रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में होने वाली गंभीर पेल्विक फ्लोर समस्याओं को लेकर एक नए अध्ययन में महत्वपूर्ण खुलासा हुआ है। शोधकर्ताओं के अनुसार, लार में पाए जाने वाले फ्री टेस्टोस्टेरोन का स्तर Pelvic Organ Prolapse यानी पेल्विक ऑर्गन प्रोलैप्स (POP) के जोखिम और उसकी गंभीरता का संकेत दे सकता है। अगर भविष्य के अध्ययनों में इस निष्कर्ष की पुष्टि होती है, तो यह महिलाओं में इस बीमारी की शुरुआती पहचान के लिए एक आसान और गैर-आक्रामक तरीका बन सकता है। क्या है पेल्विक ऑर्गन प्रोलैप्स? Pelvic Organ Prolapse एक ऐसी स्थिति है जिसमें पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियां और टिश्यू कमजोर हो जाते हैं। इसके कारण गर्भाशय, मूत्राशय या अन्य पेल्विक अंग नीचे की ओर खिसकने लगते हैं। यह समस्या खासतौर पर बढ़ती उम्र और रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में अधिक देखी जाती है। इस बीमारी के कारण महिलाओं को पेशाब संबंधी दिक्कतें, पेल्विक दबाव, असहजता और जीवन की गुणवत्ता में कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। अध्ययन में क्या पाया गया? यह अध्ययन Saga University Hospital में किया गया, जिसमें पेल्विक ऑर्गन प्रोलैप्स से पीड़ित 109 रजोनिवृत्त महिलाओं और बिना प्रोलैप्स वाली 66 महिलाओं को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने महिलाओं की पेल्विक फ्लोर स्थिति का मूल्यांकन POP-Q प्रणाली के जरिए किया। इसके साथ ही लार में फ्री टेस्टोस्टेरोन और 17β-एस्ट्राडियोल के स्तर तथा रक्त में डीएचईए-एस के स्तर की जांच की गई। अध्ययन में यह सामने आया कि POP से पीड़ित महिलाओं में लार में फ्री टेस्टोस्टेरोन का स्तर सामान्य महिलाओं की तुलना में काफी कम था। वहीं जिन महिलाओं में बीमारी ज्यादा गंभीर थी, उनमें यह स्तर और भी कम पाया गया। हार्मोन और बीमारी के बीच संबंध के संकेत शोधकर्ताओं का मानना है कि शरीर में एंड्रोजन यानी टेस्टोस्टेरोन जैसे हार्मोन की कमी पेल्विक फ्लोर टिश्यू को कमजोर कर सकती है, जिससे Pelvic Organ Prolapse विकसित होने या बढ़ने का खतरा बढ़ सकता है। अध्ययन में यह भी देखा गया कि कुछ मरीजों में डीएचईए-एस का स्तर बढ़ा हुआ था, हालांकि इसकी स्पष्ट चिकित्सीय भूमिका अभी पूरी तरह समझ नहीं आई है। लार जांच बन सकती है आसान विकल्प शोधकर्ताओं के अनुसार, लार के जरिए हार्मोन की जांच करना आसान, सुरक्षित और गैर-आक्रामक तरीका हो सकता है। भविष्य में यह महिलाओं में जोखिम की पहचान और शुरुआती स्क्रीनिंग में मदद कर सकता है। हालांकि विशेषज्ञों ने साफ किया कि यह अध्ययन केवल एक अवलोकन आधारित शोध है, इसलिए इससे सीधे कारण और परिणाम का संबंध साबित नहीं किया जा सकता। इसके लिए बड़े स्तर पर और लंबे समय तक चलने वाले अध्ययनों की जरूरत होगी। भविष्य में बदल सकती है महिलाओं की देखभाल अगर आगे के शोध इस निष्कर्ष की पुष्टि करते हैं, तो रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में Pelvic Organ Prolapse की पहचान पहले चरण में ही संभव हो सकती है। इससे समय रहते इलाज और रोकथाम की रणनीतियां तैयार करने में मदद मिल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं के स्वास्थ्य में हार्मोनल बदलावों को समझना भविष्य में पेल्विक फ्लोर डिसऑर्डर के इलाज और प्रबंधन को बेहतर बना सकता है।
चेन्नई, एजेंसियां। तमिलनाडु की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। Indian National Congress ने लंबे समय से चले आ रहे अपने सहयोगी Dravida Munnetra Kazhagam (DMK) से गठबंधन तोड़ दिया है और अब Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) को समर्थन देने का ऐलान किया है। इस फैसले से राज्य की सियासत में हलचल तेज हो गई है। विजय की पार्टी को मिला बड़ा समर्थन एक्टर से नेता बने Vijay की पार्टी TVK ने इस चुनाव में मजबूत प्रदर्शन किया है। सरकार गठन की प्रक्रिया के बीच कांग्रेस का समर्थन मिलने से TVK की स्थिति और मजबूत हो गई है। माना जा रहा है कि विजय अब सरकार बनाने के प्रमुख दावेदार बन गए हैं। कांग्रेस ने बताई गठबंधन की शर्त कांग्रेस ने साफ किया है कि TVK को दिया गया समर्थन केवल सरकार गठन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य के चुनाव—जैसे लोकसभा, राज्यसभा और स्थानीय निकाय चुनाव में भी यह गठबंधन जारी रह सकता है। हालांकि पार्टी ने यह शर्त रखी है कि इस गठबंधन में भाजपा या उसके किसी सहयोगी दल को शामिल नहीं किया जाएगा। केंद्र में बना रहेगा ‘INDIA’ गठबंधन दिलचस्प बात यह है कि तमिलनाडु में DMK से अलग होने के बावजूद कांग्रेस ने संकेत दिए हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर ‘INDIA’ गठबंधन में DMK के साथ उसके संबंध बने रह सकते हैं। यानी राज्य और केंद्र की राजनीति में अलग-अलग समीकरण देखने को मिल सकते हैं। बदले राजनीतिक समीकरण इस घटनाक्रम ने तमिलनाडु की राजनीति को पूरी तरह से नई दिशा दे दी है। जहां पहले DMK-कांग्रेस गठबंधन मजबूत माना जाता था, वहीं अब TVK-कांग्रेस का नया समीकरण उभरकर सामने आया है।
हृदय रोग के इलाज में लंबे समय से यह सवाल बना हुआ है कि सर्जरी बेहतर है या स्टेंटिंग। हालिया रिसर्च ने इस बहस को नई दिशा दी है। Coronary Artery Disease के इलाज में Coronary Artery Bypass Graft (CABG) और Percutaneous Coronary Intervention (PCI) के बीच तुलना करने वाली एक व्यापक स्टडी से कई अहम निष्कर्ष सामने आए हैं। क्या कहती है स्टडी? यह अध्ययन कई रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल्स पर आधारित है, जिनमें कम से कम 3 साल का फॉलो-अप शामिल था। मुख्य फोकस था–मृत्यु दर (all-cause mortality), जबकि सेकेंडरी पैरामीटर्स में हार्ट अटैक, स्ट्रोक जैसे गंभीर इवेंट्स और दोबारा इलाज (revascularisation) शामिल थे। मृत्यु दर में बड़ा अंतर नहीं स्टडी के अनुसार, CABG और PCI के बीच कुल मृत्यु दर में कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया। रिलेटिव रिस्क: 0.90 95% कॉन्फिडेंस इंटरवल: 0.78–1.04 हालांकि, जिन मरीजों में आर्टरी ब्लॉकेज कम जटिल था (SYNTAX स्कोर 23 से कम), उनमें CABG से मृत्यु का जोखिम कुछ कम देखा गया। गंभीर हार्ट इवेंट्स में CABG आगे भले ही मृत्यु दर लगभग समान रही, लेकिन अन्य महत्वपूर्ण पैरामीटर्स में CABG बेहतर साबित हुआ: मेजर कार्डियोवैस्कुलर और सेरेब्रोवैस्कुलर इवेंट्स (MACCE) का जोखिम कम रिलेटिव रिस्क: 0.75 दोबारा प्रक्रिया (revascularisation) की जरूरत आधी तक कम (RR: 0.50) यह फायदे अलग-अलग मरीज समूहों में भी समान रूप से देखे गए। इलाज के फैसले पर क्या असर? यह निष्कर्ष डॉक्टरों और मरीजों दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। अगर लक्ष्य सिर्फ जीवन बचाना है, तो दोनों विकल्प लगभग समान हैं लेकिन लंबे समय में जटिलताओं और दोबारा इलाज से बचना है, तो CABG बेहतर विकल्प हो सकता है क्या होना चाहिए अगला कदम? विशेषज्ञों का मानना है कि हर मरीज के लिए एक ही इलाज सही नहीं हो सकता। इलाज का चयन करते समय मरीज की स्थिति, आर्टरी की जटिलता और व्यक्तिगत जोखिम को ध्यान में रखना जरूरी है।
हाल ही में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन में यह सामने आया है कि लाइफस्टाइल फैक्टर्स का असर सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे पुरुषों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डालता है। इस रिसर्च में पाया गया कि रोजमर्रा की आदतें—जैसे व्यायाम, धूम्रपान और बॉडी वेट—सीधे तौर पर मरीजों की सोचने-समझने की क्षमता और मानसिक स्थिति को प्रभावित करती हैं। एक्सरसाइज से बेहतर हुआ दिमाग और मूड अध्ययन के अनुसार, जो मरीज नियमित रूप से शारीरिक गतिविधियों में शामिल रहे, उनकी कॉग्निटिव परफॉर्मेंस (सोचने और समझने की क्षमता) और भावनात्मक स्थिति बेहतर पाई गई। शोध में यह संबंध सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण (p<0.05) पाया गया, जिससे स्पष्ट होता है कि एक्सरसाइज न केवल शरीर बल्कि दिमाग को भी मजबूत बनाती है। स्मोकिंग और ज्यादा वजन बना खतरा इसके विपरीत, धूम्रपान करने वाले मरीजों में कॉग्निटिव स्कोर और मानसिक स्वास्थ्य दोनों ही कमजोर पाए गए। इसी तरह, जिन लोगों का BMI (बॉडी मास इंडेक्स) ज्यादा था, उनमें भी सोचने-समझने की क्षमता और भावनात्मक स्थिरता कम देखी गई। यह संकेत देता है कि खराब लाइफस्टाइल आदतें मानसिक गिरावट का कारण बन सकती हैं। हेल्दी लाइफस्टाइल से मिल सकता है फायदा रिसर्च में यह भी पाया गया कि जिन मरीजों की जीवनशैली संतुलित और स्वस्थ थी, उनके मानसिक और भावनात्मक स्कोर बेहतर थे। यह पैटर्न सभी परीक्षणों में लगातार देखने को मिला, जिससे यह स्पष्ट होता है कि लाइफस्टाइल में बदलाव कर मरीज अपनी स्थिति में सुधार ला सकते हैं। इलाज में बदलाव की जरूरत विशेषज्ञों का कहना है कि प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों में मानसिक समस्याएं अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती हैं। इस अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि इलाज के दौरान लाइफस्टाइल सुधार—जैसे नियमित व्यायाम और वजन नियंत्रण—को भी प्राथमिकता देनी चाहिए। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन निष्कर्षों से सीधे कारण-परिणाम संबंध साबित नहीं होता, लेकिन इनके बीच मजबूत संबंध जरूर है। आगे की रिसर्च जरूरी अध्ययन के आधार पर विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि भविष्य में और विस्तृत शोध किए जाने चाहिए, ताकि यह समझा जा सके कि किस तरह के लाइफस्टाइल बदलाव से मरीजों के मानसिक स्वास्थ्य में सबसे ज्यादा सुधार संभव है।
गैस्ट्रिक कैंसर के इलाज और पूर्वानुमान (प्रोग्नोसिस) को लेकर एक नई रिसर्च ने अहम जानकारी सामने रखी है। इस अध्ययन में दो नए बायोमार्कर-CXCL12 और eotaxin-की पहचान की गई है, जो मरीजों की जीवित रहने की संभावना का अनुमान लगाने में मदद कर सकते हैं। यह खोज Gastric Cancer के उपचार और निगरानी के तरीकों को बदल सकती है। क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज? गैस्ट्रिक कैंसर दुनिया में कैंसर से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में से एक है। इसकी बड़ी वजह है-देर से पहचान और एडवांस स्टेज में सीमित इलाज विकल्प। ऐसे में, ब्लड टेस्ट के जरिए मापे जा सकने वाले बायोमार्कर डॉक्टरों को यह समझने में मदद करते हैं कि कौन सा मरीज ज्यादा जोखिम में है और किसे ज्यादा निगरानी या अलग इलाज की जरूरत है। रिसर्च में क्या पाया गया? यह अध्ययन Helsinki University Hospital में 2000 से 2009 के बीच सर्जरी करा चुके 240 मरीजों पर आधारित था। वैज्ञानिकों ने 48 अलग-अलग प्रोटीन का विश्लेषण किया, जिनमें से तीन ने शुरुआती स्तर पर अहम भूमिका दिखाई: CXCL12 Stem Cell Factor Eotaxin लेकिन विस्तृत विश्लेषण (Multivariate Analysis) में केवल CXCL12 और Eotaxin ही स्वतंत्र (independent) रूप से सर्वाइवल के मजबूत संकेतक साबित हुए। कैसे काम करते हैं ये बायोमार्कर? CXCL12: यह एक केमोकिन है, जो इम्यून सेल्स की गतिविधि और ट्यूमर के माइक्रोएनवायरमेंट को नियंत्रित करता है। अध्ययन में यह बेहतर सर्वाइवल से जुड़ा पाया गया। Eotaxin: यह एक इंफ्लेमेटरी प्रोटीन है, जो शरीर में सूजन और इम्यून प्रतिक्रिया से संबंधित है। इसका भी स्वतंत्र प्रभाव सर्वाइवल पर देखा गया। यह संकेत देता है कि कैंसर के विकास में इम्यून सिस्टम की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। क्लिनिकल महत्व क्या है? इस खोज से भविष्य में: मरीजों के लिए सटीक जोखिम आकलन संभव होगा डॉक्टर बेहतर तरीके से ट्रीटमेंट प्लान बना सकेंगे हाई-रिस्क मरीजों की करीबी निगरानी की जा सकेगी यह पर्सनलाइज्ड मेडिसिन की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। सीमाएं और आगे की जरूरत हालांकि, यह अध्ययन एक ही सेंटर और पुराने डेटा पर आधारित है, जिससे इसके परिणामों की व्यापकता सीमित हो सकती है। साथ ही, इन बायोमार्कर्स को रोजमर्रा की क्लिनिकल प्रैक्टिस में लागू करने से पहले बड़े और भविष्य-आधारित (prospective) अध्ययनों की जरूरत होगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।