ईरान पर हमले रोकने के फैसले से चौंके नेतन्याहू अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की खबरों के बीच एक नई रिपोर्ट ने पश्चिम एशिया की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu को उस समय बड़ा झटका लगा जब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान पर प्रस्तावित सैन्य हमले रोकने और कूटनीतिक रास्ता अपनाने का फैसला किया। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रंप ने यह फैसला तब लिया जब उन्हें संकेत मिले कि ईरानी नेतृत्व युद्ध समाप्त करने के लिए तैयार किए गए एक प्रारूप समझौते पर सहमत हो गया है। बताया जा रहा है कि नेतन्याहू को इस बातचीत की पूरी जानकारी नहीं थी और वे अमेरिकी प्रशासन के करीबी लोगों से इसके बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहे थे। क्या इजरायल को वार्ता से दूर रखा गया? सूत्रों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में इजरायल सीधे तौर पर शामिल नहीं है। जब ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ईरान के साथ समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, तो इजरायल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने स्पष्ट किया कि वह इस प्रस्तावित समझौते का हिस्सा नहीं है। यही कारण है कि यह सवाल उठने लगा है कि क्या क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर इजरायल को वार्ता प्रक्रिया से अलग रखा गया। 'इस्लामाबाद समझौता' बन सकता है नया मोड़ रिपोर्ट्स के मुताबिक, कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता में तैयार किए जा रहे इस समझौते को "इस्लामाबाद एग्रीमेंट" नाम दिया जा सकता है। प्रस्तावित समझौते में कई अहम बिंदु शामिल हैं। इसके तहत Strait of Hormuz को तुरंत फिर से खोलने, समुद्री व्यापार सामान्य करने, ईरान को सीमित प्रतिबंध राहत देने और 60 दिनों के युद्धविराम को आगे बढ़ाने जैसे प्रावधान शामिल बताए जा रहे हैं। इस दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी आगे बातचीत हो सकती है। इजरायल की शर्तें अब भी सख्त नेतन्याहू लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने की मांग करते रहे हैं। इजरायल चाहता है कि ईरान अपने समृद्ध यूरेनियम भंडार को हटाए, परमाणु संवर्धन ढांचे को खत्म करे, मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाए और क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों को समर्थन देना बंद करे। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित समझौते में इजरायल की इन मांगों को कितना स्थान मिला है। ट्रंप और नेतन्याहू के बीच बढ़ रही दूरी? रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि हाल के दिनों में ट्रंप और नेतन्याहू के संबंधों में तनाव बढ़ा है। दोनों नेताओं की रणनीति में बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। जहां ट्रंप युद्ध को जल्द समाप्त कर क्षेत्र में स्थिरता लाना चाहते हैं, वहीं नेतन्याहू ईरान और उसके सहयोगी संगठनों के खिलाफ अधिक कठोर और लंबी रणनीति के पक्षधर माने जा रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि बढ़ती तेल कीमतों, वैश्विक आर्थिक दबाव और घरेलू राजनीतिक चुनौतियों के कारण ट्रंप युद्ध को जल्द खत्म करना चाहते हैं, जबकि इजरायल अपनी सुरक्षा चिंताओं को प्राथमिकता दे रहा है। पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव यदि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता अंतिम रूप ले लेता है, तो यह पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। इससे न केवल क्षेत्रीय तनाव कम हो सकता है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार को भी राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि इजरायल की चिंताओं और उसकी भविष्य की रणनीति पर अभी भी कई सवाल बने हुए हैं। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह समझौता क्षेत्र में स्थायी शांति लाता है या नए राजनीतिक मतभेदों को जन्म देता है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत की नीति का मजबूती से बचाव करते हुए कहा कि देश ने हमेशा कीमत, उपलब्धता और राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी है। फिनलैंड में आयोजित ‘कुलतरांता टॉक्स’ कार्यक्रम के दौरान उन्होंने यूरोपीय देशों के रवैये पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि वैश्विक मुद्दों पर नैतिकता की बात करने वाले देशों को अपने आचरण पर भी नजर डालनी चाहिए। ‘उभरती शक्तियां और नई भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा’ विषय पर आयोजित चर्चा में जयशंकर से रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत द्वारा रूसी तेल खरीद बढ़ाने को लेकर सवाल पूछा गया। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि उस समय वैश्विक बाजार की परिस्थितियों ने भारत को व्यावहारिक निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि भारत तेल की खरीद उसकी कीमत और उपलब्धता के आधार पर करता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब वैश्विक ऊर्जा बाजार में बदलाव आया, तब रूस का तेल अधिक उपलब्ध था, जबकि यूरोपीय देश मध्य पूर्व से बड़ी मात्रा में तेल खरीद रहे थे, जो पारंपरिक रूप से भारत का प्रमुख स्रोत रहा है। यूरोप के रवैये पर उठाए सवाल ऊर्जा नीति पर भारत का पक्ष रखने के बाद जयशंकर ने यूरोप के दृष्टिकोण पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि भारत ने कभी ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे किसी यूरोपीय देश की सुरक्षा प्रभावित हुई हो, लेकिन भारत के खिलाफ इस्तेमाल होने वाले कई हथियार यूरोप से आए हैं। जब उनसे इस टिप्पणी पर और स्पष्टता मांगी गई, तो उन्होंने कहा कि वर्षों से ऐसे हथियारों की आपूर्ति होती रही है जिनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया गया। उन्होंने कहा कि इस विषय पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। ‘राष्ट्रीय हित सर्वोपरि’ विदेश मंत्री ने कहा कि भारत की प्राथमिकता अपने नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना और आर्थिक स्थिरता बनाए रखना है। उनके अनुसार, वैश्विक संकट के दौर में हर देश अपने हितों को ध्यान में रखकर फैसले लेता है और भारत ने भी वही किया। जयशंकर ने यह भी कहा कि रूस-यूक्रेन संघर्ष और उससे जुड़े ऊर्जा संबंधी फैसलों को केवल नैतिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। उनका कहना था कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अधिकांश देश अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों के आधार पर निर्णय लेते हैं। वैश्विक ऊर्जा बाजार में संतुलन का मुद्दा विदेश मंत्री ने यह भी उल्लेख किया कि रूस पर प्रतिबंधों के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता की आशंका थी। ऐसे समय में भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों और बाजार की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए फैसले लिए, जिससे घरेलू आपूर्ति और आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। जयशंकर का यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस से तेल आयात को लेकर भारत और पश्चिमी देशों के बीच समय-समय पर चर्चा होती रही है। भारत लगातार यह कहता रहा है कि उसकी विदेश और ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हितों तथा व्यावहारिक आवश्यकताओं पर आधारित है।
वॉशिंगटन/होर्मुज स्ट्रेट: पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच होर्मुज स्ट्रेट के निकट एक अमेरिकी सैन्य अपाचे हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। राहत की बात यह रही कि हेलीकॉप्टर में सवार दोनों पायलटों और चालक दल के अन्य सदस्यों को समय रहते सुरक्षित बचा लिया गया। अमेरिकी अधिकारियों ने हादसे की पुष्टि करते हुए बताया कि दुर्घटना के कारणों की जांच की जा रही है। बचाव अभियान में सुरक्षित निकाला गया चालक दल रिपोर्टों के अनुसार, हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त होने के तुरंत बाद अमेरिकी सैन्य बलों ने रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। बचाव दल ने चालक दल के सभी सदस्यों को सुरक्षित निकाल लिया। प्रारंभिक जानकारी में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है। अमेरिकी प्रशासन की ओर से अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि हेलीकॉप्टर तकनीकी खराबी, मौसम संबंधी कारणों या किसी अन्य वजह से दुर्घटनाग्रस्त हुआ। रणनीतिक क्षेत्र में हुआ हादसा होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक माना जाता है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस क्षेत्र में अमेरिका, ईरान और अन्य देशों की सैन्य गतिविधियां लगातार बनी रहती हैं। ऐसे में अमेरिकी सैन्य हेलीकॉप्टर का दुर्घटनाग्रस्त होना सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है। अमेरिका-ईरान तनाव के बीच बढ़ी संवेदनशीलता यह घटना ऐसे समय हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव को कम करने तथा संभावित समझौते को लेकर कूटनीतिक प्रयास जारी हैं। हाल के दिनों में क्षेत्र में बढ़ी सैन्य गतिविधियों और संघर्ष की घटनाओं ने पहले ही सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि हादसे का सीधा संबंध किसी सैन्य कार्रवाई से है या नहीं, इसका पता जांच पूरी होने के बाद ही चल सकेगा। जांच एजेंसियां जुटीं अमेरिकी रक्षा विभाग ने दुर्घटना के कारणों का पता लगाने के लिए जांच शुरू कर दी है। हेलीकॉप्टर के फ्लाइट डेटा, तकनीकी रिकॉर्ड और घटनास्थल से जुटाए गए साक्ष्यों का विश्लेषण किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने तक दुर्घटना के कारणों को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। क्षेत्रीय हालात पर बनी हुई है नजर होर्मुज स्ट्रेट और आसपास के क्षेत्र में जारी रणनीतिक गतिविधियों के मद्देनजर अमेरिकी सैन्य बल स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। फिलहाल चालक दल के सुरक्षित होने से राहत जरूर मिली है, लेकिन दुर्घटना के वास्तविक कारणों का खुलासा जांच रिपोर्ट आने के बाद ही हो सकेगा।
वॉशिंगटन: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जारी कूटनीतिक और रणनीतिक टकराव को लेकर बड़ा दावा किया है। ट्रंप ने कहा कि अगले दो सप्ताह अमेरिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे और इसी अवधि में ईरान के खिलाफ “पूर्ण विजय” हासिल होने की संभावना है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि दोनों देशों के बीच एक नए परमाणु समझौते की राह खुल सकती है। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल के दिनों में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ा सैन्य तनाव फिलहाल कम होता दिखाई दे रहा है और क्षेत्र में युद्ध की आशंकाओं के बीच कूटनीतिक प्रयास तेज हो गए हैं। चुनावी कार्यक्रम में किया बड़ा दावा अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप ने यह टिप्पणी एक वर्चुअल राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान की, जहां उन्होंने अपने समर्थकों को संबोधित किया। कार्यक्रम रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के समर्थन में आयोजित किया गया था। अपने संबोधन में ट्रंप ने दावा किया कि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच पर्दे के पीछे चल रही बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि ईरान अमेरिकी मांगों पर गंभीरता से विचार कर रहा है और समझौते की संभावना पहले की तुलना में अधिक मजबूत दिखाई दे रही है। ट्रंप ने कहा, “हम बातचीत कर रहे हैं और वे एक अच्छा समझौता करना चाहते हैं। वे हमें लगभग हर वह चीज देने को तैयार हैं जिसकी हमें जरूरत है। वे परमाणु हथियार नहीं रखने पर भी तैयार हैं।” ‘दो सप्ताह में दिखेगी असली जीत’ राष्ट्रपति ट्रंप ने अगले पखवाड़े को निर्णायक बताते हुए कहा कि अमेरिका जल्द ही अपनी रणनीतिक सफलता की घोषणा कर सकता है। उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि हम यह संघर्ष जीत रहे हैं, लेकिन असली जीत अगले दो सप्ताह में दिखाई देगी। हम पूर्ण विजय की घोषणा करेंगे। यह पूरी जीत होगी और बहुत जल्द होगी।” ट्रंप ने यह भी दावा किया कि यदि समझौता सफल रहा तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और तेल की कीमतों में गिरावट देखने को मिल सकती है। ईरान-इजरायल तनाव के बीच आया बयान ट्रंप की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब सप्ताहांत में ईरान और इजरायल के बीच तनाव खतरनाक स्तर तक पहुंच गया था। दोनों देशों के बीच मिसाइल हमलों और जवाबी सैन्य कार्रवाइयों ने पूरे पश्चिम एशिया में युद्ध की आशंकाएं बढ़ा दी थीं। तनाव बढ़ने के बाद इजरायल ने ईरानी ठिकानों को निशाना बनाया, जबकि ईरान ने भी जवाबी हमले किए। बाद में दोनों पक्षों की ओर से सैन्य गतिविधियों में कमी देखने को मिली। नेतन्याहू ने हमले रोकने की पुष्टि की इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पुष्टि की है कि इजरायली सेना ने फिलहाल ईरानी ठिकानों पर अपने सैन्य अभियान रोक दिए हैं। उन्होंने किसी औपचारिक युद्धविराम की घोषणा नहीं की, लेकिन सैन्य कार्रवाई में आई नरमी को क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। दूसरी ओर, ईरान ने भी संकेत दिया है कि वह फिलहाल अपने सैन्य अभियान को आगे नहीं बढ़ाएगा। तेहरान ने चेतावनी दी है कि यदि उसके हितों को नुकसान पहुंचाने वाली कोई नई कार्रवाई होती है तो जवाबी कदम उठाए जा सकते हैं। परमाणु समझौते पर फिर बढ़ीं उम्मीदें ट्रंप के बयान के बाद अमेरिका और ईरान के बीच संभावित परमाणु समझौते को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। पिछले कुछ वर्षों से दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण रहे हैं और परमाणु कार्यक्रम को लेकर कई दौर की वार्ताएं भी विफल रही हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोनों पक्ष किसी नए समझौते पर सहमत होते हैं तो इससे न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी इसका व्यापक असर पड़ सकता है। पहले भी दे चुके हैं ऐसी समयसीमा यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने किसी कूटनीतिक सफलता के लिए दो सप्ताह की समयसीमा तय की हो। इससे पहले भी उन्होंने क्षेत्रीय संघर्षों और युद्धविराम प्रयासों को लेकर इसी तरह की समय-सीमा का उल्लेख किया था। अब एक बार फिर ट्रंप ने अगले दो सप्ताह को निर्णायक बताते हुए संकेत दिया है कि अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। इन दावों पर अंतिम तस्वीर आने वाले दिनों में ही साफ हो पाएगी। पश्चिम एशिया पर टिकी दुनिया की नजर ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते घटनाक्रमों पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। क्षेत्र में शांति बहाल करने के प्रयासों और संभावित परमाणु समझौते की दिशा में होने वाली प्रगति आने वाले दिनों में वैश्विक राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है।
चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping सात वर्षों बाद उत्तर कोरिया की यात्रा पर जा रहे हैं, जहां उनकी मुलाकात उत्तर कोरियाई नेता Kim Jong Un से होगी। यह दौरा केवल औपचारिक कूटनीतिक मुलाकात नहीं माना जा रहा, बल्कि पूर्वी एशिया में बदलते शक्ति संतुलन के बीच चीन की नई रणनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत भी माना जा रहा है। रूस-उत्तर कोरिया की बढ़ती नजदीकियों से चिंतित है बीजिंग विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में रूस और उत्तर कोरिया के संबंध तेजी से मजबूत हुए हैं। विशेष रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच रक्षा, आर्थिक और राजनीतिक सहयोग बढ़ा है। इससे उत्तर कोरिया को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नया समर्थन मिला है। चीन नहीं चाहता कि उसका पारंपरिक सहयोगी पूरी तरह रूस के प्रभाव क्षेत्र में चला जाए। इसी कारण बीजिंग अब प्योंगयांग के साथ अपने संबंधों को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। 2019 के बाद पहली बार आमने-सामने होंगे दोनों नेता शी जिनपिंग आखिरी बार 2019 में उत्तर कोरिया गए थे। उस समय अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच परमाणु निरस्त्रीकरण वार्ता विफल होने के बाद चीन और उत्तर कोरिया के संबंध काफी मजबूत दिखाई दिए थे। बाद के वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में कुछ दूरी देखने को मिली। ऐसे में सात साल बाद हो रही यह यात्रा दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कूटनीतिक तौर पर किम जोंग उन के लिए बड़ी उपलब्धि हाल के महीनों में चीन और उत्तर कोरिया के रिश्तों में तनाव की चर्चाएं भी सामने आई थीं। कुछ महत्वपूर्ण सरकारी आयोजनों में चीनी प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति ने इन अटकलों को और बढ़ाया था। ऐसे माहौल में चीन के राष्ट्रपति का प्योंगयांग पहुंचना उत्तर कोरिया के लिए एक बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है। इससे किम जोंग उन की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को भी मजबूती मिल सकती है। सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता भी अहम मुद्दा चीन और उत्तर कोरिया के बीच करीब 1,400 किलोमीटर लंबी सीमा है। बीजिंग के लिए यह सीमा रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। चीन चाहता है कि उसके पड़ोस में किसी प्रकार की राजनीतिक अस्थिरता या सैन्य संकट पैदा न हो। इसके अलावा उत्तर कोरिया अपनी नई विकास योजनाओं के तहत पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है। चीन की कंपनियां और निवेशक भी इसमें अवसर तलाश रहे हैं। परमाणु कार्यक्रम पर भी हो सकती है चर्चा उत्तर कोरिया का परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय रहा है। चीन लगातार कोरियाई प्रायद्वीप में स्थिरता और संवाद की वकालत करता रहा है। वहीं उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम को राष्ट्रीय सुरक्षा का अनिवार्य हिस्सा बताता है। माना जा रहा है कि शी जिनपिंग इस यात्रा के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा और परमाणु मुद्दों पर भी चर्चा कर सकते हैं। चीन का बड़ा लक्ष्य: प्योंगयांग पर प्रभाव बनाए रखना विश्लेषकों के अनुसार इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य उत्तर कोरिया पर चीन का राजनीतिक और रणनीतिक प्रभाव बनाए रखना है। रूस के बढ़ते प्रभाव के बीच बीजिंग यह संदेश देना चाहता है कि पूर्वी एशिया की सुरक्षा और क्षेत्रीय राजनीति में उसकी भूमिका अब भी केंद्रीय बनी हुई है। शी जिनपिंग और किम जोंग उन की यह मुलाकात केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि यह रूस, अमेरिका और पूरे पूर्वी एशिया की भू-राजनीति पर भी असर डाल सकती है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका-इजरायल संघर्ष के दौरान हुए एक बड़े हमले को लेकर चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने दावा किया कि संघर्ष के शुरुआती दिनों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के कार्यालय पर हुए हमले के समय वह उसी इमारत में मौजूद थे और मलबे के बीच से निकलकर अपनी जान बचाने में सफल रहे। अराघची के अनुसार, हमले के बाद दो दिनों तक उन्हें यह भी नहीं पता था कि खामेनेई किस स्थिति में हैं। हमले के वक्त खामेनेई के कार्यालय में मौजूद थे अराघची लेबनान के टीवी चैनल अल-मयादीन को दिए इंटरव्यू में अराघची ने बताया कि संघर्ष के शुरुआती घंटों में खामेनेई के कार्यालय को निशाना बनाया गया था। उस समय वे भी वहां मौजूद थे। उन्होंने कहा, “विस्फोट के बाद मेरी पहली चिंता अपनी सुरक्षा नहीं, बल्कि सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की स्थिति को लेकर थी। उस समय हालात बेहद अराजक थे और इमारत के कई हिस्से क्षतिग्रस्त हो गए थे।” दो दिन तक नहीं मिली खामेनेई की जानकारी अराघची ने बताया कि हमले के बाद लगातार दो दिनों तक उन्हें खामेनेई के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी। इस दौरान पूरा ध्यान राहत, बचाव और सुरक्षा व्यवस्थाओं पर केंद्रित रहा। उनके मुताबिक, सुरक्षा एजेंसियों ने कई बार खामेनेई को सुरक्षित बंकर या विशेष स्थान पर जाने की सलाह दी थी, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। ‘जब तक जनता सुरक्षित नहीं, मैं भी नहीं’ विदेश मंत्री के अनुसार, खामेनेई का मानना था कि यदि आम ईरानी नागरिकों को सुरक्षित आश्रय उपलब्ध नहीं है, तो वे भी किसी विशेष सुरक्षा सुविधा का लाभ नहीं लेंगे। अराघची ने दावा किया कि खामेनेई ने कहा था कि देश की जनता जिस स्थिति का सामना करेगी, वही स्थिति वे भी स्वीकार करेंगे। उन्होंने युद्ध के दौरान खामेनेई के नेतृत्व और फैसलों की भी सराहना की। खाड़ी देशों को पहले ही दी गई थी चेतावनी इंटरव्यू में अराघची ने कहा कि संघर्ष शुरू होने से पहले उन्होंने कई खाड़ी देशों का दौरा किया था और स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यदि ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियानों में क्षेत्रीय सैन्य अड्डों का उपयोग किया गया, तो जवाबी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति ही तनाव बढ़ाने का एक प्रमुख कारण रही है। ईरान की प्रतिक्रिया ने विरोधियों को चौंकाया अराघची ने दावा किया कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान की जवाबी क्षमता को कम आंका था। उनके अनुसार, बड़े पैमाने पर हमलों के बावजूद ईरान ने बहुत कम समय में जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी, जिससे विरोधी पक्ष की रणनीतिक गणनाएं प्रभावित हुईं। उन्होंने कहा कि ईरान की सैन्य प्रतिक्रिया की तीव्रता ने कई देशों को आश्चर्य में डाल दिया। नेतृत्व परिवर्तन पर भी दिया बयान ईरानी विदेश मंत्री ने देश के नेतृत्व को लेकर चल रही चर्चाओं पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि मोजतबा खामेनेई राष्ट्रीय मामलों और शासन व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं तथा सरकारी संस्थानों के साथ उनका नियमित संवाद बना हुआ है। ईरान की आधिकारिक व्यवस्था में सर्वोच्च नेतृत्व से जुड़े किसी भी बदलाव पर अंतिम पुष्टि केवल संबंधित संवैधानिक संस्थाओं द्वारा ही की जा सकती है। कैसे शुरू हुआ था 2026 का संघर्ष? 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ संयुक्त सैन्य अभियान शुरू किया था। इस अभियान में परमाणु ठिकानों, मिसाइल अड्डों, वायु रक्षा प्रणालियों और सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया। इसके जवाब में ईरान ने ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस-IV’ के तहत मिसाइल और ड्रोन हमले किए। संघर्ष का प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया में देखा गया और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी इसका असर पड़ा। फिलहाल अप्रैल 2026 से संघर्षविराम लागू है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और तनावपूर्ण बयानबाजी जारी है। ऐसे में क्षेत्र में स्थायी शांति को लेकर अब भी अनिश्चितता बनी हुई है।
रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर एक बार फिर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने संकेत दिया है कि मॉस्को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शांति प्रस्ताव के आधार पर यूक्रेन के साथ समझौते के लिए तैयार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी शांति समझौते के लिए यूक्रेन को कुछ महत्वपूर्ण शर्तें स्वीकार करनी होंगी। ट्रंप के प्रस्ताव पर रूस की सकारात्मक प्रतिक्रिया रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि रूस शांतिपूर्ण समाधान चाहता है और वह उन प्रस्तावों पर आगे बढ़ने को तैयार है जिन पर अलास्का के एंकरेज में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ चर्चा हुई थी। पुतिन ने कहा कि यदि यूक्रेन भी इन प्रस्तावों को स्वीकार करता है तो संघर्ष का समाधान अपेक्षाकृत जल्दी संभव हो सकता है। उनके अनुसार, रूस बातचीत के रास्ते को बंद नहीं करना चाहता, लेकिन समझौता दोनों पक्षों की सहमति से ही संभव होगा। रूस की प्रमुख शर्तें क्या हैं? रूसी पक्ष के अनुसार संभावित समझौते के लिए कुछ प्रमुख मुद्दों पर सहमति आवश्यक होगी: यूक्रेन को डोनबास क्षेत्र पर रूस के नियंत्रण को स्वीकार करना होगा। खेरसोन और ज़ापोरिज्जिया क्षेत्रों में रूसी दावों को मान्यता देनी होगी। यूक्रेन को नाटो सदस्यता की दिशा में आगे नहीं बढ़ना होगा। सुरक्षा और सीमा संबंधी कुछ अन्य मुद्दों पर भी सहमति बनानी होगी। इन शर्तों पर यूक्रेन की ओर से अभी तक कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिला है। जेलेंस्की ने पुतिन को लिखा खुला पत्र इस बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने पुतिन को एक खुला पत्र लिखकर सीधे संवाद का प्रस्ताव दिया है। उन्होंने युद्ध समाप्त करने के लिए आमने-सामने बातचीत और पूर्ण युद्धविराम की आवश्यकता पर जोर दिया। जेलेंस्की ने कहा कि स्थायी शांति केवल प्रत्यक्ष वार्ता के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने पुतिन को व्यक्तिगत बैठक का प्रस्ताव भी दिया है। रूस के राष्ट्रपति कार्यालय क्रेमलिन ने पुष्टि की है कि उसे यह पत्र प्राप्त हो चुका है। युद्ध के मैदान में रूस का दावा पुतिन ने दावा किया कि रूसी सेना विभिन्न मोर्चों पर लगातार बढ़त बनाए हुए है। उनके अनुसार, हाल के महीनों में रूस ने हजारों वर्ग किलोमीटर अतिरिक्त क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया है। रूसी राष्ट्रपति का कहना है कि लुहांस्क क्षेत्र पर लगभग पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो चुका है, जबकि दोनेत्स्क और ज़ापोरिज्जिया के बड़े हिस्सों पर भी रूसी सेना का नियंत्रण है। यूरोप की भूमिका पर रूस का सवाल पुतिन ने यूरोपीय देशों की मध्यस्थता क्षमता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जो देश लंबे समय से रूस की रणनीतिक हार की बात करते रहे हैं, उनके लिए निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाना कठिन होगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रूस यूरोपीय देशों के साथ संवाद के रास्ते बंद नहीं करना चाहता। शांति वार्ता में क्यों आया ठहराव? रूस और यूक्रेन के बीच जिनेवा, इस्तांबुल और अबू धाबी सहित कई स्थानों पर पहले भी वार्ताएं हो चुकी हैं, लेकिन कोई ठोस परिणाम नहीं निकल पाया। फरवरी 2022 में शुरू हुआ युद्ध अब चौथे वर्ष में प्रवेश कर चुका है और लाखों लोगों को प्रभावित कर चुका है। ट्रंप के प्रस्ताव, पुतिन की प्रतिक्रिया और जेलेंस्की की नई पहल के बाद एक बार फिर कूटनीतिक समाधान की संभावनाओं पर चर्चा तेज हो गई है। क्या जल्द खत्म हो सकता है युद्ध? विशेषज्ञों का मानना है कि शांति समझौते की संभावना तभी बढ़ेगी जब दोनों पक्ष अपनी-अपनी अधिकतम मांगों में लचीलापन दिखाएं। फिलहाल रूस और यूक्रेन के रुख में बड़ा अंतर बना हुआ है, लेकिन हालिया बयानों ने भविष्य में वार्ता की संभावना को पूरी तरह खत्म नहीं होने दिया है।
मुंबई, एजेंसियां। Vaibhav Suryavanshi : वैभव सूर्यवंशी को भारत के टी-20 टीम में जगह मिल गई है। यह खबर तब सामने आई जब बीसीसीआई ने इंग्लैंड और आयरलैंड के दौरे पर जाने के लिए टीम इंडिया की घोषणा की। वैभव सूर्यवंशी को पहली बार टीम इंडिया में जगह मिली है, जो उनके आईपीएल 2026 में बेहतरीन प्रदर्शन का इनाम है। वैभव सूर्यवंशी अभी श्रीलंका में इंडिया ए की टीम के साथ हैं। IPL 2026 में किया शानदार प्रदर्शन वैभव सूर्यवंशी ने आईपीएल 2026 में बेहतरीन प्रदर्शन किया था। वे आईपीएल में सबसे अधिक रन (776) बनाने वाले खिलाड़ी बने थे। उनका स्ट्राइक रेट (237.30) भी सबसे ज्यादा था और उन्होंने छक्के (72) भी सबसे अधिक मारे थे। वैभव सूर्यवंशी अभी महज 15 साल के हैं। उनके प्रदर्शन पर क्रिकेट के दिग्गजों की नजर थी और सभी एक सुर में यह मांग कर रहे थे कि वैभव को टीम इंडिया में जगह दी जाए। बिहार के रहने वाले हैं वैभव सूर्यवंशी वैभव सूर्यवंशी बिहार के समस्तीपुर के जिले के रहने वाले हैं। उन्हें अपने पिता से क्रिकेट की कोंचिंग मिली है। वे बचपन से ही क्रिकेट में रुचि लेते हैं और अभी उनकी शिक्षा भी पूरी नहीं हुई है। उन्होंने 10वीं का बोर्ड भी नहीं दिया है।
सेंट पीटर्सबर्ग: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम (SPIEF) 2026 में भारत की विदेश नीति और रणनीतिक स्वतंत्रता की सराहना करते हुए कहा कि भारत एक संप्रभु देश है और अपने फैसले स्वयं करता है। पुतिन ने कहा कि भारत ने हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी है और किसी बाहरी दबाव या निर्देश के आधार पर नीतियां नहीं बनाई हैं। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस के साथ भारत के ऊर्जा और आर्थिक संबंधों को लेकर पश्चिमी देशों में लगातार चर्चा हो रही है। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का किया उल्लेख फोरम के दौरान बोलते हुए पुतिन ने कहा कि भारत और चीन जैसे बड़े देश अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप स्वतंत्र निर्णय लेते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी संप्रभु राष्ट्र के निर्णय लेने के अधिकार और उसकी स्वतंत्र विदेश नीति का सम्मान किया जाना चाहिए। रूसी राष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में देशों को अपने हितों के अनुसार नीतियां तय करने का अधिकार है और इस सिद्धांत पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए। रूस-भारत संबंधों को बताया मजबूत पुतिन ने भारत को रूस का महत्वपूर्ण और भरोसेमंद साझेदार बताया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से रणनीतिक, आर्थिक और ऊर्जा सहयोग जारी है और यह संबंध आपसी हितों तथा विश्वास पर आधारित हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि रूस और भारत के बीच सहयोग को प्रभावित करने के लिए किसी प्रकार का बाहरी दबाव प्रभावी नहीं होगा। रूसी तेल खरीद को लेकर चर्चा में रहे थे भारत-अमेरिका संबंध पिछले कुछ वर्षों में रूस से तेल आयात को लेकर भारत और अमेरिका के बीच कई बार चर्चा हुई है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे, जबकि भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए रूसी तेल की खरीद जारी रखी। भारत सरकार लगातार यह कहती रही है कि उसकी विदेश नीति और आर्थिक फैसले राष्ट्रीय हितों तथा ऊर्जा सुरक्षा की आवश्यकताओं के आधार पर तय किए जाते हैं। वैश्विक मंच पर फिर चर्चा में भारत की विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि पुतिन का यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अपनी स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति को आगे बढ़ा रहा है। रूस, अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ समानांतर संबंध बनाए रखने की भारत की नीति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है।
रूस के राष्ट्रपति Vladimir Putin ने भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है और इसे कमजोर करने की पश्चिमी देशों की कोशिशें सफल नहीं होंगी। भारत-रूस साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है पुतिन ने कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने भरोसा जताया कि आने वाले वर्षों में भारत-रूस व्यापार 100 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। ‘भारत पर दबाव बनाना गलत’ — पुतिन राष्ट्रपति पुतिन ने कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और प्रधानमंत्री Narendra Modi पर बाहरी दबाव डालना अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए नुकसानदेह है। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयासों का कोई असर नहीं पड़ा है और भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर कायम है। भारत की आर्थिक प्रगति की तारीफ पुतिन ने भारत की तेज आर्थिक वृद्धि और मजबूत विकास दर की सराहना करते हुए कहा कि यह प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व और नीतिगत निरंतरता का परिणाम है। उन्होंने भारत को दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल बताया। पश्चिमी देशों के दबाव पर रूस का रुख पुतिन ने कहा कि पश्चिमी देशों की कोशिशें भारत और रूस के संबंधों को प्रभावित करने में विफल रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि रूस को भारत के अन्य देशों के साथ संबंधों से कोई आपत्ति नहीं है। भारत-अमेरिका संबंधों पर भी टिप्पणी पुतिन ने कहा कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर सभी देशों के साथ संबंध विकसित कर रहा है और अमेरिका के साथ उसके बढ़ते संबंध रूस-भारत साझेदारी पर कोई नकारात्मक असर नहीं डालेंगे। ‘भारत एक भरोसेमंद साझेदार’ रूस के राष्ट्रपति ने भारत को एक “विश्वसनीय साझेदार” बताते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक भरोसा और रणनीतिक सहयोग मजबूत बना हुआ है।
एक ओर ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव, आर्थिक संकट और सैन्य हमलों का सामना कर रहा है, वहीं उत्तर कोरिया अपने परमाणु अभियान को और तेज करता दिखाई दे रहा है। उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन ने हाल ही में एक नए परमाणु सामग्री उत्पादन केंद्र का दौरा कर संकेत दिया है कि देश अपने परमाणु हथियार भंडार का तेजी से विस्तार करने की तैयारी में है। दक्षिण कोरिया की समाचार एजेंसी योनहाप के अनुसार, सरकारी मीडिया केसीएनए ने बताया कि किम ने हाल ही में शुरू हुए परमाणु केंद्र का निरीक्षण किया। इस केंद्र का स्थान सार्वजनिक नहीं किया गया है। ‘परमाणु ताकत कई गुना बढ़ानी होगी’, किम का निर्देश निरीक्षण के दौरान किम जोंग उन ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियां उत्तर कोरिया से और अधिक मजबूत परमाणु प्रतिरोधक क्षमता की मांग करती हैं। उन्होंने अधिकारियों और वैज्ञानिकों को निर्देश दिया कि देश की परमाणु शक्ति को गुणवत्ता और संख्या दोनों स्तरों पर तेजी से बढ़ाया जाए ताकि संभावित सुरक्षा चुनौतियों का सामना किया जा सके। पांच साल में दोगुनी हुई उत्पादन क्षमता का दावा उत्तर कोरिया के सरकारी मीडिया के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में हथियार-ग्रेड परमाणु सामग्री उत्पादन की क्षमता दोगुने से अधिक बढ़ चुकी है। किम ने इस उपलब्धि का श्रेय देश के वैज्ञानिकों को दिया और कहा कि परमाणु कार्यक्रम का विस्तार राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा बना रहेगा। परमाणु हथियारों के विस्तार पर हुई विशेष बैठक परमाणु केंद्र के दौरे के दौरान उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु बलों को मजबूत करने के लिए एक उच्चस्तरीय बैठक भी आयोजित की। बैठक में किम जोंग उन ने नई कार्ययोजना को मंजूरी दी और परमाणु क्षमता बढ़ाने से जुड़े कई दिशा-निर्देश जारी किए। उन्होंने इस कदम को देश के परमाणु कार्यक्रम के लिए "ऐतिहासिक उपलब्धि" बताया। तस्वीरों में दिखीं यूरेनियम संवर्धन की अत्याधुनिक मशीनें सरकारी मीडिया द्वारा जारी तस्वीरों में बड़े हॉल के भीतर कतारबद्ध सेंट्रीफ्यूज मशीनें दिखाई दीं, जिनका उपयोग यूरेनियम संवर्धन प्रक्रिया में किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन मशीनों की बढ़ती संख्या उत्तर कोरिया की परमाणु उत्पादन क्षमता में वृद्धि का संकेत हो सकती है। क्या कोई नया गुप्त परमाणु केंद्र भी बना रहा है उत्तर कोरिया? विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तर कोरिया के प्रमुख यूरेनियम संवर्धन केंद्र योंगब्योन, कुसोंग और कांगसोंग में स्थित हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि किम ने जिन सुविधाओं का दौरा किया, वे मौजूदा केंद्रों का हिस्सा हैं या किसी नए गुप्त परमाणु परिसर का। यही वजह है कि इस दौरे ने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। दुनिया के लिए नया संकेत, पीछे हटने के मूड में नहीं प्योंगयांग किम जोंग उन के ताजा कदम से स्पष्ट संकेत मिलता है कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने के बजाय उसे और अधिक आधुनिक और व्यापक बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह रुख क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकता है, खासकर ऐसे समय में जब उत्तर कोरिया लगातार मिसाइल परीक्षणों और सैन्य गतिविधियों को बढ़ा रहा है। जापान और दक्षिण कोरिया की बढ़ सकती है चिंता हाल के महीनों में उत्तर कोरिया ने कई मिसाइल परीक्षण किए हैं, जिनमें कुछ परीक्षण जापान की दिशा में भी किए गए। मिसाइलें अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा से पहले ही गिर गईं, लेकिन इससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ा है। दक्षिण कोरिया और जापान लंबे समय से उत्तर कोरिया की बढ़ती परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को अपनी सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती मानते रहे हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और इजराइल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के बीच लेबनान में जारी सैन्य कार्रवाई को लेकर तीखी बातचीत हुई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप ने हिजबुल्लाह के खिलाफ इजराइल के बढ़ते हमलों पर नाराजगी जताते हुए नेतन्याहू से सीधे सवाल किए। माना जा रहा है कि इस मुद्दे ने वॉशिंगटन और तेल अवीव के बीच उभरते मतभेदों को भी सामने ला दिया है। लेबनान में बढ़े हमलों से बढ़ी क्षेत्रीय तनाव की आशंका रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजराइल ने हाल के दिनों में लेबनान की राजधानी बेरूत के दक्षिणी इलाकों में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हमले तेज कर दिए हैं। इसके साथ ही दक्षिणी लेबनान में जमीनी सैन्य अभियान भी आगे बढ़ाया गया है। इन घटनाओं के बाद पूरे क्षेत्र में बड़े संघर्ष की आशंका बढ़ गई है। अमेरिका को चिंता है कि क्षेत्र में बढ़ता तनाव ईरान के साथ चल रही कूटनीतिक वार्ताओं को प्रभावित कर सकता है। वहीं, ईरान ने भी चेतावनी दी है कि ऐसी सैन्य कार्रवाइयां शांति प्रयासों को कमजोर कर सकती हैं। रिपोर्ट में ट्रंप की कड़ी प्रतिक्रिया का दावा डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म Axios की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने फोन पर नेतन्याहू के फैसलों को लेकर तीखी नाराजगी जताई। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रंप का मानना है कि इजराइल की मौजूदा रणनीति उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग कर सकती है और अमेरिका की कूटनीतिक कोशिशों को भी नुकसान पहुंचा सकती है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि बातचीत के दौरान ट्रंप ने नेतन्याहू के रवैये पर बेहद कठोर टिप्पणी की और कहा कि उनके कदमों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। “आखिर आप कर क्या रहे हैं?”: रिपोर्ट एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से दावा किया गया है कि फोन वार्ता के दौरान ट्रंप ने नेतन्याहू से नाराजगी भरे लहजे में पूछा, “आखिर आप कर क्या रहे हैं?” रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति का मानना था कि लगातार सैन्य कार्रवाई क्षेत्रीय हालात को और जटिल बना सकती है। इन दावों पर व्हाइट हाउस या इजराइली प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। बेरूत में हमलों के बाद बढ़ी लोगों की चिंता सोमवार को नेतन्याहू और इजराइल के रक्षा मंत्री ने बेरूत के दहियेह इलाके में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर कार्रवाई का आदेश दिया। इजराइल का आरोप है कि हिजबुल्लाह युद्धविराम समझौते का उल्लंघन कर रहा है और उसके क्षेत्र पर हमले कर रहा है। हमलों की खबर के बाद बेरूत के दक्षिणी उपनगरों में दहशत का माहौल बन गया। संभावित हवाई हमलों की आशंका के बीच कई लोगों ने सुरक्षित स्थानों की ओर रुख किया। ईरान ने दी नई चेतावनी Iran ने कहा है कि लेबनान में जारी इजराइली सैन्य अभियान अमेरिका और ईरान के बीच चल रही वार्ताओं को प्रभावित कर सकता है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए लेबनान में युद्धविराम बनाए रखना आवश्यक है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि लेबनान मोर्चे पर तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर न केवल इजराइल-हिजबुल्लाह संघर्ष पर पड़ेगा, बल्कि अमेरिका-ईरान संबंधों और पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता पर भी दिखाई दे सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अब मिस्र भी दोनों देशों के बीच संभावित समझौते की कोशिशों में सक्रिय हो गया है। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल-फतह अल-सीसी ने कहा है कि उनका देश अमेरिका और ईरान के बीच व्यापक शांति समझौता कराने के लिए विभिन्न पक्षों के साथ लगातार संपर्क में है। मैक्रों से बातचीत में सामने आया मिस्र का रुख मिस्र के राष्ट्रपति ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ फोन पर क्षेत्रीय हालात पर चर्चा की। इस दौरान अल-सीसी ने कहा कि काहिरा अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने और एक व्यापक समझौते का रास्ता निकालने के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर मिस्र का रुख अंतरराष्ट्रीय कानून, देशों की संप्रभुता और उनके संसाधनों के सम्मान के सिद्धांतों पर आधारित है। उनका मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बातचीत और कूटनीति ही सबसे प्रभावी रास्ता है। मध्य पूर्व में स्थिरता पर फ्रांस का जोर बातचीत के दौरान फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व को नए संघर्ष और अराजकता से बचाना अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्राथमिकता होनी चाहिए। मैक्रों ने विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए इस रणनीतिक समुद्री मार्ग से जहाजों की निर्बाध आवाजाही बेहद महत्वपूर्ण है। ट्रंप बोले- समझौते के करीब हैं दोनों देश इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान परमाणु समझौते के काफी करीब पहुंच चुके हैं। उन्होंने कहा कि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और दोनों पक्षों के बीच कई मुद्दों पर सहमति बनी है। व्हाइट हाउस में दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि उनकी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार हासिल न कर सके। उन्होंने कहा कि यदि समझौता हो जाता है तो यह सभी पक्षों के लिए बेहतर होगा। परमाणु हथियार नहीं बनाने की बात पर सहमति ट्रंप के अनुसार, ईरान इस बात पर सहमत हुआ है कि वह न तो परमाणु हथियार विकसित करेगा और न ही किसी अन्य देश से हासिल करेगा। उन्होंने कहा कि बातचीत के दौरान इस विषय पर विस्तृत चर्चा हुई और शर्तों को और स्पष्ट किया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण गारंटी यही है कि ईरान के पास किसी भी परिस्थिति में परमाणु हथियार न हों। उन्होंने दावा किया कि इस दिशा में सकारात्मक प्रगति हुई है। सैन्य विकल्प अब भी खुला ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बातचीत किसी नतीजे तक नहीं पहुंचती है तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प अब भी खुला रहेगा। उन्होंने कहा कि वह कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन अमेरिका की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। ट्रंप ने बातचीत को जटिल और कठिन बताया, लेकिन साथ ही विश्वास जताया कि धीरे-धीरे दोनों पक्ष किसी समाधान की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान वार्ता और मध्य पूर्व की राजनीति पर पूरी दुनिया की नजर बनी रहेगी।
ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबफ ने अमेरिका पर आर्थिक दबाव और मीडिया प्रचार के जरिए देश को कमजोर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि ईरान अपने अधिकारों और राष्ट्रीय हितों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा. गालिबफ ने दावा किया कि तेहरान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करने की अमेरिकी रणनीति कभी सफल नहीं होगी. आर्थिक दबाव और प्रचार के जरिए फूट डालने का आरोप रविवार को संसद के नए सत्र को संबोधित करते हुए गालिबफ ने कहा कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश सैन्य मोर्चे पर मिली असफलताओं की भरपाई आर्थिक प्रतिबंधों और मीडिया अभियान के जरिए करना चाहते हैं. उनका उद्देश्य ईरान की राष्ट्रीय एकता को कमजोर करना और देश के भीतर विभाजन पैदा करना है. उन्होंने कहा कि युद्ध के नए दौर में विरोधी ताकतें आर्थिक दबाव और प्रचार तंत्र के सहारे ईरान को झुकाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन यह उनका भ्रम है और यह रणनीति सफल नहीं होगी. 'ईरान और इस्लाम को कमजोर करने की कोशिश' गालिबफ ने कहा कि देश एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील दौर से गुजर रहा है. उन्होंने दावा किया कि ईरानी जनता उन ताकतों का मजबूती से सामना कर रही है, जो ईरान और इस्लाम को कमजोर करने का प्रयास कर रही हैं. उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियां इस दौर को देश की संप्रभुता और अधिकारों की रक्षा के संघर्ष के रूप में याद रखेंगी. उनके अनुसार, यह समय राष्ट्रीय एकता और दृढ़ संकल्प का प्रतीक बनकर इतिहास में दर्ज होगा. संघर्ष के चार मोर्चों का किया जिक्र ईरानी संसद अध्यक्ष ने मौजूदा हालात को व्यापक संघर्ष बताते हुए चार प्रमुख मोर्चों का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि सैन्य, कूटनीतिक, जनसहभागिता और जनसेवा के क्षेत्र में समन्वित प्रयासों से ही देश अपने लक्ष्यों को हासिल कर सकता है. गालिबफ ने दावा किया कि मिसाइल कार्यक्रम समेत ईरान की सैन्य उपलब्धियां जनता के समर्थन और सहयोग का परिणाम हैं. उन्होंने कहा कि अब इन उपलब्धियों को राजनीतिक और कूटनीतिक सफलता में बदलने की जिम्मेदारी नीति निर्माताओं की है. समझौते पर रखा स्पष्ट रुख विदेशी शक्तियों के साथ संभावित समझौतों पर गालिबफ ने कहा कि ईरान केवल उन्हीं प्रस्तावों को स्वीकार करेगा, जिनसे देश के अधिकार और जनता के हित सुरक्षित रहें. उन्होंने कहा कि केवल आश्वासनों या बयानों के आधार पर कोई फैसला नहीं लिया जाएगा. ईरान ठोस और व्यावहारिक परिणामों को प्राथमिकता देता है और ऐसा कोई समझौता स्वीकार नहीं करेगा, जिससे राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचे. संसद के नए सत्र में दिया संबोधन गालिबफ ने ये टिप्पणियां ईरान की 12वीं संसद के तीसरे वर्ष के पहले सत्र के दौरान कीं. यह बैठक वर्चुअल माध्यम से आयोजित की गई, जिसमें बड़ी संख्या में सांसदों ने भाग लिया. उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव लगातार बना हुआ है और क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रतिबंधों तथा रणनीतिक मुद्दों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद कायम हैं.
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिकी सेना ने दावा किया है कि उसने ईरान के गोरुक और केशम द्वीप पर स्थित ड्रोन कमांड और रडार ठिकानों पर हमला किया है। वाशिंगटन का कहना है कि यह कार्रवाई आत्मरक्षा में की गई, क्योंकि ईरान ने अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र के ऊपर उड़ रहे एक अमेरिकी ड्रोन को मार गिराया था। अमेरिकी ड्रोन गिराए जाने के बाद की कार्रवाई अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, ईरान ने एक अमेरिकी MQ-1 ड्रोन को निशाना बनाया था। इसके जवाब में अमेरिकी लड़ाकू विमानों ने ईरानी हवाई सुरक्षा प्रणालियों, एक ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन और दो हमलावर ड्रोन को नष्ट कर दिया। अमेरिकी सेना ने कहा कि कार्रवाई के दौरान उसके किसी भी सैनिक या सैन्य उपकरण को नुकसान नहीं पहुंचा। वाशिंगटन ने इसे क्षेत्र में अपनी सुरक्षा और सैन्य हितों की रक्षा के लिए उठाया गया कदम बताया है। ईरान ने भी किया जवाबी हमला अमेरिकी हमले के बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई का दावा किया है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कहा कि उसकी एयरोस्पेस फोर्स ने उस एयरबेस को निशाना बनाया, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर सिरिक द्वीप पर एक दूरसंचार टावर पर अमेरिकी हमले के लिए किया गया था। ईरान ने यह नहीं बताया कि संबंधित एयरबेस कहां स्थित है और हमले में कितना नुकसान हुआ। पिछले सप्ताह भी हुई थी सैन्य कार्रवाई दोनों देशों के बीच यह टकराव नया नहीं है। पिछले सप्ताह भी अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास संचालित एक ईरानी ड्रोन अभियान को निशाना बनाया था। इसके बाद ईरान ने भी अमेरिकी हितों से जुड़े एक ठिकाने पर हमला करने का दावा किया था। लगातार हो रही सैन्य कार्रवाइयों ने क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष टकराव का खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है। समझौते की बात, लेकिन जारी है तनाव दिलचस्प बात यह है कि एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ संभावित समझौते की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई का सिलसिला जारी है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने चेतावनी दी है कि यदि भविष्य में होने वाला कोई समझौता अमेरिका की सुरक्षा संबंधी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता है, तो सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू की जा सकती है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेना हर परिस्थिति के लिए तैयार है। ट्रंप ने समझौते के मसौदे में मांगे बदलाव मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के साथ प्रस्तावित समझौते के मसौदे को संशोधन के लिए वापस भेज दिया है। बताया जा रहा है कि उन्होंने कई अहम बदलाव सुझाए हैं और समझौते को अंतिम रूप देने में जल्दबाजी नहीं दिखा रहे हैं। ऐसे में कूटनीतिक बातचीत और सैन्य तनाव साथ-साथ चलते दिखाई दे रहे हैं, जिससे पश्चिम एशिया की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।
अमेरिका और इजरायल के लगातार सैन्य हमलों के बावजूद ईरान की मिसाइल क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। हालिया सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण में दावा किया गया है कि ईरान ने अपने अधिकांश भूमिगत मिसाइल अड्डों तक पहुंच बहाल कर ली है और युद्ध के दौरान क्षतिग्रस्त हुई कई सुरंगों के प्रवेश द्वार दोबारा खोल दिए हैं। 69 में से 50 सुरंगों के रास्ते फिर खुले रिपोर्ट के मुताबिक, संघर्ष के दौरान 18 भूमिगत मिसाइल ठिकानों पर हुए हमलों में कुल 69 सुरंग प्रवेश मार्ग प्रभावित हुए थे। इनमें से 50 प्रवेश द्वारों को ईरान ने साफ कर फिर से चालू कर दिया है। सैटेलाइट तस्वीरों में बुलडोजर, लोडर और डंप ट्रक जैसे भारी उपकरण मलबा हटाते और क्षतिग्रस्त रास्तों को बहाल करते दिखाई दिए हैं। हमलों के बाद शुरू हुआ मरम्मत अभियान अमेरिका और इजरायल ने हमलों के दौरान मिसाइल ठिकानों के प्रवेश मार्ग, लॉन्चिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और संपर्क सड़कों को मुख्य निशाना बनाया था। कई सुरंगों के मुहाने मलबे से बंद हो गए थे और पहुंच मार्गों पर बड़े गड्ढे बन गए थे। युद्धविराम लागू होने के बाद ईरान ने इन इलाकों में तेजी से मरम्मत कार्य शुरू कर दिया। मिसाइल भंडार अब भी सुरक्षित होने का अनुमान विश्लेषकों का मानना है कि सुरंगों के प्रवेश द्वारों को नुकसान पहुंचाना अपेक्षाकृत आसान होता है, लेकिन पहाड़ों और चट्टानों की गहराई में छिपाए गए मिसाइल भंडार को पूरी तरह नष्ट करना कहीं अधिक मुश्किल है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हमलों के बावजूद ईरान की बड़ी संख्या में मिसाइलें सुरक्षित बची हो सकती हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि ईरान के पास अब भी लगभग 1,000 मिसाइलें भूमिगत सुविधाओं में मौजूद हो सकती हैं। सैटेलाइट तस्वीरों में दिखी तेजी से बहाली युद्धविराम के बाद ली गई नई तस्वीरों में कई मिसाइल अड्डों पर बड़े पैमाने पर मरम्मत कार्य दिखाई दिया है। इस्फहान के पास स्थित एक मिसाइल स्थल पर डंप ट्रकों और निर्माण मशीनों को क्षतिग्रस्त रास्तों की मरम्मत करते देखा गया। खोमेन क्षेत्र की एक अन्य सुविधा में कम से कम 10 निर्माण वाहन एक साथ काम करते नजर आए, जहां बंद हो चुके सुरंग मार्गों को फिर से खोला जा रहा था। विश्लेषकों का कहना है कि मरम्मत की यह गति दिखाती है कि साधारण निर्माण संसाधनों के जरिए भी सैन्य हमलों के असर को अपेक्षाकृत कम समय में काफी हद तक कम किया जा सकता है। विशेषज्ञों ने क्या कहा? जेम्स मार्टिन सेंटर फॉर नॉनप्रोलिफरेशन स्टडीज के रिसर्च एसोसिएट सैम लेयर के अनुसार, जब तक ईरान के पास मिसाइल लॉन्चर और प्रशिक्षित ऑपरेटर मौजूद हैं, तब तक उसकी मिसाइल क्षमता को पूरी तरह खत्म नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि मौजूदा मिसाइल भंडार को लॉन्चरों से जोड़ने में कोई बड़ी तकनीकी बाधा नहीं है, इसलिए ईरान अभी भी जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता रखता है। मिसाइल कार्यक्रम रहा हमलों का मुख्य लक्ष्य अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संघर्ष के दौरान कई बार कहा था कि ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को कमजोर करना अभियान का प्रमुख उद्देश्य है। अमेरिका और इजरायल ने केवल मिसाइल अड्डों को ही नहीं, बल्कि मिसाइल निर्माण से जुड़े कारखानों, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण केंद्रों और रॉकेट ईंधन सुविधाओं को भी निशाना बनाया था। ताजा सैटेलाइट तस्वीरों और विशेषज्ञों के आकलन से संकेत मिल रहे हैं कि ईरान अपनी सैन्य संरचना और मिसाइल नेटवर्क के महत्वपूर्ण हिस्सों को दोबारा सक्रिय करने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। युद्ध खत्म नहीं, तनाव बरकरार अमेरिका और ईरान के बीच अब तक कोई औपचारिक शांति समझौता नहीं हुआ है। 28 फरवरी से शुरू हुआ संघर्ष चौथे महीने में प्रवेश कर चुका है। ऐसे में ईरान की भूमिगत मिसाइल क्षमताओं की बहाली की खबरें क्षेत्रीय सुरक्षा और पश्चिम एशिया की रणनीतिक स्थिति को लेकर नई चिंताएं पैदा कर रही हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच संघर्षविराम (सीजफायर) की घोषणा के बाद भी पश्चिम एशिया में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। एक अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने सीजफायर के बाद ईरान के अंदर कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाते हुए हवाई हमले किए। हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट ने क्षेत्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट में क्या किया गया दावा? अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल में अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर की घोषणा के कुछ दिनों बाद UAE ने ईरान के भीतर कई महत्वपूर्ण ठिकानों पर जवाबी हवाई कार्रवाई की। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन स्थानों को निशाना बनाया गया उनमें फारस की खाड़ी स्थित लावन द्वीप की रिफाइनरी, होर्मुज स्ट्रेट के पास केशम और अबू मूसा द्वीप, बंदर अब्बास बंदरगाह शहर और असलुयेह पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स शामिल थे। ऊर्जा केंद्रों पर हमलों से बढ़ी चिंता रिपोर्ट के मुताबिक, असलुयेह ऊर्जा केंद्र पर हुए कथित हमले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी। यह क्षेत्र ईरान के ऊर्जा उत्पादन और निर्यात के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। बताया गया है कि इन घटनाओं के बाद अमेरिका ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ने से रोकने के लिए अपने सहयोगियों पर दबाव डाला, ताकि ऊर्जा अवसंरचना पर हमलों को सीमित किया जा सके। अमेरिका और इजरायल के साथ समन्वय का दावा रिपोर्ट में मामले से जुड़े सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि UAE ने ईरान के खिलाफ चलाए गए व्यापक सैन्य अभियान के दौरान अमेरिका और इजरायल के साथ समन्वय में काम किया। दावे के अनुसार, सीजफायर लागू होने के बाद भी कुछ हफ्तों तक यह अभियान जारी रहा। हालांकि इन आरोपों पर UAE, अमेरिका या इजरायल की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। खाड़ी देशों में बदली रणनीतिक स्थिति विश्लेषकों का मानना है कि यदि रिपोर्ट में किए गए दावे सही साबित होते हैं, तो यह संकेत होगा कि UAE ने ईरान के खिलाफ पहले की तुलना में अधिक आक्रामक रणनीति अपनाई है। जहां अधिकांश खाड़ी देश संघर्ष के दौरान अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने और तनाव से बचने की कोशिश करते रहे, वहीं UAE कथित तौर पर ईरान को सीधे जवाब देने वाले देशों में शामिल होता दिखाई देता है। आधिकारिक पुष्टि का इंतजार फिलहाल इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। न तो UAE और न ही ईरान ने रिपोर्ट में बताए गए हमलों को लेकर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान जारी किया है। ऐसे में क्षेत्रीय घटनाक्रम पर दुनिया की नजर बनी हुई है, क्योंकि किसी भी नए सैन्य टकराव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है।
अमेरिका और क्यूबा के बीच तनाव एक बार फिर तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि पेंटागन ने पिछले कुछ महीनों में क्यूबा के आसपास बड़े पैमाने पर सैन्य संसाधनों की तैनाती की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने कैरेबियाई क्षेत्र में युद्धपोत, मरीन सैनिक, निगरानी ड्रोन और मिसाइल क्षमता वाले जहाज सक्रिय किए हैं। माना जा रहा है कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका बेहद कम समय में क्यूबा के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू करने की स्थिति में है। पेंटागन ने बढ़ाई सैन्य मौजूदगी पोलिटिको की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सेना ने ऐसे सैन्य संसाधन क्षेत्र में तैनात किए हैं, जो सीमित हवाई हमलों से लेकर बड़े सैन्य अभियान तक को अंजाम देने में सक्षम माने जाते हैं। अमेरिका ने यूएसएस निमिट्ज एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप, गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर और क्रूजर जहाजों को क्षेत्र में सक्रिय किया है। ये जहाज लंबी दूरी तक सटीक मिसाइल हमले करने की क्षमता रखते हैं। इसके अलावा निगरानी ड्रोन और सैन्य विमान लगातार क्यूबा के आसपास की गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यूएसएस कियरसार्ज एम्फीबियस रेडी ग्रुप को संभावित तैनाती के लिए तैयार रखा गया है, जिसमें लगभग 2500 मरीन सैनिक शामिल हैं। पूर्व पेंटागन अधिकारी ने दिए बड़े संकेत पूर्व पेंटागन अधिकारी मार्क कैंसियन ने कहा कि यूएसएस निमिट्ज की मौजूदगी फिलहाल दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा हो सकती है, लेकिन जरूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल सैन्य अभियान में भी किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अमेरिका क्यूबा की एयर डिफेंस प्रणाली और शीर्ष नेतृत्व से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाने जैसे विकल्पों पर भी विचार कर सकता है। मार्को रुबियो ने क्यूबा को बताया सुरक्षा के लिए खतरा अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने हाल ही में कैबिनेट बैठक के दौरान क्यूबा को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया था। उन्होंने कहा कि अमेरिका के तट से केवल 90 मील दूर स्थित एक “असफल राज्य” सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा सकता है। रुबियो ने आरोप लगाया कि क्यूबा के चीन, रूस और अन्य अमेरिका विरोधी देशों के साथ बढ़ते संबंध वाशिंगटन के लिए चिंता का विषय हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका बातचीत के जरिए समाधान चाहता है, लेकिन मौजूदा क्यूबाई नेतृत्व के साथ कूटनीतिक समाधान की संभावना कमजोर नजर आती है। ट्रंप ने सैन्य कार्रवाई के संकेत दिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी हाल के दिनों में क्यूबा को लेकर सख्त बयान दिए हैं। व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा, “पिछले 50-60 सालों से कई राष्ट्रपति इस पर विचार करते रहे हैं। शायद मैं वह राष्ट्रपति बनूं जो यह कदम उठाए।” रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों और क्यूबा के प्रतिनिधियों के बीच हाल के महीनों में बातचीत भी हुई, लेकिन उससे कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार पर लगातार हमलावर है अमेरिका डोनाल्ड ट्रंप पहले भी कई बार क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार की आलोचना कर चुके हैं। उन्होंने यह तक कहा था कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भविष्य में क्यूबा के राष्ट्रपति बन सकते हैं। मार्को रुबियो मूल रूप से क्यूबाई मूल के अमेरिकी नेता हैं। माना जाता है कि उनके माता-पिता 1956 में क्यूबा के कम्युनिस्ट शासन से परेशान होकर अमेरिका चले गए थे। गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है क्यूबा इस बीच क्यूबा पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, देश में खाने-पीने की चीजों, दवाओं और बिजली की भारी कमी है। वेनेजुएला से तेल आपूर्ति घटने के बाद हालात और खराब हो गए हैं। क्यूबा सरकार ने अमेरिका पर “शासन परिवर्तन” का माहौल बनाने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। संयुक्त राष्ट्र से क्यूबा की अपील क्यूबा ने पूरे घटनाक्रम को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की मांग की है। क्यूबा के विदेश मंत्री ब्रूनो रोड्रिगेज पारिल्ला ने कहा कि अमेरिकी प्रतिबंध और सैन्य दबाव देश को मानवीय संकट की ओर धकेल रहे हैं। उन्होंने दुनिया से संभावित मानवीय तबाही रोकने के लिए आगे आने और क्यूबा के साथ एकजुटता दिखाने की अपील की। ब्रूनो रोड्रिगेज ने अमेरिका के इस दावे को भी खारिज किया कि क्यूबा अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। उन्होंने कहा कि क्यूबा शांति चाहता है और उसे शांति से जीने दिया जाना चाहिए। वैश्विक स्तर पर बढ़ सकती है चिंता विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका और क्यूबा के बीच तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर पूरे कैरेबियाई क्षेत्र और वैश्विक राजनीति पर पड़ सकता है। चीन और रूस जैसे देशों के साथ क्यूबा के संबंधों को देखते हुए यह मुद्दा केवल द्विपक्षीय विवाद नहीं, बल्कि बड़े भू-राजनीतिक संघर्ष का रूप भी ले सकता है।
दुनिया के चर्चित इतिहासकार Yuval Noah Harari ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और इजराइल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu की राजनीति पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि डर, ताकत और नफरत की राजनीति दुनिया को कमजोर बना रही है। नेतन्याहू पर हरारी का बड़ा आरोप एक इंटरव्यू में हरारी ने कहा कि इजराइल के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा नेता रहा हो जिसने समाज को उतना बांटा हो जितना नेतन्याहू ने किया। उनके मुताबिक, नेतन्याहू ने लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया और देश के भीतर गहरी राजनीतिक खाई पैदा की। हरारी ने कहा कि राष्ट्रवाद का मतलब अपने लोगों से प्रेम और जुड़ाव होना चाहिए, न कि समाज में नफरत फैलाना। ट्रम्प की राजनीति पर भी निशाना हरारी ने ट्रम्प की राजनीति की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि ट्रम्पवाद की सोच यह है कि कमजोर देश हमेशा ताकतवर देशों के सामने झुक जाएं। हरारी के मुताबिक यह सोच खतरनाक है, क्योंकि इससे दुनिया में हथियारों की दौड़ और संघर्ष बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि अगर दुनिया सिर्फ ताकत के नियम पर चलेगी, तो हर देश अपने संसाधन विकास की जगह हथियारों पर खर्च करेगा। “सहयोग से आगे बढ़ी इंसानी सभ्यता” हरारी ने कहा कि इंसानों की सबसे बड़ी ताकत युद्ध नहीं बल्कि सहयोग है। उन्होंने बताया कि इंसान इसलिए सफल हुआ क्योंकि लोग मिलकर समाज, कानून, बाजार और तकनीक बना सके। उन्होंने कहा कि अगर केवल ताकत ही सबकुछ होती, तो इंसान आज भी छोटे-छोटे समूहों में रह रहा होता। राष्ट्रवाद पर क्या बोले हरारी? हरारी ने कहा कि राष्ट्रवाद अपने आप में गलत नहीं है। उनके मुताबिक, राष्ट्रवाद का असली मतलब उन लोगों के लिए अपनापन महसूस करना है जिन्हें हम व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते, लेकिन फिर भी उनके लिए त्याग करने को तैयार रहते हैं। उन्होंने कहा कि भारत, इजराइल और चीन जैसे बड़े देशों में करोड़ों लोग रहते हैं, फिर भी राष्ट्रवाद लोगों को जोड़ने का काम करता है। उन्होंने चेतावनी दी कि जब राष्ट्रवाद नफरत और विभाजन का रूप ले लेता है, तब यह समाज के लिए खतरा बन जाता है। AI को बताया सबसे बड़ा खतरा हरारी ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को भविष्य का सबसे बड़ा खतरा बताया। उन्होंने कहा कि AI केवल मशीन नहीं रह गया है, बल्कि अब वह इंसानों जैसी बातचीत और भावनाओं की नकल करना सीख रहा है। हरारी के मुताबिक आने वाले समय में लोग असली रिश्तों की जगह AI पर ज्यादा निर्भर हो सकते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर AI पर नियंत्रण कमजोर हुआ, तो यह इंसानों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
मिडिल ईस्ट यानी पश्चिम एशिया में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। गाजा में इजरायल और हमास के बीच जंग तेज है, वहीं लेबनान सीमा पर हिजबुल्लाह और इजरायल के बीच भी हमले बढ़ गए हैं। दूसरी तरफ ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव पूरे क्षेत्र में नए संकट का संकेत दे रहा है। इन हालातों से भारत की चिंता भी बढ़ गई है। गाजा में इजरायल का बड़ा हमला इजरायल ने गाजा में हमास के सैन्य प्रमुख मोहम्मद ओदेह को निशाना बनाकर बड़ा हमला किया है। इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने कहा कि 7 अक्टूबर हमले में शामिल लोगों को छोड़ा नहीं जाएगा। इजरायल का दावा है कि यह कार्रवाई आतंकवाद के खिलाफ अभियान का हिस्सा है। इस हमले के बाद गाजा में आम लोगों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। लगातार बमबारी से कई इलाकों में भारी नुकसान हुआ है और मानवीय संकट गहरा रहा है। लेबनान सीमा पर भी बढ़ा तनाव इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच लेबनान सीमा पर भी हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। लेबनान से रॉकेट और ड्रोन हमलों के बाद इजरायल ने कई इलाकों में जवाबी कार्रवाई की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाल के महीनों में लेबनान में हजारों लोगों की मौत हो चुकी है। सीमा पर लगातार हो रहे हमलों से पूरे इलाके में डर का माहौल है। ईरान और अमेरिका के बीच टकराव अमेरिका ने हाल ही में ईरान के कुछ सैन्य ठिकानों और जहाजों पर हमला किया। अमेरिकी सेना का कहना है कि यह कार्रवाई अपने सैनिकों की सुरक्षा के लिए की गई थी। वहीं ईरान ने इसे उकसावे वाली कार्रवाई बताते हुए जवाब देने की चेतावनी दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा कि ईरान के साथ समझौते की कोशिश जारी है, लेकिन अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। दूसरी तरफ ईरान का कहना है कि बातचीत जारी है, लेकिन जल्द समझौते की उम्मीद नहीं है। तेल और व्यापार पर पड़ सकता है असर मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी दिख सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में शामिल है। अगर यहां हालात और खराब होते हैं तो तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं और समुद्री व्यापार प्रभावित हो सकता है। भारत क्यों है चिंतित? भारत के लिए मिडिल ईस्ट बेहद अहम क्षेत्र है। भारत अपने तेल का बड़ा हिस्सा इसी इलाके से खरीदता है। इसके अलावा लाखों भारतीय वहां काम करते हैं। ऐसे में युद्ध बढ़ने का असर भारत की अर्थव्यवस्था और नागरिकों पर भी पड़ सकता है। भारत ने सभी पक्षों से शांति बनाए रखने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है। भारतीय विदेश मंत्रालय लगातार हालात पर नजर बनाए हुए है। शांति की राह अभी मुश्किल गाजा, लेबनान और ईरान से जुड़े अलग-अलग मोर्चों पर बढ़ते तनाव ने पूरे मिडिल ईस्ट को अस्थिर बना दिया है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ती टकराहट के कारण आने वाले दिनों में हालात और गंभीर हो सकते हैं। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या बातचीत से हालात संभलेंगे या संघर्ष और बढ़ेगा।
Vladimir Putin ने बुधवार को China की राजधानी बीजिंग में राष्ट्रपति Xi Jinping से मुलाकात की। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब कुछ ही दिन पहले Donald Trump चीन दौरे पर गए थे। ऐसे में पुतिन की यह यात्रा वैश्विक कूटनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कई वैश्विक मुद्दों पर हुई चर्चा बीजिंग में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक में दोनों नेताओं ने कई अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा की। इनमें प्रमुख रूप से: ईरान संकट यूक्रेन युद्ध वैश्विक व्यापार पश्चिम एशिया की स्थिति ऊर्जा सुरक्षा रणनीतिक सहयोग जैसे विषय शामिल रहे। दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने तथा बदलते वैश्विक हालात में आपसी सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया। ग्रेट हॉल ऑफ द पीपुल में हुआ स्वागत बीजिंग स्थित Great Hall of the People में शी जिनपिंग ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन का औपचारिक स्वागत किया। इसके बाद दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों के बीच विस्तृत वार्ता हुई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुतिन मंगलवार रात बीजिंग पहुंचे थे, जहां उनका स्वागत चीन के विदेश मंत्री Wang Yi ने किया। पुतिन बोले- रिश्ते अभूतपूर्व स्तर पर चीन यात्रा से पहले जारी अपने वीडियो संदेश में पुतिन ने कहा कि रूस और चीन के संबंध “अभूतपूर्व स्तर” तक पहुंच चुके हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच लगातार हो रहे उच्चस्तरीय संपर्क रणनीतिक साझेदारी को मजबूत बना रहे हैं और सहयोग की नई संभावनाएं खोल रहे हैं। चीन ने क्या कहा? चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Guo Jiakun ने कहा कि शी जिनपिंग और पुतिन के बीच विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने को लेकर गहन चर्चा हुई। उन्होंने यह भी बताया कि यह पुतिन की 25वीं चीन यात्रा है, जो दोनों देशों के मजबूत संबंधों को दर्शाती है। ट्रंप की यात्रा के बाद बढ़ी कूटनीतिक हलचल इस बैठक को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया बीजिंग यात्रा के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। 14 और 15 मई को ट्रंप ने चीन का दौरा किया था, जहां उनकी और शी जिनपिंग की बातचीत में भी ईरान, यूक्रेन युद्ध, व्यापारिक तनाव और एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल थे। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की यात्रा के तुरंत बाद पुतिन का बीजिंग पहुंचना चीन-रूस संबंधों की रणनीतिक गहराई को दिखाता है। ईरान और होर्मुज संकट पर भी फोकस पुतिन की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ रहा है। खास तौर पर Iran द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े कदमों के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजारों में चिंता बढ़ गई है। रूस, चीन और ईरान के बीच पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक सहयोग मजबूत हुआ है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा ईरान से आयात करता रहा है। वैश्विक राजनीति में बढ़ती रूस-चीन साझेदारी विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंधों और वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव के बीच रूस और चीन लगातार एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। दोनों देश बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, डॉलर पर निर्भरता कम करने और पश्चिमी प्रभाव को संतुलित करने की दिशा में सहयोग बढ़ा रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।