अमेरिका ने अपने सबसे महत्वपूर्ण सैन्य कमांडों में से एक के नाम में बड़ा बदलाव करते हुए यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड (USINDOPACOM) को फिर से यूएस पैसिफिक कमांड (USPACOM) नाम दे दिया है। अमेरिकी युद्ध विभाग (Department of War) ने कहा कि यह कदम कमांड की ऐतिहासिक विरासत और उसकी मूल पहचान को बहाल करने के लिए उठाया गया है। यह वही नाम है जिसके तहत यह सैन्य कमांड 70 वर्षों से अधिक समय तक कार्य करता रहा था। 2018 में 'इंडो' शब्द जोड़ा गया था साल 2018 में तत्कालीन अमेरिकी रक्षा मंत्री Jim Mattis ने अमेरिकी पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड कर दिया था। उस समय वॉशिंगटन का मानना था कि हिंद महासागर क्षेत्र का रणनीतिक महत्व तेजी से बढ़ रहा है और इसकी सुरक्षा चुनौतियां प्रशांत क्षेत्र से गहराई से जुड़ी हुई हैं। 'इंडो-पैसिफिक' शब्द को भारत और हिंद महासागर की बढ़ती भू-राजनीतिक अहमियत के प्रतीक के रूप में देखा गया था। नाम बदला, लेकिन जिम्मेदारियां नहीं अमेरिकी युद्ध विभाग ने स्पष्ट किया है कि केवल नाम बदला गया है। कमांड की रणनीति, सैन्य मिशन और भौगोलिक दायरे में कोई बदलाव नहीं किया गया है। USPACOM का संचालन क्षेत्र पहले की तरह: अमेरिका के पश्चिमी तट से लेकर भारत की पश्चिमी सीमा तक, प्रशांत महासागर, हिंद महासागर का बड़ा हिस्सा, पूर्वी और दक्षिण-पूर्व एशिया, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण एशिया के कुछ क्षेत्रों तक फैला रहेगा। कमांड आगे भी संयुक्त सैन्य अभ्यास, समुद्री सुरक्षा, आपदा राहत, रक्षा साझेदारी और क्षेत्रीय सुरक्षा अभियानों का नेतृत्व करती रहेगी। क्यों अहम है यह सैन्य कमांड? अमेरिकी पैसिफिक कमांड की स्थापना 1 जनवरी 1947 को Harry S. Truman के कार्यकाल में हुई थी। यह अमेरिका की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी संयुक्त लड़ाकू कमांडों में से एक है। इसने: Korean War Vietnam War जैसे बड़े सैन्य अभियानों में अहम भूमिका निभाई है। इसके अलावा मानवीय सहायता और आपदा राहत अभियानों में भी इसकी महत्वपूर्ण भागीदारी रही है। भारत और क्वाड के लिए क्या मायने? अमेरिका ने कहा है कि यह केवल नाम का बदलाव है, लेकिन कई रणनीतिक विशेषज्ञ इसे प्रतीकात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण मान रहे हैं। 'इंडो-पैसिफिक' अवधारणा पिछले कुछ वर्षों में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच बने Quadrilateral Security Dialogue (क्वाड) सहयोग की आधारशिला मानी जाती रही है। 'इंडो' शब्द हटने से यह सवाल उठ रहे हैं कि: क्या ट्रंप प्रशासन इंडो-पैसिफिक रणनीति की प्राथमिकताओं में बदलाव चाहता है? क्या भारत की रणनीतिक भूमिका को लेकर अमेरिका का दृष्टिकोण बदल रहा है? क्या यह केवल ऐतिहासिक नाम की वापसी है या इसके पीछे कोई बड़ा भू-राजनीतिक संदेश छिपा है? फिलहाल अमेरिकी प्रशासन ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि क्षेत्रीय साझेदारों, भारत सहित सभी सहयोगी देशों के साथ 'स्वतंत्र और खुला क्षेत्र' बनाए रखने की प्रतिबद्धता पहले की तरह कायम रहेगी। हवाई से संचालित होता है विशाल सुरक्षा नेटवर्क हवाई स्थित मुख्यालय से संचालित यह कमांड दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री और सामरिक क्षेत्रों की निगरानी करती है। इसके दायरे में वैश्विक व्यापार मार्ग, ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री सुरक्षा और एशिया-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता जैसे अहम मुद्दे शामिल हैं। ऐसे में नाम परिवर्तन को भले ही प्रशासनिक कदम बताया जा रहा हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हलकों में इसे भारत-अमेरिका संबंधों और इंडो-पैसिफिक सुरक्षा ढांचे के संदर्भ में बारीकी से देखा जा रहा है।
Bangladesh और United States के बीच हुए नए रणनीतिक समझौतों ने दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र की भू-राजनीति को लेकर नई चर्चाएं शुरू कर दी हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक बांग्लादेश ने अमेरिका को अपने दो अहम बंदरगाहों - Port of Chittagong और Matarbari Port - के इस्तेमाल की अनुमति देने पर सहमति जताई है। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच खुफिया जानकारी साझा करने और समुद्री रणनीतिक सहयोग बढ़ाने को लेकर भी अहम करार हुए हैं। किन बंदरगाहों तक मिलेगी पहुंच? समझौते के तहत अमेरिकी नौसेना और सैन्य जहाज: Port of Chittagong Matarbari Port का इस्तेमाल कर सकेंगे। विशेषज्ञों के मुताबिक इससे अमेरिका को बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी मजबूत करने में मदद मिलेगी। खास बात यह है कि चिटगांव बंदरगाह भारत के Andaman and Nicobar Islands से लगभग 1100 किलोमीटर दूर है। अमेरिका की नजर मलक्का स्ट्रेट पर Strait of Malacca दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है। दुनिया के बड़े हिस्से का: तेल व्यापार गैस सप्लाई इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक सामानों का ट्रांसपोर्ट इसी रास्ते से होता है। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाकर चीन की समुद्री गतिविधियों पर करीबी नजर रखना चाहता है। बांग्लादेश-अमेरिका के 3 बड़े समझौते 1. बंदरगाह इस्तेमाल समझौता अमेरिकी सैन्य और नौसैनिक जहाजों को चिटगांव और मतारबाड़ी बंदरगाहों तक पहुंच मिलेगी। 2. खुफिया जानकारी साझा करना दोनों देश समुद्री सुरक्षा और सैन्य गतिविधियों से जुड़ी इंटेलिजेंस साझा करेंगे। 3. रणनीतिक सहयोग बढ़ाना बंगाल की खाड़ी और मलक्का क्षेत्र में संयुक्त निगरानी और सामरिक सहयोग मजबूत किया जाएगा। चीन के लिए क्यों अहम है मलक्का? China के लिए मलक्का स्ट्रेट बेहद संवेदनशील रणनीतिक क्षेत्र माना जाता है। चीन के लगभग 80% तेल आयात इसी रास्ते से गुजरते हैं। यही वजह है कि पूर्व चीनी राष्ट्रपति Hu Jintao ने इसे “मलक्का डिलेमा” कहा था। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस समुद्री मार्ग पर किसी भी तरह का दबाव बढ़ता है तो इसका असर सीधे चीन की अर्थव्यवस्था और सप्लाई चेन पर पड़ सकता है। भारत के लिए क्यों बढ़ी अहमियत? India का भी बड़ा समुद्री व्यापार इसी मार्ग से होकर गुजरता है। भारत के: लगभग 55% समुद्री व्यापार ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा मलक्का मार्ग से जुड़ा है। भारत की रणनीतिक ताकत का सबसे बड़ा आधार Andaman and Nicobar Islands माने जाते हैं, जो मलक्का स्ट्रेट के पश्चिमी प्रवेश द्वार के पास स्थित हैं। INS बाज की भूमिका INS Baaz भारत का महत्वपूर्ण एयर स्टेशन है, जो समुद्री निगरानी में अहम भूमिका निभाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक यहां से हिंद महासागर और मलक्का क्षेत्र की गतिविधियों पर करीबी नजर रखी जा सकती है। क्या बढ़ेगा भारत-अमेरिका सहयोग? रणनीतिक मामलों के जानकार मानते हैं कि यदि अमेरिका बंगाल की खाड़ी और मलक्का क्षेत्र में अपनी सक्रियता बढ़ाता है, तो भारत की भूमिका भी और महत्वपूर्ण हो सकती है। इस पूरे क्षेत्र में: Indonesia Malaysia जैसे देश अपनी समुद्री संप्रभुता को लेकर काफी संवेदनशील हैं। इसलिए आने वाले समय में हिंद महासागर क्षेत्र की रणनीतिक राजनीति और भी दिलचस्प हो सकती है।
अमेरिका के विदेश मंत्री Marco Rubio का भारत दौरा इस बार कई मायनों में खास माना जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उन्होंने अपनी यात्रा की शुरुआत भारत की राजनीतिक राजधानी New Delhi या आर्थिक राजधानी Mumbai से नहीं, बल्कि Kolkata से की। 23 मई 2026 की सुबह रूबियो कोलकाता पहुंचे, जहां भारत में अमेरिका के राजदूत Sergio Gor ने उनका स्वागत किया। करीब 14 साल बाद कोई अमेरिकी विदेश मंत्री कोलकाता पहुंचा है। इससे पहले 2012 में Hillary Clinton ने ‘सिटी ऑफ जॉय’ का दौरा किया था। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर कोलकाता को ही पहली मंजिल क्यों चुना गया? इस फैसले को लेकर राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक कई तरह की चर्चाएं और थ्योरीज सामने आ रही हैं। हालांकि, इसके पीछे कुछ ठोस रणनीतिक और कूटनीतिक वजहें भी मानी जा रही हैं। पहला फैक्ट: पूर्वी भारत की बढ़ती रणनीतिक अहमियत भारत-अमेरिका संबंधों में अब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र सबसे अहम मुद्दों में शामिल है। कोलकाता भौगोलिक रूप से Bay of Bengal और पूर्वी एशियाई समुद्री मार्गों के काफी करीब माना जाता है। इसी वजह से Quadrilateral Security Dialogue यानी QUAD देशों-भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया-के बीच बढ़ते सहयोग में पूर्वी भारत की भूमिका अहम मानी जा रही है। रूबियो के दौरे में ऊर्जा, रक्षा और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दे प्रमुख बताए जा रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि कोलकाता से यात्रा की शुरुआत इंडो-पैसिफिक रणनीति के तहत एक प्रतीकात्मक संदेश भी हो सकती है। दूसरा फैक्ट: मदर टेरेसा और ‘सॉफ्ट डिप्लोमेसी’ रिपोर्ट्स के मुताबिक मार्को रूबियो Missionaries of Charity के मुख्यालय Mother House भी जा सकते हैं। यह संस्था Mother Teresa से जुड़ी हुई है और दुनियाभर में मानवीय सेवा का प्रतीक मानी जाती है। अमेरिका लंबे समय से अपनी विदेश नीति में ‘सॉफ्ट डिप्लोमेसी’ का इस्तेमाल करता रहा है। ऐसे में रूबियो का कोलकाता दौरा सांस्कृतिक और मानवीय संदेश से भी जोड़ा जा रहा है। तीसरा फैक्ट: कोलकाता का ऐतिहासिक अमेरिका कनेक्शन कोलकाता में अमेरिका का बेहद पुराना राजनयिक इतिहास जुड़ा हुआ है। 19 नवंबर 1792 को George Washington ने Benjamin Joy को कलकत्ता के लिए पहला अमेरिकी वाणिज्य दूत नियुक्त किया था। ब्रिटिश दौर में कोलकाता एशिया में व्यापार और राजनीति का बड़ा केंद्र था। यही वजह है कि अमेरिका के लिए यह शहर सिर्फ सांस्कृतिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्व भी रखता है। विशेषज्ञों का मानना है कि Donald Trump के ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ नैरेटिव के बीच इतिहास से जुड़े प्रतीकों को भी अहमियत दी जा रही है। अब बात उन 4 थ्योरीज की, जिनकी सोशल मीडिया पर चर्चा है थ्योरी 1: क्या बंगाल की राजनीति पर अमेरिका की नजर? सोशल मीडिया पर कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि अमेरिका पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिति को करीब से समझना चाहता है। हालांकि, इस तरह के दावों का कोई आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी बड़े देश के लिए क्षेत्रीय राजनीति को समझना सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा होता है। थ्योरी 2: क्या चीन को संदेश देने की कोशिश? कई विश्लेषकों का मानना है कि कोलकाता का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से China को संदेश देने की कोशिश भी हो सकता है। पूर्वी भारत, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर क्षेत्र को लेकर अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। ऐसे में रूबियो का पहला पड़ाव इंडो-पैसिफिक रणनीति से जुड़ा प्रतीकात्मक संकेत माना जा रहा है। थ्योरी 3: इतिहास और कूटनीति का मेल कोलकाता में स्थित अमेरिकी वाणिज्य दूतावास दुनिया के सबसे पुराने अमेरिकी मिशनों में गिना जाता है। यही वजह है कि रूबियो की यात्रा को भारत-अमेरिका संबंधों के दो सौ साल पुराने इतिहास से जोड़कर भी देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक जुड़ाव को दोबारा रेखांकित करने की कोशिश भी हो सकता है। थ्योरी 4: ‘सांस्कृतिक भारत’ दिखाने की रणनीति? कुछ लोगों का मानना है कि अमेरिका इस बार दुनिया को सिर्फ सत्ता वाला भारत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और बौद्धिक भारत भी दिखाना चाहता है। कोलकाता लंबे समय से साहित्य, कला, थिएटर और राजनीतिक आंदोलनों का केंद्र रहा है। ऐसे में रूबियो का यहां से दौरा शुरू करना एक सांस्कृतिक संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है। क्यों अहम माना जा रहा है यह दौरा? विदेश नीति के जानकारों का कहना है कि किसी भी बड़े राजनयिक दौरे में शहरों का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण होता है। दिल्ली राजनीतिक शक्ति का केंद्र है, मुंबई आर्थिक ताकत का प्रतीक है, जबकि कोलकाता ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक पहचान रखता है। ऐसे में मार्को रूबियो का यह दौरा सिर्फ एक सामान्य प्रोटोकॉल विजिट नहीं माना जा रहा। इसमें राजनीति, रणनीति, संस्कृति और वैश्विक कूटनीति के कई संकेत छिपे दिखाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर चल रही कई कॉन्सिरेसी थ्योरीज के ठोस सबूत नहीं हैं, लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि 14 साल बाद किसी अमेरिकी विदेश मंत्री का कोलकाता पहुंचना अपने आप में एक बड़ा कूटनीतिक संदेश है।
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump का चीन दौरा वैश्विक राजनीति में नई चर्चा का विषय बन गया है। करीब नौ वर्षों बाद कोई अमेरिकी राष्ट्रपति Beijing पहुंचा है। यह दौरा ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका और भारत के रिश्तों में पहले जैसी गर्मजोशी नहीं दिख रही, जबकि पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने अमेरिका की चुनौतियां बढ़ा दी हैं। दूसरी ओर, भारत और China के बीच भी सीमाई और रणनीतिक मुद्दों को लेकर भरोसे की कमी बनी हुई है। ऐसे में ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के बीच बढ़ती नरमी और सकारात्मक संकेतों को भारत बेहद ध्यान से देख रहा है। तनाव के बाद दिखी नरमी पिछले कई महीनों से अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ विवाद, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक तनाव जारी था। इसके बावजूद ट्रंप ने शी जिनपिंग को “महान नेता” और “मित्र” कहकर संबंधों में नरमी का संकेत दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अब टकराव के बजाय स्थिर संबंधों की दिशा में बढ़ना चाहती हैं। हालांकि इसे सीधे तौर पर भारत के खिलाफ नहीं माना जा रहा, लेकिन इसके रणनीतिक असर को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। भारत के लिए क्यों अहम है यह समीकरण? भारत लंबे समय से अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाकर चलने की नीति अपनाता रहा है। भारत की कोशिश रहती है कि उसके किसी भी देश से रिश्ते दूसरे देश के खिलाफ न दिखें। India के लिए अमेरिका और चीन दोनों ही बड़े व्यापारिक साझेदार हैं। तकनीक, रक्षा, व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला जैसे कई क्षेत्रों में भारत की दोनों देशों पर अलग-अलग स्तर पर निर्भरता भी है। भारत लगातार बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और “मल्टीपोलर एशिया” की बात करता रहा है। लेकिन मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका का वैश्विक प्रभाव और एशिया में चीन की बढ़ती ताकत भारत के लिए रणनीतिक संतुलन की चुनौती पैदा करती है। एक्सपर्ट क्या कह रहे हैं? भारत-अमेरिका संबंधों के विशेषज्ञ और रणनीतिक मामलों के जानकार Ashley Tellis ने पहले भी इस मुद्दे पर चिंता जताई थी। उन्होंने अपने एक लेख में लिखा था कि ट्रंप की नीतियों से पैदा हुई अनिश्चितताएं भारत को असहज करती हैं और इससे अमेरिका के साथ गहरी साझेदारी को लेकर भारत की सतर्कता बढ़ती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भारत की रणनीतिक हिचकिचाहट केवल ट्रंप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की पुरानी विदेश नीति और खुद महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा से जुड़ी हुई है। टेलिस के मुताबिक, चीन की बढ़ती ताकत और उसका आक्रामक रुख भारत के लिए बड़ी रणनीतिक चुनौती है। ऐसे में अमेरिका के साथ मजबूत साझेदारी भारत की आवश्यकता बनी रहेगी, क्योंकि अकेले भारत के लिए चीन का संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। भारत के सामने संतुलन की चुनौती विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अमेरिका और चीन के संबंधों में स्थिरता आती है, तो इसका असर वैश्विक व्यापार, सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक रणनीति पर भी पड़ सकता है। भारत को ऐसे माहौल में अपनी विदेश नीति को बेहद संतुलित और व्यावहारिक तरीके से आगे बढ़ाना होगा। फिलहाल नई दिल्ली की नजर इस बात पर है कि ट्रंप-शी मुलाकात केवल कूटनीतिक नरमी तक सीमित रहती है या आने वाले समय में यह वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।