Education Policy

Fee Regulation Committee
दिल्ली सरकार का बड़ा फैसला, निजी स्कूलों में 15 जुलाई तक बनेगी फीस रेगुलेशन कमेटी

नई दिल्ली, एजेंसियां। दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय ने राजधानी के सभी मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों को 15 जुलाई 2026 तक स्कूल-स्तरीय फीस रेगुलेशन कमेटी गठित करने का निर्देश दिया है। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य स्कूल फीस निर्धारण प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है।   15 जुलाई तक कमेटी बनाना अनिवार्य   शिक्षा निदेशालय के आदेश के अनुसार, सभी निजी स्कूलों को निर्धारित समय सीमा के भीतर फीस रेगुलेशन कमेटी का गठन करना होगा। इस कमेटी में स्कूल प्रबंधन, शिक्षक और अभिभावकों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा, ताकि फीस से जुड़े फैसलों में सभी पक्षों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके।   नई फीस मंजूर होने तक पुरानी फीस ही रहेगी लागू   सरकार ने स्पष्ट किया है कि जब तक नई फीस संरचना को मंजूरी नहीं मिल जाती, तब तक स्कूल पहले से लागू फीस ही वसूल सकेंगे। किसी भी तरह की मनमानी फीस वृद्धि की अनुमति नहीं होगी।   अभिभावकों को मिलेगी राहत   सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से फीस निर्धारण में पारदर्शिता बढ़ेगी और अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा। साथ ही स्कूलों को भी निर्धारित नियमों के तहत ही फीस संबंधी निर्णय लेने होंगे।   शिक्षा विभाग रखेगा निगरानी   शिक्षा विभाग ने कहा है कि सभी स्कूलों को निर्देशों का पालन करना होगा। नियमों के उल्लंघन की स्थिति में संबंधित स्कूलों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।

anjali kumari जुलाई 3, 2026 0
Education System
अब एक बैंक खाते से होगा राज्य के सभी विश्वविद्यालयों का वित्तीय लेनदेन

रांची। झारखंड सरकार राज्य के सभी विश्वविद्यालयों की वित्तीय व्यवस्था में व्यापक सुधार करने जा रही है। इसके तहत वर्षों से अलग-अलग विभागों, अंगीभूत कॉलेजों, परीक्षा शाखाओं और विभिन्न योजनाओं के नाम पर संचालित बैंक खातों की व्यवस्था समाप्त कर दी जाएगी। अब प्रत्येक विश्वविद्यालय का केवल एक सिंगल नोडल अकाउंट (एसएनए) होगा, जिसके माध्यम से सभी वित्तीय लेनदेन किए जाएंगे। इस नई व्यवस्था के लिए "स्टैच्यूट्स फॉर फाइनेंस एंड अकाउंट मैनेजमेंट (Statutes for Finance and Account Management) इन स्टेट यूनिवर्सिटीज ऑफ झारखंड" का मसौदा (Draft ) तैयार कर लिया गया है।   ई-समर्थ पोर्टल से होगा पूरा वित्तीय प्रबंधन नई व्यवस्था लागू होने के बाद बजट तैयार करने, भुगतान, लेखांकन, बैंक मिलान, ऑडिट और वित्तीय रिपोर्टिंग तक की पूरी प्रक्रिया ई-समर्थ पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन संचालित होगी। नकद भुगतान और मैनुअल वाउचर की व्यवस्था पूरी तरह समाप्त कर दी जाएगी। प्रत्येक भुगतान का डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रहेगा, जिससे किसी भी समय उसकी जांच और ऑडिट करना आसान होगा। सरकार का उद्देश्य वित्तीय पारदर्शिता बढ़ाना और अनियमितताओं पर पूरी तरह रोक लगाना है।   तीन स्तर की मंजूरी के बाद होगा भुगतान वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए मेकर, चेकर और अप्रूविंग अथॉरिटी की तीन-स्तरीय प्रणाली लागू की जाएगी। किसी भी भुगतान को जारी करने से पहले इन तीनों स्तरों से स्वीकृति आवश्यक होगी। यदि स्वीकृत बजट से अधिक राशि खर्च करनी होगी तो उसके लिए सक्षम प्राधिकारी की अनुमति लेना अनिवार्य होगा। साथ ही आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए कंटिंजेंसी फंड बनाने का भी प्रावधान किया गया है।   90 से 365 दिनों में लागू होगी नई व्यवस्था अध्यादेश लागू होने के बाद सभी विश्वविद्यालयों को 90 से 365 दिनों के भीतर अपने पुराने बैंक खातों और उनमें उपलब्ध राशि को सिंगल नोडल अकाउंट में स्थानांतरित करना होगा। इसके बाद सभी अनुदान, योजनागत राशि और विशेष उद्देश्य के लिए मिलने वाले फंड का उपयोग केवल निर्धारित कार्यों के लिए ही किया जा सकेगा। किसी अन्य मद में राशि खर्च करने की अनुमति नहीं होगी।   समय पर वेतन और वित्तीय पारदर्शिता पर जोर नई व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ शिक्षकों और कर्मचारियों को मिलेगा। सरकार का लक्ष्य है कि सभी विश्वविद्यालयों में प्रत्येक माह की तीन तारीख तक वेतन का भुगतान सुनिश्चित किया जाए। इसके अलावा वर्षों से लंबित वित्तीय गड़बड़ियों और ऑडिट आपत्तियों को भी दूर किया जा सकेगा। वर्तमान में कई विश्वविद्यालयों में दर्जनों बैंक खाते संचालित हैं, जिनमें से कई वर्षों से निष्क्रिय पड़े हैं। कुछ मामलों में बड़ी राशि का समायोजन भी लंबित है, जिससे नियमित रूप से ऑडिट में आपत्तियां उठती रही हैं।   सरकार का मानना है कि सिंगल नोडल अकाउंट और डिजिटल वित्तीय प्रणाली लागू होने से राज्य के विश्वविद्यालयों में पारदर्शिता, जवाबदेही और वित्तीय अनुशासन मजबूत होगा। साथ ही सरकारी अनुदानों के उपयोग की निगरानी भी पहले से अधिक प्रभावी और आसान हो जाएगी।

anjali kumari जुलाई 2, 2026 0
Jharkhand tribal languages
क्या क्लस्टर सिस्टम खत्म कर देगा झारखंड की जनजातीय भाषाएं?

रांची। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत झारखंड के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में लागू क्लस्टर सिस्टम से जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा (TRL) विभागों में पढ़ने वाले छात्रों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। सीटों की कटौती, विषयों के पुनर्वितरण और चांसलर पोर्टल के माध्यम से हो रहे सीट आवंटन को लेकर छात्र, शोधार्थी और भाषा प्रेमी गहरी चिंता में हैं।  झारखंड टीआरएल संघ ने भी इस व्यवस्था में मौजूद विसंगतियों को लेकर राज्यपाल और मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपते हुए जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं को क्लस्टर सिस्टम से बाहर रखने की मांग की है।    क्या है क्लस्टर सिस्टम? दरअसल, क्लस्टर सिस्टम के तहत आसपास के कई कॉलेजों को एक समूह में जोड़ दिया जाता है और विषयों का बंटवारा किया जाता है। इसका उद्देश्य संसाधनों का बेहतर उपयोग और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है, लेकिन झारखंड में इसके क्रियान्वयन को लेकर उठ रहे सवाल यह संकेत दे रहे हैं कि जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं जैसे संवेदनशील विषयों में स्थानीय जरूरतों और सांस्कृतिक सरोकारों को ध्यान में रखते हुए संतुलित समाधान तलाशना आवश्यक होगा। फिलहाल यह मुद्दा शिक्षा जगत में बहस का विषय बना हुआ है और आने वाले समय में इस पर व्यापक चर्चा की संभावना है।    भाषाविद और संघ की मांग कुरमाली भाषा के विद्वान राजाराम महतो का कहना है कि भाषा संरक्षण के लिए छात्रों की सहज पहुंच और पर्याप्त शिक्षकों की उपलब्धता जरूरी है। झारखंड TRL संघ ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपकर जनजातीय भाषाओं को क्लस्टर सिस्टम से बाहर रखने की मांग की है।   विश्वविद्यालय का पक्ष रांची विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. सरोज शर्मा ने कहा कि यह व्यवस्था उपलब्ध शिक्षकों और संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए लागू की गई है। हालांकि उन्होंने माना कि छात्रों की व्यावहारिक समस्याओं पर विश्वविद्यालय गंभीरता से विचार कर रहा है। फिलहाल यह मुद्दा शिक्षा जगत में बहस का विषय बना हुआ है।

anjali kumari जून 25, 2026 0
Congress leaders announce nationwide 'Chhatron Ki Goonj' campaign to raise education and student issues.
25 जून को कांग्रेस का ‘छात्रों की गूंज’ अभियान, देशभर में 28 नेता करेंगे प्रेस कॉन्फ्रेंस

  देश में शिक्षा व्यवस्था और छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर कांग्रेस ने 25 जून को ‘छात्रों की गूंज’ नाम से राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू करने की घोषणा की है। इस अभियान के तहत पार्टी के 28 वरिष्ठ नेता देश के अलग-अलग शहरों में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर शिक्षा क्षेत्र की चुनौतियों और छात्रों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाएंगे। कांग्रेस ने इस अभियान के माध्यम से केंद्र सरकार की शिक्षा नीतियों पर सवाल खड़े करते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की भी मांग की है। शिक्षा सुधार पर राष्ट्रीय बहस शुरू करने की कोशिश अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि अभियान का उद्देश्य देश की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख मुद्दा बनाना है। पार्टी का कहना है कि शिक्षा क्षेत्र में मौजूद चुनौतियों पर गंभीर चर्चा और नीतिगत बदलाव की जरूरत है। कांग्रेस के अनुसार, यह अभियान छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों और शिक्षा से जुड़े सभी हितधारकों की आवाज को राष्ट्रीय मंच प्रदान करने का प्रयास है। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कांग्रेस ने अपने बयान में कहा कि शिक्षा व्यवस्था की मौजूदा स्थिति के लिए केंद्र सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं। पार्टी का आरोप है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान शिक्षा क्षेत्र को प्रभावी दिशा देने में असफल रहे हैं। पार्टी ने कहा कि शिक्षा प्रणाली में सुधार की शुरुआत जवाबदेही तय करने से होनी चाहिए और इसी कारण शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग की जा रही है। केंद्र सरकार पर निजीकरण और केंद्रीकरण को बढ़ावा देने का आरोप कांग्रेस ने भाजपा नीत केंद्र सरकार पर शिक्षा क्षेत्र में निजीकरण, केंद्रीकरण और वैचारिक हस्तक्षेप को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि पिछले वर्षों में शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक और रोजगारोन्मुख बनाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए। कांग्रेस के अनुसार, देश के सामने केवल बेरोजगारी का संकट नहीं है, बल्कि युवाओं की रोजगार क्षमता (Employability) भी एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। 28 शहरों में आयोजित होंगी प्रेस कॉन्फ्रेंस ‘छात्रों की गूंज’ अभियान के तहत देशभर के 28 शहरों में कांग्रेस नेताओं को प्रेस कॉन्फ्रेंस की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से पार्टी शिक्षा नीति, रोजगार, उच्च शिक्षा, कौशल विकास और छात्रों से जुड़े अन्य मुद्दों पर अपनी बात रखेगी। इन नेताओं को मिली जिम्मेदारी कांग्रेस ने विभिन्न शहरों के लिए अपने नेताओं की जिम्मेदारी तय की है। इसके तहत अहमदाबाद में सतेज पाटिल, बेंगलुरु में वर्षा गायकवाड़, भोपाल में इमरान मसूद, भुवनेश्वर में पवन खेड़ा, दिल्ली में गौरव गोगोई, चेन्नई में प्रियंक खड़गे, कोलकाता में सुप्रिया श्रीनेत और पुणे में कन्हैया कुमार प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करेंगे। इसके अलावा अन्य शहरों में भी पार्टी के वरिष्ठ नेता अभियान का नेतृत्व करेंगे। छात्रों और नागरिकों से जुड़ने की कोशिश कांग्रेस का कहना है कि यह अभियान केवल राजनीतिक आलोचना तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के भविष्य को लेकर एक व्यापक राष्ट्रीय संवाद शुरू करने का प्रयास है। पार्टी ने छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों और आम नागरिकों से इस चर्चा का हिस्सा बनने की अपील की है। कांग्रेस के अनुसार, एक आधुनिक, समावेशी और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप शिक्षा प्रणाली विकसित करने के लिए सभी पक्षों की भागीदारी आवश्यक है। ऐसे में ‘छात्रों की गूंज’ अभियान को शिक्षा सुधार के मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर की पहल के रूप में देखा जा रहा है।  

Deepshikha जून 24, 2026 0
Karnataka Chief Minister DK Shivakumar chairs review meeting with senior officials in Bengaluru.
सीएम डीके शिवकुमार का बड़ा एक्शन प्लान, 15 दिन में विभागों से मांगी कार्ययोजना

  कर्नाटक के मुख्यमंत्री DK Shivakumar ने प्रशासनिक कामकाज में तेजी लाने के लिए सभी विभागों को 15 दिनों के भीतर विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही उन्होंने अधिकारियों को जमीनी स्तर पर योजनाओं की निगरानी के लिए जिलों और तालुकों का नियमित दौरा करने को कहा है। समीक्षा बैठक में सीएम का सख्त संदेश बेंगलुरु में वरिष्ठ अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि सरकार किसी भी तरह के भेदभाव के बिना काम करेगी। उन्होंने कहा कि शासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और जनता की भागीदारी प्राथमिकता होगी। 15 दिन में तैयार होगी विभागीय योजना सीएम ने सभी विभागों को 15 दिनों के भीतर अपनी विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने और उसके क्रियान्वयन के लिए स्पष्ट जवाबदेही तय करने का निर्देश दिया। सचिवों को नियमित रूप से जिलों और तालुकों का दौरा कर योजनाओं की प्रगति जांचने को कहा गया है। शिकायत निवारण के लिए नया तंत्र बनाने की तैयारी मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि जन शिकायतों और विरोध प्रदर्शनों के समाधान के लिए एक अलग प्रशासनिक तंत्र विकसित किया जाएगा, जो समस्याओं के त्वरित और कानूनी समाधान में मदद करेगा। CSR फंड के बेहतर उपयोग पर जोर सीएम ने करीब 8,000–8,500 करोड़ रुपये के CSR फंड के प्रभावी उपयोग और पारदर्शी लेखा-जोखा सुनिश्चित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि CSR नीति के नए दिशा-निर्देश जल्द जारी किए जाएंगे। शिक्षा और कानून-व्यवस्था पर फोकस मुख्यमंत्री ने प्राथमिक शिक्षा को मजबूत करने और नए स्कूलों के निर्माण पर विशेष ध्यान देने की बात कही। साथ ही उन्होंने कानून-व्यवस्था को मजबूत करने के लिए प्रत्येक तालुका में विशेष पुलिस दस्ते तैनात करने का सुझाव दिया। कर्नाटक भवन और दिल्ली दौरे की तैयारी दिल्ली स्थित कर्नाटक भवन के कामकाज पर नाराजगी जताते हुए सीएम ने इसकी समीक्षा की बात कही है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वह जल्द दिल्ली जाकर केंद्र सरकार के अधिकारियों से मुलाकात करेंगे। गारंटी योजनाओं में बदलाव नहीं सीएम शिवकुमार ने साफ किया कि राज्य सरकार की गारंटी योजनाओं में किसी भी तरह का बदलाव नहीं किया जाएगा, दुरुपयोग रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जाएंगे।  

Deepshikha जून 5, 2026 0
Rahul Gandhi criticizes CBSE re-evaluation fees, raising concerns over student expenses after exam results
'गलती CBSE की, सजा छात्रों को': री-इवैल्यूएशन फीस को लेकर राहुल गांधी का केंद्र पर निशाना

लोकसभा में विपक्ष के नेता Rahul Gandhi ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की पोस्ट-रिजल्ट फीस व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि मूल्यांकन प्रक्रिया में होने वाली संभावित त्रुटियों को सुधारने के लिए भी छात्रों से शुल्क वसूला जा रहा है, जिससे विद्यार्थियों और उनके परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है। सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि यदि सीबीएसई की ओर से मूल्यांकन में गलती होती है तो उसका खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ता है। उन्होंने लिखा कि स्कैन कॉपी, री-टोटलिंग और री-इवैल्यूएशन जैसी प्रक्रियाओं के लिए छात्रों से अलग-अलग शुल्क लिया जा रहा है। फीस व्यवस्था पर उठाए सवाल राहुल गांधी के अनुसार, डिजिटल स्कैन कॉपी प्राप्त करने के लिए प्रति विषय 100 रुपये, री-टोटलिंग के लिए प्रति पेपर 100 रुपये और री-इवैल्यूएशन के लिए प्रति प्रश्न 25 रुपये शुल्क निर्धारित है। उन्होंने दावा किया कि कई मामलों में छात्रों को अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की दोबारा जांच कराने के लिए करीब 2,000 रुपये तक खर्च करने पड़ सकते हैं। कांग्रेस नेता ने यह भी सवाल उठाया कि यदि लाखों छात्र पुनर्मूल्यांकन और संबंधित प्रक्रियाओं के लिए आवेदन कर रहे हैं तो इससे बोर्ड को कितनी आय प्राप्त हो रही है। 'शिक्षा को व्यवसाय बनाया जा रहा' राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि जब शिक्षा को सेवा के बजाय व्यवसाय के रूप में संचालित किया जाता है तो व्यवस्थागत त्रुटियों का बोझ छात्रों पर डाल दिया जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में विद्यार्थियों को न केवल आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है, बल्कि उनके समय, आत्मविश्वास और भविष्य पर भी असर पड़ता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि ऑन-स्क्रीन मूल्यांकन प्रणाली में होने वाली संभावित त्रुटियों के कारण बड़ी संख्या में छात्रों को अपने अंकों की दोबारा जांच कराने की आवश्यकता पड़ती है। CBSE ने दिया स्पष्टीकरण इस बीच ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली को लेकर उठे सवालों के बीच सीबीएसई ने कहा है कि मूल्यांकन प्रक्रिया से जुड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म की सुरक्षा और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए विशेष कदम उठाए गए हैं। बोर्ड ने एक बयान जारी कर कहा कि उसके सेवा प्रदाता के ऑनमार्क पोर्टल में चिन्हित तकनीकी कमजोरियों की निगरानी की जा रही है और विभिन्न सरकारी एजेंसियों तथा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) के साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की टीम सिस्टम को और मजबूत बनाने में जुटी है। सीबीएसई के अनुसार, पहचानी गई कमजोरियों को नियंत्रित कर लिया गया है और पोर्टल की सुरक्षा को और बेहतर बनाने की प्रक्रिया जारी है। बोर्ड ने संभावित खामियों की जानकारी देने वाले जागरूक नागरिकों और एथिकल हैकर्स का भी आभार व्यक्त किया है। शिक्षा व्यवस्था पर फिर छिड़ी बहस राहुल गांधी की टिप्पणी के बाद परीक्षा मूल्यांकन, पुनर्मूल्यांकन शुल्क और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। विपक्ष जहां छात्रों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ का मुद्दा उठा रहा है, वहीं सीबीएसई का कहना है कि वह मूल्यांकन प्रक्रिया की गुणवत्ता और तकनीकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लगातार सुधारात्मक कदम उठा रहा है।  

surbhi जून 1, 2026 0
BIT Mesra
BIT Mesra में क्या अब नहीं पढ़गे झारखंड के छात्र

रांची। झारखंड के छात्रों के लिए प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान बीआईटी मेसरा में प्रवेश अब पहले से ज्यादा कठिन होने वाला है। संस्थान ने सत्र 2026-27 से राज्य के विद्यार्थियों को मिलने वाला 50 प्रतिशत होम स्टेट कोटा समाप्त करने का निर्णय लिया है। अब सभी सीटों पर दाखिला केवल ऑल इंडिया मेरिट के आधार पर होगा।   एमओयू खत्म होने के बाद बदली व्यवस्था यह फैसला झारखंड सरकार और बीआईटी मेसरा के बीच हुए समझौते (एमओयू) की अवधि समाप्त होने के बाद लिया गया है। अब तक राज्य के छात्रों को संस्थान में विशेष अवसर मिलता था और कुल सीटों का आधा हिस्सा झारखंड के अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित रहता था। इन सीटों पर प्रवेश जोसा, सीसैब और संस्थान स्तरीय काउंसलिंग के माध्यम से होता था। नई व्यवस्था लागू होने के बाद झारखंड के छात्रों को भी देशभर के उम्मीदवारों के साथ सीधे मुकाबले में उतरना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे प्रवेश प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और कटऑफ भी पहले से अधिक ऊंचा जा सकता है।   650 बीटेक सीटों पर मिलता था लाभ बीआईटी मेसरा में बीटेक, बीआर्क और इंटीग्रेटेड एमएससी समेत विभिन्न पाठ्यक्रमों में कुल 1342 सीटें हैं। इनमें से करीब 650 बीटेक सीटों पर झारखंड के विद्यार्थियों को होम स्टेट कोटा का लाभ मिलता था। अब ये सभी सीटें ऑल इंडिया कोटा में शामिल कर दी जाएंगी।   बीसी-1 और बीसी-2 वर्ग पर भी असर इस फैसले का असर बीसी-1 और बीसी-2 वर्ग के छात्रों पर भी पड़ेगा। पहले इन वर्गों के लिए लगभग 80 सीटों पर विशेष आरक्षण का लाभ मिलता था, लेकिन अब इन सीटों पर भी राष्ट्रीय स्तर की मेरिट के आधार पर ही नामांकन होगा।   छात्रों और अभिभावकों में बढ़ी चिंता बीआईटी मेसरा लंबे समय से झारखंड के मेधावी छात्रों की पहली पसंद माना जाता रहा है। ऐसे में कोटा समाप्त होने की खबर से छात्रों और अभिभावकों के बीच चिंता बढ़ गई है। कई लोगों का मानना है कि इससे राज्य के विद्यार्थियों के लिए अवसर सीमित हो सकते हैं, जबकि कुछ विशेषज्ञ इसे संस्थान में गुणवत्ता और राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की दिशा में उठाया गया कदम मान रहे हैं। संस्थान ने स्पष्ट किया है कि नई प्रवेश प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होगी और सभी अभ्यर्थियों को समान अवसर प्रदान किए जाएंगे।   सरकार का क्या है कहना? इधर इस पूरे मामले पर झारखंड सरकार ने भी स्थिति स्पष्ट की है। सरकार का कहना है कि मामले में कानूनी राय ली जाएगी और सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद छात्रों के हित में फैसला लिया जाएगा। हालांकि जब तक अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक यह मुद्दा छात्रों और अभिभावकों के लिए चिंता और असमंजस का कारण बना हुआ है।

Unknown मई 29, 2026 0
JTET Language Issue
JTET भाषा विवाद सुलझाने की कवायद तेज, मंत्रियों की कमेटी की पहली बैठक हुई संपन्न

रांची। झारखंड में JTET 2026 भाषा विवाद को लेकर गठित मंत्रियों की कमेटी की पहली बैठक रविवार को हुई। वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में मंत्री दीपिका पांडेय सिंह, संजय प्रसाद यादव, सुदिव्य कुमार सोनू और योगेंद्र प्रसाद शामिल हुए। करीब दो घंटे चली बैठक में भाषा विवाद से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई।   अधिकारियों को दिए गए अहम निर्देश बैठक के बाद मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने कहा कि पहली बैठक काफी सकारात्मक रही। कमेटी ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे JTET भाषा विवाद से जुड़े सभी तथ्य, दस्तावेज और आवश्यक जानकारी अगली बैठक में प्रस्तुत करें। सरकार नई नियमावली की समीक्षा कर रही है और जिन बिंदुओं पर विवाद है, उन पर विस्तार से विचार किया जाएगा।   नियमावली में सुधार पर मंथन मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने बताया कि नई JTET नियमावली में किन-किन जगहों पर सुधार की आवश्यकता है, इसे लेकर विभाग से विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है। हालांकि अगली बैठक की आधिकारिक तारीख घोषित नहीं की गई है, लेकिन सूत्रों के अनुसार कमेटी इस शुक्रवार को दोबारा बैठक कर सकती है।   क्या है पूरा विवाद? JTET 2026 को लेकर विवाद तब शुरू हुआ जब हेमंत सोरेन सरकार ने नई नियमावली को मंजूरी दी। नई सूची में भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसी भाषाओं को क्षेत्रीय भाषा श्रेणी से बाहर कर दिया गया, जबकि 2016 की JTET परीक्षा में ये भाषाएं शामिल थीं।   कई जिलों में विरोध पलामू, गढ़वा, गोड्डा, देवघर और दुमका जैसे जिलों में बड़ी संख्या में लोग इन भाषाओं का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में भाषाओं को सूची से हटाने पर राजनीतिक और सामाजिक विरोध तेज हो गया। विवाद बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री ने समाधान के लिए पांच मंत्रियों की कमेटी गठित की, जिसकी पहली बैठक अब संपन्न हुई है।

Unknown मई 18, 2026 0
Teacher Demand
शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों से अलग रखने की मांग

रांची। झारखंड माध्यमिक शिक्षक संघ ने शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों से अलग रखने की मांग की है। संघ ने कहा कि आठवीं पास करने के बाद नौवीं में बच्चों का हाई स्कूल में एडमिशन होता है। इनरोलमेंट बढ़ाने के लिए कम अंक वाले विद्याथियों का भी एडमिशन ले लिया जाता है। वे एक पैराग्राफ भी ढंग से नहीं लिख पाते हैं। नौवीं कक्षा में विद्यार्थियों का सेंटअप टेस्ट भी बंद कर दिया गया है। वे सीधे मैट्रिक की परीक्षा में शामिल होते हैं। दूसरी ओर शिक्षकों को साल भर गैर शैक्षणिक कार्यों जैसे चुनाव, ट्रेनिंग, सावित्री बाई फुले योजना, बैंक खाता खोलने और आय प्रमाण पत्र भरने जैसे काम में लगा दिया जाता है। अभी उन्हें जनगणना में लगाया गया है। इस कारण शिक्षक बच्चों पर पूरी तरह ध्यान नहीं दे पाते। यह भी रिजल्ट खराब होने का बड़ा कारण है। झारखंड राज्य माध्यमिक शिक्षक संघ के सचिव रविंद्र कुमार चौधरी ने स्कूलों में सेंटअप टेस्ट शुरू करने और शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों से अलग रखने की मांग की है।

Unknown मई 18, 2026 0
Jharkhand Assembly session with MLAs debating and passing University Bill amid protests
झारखंड विधानसभा में यूनिवर्सिटी बिल पास, VC चयन में CM की भूमिका तय, सदन में हंगामे के बीच अहम फैसले

रांची में झारखंड विधानसभा के सत्र के दौरान मंगलवार को झारखंड स्टेट यूनिवर्सिटी बिल 2026 को बहस के बाद पास कर दिया गया। इस दौरान कई विधायकों ने संशोधन के सुझाव दिए, लेकिन सरकार ने मूल प्रावधानों को बरकरार रखते हुए बिल को मंजूरी दिलाई। सत्र के दौरान शिक्षा, पेयजल और प्रशासन से जुड़े कई अहम मुद्दों पर भी चर्चा हुई। यूनिवर्सिटी बिल को मिली मंजूरी यह बिल सदन में सुदीव्य कुमार सोनू ने पेश किया। उन्होंने बताया कि इसका पहले वाला संस्करण पिछले साल अगस्त में पेश किया गया था, जिसे वापस लेकर संशोधित रूप में दोबारा लाया गया। बिल पास होने के साथ ही राज्य के विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव तय हो गया है। VC चयन में अब CM की भी भूमिका नए कानून के अनुसार: विश्वविद्यालयों के कुलपति (VC) का चयन अब राज्यपाल और मुख्यमंत्री मिलकर करेंगे अभी तक यह अधिकार केवल राज्यपाल (कुलाधिपति) के पास था सरकार का कहना है कि दो संवैधानिक पदों की संयुक्त भागीदारी से बेहतर और संतुलित निर्णय संभव होगा। विपक्ष के सुझाव, लेकिन नहीं हुए स्वीकार बहस के दौरान कई विधायकों ने अहम सुझाव दिए: राज सिन्हा ने यूनिवर्सिटी कैंपस में प्लेसमेंट एजेंसी खोलने का प्रस्ताव रखा अमित यादव ने VC चयन प्रक्रिया से मुख्यमंत्री की भूमिका हटाने की मांग की हालांकि, सरकार ने इन सभी सुझावों को खारिज कर दिया। हर घर पानी की तैयारी, लाखों चापाकल होंगे दुरुस्त सत्र के दौरान पेयजल संकट का मुद्दा भी उठा। मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने बताया कि: गर्मी को देखते हुए हर घर तक पानी पहुंचाने की तैयारी की जा रही है राज्य में 1,44,906 चापाकलों की मरम्मत का आदेश दिया गया है संथाल परगना में पानी की समस्या पर चिंता विधायक हेमलाल मुर्मू ने संथाल परगना क्षेत्र में खराब चापाकलों और सूखे की समस्या उठाई। इस पर मंत्री ने स्वीकार किया कि: कई चापाकल 10 साल पुराने हो चुके हैं भूजल स्तर गिरने से पानी की समस्या बढ़ी है वैकल्पिक जल आपूर्ति योजना पर काम चल रहा है सदन में हंगामा, असंसदीय भाषा पर विवाद सत्र के दौरान विपक्षी विधायकों ने सदन में इस्तेमाल की गई कथित असंसदीय भाषा को लेकर विरोध जताया। नीरा यादव ने इस मुद्दे को उठाया उन्होंने कहा कि सदन की कार्यवाही देखने आने वाले छात्रों पर इसका गलत असर पड़ता है स्पीकर और मंत्री ने जताया खेद रबीन्द्र नाथ महतो ने कहा कि आपत्तिजनक शब्दों को रिकॉर्ड से हटा दिया गया है। वहीं संसदीय कार्य मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने कहा कि सदन की गरिमा बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। BDO की कमी जल्द होगी दूर मंत्री दीपिका पांडेय ने बताया कि: राज्य के 264 ब्लॉकों में से 218 में BDO तैनात हैं बाकी 46 ब्लॉकों में सर्किल ऑफिसर अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे हैं अगले 15-20 दिनों में सभी खाली पद भर दिए जाएंगे

surbhi मार्च 18, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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abhishek singh जुलाई 2, 2026 0