India और United States के बीच लगभग 40 करोड़ डॉलर की अहम रक्षा डील को मंजूरी मिल गई है। इस समझौते के तहत भारत को अपाचे हेलीकॉप्टरों और एम777ए2 अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर तोपों के रखरखाव, तकनीकी सहायता और जरूरी उपकरण उपलब्ध कराए जाएंगे। माना जा रहा है कि इस डील से भारतीय सेना की युद्ध क्षमता और रक्षा तैयारियां और मजबूत होंगी। अपाचे हेलीकॉप्टरों के लिए 19.82 करोड़ डॉलर की मंजूरी अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत को एएच-64ई अपाचे हेलीकॉप्टरों से जुड़ी सेवाएं और उपकरण बेचने की मंजूरी दे दी गई है। इस डील की अनुमानित कीमत करीब 19.82 करोड़ अमेरिकी डॉलर बताई गई है। इसमें शामिल हैं: तकनीकी सहायता इंजीनियरिंग सपोर्ट लॉजिस्टिक सहायता प्रशिक्षण सेवाएं तकनीकी दस्तावेज रखरखाव संबंधी उपकरण इन सेवाओं को Boeing और Lockheed Martin जैसी अमेरिकी रक्षा कंपनियां उपलब्ध कराएंगी। एम777 हॉवित्जर तोपों को भी मिलेगा सपोर्ट इसके अलावा अमेरिका ने भारत को एम777ए2 अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर तोपों के रखरखाव और सहायता सेवाओं की बिक्री को भी मंजूरी दी है। इस डील की अनुमानित कीमत करीब 23 करोड़ अमेरिकी डॉलर है। इन सेवाओं की जिम्मेदारी ब्रिटेन की रक्षा कंपनी BAE Systems को दी गई है। भारतीय सेना पहले से कर रही इस्तेमाल अपाचे हेलीकॉप्टर और एम777 हॉवित्जर तोपें पहले से भारतीय सेना के बेड़े का हिस्सा हैं। अपाचे हेलीकॉप्टर अपनी अत्याधुनिक हमला क्षमता और दुश्मन के टैंकों को निशाना बनाने की ताकत के लिए जाने जाते हैं। वहीं एम777 हॉवित्जर तोपें ऊंचाई वाले इलाकों और सीमावर्ती क्षेत्रों में तेजी से तैनात की जा सकती हैं। नियमित तकनीकी सहायता और रखरखाव मिलने से इन हथियार प्रणालियों की प्रभावशीलता लंबे समय तक बनी रहेगी। चीन और पाकिस्तान की बढ़ सकती है चिंता रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, यह डील ऐसे समय में हुई है जब भारत अपनी सीमाओं पर सुरक्षा ढांचे को लगातार मजबूत कर रहा है। चीन और पाकिस्तान से जुड़े सुरक्षा चुनौतियों के बीच भारत अपनी सैन्य क्षमताओं को आधुनिक बनाने पर जोर दे रहा है। अपाचे हेलीकॉप्टर और एम777 तोपें पहाड़ी और रणनीतिक क्षेत्रों में भारतीय सेना की ताकत को और बढ़ा सकती हैं। भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी हुई मजबूत यह समझौता भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते रक्षा और रणनीतिक संबंधों का भी संकेत माना जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा है। इस तरह की डील से भारत को आधुनिक सैन्य तकनीक और बेहतर ऑपरेशनल सपोर्ट मिलता रहेगा, जबकि दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी भी और मजबूत होगी।
भारत की पूर्वी सीमा के पास बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच बढ़ते सैन्य संपर्क ने नई रणनीतिक चिंता पैदा कर दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक Aurangzeb Ahmed के नेतृत्व में पाकिस्तान वायुसेना का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ढाका पहुंचा है। खास बात यह है कि औरंगजेब अहमद वही अधिकारी हैं जिन्हें पिछले साल “ऑपरेशन सिंदूर” के दौरान पाकिस्तान एयरफोर्स का पोस्टर बॉय माना गया था। रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान एयरफोर्स के अधिकारियों की पांच सदस्यीय टीम 10 मई से बांग्लादेश में मौजूद है और दोनों देशों के बीच पहली “एयर स्टाफ टॉक” शुरू हुई है। हालांकि इस दौरे को लेकर न तो Bangladesh और न ही Pakistan की सरकार ने औपचारिक जानकारी साझा की है। कौन हैं औरंगजेब अहमद? एयर वाइस मार्शल औरंगजेब अहमद पाकिस्तान वायुसेना में जनसंपर्क महानिदेशक, वायुसेना उप-प्रमुख (ऑपरेशंस) और रणनीतिक कमान के कमांडर जैसे अहम पदों पर हैं। इस्लामाबाद में हाल ही में आयोजित एक सैन्य समारोह में उन्हें सम्मानित भी किया गया था। उनके साथ एयर कमोडोर शाह खालिद, अब्दुल गफूर बुजदार, ग्रुप कैप्टन मोहम्मद अली खान और विंग कमांडर हसन तारिक अजीज जैसे वरिष्ठ अधिकारी भी ढाका पहुंचे हैं। बांग्लादेश एयरफोर्स में TTP मॉडल का खुलासा यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब कुछ दिन पहले बांग्लादेश की सुरक्षा एजेंसियों ने Tehrik-i-Taliban Pakistan (TTP) से प्रेरित गतिविधियों का खुलासा किया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक बांग्लादेश वायुसेना के कुछ अधिकारियों और गैर-कमीशंड अधिकारियों को कथित तौर पर चरमपंथी संपर्कों के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। हालांकि बांग्लादेश वायुसेना की ओर से आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया, लेकिन सूत्रों के अनुसार आरोपियों के खिलाफ कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। भारत की सीमा के पास बढ़ रही गतिविधियां रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि पाकिस्तान वायुसेना का प्रतिनिधिमंडल भारत-बांग्लादेश सीमा के करीब स्थित लालमोनिरहाट और बोगुरा एयरबेस का दौरा कर सकता है। इन इलाकों में हाल के महीनों में एयर डिफेंस रडार, रनवे विस्तार और नए सैन्य ढांचे का निर्माण तेजी से किया जा रहा है। Lalmonirhat Airport भारत की सीमा से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित है, जहां हाल ही में नया हैंगर तैयार किया गया है। वहीं Bogura Airbase पर रनवे को 3.2 किलोमीटर तक बढ़ाने का काम जारी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह पूरा सैन्य ढांचा भविष्य में लड़ाकू विमानों और ड्रोन ऑपरेशंस के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। JF-17 फाइटर जेट डील पर भी नजर रिपोर्ट्स के मुताबिक बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच JF-17 Thunder लड़ाकू विमान खरीदने को लेकर भी बातचीत चल रही है। यह विमान चीन की Chengdu Aircraft Corporation और Pakistan Aeronautical Complex द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया है। सूत्रों का कहना है कि इस यात्रा के दौरान कई रक्षा समझौतों और MoU पर चर्चा हो सकती है, जिनमें बांग्लादेशी पायलटों और तकनीशियनों को पाकिस्तान में एडवांस प्रशिक्षण देना भी शामिल है। भारत की रणनीतिक चिंता क्यों बढ़ी? रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच बढ़ता सैन्य सहयोग भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण विषय बन सकता है। खासतौर पर तब, जब भारत की सीमा के पास एयरबेस और सैन्य इंफ्रास्ट्रक्चर को तेजी से मजबूत किया जा रहा हो। हालांकि अभी तक किसी भी पक्ष ने भारत विरोधी गतिविधि की पुष्टि नहीं की है, लेकिन भारतीय सुरक्षा एजेंसियां इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने एक बड़ा कदम उठाते हुए अपने सहयोगी देशों को 8.6 अरब डॉलर से ज्यादा के हथियार बेचने की मंजूरी दे दी है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब ईरान के साथ जारी टकराव ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। किन देशों को मिलेंगे हथियार? अमेरिकी विदेश विभाग की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, जिन देशों को यह सैन्य उपकरण दिए जाएंगे, उनमें शामिल हैं: इजरायल कतर कुवैत संयुक्त अरब अमीरात ये सभी देश लंबे समय से अमेरिका के रणनीतिक सहयोगी रहे हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा में अहम भूमिका निभाते हैं। युद्ध और व्यापार साथ-साथ ईरान के साथ संघर्ष में अमेरिका अब तक करीब 25 अरब डॉलर (लगभग 2.37 लाख करोड़ रुपये) खर्च कर चुका है। यह खर्च मुख्य रूप से: गोला-बारूद मिसाइल सिस्टम ड्रोन सैन्य तैनाती पर हुआ है। इस दौरान अमेरिका को हाईटेक हथियारों और डिफेंस सिस्टम के नुकसान का भी सामना करना पड़ा। ऐसे में हथियारों की यह बिक्री एक तरह से उस आर्थिक नुकसान की भरपाई के रूप में देखी जा रही है। डर बना हथियार बाजार की वजह ईरान के हमलों ने इन देशों की सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार: मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने में कई डिफेंस सिस्टम पूरी तरह सफल नहीं रहे सैन्य ठिकानों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचा “स्वार्म अटैक” (एक साथ कई हमले) से रक्षा तंत्र पर दबाव बढ़ा इन हालातों ने मिडिल ईस्ट के देशों को अपनी रक्षा क्षमता मजबूत करने के लिए मजबूर कर दिया। THAAD और पैट्रियट भी पड़े कमजोर? इन देशों ने THAAD और Patriot Missile System जैसे एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया, लेकिन ईरान के कुछ हमलों को रोकने में ये भी पूरी तरह सफल नहीं रहे। इससे यह साफ हुआ कि आधुनिक युद्ध में पारंपरिक रक्षा सिस्टम को और अपग्रेड करने की जरूरत है। अस्थायी शांति, लेकिन खतरा बरकरार अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष अब नौवें सप्ताह में पहुंच चुका है। हालांकि, 8 अप्रैल से एक नाजुक युद्धविराम लागू है, लेकिन हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं। ऐसे में मिडिल ईस्ट के देश: भविष्य के हमलों के लिए तैयार हो रहे हैं अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहे हैं अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग मजबूत कर रहे हैं ट्रंप का दावा और सख्त रुख डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि यह कदम परमाणु खतरे को रोकने के लिए जरूरी था। उन्होंने दावा किया कि: ईरान की सैन्य क्षमता कमजोर हो चुकी है उसके कई डिफेंस सिस्टम नष्ट हो चुके हैं यह कार्रवाई मिडिल ईस्ट और यूरोप को सुरक्षित रखने के लिए की गई दोहरा फायदा: रणनीति और कारोबार विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका को दोहरा फायदा हुआ है: ईरान पर दबाव बनाकर उसे कमजोर करना सहयोगी देशों को हथियार बेचकर आर्थिक लाभ कमाना यानी, युद्ध के माहौल ने हथियारों के बाजार को और तेज कर दिया है।
NATO ने साफ किया अपना रुख अमेरिका और स्पेन के बीच बढ़ते तनाव के बीच NATO ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके नियमों में किसी सदस्य देश को निलंबित करने या बाहर निकालने का कोई प्रावधान नहीं है। यह बयान उस रिपोर्ट के बाद आया, जिसमें दावा किया गया था कि अमेरिका, ईरान युद्ध पर स्पेन के रुख से नाराज होकर उसके खिलाफ कार्रवाई पर विचार कर सकता है। क्या है पूरा मामला? रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा विभाग के एक आंतरिक ईमेल में उन सहयोगी देशों के खिलाफ संभावित कदमों पर चर्चा की गई, जिन्होंने ईरान के खिलाफ अमेरिकी अभियान का खुलकर समर्थन नहीं किया। इस सूची में Spain का नाम प्रमुखता से सामने आया। स्पेन ने अपने सैन्य अड्डों का इस्तेमाल ईरान पर हमलों के लिए करने से इनकार कर दिया था। अमेरिका के दो महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने स्पेन में स्थित हैं। स्पेन के प्रधानमंत्री ने रिपोर्ट को किया खारिज स्पेन के प्रधानमंत्री Pedro Sánchez ने इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार किसी लीक ईमेल के आधार पर नहीं, बल्कि आधिकारिक दस्तावेजों और अमेरिकी सरकार की औपचारिक नीति के आधार पर काम करती है। उन्होंने दोहराया कि स्पेन अपने सहयोगियों के साथ खड़ा है, लेकिन हमेशा अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में। ट्रंप प्रशासन की नाराजगी अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और रक्षा मंत्री Pete Hegseth लगातार यूरोपीय सहयोगियों पर निशाना साध रहे हैं। उनका आरोप है कि यूरोप अमेरिकी सुरक्षा पर निर्भर है, लेकिन संकट के समय पर्याप्त सहयोग नहीं करता। हेगसेथ ने कहा कि यूरोप को सिर्फ बयान देने के बजाय वास्तविक योगदान देना चाहिए। फॉकलैंड मुद्दे का भी जिक्र रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अमेरिका, ब्रिटेन के फॉकलैंड द्वीपों पर अपने समर्थन की समीक्षा कर सकता है। यह द्वीप लंबे समय से Argentina और United Kingdom के बीच विवाद का केंद्र रहे हैं। यूरोपीय देशों ने दिखाई एकजुटता इटली की प्रधानमंत्री Giorgia Meloni ने NATO की एकता बनाए रखने पर जोर दिया। वहीं, जर्मनी ने भी स्पष्ट कहा कि स्पेन की सदस्यता पर कोई सवाल नहीं उठता। NATO में स्पेन की सदस्यता सुरक्षित हालिया विवाद के बावजूद, NATO के नियम स्पष्ट हैं। किसी सदस्य देश को संगठन से निकालना आसान नहीं है, और फिलहाल स्पेन की सदस्यता पर कोई खतरा नजर नहीं आता। हालांकि, इस घटनाक्रम ने अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच बढ़ती खाई को जरूर उजागर कर दिया है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने ईरान के खिलाफ बड़ा समुद्री सैन्य कदम उठाया है। United States Central Command (CENTCOM) के मुताबिक, अरब सागर में ईरान के तटों और बंदरगाहों की घेराबंदी की गई है, जिसकी कमान अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर USS Abraham Lincoln (CVN-72) संभाल रहा है। 100 से ज्यादा विमान और 10 हजार सैनिक तैनात CENTCOM की रिपोर्ट के अनुसार, इस ऑपरेशन में अमेरिका ने भारी सैन्य ताकत झोंकी है। 10,000 से अधिक अमेरिकी सैनिक 12 से ज्यादा जंगी जहाज 100+ लड़ाकू विमान एयरक्राफ्ट कैरियर USS Abraham Lincoln पर अत्याधुनिक फाइटर जेट्स और सर्विलांस सिस्टम तैनात हैं, जिनमें F-35C स्टील्थ फाइटर, F/A-18 जेट्स और E-2D कमांड कंट्रोल एयरक्राफ्ट शामिल हैं। इसके अलावा गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर USS Delbert D. Black (DDG-119) को भी संदिग्ध जहाजों पर नजर रखने और उन्हें रोकने की जिम्मेदारी दी गई है। क्या है अमेरिका की रणनीति? CENTCOM के अनुसार, इस सैन्य कार्रवाई का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी जहाज ईरानी सीमा में प्रवेश न करे और न ही वहां से बाहर निकले। यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति के निर्देश पर उठाया गया है। हालांकि, अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने साफ किया है कि यह नाकाबंदी केवल ईरान के तटों और बंदरगाहों तक सीमित है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर नहीं है रोक अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि Strait of Hormuz (होर्मुज जलडमरूमध्य) को ब्लॉक नहीं किया गया है। यह वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बेहद अहम मार्ग है, इसलिए इसे खुला रखा गया है। ट्रंप का बयान: ‘यह रूटीन ऑपरेशन’ Donald Trump ने इस सैन्य कार्रवाई को ‘रूटीन ऑपरेशन’ बताया है। उनके मुताबिक, अमेरिकी नौसेना पूरी तरह नियंत्रण में है और कोई भी जहाज इस क्षेत्र में बिना अनुमति के आवाजाही नहीं कर पा रहा है। बढ़ा क्षेत्रीय तनाव अमेरिका और Iran के बीच बढ़ते तनाव के चलते पूरे अरब सागर क्षेत्र में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। अमेरिकी बल हर गतिविधि पर नजर बनाए हुए हैं, जिससे हालात और संवेदनशील बने हुए हैं। ईरान के खिलाफ अमेरिका की यह समुद्री घेराबंदी मिडिल ईस्ट में तनाव को और बढ़ा सकती है। हालांकि, अमेरिका इसे ‘रूटीन’ बता रहा है, लेकिन इतने बड़े सैन्य जमावड़े ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता जरूर बढ़ा दी है।
ईरान में फंसे अमेरिकी एयरमैन को बचाने के लिए अमेरिका ने एक बेहद जटिल और जोखिम भरा रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया, जिसमें सेना के साथ-साथ खुफिया एजेंसी CIA ने भी अहम भूमिका निभाई। यह मिशन इतना खतरनाक था कि इसे हाल के वर्षों के सबसे चुनौतीपूर्ण सैन्य अभियानों में से एक माना जा रहा है। कैसे शुरू हुई पूरी घटना? दरअसल, यह मामला तब शुरू हुआ जब दक्षिणी ईरान के ऊपर उड़ रहे अमेरिकी वायुसेना के एफ-15ई स्ट्राइक ईगल लड़ाकू विमान को मार गिराया गया। इस विमान में दो अधिकारी सवार थे-एक पायलट और एक वेपन्स सिस्टम्स ऑफिसर। हमले के बाद दोनों ने समय रहते इजेक्ट कर लिया। हालांकि, पायलट को उसी दिन सुरक्षित बचा लिया गया, लेकिन दूसरा क्रू सदस्य दुश्मन के इलाके में फंस गया और लापता हो गया। यह घटना इसलिए भी खास थी क्योंकि पिछले 20 सालों में पहली बार किसी अमेरिकी लड़ाकू विमान को दुश्मन ने मार गिराया था। CIA ने कैसे निभाई अहम भूमिका? अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मिशन में CIA ने ग्राउंड इंटेलिजेंस जुटाने, लोकेशन ट्रैक करने और सुरक्षित रूट तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दुश्मन इलाके में फंसे एयरमैन की सटीक लोकेशन का पता लगाना सबसे बड़ी चुनौती थी, जिसे CIA की मदद से संभव बनाया गया। CIA के इनपुट के आधार पर ही अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज ने ऑपरेशन की रणनीति तैयार की और सही समय पर रेस्क्यू मिशन को अंजाम दिया। कैसे चला रेस्क्यू ऑपरेशन? इस हाई-रिस्क ऑपरेशन में अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज के दर्जनों जवान शामिल थे। इसके अलावा लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टरों की मदद से एयर कवर और निकासी (Extraction) की योजना बनाई गई। रेस्क्यू टीम को ईरान के पहाड़ी और दुर्गम इलाके में पहुंचना पड़ा, जहां हर कदम पर दुश्मन की निगरानी और हमले का खतरा था। इसके बावजूद टीम ने साहस और सटीक रणनीति के दम पर एयरमैन तक पहुंच बनाई और उसे सुरक्षित बाहर निकाला। ट्रंप ने दी जानकारी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस सफल ऑपरेशन की जानकारी सोशल मीडिया पर साझा की। उन्होंने कहा, “हमने ईरान के पहाड़ों की गहराई से गंभीर रूप से घायल और बेहद बहादुर एफ-15 क्रू सदस्य को बचा लिया है।” बेहद खतरनाक था मिशन रिपोर्ट्स के अनुसार, एयरमैन गंभीर रूप से घायल था और दुश्मन के इलाके में फंसा हुआ था, जिससे मिशन और भी कठिन हो गया। खराब मौसम, दुर्गम इलाके और लगातार खतरे के बीच इस ऑपरेशन को अंजाम देना सेना के लिए बड़ी चुनौती थी। क्या है इस मिशन का महत्व? यह रेस्क्यू मिशन अमेरिकी सेना की त्वरित कार्रवाई, तकनीकी क्षमता और खुफिया समन्वय का बड़ा उदाहरण माना जा रहा है। CIA और सेना के बीच तालमेल ने यह साबित किया कि मुश्किल से मुश्किल हालात में भी अमेरिका अपने सैनिकों को वापस लाने के लिए हर संभव प्रयास करता है।
मिडिल ईस्ट में जारी तनावपूर्ण हालात के बीच ईरान ने बड़ा दावा करते हुए कहा है कि उसने एक और अमेरिकी एयरफोर्स के अत्याधुनिक F-35 लड़ाकू विमान को मार गिराया है। यह दावा ऐसे समय में सामने आया है, जब क्षेत्र में अमेरिका और ईरान के बीच टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है। ईरान का दावा: पायलट के बचने की संभावना कम ईरान की अर्ध-सरकारी एजेंसी के अनुसार, देश की सेना के मुख्यालय ‘खतम अल-अंबिया’ के प्रवक्ता ने बताया कि F-35 को सफलतापूर्वक निशाना बनाया गया। साथ ही यह भी कहा गया कि हादसे में पायलट गंभीर रूप से घायल हुआ और उसके बचने की संभावना बेहद कम है। ईरान की ओर से कुछ तस्वीरें भी जारी की गई हैं, जिनमें कथित तौर पर विमान के मलबे को दिखाया गया है। अमेरिका की ओर से नहीं हुई पुष्टि हालांकि इस पूरे मामले पर अभी तक अमेरिकी सैन्य कमान United States Central Command की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। इससे पहले भी ईरान ने इसी तरह का दावा किया था, जिसे अमेरिका ने खारिज करते हुए कहा था कि विमान सुरक्षित लैंड कर गया था। कितना खतरनाक है F-35? F-35 Lightning II अमेरिका का पांचवीं पीढ़ी का अत्याधुनिक स्टील्थ लड़ाकू विमान है, जिसे दुनिया के सबसे उन्नत फाइटर जेट्स में गिना जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी ‘स्टील्थ टेक्नोलॉजी’ है, जिससे यह दुश्मन के रडार से लगभग छिपा रहता है। यह विमान दुश्मन के भारी एयर डिफेंस सिस्टम को भेदने, सटीक हमले करने और मल्टी-रोल मिशन को अंजाम देने में सक्षम है। पहले भी हो चुका है ऐसा दावा ईरान इससे पहले 19 मार्च को भी एक F-35 को मार गिराने का दावा कर चुका है। हालांकि उस समय अमेरिका ने साफ कहा था कि विमान ने सुरक्षित इमरजेंसी लैंडिंग कर ली थी। ऐसे में इस बार भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है और दोनों देशों के दावों के बीच सच्चाई की पुष्टि होना बाकी है। बढ़ सकता है वैश्विक तनाव विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह दावा सही साबित होता है, तो यह अमेरिका-ईरान तनाव को और बढ़ा सकता है। इसका असर न केवल मिडिल ईस्ट बल्कि वैश्विक सुरक्षा और कूटनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है।
अमेरिकी सेना में उस समय बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जब ईरान के साथ जारी तनाव और युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। इसी बीच अमेरिका के आर्मी चीफ रैंडी ए. जॉर्ज को अचानक पद से हटाकर तत्काल रिटायर होने के लिए कहा गया है। यह फैसला अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने लिया, जिससे कई सवाल खड़े हो गए हैं। अचानक क्यों लिया गया यह फैसला? पेंटागन की ओर से इस फैसले की पुष्टि तो कर दी गई, लेकिन इसके पीछे कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया। जानकारों का मानना है कि यह कदम अमेरिकी प्रशासन के भीतर चल रहे बड़े सैन्य पुनर्गठन का हिस्सा हो सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन लगातार सेना के शीर्ष नेतृत्व में बदलाव कर रहा है, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंडे के अनुरूप नई रणनीति लागू की जा सके। नए आर्मी चीफ की नियुक्ति रैंडी ए. जॉर्ज के हटने के बाद, वाइस चीफ ऑफ स्टाफ क्रिस्टोफर ला-नेव को कार्यवाहक आर्मी चीफ बनाया गया है। ला-नेव इससे पहले कई महत्वपूर्ण सैन्य पदों पर रह चुके हैं और उन्हें रक्षा मंत्री के करीबी अधिकारियों में भी गिना जाता है। ट्रंप प्रशासन क्यों कर रहा लगातार बदलाव? विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। कई वरिष्ठ अधिकारियों को पहले ही हटाया जा चुका है कुछ को समय से पहले रिटायर किया गया ‘डाइवर्सिटी, इक्विटी और इंक्लूजन’ (DEI) नीतियों को खत्म करने की कोशिश जारी है सूत्रों के मुताबिक, प्रशासन उन अधिकारियों को हटाने की कोशिश कर रहा है, जिन्हें पिछली सरकार की नीतियों से जुड़ा माना जाता है। क्या युद्ध के बीच यह फैसला सही? ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच इस तरह का नेतृत्व परिवर्तन कई विशेषज्ञों को चौंका रहा है। उनका मानना है कि: इससे सैनिकों का मनोबल प्रभावित हो सकता है रणनीतिक फैसलों में अस्थिरता आ सकती है युद्ध के दौरान नेतृत्व में बदलाव जोखिम भरा हो सकता है हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि अमेरिका अपने सैन्य लक्ष्यों को तेजी से पूरा करना चाहता है और इसी दिशा में यह बदलाव किया जा रहा है। रैंडी जॉर्ज का सैन्य करियर रैंडी ए. जॉर्ज एक अनुभवी इन्फैंट्री अधिकारी रहे हैं। वेस्ट प्वाइंट मिलिट्री अकादमी के स्नातक गल्फ वॉर, इराक और अफगानिस्तान में सेवा 2023 में आर्मी चीफ नियुक्त सामान्य कार्यकाल 2027 तक था यानी उनका कार्यकाल अभी पूरा नहीं हुआ था, लेकिन उन्हें समय से पहले ही हटाया गया। आगे क्या हो सकता है? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आने वाले समय में अमेरिकी सेना और प्रशासन में और बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। यह भी संभावना जताई जा रही है कि कुछ और वरिष्ठ अधिकारियों को हटाया या रिटायर किया जा सकता है।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें अमेरिकी F-15 फाइटर जेट को ईरानी ड्रोन का पीछा करते हुए दिखाया गया है। दावा किया जा रहा है कि कम कीमत वाला ईरानी ड्रोन अमेरिकी जेट को चकमा देने में सफल रहा। हालांकि, इस वीडियो की अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। क्या दिख रहा है वायरल वीडियो में? आसमान में अमेरिकी F-15 फाइटर जेट ईरान के कथित शाहेद ड्रोन का पीछा इसके बाद जमीन पर जोरदार धमाका और धुएं का गुबार सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स का दावा है कि अमेरिकी जेट ड्रोन को रोकने में नाकाम रहा, जिससे सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं। एरबिल में तेल प्लांट पर हमला रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना इराक के एरबिल शहर में एक ब्रिटिश कंपनी के मोटर ऑयल प्लांट पर हुए हमले से जुड़ी हो सकती है। प्लांट में भीषण आग लगी आसमान में काला धुआं फैल गया सुबह के समय तीन ड्रोन से हमला किए जाने की बात बताया जा रहा है कि यह प्लांट एक ब्रिटिश ब्रांड का था, जिसे सरदार ग्रुप संचालित करता है। आधिकारिक पुष्टि नहीं अब तक अमेरिका, ब्रिटेन या किसी सहयोगी देश की ओर से इस हमले या वायरल वीडियो की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। ऐसे में दावों की सत्यता पर सवाल बने हुए हैं। इराक में बढ़ता तनाव मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष का असर इराक पर भी साफ दिख रहा है: अमेरिका और ईरान समर्थित समूहों के बीच टकराव बढ़ा कई सैन्य ठिकानों पर हमले इराक सरकार संतुलन बनाने की कोशिश में इराक ने कुछ समूहों को आत्मरक्षा की अनुमति दी है, लेकिन साथ ही चेतावनी दी है कि अमेरिकी हितों पर हमले करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। क्या संकेत देता है यह मामला? यदि वायरल दावे सही साबित होते हैं, तो यह दिखाता है कि कम लागत वाले ड्रोन भी बड़ी सैन्य चुनौती बन सकते हैं पारंपरिक फाइटर जेट्स के सामने नई रणनीतिक चुनौतियां उभर रही हैं
रूस का सैन्य ट्रांसपोर्ट विमान An-26 मंगलवार को क्रीमिया में दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें सवार सभी 29 लोगों की मौत हो गई। हादसे में 23 यात्री और 6 क्रू मेंबर शामिल थे। दुर्घटना के बाद किसी के भी जीवित बचने की खबर नहीं है। रूसी न्यूज एजेंसी TASS के मुताबिक, विमान से पहले संपर्क टूट गया था। इसके कुछ समय बाद पता चला कि विमान चट्टान से टकराकर क्रैश हो गया। हादसे के कारणों की जांच जारी है, हालांकि शुरुआती रिपोर्ट में तकनीकी खराबी की आशंका जताई गई है। जांच जारी, तकनीकी खराबी की आशंका रूसी अधिकारियों ने बताया कि दुर्घटना के पीछे असली कारणों का पता लगाने के लिए जांच शुरू कर दी गई है। फिलहाल तकनीकी खामी को संभावित वजह माना जा रहा है, लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। An-26 विमान की खासियत An-26 सोवियत दौर का सैन्य ट्रांसपोर्ट विमान है, जिसे एंटोनोव कंपनी ने विकसित किया था। इसकी पहली उड़ान 1969 में हुई थी। इस विमान का इस्तेमाल मुख्य रूप से सैनिकों, हथियारों और सैन्य सामान के परिवहन के लिए किया जाता है। यह विमान अपनी खास क्षमता के लिए जाना जाता है, जिसमें छोटे और खराब रनवे से भी उड़ान भरने की क्षमता शामिल है। यही कारण है कि इसका उपयोग दुर्गम और युद्ध क्षेत्रों में व्यापक रूप से किया जाता रहा है। इसके पीछे मौजूद बड़े कार्गो दरवाजे से एयरड्रॉप ऑपरेशन भी किए जा सकते हैं। पुराना डिजाइन, उठते रहे हैं सवाल करीब 50 साल पुराने डिजाइन वाले इस विमान की सुरक्षा को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। पहले भी इस तरह के विमानों से जुड़े हादसे सामने आ चुके हैं। हालांकि, आज भी कई देशों की वायुसेनाएं इसका उपयोग कर रही हैं, लेकिन धीरे-धीरे इन्हें आधुनिक ट्रांसपोर्ट विमानों से बदला जा रहा है।
दुनिया के सबसे आधुनिक माने जाने वाले लड़ाकू विमानों में शामिल F-35 Lightning II एक बार फिर विवादों में है। हालिया रिपोर्ट्स और घटनाओं ने इस फिफ्थ जेनरेशन स्टेल्थ फाइटर की क्षमताओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे भारत के इसे न खरीदने के फैसले पर नई चर्चा शुरू हो गई है। बार-बार हादसे और तकनीकी खामियां पिछले कुछ वर्षों में F-35 से जुड़ी कई दुर्घटनाएं सामने आई हैं। अलग-अलग देशों के बेड़े में शामिल इन विमानों को तकनीकी खराबी, ट्रेनिंग मिशन या लैंडिंग के दौरान नुकसान झेलना पड़ा है। केरल में ब्रिटिश नेवी के F-35B की इमरजेंसी लैंडिंग जैसी घटनाओं ने भी इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए। ईरान के दावे से बढ़ी बहस हालिया घटनाक्रम में ईरान ने दावा किया है कि उसने अपने एयर डिफेंस सिस्टम से F-35 को इंटरसेप्ट कर नुकसान पहुंचाया। हालांकि, अमेरिका ने विमान के नष्ट होने की पुष्टि नहीं की है, लेकिन इस दावे ने स्टेल्थ टेक्नोलॉजी की वास्तविक क्षमता पर चर्चा तेज कर दी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि कोई स्टेल्थ जेट आसानी से ट्रैक या हिट हो सकता है, तो उसकी तकनीकी बढ़त पर सवाल उठना स्वाभाविक है। भारत क्यों रहा सतर्क? भारत को लंबे समय से आधुनिक 5th जेनरेशन फाइटर जेट की जरूरत है, खासकर चीन की बढ़ती सैन्य ताकत को देखते हुए। अमेरिका ने कई बार भारत को F-35 बेचने की कोशिश की, खासतौर पर डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में इस पर जोर दिया गया। लेकिन भारत ने अब तक इस डील पर अंतिम निर्णय नहीं लिया। इसके पीछे कई अहम कारण रहे- टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर सीमाएं हथियार सिस्टम के इंटीग्रेशन की चुनौती लागत और मेंटेनेंस का बोझ और अब उभरते तकनीकी सवाल क्या JF-17 से भी तुलना सही? कुछ रिपोर्ट्स में F-35 की तुलना JF-17 Thunder से की जा रही है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञ इसे अतिशयोक्ति मानते हैं। JF-17 एक हल्का मल्टी-रोल फाइटर है, जबकि F-35 अत्याधुनिक स्टेल्थ टेक्नोलॉजी, सेंसर फ्यूजन और नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर के लिए डिजाइन किया गया है। दोनों की श्रेणी और क्षमताएं अलग हैं, इसलिए सीधी तुलना तकनीकी रूप से सटीक नहीं मानी जाती। भारत के पास क्या विकल्प? भारत फिलहाल अपने स्वदेशी और विदेशी विकल्पों पर समानांतर काम कर रहा है- Su-57 जैसे विकल्पों पर नजर और स्वदेशी 5th जेनरेशन प्रोजेक्ट (AMCA) पर तेजी भारत का लक्ष्य केवल खरीद नहीं, बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता भी है। F-35 पर उठते सवालों के बीच यह साफ है कि भारत बेहद सतर्क रणनीति अपना रहा है। रक्षा खरीद में जल्दबाजी के बजाय दीर्घकालिक रणनीतिक फायदे को प्राथमिकता दी जा रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।