घरेलू शेयर बाजार में आज जबरदस्त तेजी देखने को मिली। सेंसेक्स 2700 अंक से ज्यादा उछल गया, वहीं निफ्टी 800 अंक चढ़कर नई ऊंचाई के करीब पहुंच गया। बाजार खुलते ही खरीदारी की ऐसी लहर आई कि निवेशकों की संपत्ति में ₹13 लाख करोड़ से ज्यादा का इजाफा हो गया। बाजार का ताजा हाल सेंसेक्स: +2716 अंक (3.64%) ➝ 77,332 के करीब निफ्टी 50: +797 अंक (3.45%) ➝ 23,921 के करीब मार्केट कैप: ₹13.74 लाख करोड़ की बढ़त हर सेक्टर में तेजी, मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी जोरदार खरीदारी क्यों आई बाजार में इतनी बड़ी तेजी? 1. ईरान-अमेरिका सीजफायर डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ 2 हफ्ते के संघर्ष विराम पर सहमति जताई इससे ग्लोबल टेंशन कम हुआ और एशियाई बाजारों में तेजी आई 2. कच्चे तेल में भारी गिरावट WTI क्रूड में करीब 19% गिरावट ब्रेंट क्रूड में 16% तक की कमी भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए यह बड़ी राहत है, जिससे बाजार में पॉजिटिव सेंटिमेंट बना। 3. RBI MPC फैसले का इंतजार निवेशकों को उम्मीद है कि RBI कोई सपोर्टिव पॉलिसी ला सकता है इसी उम्मीद में बाजार में पहले से खरीदारी बढ़ी निवेशकों को कितना फायदा? 7 अप्रैल: मार्केट कैप ➝ ₹4.29 लाख करोड़ करोड़ 8 अप्रैल: मार्केट कैप ➝ ₹4.43 लाख करोड़ करोड़ यानी सिर्फ एक दिन में ₹13.74 लाख करोड़ का फायदा मार्केट ब्रेड्थ (Market Breadth) कुल शेयर ट्रेड: 2679 तेजी वाले शेयर: 2408 गिरावट वाले: 178 36 शेयर: 1 साल के हाई पर 123 शेयर: अपर सर्किट में सेंसेक्स के सभी 30 शेयर ग्रीन जोन में
ईरान और अमेरिका के बीच हालिया युद्धविराम ने वैश्विक राजनीति में नया मोड़ ला दिया है। शुरुआती तौर पर जहां इस सीजफायर का श्रेय Shehbaz Sharif और पाकिस्तान की मध्यस्थता को दिया गया, वहीं अब नई रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि असल ‘गेम चेंजर’ China रहा। रिपोर्ट के मुताबिक, एक महीने तक चले संघर्ष के दौरान चीन ने खुलकर कोई भूमिका नहीं निभाई, लेकिन आखिरी समय में उसकी ‘डिस्क्रीट डिप्लोमेसी’ यानी पर्दे के पीछे की बातचीत ने हालात बदल दिए। जब युद्ध तेज होने की कगार पर था और Donald Trump ने सख्त चेतावनी दी, उसी दौरान चीन ने सीधे हस्तक्षेप कर ईरान को वार्ता के लिए तैयार किया। 10 घंटे में बदला खेल बताया जा रहा है कि ट्रंप की कड़ी चेतावनी के बाद महज 10 घंटों में हालात पूरी तरह बदल गए। ईरान ने न केवल सीजफायर पर सहमति दी, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए अहम Strait of Hormuz को फिर से खोलने का फैसला भी किया। चीन की रणनीतिक चाल सूत्रों के अनुसार, शुरुआत में चीन ने पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से बातचीत कराई। लेकिन जैसे ही पूर्ण युद्ध का खतरा बढ़ा, चीन ने सीधे ईरान से संपर्क साधा। यही निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन और रूस ने उस प्रस्ताव को भी रोक दिया, जिसमें हॉरमुज़ जलडमरूमध्य को बलपूर्वक खोलने की बात थी। चीन ने इसे ईरान के खिलाफ पक्षपाती बताया। अमेरिका ने क्यों नहीं दिया खुला श्रेय? हालांकि Donald Trump ने अनौपचारिक तौर पर चीन की भूमिका को स्वीकार किया, लेकिन आधिकारिक बयान में पाकिस्तान को ही श्रेय दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अमेरिका की रणनीति का हिस्सा था, ताकि चीन को वैश्विक स्तर पर ‘बराबरी का मध्यस्थ’ न माना जाए। पाकिस्तान की भूमिका पर उठे सवाल इस घटनाक्रम के बाद पाकिस्तान की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान सिर्फ संदेशवाहक की भूमिका में था, जबकि असली कूटनीतिक दबाव चीन ने बनाया। Shehbaz Sharif के एक सोशल मीडिया पोस्ट के ड्राफ्ट को लेकर भी विवाद हुआ, जिसमें “Draft” शब्द दिखने के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि संदेश कहीं और से तैयार किया गया था। चीन के हित भी जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की इस सक्रियता के पीछे उसके आर्थिक हित भी हैं। चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है और मध्य पूर्व में अस्थिरता उसकी ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकती थी। अगर युद्ध बढ़ता, तो न केवल ईरान का तेल निर्यात रुक सकता था, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन भी बुरी तरह प्रभावित होती-जिसका सीधा असर चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ता। निष्कर्ष कुल मिलाकर, यह घटनाक्रम दिखाता है कि वैश्विक राजनीति में कई बार असली फैसले पर्दे के पीछे लिए जाते हैं। इस मामले में चीन की चुप्पी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी, जिसने अंतिम समय में युद्धविराम को संभव बनाया।
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच बड़ी कूटनीतिक पहल सामने आई है। Iran और United States के बीच दो हफ्ते के सीजफायर पर सहमति बनने के बाद अब दोनों देशों के बीच औपचारिक वार्ता शुरू होने जा रही है। यह अहम बातचीत Islamabad में शुक्रवार को आयोजित होगी, जिसकी मेजबानी Pakistan करेगा। ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अनुसार, यह बातचीत तेहरान के 10-सूत्रीय प्रस्ताव के आधार पर होगी। इस प्रस्ताव में सबसे अहम मांग Strait of Hormuz पर नियंत्रण और सभी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को हटाने की है। सीजफायर के बाद शुरू हुई कूटनीतिक प्रक्रिया यह घटनाक्रम तब सामने आया जब Donald Trump ने ईरान पर हमले अस्थायी रूप से रोकने का ऐलान किया। इसके जवाब में ईरान ने भी अपनी सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति जताई। दोनों पक्षों ने दो हफ्ते के भीतर स्थायी समझौते की दिशा में काम करने की बात कही है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य बना मुख्य मुद्दा दुनिया के लगभग 20% तेल सप्लाई का रास्ता Strait of Hormuz से होकर गुजरता है। ईरान द्वारा आंशिक नाकेबंदी के कारण वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल मच गई थी, जिससे ईंधन की कीमतें बढ़ीं और कई देशों में सप्लाई प्रभावित हुई। अब अमेरिका ने इस जलमार्ग को पूरी तरह खोलने की शर्त रखी है, जबकि ईरान इसके बदले आर्थिक प्रतिबंध हटाने और क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखने की मांग कर रहा है। पाकिस्तान की मध्यस्थता से बढ़ी उम्मीदें Shehbaz Sharif ने दोनों देशों के बीच सीजफायर की पुष्टि करते हुए इस्लामाबाद में बातचीत के लिए आमंत्रण दिया है। उन्होंने इसे क्षेत्रीय शांति की दिशा में बड़ा कदम बताया है। प्रस्ताव में क्या-क्या शामिल? ईरान के 10-सूत्रीय प्रस्ताव में शामिल प्रमुख मांगें: हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर निगरानी और नियंत्रण मध्य-पूर्व से अमेरिकी सैनिकों की वापसी युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई सभी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना विदेशी बैंकों में जमा ईरानी संपत्तियों की रिहाई हालांकि, ईरान ने साफ कहा है कि वह अमेरिका पर “पूरी तरह भरोसा नहीं करता” और किसी भी गलती पर कड़ी प्रतिक्रिया देगा। इजरायल की चुप्पी बरकरार इस पूरे घटनाक्रम पर Israel की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, जबकि वह इस संघर्ष का अहम पक्ष रहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।