Donald Trump on Giorgia Meloni: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तुर्किए दौरे के दौरान इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर बदले हुए तेवर दिखाए। उन्होंने मेलोनी को "अच्छा इंसान" बताया, लेकिन ईरान से जुड़े मुद्दे पर सहयोग नहीं मिलने को लेकर नाराजगी भी जाहिर की। ट्रंप के इस बयान को दोनों देशों के रिश्तों में आई हालिया तल्खी के बीच अहम माना जा रहा है। ट्रंप बोले- मेलोनी पसंद हैं, लेकिन उन्होंने गलती की तुर्किए की राजधानी अंकारा में ट्रंप ने कहा कि ईरान के मामले में मेलोनी के साथ उनके संबंध कुछ खराब हो गए थे क्योंकि उन्होंने अमेरिका की मदद करने से इनकार कर दिया था। ट्रंप ने कहा, "मैं उन्हें पसंद करता हूं। वह वास्तव में एक अच्छी इंसान हैं, लेकिन मुझे लगता है कि उन्होंने इस मामले में गलती की।" हाल के महीनों में बढ़ी थी दोनों नेताओं के बीच दूरी कुछ समय पहले तक जॉर्जिया मेलोनी को ट्रंप का करीबी सहयोगी माना जाता था, लेकिन पिछले महीने दोनों नेताओं के बीच सार्वजनिक बयानबाजी के बाद रिश्तों में तनाव आ गया। ट्रंप ने दावा किया था कि फ्रांस में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन के दौरान मेलोनी ने उनके साथ फोटो खिंचवाने की इच्छा जताई थी। मेलोनी ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे मनगढ़ंत बताया था। इस विवाद के बाद इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने अपना प्रस्तावित अमेरिका दौरा भी रद्द कर दिया था। ईरान मुद्दे पर भी बढ़ा था विवाद ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े घटनाक्रम के दौरान भी दोनों नेताओं के बीच मतभेद सामने आए थे। जब ट्रंप ने पोप लियो की ईरान संबंधी टिप्पणी की आलोचना की थी, तब मेलोनी ने उनका विरोध किया। बाद में ट्रंप ने आरोप लगाया कि इटली ने होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के प्रयासों में अमेरिका का साथ नहीं दिया। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर भी किया था पोस्ट हाल ही में ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर जॉर्जिया मेलोनी की एक तस्वीर साझा की थी। तस्वीर के साथ उन्होंने लिखा था, "रोक लगाने वाले आदेश की ज़रूरत है।" हालांकि इटली सरकार ने इस पोस्ट पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी। विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने कहा कि ट्रंप अक्सर सोशल मीडिया पर उकसाने वाले बयान देते हैं और इटली ने इस पर प्रतिक्रिया न देने का फैसला किया है। पहले भी अमेरिका को नहीं मिली थी इजाजत मार्च में इटली ने सिसिली स्थित सिगोनेला एयरबेस पर अमेरिकी सैन्य विमानों को उतरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। इटली का कहना था कि अमेरिका ने इस संबंध में पहले से आवश्यक अनुमति नहीं ली थी। ट्रंप के ताजा बयान के बाद माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच हाल के महीनों में पैदा हुई कूटनीतिक दूरी को कम करने की कोशिश शुरू हो सकती है।
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर चल रही बातचीत के बीच परमाणु निरीक्षण का मुद्दा एक बार फिर विवाद के केंद्र में आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कहा है कि किसी भी अंतिम समझौते में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों को ईरान के परमाणु ठिकानों की जांच की अनुमति देना अनिवार्य होगा। वहीं, ईरान इस तरह की व्यापक निरीक्षण व्यवस्था को स्वीकार करने से इनकार करता नजर आ रहा है। ट्रंप ने ईरान के दावों को बताया गलत पेंसिल्वेनिया में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने ईरानी अधिकारियों के उन दावों को खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि तेहरान ने किसी व्यापक अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था को मंजूरी नहीं दी है। ट्रंप ने कहा कि ईरानी अधिकारी इस मुद्दे पर गलत जानकारी दे रहे हैं और उन्हें बातचीत में तय हो रही शर्तों की पूरी जानकारी है। उन्होंने कहा, “निरीक्षण व्यवस्था सौ फीसदी तय है। अगर ऐसा नहीं होता तो मैं अभी बातचीत और बैठकों को रद्द कर देता।” IAEA को मिलेगी परमाणु ठिकानों तक पहुंच अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि भविष्य में IAEA के निरीक्षकों को ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों तक पहुंच मिलेगी और वे मौके पर जाकर जांच कर सकेंगे। ट्रंप के अनुसार, किसी भी समझौते की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र और अंतरराष्ट्रीय निगरानी व्यवस्था जरूरी है। उन्होंने कहा कि उचित समय आने पर निरीक्षक जमीन पर मौजूद होंगे और समझौते के अनुपालन की पुष्टि करेंगे। निरीक्षण व्यवस्था पर दोनों देशों में मतभेद परमाणु निगरानी को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं। अमेरिका का मानना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर किसी भी समझौते में स्वतंत्र जांच और सत्यापन की व्यवस्था जरूरी है। वहीं, ईरान कई बार यह कह चुका है कि उसकी परमाणु गतिविधियां शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए हैं और अत्यधिक अंतरराष्ट्रीय निगरानी उसकी संप्रभुता के खिलाफ हो सकती है। ईरान ने ट्रंप और जेडी वेंस के दावों को नकारा ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने अमेरिकी दावों को खारिज करते हुए कहा कि परमाणु स्थलों की जांच को लेकर कोई अंतिम समयसीमा तय नहीं हुई है। उन्होंने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस बयान का भी खंडन किया, जिसमें कहा गया था कि ईरान स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के लिए तैयार हो गया है। बघाई ने कहा कि इस विषय पर अभी कई मुद्दों पर चर्चा बाकी है। परमाणु समझौतों में हमेशा अहम रहा है सत्यापन विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान से जुड़े सभी प्रमुख परमाणु समझौतों में निगरानी और सत्यापन सबसे महत्वपूर्ण तत्व रहे हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी देश चाहते हैं कि यह सुनिश्चित किया जाए कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण और नागरिक उद्देश्यों तक सीमित रहे। दूसरी ओर, ईरान का तर्क रहा है कि सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर उसकी चिंताओं को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। 60 दिनों की समयसीमा में आगे बढ़ रही बातचीत अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए समझौते के तहत कई मुद्दों पर चरणबद्ध बातचीत जारी है। दोनों पक्षों ने 60 दिनों के भीतर व्यापक सहमति बनाने की दिशा में काम करने पर सहमति जताई है। स्विट्जरलैंड में हाल में हुई वार्ता में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी अधिकारियों के बीच परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत, क्षेत्रीय सुरक्षा, पुनर्निर्माण और होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी। होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य हो रही गतिविधियां वार्ता के बाद अमेरिकी प्रशासन ने दावा किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल परिवहन में तेजी आई है और समुद्री गतिविधियां सामान्य होने लगी हैं। अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठनों के अनुसार, क्षेत्र में फंसे हजारों नाविकों और जहाज कर्मियों को सुरक्षित निकालने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। अंतिम समझौते में निरीक्षण बन सकता है सबसे बड़ा मुद्दा विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच व्यापक शांति समझौते की राह में परमाणु निरीक्षण सबसे संवेदनशील और निर्णायक मुद्दा बन सकता है। ट्रंप के ताजा बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिकी प्रशासन किसी भी अंतिम समझौते में निरीक्षण और सत्यापन तंत्र से समझौता करने के पक्ष में नहीं है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तेहरान अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था को लेकर कितना लचीला रुख अपनाता है और क्या दोनों देश किसी साझा समाधान तक पहुंच पाते हैं।
वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते की घोषणा के बाद दुनिया भर के नेताओं ने इसका स्वागत किया है। कतर, तुर्किये, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस समेत कई देशों ने इसे पश्चिम एशिया में स्थिरता बहाल करने, होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) को दोबारा खोलने और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे दबाव को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शांति समझौते के दावे और पाकिस्तान की ओर से 19 जून को स्विट्जरलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर होने की घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। ईरान ने भी संकेत दिया है कि निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद समझौते पर हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। कतर ने कहा- स्थायी शांति की दिशा में अहम पहल Mohammed bin Abdulrahman Al Thani ने अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि यह पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आगे की वार्ताएं सकारात्मक और रचनात्मक माहौल में आगे बढ़ेंगी। एर्दोआन बोले- दुनिया लंबे समय से इस खबर का इंतजार कर रही थी Recep Tayyip Erdoğan ने कहा कि पूरी दुनिया लंबे समय से इस तरह की खबर का इंतजार कर रही थी। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह समझौता क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त करेगा। एर्दोआन ने सभी पक्षों से संयम बरतने और उकसावे वाली गतिविधियों से बचने की अपील की। साथ ही उन्होंने पाकिस्तान, कतर और सऊदी अरब के कूटनीतिक प्रयासों की सराहना की। ब्रिटेन ने बताया युद्ध समाप्ति की दिशा में बड़ी उपलब्धि Keir Starmer ने इस समझौते को युद्ध समाप्त करने और क्षेत्रीय स्थिरता बहाल करने की दिशा में बड़ी उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। स्टार्मर ने यह भी कहा कि समझौते को पूरी तरह लागू किया जाना चाहिए और ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाने की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता बनी रहनी चाहिए। जर्मनी ने कहा- वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत Friedrich Merz ने इस समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि यह पश्चिम एशिया में तनाव कम करने और वैश्विक अर्थव्यवस्था को नई गति देने वाला कदम साबित हो सकता है। उन्होंने इसे दूरगामी प्रभाव वाला कूटनीतिक समाधान बताते हुए कहा कि इससे ऊर्जा बाजारों में स्थिरता लौट सकती है और व्यापारिक अनिश्चितताएं कम हो सकती हैं। फ्रांस ने होर्मुज जलडमरूमध्य तत्काल खोलने की मांग की Emmanuel Macron ने कहा कि समझौते का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम होर्मुज जलडमरूमध्य का तत्काल और बिना किसी शर्त के दोबारा खुलना होना चाहिए। मैक्रों ने कहा कि फ्रांस और ब्रिटेन अंतरराष्ट्रीय समुद्री यातायात को सामान्य बनाने के प्रयासों में सहयोग देने के लिए तैयार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि समझौते के बाद ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों सहित क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े व्यापक मुद्दों पर भी बातचीत आगे बढ़नी चाहिए। ट्रंप ने किया समझौता पूरा होने का दावा Donald Trump ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर दावा किया कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता पूरा हो चुका है और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की अनुमति दी जा रही है। ट्रंप ने कहा, "दुनिया के जहाज अब अपने इंजन शुरू करें, तेल का प्रवाह जारी रहने दें।" पाकिस्तान की मध्यस्थता की चर्चा Shehbaz Sharif ने दावा किया कि लंबी बातचीत के बाद दोनों पक्ष समझौते पर सहमत हुए हैं और 19 जून को स्विट्जरलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि समझौते को अंतिम रूप देने में कतर, सऊदी अरब और तुर्किये की भूमिका अहम रही है। वैश्विक बाजार की नजरें 19 जून पर यदि प्रस्तावित समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर होते हैं और होर्मुज जलडमरूमध्य दोबारा खुलता है, तो इसका असर वैश्विक तेल आपूर्ति, ऊर्जा कीमतों और पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति पर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब 19 जून को होने वाली संभावित औपचारिक प्रक्रिया और उसके बाद की घटनाओं पर नजर बनाए हुए है।
तेहरान/वॉशिंगटन डीसी, एजेंसियां। अमेरिका और ईरान रविवार को जंग खत्म करने के लिए शांति समझौते पर राजी हो गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ईरान के साथ समझौता अब पूरा हो गया है। वहीं ईरान ने बयान जारी कर कहा कि अमेरिका के साथ कई महीनों तक चली लंबी और मुश्किल बातचीत के बाद दोनों देशों ने एक डील यानी MoU को अंतिम रूप दे दिया है। नौसैनिक नाकेबंदी हटाने को मंजूरी ट्रम्प ने कहा कि इस समझौते के तहत होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोला जाएगा। उन्होंने ईरानी बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को तुरंत हटाने की मंजूरी दे दी है। ट्रम्प ने अपने पोस्ट में लिखा, ‘दुनिया के जहाजो, अपने इंजन चालू कर लो। तेल को बहने दो।’ जेनेवा में होगा समझौते पर हस्ताक्षर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि दोनों देश पीस डील पर 19 जून को स्विट्जरलैंड के जेनेवा में दस्तखत करेंगे। अगर ऐसा होता है तो यह 47 साल में तेहरान और वॉशिंगटन के बीच हाई लेवल की बैठक होगी। ईरान ने दस्तखत करने से पहले 3 शर्तें रखी ईरान-अमेरिका के बीच हुए समझौते का पूरा दस्तावेज अभी जारी नहीं किया गया है। हालांकि, ईरानी मीडिया के मुताबिक दोनों देशों के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) में कुछ अहम बातें शामिल हैं। इनमें युद्ध और सैन्य कार्रवाई रोकना, होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलना, अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाना, ईरान के कुछ फ्रीज्ड फंड जारी करना, परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों पर अगले 60 दिनों की बातचीत का ढांचा तय करना शामिल है। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा है कि MoU पर हस्ताक्षर होने के बाद शुरू होने वाली 60 दिन की अमेरिका-ईरान की बातचीत इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका पहले अपने तीन वादे पूरे करता है या नहीं। अमेरिका को ये 3 शर्ते पूरी करनी होगी गरीबाबादी के मुताबिक अमेरिका को तीन कदम उठाने होंगे- 1. नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करना, 2. युद्ध और सभी सैन्य कार्रवाइयों को रोकना, 3. ईरान के फ्रीज्ड फंड जारी करना।
वॉशिंगटन: लेबनान की राजधानी बेरूत पर इजराइली हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप ने इजराइल और ईरान दोनों को चेतावनी देते हुए कहा कि पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने के प्रयास निर्णायक चरण में हैं और ऐसे समय में किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई से बचना चाहिए। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट करते हुए कहा, “आज सुबह बेरूत पर हुआ हमला नहीं होना चाहिए था, खासकर ऐसे दिन जब हम ईरान के साथ शांति समझौते के बहुत करीब हैं।” ‘इजराइल को आत्मरक्षा का अधिकार, लेकिन जवाबी हमला बेमतलब था’ ट्रंप ने कहा कि इजराइल को अपनी सुरक्षा और खतरों से बचाव का पूरा अधिकार है, लेकिन जिस घटना के जवाब में यह हमला किया गया, उसमें कोई घायल या हताहत नहीं हुआ था। ऐसे में इस तरह की सैन्य कार्रवाई की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने कहा, “इजराइल को अपने नागरिकों की रक्षा करने का अधिकार है, लेकिन इस मामले में की गई जवाबी कार्रवाई बेमतलब थी।” ‘अब आगे कोई हमला नहीं होना चाहिए’ अमेरिकी राष्ट्रपति ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील करते हुए कहा कि क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए सभी पक्षों को पीछे हटना होगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न केवल इजराइल को लेबनान में आगे कोई हमला नहीं करना चाहिए, बल्कि हिज्बुल्ला और अन्य संगठनों को भी इजराइल के खिलाफ किसी प्रकार की सैन्य कार्रवाई से बचना चाहिए। ट्रंप ने लिखा, “हम एक ऐसे समझौते के बेहद करीब हैं, जो लेबनान समेत पूरे क्षेत्र में शांति ला सकता है। सभी पक्षों को पीछे हटना चाहिए। इजराइल को लेबनान में और हमले नहीं करने चाहिए और हिज्बुल्ला समेत किसी भी अन्य पक्ष को भी इजराइल पर हमला नहीं करना चाहिए।”
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump के जन्मदिन पर व्हाइट हाउस में बड़ा UFC फाइट इवेंट आयोजित किया जाएगा। इसके लिए व्हाइट हाउस के साउथ लॉन में विशाल फाइटिंग एरीना तैयार किया जा रहा है। मंगलवार को वहां बड़े क्रेन और लोहे के ढांचे लगाते हुए देखा गया। यह मुकाबला 14 जून को होगा, जो ट्रंप का 80वां जन्मदिन भी है। हजारों लोग लाइव देखेंगे मुकाबला ट्रंप ने बताया कि इस इवेंट में करीब 4,500 लोग सीधे व्हाइट हाउस लॉन में बैठकर मुकाबला देख सकेंगे। इसके अलावा व्हाइट हाउस के बाहर बड़ी स्क्रीन लगाई जाएंगी, जहां करीब 1 लाख लोग मुफ्त में मैच देख पाएंगे। ट्रंप बोले- ऐसा इवेंट पहले कभी नहीं हुआ इस महीने ओवल ऑफिस में हुए एक कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने कहा था कि यह बेहद बड़ा फाइट इवेंट होगा और ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। उन्होंने UFC के मशहूर ऑक्टागन रिंग की तस्वीर भी दिखाई थी, जिसके पीछे व्हाइट हाउस नजर आ रहा था। UFC फाइटिंग के बड़े फैन हैं ट्रंप डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से UFC मुकाबलों के समर्थक रहे हैं। वह कई बड़े फाइट इवेंट्स में हिस्सा लेते रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि UFC जैसे खेलों के जरिए ट्रंप युवा पुरुष वोटर्स के बीच अपनी लोकप्रियता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। ‘UFC Freedom 250’ रखा गया इवेंट का नाम इस खास मुकाबले का नाम “UFC Freedom 250” रखा गया है। ट्रंप ने इसे अमेरिका की स्थापना की 250वीं वर्षगांठ से जुड़ा कार्यक्रम बताया है। UFC की ओर से पहले ही घोषणा की जा चुकी है कि मुख्य मुकाबले में Ilia Topuria और Justin Gaethje आमने-सामने होंगे। इस इवेंट पर खर्च होंगे करोड़ों डॉलर रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस आयोजन पर करीब 6 करोड़ डॉलर खर्च हो सकते हैं। व्हाइट हाउस का कहना है कि इस कार्यक्रम का पूरा खर्च UFC कंपनी उठाएगी और अमेरिकी टैक्सपेयर्स का पैसा इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। व्हाइट हाउस में पहले भी कर चुके हैं बड़े बदलाव यह आयोजन ट्रंप द्वारा व्हाइट हाउस में किए जा रहे बड़े बदलावों का हिस्सा माना जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इससे पहले रोज गार्डन की घास हटाई जा चुकी है और ईस्ट विंग में बड़ा बॉलरूम बनाने की योजना पर भी काम चल रहा है। युद्ध और महंगाई के बीच हो रहा बड़ा आयोजन यह इवेंट ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका ईरान के साथ बढ़ते तनाव और महंगाई जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। इसी वजह से विपक्षी दल और कई विश्लेषक इस आयोजन को लेकर सवाल भी उठा रहे हैं।
वॉशिंगटन: Donald Trump की लोकप्रियता में गिरावट के संकेत मिल रहे हैं। एक ताजा सर्वे के मुताबिक, अमेरिका में उनकी कुल अप्रूवल रेटिंग घटकर 37% रह गई है, जबकि 66% लोग उनकी आर्थिक नीतियों से असंतुष्ट हैं। सर्वे में क्या सामने आया? ‘वॉशिंगटन पोस्ट-एबीसी न्यूज-इप्सोस’ सर्वे के अनुसार: कुल अप्रूवल रेटिंग: 37% अस्वीकृति: 62% (अब तक का उच्च स्तर) अर्थव्यवस्था पर समर्थन: 34% महंगाई पर समर्थन: 27% जीवन-यापन लागत पर समर्थन: सिर्फ 23% रिपोर्ट बताती है कि फरवरी के मुकाबले ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट आई है और आर्थिक मुद्दों पर जनता का भरोसा कमजोर हुआ है। ईरान नीति पर भी जनता नाराज Iran के साथ बढ़ते तनाव का असर भी ट्रंप की छवि पर पड़ा है। 66% अमेरिकियों ने ईरान से निपटने के तरीके को गलत बताया सिर्फ 33% लोगों ने उनकी नीति का समर्थन किया यह संकेत देता है कि विदेश नीति, खासकर मध्य-पूर्व को लेकर ट्रंप की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं। महंगाई और ईंधन कीमतों का असर अमेरिका में बढ़ती महंगाई और ईंधन की कीमतों ने आम लोगों की जेब पर असर डाला है। इसका सीधा असर ट्रंप की लोकप्रियता पर दिख रहा है। महंगाई से जुड़े मुद्दों पर 76% लोगों ने असहमति जताई जीवन-यापन की लागत सबसे बड़ा चिंता का विषय बनकर उभरी आव्रजन पर मिला मिश्रित समर्थन हालांकि United States-मेक्सिको सीमा पर ट्रंप की नीतियों को कुछ हद तक समर्थन मिला है: 45% लोगों ने आव्रजन नीति को मंजूरी दी 54% लोग इससे असहमत रहे राजनीतिक दलों पर घटा भरोसा सर्वे में यह भी सामने आया कि बड़ी संख्या में अमेरिकी किसी भी राजनीतिक दल पर भरोसा नहीं कर रहे हैं: आव्रजन: 23% को किसी दल पर भरोसा नहीं अर्थव्यवस्था: 27% अपराध: 28% महंगाई: 33% AI मुद्दा: 51% लोगों को किसी दल पर भरोसा नहीं यह रुझान अमेरिकी राजनीति में बढ़ती निराशा और अविश्वास को दिखाता है। रिपब्लिकन समर्थकों में अब भी मजबूत पकड़ हालांकि आम जनता में गिरावट के बावजूद Republican Party के समर्थकों के बीच ट्रंप की पकड़ मजबूत बनी हुई है। 85% रिपब्लिकन समर्थक अब भी उनके साथ हैं चुनाव से पहले बढ़ी चुनौती नवंबर में होने वाले चुनाव से पहले यह सर्वे Donald Trump के लिए चेतावनी माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आर्थिक हालात और महंगाई पर नियंत्रण नहीं हुआ, तो चुनावी असर साफ दिखाई दे सकता है।
Iran US Tension: ईरान और अमेरिका के बीच संभावित बातचीत की अटकलों के बीच तेहरान ने सख्त रुख अपनाया है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिकी दबाव और धमकियों के बीच किसी भी वार्ता को स्वीकार नहीं करेगा। ईरान का तीखा बयान ईरानी संसद (मजलिस) के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अमेरिका पर तीखा हमला बोला। उन्होंने लिखा: “ट्रंप घेराबंदी और युद्धविराम तोड़कर बातचीत की मेज़ को आत्मसमर्पण की मेज़ बनाना चाहते हैं या फिर युद्ध को सही ठहराना चाहते हैं।” ग़ालिबाफ़ ने साफ कहा कि ईरान “धमकियों के साये में बातचीत” नहीं करेगा। ‘मैदान-ए-जंग में नए पत्ते खोलने की तैयारी’ ग़ालिबाफ़ ने अपने बयान में संकेत दिया कि ईरान सैन्य विकल्पों के लिए भी तैयार है। उन्होंने कहा: “पिछले दो हफ्तों से हमने मैदान-ए-जंग में नए पत्ते खोलने की तैयारी कर ली है।” यह बयान ऐसे समय आया है जब क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है। ट्रंप की रणनीति पर सवाल अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump लगातार ईरान पर दबाव बना रहे हैं और समझौते की बात कर रहे हैं। लेकिन ईरान का आरोप है कि: अमेरिका एक तरफ बातचीत की बात करता है दूसरी तरफ सैन्य दबाव और नाकेबंदी जारी रखता है पाकिस्तान में वार्ता पर अनिश्चितता Islamabad में दूसरे दौर की बातचीत की तैयारियां चल रही हैं। अमेरिका ने अपना प्रतिनिधिमंडल भेजने की बात कही है। हालांकि, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmail Baghaei ने कहा: अभी तक वार्ता को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है ईरान फिलहाल स्थिति का आकलन कर रहा है पहले दौर की बातचीत का संदर्भ ईरान और अमेरिका के बीच पहले दौर की बातचीत पहले ही हो चुकी है, जिसमें Mohammad Bagher Ghalibaf ने ईरान का नेतृत्व किया था। हालांकि, वह वार्ता किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी।
US Iran War: ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। इस्लामाबाद में प्रस्तावित दूसरे दौर की वार्ता फिलहाल स्थगित हो गई है, क्योंकि ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह फिलहाल किसी भी बातचीत में शामिल होने के मूड में नहीं है। इसी बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच फोन पर बातचीत की खबर सामने आई है। ईरान ने बातचीत से किया इनकार ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने साफ कहा है कि तेहरान के पास फिलहाल अमेरिका के साथ किसी भी नए दौर की वार्ता की कोई योजना नहीं है। यह बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान में शांति वार्ता की कोशिशें तेज थीं और मध्यस्थता की तैयारी चल रही थी। मुनीर-ट्रंप फोन कॉल में क्या हुआ? रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बातचीत की। इस बातचीत में बताया गया कि: होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव वार्ता के लिए सबसे बड़ा रोड़ा है ईरान की स्थिति के कारण बातचीत आगे बढ़ना मुश्किल हो रहा है बताया जा रहा है कि ट्रंप ने इस मुद्दे पर “गंभीरता से विचार करने” की बात कही है। होर्मुज संकट बना मुख्य वजह होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका और ईरान दोनों एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। हाल ही में: अमेरिका ने ईरानी ध्वज वाले मालवाहक पोत को रोका ईरान ने इसे “समुद्री डकैती” बताया दोनों देशों के बीच समुद्री तनाव और बढ़ गया अमेरिकी कार्रवाई और ईरान की चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार, ईरानी जहाज “तुस्का” को रुकने की चेतावनी दी गई और फिर उसे नियंत्रित कर लिया गया। अमेरिका का दावा है कि: जहाज प्रतिबंधों से बचने की कोशिश कर रहा था अमेरिकी मरीन ने उसे सुरक्षित रूप से कब्जे में लिया वहीं ईरान ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी है। पहली बार नाकेबंदी के बाद बड़ी घटना अमेरिकी नाकेबंदी अभियान शुरू होने के बाद यह पहली बड़ी घटना है जब किसी ईरानी पोत को सीधे रोका गया है। ईरान का कहना है कि यह: समुद्री डकैती जैसा कदम है और युद्धविराम की शर्तों का उल्लंघन है सीजफायर पर भी खतरा ईरान और अमेरिका के बीच जारी 14 दिनों का सीजफायर 22 अप्रैल को खत्म हो रहा है। ऐसे में: वार्ता की अनिश्चितता बढ़ गई है होर्मुज तनाव ने स्थिति और जटिल बना दी है पाकिस्तान की मध्यस्थता पर भी सवाल उठ रहे हैं
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच बड़ी कूटनीतिक पहल सामने आई है। Iran और United States के बीच दो हफ्ते के सीजफायर पर सहमति बनने के बाद अब दोनों देशों के बीच औपचारिक वार्ता शुरू होने जा रही है। यह अहम बातचीत Islamabad में शुक्रवार को आयोजित होगी, जिसकी मेजबानी Pakistan करेगा। ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अनुसार, यह बातचीत तेहरान के 10-सूत्रीय प्रस्ताव के आधार पर होगी। इस प्रस्ताव में सबसे अहम मांग Strait of Hormuz पर नियंत्रण और सभी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को हटाने की है। सीजफायर के बाद शुरू हुई कूटनीतिक प्रक्रिया यह घटनाक्रम तब सामने आया जब Donald Trump ने ईरान पर हमले अस्थायी रूप से रोकने का ऐलान किया। इसके जवाब में ईरान ने भी अपनी सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति जताई। दोनों पक्षों ने दो हफ्ते के भीतर स्थायी समझौते की दिशा में काम करने की बात कही है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य बना मुख्य मुद्दा दुनिया के लगभग 20% तेल सप्लाई का रास्ता Strait of Hormuz से होकर गुजरता है। ईरान द्वारा आंशिक नाकेबंदी के कारण वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल मच गई थी, जिससे ईंधन की कीमतें बढ़ीं और कई देशों में सप्लाई प्रभावित हुई। अब अमेरिका ने इस जलमार्ग को पूरी तरह खोलने की शर्त रखी है, जबकि ईरान इसके बदले आर्थिक प्रतिबंध हटाने और क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखने की मांग कर रहा है। पाकिस्तान की मध्यस्थता से बढ़ी उम्मीदें Shehbaz Sharif ने दोनों देशों के बीच सीजफायर की पुष्टि करते हुए इस्लामाबाद में बातचीत के लिए आमंत्रण दिया है। उन्होंने इसे क्षेत्रीय शांति की दिशा में बड़ा कदम बताया है। प्रस्ताव में क्या-क्या शामिल? ईरान के 10-सूत्रीय प्रस्ताव में शामिल प्रमुख मांगें: हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर निगरानी और नियंत्रण मध्य-पूर्व से अमेरिकी सैनिकों की वापसी युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई सभी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना विदेशी बैंकों में जमा ईरानी संपत्तियों की रिहाई हालांकि, ईरान ने साफ कहा है कि वह अमेरिका पर “पूरी तरह भरोसा नहीं करता” और किसी भी गलती पर कड़ी प्रतिक्रिया देगा। इजरायल की चुप्पी बरकरार इस पूरे घटनाक्रम पर Israel की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, जबकि वह इस संघर्ष का अहम पक्ष रहा है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल का असर अब भारत के ईंधन बाजार पर साफ दिखने लगा है। सोमवार, 23 मार्च 2026 को देश के कई राज्यों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बदलाव देखने को मिला। जहां कुछ राज्यों में तेल महंगा हुआ है, वहीं कुछ जगहों पर मामूली राहत भी मिली है। ग्लोबल मार्केट में Brent Crude Oil $112 प्रति बैरल के पार पहुंच गया है, जबकि WTI Crude Oil भी $100 के करीब है। मिडिल ईस्ट तनाव और डोनाल्ड ट्रम्प की चेतावनी के बाद तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है, जिसका सीधा असर भारत में ईंधन कीमतों पर पड़ा है। मेट्रो शहरों में क्या है आज का रेट? देश की तेल कंपनियों ने सुबह 6 बजे नए रेट जारी किए। प्रमुख महानगरों में कीमतें इस प्रकार हैं: दिल्ली: पेट्रोल ₹94.77 | डीजल ₹87.67 प्रति लीटर मुंबई: पेट्रोल ₹103.54 | डीजल ₹90.03 प्रति लीटर कोलकाता: पेट्रोल ₹105.45 | डीजल ₹92.02 प्रति लीटर चेन्नई: पेट्रोल ₹100.84 | डीजल ₹92.39 प्रति लीटर इन शहरों में आज कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। इन राज्यों में बढ़े दाम कई राज्यों में आज ईंधन महंगा हो गया है: बिहार: पेट्रोल ₹106.95, डीजल ₹93.14 उत्तर प्रदेश: पेट्रोल ₹95.00, डीजल ₹88.72 झारखंड: पेट्रोल ₹99.16, डीजल ₹93.89 गोवा: पेट्रोल ₹96.96, डीजल ₹88.71 केरल: पेट्रोल ₹96.96, डीजल ₹96.02 तमिलनाडु: पेट्रोल ₹102.34, डीजल ₹93.89 इसके अलावा हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और मणिपुर में भी मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इन राज्यों में मिली राहत कुछ राज्यों में तेल की कीमतों में गिरावट भी देखी गई: गुजरात: पेट्रोल ₹95.07, डीजल ₹90.77 कर्नाटक: पेट्रोल ₹102.41, डीजल ₹90.48 मध्य प्रदेश: पेट्रोल ₹106.18, डीजल ₹91.56 महाराष्ट्र: पेट्रोल ₹105.43, डीजल ₹91.94 ओडिशा: पेट्रोल ₹102.23, डीजल ₹93.79 उत्तराखंड: पेट्रोल ₹94.51, डीजल ₹89.44 पश्चिम बंगाल: पेट्रोल ₹105.80, डीजल ₹92.37 क्यों बदलते हैं रोज दाम? पेट्रोल-डीजल की कीमतें कई कारकों पर निर्भर करती हैं, जिनमें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के दाम, डॉलर-रुपया विनिमय दर और राज्य सरकारों द्वारा लगाए गए VAT शामिल हैं। यही वजह है कि हर राज्य और शहर में कीमतें अलग-अलग होती हैं। घर बैठे ऐसे चेक करें रेट आप अपने शहर का ताजा रेट SMS के जरिए भी जान सकते हैं: Indian Oil: RSP <City Code> भेजें 9224992249 पर BPCL: RSP भेजें 9223112222 पर HPCL: HP Price भेजें 9222201122 पर
हफ्ते के पहले कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई, जिससे निवेशकों के अरबों रुपये कुछ ही मिनटों में स्वाहा हो गए। वैश्विक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बीच बाजार में जबरदस्त बिकवाली देखने को मिली। सोमवार सुबह बाजार खुलते ही BSE Sensex 1,474.56 अंक यानी करीब 2% की गिरावट के साथ 73,058.40 पर आ गया। वहीं Nifty 50 भी 433.70 अंक (1.88%) टूटकर 22,680.80 के स्तर पर पहुंच गया। शुरुआती कारोबार में ही बाजार पूरी तरह लाल निशान में डूबा नजर आया। क्यों आई बाजार में इतनी बड़ी गिरावट? इस भारी गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण मिडिल ईस्ट में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव और डोनाल्ड ट्रम्प की कड़ी चेतावनी मानी जा रही है। ट्रम्प ने ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ खोलने को कहा है, अन्यथा ऊर्जा ठिकानों पर हमले की धमकी दी है। इस घटनाक्रम से वैश्विक सप्लाई चेन को लेकर चिंता बढ़ गई है। इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है-WTI Crude Oil $100 के करीब पहुंच गया, जबकि Brent Crude Oil $112.17 के पार चला गया। तेल की कीमतों में इस तेजी ने बाजार की घबराहट और बढ़ा दी। किन शेयरों में सबसे ज्यादा गिरावट? बाजार में आई इस गिरावट का सबसे ज्यादा असर बड़े और दिग्गज शेयरों पर पड़ा। Hindalco Industries, Tata Steel, State Bank of India, Mahindra & Mahindra और HDFC Bank जैसे प्रमुख शेयरों में तेज गिरावट दर्ज की गई। हालांकि गिरावट के इस माहौल में Max Healthcare और ONGC जैसे कुछ शेयरों में मामूली बढ़त देखने को मिली। हर सेक्टर पर पड़ा असर इस गिरावट से कोई भी सेक्टर अछूता नहीं रहा। ऑटो, बैंकिंग, मेटल, मीडिया और PSU बैंक समेत सभी सेक्टोरल इंडेक्स 2% तक टूट गए। सिर्फ बड़े शेयर ही नहीं, बल्कि मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स में भी 2% से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई, जिससे बाजार में व्यापक कमजोरी का संकेत मिला। एशियाई बाजारों में भी ‘ब्लैक मंडे’ जैसा माहौल भारतीय बाजार के साथ-साथ एशियाई बाजारों में भी भारी गिरावट देखने को मिली। दक्षिण कोरिया का KOSPI 4.57% और जापान का Nikkei 4% से ज्यादा टूट गया। International Energy Agency के प्रमुख फातिह बिरोल ने चेतावनी दी है कि दुनिया कई दशकों के सबसे बड़े ऊर्जा संकट की ओर बढ़ रही है, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर हो सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।