मुंबई: अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे के कथित गबन के मामले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) प्रमुख उद्धव ठाकरे और कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर निशाना साधते हुए मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। वहीं कांग्रेस ने इस प्रकरण की जांच सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीश से कराने की मांग उठाई है। उद्धव ठाकरे का बीजेपी पर तंज महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा कि कुछ लोग नारा देते हैं, "अयोध्या तो बस एक झांकी थी, अभी काशी और मथुरा बाकी है", लेकिन मौजूदा घटनाक्रम को देखते हुए अब उन्हें इन धार्मिक स्थलों की भी चिंता हो रही है। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज किसी भी व्यक्ति को मंदिरों के नाम पर भ्रष्टाचार या गड़बड़ी करने की अनुमति नहीं देगा। उद्धव ठाकरे ने कहा, "हम निडर, मासूम और देश से प्रेम करने वाले हिंदू हैं, लेकिन बेवकूफ नहीं। अगर कोई हिंदुत्व के नाम पर मंदिरों को लूटने की कोशिश करेगा तो हिंदू समाज उसे माफ नहीं करेगा।" उन्होंने केंद्र सरकार पर भी निशाना साधते हुए कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन पर हिंदुओं के हितों की रक्षा की जिम्मेदारी है, उन्हीं पर सवाल उठ रहे हैं। 'चोरी का मामला सुलझने तक शांत नहीं बैठेंगे' उद्धव ठाकरे ने कहा कि शिवसेना (UBT) इस मामले को गंभीरता से उठा रही है और जब तक पूरे मामले की सच्चाई सामने नहीं आती तथा दोषियों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक उनकी पार्टी शांत नहीं बैठेगी। उन्होंने कहा कि बालासाहेब ठाकरे ने हिंदुओं को जागरूक करने का काम किया था और मंदिरों से जुड़े मामलों में भ्रष्टाचार स्वीकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस ने भी साधा निशाना कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी राम मंदिर चढ़ावा विवाद को लेकर भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा की राजनीति तीन बातों पर आधारित है— वोट चोरी, सीट चोरी, और चंदा चोरी। जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की चुप्पी पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इतने गंभीर मामले पर सरकार की ओर से स्पष्ट प्रतिक्रिया आनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के जज से जांच की मांग कांग्रेस ने इस मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के किसी मौजूदा न्यायाधीश की निगरानी में कराने की मांग की है। जयराम रमेश ने कहा कि यदि चढ़ावे में गड़बड़ी के आरोप सही हैं, तो पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होनी चाहिए तथा दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। क्या है पूरा मामला? राम मंदिर में चढ़ावे के कथित गबन का मामला उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) की प्रारंभिक रिपोर्ट के बाद सामने आया था। इसके आधार पर 25 जून को एफआईआर दर्ज की गई। अब तक पुलिस इस मामले में 8 आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है। पुलिस के अनुसार, छह आरोपियों के पास से लगभग 80 लाख रुपये नकद और कुछ विदेशी मुद्रा बरामद की गई है। मामले की जांच फिलहाल जारी है और ट्रस्ट तथा जांच एजेंसियों की ओर से आगे की कार्रवाई की जा रही है। राजनीतिक दल इस मुद्दे को लेकर लगातार एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं।
चंडीगढ़: पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले हुए नगर निकाय चुनावों में आम आदमी पार्टी (AAP) ने मजबूत प्रदर्शन करते हुए अपनी राजनीतिक पकड़ और मजबूत कर ली है। पार्टी ने होशियारपुर नगर निगम और जलालाबाद नगर परिषद में शानदार जीत दर्ज कर विपक्षी दलों को बड़ा झटका दिया है। होशियारपुर नगर निगम में AAP का दबदबा होशियारपुर नगर निगम की 50 सीटों में से आम आदमी पार्टी ने 35 सीटों पर जीत हासिल कर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। चुनाव परिणाम के अनुसार— AAP: 35 सीटें कांग्रेस: 9 सीटें भाजपा: 3 सीटें निर्दलीय: 3 सीटें होशियारपुर में इस चुनाव के दौरान करीब 60.5 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व आम आदमी पार्टी के विधायक ब्रह्म शंकर जिम्पा करते हैं। जलालाबाद में भी AAP की बड़ी सफलता आम आदमी पार्टी ने जलालाबाद नगर परिषद की 17 में से 12 सीटों पर जीत दर्ज की। पार्टी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि बताते हुए कहा कि जलालाबाद लंबे समय तक शिरोमणि अकाली दल (SAD) के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल का मजबूत राजनीतिक गढ़ माना जाता रहा है। बदलते राजनीतिक समीकरण जलालाबाद सीट पर 2017 के विधानसभा चुनाव में सुखबीर सिंह बादल ने वर्तमान मुख्यमंत्री भगवंत मान को हराया था। हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार जगदीप कंबोज ने सुखबीर बादल को 30,930 वोटों के बड़े अंतर से पराजित कर राजनीतिक समीकरण बदल दिए थे। नगर परिषद चुनाव में मिली ताजा जीत को भी इसी राजनीतिक बदलाव की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है। निकाय चुनावों में लगातार मजबूत प्रदर्शन इससे पहले मई 2026 में हुए पंजाब के नगर निकाय चुनावों में भी आम आदमी पार्टी ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया था। उस दौरान पार्टी ने राज्य के— 8 नगर निगम, 75 नगर परिषद, और 19 नगर पंचायतों के चुनावों में भी महत्वपूर्ण सफलता हासिल की थी। 2027 चुनाव से पहले बढ़ा AAP का मनोबल होशियारपुर और जलालाबाद में मिली जीत को आम आदमी पार्टी के लिए 2027 विधानसभा चुनाव से पहले एक सकारात्मक राजनीतिक संकेत माना जा रहा है। वहीं, कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के लिए यह परिणाम संगठनात्मक रणनीति और जनाधार को मजबूत करने की चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
पणजी: दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस पर लगातार हमलावर रहने वाली आम आदमी पार्टी (AAP) अब गोवा में उसी कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन की संभावनाएं तलाश रही है। 2027 के गोवा विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी ने संकेत दिए हैं कि भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए विपक्षी एकजुटता जरूरी है। गठबंधन पर अंतिम फैसला गोवा इकाई ही करेगी। केजरीवाल ने राज्य नेतृत्व को दी जिम्मेदारी गोवा दौरे पर पहुंचे AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने गठबंधन के सवाल पर कहा कि इस संबंध में राज्य नेतृत्व निर्णय लेगा। उन्होंने कहा कि प्रदेश अध्यक्ष वाल्मिकी नाइक और उनकी टीम जो फैसला करेगी, पार्टी उसका पूरा समर्थन करेगी। केजरीवाल ने कहा कि गठबंधन से जुड़े सभी सवालों का जवाब गोवा इकाई ही देगी, क्योंकि स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों को वही बेहतर तरीके से समझती है। गठबंधन वार्ता के लिए बनी तीन सदस्यीय समिति AAP ने संभावित चुनावी गठबंधन पर बातचीत के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है। इसमें प्रदेश अध्यक्ष वाल्मिकी नाइक, कार्यकारी अध्यक्ष गर्सन गोम्स और संगठन सचिव प्रशांत नाइक शामिल हैं। यह समिति कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों के साथ प्री-पोल गठबंधन की संभावनाओं पर चर्चा करेगी। पार्टी का कहना है कि उसकी लड़ाई किसी एक दल से नहीं, बल्कि भाजपा की नीतियों और विचारधारा के खिलाफ है। AAP ने विपक्षी दलों से व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर एकजुट होने की अपील भी की है। कांग्रेस ने भी छोड़े बातचीत के दरवाजे खुले गोवा प्रदेश कांग्रेस ने भी गठबंधन की संभावना से इनकार नहीं किया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गिरीश चोडणकर ने कहा कि भाजपा को चुनौती देने के लिए विपक्षी वोटों का बिखराव रोकना जरूरी है और इस दिशा में बातचीत की जा सकती है। बदलते राजनीतिक समीकरणों पर नजर दिल्ली, पंजाब और गुजरात में कांग्रेस के खिलाफ आक्रामक राजनीति करने वाली AAP का गोवा में बदला हुआ रुख राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। माना जा रहा है कि यदि कांग्रेस और AAP के बीच चुनावी समझौता होता है, तो 2027 के गोवा विधानसभा चुनाव में विपक्ष भाजपा के सामने अधिक मजबूत चुनौती पेश कर सकता है।
मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में दल-बदल का दौर जारी है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के पूर्व विधायक Sachin Ahir ने मुख्यमंत्री Eknath Shinde के नेतृत्व वाली शिवसेना का दामन थाम लिया है। उनके इस कदम को Uddhav Thackeray के लिए एक और बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। पार्टी में शामिल होने के तुरंत बाद सचिन अहीर ने महाराष्ट्र विधान परिषद के उपसभापति (डिप्टी चेयरमैन) पद के लिए अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया। श्रीकांत शिंदे ने की पुष्टि शिवसेना सांसद Shrikant Shinde ने सचिन अहीर के पार्टी में शामिल होने की पुष्टि करते हुए बताया कि उन्हें आधिकारिक तौर पर शिवसेना की सदस्यता दिलाई गई है और उपसभापति पद के चुनाव के लिए पार्टी का उम्मीदवार बनाया गया है। कांग्रेस से शिवसेना तक का राजनीतिक सफर सचिन अहीर ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से की थी। इसके बाद वह Nationalist Congress Party (एनसीपी) में शामिल हुए और बाद में अविभाजित शिवसेना का हिस्सा बने। उन्हें लंबे समय तक Aaditya Thackeray के करीबी नेताओं में गिना जाता रहा। खासकर जब आदित्य ठाकरे ने वर्ली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था, तब सचिन अहीर उनकी टीम के अहम सदस्य माने जाते थे। यूबीटी की मुश्किलें बढ़ीं साल 2022 में शिवसेना में हुई बड़ी टूट के बाद से उद्धव ठाकरे गुट लगातार नेताओं और जनप्रतिनिधियों के पार्टी छोड़ने की चुनौती का सामना कर रहा है। हाल के दिनों में भी शिवसेना (यूबीटी) के कई नेताओं और सांसदों के शिंदे गुट में शामिल होने की खबरें सामने आई हैं। ऐसे में सचिन अहीर का पार्टी छोड़ना उद्धव ठाकरे के संगठनात्मक आधार के लिए एक और झटका माना जा रहा है। राजनीतिक संकेत राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधान परिषद उपसभापति चुनाव से ठीक पहले सचिन अहीर का शिंदे गुट में शामिल होना केवल व्यक्तिगत राजनीतिक फैसला नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की बदलती राजनीतिक रणनीतियों का संकेत भी है। इससे एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना की स्थिति और मजबूत होती दिखाई दे रही है, जबकि उद्धव ठाकरे गुट के सामने संगठन को मजबूत बनाए रखने की चुनौती और बढ़ गई है।
हैदराबाद: तेलंगाना में फीस रीइंबर्समेंट (शुल्क प्रतिपूर्ति) और लंबित छात्रवृत्ति जारी करने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के कार्यकर्ताओं और छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज किया और कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया। TGCHE कार्यालय के बाहर हुआ प्रदर्शन एएनआई के अनुसार, एबीवीपी के नेतृत्व में बड़ी संख्या में छात्र तेलंगाना राज्य उच्च शिक्षा परिषद (TGCHE) के कार्यालय के बाहर एकत्र हुए। प्रदर्शनकारी वर्ष 2022-23 से 2025-26 के बीच लंबित फीस रीइंबर्समेंट और छात्रवृत्ति की राशि जारी करने की मांग कर रहे थे। छात्रों का कहना है कि आर्थिक सहायता समय पर नहीं मिलने से हजारों विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और कई छात्र पढ़ाई बीच में छोड़ने की स्थिति में पहुंच गए हैं। पुलिस पर लाठीचार्ज का आरोप एबीवीपी नेताओं का आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने बल प्रयोग करते हुए कार्यकर्ताओं पर लाठीचार्ज किया। संगठन का दावा है कि कई छात्रों और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेकर अलग-अलग पुलिस थानों में भेजा गया। पुलिस की ओर से इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। सरकार पर लगाए गंभीर आरोप प्रदर्शनकारी छात्रों और एबीवीपी ने कांग्रेस सरकार पर फीस रीइंबर्समेंट योजना को कमजोर करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि सरकार छात्रों के भविष्य की अनदेखी कर रही है और लंबित भुगतान जारी करने में लगातार देरी हो रही है। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो पूरे तेलंगाना में व्यापक छात्र आंदोलन शुरू किया जाएगा। 12 हजार करोड़ रुपये बकाया होने का दावा छात्र संगठनों का दावा है कि राज्य सरकार पर निजी कॉलेजों का करीब 12,000 करोड़ रुपये का फीस रीइंबर्समेंट बकाया है। उनका कहना है कि पिछले तीन-चार वर्षों से कई कॉलेजों और छात्रों को नियमित रूप से छात्रवृत्ति और शुल्क प्रतिपूर्ति की राशि नहीं मिल रही है। इसके चलते शैक्षणिक संस्थानों और विद्यार्थियों दोनों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। पहले भी उठ चुका है यह मुद्दा फीस रीइंबर्समेंट और छात्रवृत्ति में देरी का मुद्दा तेलंगाना में नया नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में भी छात्र संगठनों ने कई बार इस मुद्दे पर प्रदर्शन और धरने दिए हैं। सरकारें बदलने के बावजूद यह समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी है। ताजा प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई के बाद एक बार फिर राज्य में छात्र राजनीति तेज हो गई है। विपक्षी दल भी इस मुद्दे को लेकर सरकार पर निशाना साध रहे हैं, जबकि छात्रों की मांग है कि लंबित राशि जल्द जारी कर उनकी पढ़ाई प्रभावित होने से बचाई जाए।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को लेकर लगाए गए 'गुमशुदा' पोस्टरों ने राजनीतिक विवाद को हवा दे दी है। शहर के कई इलाकों में लगाए गए इन पोस्टरों में राहुल गांधी की तस्वीर के साथ उन्हें "गुमशुदा" बताया गया है और उनकी विदेश यात्राओं को लेकर तंज कसा गया है। इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। पोस्टरों में क्या लिखा है? दिल्ली में लगाए गए पोस्टरों में बड़े अक्षरों में "गुमशुदा" लिखा गया है। पोस्टर में राहुल गांधी की तस्वीर के साथ लिखा गया है: नाम: राहुल गांधी पहचान: हमेशा विदेश में पाए जाते हैं। किसी पब में हो सकते हैं, किसी बीच पर हो सकते हैं। तलाश जारी है। इन पोस्टरों के सामने आने के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। बीजेपी ने राहुल गांधी पर साधा निशाना बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर राहुल गांधी को निशाने पर लेते हुए उन्हें "पर्यटन का नेता" और "लापता राहुल बाबा" बताया। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में बिना छुट्टी लिए लगातार काम किया है, जबकि राहुल गांधी महत्वपूर्ण राजनीतिक अवसरों पर अक्सर विदेश यात्राओं पर चले जाते हैं। पूनावाला ने आरोप लगाया कि जब संसद, देश या उनकी पार्टी को उनकी जरूरत होती है, तब राहुल गांधी विदेश में होते हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि राहुल गांधी की विदेश यात्राओं का खर्च किस स्रोत से उठाया जाता है। अर्जुन राम मेघवाल ने भी किया हमला केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने भी पोस्टरों के मुद्दे पर राहुल गांधी की आलोचना की। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी का तरीका "झूठ बोलो और फिर भाग जाओ" जैसा हो गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी कई बार ऐसे मुद्दों पर राजनीति करते हैं, जिनसे देश में भ्रम और अशांति फैलती है। उन्होंने कहा कि यदि किसी नीति या परीक्षा व्यवस्था पर सुझाव हैं तो उन्हें रचनात्मक तरीके से रखा जाना चाहिए। कांग्रेस की ओर से नहीं आई प्रतिक्रिया पोस्टर विवाद पर कांग्रेस की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद सत्र और आगामी राजनीतिक कार्यक्रमों के बीच यह मुद्दा सियासी बहस का हिस्सा बना रह सकता है। दिल्ली में लगे इन पोस्टरों ने एक बार फिर राहुल गांधी की विदेश यात्राओं को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को तेज कर दिया है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर कांग्रेस और बीजेपी के बीच बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।
नई दिल्ली: कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने पासपोर्ट को लेकर केंद्र सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए इसे "अजीब कानूनी विरोधाभास" बताया है। उन्होंने कहा कि जब सरकार पासपोर्ट जारी करने से पहले सभी दस्तावेजों और पहचान की विस्तृत जांच करती है, तो फिर उसी पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना आम लोगों के लिए भ्रम पैदा करता है। थरूर ने सरकार से कानून में संशोधन कर पासपोर्ट और आधार को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनाने की मांग की है। पासपोर्ट को लेकर सरकार के रुख पर उठाए सवाल शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जाता, जबकि इसे जारी करने से पहले सरकार व्यापक सत्यापन प्रक्रिया अपनाती है। उन्होंने कहा कि यदि इतनी जांच के बाद भी पासपोर्ट नागरिकता साबित नहीं करता, तो यह कानूनी व्यवस्था में गंभीर विरोधाभास को दर्शाता है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि इस भ्रम को दूर करने के लिए कानून में आवश्यक बदलाव किए जाएं। आधार कार्ड को लेकर भी जताई चिंता थरूर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि आधार केवल पहचान और पते का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं। ऐसे में करोड़ों भारतीयों के पास सरकारी दस्तावेज तो हैं, लेकिन नागरिकता साबित करने के लिए कोई स्पष्ट और अंतिम दस्तावेज नहीं है। उनका कहना है कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर नागरिकता का वैध और अंतिम प्रमाण कौन-सा दस्तावेज है। कानून में संशोधन की मांग कांग्रेस सांसद ने मांग की कि केंद्र सरकार कानून में बदलाव कर भारतीय पासपोर्ट और सामान्य आधार कार्ड को नागरिकता का वैध और अंतिम प्रमाण घोषित करे। उनका कहना है कि इससे नागरिकों को विभिन्न सरकारी प्रक्रियाओं में बार-बार अपनी नागरिकता साबित करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और प्रशासनिक व्यवस्था भी सरल होगी। गैर-नागरिकों के लिए अलग आधार कार्ड का सुझाव शशि थरूर ने यह भी सुझाव दिया कि भारत में रहने वाले गैर-नागरिकों के लिए अलग रंग या अलग पहचान वाला आधार कार्ड जारी किया जाए। उनका मानना है कि इससे नागरिकों और गैर-नागरिकों के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकेगा और सरकारी एजेंसियों के लिए पहचान संबंधी प्रक्रियाएं आसान होंगी। सरकार ने क्या कहा? केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट मुख्य रूप से विदेश यात्रा के लिए जारी किया जाने वाला दस्तावेज है, न कि नागरिकता का अंतिम प्रमाण। सरकार का कहना है कि यह कोई नया नियम नहीं है, बल्कि लंबे समय से लागू कानूनी व्यवस्था का हिस्सा है। सरकार ने अपने पक्ष के समर्थन में पासपोर्ट अधिनियम, 1967 और 2013 के बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पासपोर्ट जारी किया जाना अपने आप में नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जा सकता।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान नीति के मोर्चे पर बड़ी राजनीतिक जीत मिली है। अमेरिकी सीनेट ने उस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया, जिसका उद्देश्य राष्ट्रपति की ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने की शक्तियों पर कांग्रेस का नियंत्रण बढ़ाना था। मतदान के दौरान दो रिपब्लिकन सीनेटरों के अंतिम समय में रुख बदलने से ट्रंप प्रशासन को राहत मिल गई। प्रस्ताव के रुकने के बाद ट्रंप ने इसे ईरान के लिए "कड़ा संदेश" बताया और अपने सहयोगी सांसदों का धन्यवाद किया। ट्रंप ने जताई खुशी, बोले- ईरान के लिए चेतावनी सीनेट में मतदान के बाद ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, "वाह! सीनेट ने ईरान पर अपना वोट बदल दिया। रैंड पॉल और बिल कैसिडी ने अपना रुख बदला। नेता जॉन थ्यून, लिंडसे ग्राहम, बर्नी मोरेनो और सभी का धन्यवाद। यह वोट ईरान के लिए एक चेतावनी है।" ट्रंप का कहना है कि राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियों को सीमित करने वाला प्रस्ताव अमेरिका की कूटनीतिक और रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता था। राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों पर लगाम लगाने की कोशिश नाकाम सीनेट में पेश किए गए इस प्रस्ताव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि ईरान के खिलाफ किसी भी बड़े सैन्य अभियान से पहले कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी आवश्यक हो। सीनेट ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया और इस तरह राष्ट्रपति की मौजूदा युद्ध शक्तियों को सीमित करने की कोशिश फिलहाल विफल हो गई। दो रिपब्लिकन सांसदों ने बदला फैसला इस मतदान का सबसे बड़ा मोड़ दो रिपब्लिकन सांसदों के रुख बदलने से आया। सीनेटर रैंड पॉल ने इस बार 'प्रेजेंट' वोट किया, यानी उन्होंने पक्ष या विपक्ष में मतदान नहीं किया। सीनेटर बिल कैसिडी ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के खिलाफ मतदान किया। अंतिम मतदान में प्रस्ताव के पक्ष में पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका और परिणाम 47-50-1 रहा। रैंड पॉल बोले- शांति वार्ता के लिए दिया राष्ट्रपति को मौका मतदान से पहले रैंड पॉल ने सोशल मीडिया पर कहा कि उनकी युद्ध शक्तियों को लेकर राय नहीं बदली है। उन्होंने लिखा कि उनका 'प्रेजेंट' वोट राष्ट्रपति को स्थायी शांति के लिए बातचीत करने की अधिक गुंजाइश देने के उद्देश्य से है। बिल कैसिडी ने पहले उठाए सवाल, फिर बदला रुख सीनेटर बिल कैसिडी ने पहले ट्रंप प्रशासन से ईरान संघर्ष को लेकर कई सवाल पूछे थे। उनका कहना था कि सांसदों और जनता को युद्ध की वास्तविक स्थिति की पूरी जानकारी मिलनी चाहिए। बाद में उन्होंने बताया कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने उन्हें विस्तृत जानकारी दी, जिससे उनकी कई चिंताएं दूर हो गईं। इसके बाद उन्होंने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। कुछ रिपब्लिकन ने किया समर्थन, डेमोक्रेट में भी दिखी अलग राय रिपब्लिकन सीनेटर सुसान कॉलिन्स और लिसा मुर्कोव्स्की ने राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को सीमित करने वाले प्रस्ताव का समर्थन किया। वहीं डेमोक्रेटिक सीनेटर जॉन फेटरमैन ने प्रस्ताव का विरोध किया। इससे साफ हुआ कि ईरान नीति को लेकर मतभेद केवल पार्टी लाइनों तक सीमित नहीं हैं। राष्ट्रपति की शक्तियों पर बहस जारी अमेरिका में राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सांसदों का तर्क है कि यदि कोई फैसला अमेरिका को बड़े सैन्य संघर्ष की ओर ले जा सकता है, तो उसमें कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी अनिवार्य होनी चाहिए। वहीं ट्रंप समर्थकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संकट के समय राष्ट्रपति के पास त्वरित निर्णय लेने की पर्याप्त संवैधानिक शक्तियां बनी रहनी चाहिए। ईरान को लेकर जारी तनाव के बीच सीनेट का यह फैसला ट्रंप प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक जीत माना जा रहा है, जबकि राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को लेकर अमेरिकी कांग्रेस में बहस आगे भी जारी रहने के संकेत हैं।
देश में शिक्षा व्यवस्था और छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर कांग्रेस ने 25 जून को ‘छात्रों की गूंज’ नाम से राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू करने की घोषणा की है। इस अभियान के तहत पार्टी के 28 वरिष्ठ नेता देश के अलग-अलग शहरों में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर शिक्षा क्षेत्र की चुनौतियों और छात्रों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाएंगे। कांग्रेस ने इस अभियान के माध्यम से केंद्र सरकार की शिक्षा नीतियों पर सवाल खड़े करते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की भी मांग की है। शिक्षा सुधार पर राष्ट्रीय बहस शुरू करने की कोशिश अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि अभियान का उद्देश्य देश की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख मुद्दा बनाना है। पार्टी का कहना है कि शिक्षा क्षेत्र में मौजूद चुनौतियों पर गंभीर चर्चा और नीतिगत बदलाव की जरूरत है। कांग्रेस के अनुसार, यह अभियान छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों और शिक्षा से जुड़े सभी हितधारकों की आवाज को राष्ट्रीय मंच प्रदान करने का प्रयास है। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कांग्रेस ने अपने बयान में कहा कि शिक्षा व्यवस्था की मौजूदा स्थिति के लिए केंद्र सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं। पार्टी का आरोप है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान शिक्षा क्षेत्र को प्रभावी दिशा देने में असफल रहे हैं। पार्टी ने कहा कि शिक्षा प्रणाली में सुधार की शुरुआत जवाबदेही तय करने से होनी चाहिए और इसी कारण शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग की जा रही है। केंद्र सरकार पर निजीकरण और केंद्रीकरण को बढ़ावा देने का आरोप कांग्रेस ने भाजपा नीत केंद्र सरकार पर शिक्षा क्षेत्र में निजीकरण, केंद्रीकरण और वैचारिक हस्तक्षेप को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि पिछले वर्षों में शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक और रोजगारोन्मुख बनाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए। कांग्रेस के अनुसार, देश के सामने केवल बेरोजगारी का संकट नहीं है, बल्कि युवाओं की रोजगार क्षमता (Employability) भी एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। 28 शहरों में आयोजित होंगी प्रेस कॉन्फ्रेंस ‘छात्रों की गूंज’ अभियान के तहत देशभर के 28 शहरों में कांग्रेस नेताओं को प्रेस कॉन्फ्रेंस की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से पार्टी शिक्षा नीति, रोजगार, उच्च शिक्षा, कौशल विकास और छात्रों से जुड़े अन्य मुद्दों पर अपनी बात रखेगी। इन नेताओं को मिली जिम्मेदारी कांग्रेस ने विभिन्न शहरों के लिए अपने नेताओं की जिम्मेदारी तय की है। इसके तहत अहमदाबाद में सतेज पाटिल, बेंगलुरु में वर्षा गायकवाड़, भोपाल में इमरान मसूद, भुवनेश्वर में पवन खेड़ा, दिल्ली में गौरव गोगोई, चेन्नई में प्रियंक खड़गे, कोलकाता में सुप्रिया श्रीनेत और पुणे में कन्हैया कुमार प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करेंगे। इसके अलावा अन्य शहरों में भी पार्टी के वरिष्ठ नेता अभियान का नेतृत्व करेंगे। छात्रों और नागरिकों से जुड़ने की कोशिश कांग्रेस का कहना है कि यह अभियान केवल राजनीतिक आलोचना तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के भविष्य को लेकर एक व्यापक राष्ट्रीय संवाद शुरू करने का प्रयास है। पार्टी ने छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों और आम नागरिकों से इस चर्चा का हिस्सा बनने की अपील की है। कांग्रेस के अनुसार, एक आधुनिक, समावेशी और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप शिक्षा प्रणाली विकसित करने के लिए सभी पक्षों की भागीदारी आवश्यक है। ऐसे में ‘छात्रों की गूंज’ अभियान को शिक्षा सुधार के मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर की पहल के रूप में देखा जा रहा है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi के 56वें जन्मदिन के अवसर पर उत्तर प्रदेश के वाराणसी में युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा आयोजित कार्यक्रम ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी को भगवान परशुराम के रूप में चित्रित किया गया, जिस पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कड़ी आपत्ति जताई है। वाराणसी में अनोखे अंदाज में मनाया गया जन्मदिन वाराणसी में गंगा घाट पर युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी का जन्मदिन प्रतीकात्मक हिंदू रीति-रिवाजों के साथ मनाया। इस दौरान उनकी एक तस्वीर प्रदर्शित की गई, जिसमें उन्हें भगवान परशुराम के स्वरूप में दिखाया गया था। तस्वीर में राहुल गांधी के एक हाथ में फरसा और दूसरे हाथ में भारतीय संविधान की प्रति दिखाई गई। कार्यकर्ताओं ने तस्वीर पर दूध अर्पित कर जन्मदिन मनाया, जिसकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गए। BJP ने जताई कड़ी आपत्ति भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता Shehzad Poonawalla ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे हिंदू धर्म और उसकी आस्थाओं का अपमान बताया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि कांग्रेस के लिए राहुल गांधी भगवान हो सकते हैं, लेकिन हिंदुओं के लिए नहीं। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी को भगवान परशुराम के रूप में चित्रित करना हिंदू धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला कदम है। कांग्रेस पर लगाए गंभीर आरोप शहजाद पूनावाला ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर हिंदू परंपराओं का लगातार अपमान करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने समय-समय पर हिंदू परंपराओं, धार्मिक प्रतीकों और मान्यताओं पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने अतीत में "हिंदू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया और कई अवसरों पर हिंदू धार्मिक आयोजनों को लेकर विवादित टिप्पणियां कीं। कांग्रेस की ओर से नहीं आई आधिकारिक प्रतिक्रिया इस विवाद पर समाचार लिखे जाने तक कांग्रेस की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी।पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि राहुल गांधी को भगवान परशुराम के रूप में दिखाने का उद्देश्य सामाजिक न्याय, संविधान और समानता के संदेश को प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत करना था। राजनीतिक बहस तेज राहुल गांधी के जन्मदिन समारोह के दौरान सामने आई इस तस्वीर ने एक बार फिर धर्म और राजनीति के संबंधों पर बहस छेड़ दी है। भाजपा इसे धार्मिक भावनाओं से जुड़ा मुद्दा बता रही है, जबकि कांग्रेस समर्थक इसे प्रतीकात्मक राजनीतिक अभिव्यक्ति के रूप में देख रहे हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद राजनीतिक रूप से और तूल पकड़ सकता है, खासकर ऐसे समय में जब देश में विभिन्न दल धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के इस्तेमाल को लेकर एक-दूसरे पर लगातार निशाना साध रहे हैं।
कर्नाटक विधान परिषद (एमएलसी) चुनाव के नतीजों के बाद राज्य की राजनीति में बड़ा सियासी भूचाल आ गया है। 7 सीटों में से 5 पर कांग्रेस की जीत ने जहां पार्टी की स्थिति मजबूत की है, वहीं एनडीए खेमे में हुई क्रॉस-वोटिंग ने बीजेपी और जेडी(एस) के भीतर गंभीर मतभेदों को उजागर कर दिया है। क्रॉस-वोटिंग से बीजेपी में नाराजगी चुनाव में एनडीए के 11 विधायकों द्वारा पार्टी लाइन के खिलाफ मतदान किए जाने की पुष्टि के बाद बीजेपी नेतृत्व नाराज है। इस क्रॉस-वोटिंग के चलते कांग्रेस को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ मिला और उसने 5 सीटों पर जीत दर्ज की। बीजेपी के भीतर इस घटनाक्रम को अनुशासनहीनता और संगठनात्मक विफलता के रूप में देखा जा रहा है। बीवाई विजयेंद्र को दिल्ली तलब स्थिति की गंभीरता को देखते हुए बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने कर्नाटक बीजेपी अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र को दिल्ली बुलाया है। पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन ने पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है और क्रॉस-वोटिंग के कारणों की जांच के निर्देश दिए हैं। विजयेंद्र ने स्वीकार किया है कि बीजेपी और जेडी(एस) के कुछ विधायकों ने पार्टी व्हिप के खिलाफ जाकर मतदान किया है। उन्होंने साफ किया कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी और किसी को माफ नहीं किया जाएगा। 11 विधायकों ने तोड़ा पार्टी अनुशासन सूत्रों के अनुसार कुल 11 विधायकों ने एनडीए उम्मीदवार के खिलाफ वोटिंग की, जिनमें बीजेपी और जेडी(एस) दोनों के विधायक शामिल हैं। जेडी(एस) के उम्मीदवार गोविंदराजू की हार इस चुनाव का सबसे बड़ा झटका मानी जा रही है। पार्टी के 18 विधायकों के बावजूद उन्हें केवल 14 वोट मिले, जिससे कम से कम चार विधायकों के क्रॉस-वोटिंग करने की पुष्टि होती है। कांग्रेस की सीटों में बढ़ोतरी 75 सदस्यीय विधान परिषद में अब कांग्रेस की स्थिति और मजबूत हो गई है। कांग्रेस: 34 से बढ़कर 39 सीटें बीजेपी: 29 सीटें जेडी(एस): 6 सीटें कांग्रेस ने इस नतीजे को एनडीए के भीतर असंतोष और नेतृत्व संकट का संकेत बताया है। सदन में आरोप-प्रत्यारोप तेज बीजेपी ने क्रॉस-वोटिंग के पीछे कांग्रेस की रणनीति का आरोप लगाया है, जबकि कांग्रेस ने इसे विपक्षी गठबंधन में गहरी दरार का परिणाम बताया है। विपक्षी नेता चालावाड़ी नारायणस्वामी ने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि सत्ता पक्ष को लाभ पहुंचाने वाला वोट लोकतांत्रिक है, तो विपक्षी वोटिंग को असंवैधानिक कैसे कहा जा सकता है। राजनीतिक असर कर्नाटक एमएलसी चुनाव परिणामों ने राज्य की राजनीति में नए समीकरण खड़े कर दिए हैं। बीजेपी जहां आंतरिक अनुशासन को लेकर दबाव में है, वहीं कांग्रेस इस परिणाम को अपनी बड़ी राजनीतिक जीत के रूप में देख रही है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक सियासी सरगर्मी और बढ़ने की संभावना है।
नई दिल्ली: लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी शुक्रवार (19 जून, 2026) को 56 वर्ष के हो गए। उनके जन्मदिन के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें शुभकामनाएं दीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए राहुल गांधी को जन्मदिन की बधाई दी। प्रधानमंत्री ने लिखा, "लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को जन्मदिन की शुभकामनाएं। उनके अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करता हूं।" 56 साल के हुए राहुल गांधी राहुल गांधी का जन्म 19 जून, 1970 को नई दिल्ली में हुआ था। वह पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के पुत्र हैं। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश की रायबरेली लोकसभा सीट से सांसद हैं और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। राहुल गांधी पिछले 22 वर्षों से सक्रिय राजनीति में हैं और कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। मल्लिकार्जुन खरगे ने बताया प्रेरणास्रोत कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने X पर पोस्ट कर राहुल गांधी को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने लिखा कि संविधान के आदर्शों के प्रति राहुल गांधी की अटूट निष्ठा और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए उनका संघर्ष लाखों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत रहा है। खरगे ने कहा कि समावेशिता, सामाजिक न्याय, सद्भाव और करुणा की कांग्रेस पार्टी की परंपरा राहुल गांधी के सार्वजनिक जीवन और नेतृत्व में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि जनता के बीच निरंतर संवाद और सत्ता के सामने निर्भीक होकर सच बोलने के कारण राहुल गांधी ने समाज के कमजोर और हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज को मजबूती से उठाया है। पवन खेड़ा ने राहुल गांधी के संघर्ष को सराहा कांग्रेस के मीडिया एवं प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने भी राहुल गांधी को जन्मदिन की बधाई दी। उन्होंने कहा कि बहुत कम नेताओं ने लंबे समय तक इतनी तीखी आलोचना और लगातार सार्वजनिक जांच-परख का सामना किया है। पवन खेड़ा ने कहा, "ऐसी परिस्थितियों में अधिकांश लोग सार्वजनिक जीवन से पीछे हट जाते हैं, लेकिन राहुल गांधी को कमजोर करने का हर प्रयास उनके संकल्प को और मजबूत करता गया, उनकी राजनीति को और परिपक्व बनाता गया तथा जनता से उनके संबंध को और गहरा करता गया।" राहुल गांधी के जन्मदिन के अवसर पर देशभर से कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने भी उन्हें शुभकामनाएं दीं और उनके लंबे एवं स्वस्थ जीवन की कामना की।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष में एक नए राजनीतिक और कानूनी विवाद के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस नेता प्रियांक खरगे ने संघ प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर सवाल उठाया है कि देश का सबसे बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करने वाला RSS आज तक औपचारिक रूप से पंजीकृत (Registered) क्यों नहीं हुआ। खरगे ने संगठन की फंडिंग, टैक्स अनुपालन और सार्वजनिक जवाबदेही पर भी सवाल खड़े किए हैं। प्रियांक खरगे ने कहा कि जब नागरिकों, गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), ट्रस्टों, मंदिरों और कंपनियों को कानून के तहत पंजीकरण, लेखा-परीक्षा और पारदर्शिता के नियमों का पालन करना पड़ता है, तो RSS को इससे अलग क्यों रखा जाए। उन्होंने कहा कि 60,000 से अधिक शाखाओं और करोड़ों स्वयंसेवकों का दावा करने वाले संगठन को भी संवैधानिक जवाबदेही के मानकों पर खरा उतरना चाहिए। संघ का पक्ष: रजिस्ट्रेशन कभी अनिवार्य नहीं रहा विवाद के बीच संघ प्रमुख मोहन भागवत ने स्पष्ट किया है कि RSS की स्थापना 1925 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी, जब संगठन के पंजीकरण को लेकर कोई अनिवार्य कानूनी व्यवस्था नहीं थी। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भी ऐसा कोई कानून नहीं बनाया गया, जिसने RSS के लिए रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य बनाया हो। भागवत के अनुसार, RSS सरकार से कोई अनुदान या वित्तीय लाभ नहीं लेता और एक स्वैच्छिक संगठन के रूप में कार्य करता है। उन्होंने कहा कि संघ अपने वित्तीय लेन-देन का पूरा रिकॉर्ड रखता है और यदि सरकार कभी जानकारी मांगे तो वह अपना पूरा हिसाब-किताब प्रस्तुत कर सकता है। गुरु दक्षिणा पर नहीं लगता टैक्स RSS की आय का प्रमुख स्रोत ‘गुरु दक्षिणा’ है, जो स्वयंसेवकों द्वारा हर वर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर पर स्वेच्छा से दिया जाने वाला आर्थिक योगदान है। संघ का तर्क है कि यह व्यावसायिक आय नहीं, बल्कि स्वयंसेवकों का स्वैच्छिक योगदान है। 1970 के दशक में इस आय पर कर लगाने का प्रयास किया गया था, लेकिन मामला आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) की बंबई पीठ तक पहुंचा। 26 जुलाई 1980 को दिए गए फैसले में न्यायाधिकरण ने माना कि RSS और उसके स्वयंसेवकों के बीच ‘म्यूचुअलिटी’ (Mutuality) का संबंध है, इसलिए गुरु दक्षिणा को कर योग्य आय नहीं माना जा सकता। 'Body of Individuals' के रूप में मान्यता RSS का कहना है कि आयकर अधिकारियों और न्यायालयों ने उसे ‘Body of Individuals’ (BOI) यानी ‘व्यक्तियों का समूह’ माना है। इसका अर्थ यह है कि कुछ व्यक्ति मिलकर एक संगठनात्मक इकाई के रूप में कार्य कर रहे हैं, लेकिन उनका किसी कंपनी, ट्रस्ट या सोसायटी के रूप में पंजीकृत होना आवश्यक नहीं है। संघ नेतृत्व का तर्क है कि इसी आधार पर उस पर आयकर की देनदारी लागू नहीं होती और वह मौजूदा कानूनों के तहत वैध रूप से काम कर रहा है। क्या बिना रजिस्ट्रेशन के संगठन गैरकानूनी हो जाता है? कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी संगठन का गैर-पंजीकृत होना उसे स्वतः गैरकानूनी नहीं बनाता। झारखंड हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अवनीश रंजन मिश्रा के अनुसार, भारत में रजिस्ट्रेशन मुख्य रूप से उन संस्थाओं के लिए आवश्यक होता है, जो सरकार से अनुदान, वित्तीय सहायता या विशेष कानूनी लाभ प्राप्त करना चाहती हैं। ऐसे में केवल रजिस्ट्रेशन न होने के आधार पर RSS को अवैध नहीं कहा जा सकता। क्यों महत्वपूर्ण बन गया है यह विवाद? RSS के रजिस्ट्रेशन को लेकर उठी बहस अब केवल एक कानूनी प्रश्न नहीं रह गई है। यह मुद्दा देश के सबसे प्रभावशाली सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों में से एक की वित्तीय पारदर्शिता, सार्वजनिक जवाबदेही और संस्थागत नियमन से जुड़ गया है। एक ओर आलोचक यह सवाल उठा रहे हैं कि इतने बड़े संगठन को अन्य संस्थाओं की तरह पारदर्शिता के नियमों के दायरे में लाया जाना चाहिए, वहीं RSS का कहना है कि उसने कभी कानून का उल्लंघन नहीं किया और मौजूदा कानूनी ढांचे के भीतर ही अपना कार्य संचालित किया है। RSS के शताब्दी वर्ष में उठा यह विवाद आने वाले दिनों में संगठन की संरचना, वित्तीय जवाबदेही और कानूनी स्थिति पर एक व्यापक राष्ट्रीय बहस को जन्म दे सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की विदेश नीति पर तीखा हमला बोला है। होर्मुज स्ट्रेट के पास एक वाणिज्यिक जहाज पर भारतीय नाविकों की मौत और ओमान के डुक्म बंदरगाह पर एक अन्य भारतीय नागरिक की मृत्यु का हवाला देते हुए राहुल गांधी ने सरकार पर भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए आरोप लगाया कि अमेरिका की कार्रवाई में भारतीय नागरिकों की मौत के बावजूद न तो माफी मांगी गई और न ही भारत सरकार ने कोई सख्त प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि एक स्वतंत्र देश को आदेशात्मक भाषा स्वीकार नहीं करनी चाहिए। ‘कंप्रोमाइज्ड पीएम’ कहकर साधा निशाना कांग्रेस नेता ने अपने पोस्ट में प्रधानमंत्री मोदी को ‘कंप्रोमाइज्ड पीएम’ बताते हुए कहा कि सरकार अमेरिकी दबाव के सामने चुप है और एक ‘आज्ञाकारी नौकर’ की तरह व्यवहार कर रही है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े मुद्दों पर केंद्र सरकार अपेक्षित दृढ़ता नहीं दिखा रही है। उन्होंने लिखा कि विदेशी ताकतें भारतीय नागरिकों को नुकसान पहुंचा रही हैं, जबकि सरकार मौन बनी हुई है। राहुल गांधी ने इसे देश के सम्मान और नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया। भारतीय नागरिक की मौत का भी उठाया मुद्दा राहुल गांधी ने ओमान के डुक्म बंदरगाह पर खड़े एक जहाज पर सवार भारतीय नागरिक निशांत उर्थनाथन की मौत का मुद्दा भी उठाया। मस्कट स्थित भारतीय दूतावास के अनुसार, निशांत उर्थनाथन की मृत्यु बीमारी के कारण हुई और उनका पार्थिव शरीर भारत लाने के लिए आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी की जा रही हैं। इस घटना का उल्लेख करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि विदेशों में मुश्किल परिस्थितियों में फंसे भारतीयों की मदद के लिए सरकार को अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। होर्मुज क्षेत्र में बढ़ा है तनाव हाल के दिनों में होर्मुज स्ट्रेट और ओमान की खाड़ी के आसपास बढ़ते सैन्य तनाव ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा और भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। इस क्षेत्र से होकर बड़ी संख्या में भारतीय नाविक और व्यापारिक जहाज गुजरते हैं, जिसके कारण भारत सरकार लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने पहले भी क्षेत्रीय तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान की आवश्यकता पर जोर दिया है। वहीं, विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार की प्रतिक्रिया और विदेश नीति को लेकर लगातार सवाल उठा रहा है। सियासी बहस तेज राहुल गांधी के इस बयान के बाद भारतीय राजनीति में एक नई बहस छिड़ने की संभावना है। कांग्रेस जहां सरकार की विदेश नीति और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा के मुद्दे पर केंद्र को घेर रही है, वहीं सरकार की ओर से अभी तक राहुल गांधी की ताजा टिप्पणियों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। होर्मुज क्षेत्र में जारी तनाव और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा का मुद्दा आने वाले दिनों में देश की राजनीति और कूटनीतिक चर्चाओं का प्रमुख विषय बना रह सकता है।
नई दिल्ली: कांग्रेस नेता उदित राज ने प्रधानमंत्री Narendra Modi के लंबे कार्यकाल और केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर तीखी आलोचना की है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार विकास और अर्थव्यवस्था से जुड़े आंकड़ों को लेकर भ्रामक तस्वीर पेश कर रही है तथा वास्तविक मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है। उदित राज ने कहा कि किसी भी सरकार का मूल्यांकन उसके कार्यकाल की अवधि से नहीं, बल्कि रोजगार सृजन, महंगाई नियंत्रण, प्रति व्यक्ति आय और आर्थिक अवसरों में सुधार जैसे मानकों से किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, जनता इन मुद्दों पर जवाब चाहती है। GDP आंकड़ों को लेकर सरकार पर निशाना कांग्रेस नेता ने आर्थिक आंकड़ों और विकास दर को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि सरकार अपनी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है और आर्थिक स्थिति की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं रखती। उदित राज ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि आर्थिक आंकड़ों की विश्वसनीयता और पारदर्शिता को लेकर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार आलोचनाओं का जवाब देने के बजाय राजनीतिक मुद्दों को अधिक प्रमुखता देती है। रोजगार और महंगाई को बताया बड़ा मुद्दा कांग्रेस नेता ने कहा कि देश के सामने रोजगार, महंगाई, उत्पादन, निर्यात-आयात और बढ़ते कर्ज जैसे मुद्दे सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। उनके अनुसार, इन विषयों पर व्यापक बहस और ठोस नीतिगत कदमों की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि किसी भी अर्थव्यवस्था का आकलन जाति, धर्म या राजनीतिक नारों के आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक संकेतकों और आम नागरिक के जीवन स्तर में सुधार के आधार पर किया जाना चाहिए। लंबे कार्यकाल पर भी उठाए सवाल उदित राज ने कहा कि लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली सरकार से लोगों की अपेक्षाएं अधिक होती हैं। उनके अनुसार, ऐसे कार्यकाल का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि रोजगार के अवसर कितने बढ़े, महंगाई पर कितना नियंत्रण हुआ और आम लोगों की आय में कितना सुधार आया। फिलहाल कांग्रेस और भाजपा के बीच अर्थव्यवस्था, विकास दर और रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज बनी हुई है। सत्तारूढ़ पक्ष जहां अपनी आर्थिक उपलब्धियों को रेखांकित कर रहा है, वहीं विपक्ष सरकार के दावों पर लगातार सवाल उठा रहा है।
भोपाल, एजेंसियां। मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की एकमात्र उम्मीदवार मिनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा नामांकन खारिज किए जाने के बाद कांग्रेस ने आधी रात को कानूनी रणनीति तैयार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। मामले पर अवकाशकालीन पीठ के समक्ष जल्द सुनवाई की उम्मीद जताई जा रही है। भाजपा की आपत्ति के बाद हुआ फैसला विवाद की शुरुआत भाजपा द्वारा उठाई गई आपत्ति से हुई। भाजपा का आरोप है कि मीनाक्षी नटराजन ने अपने नामांकन पत्र के साथ दाखिल हलफनामे में तेलंगाना से जुड़े एक कानूनी मामले की जानकारी नहीं दी। इसी आधार पर रिटर्निंग ऑफिसर ने उनका नामांकन रद्द कर दिया। हालांकि कांग्रेस ने इस फैसले को पूरी तरह गैरकानूनी और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है। कांग्रेस ने फैसले को बताया साजिश मीनाक्षी नटराजन और कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं है, जिसे चुनावी नियमों के तहत घोषित करना आवश्यक हो। उनका दावा है कि संबंधित मामला केवल एक निजी शिकायत तक सीमित था और अदालत ने उस पर अभी तक संज्ञान भी नहीं लिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि रिटर्निंग ऑफिसर ने सरकार के दबाव में आकर निर्णय लिया। चुनाव आयोग से भी की गई शिकायत वरिष्ठ कांग्रेस नेता Abhishek Manu Singhvi और K. C. Venugopal के नेतृत्व में पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मुलाकात कर विस्तृत ज्ञापन सौंपा। कांग्रेस ने आयोग से हस्तक्षेप कर नामांकन रद्द करने के फैसले की समीक्षा करने की मांग की है। कांग्रेस के सामने बढ़ी चुनौती मीनाक्षी नटराजन राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की एकमात्र उम्मीदवार थीं। नामांकन की अंतिम तिथि समाप्त होने के बाद उनका पर्चा खारिज होने से पार्टी किसी अन्य उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतार सकती। ऐसे में कांग्रेस की उम्मीदें अब सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के फैसले पर टिकी हुई हैं। अब सबकी नजर अदालत पर राजनीतिक और कानूनी रूप से महत्वपूर्ण बन चुके इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला कांग्रेस की आगे की रणनीति तय करेगा। साथ ही चुनाव आयोग भी कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेकर अपना रुख स्पष्ट कर सकता है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी उथल-पुथल के बीच तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बागी गुट ने अपनी ताकत बढ़ने का दावा किया है। बागी गुट के नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि उनके समर्थन वाले विधायकों की संख्या बढ़कर 64 हो गई है। साथ ही उन्होंने टीएमसी के कांग्रेस में विलय से जुड़े सभी कयासों को सिरे से खारिज कर दिया। बागी खेमे ने बढ़ते समर्थन का किया दावा रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि कुछ समय पहले तक उनके साथ 58 विधायक थे, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 64 हो चुकी है। उन्होंने दावा किया कि जल्द ही एक और विधायक उनके गुट में शामिल हो सकता है। उनके मुताबिक, बागी गुट को केवल विधायकों का ही नहीं बल्कि कई सांसदों, जिला स्तर के नेताओं और स्थानीय निकाय प्रतिनिधियों का भी समर्थन प्राप्त है। "असली तृणमूल कांग्रेस हमारे साथ" विधानसभा परिसर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि उनका गुट ही तृणमूल कांग्रेस की वास्तविक राजनीतिक विरासत और संगठनात्मक ताकत का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने कहा, "हम कांग्रेस में शामिल नहीं हो रहे हैं। हम ही असली तृणमूल कांग्रेस हैं और पार्टी के झंडे तथा विचारधारा के साथ आगे बढ़ते रहेंगे।" ममता-सोनिया मुलाकात के बाद तेज हुईं राजनीतिक चर्चाएं हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee और कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष Sonia Gandhi के बीच दिल्ली में हुई मुलाकात के बाद टीएमसी और कांग्रेस के रिश्तों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई थीं। इसके अलावा टीएमसी नेता Abhishek Banerjee और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच हुई बैठकों ने भी दोनों दलों के संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर कयासों को हवा दी थी। रीतब्रत बनर्जी ने स्पष्ट किया कि इन बैठकों का उनके गुट की राजनीतिक दिशा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा जाएगा नया समर्थन पत्र बागी गुट अब अपनी संख्या बल को आधिकारिक रूप से दर्ज कराने की तैयारी में है। सूत्रों के अनुसार, गुट जल्द ही विधानसभा अध्यक्ष को नया समर्थन पत्र सौंप सकता है, जिसमें उनके साथ खड़े विधायकों की अद्यतन संख्या दर्ज होगी। लोकसभा में NDA को समर्थन जारी रहेगा रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि उनके समर्थक सांसद लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का समर्थन जारी रखेंगे। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय राजनीति में उनका रुख पहले की तरह कायम रहेगा और वर्तमान परिस्थितियों में किसी बदलाव की संभावना नहीं है। टीएमसी के सामने गहराता संगठनात्मक संकट राजनीतिक जानकारों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस अपने 28 वर्षों के इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजर रही है। पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इस बीच, टीएमसी और कांग्रेस के बीच संभावित राजनीतिक नजदीकियों को लेकर चर्चाएं जारी हैं, लेकिन बागी गुट ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी प्रकार के विलय या राजनीतिक समझौते का हिस्सा नहीं बनने जा रहा और खुद को ही पार्टी का वास्तविक प्रतिनिधि मानता है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद तृणमूल कांग्रेस यानी TMC में मचे अभूतपूर्व आंतरिक घमासान के बीच देश के सियासी गलियारों में एक नई सुगबुगाहट तेज हो गई है। हाल ही में टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी की कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी से दिल्ली में हुई मुलाकात और उसके बाद अभिषेक बनर्जी व राहुल गांधी की बैठक ने इन चर्चाओं को हवा दे दी है कि क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर सकती हैं? हालांकि टीएमसी और कांग्रेस दोनों ही अधिकारिक तौर पर इसे 'अफवाह' और 'निराधार' बता रहे हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे संकट में घिरी ममता बनर्जी के लिए एक रणनीतिक कदम के रूप में देख रहे हैं। 1998 में कांग्रेस से अलग होकर टीएमसी बनाने वाली ममता बनर्जी अगर आज दोबारा कांग्रेस का दामन थामती हैं, तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे। आइए विश्लेषण करते हैं कि इस संभावित कदम से ममता बनर्जी को कितना फायदा और कितना नुकसान हो सकता है: यदि फायदों की बात करें, तो ममता बनर्जी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा कवच और राजनीतिक वजूद की रक्षा को ध्यान में रखते हुए ये फैसला ले सकती हैं। इससे उन्हें बगावत और बिखराव से बचने का 'सेफ पैसेज' मिल सकता है। दरअसल, हालिया चुनावों में मिली करारी शिकस्त के बाद ममता बनर्जी की पार्टी गहरे संकट में है। टीएमसी के विधायकों और सांसदों में भारी असंतोष है। खबर है कि 20 के करीब लोकसभा सांसद और 60 से अधिक विधायक बागी रुख अपनाए हुए हैं। ऐसी स्थिति में यदि टीएमसी का कांग्रेस में विलय होता है, तो दल-बदल विरोधी कानून मतलब Anti-Defection Law के तहत बागियों के मंसूबों पर पानी फिर सकता है और ममता को अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए एक मजबूत राष्ट्रीय 'मदरशिप' मिल जाएगी। राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका टीएमसी एक क्षेत्रीय दल है, जिसकी ताकत मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल तक ही सीमित रही है। कांग्रेस के साथ आने से ममता बनर्जी और उनके उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी को सीधे राष्ट्रीय राजनीति के मुख्य मंच पर एंट्री मिल जाएगी। वह विपक्षी गठबंधन (INDIA Bloc) और संसद में कांग्रेस के बड़े चेहरे के रूप में उभर सकती हैं, जिससे उनका कद एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होगा। केंद्रीय एजेंसियों और राजनीतिक दबाव से राहत बीजेपी और एनडीए के आक्रामक रुख के सामने फिलहाल ममता बनर्जी राज्य में अकेली पड़ती दिख रही हैं। कांग्रेस जैसी पुरानी और राष्ट्रीय पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और कानूनी सेल का साथ मिलने से वह केंद्रीय जांच एजेंसियों मसलन CBI, ED और अन्य राजनीतिक हमलों का मुकाबला अधिक संस्थागत तरीके से कर पाएंगी। अब यदि इस विलय से होनेवाले नुकसान की बात करें, तो इससे बंगाल में 'दीदी' के ब्रांड और वर्चस्व का अंत होना सुनिश्चित है। इसे 'बंगाल की बेटी' की अपनी पहचान और संप्रभुता का समर्पण ही समझा जायेगा। ममता बनर्जी की पूरी राजनीति 'अस्मिता' और स्वायत्तता पर टिकी है। उन्होंने हमेशा दिल्ली के नियंत्रण के खिलाफ लड़कर अपनी छवि बनाई है। कांग्रेस में विलय का सीधा मतलब होगा कि अब बंगाल टीएमसी के फैसले कोलकाता के हरीश चटर्जी स्ट्रीट से नहीं, बल्कि दिल्ली के 24 अकबर रोड यानी कांग्रेस मुख्यालय से तय होंगे। इससे 'दीदी' का वह कड़क और स्वतंत्र नेतृत्व वाला ब्रांड कमजोर हो जाएगा, जिसने उन्हें तीन दशक तक पहचान दी। जमीनी कार्यकर्ताओं और कैडर में निराशा बंगाल में टीएमसी का काडर सालों तक कांग्रेस और वामपंथियों यानी Left दोनों के खिलाफ संघर्ष करके बड़ा हुआ है। स्थानीय स्तर पर आज भी कई जगह कांग्रेस और टीएमसी के कार्यकर्ता आमने-सामने हैं। अचानक हुए इस बदलाव से जमीनी कार्यकर्ताओं में भारी भ्रम और निराशा फैल सकती है, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को जमीन मजबूत करने में मिलेगा। कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व का आंतरिक विरोध भले ही दिल्ली में सोनिया-ममता के बीच गर्मजोशी दिख रही हो, लेकिन बंगाल कांग्रेस के नेता (जैसे अधीर रंजन चौधरी और अन्य गुट) सालों तक ममता की राजनीति के पीड़ित रहे हैं। बंगाल कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा इस विलय के खिलाफ है। उनका मानना है कि टीएमसी के खिलाफ जनता के गुस्से (Anti-incumbency) का खामियाजा कांग्रेस को भी भुगतना पड़ सकता है, जिससे पार्टी को आंतरिक कलह का सामना करना पड़ेगा। क्या मजबूरी बन गई है 'घर वापसी'? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी एक 'शतरंज की माहिर खिलाड़ी' हैं और वह कभी भी आसानी से घुटने नहीं टेकतीं। लेकिन, मौजूदा वक्त में जब उनकी अपनी ही पार्टी के कई सांसद और विधायक पाला बदलने को तैयार बैठे हैं, तो कांग्रेस के साथ गठबंधन को मजबूत करना या विलय की दिशा में सोचना उनकी रणनीतिक मजबूरी हो सकता है। राजनीतिक विशेषज्ञ संजय सिंह के अनुसार: "यह कदम ममता बनर्जी के लिए अपनी राजनीतिक विरासत को पूरी तरह खत्म होने से बचाने और अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने का आखिरी दांव साबित हो सकता है।" क्या ममता बनर्जी अपनी शर्तों पर कांग्रेस के साथ आगे बढ़ेंगी या फिर यह केवल विपक्षी एकजुटता को और धार देने की एक कोशिश है? इसका फैसला आने वाले कुछ दिनों में पूरी तरह साफ हो जाएगा, लेकिन इतना तय है कि बंगाल की राजनीति अब एक नए मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है।
नई दिल्ली: INDIA गठबंधन की समन्वय समिति की बैठक के दौरान सोमवार को एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी की मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं के बीच गर्मजोशी देखने को मिली। इस दौरान ममता बनर्जी भावुक भी नजर आईं। दिल्ली में विपक्षी नेताओं की मुलाकात बनी चर्चा का विषय INDIA गठबंधन की बैठक में शामिल होने पहुंचीं ममता बनर्जी का सोनिया गांधी ने स्वागत किया। दोनों नेताओं के बीच कुछ समय तक बातचीत हुई और मुलाकात की तस्वीरें तेजी से चर्चा में आ गईं। राजनीतिक जानकार इसे विपक्षी दलों के बीच बढ़ते संवाद का संकेत मान रहे हैं। तीन दशक पुराने रिश्तों की फिर हुई चर्चा कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के रिश्ते भारतीय राजनीति के सबसे दिलचस्प अध्यायों में से एक रहे हैं। 1998 में कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। इसके बाद दोनों दलों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा का दौर लगातार चलता रहा। बंगाल की राजनीति में कई बार आमने-सामने आए दोनों दल पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और टीएमसी कई चुनावों में प्रतिद्वंद्वी रही हैं। राज्य की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के उभार के साथ कांग्रेस का प्रभाव सीमित होता गया। इसके बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर दोनों दल कई मौकों पर एक साथ भी नजर आए हैं। 2024 के चुनाव के बाद बढ़ी थी राजनीतिक दूरी लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान सीट बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच मतभेद खुलकर सामने आए थे। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया था, जिसके बाद कांग्रेस और टीएमसी के रिश्तों में तनाव की चर्चा तेज हो गई थी। INDIA गठबंधन को मजबूत करने पर हुई बातचीत सूत्रों के अनुसार बैठक के दौरान विपक्षी एकजुटता और भविष्य की राजनीतिक रणनीति पर भी चर्चा हुई। विपक्षी दल आगामी चुनावों को देखते हुए साझा मुद्दों पर साथ आने की कोशिश कर रहे हैं। 10 जनपथ पर फिर हुई अहम मुलाकात बैठक के अगले दिन ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी से उनके आवास 10 जनपथ पर भी मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच हुई इस बातचीत को विपक्षी राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। टीएमसी की चुनौतियों के बीच बढ़ी राजनीतिक सक्रियता हाल के दिनों में तृणमूल कांग्रेस को संगठनात्मक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में ममता बनर्जी की विपक्षी नेताओं के साथ लगातार बैठकें राजनीतिक रूप से अहम मानी जा रही हैं। विपक्षी राजनीति में नए संकेत दे रही है यह मुलाकात विश्लेषकों का मानना है कि सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की यह मुलाकात केवल शिष्टाचार तक सीमित नहीं है, बल्कि विपक्षी दलों के बीच बेहतर समन्वय और संवाद की संभावनाओं को भी दर्शाती है। आने वाले समय में इसका असर राष्ट्रीय राजनीति में देखने को मिल सकता है।
भोपाल/नई दिल्ली: मध्य प्रदेश में होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द किए जाने के बाद राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस ने इस फैसले को लोकतंत्र पर हमला बताते हुए “सीट चोरी” का गंभीर आरोप लगाया है। कांग्रेस ने फैसले को बताया लोकतंत्र पर हमला कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग के निर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा कि पार्टी को अपनी बात रखने का पूरा अवसर नहीं दिया गया। मंगलवार को कांग्रेस का एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली स्थित चुनाव आयोग कार्यालय पहुंचा और औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। पार्टी ने चेतावनी दी है कि वह इस मामले को अदालत में भी चुनौती देगी। सचिन पायलट ने उठाए गंभीर सवाल कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने कहा कि यह बेहद दुर्लभ मामला है कि बिना स्पष्ट और ठोस आधार के किसी उम्मीदवार का नामांकन रद्द किया गया हो। उन्होंने दावा किया कि नटराजन के खिलाफ न कोई FIR है और न ही कोई आपराधिक चार्जशीट दाखिल है। पायलट ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल बताया और निष्पक्ष जांच की मांग की। मीनाक्षी नटराजन का आरोप—‘वोट से आगे अब सीट की चोरी’ नामांकन रद्द होने के बाद मीनाक्षी नटराजन ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक दबाव में उनका नामांकन खारिज किया गया है। उन्होंने कहा कि पहले “वोट चोरी” की बात होती थी, लेकिन अब मामला “सीट चोरी” तक पहुंच गया है। नटराजन ने दावा किया कि उन्हें पर्याप्त सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। नामांकन रद्द करने का क्या है आधार? सूत्रों के अनुसार, भाजपा प्रत्याशी पक्ष की ओर से आपत्ति दर्ज कराई गई थी कि नटराजन ने अपने शपथपत्र में एक लंबित आपराधिक मामले की जानकारी नहीं दी थी। बताया गया कि तेलंगाना की एक अदालत में CrPC की धारा 223 के तहत एक मामला दर्ज है, जिसका उल्लेख नामांकन पत्र में नहीं किया गया। इसी आधार पर निर्वाचन अधिकारी ने नामांकन रद्द करने का निर्णय लिया। भाजपा ने फैसले को बताया सही मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे “न्याय की जीत” बताया। उन्होंने कहा कि पूरी प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार हुई है और नियमों के तहत ही आपत्ति दर्ज की गई थी। कांग्रेस का पलटवार कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने नामांकन रद्द किए जाने के फैसले को गलत बताया। उन्होंने दावा किया कि नटराजन के खिलाफ न कोई एफआईआर है और न ही कोई आपराधिक मुकदमा लंबित है। तन्खा के अनुसार केवल CrPC की धारा 223 के तहत एक नोटिस जारी हुआ था, जिसे गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया। चुनाव आयोग में शिकायत, अदालत जाने की तैयारी कांग्रेस ने इस पूरे मामले को लेकर चुनाव आयोग के समक्ष औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। पार्टी ने संकेत दिया है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो वह अदालत का दरवाजा खटखटाएगी। राज्यसभा चुनाव से पहले बढ़ा सियासी तनाव मध्य प्रदेश में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले इस घटनाक्रम ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल इस मामले को लोकतांत्रिक प्रक्रिया और पारदर्शिता से जोड़कर देख रहे हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। नरेंद्र मोदी बतौर इलेक्टेड प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को पार कर चुके हैं। नेहरू चुनाव जीतकर 4398 दिन प्रधानमंत्री रहे थे। मोदी बतौर पीएम सबसे ज्यादा यानी 4399 पार कर चुके हैं। हालांकि नेहरू 1947 से 1952 तक भी प्रधानमंत्री थे, लेकिन तब चुनाव नहीं हुआ था, यानी इलेक्टेड पीएम नहीं थे। उसे भी जोड़ दें तो नेहरू का कुल कार्यकाल 6131 दिन का हो जाएगा। देश में सबसे ज्यादा लगातार 9000 से ज्यादा दिनों तक सत्ता प्रमुख रहने का रिकॉर्ड भी नरेंद्र मोदी के नाम है। पहले गुजरात के सीएम और फिर देश के पीएम के तौर पर।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।