कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के तहत अनिवार्य वेतन सीमा को 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह करने की प्रस्तावित योजना पर केंद्र सरकार ने फिलहाल रोक लगा दी है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब उद्योग जगत पहले से नए श्रम कानूनों (Labour Codes) के कारण बढ़े हुए अनुपालन खर्च का सामना कर रहा है। हालांकि सरकार ने साफ किया है कि यह प्रस्ताव रद्द नहीं किया गया है। संबंधित पक्षों से व्यापक चर्चा के बाद भविष्य में इस पर आगे निर्णय लिया जाएगा। क्या है मौजूदा EPFO वेतन सीमा? वर्तमान नियमों के अनुसार, 15,000 रुपये तक मासिक मूल वेतन पाने वाले कर्मचारियों के लिए कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) और कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) में योगदान अनिवार्य है। यह सीमा वर्ष 2014 से लागू है और पिछले 12 वर्षों से इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है। मौजूदा व्यवस्था के तहत कर्मचारी अपने मूल वेतन का 12 प्रतिशत EPF में जमा करते हैं, जबकि नियोक्ता भी समान राशि का योगदान देता है। नियोक्ता के हिस्से का एक भाग EPS में और शेष EPF खाते में जमा होता है। इस व्यवस्था में अधिकतम अनिवार्य मासिक योगदान कर्मचारी और नियोक्ता, दोनों के लिए 1,800 रुपये तक सीमित है। यदि सीमा बढ़ती तो क्या बदलता? यदि वेतन सीमा 25,000 रुपये कर दी जाती, तो कर्मचारी और नियोक्ता दोनों का अधिकतम अनिवार्य EPF योगदान बढ़कर 3,000 रुपये प्रति माह हो जाता। इसके अलावा, श्रम मंत्रालय के आंतरिक आकलन के अनुसार, इस बदलाव से एक करोड़ से अधिक अतिरिक्त कर्मचारी अनिवार्य रूप से EPF और EPS के दायरे में आ सकते थे। इससे अधिक संख्या में कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिलने की संभावना थी। सरकार ने फिलहाल क्यों टाला फैसला? रिपोर्ट के अनुसार, सरकार का मानना है कि फिलहाल कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालना उचित नहीं होगा। नए श्रम कानून लागू होने के बाद कई कंपनियों का अनुपालन खर्च पहले ही बढ़ चुका है। उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि नई व्यवस्थाओं के कारण कंपनियों की वैधानिक लागत में करीब 15 से 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। आईटी सेक्टर में ही अनुपालन पर हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च होने की बात कही जा रही है। इसी वजह से सरकार ने फिलहाल वेतन सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव को स्थगित कर दिया है। श्रम संगठनों की क्या है मांग? श्रम संगठनों का लंबे समय से कहना है कि 15,000 रुपये की सीमा अब मौजूदा वेतन संरचना के अनुरूप नहीं रही। महानगरों और शहरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में निम्न और मध्यम आय वर्ग के कर्मचारी इससे अधिक वेतन प्राप्त करते हैं, जिसके कारण उनके लिए EPF सदस्यता अनिवार्य नहीं रह जाती। यूनियनों का मानना है कि सीमा बढ़ाने से अधिक कर्मचारियों को भविष्य निधि और पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिलेगा। अब आगे क्या होगा? सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रस्ताव को पूरी तरह वापस नहीं लिया गया है। उद्योग, श्रमिक संगठनों और अन्य हितधारकों के साथ चर्चा पूरी होने के बाद इस पर आगे फैसला लिया जाएगा। हालांकि, फिलहाल इसकी कोई निश्चित समयसीमा घोषित नहीं की गई है। वर्तमान में EPFO के पास करीब 27 से 28 लाख करोड़ रुपये का कोष है और संगठन के लगभग 8 करोड़ सक्रिय सदस्य हैं, जिससे यह दुनिया के सबसे बड़े सामाजिक सुरक्षा संस्थानों में शामिल है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. शारद्वत मुखर्जी ने सरकारी डॉक्टरों के लिए सप्ताह में 96 घंटे ड्यूटी वाले अपने बयान पर 24 घंटे के भीतर ही सफाई देते हुए यू-टर्न ले लिया है। उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से कोई नया आदेश जारी नहीं किया गया था, बल्कि डॉक्टरों से केवल जनहित में सहयोग का अनुरोध किया गया था। 96 घंटे की ड्यूटी पर दी सफाई सोमवार को स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग का उद्देश्य डॉक्टरों के लिए सप्ताह में 96 घंटे की सक्रिय ड्यूटी अनिवार्य करना नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि डॉक्टरों से केवल इतना अनुरोध किया गया था कि वे जरूरत पड़ने पर अपने कार्यस्थल के आसपास उपलब्ध रहें, ताकि मरीजों को समय पर चिकित्सा सुविधा मिल सके। ड्यूटी के दौरान निजी प्रैक्टिस से बचने की अपील स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि डॉक्टरों से ड्यूटी के दौरान निजी प्रैक्टिस से बचने की भी अपील की गई थी। उनका कहना था कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों को प्राथमिकता देना जरूरी है और इसी उद्देश्य से यह अनुरोध किया गया था। रविवार को दिया था सख्त बयान एक दिन पहले रविवार को स्वास्थ्य मंत्री ने कहा था कि सरकारी अस्पतालों के प्रोफेसरों और डॉक्टरों को सप्ताह में 96 घंटे ड्यूटी करनी होगी। उन्होंने यह भी कहा था कि सरकार जनता की सेवा के लिए वेतन देती है और यदि किसी को यह व्यवस्था स्वीकार नहीं है तो वह नौकरी छोड़ सकता है। इस बयान के बाद राज्यभर में डॉक्टरों और विभिन्न चिकित्सा संगठनों ने कड़ी नाराजगी जताई थी। विरोध के बाद बदला रुख डॉक्टरों के विरोध और बढ़ते विवाद के बीच स्वास्थ्य मंत्री ने सोमवार को अपने बयान को स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकार ने कोई बाध्यकारी निर्देश जारी नहीं किया है। उन्होंने कहा कि कोलकाता से लेकर जिलों तक सभी सरकारी डॉक्टरों से केवल जनहित में सहयोग की अपेक्षा की गई है। डॉक्टरों में बना हुआ है असंतोष हालांकि मंत्री की सफाई के बाद भी डॉक्टरों के संगठनों में इस मुद्दे को लेकर चर्चा जारी है। उनका कहना है कि सरकारी अस्पतालों में पहले से ही डॉक्टरों पर कार्यभार अधिक है और किसी भी नई व्यवस्था से पहले पर्याप्त संसाधन एवं मानवबल उपलब्ध कराना जरूरी है। सरकार की ओर से फिलहाल इस संबंध में कोई नया औपचारिक आदेश जारी नहीं किया गया है।
मुंह के छाले (Mouth Ulcers) एक आम समस्या है, लेकिन इनके कारण खाना, पानी पीना और बोलना तक मुश्किल हो सकता है। ये छोटे-छोटे घाव जीभ, होंठों के अंदर, मसूड़ों या गालों की अंदरूनी सतह पर हो सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अधिकतर मामलों में ये 7 से 14 दिनों के भीतर अपने आप ठीक हो जाते हैं। हालांकि सही देखभाल और कुछ घरेलू उपाय दर्द कम करने और घाव भरने की प्रक्रिया में मदद कर सकते हैं। नोट: घरेलू उपाय केवल सामान्य और हल्के छालों में राहत के लिए हैं। यदि समस्या गंभीर या लंबे समय तक बनी रहे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। मुंह में छाले क्यों होते हैं? विशेषज्ञों के अनुसार, मुंह के छालों के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे: विटामिन B12, आयरन या फोलिक एसिड की कमी मानसिक तनाव हार्मोनल बदलाव बहुत मसालेदार या खट्टा भोजन मुंह के अंदर चोट लगना कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली छाले होने पर सबसे पहले क्या करें? अगर मुंह में छाले हो गए हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें: मसालेदार, ज्यादा गर्म और खट्टे भोजन से बचें। दिन में 3–4 बार गुनगुने नमक वाले पानी से कुल्ला करें। पर्याप्त मात्रा में पानी पीकर शरीर को हाइड्रेट रखें। मुलायम और ठंडा भोजन खाएं। मुलायम ब्रिसल वाले टूथब्रश का इस्तेमाल करें। ज्यादा दर्द होने पर डॉक्टर की सलाह से ओरल जेल का उपयोग करें। मुंह के छालों के लिए घरेलू उपाय 1. नमक वाले गुनगुने पानी से कुल्ला आधा चम्मच नमक गुनगुने पानी में मिलाकर कुल्ला करने से संक्रमण का खतरा कम हो सकता है और दर्द में राहत मिल सकती है। 2. शहद शहद में प्राकृतिक एंटीबैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। दिन में 2–3 बार प्रभावित स्थान पर थोड़ा शहद लगाने से आराम मिल सकता है। 3. नारियल तेल नारियल तेल सूजन कम करने और घाव भरने में सहायक माना जाता है। इसे साफ उंगली या कॉटन की मदद से प्रभावित हिस्से पर लगाया जा सकता है। 4. बेकिंग सोडा थोड़ा-सा बेकिंग सोडा पानी में मिलाकर कुल्ला करने से मुंह का pH संतुलित रखने में मदद मिल सकती है, जिससे जलन कम हो सकती है। 5. ठंडी चीजों का सेवन बर्फ का छोटा टुकड़ा या ठंडा पानी दर्द और सूजन कम करने में राहत दे सकता है। किन चीजों से बचना चाहिए? छालों के दौरान इन चीजों से दूरी बनाना बेहतर माना जाता है: बहुत तीखा और मसालेदार भोजन अधिक खट्टे फल धूम्रपान और तंबाकू शराब बहुत गर्म चाय या कॉफी डॉक्टर से कब संपर्क करें? अगर निम्न में से कोई स्थिति हो, तो डॉक्टर से परामर्श जरूर लें: छाले 2 सप्ताह से अधिक समय तक बने रहें। बार-बार छाले निकलते हों। तेज बुखार के साथ छाले हों। खाना या पानी निगलने में परेशानी हो। छाले बहुत बड़े या अत्यधिक दर्दनाक हों। अधिकांश सामान्य छाले कुछ दिनों में ठीक हो जाते हैं, लेकिन संतुलित आहार, पर्याप्त पानी, अच्छी ओरल हाइजीन और समय पर देखभाल से इस समस्या से जल्दी राहत पाने में मदद मिल सकती है।
नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और भावनात्मक फैसले में 17 वर्षीय नाबालिग को अपने गंभीर रूप से बीमार पिता को लिवर का एक हिस्सा दान करने की अनुमति दे दी है। अदालत ने Institute of Liver and Biliary Sciences (ILBS) को निर्देश दिया है कि सभी कानूनी, नैतिक और चिकित्सकीय मानकों का पालन करते हुए जल्द से जल्द लिवर प्रत्यारोपण की प्रक्रिया पूरी की जाए। क्या है मामला? यह मामला एक 17 वर्षीय किशोर की ओर से उसकी मां के माध्यम से दायर याचिका से जुड़ा है। याचिका में Human Organ and Tissue Transplantation Act, 1994 के तहत अपने पिता उत्तम कुमार शॉ को लिवर का हिस्सा दान करने की अनुमति मांगी गई थी। पिता लंबे समय से क्रॉनिक लिवर डिजीज से पीड़ित हैं और उनकी स्थिति गंभीर बताई गई है। कोर्ट ने किन आधारों पर दी अनुमति? मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि मरीज लिवर सिरोसिस और हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा (लिवर कैंसर) जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। चिकित्सकों के अनुसार उनकी जान बचाने का एकमात्र विकल्प लिवर प्रत्यारोपण है। परिवार के अन्य सदस्यों की मेडिकल जांच के बाद केवल नाबालिग बेटा ही लिवर दान के लिए उपयुक्त पाया गया। नाबालिग का फैसला स्वेच्छा से अदालत ने अपने आदेश में कहा कि करीब साढ़े 17 वर्ष का यह किशोर पूरी तरह स्वस्थ है और उसने बिना किसी दबाव, लालच या बाहरी प्रभाव के केवल अपने पिता की जान बचाने की भावना से अंगदान का निर्णय लिया है। एलजी की मंजूरी पहले ही मिल चुकी थी सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार ने अदालत को बताया कि 29 जून 2026 को सक्षम प्राधिकारी और दिल्ली के उपराज्यपाल की ओर से नाबालिग को अपने पिता को लिवर दान करने की प्रशासनिक अनुमति पहले ही दी जा चुकी थी। अस्पताल को जल्द सर्जरी करने का निर्देश अदालत ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि यदि समय रहते अनुमति नहीं दी गई तो मरीज की जान को गंभीर खतरा हो सकता है। इसलिए मानवीय आधार पर यह अनुमति देना आवश्यक है। ILBS ने अदालत को आश्वस्त किया कि आदेश मिलते ही प्रत्यारोपण की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी और जल्द ही सर्जरी की तारीख तय की जाएगी। क्या कहता है कानून? भारत में सामान्य परिस्थितियों में नाबालिगों द्वारा अंगदान की अनुमति नहीं होती। हालांकि, मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण नियम, 2014 के तहत अत्यंत असाधारण और जीवनरक्षक परिस्थितियों में सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी से नाबालिग द्वारा अंगदान की अनुमति दी जा सकती है। अनुच्छेद 226 क्या है? भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226 देश के उच्च न्यायालयों को यह अधिकार देता है कि वे नागरिकों के मौलिक अधिकारों और अन्य कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक आदेश या रिट जारी कर सकें। इसी संवैधानिक शक्ति का उपयोग करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में मानवीय आधार पर हस्तक्षेप किया।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।