कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दूसरे और अंतिम चरण में बुधवार को 142 सीटों पर मतदान जारी है। शुरुआती 5 घंटों के भीतर करीब 45% मतदान दर्ज किया गया, जो मतदाताओं के उत्साह को दर्शाता है। इस चरण में 7 जिलों की सीटों पर 1448 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, जिनका फैसला 3.22 करोड़ से अधिक मतदाता करेंगे। सुरक्षा के कड़े इंतजाम चुनाव को शांतिपूर्ण और निष्पक्ष बनाने के लिए व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई है। लगभग 2,300 से अधिक पैरा मिलिट्री फोर्स की कंपनियां तैनात की गई हैं, जबकि 300 से ज्यादा ऑब्जर्वर निगरानी कर रहे हैं। संवेदनशील इलाकों में विशेष सतर्कता बरती जा रही है। भवानीपुर में हाई-प्रोफाइल मुकाबला इस चरण की सबसे चर्चित सीट भवानीपुर है, जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मैदान में हैं। यह क्षेत्र तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता है, लेकिन भाजपा भी यहां अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में है। इस सीट पर मुकाबला राजनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है। बीजेपी उम्मीदवार पर हमला, बढ़ा तनाव दक्षिण 24 परगना जिले में एक गंभीर घटना सामने आई है, जहां बीजेपी उम्मीदवार पर कथित रूप से जानलेवा हमला किया गया। इस घटना के बाद इलाके में तनाव बढ़ गया है और अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं। चुनाव आयोग ने मामले का संज्ञान लेते हुए रिपोर्ट तलब की है। 2021 के मुकाबले कड़ी टक्कर इन 142 सीटों पर 2021 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 123 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि बीजेपी को सिर्फ 18 सीटें मिली थीं। इस बार बीजेपी बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद में है, जबकि टीएमसी अपने गढ़ को बचाने की कोशिश कर रही है। नतीजों पर टिकी नजर दूसरा चरण राज्य की सत्ता की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस चरण का प्रदर्शन ही यह तय करेगा कि राज्य में सत्ता किसके हाथ में जाएगी।
50 साल पुरानी राजनीति में बड़ा बदलाव तमिलनाडु की राजनीति में इस बार ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल रहा है। दशकों से चली आ रही दो दलों की सीधी टक्कर अब त्रिकोणीय मुकाबले में बदल गई है। M. K. Stalin की Dravida Munnetra Kazhagam और Edappadi K. Palaniswami की All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam के बीच अब अभिनेता से नेता बने Vijay की एंट्री ने समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। विजय की पार्टी TVK बनी ‘गेम चेंजर’ Vijay की पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam ने पहली बार चुनावी मैदान में उतरते ही बड़ा प्रभाव डाला है। युवाओं और शहरी वोटर्स के बीच पार्टी को तेजी से समर्थन मिल रहा है। अनुमान है कि TVK 15-20% तक वोट शेयर हासिल कर सकती है, जो किसी नई पार्टी के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। युवा और महिला वोटर्स पर खास फोकस TVK ने अपने चुनावी अभियान में युवाओं और महिलाओं को केंद्र में रखा है। पार्टी ने रोजगार, इंटर्नशिप और वित्तीय सहायता जैसे वादे किए हैं। साथ ही महिलाओं के लिए हर महीने ₹2500 की सहायता, मुफ्त गैस सिलेंडर और शादी से जुड़े लाभ देने का ऐलान किया है। DMK और AIADMK के सामने नई चुनौती Dravida Munnetra Kazhagam अपनी सरकार के काम और कल्याण योजनाओं के दम पर मैदान में है, जबकि All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को उठा रही है। लेकिन TVK की एंट्री ने दोनों दलों के वोट बैंक में सेंध लगा दी है, जिससे मुकाबला और ज्यादा रोमांचक हो गया है। कई सीटों पर ‘किंगमेकर’ बन सकती है TVK विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही Tamilaga Vettri Kazhagam सीधे तौर पर सरकार न बना पाए, लेकिन कई सीटों पर उसका प्रदर्शन नतीजों को प्रभावित कर सकता है। दक्षिणी जिलों और चेन्नई जैसे शहरी इलाकों में इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। क्या खत्म होगी द्विदलीय राजनीति? कुछ सर्वे बताते हैं कि अभी भी बड़ी संख्या में मतदाता इसे DMK बनाम AIADMK की लड़ाई मानते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में यह चुनाव पूरी तरह बदल चुका है। तमिलनाडु की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश करती दिख रही है, जहां तीसरी ताकत निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
दुर्गापुर: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बीच जहां राज्य के कई हिस्सों से हिंसा और तनाव की खबरें सामने आ रही हैं, वहीं दुर्गापुर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने लोकतंत्र की असली भावना को उजागर कर दिया। दुर्गापुर कोर्ट परिसर में भारतीय जनता पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के उम्मीदवारों ने एक-दूसरे को गले लगाकर राजनीतिक शिष्टाचार की मिसाल पेश की। जब आमने-सामने आए सियासी प्रतिद्वंदी घटना शुक्रवार दोपहर की है, जब दुर्गापुर पूर्व से भाजपा प्रत्याशी चंद्रशेखर बनर्जी अपने समर्थकों के साथ प्रचार कर रहे थे। उसी दौरान सीपीएम के प्रत्याशी सिमंत चटर्जी, प्रभास साईं और प्रवीर मंडल भी वहां पहुंचे। आमतौर पर ऐसे मौके पर नारेबाजी या तनाव देखने को मिलता है, लेकिन यहां नजारा बिल्कुल अलग था। सभी उम्मीदवारों ने हाथ मिलाया और गले मिलकर सौहार्द का संदेश दिया। आम लोगों के लिए बना मिसाल इस दृश्य को देखकर कोर्ट परिसर में मौजूद वकील और आम लोग हैरान रह गए। चुनावी माहौल में इस तरह का सौहार्दपूर्ण व्यवहार लोगों के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। पूर्व मेयर का ‘गुरु मंत्र’ इस दौरान दुर्गापुर नगर निगम के पूर्व मेयर रथिन रॉय ने भाजपा उम्मीदवार चंद्रशेखर बनर्जी को सलाह देते हुए कहा कि: “राजनीति बिना हिंसा के होनी चाहिए, समाज को बांटने की नहीं, जोड़ने की जिम्मेदारी हमारी है।” उनकी इस बात पर मौजूद लोगों ने तालियां बजाकर समर्थन जताया, हालांकि कुछ लोगों ने इसे चुनावी रणनीति भी बताया। उम्मीदवारों का साझा संदेश सभी प्रत्याशियों ने एक सुर में कहा कि: लोकतंत्र में शांति और शिष्टाचार जरूरी है चुनावी प्रतिस्पर्धा व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं होनी चाहिए समाज में एकता और भाईचारा बनाए रखना ही राजनीति का उद्देश्य है क्यों खास है यह घटना? बंगाल चुनावों में अक्सर हिंसा और तनाव की खबरें सुर्खियों में रहती हैं। ऐसे में दुर्गापुर की यह तस्वीर राजनीतिक परिपक्वता और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक बनकर सामने आई है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से ठीक पहले राज्य में वोटर लिस्ट को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में नाम कटने के आरोपों के बीच कई जिलों में उग्र प्रदर्शन देखने को मिले। हालात ऐसे बने कि सड़कों पर टायर जलाकर विरोध किया गया और कई जगह हाईवे तक जाम कर दिए गए। किन-किन जिलों में भड़का विरोध? राज्य के अलग-अलग हिस्सों में जनता का गुस्सा खुलकर सामने आया: मालदा: कालियाचक, जदुपुर और मंगलबाड़ी में लोगों ने दस्तावेज दिखाकर विरोध किया, NH जाम रहा जलपाईगुड़ी: मयनागुड़ी में NH-27 को पूरी तरह ब्लॉक किया गया कूचबिहार: माथाभंगा में ग्रामीणों ने 3 घंटे तक सड़क जाम रखी पूर्वी बर्धमान: शक्तिगढ़ में लोगों ने शांतिपूर्ण मौन मार्च निकाला प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि वैध दस्तावेज होने के बावजूद उनके नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। ममता बनर्जी का बड़ा आरोप इन घटनाओं के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि यह पूरा मामला एक “बड़ी साजिश” का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य राज्य में अशांति फैलाना है। उन्होंने अमित शाह पर निशाना साधते हुए दावा किया कि चुनाव से पहले राष्ट्रपति शासन लगाने की कोशिश की जा रही है। NH-12 पर बढ़ा तनाव NH-12 (कोलकाता-सिलीगुड़ी मार्ग) पर स्थिति सबसे ज्यादा तनावपूर्ण रही। कई घंटों तक यातायात ठप भारी पुलिस और केंद्रीय बल तैनात न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा बढ़ाई गई प्रदर्शनकारियों ने साफ कहा है कि जब तक सभी पात्र मतदाताओं के नाम सूची में शामिल नहीं किए जाते, आंदोलन जारी रहेगा। चुनाव से पहले बढ़ा सियासी तापमान इस पूरे विवाद ने चुनावी माहौल को और गर्म कर दिया है। विपक्ष और सत्तारूढ़ दल के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज वोटर लिस्ट की विश्वसनीयता पर सवाल प्रशासन पर निष्पक्षता बनाए रखने का दबाव विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले चुनाव में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। निष्कर्ष पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट को लेकर उठा यह विवाद सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक संकट बनता जा रहा है। अब देखना होगा कि सरकार और चुनाव आयोग इस स्थिति को कैसे संभालते हैं और क्या समय रहते समाधान निकल पाता है।
केरल में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। इसी क्रम में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 55 सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की नई सूची जारी कर दी है। इस सूची में पार्टी ने अनुभव और संगठनात्मक संतुलन साधते हुए 20 मौजूदा विधायकों को दोबारा मौका दिया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि कांग्रेस इस चुनाव में स्थिरता और भरोसे की रणनीति के साथ मैदान में उतर रही है। दिग्गज नेताओं पर कांग्रेस का भरोसा घोषित सूची में कई प्रमुख नेताओं को फिर से चुनावी मैदान में उतारा गया है: रमेश चेन्निथला – हरिपद सीट वी.डी. सतीशन – परवूर सीट सनी जोसेफ – पेरावूर सीट इन नामों से स्पष्ट है कि पार्टी नेतृत्व अनुभवी चेहरों के सहारे मजबूत प्रदर्शन की उम्मीद कर रहा है। वाम मोर्चा भी तैयार, CPI ने जारी की सूची सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) की सहयोगी पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी 25 सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है। पार्टी के चारों मौजूदा मंत्री फिर से चुनाव लड़ेंगे यह संकेत है कि LDF सरकार अपने प्रदर्शन पर भरोसा जता रही है कब होंगे चुनाव और कब आएंगे नतीजे? केरल की 140 सदस्यीय विधानसभा के लिए: मतदान: 9 अप्रैल 2026 मतगणना: 4 मई 2026 कार्यकाल समाप्त: 23 मई 2026 यह चुनाव राज्य की राजनीतिक दिशा तय करने के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। पिछला चुनाव और मौजूदा सियासी परिदृश्य 2021 के विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेतृत्व वाले LDF ने 140 में से 99 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। इसके बाद पिनाराई विजयन ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी की। अब 2026 में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती LDF के मजबूत किले को भेदने की है। चुनावी तस्वीर: क्या कहती है रणनीति? कांग्रेस: अनुभव + संगठन का संतुलन LDF: प्रदर्शन और स्थिर सरकार का दावा मुकाबला: सीधा और कड़ा राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार मुकाबला पहले से ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो सकता है। केरल चुनाव 2026 में कांग्रेस की नई सूची ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। अनुभवी नेताओं पर भरोसा और रणनीतिक चयन से पार्टी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताकत झोंकने को तैयार है।
पश्चिम बंगाल की सियासत में 2026 विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक उलटफेर देखने को मिला है। तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ने 291 उम्मीदवारों की सूची जारी कर सभी को चौंका दिया है। इस सूची की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पार्टी ने 75 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए, जिससे साफ संकेत मिलता है कि TMC सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency) से निपटने के लिए आक्रामक रणनीति अपना रही है। भवानीपुर बना सबसे बड़ा रणक्षेत्र इस चुनाव का सबसे बड़ा मुकाबला भवानीपुर सीट पर देखने को मिलेगा, जहां ममता बनर्जी खुद चुनाव लड़ेंगी। उनके सामने होंगे भाजपा के कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी, जिन्होंने 2021 में नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हराया था। अब भवानीपुर में यह मुकाबला सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि “नंदीग्राम का हिसाब” माना जा रहा है। 75 विधायकों का टिकट कटा, क्यों लिया बड़ा जोखिम? TMC ने 135 मौजूदा विधायकों को दोबारा मौका दिया, लेकिन 75 को बाहर कर दिया। यह फैसला इन कारणों से अहम माना जा रहा है: सत्ता विरोधी माहौल को कम करना जमीनी स्तर पर सक्रिय नेताओं को मौका देना बूथ मैनेजमेंट को मजबूत करना यह साफ संदेश है कि अब “स्टार पावर” नहीं, बल्कि “ग्राउंड पावर” चुनाव जिताएगी। बड़े चेहरों की विदाई इस बार कई बड़े और चर्चित नामों का पत्ता कट गया, जिनमें शामिल हैं: पार्थ चटर्जी चिरंजीत चक्रवर्ती परेश पाल पार्टी ने साफ कर दिया है कि सिर्फ लोकप्रियता या ग्लैमर अब टिकट की गारंटी नहीं है। नए चेहरे और ‘सोशल इंजीनियरिंग’ पर जोर TMC ने इस बार संतुलित सामाजिक समीकरण (Social Engineering) पर खास ध्यान दिया है: महिलाएं: 52 उम्मीदवार SC/ST: 95 उम्मीदवार अल्पसंख्यक: 47 उम्मीदवार नए चेहरे: 72 नए उम्मीदवारों में ओलंपियन स्वप्ना बर्मन और पूर्व क्रिकेटर शिव शंकर पॉल जैसे नाम शामिल हैं। TMC की रणनीति: ‘ग्लैमर आउट, संगठन इन’ इस बार पार्टी ने साफ तौर पर रणनीति बदली है: ग्लैमर से दूरी: फिल्मी और चर्चित चेहरों को कम महत्व संगठन पर फोकस: बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को टिकट युवा नेतृत्व: नई पीढ़ी को मौका पार्टी का लक्ष्य इस चुनाव में 226+ सीटें जीतकर लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी करना है। क्या कहती है सियासी तस्वीर? भवानीपुर की सीट पर ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी की सीधी टक्कर इस चुनाव को हाई-वोल्टेज बना रही है। एक तरफ “दीदी” की प्रतिष्ठा दांव पर है, तो दूसरी ओर भाजपा इस सीट को जीतकर बंगाल की राजनीति में बड़ा संदेश देना चाहती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।