Court Verdict

Supreme Court bail
पूर्व मंत्री आलमगीर आलम को सुप्रीम कोर्ट से मिली बेल

रांची। टेंडर घोटाला के जरिए करोड़ों रुपए की मनी लाउंड्रिंग करने के आरोपी पूर्व मंत्री आलमगीर आलम की जमानत याचिका पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सोमवार की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने आलमगीर आलम को बड़ी राहत देते हुए उनकी जमानत याचिका स्वीकार कर लीय़ जामनत याचिका स्वीकार होने के बाद अब आलमगीर आलम करीब दो वर्ष के बाद जेल की सलाखों से बाहर आ जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस एम एम सुंदरेश्वर और जस्टिस एन कोटीश्वर सिंह की बेंच में आलमगीर आलम की याचिका पर सुनवाई हुई। 11 जुलाई 2025 को झारखंड हाईकोर्ट ने आलमगीर आलम की जमानत याचिका को खारिज करते हुए उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में बेल के लिए गुहार लगाई। आलमगीर आलम की जमानत याचिका झारखण्ड हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की कोर्ट ने खारिज की थी। पिछली सरकार में मंत्री रहे आलमगीर आलम को ईडी ने 15 मई 2024 को गिरफ्तार किया था। तब से वह जेल में हैं। आरोपों के मुताबिक उनके आप्त सचिव संजीव कुमार लाल एवं उनके नौकर जहांगीर आलम के यहां से मिले 32.30 करोड़ रुपये नकद की बरामदी हुई थी। पैसे बरामद होने के बाद आलमगीर आलम से पूछताछ हुई थी फिर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। 

Anjali Kumari मई 11, 2026 0
Indian LPG tanker Sarv Shakti sailing through Strait of Hormuz amid high geopolitical tensions
Hormuz Crisis: ‘चक्रव्यूह’ से निकला भारत का LPG टैंकर ‘सर्व शक्ति’, 45 हजार टन गैस के साथ सुरक्षित पारगमन

मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और Strait of Hormuz पर बनी नाकेबंदी के बीच भारत के लिए बड़ी राहत की खबर सामने आई है। भारत से जुड़ा एलपीजी टैंकर ‘सर्व शक्ति’ इस संवेदनशील जलमार्ग को सफलतापूर्वक पार करने में कामयाब रहा है। ऐसे समय में जब ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच तनाव के कारण जहाजों की आवाजाही लगभग ठप पड़ी थी, यह यात्रा बेहद अहम मानी जा रही है। 45 हजार टन LPG के साथ जोखिम भरा सफर शिपिंग डेटा के अनुसार, यह टैंकर करीब 45,000 टन एलपीजी (LPG) लेकर भारत की ओर बढ़ रहा है। जहाज ने ईरान के लारक और क़ेश्म द्वीपों के पास से गुजरते हुए ओमान की खाड़ी में प्रवेश किया। इस दौरान उसने तेहरान द्वारा तय किए गए सुरक्षित मार्ग का पालन किया। इस जहाज पर 18 भारतीय चालक दल के सदस्य सवार हैं, और यह विशाखापत्तनम स्थित एक बड़े ऊर्जा टर्मिनल की ओर बढ़ रहा है। संकट के बीच ‘दुर्लभ’ पारगमन हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरना इस समय बेहद जोखिम भरा माना जा रहा है। हाल ही में कई जहाजों को हमले और फायरिंग के खतरे के चलते वापस लौटना पड़ा था। ऐसे में ‘सर्व शक्ति’ का सफल पारगमन एक दुर्लभ और रणनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है। यह भी बताया जा रहा है कि यह टैंकर मार्शल आइलैंड्स के झंडे के तहत संचालित हो रहा है, जो अंतरराष्ट्रीय शिपिंग में आम प्रथा है। इंडियन ऑयल बना खरीदार रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस एलपीजी कार्गो का खरीदार Indian Oil Corporation है। हालांकि कंपनी की ओर से इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन यह खेप भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत के लिए क्यों अहम है यह यात्रा? भारत दुनिया का: तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक दूसरा सबसे बड़ा LPG उपभोक्ता है। ऐसे में मिडिल ईस्ट से सप्लाई बाधित होने पर देश में: गैस की कमी लंबी कतारें सप्लाई संकट जैसी स्थिति पैदा हो गई थी। ‘सर्व शक्ति’ की यह खेप भारत के लिए राहत लेकर आ सकती है और बाजार में स्थिरता ला सकती है। पहले क्यों बिगड़ी थी स्थिति? अप्रैल में हालात तब और बिगड़ गए थे जब ईरान ने पहले जहाजों को गुजरने की अनुमति दी, लेकिन बाद में कुछ जहाजों पर फायरिंग की घटनाएं सामने आईं। इससे कई अंतरराष्ट्रीय टैंकरों को अपनी यात्रा बीच में ही रोकनी पड़ी। हालांकि, इससे पहले एक भारतीय टैंकर ‘देश गरिमा’ भी जोखिम उठाकर इस मार्ग से गुजरने में सफल रहा था।  

surbhi मई 4, 2026 0
MLA Pradeep Yadav
कांग्रेस विधायक प्रदीप यादव को 1 साल की सजा, मिली जमानत

दुमका। 16 साल पुराने सड़क जाम के एक मामले में सोमवार को एमपी-एमएलए की विशेष अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने पोड़ैयाहाट से कांग्रेस विधायक प्रदीप यादव को भारतीय दंड संहिता की धारा 225 के तहत दोषी मानते हुए 1 साल के कारावास की सजा सुनाई। अदालत के फैसले के तुरंत बाद ही विधायक प्रदीप यादव को सशर्त जमानत भी दे दी गई, जिससे उन्हें फिलहाल राहत मिल गई है। पूर्व भाजपा विधायक समेत अन्य आरोपी बरी इस मामले में साक्ष्य के अभाव के चलते पूर्व भाजपा विधायक रणधीर सिंह सहित सभी अन्य आरोपियों को अदालत ने बरी कर दिया। यह मामला करीब 16 साल पहले हुए सड़क जाम से जुड़ा हुआ है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि सार्वजनिक मार्ग को बाधित किया गया था। लंबे समय से चल रही सुनवाई के बाद अब जाकर इस पर अदालत का फैसला आया है।

Anjali Kumari मई 4, 2026 0
Allahabad High Court rules transgender community has no legal right to demand traditional badhai or neg
इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: किन्नरों को 'बधाई' मांगने का कानूनी अधिकार नहीं

'नेग' वसूली को कानूनी मान्यता नहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम फैसले में कहा है कि किन्नर समुदाय को पारंपरिक 'बधाई' या 'नेग' मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति से जबरन धन वसूलना कानूनन अपराध की श्रेणी में आ सकता है। क्षेत्र तय करने की मांग अदालत ने ठुकराई यह फैसला गोंडा जिले की रेखा देवी नामक ट्रांसजेंडर द्वारा दायर याचिका पर सुनाया गया। याचिका में उन्होंने जरवल कस्बे के कटी का पुल से घाघरा घाट और कर्नलगंज के सरयू पुल तक के इलाके को 'बधाई' संग्रह के लिए उनके विशेष क्षेत्र के रूप में घोषित करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि वह वर्षों से इस इलाके में नेग लेती आ रही हैं और अन्य लोगों के आने से विवाद की स्थिति पैदा हो जाती है। कोर्ट ने क्या कहा? न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने कहा कि किसी भी प्रकार का टैक्स, शुल्क या धनराशि केवल कानून के तहत ही वसूली जा सकती है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि "किसी भी नागरिक से उसकी इच्छा से या दबाव बनाकर धन लेना स्वीकार्य नहीं है। केवल वही भुगतान वैध है, जिसे कानून की अनुमति हो।" ट्रांसजेंडर कानून में भी नहीं है ऐसा प्रावधान कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में भी 'बधाई' या 'नेग' मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं दिया गया है। जबरन वसूली पर लग सकती हैं आपराधिक धाराएं अदालत ने चेतावनी दी कि यदि किसी से जबरन धन वसूला जाता है, तो यह भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत दंडनीय अपराध हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी मांग को मान्यता देना अवैध वसूली को वैध ठहराने जैसा होगा, जिससे आपराधिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। सामाजिक परंपरा और कानून अलग-अलग यह फैसला स्पष्ट करता है कि सामाजिक परंपराओं और कानूनी अधिकारों में अंतर होता है। किसी परंपरा के लंबे समय से चले आने मात्र से उसे कानूनी संरक्षण नहीं मिल जाता।  

surbhi अप्रैल 29, 2026 0
Working woman with newborn highlighting maternity leave rights after High Court ruling
दो साल के भीतर दूसरी मातृत्व अवकाश से इनकार नहीं: हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

  हाई कोर्ट का स्पष्ट संदेश Allahabad High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी महिला कर्मचारी को सिर्फ इस आधार पर दूसरी मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) से वंचित नहीं किया जा सकता कि पहली और दूसरी छुट्टी के बीच दो साल का अंतर नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मातृत्व लाभ से जुड़े कानूनी अधिकार किसी भी प्रशासनिक नियम से ऊपर हैं। याचिका पर सुनवाई में आया फैसला यह फैसला जस्टिस करुणेश सिंह पवार की लखनऊ पीठ ने सुनाया। मामला मनीषा यादव की याचिका से जुड़ा था, जिन्होंने 4 अप्रैल 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी दूसरी मातृत्व अवकाश की मांग खारिज कर दी गई थी। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि Maternity Benefit Act, 1961 एक कल्याणकारी कानून है और इसके प्रावधानों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। सरकारी नियमों पर कानून भारी राज्य सरकार ने अपने पक्ष में वित्तीय हैंडबुक के नियम 153(1) का हवाला देते हुए कहा था कि दो मातृत्व अवकाश के बीच कम से कम दो साल का अंतर होना जरूरी है। लेकिन हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि संसद द्वारा बनाए गए कानून के सामने किसी भी तरह के कार्यकारी निर्देश या नियम टिक नहीं सकते। कोर्ट ने आदेश रद्द कर दी राहत अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने 2021 में पहले बच्चे को जन्म दिया था और 2022 में दूसरी मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया था, जिसे गलत आधार पर खारिज कर दिया गया। कोर्ट ने संबंधित आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि मनीषा यादव को 6 अप्रैल 2026 से 2 अक्टूबर 2026 तक मातृत्व अवकाश दिया जाए। महिलाओं के अधिकारों के लिए अहम फैसला यह निर्णय कामकाजी महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। इससे साफ संदेश गया है कि मातृत्व लाभ जैसे अधिकारों को किसी भी प्रशासनिक शर्त के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।  

surbhi अप्रैल 22, 2026 0
Supreme Court building with students discussing NEET MBBS admission decision and merit-based seat allocation
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अब फ्रॉड से खाली MBBS सीट नहीं जाएगी बेकार

सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल एडमिशन को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है, जिससे हजारों NEET अभ्यर्थियों को राहत मिलेगी। कोर्ट ने साफ किया है कि धोखाधड़ी (फ्रॉड) के कारण खाली हुई MBBS सीट अब खाली नहीं छोड़ी जाएगी, बल्कि उसे मेरिट के आधार पर अगले योग्य उम्मीदवार को दिया जाएगा। क्या था मामला? मामला NEET UG 2022 से जुड़ा है एक छात्र ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए MBBS में एडमिशन ले लिया जांच में फ्रॉड सामने आने पर उसका एडमिशन रद्द कर दिया गया इससे एक सीट खाली हो गई, लेकिन मेरिट में अगले छात्र को समय पर सीट नहीं मिली सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा- MBBS सीट एक राष्ट्रीय संसाधन (National Resource) है इसे खाली छोड़ना गलत है फ्रॉड से खाली हुई सीट तुरंत अगले योग्य कैंडिडेट को दी जानी चाहिए कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रशासनिक देरी या लापरवाही के कारण सीट खाली रखना पूरी प्रक्रिया के खिलाफ है। NMC को झटका नेशनल मेडिकल काउंसिल (NMC) ने इस फैसले को चुनौती दी थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने NMC की अपील खारिज कर दी और छात्र के एडमिशन को बरकरार रखा छात्रों के लिए क्या बदलेगा? अब किसी भी फ्रॉड से आपका हक नहीं छीना जाएगा मेरिट लिस्ट में आगे आने वाले छात्रों को सीधा फायदा मिलेगा एडमिशन प्रक्रिया बनेगी ज्यादा फेयर और ट्रांसपेरेंट

surbhi अप्रैल 8, 2026 0
Allahabad High Court granting anticipatory bail in Shankaracharya case with legal scrutiny
प्रयागराज से बड़ी खबर: शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अग्रिम जमानत, अदालत के आदेश में उठे कई अहम सवाल

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके सह-आरोपी स्वामी प्रत्यक्चैतन्य मुकुंदानंद गिरि को अग्रिम जमानत प्रदान की है। यह मामला दो लड़कों, जिनमें एक नाबालिग भी शामिल है, के साथ कथित यौन उत्पीड़न से जुड़ा है, जिसमें POCSO Act के तहत केस दर्ज किया गया था। यह आदेश जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ द्वारा दिया गया, जिसमें अदालत ने केवल जमानत ही नहीं दी बल्कि एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया और मामले के कई पहलुओं पर गंभीर सवाल भी खड़े किए। अदालत ने किन बिंदुओं पर उठाए सवाल? अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में कई महत्वपूर्ण तथ्यों पर ध्यान दिलाया: 1. शिकायत दर्ज करने में देरी और प्रक्रिया पर सवाल एफआईआर 21 फरवरी 2026 को दर्ज की गई, जबकि कथित घटना की जानकारी 18 जनवरी को मिलने की बात कही गई। शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज ने पुलिस को जानकारी देने में देरी का कारण पूजा-पाठ में व्यस्तता बताया, जिसे अदालत ने संदिग्ध माना। 2. पीड़ितों का व्यवहार ‘सामान्य नहीं’ कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़ितों ने अपने अभिभावकों के बजाय एक बाहरी व्यक्ति को घटना की जानकारी दी, जो सामान्य मानवीय व्यवहार के अनुरूप नहीं है। 3. मेडिकल जांच और साक्ष्यों की कमी पीड़ितों का समय पर मेडिकल परीक्षण नहीं कराया गया। डॉक्टर की रिपोर्ट में किसी बाहरी चोट का उल्लेख नहीं है और यौन उत्पीड़न की पुष्टि भी स्पष्ट रूप से नहीं की गई। एफएसएल रिपोर्ट भी लंबित है। 4. घटनास्थल और समय में विरोधाभास एफआईआर में घटना की अवधि जनवरी 2025 से फरवरी 2026 बताई गई, जबकि एक पीड़ित ने जून 2024 में अलग-अलग स्थानों पर घटना होने का दावा किया। इससे मामले की विश्वसनीयता पर सवाल उठे। 5. पीड़ित की उम्र को लेकर भ्रम अदालत ने पाया कि एक पीड़ित कथित अवधि में वयस्क था, जबकि दूसरी अवधि में नाबालिग, जिससे आरोपों की प्रकृति पर असर पड़ता है। 6. आश्रम से संबंध पर सवाल कोर्ट ने कहा कि संबंधित पीड़ित आश्रम का छात्र नहीं है, बल्कि हरदोई के एक संस्कृत विद्यालय का छात्र है। 7. विवाद और शिकायत की तारीख एक ही कोर्ट ने यह भी नोट किया कि कथित अपराध की जानकारी मिलने और संगम स्नान को लेकर विवाद की तारीख (18 जनवरी 2026) एक ही है, जिससे मामले में और जांच की आवश्यकता बताई गई।   किन शर्तों पर मिली अग्रिम जमानत? अदालत ने दोनों आरोपियों को 50,000 रुपये के निजी मुचलके और दो जमानतदारों के साथ जमानत दी, साथ ही पांच सख्त शर्तें लगाईं: साक्ष्यों से छेड़छाड़ नहीं करेंगे गवाहों को प्रभावित नहीं करेंगे ट्रायल में सहयोग करेंगे बिना अनुमति देश नहीं छोड़ेंगे मामले पर मीडिया से बातचीत नहीं करेंगे कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी शर्त के उल्लंघन पर जमानत रद्द की जा सकती है।  

kalpana मार्च 26, 2026 0
Supreme Court of India delivers verdict on government employee accident compensation case
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सड़क हादसे में मृत सरकारी कर्मचारी के परिवार को दोहरी मुआवजा राशि नहीं मिलेगी

सरकार या MACT में से किसी एक से ही आय नुकसान का मुआवजा मिलेगा Supreme Court of India ने सड़क दुर्घटना से जुड़े मामलों में एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी की सड़क हादसे में मौत होती है, तो उसके आश्रित परिवार के सदस्य आय के नुकसान के लिए मुआवजा या तो सरकार से ले सकते हैं या फिर Motor Accidents Claims Tribunal (MACT) से-दोनों जगह से एक साथ नहीं। न्यायमूर्ति Sanjay Karol और न्यायमूर्ति Augustine George Masih की पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत ने Reliance General Insurance की ओर से दायर अपील को स्वीकार करते हुए Punjab and Haryana High Court के आदेश को रद्द कर दिया। 2009 के सड़क हादसे से जुड़ा है मामला यह मामला 2 नवंबर 2009 को हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। उस दिन रविंदर कुमार की मोटरसाइकिल, जिस पर होम देवी और कनिका सवार थीं, एक जीप से टकरा गई। इस हादसे में सरकारी कर्मचारी होम देवी की मौत हो गई, जबकि बाकी दो लोग घायल हो गए। MACT ने दिया था 8.8 लाख रुपये का मुआवजा दुर्घटना के बाद पीड़ित परिवार ने MACT में मुआवजे के लिए दावा किया था। ट्रिब्यूनल ने परिवार के आश्रितों को 8 लाख 80 हजार रुपये देने का आदेश दिया। हालांकि परिवार ने इस राशि को कम बताते हुए हाई कोर्ट में चुनौती दी और मुआवजा बढ़ाने की मांग की। हाई कोर्ट ने बढ़ाकर 29 लाख रुपये किया मुआवजा हाई कोर्ट ने मुआवजे की राशि बढ़ाकर 29 लाख 9 हजार 240 रुपये कर दी। शुरुआत में अदालत ने कहा कि हरियाणा सरकार की योजना-Haryana Compassionate Assistance to Dependents of Deceased Government Employees Rules 2006-के तहत परिवार को मिली राशि को कुल मुआवजे से घटाया जाएगा। लेकिन बाद में एक अन्य आदेश में हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार से मिली सहायता राशि को मुआवजे से घटाने की जरूरत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का आदेश किया रद्द हाई कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए बीमा कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसले-Reliance General Insurance vs Shashi Sharma-का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि मुआवजे की गणना करते समय समान प्रकार के लाभों को ध्यान में रखा जाएगा ताकि एक ही आर्थिक नुकसान के लिए दो बार भुगतान न हो। फैसले से स्पष्ट हुई कानूनी स्थिति सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह निर्णय संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी है। इससे पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा तो मिलेगा, लेकिन एक ही नुकसान के लिए दो बार भुगतान नहीं किया जाएगा। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई सहायता अलग प्रकृति की है और मुआवजे से सीधे जुड़ी नहीं है, तो उसे घटाने की आवश्यकता नहीं होगी।

surbhi मार्च 5, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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surbhi मई 15, 2026 0