केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) वर्ष 2026 की कक्षा 12वीं की परीक्षा के मूल्यांकन को लेकर एक बहुत बड़े राष्ट्रीय विवाद के घेरे में है। परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद शुरू हुआ यह विवाद केवल छात्रों और अभिभावकों के गुस्से तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें तकनीकी हैकिंग, डेटा लीक के आरोप, विपक्षी दलों का राजनीतिक हमला और अंततः न्यायालय का हस्तक्षेप व बोर्ड के शीर्ष अधिकारियों पर गाज गिरने तक की घटनाएं शामिल हो चुकी हैं। दरअसल यह पूरा मामला ऑन स्क्रीन मार्किंग से जुड़ा है। इसमें दिखी खामियों को लेकर पूरे देश में छात्र नाराज हैं। इस विवाद के कारण बोर्ड के चेयरमैन और सेक्रेट्ररी तक को बदल दिया गया है। इस पूरे मामले में हैकर्स और हैकिंग को मुख्य वजह बताया जा रहा है। विवाद की मुख्य वजह इस पूरे विवाद की जड़ में सीबीएसई द्वारा पहली बार इतने बड़े पैमाने पर लागू की गई एक नई तकनीक है, जिसे On-Screen Marking (OSM) यानी डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली कहा जाता है। क्या है OSM प्रणाली? इस व्यवस्था के तहत छात्रों की फिजिकल उत्तर पुस्तिकाओं (हार्डकॉपी) को स्कैन करके एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया जाता है। इसके बाद देश भर के शिक्षक कंप्यूटर या टैबलेट की स्क्रीन पर ही कॉपियों को जांचते हैं और वहीं नंबर देते हैं। सीबीएसई का उद्देश्य बोर्ड का दावा था कि इस प्रणाली से कॉपियों को जांचने में समय कम लगेगा, टोटल करने की गलतियां (Totalling Errors) खत्म होंगी, पारदर्शिता बढ़ेगी और परिणाम जल्दी जारी किए जा सकेंगे। इस कार्य का टेंडर हैदराबाद की एक निजी कंपनी 'कोएम्प्ट एडुटेक' (Coempt EduTeck) को दिया गया था। 12वीं के रिजल्ट के साथ विवाद शुरू मई 2026 के मध्य में जब सीबीएसई ने कक्षा 12वीं के परिणाम घोषित किए, तो देशभर के लगभग 17 लाख से अधिक छात्रों और उनके परिवारों को बड़ा झटका लगा। राष्ट्रीय स्तर पर पास होने वाले छात्रों का प्रतिशत गिरकर 85.20% पर आ गया, जो पिछले 7 वर्षों में सबसे कम था। अपेक्षा से बहुत कम अंक सालभर बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले मेधावी छात्रों को भी बेहद कम और अप्रत्याशित अंक मिले। इसके बाद छात्रों ने सोशल मीडिया पर अपने गुस्से का इजहार करना शुरू कर दिया। क्या-क्या गड़बड़ियां आईं सामने? जब छात्रों ने उत्तर पुस्तिकाओं के वेरिफिकेशन और पुनर्मूल्यांकन (Revaluation) के लिए आवेदन किया और अपनी जांची हुई कॉपियों की स्कैन कॉपी देखी, तो हैरान कर देने वाली कमियां सामने आईं। धुंधली (Blurred) स्कैन कॉपियां हजारों छात्रों ने शिकायत की कि जो डिजिटल कॉपियां उन्हें या परीक्षकों को दिखाई गईं, वे इतनी धुंधली और अस्पष्ट थीं कि एक भी शब्द पढ़ना नामुमकिन था। इसके बावजूद परीक्षकों ने उन पर लाल पेन के टिक लगाकर मनमाने नंबर दे दिए थे। मिसिंग पेजेस (गायब पन्ने) कई उत्तर पुस्तिकाओं के बीच के पन्ने या सप्लीमेंट्री शीट स्कैन होने से छूट गए थे, जिससे उन प्रश्नों का मूल्यांकन ही नहीं हो सका। कॉपियों की अदला-बदली (Mix-up) विवाद तब और भड़क गया जब वेदांत श्रीवास्तव नामक छात्र ने सोशल मीडिया पर सबूत साझा करते हुए बताया कि पुनर्मूल्यांकन पोर्टल पर जो भौतिकी (Physics) की कॉपी अपलोड की गई थी, वह उसकी थी ही नहीं। वह किसी अन्य छात्र की लिखावट थी और उसमें उन सवालों के जवाब थे जो उसने हल ही नहीं किए थे। बाद में सीबीएसई ने इसे 'तकनीकी त्रुटि' मानकर छात्र को सही कॉपी भेजी। सुरक्षा में चूक: हैकिंग का दावा और 'डेटा ब्रीच'.. यह मामला तब और गंभीर हो गया जब इसमें तकनीकी सुरक्षा और साइबर सुरक्षा से जुड़े बड़े खुलासे हुए। मास्टर पासवर्ड से बाईपास (हैकिंग) निसर्ग अधिकारी नामक एक एथिकल हैकर ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि सीबीएसई के ओएसएम पोर्टल के फ्रंटएंड कोड में एक गंभीर खामी (Vulnerability) थी। एक 'मास्टर पासवर्ड' के जरिए ओटीपी (OTP) सुरक्षा को बाईपास करके सीधे पेपर-चेकिंग डैशबोर्ड में दाखिल हुआ जा सकता था और नंबरों के साथ छेड़छाड़ संभव थी। डेटा लीक का आरोप मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि करीब 20 लाख छात्रों की कॉपियों का डेटा सार्वजनिक डोमेन में असुरक्षित (AWS क्लाउड बकेट के गलत कॉन्फ़िगरेशन के कारण) उपलब्ध था, जिसे कोई भी एक्सेस कर सकता था। यह देश का एक बहुत बड़ा डेटा ब्रीच था। सीबीएसई का बचाव सीबीएसई ने शुरुआत में इन दावों को खारिज किया और कहा कि जिस पोर्टल में खामी की बात कही जा रही है वह केवल सैंपल टेस्टिंग के लिए था, मुख्य डेटाबेस सुरक्षित है। हालांकि, बाद में बोर्ड ने माना कि कमजोरियों को ठीक कर लिया गया है और आईआईटी व सरकारी साइबर सुरक्षा टीमों को तैनात किया गया है। अब तक क्या-क्या कार्रवाई हुई? इस विवाद के राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ने के बाद सरकार और न्यायिक व्यवस्था में हड़कंप मच गया। अब तक इस मामले में कई बड़े कदम उठाए जा चुके हैं। शीर्ष अधिकारियों पर गिरी गाज विवाद की गंभीरता और छात्रों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए केंद्र सरकार ने सख्त रुख अपनाया। मई के आखिरी दिनों में सीबीएसई के तत्कालीन चेयरमैन और सचिव को उनके पदों से तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया और उनका तबादला कर दिया गया। सरकार ने पूरे मामले की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन भी किया है। मामला पहुंचा दिल्ली हाईकोर्ट छात्र संगठन एनएसयूआई (NSUI) और कई प्रभावित छात्रों ने दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) में याचिकाएं दायर की हैं। कोर्ट से मांग की गई है कि इस पूरे डिजिटल मूल्यांकन घोटाले और अनियमितताओं की एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए ताकि 12वीं के छात्रों का भविष्य बर्बाद न हो। पुनर्मूल्यांकन पोर्टल का दोबारा खुलना विवाद के कारण सीबीएसई को अपनी पुनर्मूल्यांकन (Revaluation) की तारीखों को आगे बढ़ाना पड़ा। नया शेड्यूल जारी कर 1 जून 2026 से 6 जून 2026 तक के लिए ऑनलाइन पोर्टल खोला गया है, जहां छात्र अपने आधार नंबर के जरिए लॉगिन करके उत्तर पुस्तिकाओं की दोबारा जांच के लिए आवेदन कर सकते हैं। कंपनी का भुगतान रोका गया सीबीएसई ने साफ किया है कि ओएसएम सिस्टम का संचालन करने वाली कंपनी 'कोएम्प्ट एडुटेक' को अभी तक कोई भुगतान (Payment) नहीं जारी किया गया है। पुनर्मूल्यांकन और सप्लीमेंट्री परीक्षाओं की प्रक्रिया पूरी होने के बाद कंपनी पर भारी जुर्माना (Penalty) लगाने पर विचार किया जा रहा है। बिना पूरी तैयारी मतलब हैकर्स को आमंत्रण सीबीएसई का यह विवाद यह दर्शाता है कि बिना पूरी तैयारी, पायलट प्रोजेक्ट और फुल-प्रूफ टेस्टिंग के इतने संवेदनशील और बड़े पैमाने पर टेक्नोलॉजी को लागू करने के क्या गंभीर परिणाम हो सकते हैं। बिना तैयारी के उठाये गये कदम के कारण ही हैकर्स को मौका मिलता है। जहां एक तरफ देश की सबसे बड़ी शिक्षा व्यवस्था को डिजिटल बनाने की कोशिश की जा रही थी, वहीं तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर बरती गई लापरवाही ने लाखों छात्रों के करियर को अधर में लटका दिया है। फिलहाल छात्र अपनी कॉपियों के पुनर्मूल्यांकन और हाईकोर्ट के फैसले पर नजरें टिकाए हुए हैं। हैकिंग क्या है और हैकर्स कौन होते है हैकिंग (Hacking) और हैकर्स (Hackers) आज के डिजिटल युग के दो ऐसे शब्द हैं, जिन्हें सुनते ही अक्सर लोगों के दिमाग में किसी का बैंक अकाउंट खाली होना या किसी वेबसाइट का बंद होना आता है। लेकिन, विज्ञान और तकनीक की दुनिया में इसका दायरा बहुत बड़ा है। भारत में सीबीएसई की 12वीं की कॉपियों के मूल्यांकन को लेकर उलझा विवाद इसका सबसे ताजा और सटीक उदाहरण है, जहां इससे देश के लाखों छात्र प्रभावित हैं। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है। हैकिंग क्या है? (What is Hacking?) किसी कंप्यूटर, स्मार्टफोन, नेटवर्क या डिजिटल सिस्टम की कमियों (Vulnerabilities) का पता लगाकर, उसमें अनधिकृत रूप से (यानी बिना अनुमति के) प्रवेश करना या उस पर नियंत्रण पाना हैकिंग कहलाता है। सकारात्मक पहलू: यदि यह काम किसी सिस्टम की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए किया जाए, तो इसे 'एथिकल हैकिंग' (Ethical Hacking) कहते हैं। नकारात्मक पहलू: यदि यह काम चोरी, जासूसी या किसी को नुकसान पहुंचाने के इरादे से किया जाए, तो यह एक साइबर अपराध (Cyber Crime) है। हैकर्स कौन होते हैं? (Who are Hackers?) हैकर्स वे लोग होते हैं, जिन्हें कंप्यूटर प्रोग्रामिंग, कोडिंग, नेटवर्किंग और ऑपरेटिंग सिस्टम का बहुत गहरा और एडवांस ज्ञान होता है। ये ऐसे विशेषज्ञ होते हैं जो किसी सॉफ्टवेयर या सुरक्षा चक्र की सीमाओं को तोड़कर उसके अंदर का रास्ता खोज निकालते हैं।3. हैकर्स के प्रकार (Types of Hackers)काम करने के तरीके और इरादे (Intent) के आधार पर हैकर्स को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जाता है: 1. व्हाइट हैट हैकर (White Hat Hackers) इन्हें 'एथिकल हैकर' भी कहा जाता है। ये कानूनी रूप से और किसी कंपनी या सरकार की अनुमति लेकर उनके सिस्टम की सुरक्षा की जांच करते हैं। उद्देश्य: सिस्टम की कमियों को ढूंढकर उन्हें ठीक करना, ताकि कोई चोर (साइबर अपराधी) उसका फायदा न उठा सके। काम: ये सुरक्षा सलाहकार या साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट के रूप में बड़ी कंपनियों में काम करते हैं। 2. ब्लैक हैट हैकर (Black Hat Hackers) इन्हें आम भाषा में 'साइबर अपराधी' या 'क्रैकर्स' कहा जाता है। ये बिना किसी अनुमति के दूसरों के सिस्टम में जबरन घुसते हैं। उद्देश्य: व्यक्तिगत लाभ, पैसों की उगाही (रैंसमवेयर), डेटा चोरी करना, या किसी संस्था को नुकसान पहुंचाना। काम: क्रेडिट कार्ड फ्रॉड, बैंक डकैती, और वायरस फैलाना। 3. ग्रे हैट हैकर (Grey Hat Hackers) ये व्हाइट और ब्लैक हैट हैकर्स का मिश्रण होते हैं। ये किसी दुर्भावना से काम नहीं करते, लेकिन बिना अनुमति के किसी के सिस्टम को हैक कर लेते हैं। उद्देश्य: ये केवल अपनी कला दिखाने या मजे के लिए ऐसा करते हैं। अक्सर ये किसी सिस्टम को हैक करने के बाद उसके मालिक को उसकी कमी के बारे में बता देते हैं और कभी-कभी इसे ठीक करने के बदले पैसों की मांग भी करते हैं। 4. हैकर्स हैकिंग क्यों करते हैं? (Motives behind Hacking) आर्थिक लाभ (Financial Gain): बैंक खातों से पैसे चुराना या कंपनियों का डेटा चुराकर उन्हें ब्लैकमेल करना। जासूसी (Espionage): एक देश द्वारा दूसरे देश की खुफिया सरकारी जानकारियों या मिलिट्री डेटा को चुराना। हैक्टिविज्म (Hacktivism): किसी राजनीतिक, सामाजिक या धार्मिक विचारधारा के विरोध में किसी सरकारी या बड़ी वेबसाइट को हैक करके अपना संदेश प्रदर्शित करना। मनोरंजन या चुनौती (Fun/Challenge): कुछ नौसिखिए हैकर्स केवल अपनी क्षमता को परखने या दूसरों को प्रभावित करने के लिए हैकिंग करते हैं। 5. हैकिंग से बचने के बुनियादी नियम यदि आप अपने डिजिटल जीवन (मोबाइल और कंप्यूटर) को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें: मजबूत पासवर्ड: हमेशा कठिन पासवर्ड (जैसे: $P@ssw0rd!23$) का उपयोग करें और समय-समय पर बदलते रहें। टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (2FA): अपने सोशल मीडिया और बैंक अकाउंट्स में 'टू-स्टेप वेरिफिकेशन' हमेशा चालू रखें। संदिग्ध लिंक्स से बचें: ईमेल या व्हाट्सएप पर आए किसी भी अनजान या लॉटरी वाले लिंक पर क्लिक न करें। सॉफ्टवेयर अपडेट: अपने फोन और कंप्यूटर के ऑपरेटिंग सिस्टम (OS) और ऐप्स को हमेशा अपडेट रखें, क्योंकि अपडेट्स में सुरक्षा की कमियों को सुधारा जाता है। भारत के पास अपना सर्वर नहीं, डाटा विदेश मे यह माना जाता है कि भारत के पास अपना कोई सर्वर ही नहीं है, लेकिन तकनीकी सच्चाई थोड़ी अलग और गहरी है। वास्तव में भारत के पास सर्वर और डेटा सेंटर्स की कोई कमी नहीं है, लेकिन हमारी असली निर्भरता विदेशी कंपनियों जैसे अमेज़न, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट के क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर पर है। भारत का डेटा संप्रभुता (Data Sovereignty) संकट यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि भारत के पास अपने सर्वर नहीं हैं। भारत सरकार का राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) देश के भीतर कई बड़े डेटा सेंटर्स संचालित करता है, जहां सरकारी विभागों, आधार (UIDAI), और डिजिटल इंडिया का महत्वपूर्ण डेटा स्टोर किया जाता है। इसके अलावा, भारत में निजी डेटा सेंटर्स का बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा है। असली समस्या सर्वर के न होने की नहीं, बल्कि विदेशी क्लाउड सर्वर पर अत्यधिक निर्भरता की है। भारत का अधिकांश कमर्शियल, सोशल मीडिया और निजी कंपनियों का डेटा अमेरिकी या अन्य विदेशी कंपनियों के सर्वर (जो अक्सर विदेशों में स्थित होते हैं) पर होस्ट किया जाता है। डेटा विदेश में रखने के मुख्य कारण क्लाउड कंप्यूटिंग का एकाधिकार: अमेज़न (AWS), माइक्रोसॉफ्ट (Azure), और गूगल (Google Cloud) जैसी कंपनियों के पास दुनिया का सबसे उन्नत और किफायती इंफ्रास्ट्रक्चर है। भारतीय स्टार्टअप्स और कंपनियों के लिए अपने निजी सर्वर लगाने के बजाय इन विदेशी कंपनियों की सेवाएं लेना बहुत सस्ता और आसान पड़ता है। सॉफ्टवेयर और ऐप्स का विदेशी होना भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले ऐप्स (जैसे व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स) अमेरिकी कंपनियों के हैं। इन ऐप्स का यूजर डेटा स्वाभाविक रूप से उनके अपने वैश्विक सर्वर्स पर ही जाता है। हार्डवेयर निर्माण में कमी सर्वर्स के लिए जरूरी अत्याधुनिक माइक्रोचिप्स, सेमीकंडक्टर्स और प्रोसेसर का निर्माण भारत में नहीं होता। हम आज भी इसके लिए ताइवान, चीन और अमेरिका पर निर्भर हैं। विदेशों में डेटा रखने से हैकिंग और सुरक्षा के खतरे जब भारत के नागरिकों का संवेदनशील डेटा (जैसे वित्तीय जानकारी, व्यक्तिगत विवरण और मेडिकल रिकॉर्ड) विदेशी धरती पर मौजूद सर्वर्स पर स्टोर होता है, तो कई गंभीर सुरक्षा चुनौतियां खड़ी होती हैं: डेटा लीक और साइबर हमले (Data Breaches): विदेशी सर्वर्स पर लगातार बड़े साइबर हमले होते रहते हैं। यदि किसी विदेशी कंपनी का सर्वर हैक होता है, तो करोड़ों भारतीयों का डेटा डार्क वेब पर बिकने के लिए आ जाता है। भू-राजनीतिक जोखिम (Geopolitical Risk): यदि भविष्य में भारत का किसी देश के साथ कूटनीतिक विवाद या युद्ध होता है, तो वह देश भारतीय डेटा तक हमारी पहुंच को ब्लॉक कर सकता है या उस डेटा का इस्तेमाल भारत के खिलाफ जासूसी (Espionage) के लिए कर सकता है। कानूनी पेचीदगियां: यदि विदेश में स्थित किसी सर्वर से डेटा चोरी होता है, तो भारतीय कानून (जैसे आईटी एक्ट) वहां सीधे तौर पर लागू नहीं होते। अपराधियों को पकड़ना और कानूनी कार्रवाई करना बेहद जटिल हो जाता है। सरकार के कदम और आगे की राह भारत सरकार इस खतरे को समझ चुकी है और स्थिति को बदलने के लिए लगातार प्रयास कर रही है: डेटा स्थानीयकरण (Data Localization): भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और सरकार ने नियम बनाए हैं कि भारतीय नागरिकों का वित्तीय और बैंकिंग डेटा अनिवार्य रूप से भारत की भौगोलिक सीमा के भीतर ही स्टोर होना चाहिए। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP Act): इस कानून के जरिए सरकार ने नागरिकों के डेटा की सुरक्षा और उसके विदेशी ट्रांसफर पर कड़े नियम लागू किए हैं। घरेलू डेटा सेंटर्स को बढ़ावा: भारत में मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहरों को बड़े डेटा सेंटर हब के रूप में विकसित किया जा रहा है, ताकि विदेशी कंपनियों को भी अपने सर्वर भारत में ही लगाने के लिए मजबूर किया जा सके। विदेशी टेक दग्गजों पर निर्भरता खत्म होना जरूरी भारत के पास सर्वर इंफ्रास्ट्रक्चर की क्षमता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन विदेशी टेक दिग्गजों पर निर्भरता रातों-रात खत्म नहीं की जा सकती। भारतीय प्रतिभाएं जा रही विदेश और देश विदेश टेक दिग्गजों पर निर्भर 'ब्रेन ड्रेन' (Brain Drain) यानी भारतीय प्रतिभाओं का विदेशों में पलायन और भारत की विदेशी टेक दिग्गजों (जैसे गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न) पर अत्यधिक निर्भरता, एक ऐसा चक्र है, जो देश की आर्थिक और तकनीकी संप्रभुता के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। एक तरफ हमारे बेहतरीन इंजीनियर और वैज्ञानिक विदेशों को समृद्ध कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ हमारा डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर विदेशी कंपनियों के हाथों में है। यह एक गंभीर स्थिति है और इसका प्रभावो देश के आम नागरिक पर पड़ रहा है। भारतीय प्रतिभाओं का पलायन: आंकड़े और हकीकत भारत दुनिया में सबसे ज्यादा इंजीनियर और टेक प्रोफेशनल्स पैदा करने वाले देशों में से एक है। आईआईटी (IIT), एनआईटी (NIT) और अन्य शीर्ष संस्थानों से निकलने वाले देश के सबसे शानदार दिमाग हर साल विदेशों का रुख करते हैं। ग्लोबल कंपनियों के शीर्ष पर भारतीय: आज दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों की कमान भारतीय मूल के दिग्गजों के हाथों में है। सुंदर पिचई (Alphabet/Google), सत्या नडेला (Microsoft) और अरविंद कृष्णा (IBM) इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। पलायन के मुख्य कारण: बेहतर पैकेज और जीवन स्तर: विदेशों में मिलने वाला आर्थिक पैकेज और 'क्वालिटी ऑफ लाइफ' भारत के मुकाबले कहीं बेहतर है। रिसर्च के लिए संसाधनों की कमी: भारत में अत्याधुनिक रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) इंफ्रास्ट्रक्चर और फंडिंग की आज भी भारी कमी है, जो इनोवेटर्स को बाहर जाने पर मजबूर करती है। विदेशी टेक दिग्गजों पर भारत की निर्भरताः इस प्रतिभा पलायन का सीधा असर यह हुआ है कि भारत आज एक बहुत बड़ा उपभोक्ता (Consumer) तो बन गया है, लेकिन तकनीकी रूप से 'आत्मनिर्भर' नहीं हो पाया है। हमारी निर्भरता मुख्य रूप से इन क्षेत्रों में है: क्लाउड और डेटा स्टोरेज: जैसा कि हमने पहले देखा, भारत की अधिकांश कंपनियों और स्टार्टअप्स का डेटा अमेज़न (AWS), गूगल क्लाउड या माइक्रोसॉफ्ट एज़्योर पर होस्ट होता है। ऑपरेटिंग सिस्टम और सॉफ्टवेयर: भारत के 95% से अधिक स्मार्टफोन 'एंड्रॉयड' (गूगल) या 'आईओएस' (एप्पल) पर चलते हैं। कंप्यूटरों में माइक्रोसॉफ्ट विंडोज का एकाधिकार है। हार्डवेयर और सेमीकंडक्टर: सर्वर्स, राउटर्स, और कंप्यूटर चिप्स (Semiconductors) के लिए भारत पूरी तरह विदेशी आयात पर निर्भर है। भारत के आम आदमी पर असर भारतीय प्रतिभाओं का बाहर जाना और विदेशी तकनीक पर निर्भर रहना देश के लिए कई तरह के जोखिम पैदा करता है: आर्थिक नुकसान (Capital Outflow): भारतीय कंपनियां और सरकार हर साल अरबों डॉलर विदेशी टेक कंपनियों को उनकी सेवाओं (सॉफ्टवेयर लाइसेंस, क्लाउड स्टोरेज) के लिए चुकाती हैं। यह पैसा देश के विकास में लग सकता था, जिससे आम लोगों को लाभ होता, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा। साइबर सुरक्षा और संप्रभुता का खतरा: जब मुख्य तकनीकी ढांचा विदेशी कंपनियों के नियंत्रण में होता है, तो देश का संवेदनशील डेटा सुरक्षित नहीं रहता। युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव की स्थिति में ये कंपनियां अपनी सेवाएं रोक भी सकती हैं। इनोवेशन का नुकसान: भारत के पास अपनी समस्याओं जैसे कृषि, स्थानीय स्वास्थ्य और ग्रामीण शिक्षा के समाधान के लिए स्वदेशी और कस्टमाइज्ड तकनीक विकसित करने की गति धीमी हो जाती है। क्या बदल रही है स्थिति? पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार और घरेलू उद्योगों ने इस कमी को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए हैं: स्टार्टअप इकोसिस्टम का उदय: भारत अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है। फ्लिपकार्ट, जोमैटो, और यूपीआई (UPI) जैसे स्वदेशी प्लेटफॉर्म्स ने देश में ही उच्च स्तर के रोजगार और इनोवेशन पैदा किए हैं, जिससे कई प्रोफेशनल्स अब भारत में रुक रहे हैं या वापस लौट रहे हैं। सेमीकंडक्टर मिशन: भारत सरकार ने देश के भीतर ही माइक्रोचिप्स और सेमीकंडक्टर बनाने के लिए अरबों डॉलर के प्रोत्साहन (PLI Scheme) की घोषणा की है, ताकि हार्डवेयर के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल की जा सके। स्वदेशी विकल्प: 'डेटा स्थानीयकरण' (Data Localization) और 'डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर' (जैसे UPI, ONDC) के जरिए भारत विदेशी कंपनियों के एकाधिकार को चुनौती दे रहा है। देश को कैसे मिलेगा भारतीय प्रतिभाओं का लाभ भारतीय प्रतिभाओं का विदेशों में डंका बजना गर्व की बात है, लेकिन यह तब तक अधूरा है जब तक उस प्रतिभा का लाभ खुद भारत को न मिले। भारत को केवल 'सुपर-कंज्यूमर' बनने के बजाय 'सुपर-क्रिएटर' बनना होगा। इसके लिए देश के भीतर ही रिसर्च, बेहतर वेतन और विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर देना अनिवार्य है, ताकि देश की प्रतिभा देश के ही काम आ सके। डेटा ही इस सदी का 'नया तेल' (New Oil) है। जब तक भारत पूरी तरह से 'डेटा आत्मनिर्भर' नहीं बन जाता और अपने घरेलू क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत नहीं करता, तब तक साइबर सुरक्षा और हैकिंग का यह अदृश्य खतरा देश पर मंडराता रहेगा।
नई दिल्ली: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड Central Board of Secondary Education ने कक्षा 10वीं की सेकेंड बोर्ड परीक्षा (CBSE 10th May Exam 2026) के लिए List of Candidates (LOC) सबमिशन प्रक्रिया शुरू कर दी है। बोर्ड के आधिकारिक नोटिफिकेशन के अनुसार, स्कूल अब छात्रों का डेटा आधिकारिक वेबसाइट cbse.gov.in पर जाकर जमा कर सकते हैं। यह प्रक्रिया उन छात्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है जो मई 2026 में आयोजित होने वाली सेकेंड बोर्ड परीक्षा में शामिल होना चाहते हैं। बोर्ड ने साफ किया है कि LOC सबमिशन विंडो 20 अप्रैल 2026 तक ही खुली रहेगी। परीक्षा और फीस से जुड़ी महत्वपूर्ण तारीखें सीबीएसई द्वारा जारी शेड्यूल के मुताबिक: पहले और दूसरे चरण के लिए परीक्षा शुल्क जमा करने की अंतिम तिथि: 16 अप्रैल से 20 अप्रैल 2026 तीसरे चरण के लिए शुल्क जमा करने की तिथि: 21 और 22 अप्रैल 2026 स्कूलों को निर्धारित समय सीमा के भीतर सभी प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी, ताकि छात्रों की परीक्षा में भागीदारी सुनिश्चित की जा सके। सेकेंड बोर्ड परीक्षा के लिए जारी गाइडलाइंस बोर्ड ने इस बार परीक्षा प्रक्रिया को लेकर कई अहम दिशा-निर्देश जारी किए हैं: जिन छात्रों का नाम पहले फेज की LOC में शामिल नहीं हुआ था, वे अब सेकेंड बोर्ड परीक्षा के लिए आवेदन कर सकते हैं और परीक्षा शुल्क जमा कर सकते हैं। जिन छात्रों का नाम पहले ही दर्ज है, उन्हें केवल परीक्षा शुल्क जमा करना होगा। जो छात्र सेकेंड परीक्षा में शामिल नहीं होना चाहते, वे अपना नाम वापस ले सकते हैं। गणित विषय में बदलाव की सुविधा भी दी गई है। छात्र Mathematics Standard से Mathematics Basic और इसके उलट बदलाव कर सकते हैं। अन्य विषयों में किसी प्रकार का बदलाव मान्य नहीं होगा। किन छात्रों को मिलेगा मौका बोर्ड के अनुसार, जो छात्र मुख्य परीक्षा में उत्तीर्ण हो चुके हैं और अपने अंकों में सुधार करना चाहते हैं, वे तीन विषयों में से किसी भी दो विषयों की पुनः परीक्षा दे सकते हैं, जिनमें विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान और भाषाएं शामिल हैं। हालांकि, Essential Repeat (ER) कैटेगरी में आने वाले छात्र इस सेकेंड बोर्ड परीक्षा के लिए पात्र नहीं होंगे। CBSE 10वीं रिजल्ट का प्रदर्शन इस वर्ष कक्षा 10वीं का परिणाम काफी बेहतर रहा है। कुल 23,16,008 छात्रों ने परीक्षा उत्तीर्ण की है और ओवरऑल पास प्रतिशत 93.70 दर्ज किया गया है। लड़कियों का पास प्रतिशत: 94.99 लड़कों का पास प्रतिशत: 92.69 क्षेत्रीय प्रदर्शन में त्रिवेंद्रम और विजयवाड़ा सबसे आगे रहे, जहां पास प्रतिशत 99.79 दर्ज किया गया।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।