health awareness

Person experiencing sleep apnea symptoms as interrupted breathing affects sleep quality and brain health
रात में बार-बार खुलती है नींद? हो सकता है दिमाग को नहीं मिल रही पर्याप्त ऑक्सीजन, जानिए स्लीप एपनिया कितना खतरनाक

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में नींद से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। कई लोग रात में बार-बार नींद टूटने, खर्राटे आने या सुबह उठने के बाद भी थकान महसूस करने जैसी समस्याओं से जूझते हैं। अक्सर लोग इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA) जैसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है। स्लीप एपनिया केवल नींद की गुणवत्ता को प्रभावित नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे दिमाग की कार्यक्षमता, याददाश्त और मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डाल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इसका इलाज नहीं किया गया, तो यह ब्रेन टिश्यू को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ स्ट्रोक और डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ा सकता है। क्या है स्लीप एपनिया? ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें सोते समय श्वसन मार्ग बार-बार आंशिक या पूरी तरह बंद हो जाता है। इसके कारण सांस लेने में रुकावट आती है और व्यक्ति की नींद बार-बार टूटती रहती है। कई बार मरीज को इसका एहसास भी नहीं होता, लेकिन उसका शरीर पूरी रात इस समस्या से जूझता रहता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह रुकावट एक रात में दर्जनों या यहां तक कि सैकड़ों बार भी हो सकती है। दिमाग को कैसे पहुंचता है नुकसान? ऑक्सीजन की कमी बनती है सबसे बड़ा खतरा स्लीप एपनिया के दौरान शरीर और दिमाग को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। इस स्थिति को "इंटरमिटेंट हाइपोक्सिया" कहा जाता है। दिमाग को लगातार ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। जब बार-बार ऑक्सीजन की कमी होती है, तो मस्तिष्क की कोशिकाएं प्रभावित होने लगती हैं। खासकर वे हिस्से जो याददाश्त, ध्यान और निर्णय लेने की क्षमता को नियंत्रित करते हैं। रिसर्च में पाया गया है कि लंबे समय तक बिना इलाज वाले स्लीप एपनिया से हिप्पोकैम्पस और फ्रंटल कॉर्टेक्स जैसे महत्वपूर्ण ब्रेन क्षेत्रों में बदलाव हो सकते हैं। याददाश्त और सोचने की क्षमता पर असर स्लीप एपनिया से पीड़ित लोगों में अक्सर ये समस्याएं देखी जाती हैं— चीजें भूलना ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई निर्णय लेने में परेशानी मानसिक प्रतिक्रिया की गति धीमी होना पढ़ाई और काम में प्रदर्शन प्रभावित होना नींद की रिकवरी प्रक्रिया हो जाती है प्रभावित हर बार सांस रुकने पर शरीर हल्की अवस्था में जाग जाता है, जिसे मेडिकल भाषा में "अराउजल" कहा जाता है। इससे गहरी नींद और REM Sleep बार-बार बाधित होती है। यही वे चरण हैं जिनमें— दिमाग खुद की मरम्मत करता है यादें मजबूत होती हैं भावनात्मक संतुलन बनता है सीखने की क्षमता बेहतर होती है जब ये प्रक्रियाएं पूरी नहीं हो पातीं, तो व्यक्ति दिनभर थकान, चिड़चिड़ापन और सुस्ती महसूस करता है। बढ़ सकता है स्ट्रोक का खतरा विशेषज्ञों के अनुसार स्लीप एपनिया केवल नींद की बीमारी नहीं है, बल्कि यह रक्त वाहिकाओं को भी प्रभावित करता है। बार-बार ऑक्सीजन की कमी और फिर अचानक ऑक्सीजन मिलने की प्रक्रिया से— सूजन बढ़ती है ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ता है हृदय रोगों की संभावना बढ़ती है इन सभी कारणों से स्ट्रोक और मस्तिष्क संबंधी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है। अल्जाइमर और डिमेंशिया से भी जुड़ सकता है संबंध हाल के शोध बताते हैं कि लंबे समय तक अनुपचारित स्लीप एपनिया अल्जाइमर और अन्य न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के जोखिम को बढ़ा सकता है। नींद में लगातार व्यवधान आने से दिमाग में जमा होने वाले हानिकारक प्रोटीन, जैसे बीटा-एमिलॉयड, ठीक तरह से साफ नहीं हो पाते। यही प्रोटीन आगे चलकर डिमेंशिया और अल्जाइमर से जुड़े पाए गए हैं। किन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें? यदि आपको इनमें से कोई लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है— तेज खर्राटे आना रात में बार-बार नींद खुलना सोते समय सांस रुकने जैसा महसूस होना सुबह सिरदर्द होना दिनभर अत्यधिक नींद आना लगातार थकान महसूस होना ध्यान और याददाश्त कमजोर होना क्या है इसका इलाज? अच्छी बात यह है कि स्लीप एपनिया का इलाज संभव है। विशेषज्ञ इसके लिए कई उपाय सुझाते हैं— CPAP (Continuous Positive Airway Pressure) थेरेपी वजन नियंत्रित करना नियमित व्यायाम धूम्रपान और शराब से दूरी ओरल डिवाइस का उपयोग सोने की सही पोजीशन अपनाना समय पर पहचान और उपचार से न केवल नींद की गुणवत्ता बेहतर होती है, बल्कि दिमाग को होने वाले लंबे समय के नुकसान से भी बचा जा सकता है।  

surbhi जून 25, 2026 0
International Yoga Day
‘रन फॉर योग’ में दौड़ा धनबाद

धनबाद। 12वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को लेकर धनबाद में खासा उत्साह है। इसे लेकर शुक्रवार को ‘रन फॉर योग’ का आयोजन हुआ, जिसमें धनबाद के लोगों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। लोगों ने दिया ये संदेश जिला प्रशासन की पहल पर आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शामिल लोगों ने योग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने का संदेश दिया। DC आदित्य रंजन के निर्देश पर आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत रणधीर वर्मा चौक से हुई। इसके बाद प्रतिभागी दौड़ते हुए सिटी सेंटर पहुंचे, जहां कार्यक्रम का समापन हुआ। पूरे रास्ते लोगों में खासा उत्साह देखने को मिला। हर तबके के लोग हुए शामिल ‘रन फॉर योग’ में जिले के विभिन्न विभागों के अधिकारी और कर्मचारी, खेल प्रेमी, छात्र-छात्राएं, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि समेत बड़ी संख्या में आम नागरिक शामिल हुए। सभी ने जोश के साथ दौड़ में हिस्सा लिया और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के दौरान लोगों को योग के महत्व और उसके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों के बारे में जानकारी दी गई। प्रतिभागियों को बताया गया कि नियमित योग करने से न सिर्फ शरीर फिट रहता है, बल्कि मानसिक तनाव भी कम होता है। योग को जन-आंदोलन बनाने का संकल्प दौड़ में शामिल लोगों ने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर योग को जन-जन तक पहुंचाने और इसे जन-आंदोलन बनाने का संकल्प लिया। साथ ही स्वस्थ और जागरूक समाज के निर्माण में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाने की बात कही। जिला प्रशासन ने कार्यक्रम में शामिल सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। साथ ही लोगों से अपील की कि 21 जून 2026 को मेमको मोड़ स्थित मेगा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में आयोजित होने वाले जिला स्तरीय योग कार्यक्रम में अधिक से अधिक संख्या में शामिल होकर योग दिवस को सफल बनाएं।

anjali kumari जून 19, 2026 0
Person drinking water in summer to reduce dehydration and kidney stone risk
गर्मियों में पानी कम पीना पड़ सकता है भारी, बढ़ रहा है किडनी स्टोन का खतरा; जानिए कारण, लक्षण और बचाव

गर्मियों के मौसम में शरीर से पसीने के रूप में बड़ी मात्रा में पानी बाहर निकलता है। यदि इस दौरान पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं पिया जाए, तो शरीर में डिहाइड्रेशन की स्थिति बन सकती है, जिसका सीधा असर किडनी की सेहत पर पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार, गर्मियों में किडनी स्टोन के मामलों में बढ़ोतरी का एक प्रमुख कारण शरीर में पानी की कमी है। कानपुर स्थित अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल के वरिष्ठ यूरोलॉजिस्ट डॉ. विनीत सिंह सोमवंशी के मुताबिक, जब शरीर में पानी की मात्रा कम हो जाती है तो पेशाब अधिक गाढ़ा हो जाता है। इससे उसमें मौजूद कैल्शियम, ऑक्सालेट और यूरिक एसिड जैसे तत्वों की सांद्रता बढ़ जाती है, जो आपस में मिलकर क्रिस्टल बनाते हैं। समय के साथ यही क्रिस्टल किडनी स्टोन का रूप ले लेते हैं। कैसे बनती है किडनी स्टोन? गर्म मौसम में अत्यधिक पसीना आने से शरीर से पानी तेजी से निकलता है। यदि इस पानी की भरपाई नहीं की जाती, तो पेशाब की मात्रा कम हो जाती है और उसमें मौजूद खनिज पदार्थ घुलने के बजाय जमा होने लगते हैं। यही जमा हुए कण धीरे-धीरे पथरी का रूप ले लेते हैं। किन लोगों को अधिक खतरा? विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ लोगों में किडनी स्टोन का जोखिम अधिक होता है, जैसे: लंबे समय तक धूप या गर्म वातावरण में काम करने वाले लोग पर्याप्त पानी पिए बिना ज्यादा व्यायाम करने वाले सॉफ्ट ड्रिंक्स, कैफीन और मीठे पेय पदार्थों का अधिक सेवन करने वाले बार-बार डिहाइड्रेशन का शिकार होने वाले पहले किडनी स्टोन की समस्या झेल चुके लोग खानपान भी बढ़ा सकता है जोखिम गर्मियों में प्रोसेस्ड फूड, अधिक नमक वाले स्नैक्स और शुगर युक्त पेय पदार्थों का सेवन किडनी स्टोन बनने की संभावना बढ़ा सकता है। ऐसे खाद्य पदार्थ शरीर के मिनरल संतुलन को प्रभावित करते हैं और पथरी बनने की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं। किडनी स्टोन के प्रमुख लक्षण किडनी स्टोन होने पर शरीर कई संकेत देता है, जिन पर ध्यान देना जरूरी है: पीठ, पेट या कमर के निचले हिस्से में तेज दर्द पेशाब करते समय जलन या दर्द पेशाब में खून आना या रंग बदलना बार-बार पेशाब की इच्छा होना मतली, उल्टी, बुखार या कंपकंपी पेशाब की मात्रा कम होना यदि इन लक्षणों के साथ बुखार भी हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए क्योंकि यह संक्रमण का संकेत हो सकता है। किडनी स्टोन से बचाव के आसान उपाय रोजाना कम से कम 2.5 से 3 लीटर पानी पिएं। तरबूज, खीरा, खरबूजा और खट्टे फलों का सेवन बढ़ाएं। नमकीन, प्रोसेस्ड और पैकेज्ड फूड से दूरी बनाएं। सॉफ्ट ड्रिंक्स, शराब और कैफीन का सीमित सेवन करें। प्यास लगने का इंतजार न करें, समय-समय पर पानी पीते रहें। धूप में काम करने या बाहर रहने पर पानी की मात्रा और बढ़ाएं। विशेषज्ञों का कहना है कि किडनी स्टोन से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका शरीर को हाइड्रेटेड रखना है। गर्मियों में पानी पीने की आदत को नजरअंदाज करना भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है।  

surbhi जून 4, 2026 0
Tight jeans button showing increasing belly fat and early signs of abdominal weight gain
जींस की बटन हो रही है टाइट? ये संकेत बताते हैं कि पेट की चर्बी बढ़नी शुरू हो गई है

शरीर देता है शुरुआती संकेत, जिन्हें अक्सर लोग कर देते हैं नजरअंदाज आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, खराब खानपान, कम शारीरिक गतिविधि और बढ़ते तनाव के कारण पेट की चर्बी बढ़ना एक आम समस्या बन चुकी है। हालांकि बेली फैट अचानक नहीं बढ़ता, बल्कि शरीर इसके संकेत काफी पहले से देना शुरू कर देता है। समस्या यह है कि ज्यादातर लोग इन शुरुआती लक्षणों को पहचान नहीं पाते। यदि समय रहते इन संकेतों पर ध्यान दिया जाए, तो पेट की बढ़ती चर्बी को नियंत्रित करना आसान हो सकता है। कमर और पेट का आकार धीरे-धीरे बढ़ना पेट की चर्बी बढ़ने का सबसे सामान्य संकेत कमर का आकार बढ़ना है। कई बार शरीर का कुल वजन ज्यादा नहीं बढ़ता, लेकिन पेट और कमर के आसपास फैट जमा होने लगता है। इसका असर कपड़ों की फिटिंग पर दिखाई देता है। पहले जो जींस या पैंट आराम से फिट आती थी, वह धीरे-धीरे टाइट महसूस होने लगती है। यह शरीर में अतिरिक्त चर्बी जमा होने का शुरुआती संकेत हो सकता है। पेट हमेशा फूला-फूला महसूस होना यदि आपको अक्सर पेट भारी या फूला हुआ महसूस होता है, तो इसे सिर्फ गैस या अपच समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पाचन तंत्र की धीमी गति और शरीर में बढ़ते फैट के कारण ऐसा हो सकता है। समय के साथ यही स्थिति पेट के बाहर निकलने और चर्बी बढ़ने का कारण बन सकती है। छोटी-छोटी गतिविधियों में थकान महसूस होना जब शरीर में अतिरिक्त फैट जमा होने लगता है, तो ऊर्जा का स्तर प्रभावित होने लगता है। यदि आपको सामान्य काम करने के बाद भी जल्दी थकान महसूस होती है या हर समय सुस्ती बनी रहती है, तो यह बढ़ते बेली फैट का संकेत हो सकता है। इसके पीछे मेटाबॉलिज्म का धीमा होना भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। सीढ़ियां चढ़ते समय सांस फूलना यदि थोड़ी दूरी चलने, तेज गति से चलने या कुछ सीढ़ियां चढ़ने के बाद ही सांस फूलने लगे, तो यह भी शरीर में बढ़ती चर्बी का संकेत हो सकता है। पेट और शरीर में जमा अतिरिक्त फैट हृदय और फेफड़ों पर अतिरिक्त दबाव डालता है, जिससे सामान्य गतिविधियों में भी अधिक मेहनत करनी पड़ती है। कपड़ों की फिटिंग में बदलाव को न करें नजरअंदाज कपड़ों की फिटिंग में बदलाव बेली फैट बढ़ने का सबसे आसान और स्पष्ट संकेत माना जाता है। यदि आपकी पसंदीदा ड्रेस, शर्ट या जींस पेट और कमर के आसपास पहले की तुलना में ज्यादा टाइट महसूस होने लगी है, तो यह संकेत हो सकता है कि शरीर में धीरे-धीरे चर्बी जमा हो रही है। स्वस्थ जीवनशैली से करें बचाव विशेषज्ञों के अनुसार नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन पेट की चर्बी को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शुरुआती संकेतों को पहचानकर समय पर कदम उठाने से भविष्य में होने वाली कई स्वास्थ्य समस्याओं से बचा जा सकता है।  

surbhi जून 2, 2026 0
World Thyroid Day 2026
World Thyroid Day 2026: क्यों होती है थायरॉइड की बीमारी? जानिए लक्षण, कारण और बचाव के तरीके

नई दिल्ली, एजेंसियां। हर साल 25 मई को मनाए जाने वाले World Thyroid Day 2026 का उद्देश्य लोगों को थायरॉइड बीमारी के प्रति जागरूक करना है। आज दुनियाभर में करोड़ों लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक महिलाओं में पुरुषों की तुलना में थायरॉइड की समस्या लगभग आठ गुना अधिक देखी जाती है।   थायरॉइड गर्दन के सामने स्थित तितली के आकार की एक छोटी ग्रंथि होती है, जो शरीर के लिए जरूरी हार्मोन बनाती है। जब यह ग्रंथि सही तरीके से काम नहीं करती, तो शरीर के कई कार्य प्रभावित होने लगते हैं। वजन बढ़ना या घटना, थकान, घबराहट, दिल की धड़कन तेज होना, बाल झड़ना और ज्यादा पसीना आना इसके सामान्य लक्षण माने जाते हैं।   थायरॉइड के दो प्रमुख प्रकार विशेषज्ञों के अनुसार थायरॉइड मुख्य रूप से दो तरह का होता है। पहला हाइपोथायरायडिज्म, जिसमें हार्मोन कम बनते हैं और व्यक्ति को थकान, सुस्ती व वजन बढ़ने जैसी समस्याएं होती हैं। दूसरा हाइपरथायरॉइडिज्म, जिसमें हार्मोन ज्यादा बनने लगते हैं, जिससे घबराहट, तेजी से वजन कम होना और हाथ कांपने जैसी दिक्कतें होती हैं।   किन कारणों से बढ़ता है खतरा? डॉक्टरों के मुताबिक ऑटोइम्यून डिसऑर्डर थायरॉइड का सबसे बड़ा कारण है। इसमें शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से थायरॉइड ग्रंथि पर हमला करने लगता है। इसके अलावा आयोडीन की कमी, खराब लाइफस्टाइल, तनाव, हार्मोनल बदलाव और आनुवंशिक कारण भी बीमारी का खतरा बढ़ाते हैं। गर्भावस्था, पीरियड्स और मेनोपॉज के दौरान महिलाओं में इसका जोखिम अधिक रहता है।   बचाव और इलाज कैसे करें? विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित दवा, संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली से थायरॉइड को नियंत्रित किया जा सकता है। डाइट में आयोडीन, जिंक, आयरन और सेलेनियम से भरपूर चीजें जैसे अंडे, मछली, दही, हरी सब्जियां और नट्स शामिल करने की सलाह दी जाती है। साथ ही नियमित व्यायाम और समय-समय पर थायरॉइड टेस्ट कराना भी जरूरी माना गया है।

Unknown मई 25, 2026 0
Thyroid in Women
महिलाओं में ज्यादा बढ़ रहा थायरॉइड का खतरा, जानिए कारण और बचाव के उपाय

नई दिल्ली, एजेंसियां। आज के समय में थायरॉइड की बीमारी तेजी से लोगों को अपनी चपेट में ले रही है। भारत में भी इसके मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इंडियन थायरॉइड सोसाइटी के अनुसार देश में करीब 4.2 करोड़ लोग किसी न किसी प्रकार के थायरॉइड विकार से प्रभावित हैं। खास बात यह है कि बड़ी संख्या में लोगों को लंबे समय तक इस बीमारी का पता ही नहीं चल पाता। इसी को लेकर हर साल 25 मई को विश्व थायरॉइड दिवस मनाया जाता है, ताकि लोगों में जागरूकता बढ़ाई जा सके।   क्या है थायरॉइड और क्यों है जरूरी? थायरॉइड गर्दन के सामने स्थित तितली के आकार की एक छोटी ग्रंथि होती है। यह शरीर में मेटाबॉलिज्म, वजन, हार्ट रेट, शरीर के तापमान, ऊर्जा स्तर और मानसिक स्वास्थ्य को नियंत्रित करने वाले हार्मोन बनाती है। जब यह ग्रंथि कम या ज्यादा मात्रा में हार्मोन बनाने लगती है, तो शरीर में कई तरह की समस्याएं शुरू हो जाती हैं।   थायरॉइड की समस्या होने पर थकान, वजन बढ़ना या घटना, बाल झड़ना, कमजोरी, मूड स्विंग, घबराहट और दिल की धड़कन तेज होने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।   महिलाओं में ज्यादा क्यों होता है खतरा? विशेषज्ञों और कई मेडिकल रिपोर्ट्स के अनुसार पुरुषों की तुलना में महिलाओं में थायरॉइड का खतरा 5 से 8 गुना अधिक होता है। इसका सबसे बड़ा कारण महिलाओं में होने वाले हार्मोनल बदलाव हैं।   पीरियड्स, गर्भावस्था, प्रसव और मेनोपॉज के दौरान शरीर में एस्ट्रोजन और अन्य हार्मोन में बदलाव होता है, जो थायरॉइड ग्रंथि को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा तनाव, खराब लाइफस्टाइल, नींद की कमी और जंक फूड का अधिक सेवन भी बीमारी का जोखिम बढ़ा रहे हैं।   कैसे करें बचाव? डॉक्टरों के अनुसार थायरॉइड से बचने के लिए संतुलित खानपान और स्वस्थ जीवनशैली बेहद जरूरी है। आहार में आयोडीन की पर्याप्त मात्रा होनी चाहिए। इसके लिए आयोडीन युक्त नमक, दूध, दही और अंडे का सेवन फायदेमंद माना जाता है। इसके अलावा अखरोट, दालें, बीज और हरी सब्जियां शरीर को जरूरी पोषक तत्व देती हैं। तनाव कम करने के लिए योग, मेडिटेशन और नियमित व्यायाम भी जरूरी है। जिन लोगों के परिवार में पहले से थायरॉइड की समस्या रही हो, उन्हें समय-समय पर जांच कराते रहना चाहिए।

Unknown मई 25, 2026 0
Person using laptop and mobile with tired eyes highlighting digital eye strain and screen fatigue
डिजिटल आई स्ट्रेन बना बड़ी समस्या: मोबाइल-लैपटॉप यूज करने वालों के लिए जरूरी सावधानियां

आज के डिजिटल दौर में लगातार मोबाइल, लैपटॉप और टीवी स्क्रीन पर समय बिताना आम बात हो गई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसका सीधा असर आपकी आंखों पर पड़ रहा है? “डिजिटल आई स्ट्रेन” (Computer Vision Syndrome) अब एक गंभीर समस्या बन चुका है, जिससे आंखों में थकान, सूखापन और धुंधलापन जैसी दिक्कतें बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों की मांसपेशियों पर दबाव पड़ता है, इसलिए समय रहते सावधानी बरतना बेहद जरूरी है। क्या है डिजिटल आई स्ट्रेन? डिजिटल आई स्ट्रेन कोई मिथक नहीं, बल्कि एक वास्तविक समस्या है। मोबाइल, टैबलेट, कंप्यूटर और टीवी स्क्रीन पर लगातार नजरें टिकाए रखने से आंखों में थकान, जलन और सिरदर्द जैसी परेशानियां हो सकती हैं। इसे आमतौर पर “कंप्यूटर विजन सिंड्रोम” भी कहा जाता है। स्क्रीन से आंखों को कैसे बचाएं? अगर आप रोजाना लंबे समय तक स्क्रीन इस्तेमाल करते हैं, तो ये आसान उपाय आपकी आंखों को सुरक्षित रख सकते हैं: 1. अपनाएं 20-20-20 नियम हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर किसी चीज को देखें। इससे आंखों की मांसपेशियों को आराम मिलता है और थकान कम होती है। 2. बार-बार पलक झपकाएं कम पलक झपकाने से आंखें सूख जाती हैं। इसलिए काम करते समय नियमित रूप से पलक झपकाना जरूरी है। जरूरत हो तो आर्टिफिशियल आई ड्रॉप्स का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। 3. स्क्रीन सेटिंग्स करें सही ब्राइटनेस को संतुलित रखें नाइट मोड या ब्लू लाइट फिल्टर का उपयोग करें इससे आंखों पर पड़ने वाला दबाव कम होता है। 4. ग्लेयर (चमक) कम करें स्क्रीन पर पड़ने वाली तेज रोशनी को कम करें। एंटी-ग्लेयर स्क्रीन या सही एंगल में डिवाइस रखने से आंखों को राहत मिलती है। 5. स्क्रीन की सही पोजिशन रखें स्क्रीन आंखों से 20–28 इंच दूर हो स्क्रीन का ऊपरी हिस्सा आंखों के बराबर या थोड़ा नीचे हो यह आदत आंखों और गर्दन दोनों के लिए फायदेमंद है। 6. कमरे की लाइटिंग संतुलित रखें अंधेरे कमरे में काम न करें और स्क्रीन बहुत ज्यादा चमकीली न रखें। सही रोशनी आंखों के तनाव को कम करती है। 7. डॉक्यूमेंट स्टैंड का इस्तेमाल करें अगर काम के दौरान कागज और स्क्रीन दोनों देखना पड़ता है, तो डॉक्यूमेंट स्टैंड का उपयोग करें। इससे आंखों और गर्दन की मूवमेंट कम होती है। 8. बीच-बीच में ब्रेक लें लंबे समय तक लगातार स्क्रीन देखने से बचें। थोड़ी-थोड़ी देर में उठकर टहलना आंखों को आराम देता है। 9. फालतू स्क्रीन टाइम कम करें मनोरंजन के लिए मोबाइल या टीवी का इस्तेमाल सीमित करें। इससे आंखों की थकान और सूखापन कम होगा। 10. सोने से पहले स्क्रीन से दूरी रखें सोने से कम से कम 1 घंटे पहले स्क्रीन का इस्तेमाल बंद कर दें। यह आंखों को आराम देने के साथ नींद भी बेहतर बनाता है। 11. नियमित आंखों की जांच कराएं समय-समय पर आंखों की जांच कराना जरूरी है, ताकि किसी भी समस्या का पता समय रहते चल सके।  

surbhi मार्च 18, 2026 0
Indian protein-rich foods on a plate
‘प्रोटीन पैरेडॉक्स’ का सच: भारत में पोषण की अनदेखी समस्या, ज्यादातर लोग पूरी नहीं कर पा रहे दैनिक जरूरत

  1.4 अरब की आबादी, लेकिन प्रोटीन की भारी कमी भारत में पोषण से जुड़ी एक बड़ी लेकिन कम चर्चा होने वाली समस्या सामने आ रही है, जिसे विशेषज्ञ “प्रोटीन पैरेडॉक्स” कहते हैं। एक तरफ देश दुनिया में शराब की खपत करने वाले शीर्ष देशों में शामिल है, वहीं दूसरी तरफ लगभग 70 से 80 प्रतिशत भारतीय अपनी रोजाना की न्यूनतम प्रोटीन जरूरत भी पूरी नहीं कर पा रहे हैं। आम धारणा यह भी है कि ज्यादा प्रोटीन खाने से किडनी पर बुरा असर पड़ सकता है, जबकि वैज्ञानिक शोध इस डर को काफी हद तक गलत साबित करते हैं।   औसत प्रोटीन सेवन जरूरत से काफी कम रिपोर्टों के मुताबिक भारत में औसत व्यक्ति प्रतिदिन अपने शरीर के वजन के प्रति किलोग्राम पर लगभग 0.6 ग्राम प्रोटीन ही ले पाता है। जबकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार एक स्वस्थ वयस्क के लिए 0.8 से 1 ग्राम प्रति किलोग्राम वजन प्रोटीन लेना जरूरी माना जाता है। यानी ज्यादातर लोग अपनी बुनियादी पोषण जरूरत से भी कम प्रोटीन ले रहे हैं, जो लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है।   शरीर के लिए क्यों जरूरी है प्रोटीन प्रोटीन को शरीर के सबसे महत्वपूर्ण मैक्रोन्यूट्रिएंट्स में से एक माना जाता है। इसका महत्व केवल जिम या बॉडी बिल्डिंग तक सीमित नहीं है। प्रोटीन शरीर में कई महत्वपूर्ण कार्यों में भूमिका निभाता है, जैसे- मांसपेशियों और ऊतकों को मजबूती देना शरीर की हरकतों के लिए मांसपेशियों को ऊर्जा देना रक्त में ऑक्सीजन ले जाने वाले हीमोग्लोबिन का निर्माण रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना एंजाइम और हार्मोन बनाने में मदद त्वचा, बाल और नाखूनों के निर्माण में योगदान यदि शरीर में प्रोटीन की कमी होती है, तो थकान, कमजोरी और इम्यून सिस्टम कमजोर होने जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।   चोट या बीमारी में बढ़ जाती है प्रोटीन की जरूरत जब शरीर को चोट लगती है या कोई बीमारी होती है, तब प्रोटीन की आवश्यकता और बढ़ जाती है। यह क्षतिग्रस्त ऊतकों, हड्डियों और मांसपेशियों की मरम्मत में अहम भूमिका निभाता है। विशेषज्ञों के अनुसार रिकवरी के दौरान प्रोटीन की मात्रा को बढ़ाकर लगभग 2 ग्राम प्रति किलोग्राम वजन तक लेने की सलाह दी जाती है, ताकि शरीर को जरूरी अमीनो एसिड मिल सकें।   भारत में प्रोटीन की कमी के पीछे क्या कारण हैं भारत में प्रोटीन की कमी कई कारणों से जुड़ी हुई है। इनमें आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू शामिल हैं। मुख्य कारणों में शामिल हैं- लोगों में प्रोटीन के महत्व को लेकर जागरूकता की कमी यह धारणा कि प्रोटीन केवल खिलाड़ियों या बॉडी बिल्डर्स के लिए जरूरी है दूध, अंडे, मछली और चिकन जैसे प्रोटीन स्रोतों की अपेक्षाकृत ज्यादा कीमत कई धार्मिक या पारंपरिक आहार पद्धतियों में प्रोटीन विकल्पों की सीमित उपलब्धता कुछ क्षेत्रों में ताजा प्रोटीन स्रोतों की कमी इसके अलावा वर्षों तक गलत प्रचार के कारण यह धारणा भी बनी कि प्रोटीन सप्लीमेंट केवल जिम करने वालों के लिए होते हैं, जबकि वास्तव में ये उन लोगों के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं जो भोजन से पर्याप्त प्रोटीन नहीं ले पाते।   समाधान क्या हो सकता है पिछले कुछ वर्षों में भारत में फिटनेस और पोषण को लेकर जागरूकता बढ़ी है। लोग अब अपने खान-पान पर पहले से ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इस समस्या का सबसे बड़ा समाधान पोषण शिक्षा और जागरूकता है। लोगों को यह समझने की जरूरत है कि उनके शरीर को कितनी मात्रा में प्रोटीन चाहिए और इसे भोजन के जरिए कैसे पूरा किया जा सकता है।   प्रोटीन से किडनी को नुकसान? जानिए सच्चाई प्रोटीन को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यह है कि अधिक प्रोटीन खाने से किडनी खराब हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ व्यक्तियों में ऐसा कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि सामान्य मात्रा में प्रोटीन लेने से किडनी को नुकसान होता है। हालांकि जिन लोगों को पहले से किडनी की बीमारी है, उन्हें डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही प्रोटीन लेना चाहिए।  

surbhi मार्च 14, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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abhishek singh जुलाई 2, 2026 0