Financial Planning

NPS PRIDE-Disha dashboard displaying SIP return analysis, NAV history and pension fund comparison
NPS में बड़ा बदलाव: अब SIP का पूरा रिटर्न देख सकेंगे निवेशक, PFRDA ने लॉन्च किया PRIDE-Disha टूल

नई दिल्ली: नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) से जुड़े करोड़ों निवेशकों के लिए बड़ी राहत की खबर है। पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (PFRDA) ने NPS PRIDE-Disha (Pension Fund Returns for Informed Decision and Empowerment) नाम से एक नया डिजिटल टूल लॉन्च किया है। इस टूल का उद्देश्य NPS सब्सक्राइबर्स को अलग-अलग पेंशन फंड और निवेश विकल्पों के पिछले प्रदर्शन का विस्तृत विश्लेषण उपलब्ध कराना है, ताकि वे अपने रिटायरमेंट निवेश से जुड़े फैसले अधिक समझदारी से ले सकें। अब SIP निवेश का भी मिलेगा वास्तविक रिटर्न अब तक NPS निवेशक केवल 1, 2, 5 या 10 वर्षों के एकमुश्त (Lumpsum) निवेश के आधार पर फंड के प्रदर्शन की तुलना कर सकते थे। लेकिन नए PRIDE-Disha टूल के जरिए अब वे अपने मासिक निवेश यानी SIP के वास्तविक रिटर्न (XIRR) की भी गणना कर सकेंगे। XIRR निवेशकों को यह समझने में मदद करेगा कि यदि उन्होंने नियमित मासिक निवेश किया होता तो समय के साथ उनका निवेश कितना बढ़ सकता था। इससे वास्तविक निवेश प्रदर्शन का अधिक सटीक आकलन संभव होगा। 5,000 दिनों का NAV डेटा होगा उपलब्ध इस नए प्लेटफॉर्म में वर्ष 2008 से अब तक का लगभग 5,000 दिनों का NAV (Net Asset Value) डेटा शामिल किया गया है। निवेशक पुराने रिकॉर्ड के आधार पर विभिन्न पेंशन फंडों के प्रदर्शन की तुलना कर सकेंगे और यह समझ पाएंगे कि लंबे समय में किस फंड ने बेहतर रिटर्न दिया। करीब 4,800 निवेश विकल्पों की तुलना PRIDE-Disha टूल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें निवेशक Active Choice और Auto Choice सहित करीब 4,800 विभिन्न निवेश विकल्पों की तुलना कर सकते हैं। इसके अलावा बार ग्राफ और अन्य विजुअल टूल्स की मदद से अलग-अलग फंडों के प्रदर्शन को आसानी से समझा जा सकता है। भविष्य का अनुमान नहीं देगा यह टूल PFRDA ने 14 जुलाई को जारी अपने सर्कुलर में स्पष्ट किया है कि PRIDE-Disha केवल ऐतिहासिक आंकड़ों पर आधारित जानकारी उपलब्ध कराता है। यह किसी भी प्रकार से भविष्य के रिटर्न की भविष्यवाणी या गारंटी नहीं देता। इसका उद्देश्य केवल निवेशकों को पुराने प्रदर्शन के आधार पर बेहतर निर्णय लेने में सहायता प्रदान करना है। ऐसे करें इस्तेमाल NPS सब्सक्राइबर्स PFRDA की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध PRIDE-Disha Calculator के माध्यम से इस सुविधा का उपयोग कर सकते हैं। यहां वे अलग-अलग पेंशन फंड, NAV हिस्ट्री और SIP आधारित XIRR की तुलना कर अपने रिटायरमेंट निवेश की बेहतर योजना बना सकते हैं। क्यों है यह टूल महत्वपूर्ण? रिटायरमेंट प्लानिंग में सही पेंशन फंड का चयन बेहद महत्वपूर्ण होता है। PRIDE-Disha टूल निवेशकों को पारदर्शी डेटा, विस्तृत तुलना और वास्तविक निवेश प्रदर्शन की जानकारी देकर अधिक समझदारी से निर्णय लेने में मदद करेगा। इससे NPS निवेशकों को अपने लंबे समय के वित्तीय लक्ष्यों के अनुरूप बेहतर फंड चुनने का अवसर मिलेगा।  

surbhi जुलाई 16, 2026 0
Professional working on a laptop with salary, career growth, and comfort trap concept highlighted in a modern office.
₹1 लाख महीने की सैलरी: सफलता की निशानी या 'कम्फर्ट ट्रैप'? वायरल पोस्ट ने छेड़ी नई बहस

बहुत से नौकरीपेशा लोगों के लिए हर महीने ₹1 लाख की सैलरी एक बड़ा लक्ष्य होती है। यह आर्थिक स्थिरता, बेहतर जीवनशैली और वर्षों की मेहनत का परिणाम मानी जाती है। लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक पोस्ट ने इस सोच को नई दिशा दे दी है। अब सवाल उठ रहा है कि क्या ₹1 लाख की मासिक आय लोगों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देने के बजाय उन्हें "कम्फर्ट ट्रैप" में फंसा रही है? सोशल मीडिया पोस्ट ने शुरू की नई चर्चा Nidhi Kushwaha की एक वायरल इंस्टाग्राम पोस्ट में दावा किया गया है कि ₹1 लाख की मासिक सैलरी लोगों को इतना आरामदायक जीवन दे देती है कि वे अपने करियर में आगे बढ़ने की कोशिश कम कर देते हैं। उनका कहना है कि यह राशि इतनी पर्याप्त होती है कि लोग घर का किराया या ईएमआई चुका सकें, नियमित खर्च पूरे कर सकें, कभी-कभार यात्रा कर सकें और आरामदायक जीवन जी सकें। ऐसे में कई लोग नए अवसर तलाशने या जोखिम लेने से बचने लगते हैं। 'कम्फर्ट' कैसे बन सकता है रुकावट? पोस्ट के अनुसार समस्या सैलरी की राशि नहीं, बल्कि उससे मिलने वाली मानसिक संतुष्टि है। जब व्यक्ति को लगता है कि उसकी आर्थिक स्थिति सुरक्षित है, तो वह अपने कौशल को और बेहतर बनाने, नई जिम्मेदारियां लेने या करियर में बदलाव करने की इच्छा खो सकता है। निधि का मानना है कि कई प्रतिभाशाली लोग अपनी क्षमता की कमी से नहीं, बल्कि आरामदायक स्थिति छोड़ने की अनिच्छा के कारण वर्षों तक एक ही स्तर पर बने रहते हैं। सोशल मीडिया पर बंटी लोगों की राय यह पोस्ट वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर इस विषय पर तीखी बहस शुरू हो गई। एक वर्ग ने इस विचार का समर्थन करते हुए कहा कि आर्थिक स्थिरता मिलने के बाद कई लोग अपने करियर में आगे बढ़ने की कोशिश कम कर देते हैं और नए लक्ष्य तय नहीं करते। वहीं दूसरी ओर कई लोगों ने इस सोच का विरोध भी किया। उनका कहना था कि आज के समय में Mumbai, Bengaluru और Gurugram जैसे बड़े शहरों में बढ़ती महंगाई को देखते हुए ₹1 लाख की सैलरी पहले जितनी बड़ी नहीं रही। उनका मानना है कि परिवार, बच्चों की शिक्षा, घर का किराया और अन्य खर्चों के बीच यह आय भी सीमित महसूस हो सकती है। क्या ज्यादा कमाना ही सफलता का पैमाना है? बहस के दौरान कई यूजर्स ने यह भी कहा कि सफलता को केवल अधिक कमाई से नहीं मापा जाना चाहिए। उनके अनुसार आर्थिक सुरक्षा, परिवार के साथ समय, मानसिक शांति और बेहतर जीवन संतुलन भी उतने ही महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी वर्तमान आय से संतुष्ट है और उसका जीवन संतुलित है, तो उसे लगातार अधिक कमाने की दौड़ में शामिल होना जरूरी नहीं है। असली सवाल क्या है? यह पूरी बहस इस बात पर नहीं है कि ₹1 लाख महीने की सैलरी पर्याप्त है या नहीं। असली सवाल यह है कि किसी आर्थिक लक्ष्य तक पहुंचने के बाद व्यक्ति अपने विकास को कैसे देखता है। आर्थिक स्थिरता निश्चित रूप से एक उपलब्धि है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि सीखते रहना, नए कौशल विकसित करना और व्यक्तिगत व पेशेवर विकास जारी रखना भी उतना ही जरूरी है। आगे बढ़ने का अर्थ हमेशा अधिक पैसा कमाना नहीं होता, बल्कि अपने जीवन और करियर में लगातार नए लक्ष्य तय करना भी होता है।  

surbhi जुलाई 13, 2026 0
Urban Indian middle-class family managing rising expenses despite earning a six-figure monthly salary
क्या अब 1 लाख रुपये महीना कमाना भी काफी नहीं? बदलती जिंदगी ने बढ़ाई भारत के मिडिल क्लास की चिंता

कभी सफलता की पहचान थी छह अंकों वाली सैलरी, अब उठ रहे हैं सवाल एक समय था जब हर महीने 1 लाख रुपये या उससे अधिक कमाना आर्थिक सफलता की पहचान माना जाता था। यह अच्छी नौकरी, स्थिर भविष्य और आरामदायक जीवन का प्रतीक समझा जाता था। लेकिन अब तेजी से बदलती आर्थिक परिस्थितियों के बीच यह धारणा कमजोर पड़ती नजर आ रही है। हाल ही में बेंगलुरु के एक आईटी प्रोफेशनल के अतिरिक्त आय के लिए टैक्सी चलाने की खबर ने देशभर के लाखों नौकरीपेशा लोगों का ध्यान खींचा। यह घटना केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि शहरी भारत के उस वर्ग की चिंता को दर्शाती है जो अच्छी कमाई के बावजूद आर्थिक सुरक्षा को लेकर असमंजस में है। बढ़ती आय के साथ और तेजी से बढ़ रहे खर्च देश के बड़े शहरों जैसे बेंगलुरु, मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, हैदराबाद और पुणे में रहने की लागत पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। सबसे ज्यादा असर इन क्षेत्रों में देखने को मिला है: घरों का किराया और प्रॉपर्टी की कीमतें बच्चों की शिक्षा स्वास्थ्य सेवाएं और मेडिकल खर्च बीमा प्रीमियम वाहन और होम लोन की ईएमआई दैनिक जीवन की बढ़ती लागत नतीजतन, वेतन बढ़ने के बावजूद अधिकांश परिवारों के पास बचत के लिए अपेक्षाकृत कम पैसा बच रहा है। ज्यादा कमाई, लेकिन कम आर्थिक संतोष विशेषज्ञों का मानना है कि आज की पीढ़ी अपने माता-पिता की तुलना में कहीं अधिक कमाई कर रही है, लेकिन आर्थिक रूप से खुद को उतना सुरक्षित महसूस नहीं करती। ईएमआई, स्कूल फीस, बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल, स्वास्थ्य बीमा और अन्य जिम्मेदारियों के बाद आय का बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है। यही वजह है कि अच्छी सैलरी पाने वाले लोग भी भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं। साइड इनकम का बढ़ता ट्रेंड बेंगलुरु के आईटी प्रोफेशनल की तरह अब कई नौकरीपेशा लोग अतिरिक्त कमाई के रास्ते तलाश रहे हैं। आज बड़ी संख्या में लोग: फ्रीलांसिंग कर रहे हैं ऑनलाइन पढ़ा रहे हैं कंसल्टिंग सेवाएं दे रहे हैं निवेश और ट्रेडिंग कर रहे हैं छोटे व्यवसाय शुरू कर रहे हैं इनमें से अधिकांश लोग आर्थिक संकट में नहीं हैं, बल्कि बढ़ती आकांक्षाओं और खर्चों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। क्या समस्या सैलरी की है या बढ़ती उम्मीदों की? विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि केवल महंगाई ही समस्या नहीं है, बल्कि जीवनशैली की अपेक्षाएं भी काफी बदल गई हैं। आज का शहरी मध्यम वर्ग एक साथ कई लक्ष्य हासिल करना चाहता है: अपना घर खरीदना बच्चों को निजी स्कूल में पढ़ाना बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं लेना नियमित छुट्टियां मनाना नई तकनीक और गैजेट्स खरीदना निवेश और रिटायरमेंट प्लानिंग करना इन सभी जरूरतों को एक ही आय के जरिए पूरा करना पहले की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। सोशल मीडिया ने भी बढ़ाया दबाव सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने लोगों की जीवनशैली और सफलता की परिभाषा बदल दी है। लक्जरी घर, विदेश यात्राएं, महंगी कारें और हाई-एंड लाइफस्टाइल अब लगातार लोगों की स्क्रीन पर दिखाई देती हैं। इससे कई बार लोग अपनी तुलना समाज के सबसे संपन्न वर्ग से करने लगते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आर्थिक असंतोष का एक कारण यह भी है कि सफलता का पैमाना लगातार बदल रहा है। आर्थिक असुरक्षा केवल मानसिक नहीं, वास्तविक भी है आज के शहरी परिवारों के सामने कई वित्तीय जिम्मेदारियां एक साथ मौजूद हैं। उन्हें: घर की लागत संभालनी है बच्चों की उच्च शिक्षा की योजना बनानी है बुजुर्ग माता-पिता का सहारा बनना है रिटायरमेंट फंड तैयार करना है मेडिकल आपात स्थितियों के लिए बचत करनी है इसी वजह से अच्छी आय होने के बावजूद आर्थिक असुरक्षा की भावना बनी रहती है। बदल गया है मिडिल क्लास का सपना मध्यम वर्ग के सपने आज भी वही हैं—स्थिर नौकरी, अपना घर, बच्चों की अच्छी शिक्षा और सुरक्षित रिटायरमेंट। लेकिन इन लक्ष्यों को हासिल करने की लागत पहले की तुलना में काफी बढ़ चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आज आर्थिक सुरक्षा केवल अधिक कमाने से नहीं, बल्कि बेहतर वित्तीय योजना, अनुशासित बचत और समझदारी से निवेश करने से मिलेगी। 1 लाख रुपये महीना आज भी भारत के अधिकांश लोगों के लिए एक बड़ी आय मानी जाती है। लेकिन बड़े शहरों में बढ़ती महंगाई, जीवनशैली के खर्च और वित्तीय जिम्मेदारियों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या केवल अच्छी सैलरी ही आर्थिक सुरक्षा की गारंटी दे सकती है? आज के भारत में जवाब शायद "नहीं" है। अब आर्थिक सफलता केवल कमाई पर नहीं, बल्कि उस कमाई को संभालने और बढ़ाने की क्षमता पर भी निर्भर करती है।  

surbhi जून 16, 2026 0
Person planning finances with documents, calculator, tax forms before March 31 deadline
1 अप्रैल 2026 से बदलेंगे वित्तीय नियम: PPF, NPS और टैक्स सेविंग से जुड़े काम 31 मार्च तक निपटाना जरूरी

नए वित्तीय वर्ष 2026-27 की शुरुआत के साथ 1 अप्रैल 2026 से कई अहम नियम लागू होने जा रहे हैं। ऐसे में अगर आपने समय रहते अपने निवेश और टैक्स से जुड़े जरूरी काम पूरे नहीं किए, तो आपको न सिर्फ आर्थिक नुकसान हो सकता है, बल्कि जुर्माना भी भरना पड़ सकता है। आइए जानते हैं वे 5 जरूरी काम, जिन्हें 31 मार्च से पहले पूरा करना बेहद जरूरी है। PPF और सुकन्या समृद्धि में न्यूनतम निवेश अगर आपका खाता Public Provident Fund (PPF) या सुकन्या समृद्धि योजना में है, तो हर साल न्यूनतम राशि जमा करना जरूरी है। PPF: कम से कम ₹500 सुकन्या समृद्धि योजना: ₹250 अगर यह जमा नहीं किया गया, तो खाता डिफॉल्ट हो सकता है और उसे दोबारा चालू करने के लिए पेनल्टी देनी पड़ेगी। NPS में योगदान पूरा करें National Pension System (NPS) में निवेश करने वालों के लिए 31 मार्च आखिरी मौका है। टियर-1 अकाउंट एक्टिव रखने के लिए ₹1,000 का न्यूनतम निवेश जरूरी सेक्शन 80CCD(1B) के तहत ₹50,000 तक अतिरिक्त टैक्स छूट समय सीमा चूकने पर टैक्स बचत का फायदा नहीं मिलेगा। PAN-Aadhaar लिंक और KYC अपडेट सरकार ने PAN और Aadhaar लिंक करना अनिवार्य कर दिया है। अगर आपका KYC अपडेट नहीं है: बैंक ट्रांजेक्शन रुक सकते हैं डीमैट अकाउंट फ्रीज हो सकता है इसलिए 31 मार्च से पहले ये काम जरूर पूरा करें। टैक्स सेविंग निवेश (Section 80C) पुरानी टैक्स व्यवस्था अपनाने वालों के लिए 31 मार्च आखिरी मौका है। ₹1.5 लाख तक की छूट निवेश विकल्प: LIC, ELSS, FD, ट्यूशन फीस इसके अलावा, सेक्शन 80D के तहत हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम पर भी टैक्स बचत का लाभ उठाया जा सकता है। होम लोन प्री-पेमेंट का मौका होम लोन लेने वालों के लिए मार्च का महीना बेहद अहम होता है। सेक्शन 80C: प्रिंसिपल पर छूट सेक्शन 24(b): ब्याज पर छूट अगर आप अतिरिक्त प्री-पेमेंट करते हैं, तो ब्याज का बोझ घटेगा और टैक्स में भी राहत मिलेगी। निष्कर्ष 31 मार्च 2026 आपके लिए सिर्फ तारीख नहीं, बल्कि वित्तीय प्लानिंग का आखिरी मौका है। समय पर ये काम पूरे कर आप न सिर्फ टैक्स बचा सकते हैं, बल्कि भविष्य की आर्थिक सुरक्षा भी सुनिश्चित कर सकते हैं।  

surbhi मार्च 30, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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anjali kumari जुलाई 11, 2026 0