी से 25 फरवरी 2026 के बीच आयोजित की गई थीं। अब सभी छात्रों को अपने परिणाम का बेसब्री से इंतजार है। कहां और कैसे देखें रिजल्ट रिजल्ट जारी होने के बाद छात्र इन आधिकारिक वेबसाइट्स पर जाकर अपना परिणाम देख सकेंगे: bseexam.com biharboardonline.bihar.gov.in secondary.biharboardonline.com results.biharboardonline.com matricbiharboard.com रिजल्ट चेक करने के आसान स्टेप्स: किसी भी आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं “BSEB 10th Result 2026” लिंक पर क्लिक करें रोल नंबर और रोल कोड दर्ज करें सबमिट बटन दबाएं स्क्रीन पर रिजल्ट देखें और डाउनलोड करें छात्रों के लिए अहम सलाह रिजल्ट जारी होने के समय वेबसाइट पर ट्रैफिक अधिक होने की वजह से साइट स्लो हो सकती है। ऐसे में छात्र धैर्य बनाए रखें और केवल आधिकारिक वेबसाइट्स पर ही भरोसा करें।
Bihar School Examination Board (BSEB) के लाखों छात्र-छात्राओं का इंतजार अब खत्म होने वाला है। बिहार बोर्ड मैट्रिक (10वीं) परीक्षा 2026 के नतीजे जल्द जारी किए जा सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 27 मार्च से 31 मार्च 2026 के बीच किसी भी दिन रिजल्ट घोषित होने की संभावना है। छात्र अपना परिणाम बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट biharboardonline.bihar.gov.in पर चेक कर सकेंगे। प्रेस कॉन्फ्रेंस में होगा रिजल्ट का ऐलान हर साल की तरह इस बार भी रिजल्ट की घोषणा पटना स्थित बोर्ड मुख्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए की जाएगी। इस दौरान टॉपर्स लिस्ट, पास प्रतिशत और अन्य महत्वपूर्ण आंकड़े जारी किए जाएंगे। टॉपर्स वेरिफिकेशन जारी फिलहाल बोर्ड की ओर से टॉपर्स का फिजिकल वेरिफिकेशन किया जा रहा है। यह प्रक्रिया पूरी होते ही रिजल्ट की आधिकारिक तारीख घोषित कर दी जाएगी। कैसे चेक करें रिजल्ट? रिजल्ट जारी होने के बाद छात्र इन स्टेप्स के जरिए अपना स्कोरकार्ड देख सकते हैं: ऑफिशियल वेबसाइट पर जाएं ‘Matric Annual Result 2026’ लिंक पर क्लिक करें रोल कोड और रोल नंबर दर्ज करें कैप्चा भरकर ‘View’ पर क्लिक करें रिजल्ट स्क्रीन पर दिखाई देगा- डाउनलोड और प्रिंट कर लें रिजल्ट तैयार करने का तरीका बिहार बोर्ड ने इस बार भी स्टेप-वाइज मार्किंग सिस्टम अपनाया है: 50% ऑब्जेक्टिव प्रश्न (कंप्यूटर से जांच) हर विषय में 30% अंक लाना जरूरी जरूरत पड़ने पर ग्रेस मार्क्स का प्रावधान रिजल्ट के बाद क्या करें? रिजल्ट आने के बाद छात्रों के पास ये विकल्प होंगे: स्क्रूटनी: नंबरों से संतुष्ट न होने पर कॉपी दोबारा जांच के लिए आवेदन कंपार्टमेंट परीक्षा: एक-दो विषय में फेल होने पर दूसरा मौका 11वीं में एडमिशन: OFSS पोर्टल के जरिए स्ट्रीम चुन सकते हैं पिछले सालों का ट्रेंड बिहार बोर्ड लगातार देश में सबसे पहले रिजल्ट जारी करने के लिए जाना जाता है: 2025: 29 मार्च 2024: 31 मार्च 2023: 31 मार्च 2022: 31 मार्च 2021: 5 अप्रैल इस ट्रेंड को देखते हुए इस बार भी मार्च के अंत तक नतीजे आने की पूरी संभावना है।
2 मार्च से शुरू हुआ कॉपियों का मूल्यांकन Bihar School Examination Board (BSEB) ने मैट्रिक यानी 10वीं बोर्ड परीक्षा 2026 के परिणाम की तैयारी तेज कर दी है। परीक्षा खत्म होने के बाद राज्यभर के विभिन्न मूल्यांकन केंद्रों पर 2 मार्च से उत्तर पुस्तिकाओं की जांच शुरू हो चुकी है। बोर्ड ने लक्ष्य तय किया है कि 13 मार्च 2026 तक कॉपियों के मूल्यांकन की प्रक्रिया पूरी कर ली जाए, ताकि समय पर परिणाम जारी किया जा सके। जल्दबाजी से बचने के लिए नया नियम इस साल बोर्ड ने मूल्यांकन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सटीक बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है। नए निर्देश के अनुसार अब कोई भी परीक्षक एक दिन में अधिकतम 55 कॉपियों की ही जांच कर सकेगा। बोर्ड का मानना है कि जब शिक्षकों पर अधिक कॉपियां जांचने का दबाव होता है, तो मूल्यांकन में गलती की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए इस बार गुणवत्ता पर विशेष जोर दिया जा रहा है। नियम तोड़ने पर होगी कार्रवाई बोर्ड की ओर से सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों और मूल्यांकन केंद्र निदेशकों को निर्देश जारी किए गए हैं। उन्हें यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि कोई भी शिक्षक निर्धारित सीमा से अधिक कॉपियां न जांचे। यदि किसी केंद्र पर नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित परीक्षक और केंद्र निदेशक के खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई की जाएगी। 15 लाख से ज्यादा छात्रों ने दी परीक्षा इस वर्ष बिहार बोर्ड की 10वीं परीक्षा में राज्यभर से 15 लाख से अधिक छात्र-छात्राएं शामिल हुए थे। इतनी बड़ी संख्या में कॉपियों का सटीक मूल्यांकन करना बोर्ड के लिए बड़ी जिम्मेदारी माना जा रहा है। मूल्यांकन के साथ-साथ छात्रों के अंक कंप्यूटर पर दर्ज भी किए जा रहे हैं, ताकि 13 मार्च को जांच पूरी होते ही टॉपर्स का वेरिफिकेशन शुरू किया जा सके। कब आ सकता है रिजल्ट शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मूल्यांकन प्रक्रिया तय समय पर पूरी हो जाती है, तो मार्च के अंतिम सप्ताह या अप्रैल के पहले सप्ताह तक मैट्रिक परीक्षा के परिणाम घोषित किए जा सकते हैं। यहां चेक कर सकेंगे रिजल्ट बिहार बोर्ड के छात्र अपना रिजल्ट आधिकारिक वेबसाइट biharboardonline.bihar.gov.in और biharboardonline.com पर जाकर देख सकेंगे। रिजल्ट जारी होने के बाद छात्र अपने रोल नंबर की मदद से आसानी से अपना परिणाम चेक कर पाएंगे। बोर्ड ने छात्रों और अभिभावकों को सलाह दी है कि वे रिजल्ट से जुड़ी जानकारी केवल आधिकारिक वेबसाइट से ही प्राप्त करें।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।