Iran को लेकर एक नई रिपोर्ट ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। दावा किया गया है कि United States और Israel का सैन्य अभियान केवल ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को निशाना बनाने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे तेहरान में सत्ता परिवर्तन की बड़ी रणनीति भी शामिल थी। रिपोर्ट के मुताबिक, इस योजना में ईरान के पूर्व राष्ट्रपति Mahmoud Ahmadinejad को दोबारा सत्ता में लाने की कोशिश की जा रही थी। हालांकि एक हमले और बाद की घटनाओं ने इस पूरी रणनीति को कमजोर कर दिया। क्या था कथित प्लान? The New York Times की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और इजरायल ने कथित “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” के जरिए ईरान के शीर्ष नेतृत्व को कमजोर करने की योजना बनाई थी। दावा किया गया कि इस ऑपरेशन के मुख्य उद्देश्य थे: ईरान के सैन्य और परमाणु ढांचे को नुकसान पहुंचाना शीर्ष नेतृत्व को खत्म करना देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करना वैकल्पिक सत्ता व्यवस्था तैयार करना रिपोर्ट में कहा गया कि सार्वजनिक तौर पर अमेरिका केवल परमाणु खतरे की बात करता रहा, लेकिन इजरायल इससे कहीं बड़े राजनीतिक बदलाव की तैयारी में था। खामेनेई की मौत से बढ़ा संकट रिपोर्ट के मुताबिक, 1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि सर्वोच्च नेता Ali Khamenei और कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी हमलों में मारे गए। खामेनेई करीब 37 वर्षों तक ईरान के सर्वोच्च नेता रहे थे। उनकी मौत के बाद देशभर में 40 दिनों का शोक घोषित किया गया और सत्ता को लेकर अस्थिरता बढ़ गई। अमेरिका और इजरायल को उम्मीद थी कि नेतृत्व हटते ही ईरानी सत्ता ढांचा बिखर जाएगा, लेकिन ऐसा पूरी तरह नहीं हुआ। अहमदीनेजाद को “मुक्त” कराने की कोशिश? रिपोर्ट के अनुसार, तेहरान के पूर्वी हिस्से में एक गुप्त अभियान चलाया गया, जहां महमूद अहमदीनेजाद कथित तौर पर नजरबंद थे। बताया गया कि हमला सीधे उनके घर पर नहीं, बल्कि उस सुरक्षा चौकी पर किया गया जहां Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) के जवान तैनात थे। सैटेलाइट तस्वीरों में सुरक्षा चौकी तबाह दिखाई गई, जबकि अहमदीनेजाद का घर सुरक्षित बताया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, हमले में अहमदीनेजाद घायल हुए लेकिन बच गए। क्यों अहम थे अहमदीनेजाद? महमूद अहमदीनेजाद 2005 से 2013 तक ईरान के राष्ट्रपति रहे। अपने कार्यकाल में वह पश्चिम विरोधी बयानों, परमाणु कार्यक्रम और इजरायल पर तीखे रुख को लेकर चर्चा में रहे। हालांकि बाद के वर्षों में उनका टकराव खामेनेई समर्थक सत्ता प्रतिष्ठान से बढ़ गया था। उन्होंने ईरानी शासन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे और बाद में उन्हें चुनाव लड़ने से भी रोका गया। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि मौजूदा सत्ता से उनकी दूरी उन्हें “संक्रमणकालीन नेतृत्व” के लिए उपयोगी बना सकती है। हमला फेल हुआ तो बिखर गई रणनीति रिपोर्ट में दावा किया गया कि हमले के बाद अहमदीनेजाद सार्वजनिक जीवन से अचानक गायब हो गए। उनके पीछे हटने से सत्ता परिवर्तन की पूरी योजना कमजोर पड़ गई। इसके अलावा: ईरान में बड़े पैमाने पर जनविद्रोह नहीं हुआ राजनीतिक ढांचा पूरी तरह नहीं टूटा कुर्द समूहों ने अपेक्षित भूमिका नहीं निभाई वैकल्पिक नेतृत्व उभर नहीं पाया इन वजहों से कथित योजना अधूरी रह गई। ट्रंप और नेतन्याहू के बयान भी चर्चा में रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu दोनों ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि ईरान में बदलाव “अंदर से” आना चाहिए। हालांकि रिपोर्ट का दावा है कि पर्दे के पीछे कहीं बड़ी रणनीति पर काम हो रहा था। सिर्फ एयरस्ट्राइक नहीं, ‘इन्फ्लुएंस ऑपरेशन’ भी रिपोर्ट के मुताबिक, योजना में केवल हवाई हमले ही नहीं बल्कि: साइकोलॉजिकल ऑपरेशन इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाना सोशल अस्थिरता बढ़ाना कुर्द लड़ाकों को सक्रिय करना जैसी रणनीतियां भी शामिल थीं, ताकि जनता में यह संदेश जाए कि ईरानी शासन नियंत्रण खो चुका है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट ने पश्चिम एशिया की राजनीति और ईरान में संभावित सत्ता परिवर्तन को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है।
युद्धविराम के बावजूद ईरान में खतरे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। उत्तर-पश्चिमी जंजान में शुक्रवार को हुए एक भीषण विस्फोट ने यह साफ कर दिया कि युद्ध के अवशेष कितने घातक हो सकते हैं। इस हादसे में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के 14 जवानों की मौत हो गई, जबकि दो अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। बम निष्क्रिय करने के दौरान हुआ हादसा ईरान की सरकारी एजेंसी IRNA के मुताबिक, यह विस्फोट उस समय हुआ जब IRGC की एक विशेष बम निरोधक टीम इलाके में सफाई अभियान चला रही थी। यह टीम हालिया हवाई हमलों के बाद बचे हुए गोला-बारूद को खोजकर निष्क्रिय कर रही थी अचानक एक अज्ञात विस्फोटक सक्रिय हो गया धमाका इतना शक्तिशाली था कि कई जवान मौके पर ही मारे गए मारे गए जवान “अंसार अल-महदी” यूनिट के अनुभवी सदस्य थे, जिन्हें ऐसे जोखिम भरे अभियानों के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। बिना फटे बम बने सबसे बड़ा खतरा प्रारंभिक जांच में यह आशंका जताई गई है कि विस्फोट का कारण क्लस्टर बम या बारूदी सुरंग हो सकता है, जो हवाई हमलों के दौरान गिराए गए थे लेकिन फटे नहीं थे। ऐसे बम जमीन में छिपे रहते हैं और लंबे समय तक सक्रिय रहते हैं इन्हें निष्क्रिय करना बेहद कठिन और खतरनाक होता है जरा सी चूक जानलेवा साबित हो सकती है युद्ध खत्म होने के बाद भी ये ‘अनएक्सप्लोडेड ऑर्डनेंस’ (UXO) वर्षों तक खतरा बने रहते हैं। सीजफायर के बाद सबसे बड़ी सैन्य क्षति 8 अप्रैल को लागू हुए युद्धविराम के बाद यह IRGC के लिए अब तक की सबसे बड़ी जनहानि बताई जा रही है। यह घटना इस बात की गंभीर याद दिलाती है कि युद्ध के प्रभाव सिर्फ लड़ाई तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उसके बाद भी जानलेवा खतरे बने रहते हैं। IRGC के मुताबिक: अब तक 15,000 से ज्यादा बिना फटे गोला-बारूद की पहचान की जा चुकी है इनको निष्क्रिय करने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया जा रहा है कई इलाके अभी भी ‘हाई रिस्क जोन’ बने हुए हैं आम नागरिक और खेती भी खतरे में अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यह खतरा सिर्फ सैन्य बलों तक सीमित नहीं है। कई बम रिहायशी इलाकों और गांवों के पास पड़े हैं कृषि भूमि में भी भारी मात्रा में विस्फोटक मौजूद हैं फार्स न्यूज एजेंसी के अनुसार, लगभग 1,200 हेक्टेयर कृषि क्षेत्र अभी भी जोखिम में है, जिससे किसानों की आजीविका प्रभावित हो रही है और खाद्य उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। युद्ध की पृष्ठभूमि और बढ़ता वैश्विक तनाव इस हादसे की पृष्ठभूमि हालिया संघर्ष से जुड़ी है, जिसमें अमेरिका और इजरायल ने फरवरी में ईरान के कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर संयुक्त हमले किए थे। जवाब में ईरान ने मिसाइल और ड्रोन हमले किए इस संघर्ष में 4000 से अधिक लोगों की जान गई वैश्विक दबाव और बढ़ते नुकसान के बाद 8 अप्रैल को सीजफायर लागू हुआ होर्मुज जलडमरूमध्य और ऊर्जा संकट होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट गहरा गया है। यह दुनिया के सबसे अहम तेल आपूर्ति मार्गों में से एक है जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से तेल और गैस की सप्लाई पर असर पड़ा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला सीजफायर के बाद भी इस क्षेत्र में स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाई है। अमेरिका-ईरान वार्ता में जारी गतिरोध इसी बीच डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के नए प्रस्ताव पर असंतोष जताया है। उन्होंने कहा कि प्रस्ताव “पर्याप्त नहीं” है परमाणु कार्यक्रम को लेकर दोनों देशों में मतभेद बरकरार हैं बातचीत जारी है, लेकिन ठोस समाधान अभी दूर नजर आ रहा है ईरान ने युद्ध समाप्त करने और आर्थिक प्रतिबंधों में राहत के लिए बातचीत की इच्छा जताई है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच भरोसे की कमी साफ दिखती है।
देश की कमान अब जनरलों के नेटवर्क के इर्द-गिर्द ईरान की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां सर्वोच्च नेतृत्व से जुड़े मोजतबा खामेनेई की गंभीर चोटों के बाद देश की निर्णय प्रक्रिया पर सेना का प्रभाव तेजी से बढ़ गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब महत्वपूर्ण फैसले सीधे तौर पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के शीर्ष जनरलों की सलाह और सहमति से लिए जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, मौजूदा हालात में सरकार का मुख्य काम केवल आंतरिक स्थिरता बनाए रखना, आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करना और रोजमर्रा के प्रशासन को सुचारू रूप से चलाना रह गया है। गंभीर चोटों के बाद इलाज जारी, कई सर्जरी हो चुकी हैं रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मोजतबा खामेनेई को पहले हुए हमलों में गंभीर चोटें आई हैं। उनकी एक टांग पर अब तक तीन बार सर्जरी हो चुकी है और आगे चलकर उन्हें कृत्रिम पैर (prosthetic leg) की जरूरत पड़ सकती है। इसके अलावा, उनके हाथ की भी सर्जरी की गई है और उसमें धीरे-धीरे सुधार देखा जा रहा है। चेहरे और होंठों पर गंभीर जलन के निशान बताए गए हैं, जिससे बोलने में कठिनाई हो रही है। डॉक्टरों का कहना है कि भविष्य में उन्हें प्लास्टिक सर्जरी की आवश्यकता भी पड़ सकती है। देश से अलग-थलग, सिर्फ मेडिकल टीम से संपर्क जानकारी के अनुसार, सुरक्षा कारणों से वरिष्ठ सैन्य और राजनीतिक नेता अब सीधे मोजतबा से मुलाकात नहीं कर रहे हैं। उनका इलाज स्वास्थ्य मंत्रालय और विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में चल रहा है। ईरान के राष्ट्रपति, जो स्वयं एक डॉक्टर हैं, भी उनकी देखभाल प्रक्रिया से जुड़े बताए जा रहे हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि वे सार्वजनिक रूप से बोलने से बच रहे हैं और केवल लिखित संदेशों के जरिए ही संवाद कर रहे हैं। सैन्य नेतृत्व के हाथ में सत्ता का संतुलन ईरान की सत्ता संरचना में इस समय बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स देश की सुरक्षा, विदेश नीति और रणनीतिक फैसलों में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। विदेश नीति से जुड़े कई महत्वपूर्ण अधिकार पहले के मुकाबले अब अलग नेताओं के पास स्थानांतरित हो गए हैं। संसद प्रमुख और कुछ वरिष्ठ सैन्य अधिकारी अंतरराष्ट्रीय रणनीति में ज्यादा प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं। सरकार सीमित भूमिका में, जनरल्स का बढ़ता प्रभाव ईरान की निर्वाचित सरकार फिलहाल केवल प्रशासनिक कार्यों तक सीमित नजर आ रही है। खाद्य आपूर्ति, ईंधन व्यवस्था और घरेलू स्थिरता जैसे कार्य सरकार के मुख्य दायित्व बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति में देश के भीतर शक्ति का संतुलन स्पष्ट रूप से सैन्य नेतृत्व की ओर झुका हुआ है। हालांकि, ईरानी व्यवस्था में अलग-अलग शक्ति केंद्रों का अस्तित्व पहले से ही रहा है। अस्थिर समय में सत्ता का बदलता ढांचा ईरान की वर्तमान राजनीतिक स्थिति एक असाधारण मोड़ पर दिखाई दे रही है, जहां घायल नेतृत्व, सीमित प्रशासनिक भूमिका और मजबूत सैन्य प्रभाव मिलकर एक नया शक्ति समीकरण बना रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि देश का राजनीतिक ढांचा किस दिशा में आगे बढ़ता है।
तेहरान में सत्ता का बदलता समीकरण Iran की सत्ता संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, देश में असली ताकत अब पारंपरिक राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व से हटकर सैन्य ढांचे के पास जाती दिख रही है। विशेष रूप से Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) का प्रभाव तेजी से बढ़ा है, जिससे सरकार के फैसलों पर सेना का दबदबा मजबूत हुआ है। अहमद वहिदी का उभार, बने सबसे प्रभावशाली चेहरा इस बदलाव के केंद्र में Ahmad Vahidi हैं, जिन्हें IRGC का प्रमुख बनाया गया है। वहिदी पहले भी ईरान के रक्षा मंत्री और कुद्स फोर्स जैसे अहम सैन्य संगठनों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा चुके हैं। अब उन्हें देश की सुरक्षा, विदेश नीति और युद्ध रणनीति के बड़े फैसलों का प्रमुख चेहरा माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान हालात में वही तय कर सकते हैं कि ईरान संघर्ष बढ़ाएगा या बातचीत का रास्ता चुनेगा। IRGC का बढ़ता नियंत्रण, सरकार पर हावी सैन्य शक्ति Islamic Revolutionary Guard Corps अब सिर्फ सैन्य बल नहीं रह गया है, बल्कि यह आर्थिक, खुफिया और विदेश नीति जैसे क्षेत्रों में भी गहरी पकड़ रखता है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई बार सरकार के कूटनीतिक फैसलों को भी IRGC के सख्त रुख के कारण बदला या रोका गया है। सुप्रीम लीडर की भूमिका पर भी उठे सवाल ईरान में औपचारिक रूप से सर्वोच्च शक्ति सुप्रीम लीडर के पास होती है। वर्तमान में Mojtaba Khamenei इस पद पर हैं, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि असली नियंत्रण अब पर्दे के पीछे IRGC के हाथों में जाता दिख रहा है। इससे धार्मिक नेतृत्व की भूमिका सीमित होकर प्रतीकात्मक बनने की आशंका जताई जा रही है। अमेरिका-ईरान संबंधों पर असर United States और ईरान के बीच चल रहे तनाव के बीच यह बदलाव बेहद अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, जब निर्णय लेने की ताकत सैन्य नेतृत्व के पास होती है, तो बातचीत अधिक कठोर और अनिश्चित हो सकती है। इससे शांति वार्ता और सीजफायर प्रयासों पर भी असर पड़ सकता है। वैश्विक राजनीति में बढ़ेगा असर अहमद वहिदी और IRGC का बढ़ता दबदबा यह संकेत देता है कि ईरान अब ज्यादा सख्त और आक्रामक नीति अपना सकता है। इसका असर सिर्फ मिडिल ईस्ट ही नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीति और सुरक्षा समीकरणों पर भी देखने को मिल सकता है।
ईरान ने दी खुली धमकी, तेल उद्योग को निशाना बनाने की बात अमेरिका-ईरान तनाव के बीच ईरान ने बड़ा और सख्त बयान दिया है। ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड’ (IRGC) के एयरोस्पेस प्रमुख जनरल माजिद मूसावी ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका के साथ युद्ध दोबारा शुरू हुआ, तो ईरान पूरे क्षेत्र की ऑयल इंडस्ट्री को तबाह कर सकता है। उन्होंने साफ कहा कि ईरान के खिलाफ कोई भी सैन्य कार्रवाई “गंभीर भूल” साबित होगी और इसके दूरगामी परिणाम होंगे। पड़ोसी देशों को भी चेतावनी, तेल भंडार खतरे में ईरानी अधिकारी ने सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि क्षेत्र के अन्य देशों को भी आगाह किया। मूसावी ने कहा कि अगर किसी देश ने अमेरिका को अपने सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करने की अनुमति दी, तो उनके तेल भंडार भी निशाने पर आ सकते हैं। इस बयान से पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है, जहां पहले से ही हालात नाजुक बने हुए हैं। ट्रंप ने बढ़ाया सीजफायर, कूटनीति को मिला समय ईरान की चेतावनी के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीजफायर को आगे बढ़ाने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि युद्धविराम तब तक जारी रहेगा, जब तक ईरान की ओर से कोई ठोस और संयुक्त प्रस्ताव नहीं आता। ट्रंप के मुताबिक, यह फैसला पाकिस्तान के अनुरोध के बाद लिया गया, ताकि दोनों देशों के बीच बातचीत को आगे बढ़ाने का मौका मिल सके। बातचीत अटकी, बढ़ सकता है वैश्विक संकट सीजफायर खत्म होने से ठीक पहले यह फैसला लिया गया, जिससे संकेत मिलता है कि हालात अब भी बेहद संवेदनशील हैं। अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत में प्रगति नहीं होने और सख्त बयानों के चलते वैश्विक तेल बाजार और क्षेत्रीय स्थिरता पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तनाव बढ़ता है, तो इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
सेना का बढ़ता प्रभाव, सत्ता पर पकड़ मजबूत ईरान में सत्ता के समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) पर आरोप है कि वह देश की राजनीतिक व्यवस्था में अपनी पकड़ लगातार मजबूत कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, IRGC ने राष्ट्रपति के कई अहम फैसलों में हस्तक्षेप करते हुए सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रभाव बढ़ा दिया है। राष्ट्रपति की नियुक्तियों पर रोक Masoud Pezeshkian द्वारा किए गए महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति के प्रयासों को कथित तौर पर रोक दिया गया। खासकर खुफिया मंत्री की नियुक्ति को लेकर राष्ट्रपति और सैन्य नेतृत्व के बीच टकराव सामने आया है। बताया जा रहा है कि IRGC के दबाव के चलते प्रस्तावित सभी नामों को खारिज कर दिया गया। सुप्रीम लीडर तक पहुंच भी सीमित रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि Mojtaba Khamenei के आसपास सुरक्षा घेरा कड़ा कर दिया गया है और उनकी पहुंच को सीमित किया गया है। सूत्रों के अनुसार, अब शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच और संवाद को सैन्य अधिकारियों की एक परिषद नियंत्रित कर रही है, जिससे सरकार और नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ गई है। क्या यह तख्तापलट है? विशेषज्ञ इसे अचानक हुआ सत्ता परिवर्तन नहीं मानते, बल्कि इसे लंबे समय से चल रही प्रक्रिया का हिस्सा बताते हैं। उनका कहना है कि IRGC का प्रभाव पहले से ही बढ़ रहा था और अब वह खुलकर सामने आ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर IRGC का दबदबा और बढ़ता है, तो ईरान की विदेश नीति और अधिक सख्त हो सकती है। इससे अमेरिका जैसे देशों के साथ बातचीत में तनाव बढ़ने की संभावना है। राजनीतिक संकट गहराने के संकेत ईरान के भीतर सत्ता संघर्ष और बढ़ते तनाव से राजनीतिक संकट गहराता दिख रहा है। राष्ट्रपति पेजेशकियन के लिए यह स्थिति बड़ी चुनौती बन गई है, जहां उन्हें एक ऐसे सिस्टम में काम करना पड़ रहा है, जहां वास्तविक नियंत्रण धीरे-धीरे सैन्य संस्थाओं के हाथ में जाता नजर आ रहा है।
मध्य-पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान के भीतर ही सत्ता के शीर्ष स्तर पर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। अमेरिका के साथ संभावित वार्ता को लेकर ईरानी नेतृत्व दो धड़ों में बंटा दिख रहा है–एक पक्ष बातचीत के जरिए समाधान चाहता है, जबकि दूसरा टकराव के रास्ते पर अडिग है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम भूमिका Ahmad Vahidi की मानी जा रही है, जिन पर यह तय करने की जिम्मेदारी आ टिकी है कि ईरान शांति की राह चुनेगा या संघर्ष को आगे बढ़ाएगा। IRGC बनाम सिविल नेतृत्व: बढ़ती खींचतान रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरानी संसद के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) के प्रमुख अहमद वाहिदी के बीच गंभीर मतभेद उभर आए हैं। जहां गालिबाफ जैसे नागरिक नेता अमेरिका के साथ वार्ता के जरिए तनाव कम करने के पक्ष में हैं, वहीं IRGC के कई वरिष्ठ अधिकारी बातचीत का विरोध कर रहे हैं। मौजूदा संकेतों से यह भी लग रहा है कि इस समय सत्ता संतुलन में वाहिदी का प्रभाव ज्यादा मजबूत है। कौन हैं अहमद वाहिदी? अहमद वाहिदी को ईरान के सबसे प्रभावशाली और कठोर रुख वाले नेताओं में गिना जाता है। मार्च 2026 में उन्हें IRGC का कमांडर-इन-चीफ बनाया गया। इससे पहले वे गृह मंत्री और रक्षा मंत्री जैसे अहम पदों पर भी रह चुके हैं। उनका नाम 1994 के अर्जेंटीना AMIA बम धमाके में भी सामने आया था, जिसके चलते इंटरपोल ने उन्हें वांटेड घोषित किया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन पर कई प्रतिबंध भी लगाए गए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि वाहिदी का रुख हमेशा से आक्रामक रहा है और वे “अमेरिका विरोधी” रणनीति के मजबूत समर्थक हैं। ईरान के प्रॉक्सी संगठनों पर भी उनकी गहरी पकड़ मानी जाती है। वार्ता पर सस्पेंस, इस्लामाबाद बैठक अनिश्चित अमेरिका के साथ दूसरे दौर की वार्ता के लिए ईरानी प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद जाएगा या नहीं, इस पर अभी भी संशय बना हुआ है। जहां अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल रवाना हो चुका है, वहीं ईरान की ओर से स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं। सूत्रों के मुताबिक, यदि ईरान बातचीत के लिए सहमत भी होता है, तो उसकी शर्तें पहले जैसी ही सख्त रह सकती हैं। समुद्री तनाव और बढ़ती सख्ती इस बीच अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों के आसपास अपनी नौसैनिक गतिविधियां और नाकेबंदी जारी रखी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अब तक कई जहाजों को अपना मार्ग बदलने के निर्देश दिए गए हैं और एक ईरानी जहाज को जब्त भी किया गया है। वहीं ईरानी संसद होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण को लेकर एक नया विधेयक तैयार कर रही है। इसके तहत ‘शत्रु देशों’ के जहाजों पर सख्त प्रतिबंध और टोल वसूली जैसे प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं। यह कदम वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति पर भी असर डाल सकता है। आगे क्या? मौजूदा हालात में यह स्पष्ट है कि ईरान के भीतर सत्ता संघर्ष ही यह तय करेगा कि देश अमेरिका के साथ टकराव बढ़ाएगा या कूटनीतिक रास्ता अपनाएगा।
मिडिल ईस्ट में हालात तेजी से बिगड़ते नजर आ रहे हैं। Gulf of Oman में United States और Iran के बीच सीधा सैन्य टकराव जैसी स्थिति बन गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका द्वारा ईरानी मर्चेंट शिप पर कार्रवाई के बाद तेहरान ने जवाबी कदम उठाते हुए अमेरिकी युद्धपोतों की ओर ड्रोन भेजे हैं। क्या हुआ ओमान की खाड़ी में? ईरानी मीडिया के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार: अमेरिकी सेना ने ईरान के एक व्यापारिक जहाज़ को निशाना बनाया जहाज़ को रोककर उसे वापस ईरानी समुद्री सीमा में भेजने की कोशिश की गई इस कार्रवाई को ईरान ने “उकसावे वाली” कार्रवाई बताया इसके जवाब में: ईरान की सेना और Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) ने अमेरिकी युद्धपोतों की दिशा में ड्रोन तैनात किए IRGC का दावा है कि अमेरिकी नौसेना को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है, जिससे स्थिति और धुंधली बनी हुई है। होर्मुज और खाड़ी की रणनीतिक अहमियत Strait of Hormuz और Gulf of Oman वैश्विक तेल व्यापार के सबसे अहम मार्गों में गिने जाते हैं। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है यहां किसी भी तरह का सैन्य टकराव सीधे तेल कीमतों और सप्लाई पर असर डाल सकता है इसी वजह से इस क्षेत्र में बढ़ती हर गतिविधि को वैश्विक स्तर पर गंभीरता से देखा जा रहा है। जहाज़ ‘टूस्का’ पर कार्रवाई अमेरिका ने एक और बड़ा दावा करते हुए कहा कि उसने ‘टूस्का’ नाम के ईरानी जहाज़ को रोक लिया है। United States Central Command (CENTCOM) के अनुसार कई बार चेतावनी देने के बाद भी जहाज़ नहीं रुका इसके बाद अमेरिकी युद्धपोत USS Spruance ने उसके इंजन रूम पर फायरिंग की जहाज़ को निष्क्रिय कर अमेरिका ने अपने कब्जे में ले लिया इस कार्रवाई की पुष्टि Donald Trump ने भी की है। ईरान का पलटवार और आरोप ईरान ने इस पूरी घटना को “समुद्री डकैती” करार दिया है। तेहरान का कहना है कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर रहा है IRGC ने चेतावनी दी है कि अगर नाकेबंदी जारी रही तो होर्मुज पूरी तरह बंद रहेगा साथ ही, ईरान ने कुछ विदेशी टैंकरों को भी रास्ते से वापस भेजा है, जिससे तनाव और बढ़ गया है। सीजफायर पर भी सवाल ईरान ने आरोप लगाया है कि 8 अप्रैल को घोषित युद्धविराम का अमेरिका ने उल्लंघन किया है। तेहरान का कहना है कि पहले अमेरिका अपनी नाकेबंदी हटाए तभी किसी भी तरह की बातचीत संभव होगी यानी कूटनीतिक रास्ते फिलहाल कमजोर पड़ते दिख रहे हैं। क्या बढ़ सकता है युद्ध? विशेषज्ञ मानते हैं कि हालात बेहद नाजुक हैं: दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने हैं छोटे-छोटे टकराव बड़े संघर्ष में बदल सकते हैं ड्रोन, नौसैनिक कार्रवाई और नाकेबंदी–तीनों मिलकर जोखिम बढ़ा रहे हैं ओमान की खाड़ी में हुआ यह घटनाक्रम सिर्फ एक क्षेत्रीय झड़प नहीं, बल्कि वैश्विक संकट का संकेत हो सकता है। एक ओर अमेरिका अपनी सैन्य ताकत दिखा रहा है, तो दूसरी ओर ईरान भी पीछे हटने को तैयार नहीं है। अब दुनिया की नजर इस बात पर है कि: क्या यह टकराव कूटनीति से सुलझेगा या फिर मिडिल ईस्ट एक बड़े युद्ध की ओर बढ़ रहा है
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच Iran की आंतरिक राजनीति को लेकर नई अटकलें तेज हो गई हैं। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि ईरान की शक्तिशाली सैन्य इकाई Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) का प्रभाव तेजी से बढ़ा है और उसने सुरक्षा व विदेश नीति से जुड़े फैसलों पर पकड़ मजबूत कर ली है। क्या वाकई “तख्तापलट” जैसा माहौल है? सीधे तौर पर आधिकारिक “कूप” (coup) की पुष्टि नहीं है, लेकिन संकेत यह जरूर मिल रहे हैं कि: सैन्य नेतृत्व का प्रभाव बढ़ा है कूटनीतिक (डिप्लोमैटिक) चैनल कमजोर पड़े हैं बातचीत की जगह सख्त रुख हावी हो रहा है रिपोर्ट्स के मुताबिक IRGC से जुड़े वरिष्ठ नेता Ahmad Vahidi और सुप्रीम लीडर के करीबी Mojtaba Khamenei की भूमिका अहम हो गई है। नरमपंथी नेता साइडलाइन? ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi जैसे नेताओं के प्रभाव में कमी की बात कही जा रही है। बताया जा रहा है कि: उन्होंने पहले बातचीत के जरिए तनाव कम करने के संकेत दिए थे लेकिन IRGC ने सख्त रुख अपनाते हुए उस लाइन को पलट दिया इससे साफ है कि फिलहाल “डिप्लोमेसी बनाम मिलिट्री” की लड़ाई में सैन्य पक्ष भारी पड़ रहा है। बढ़ा तनाव Strait of Hormuz पर नियंत्रण को लेकर हालात और गंभीर हो गए हैं। ईरान ने जहाजों की आवाजाही सीमित की कई जहाजों को निशाना बनाए जाने की खबरें सैकड़ों जहाज फंसे होने की आशंका यह मार्ग वैश्विक तेल सप्लाई के लिए बेहद अहम है, इसलिए इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। डिप्लोमेसी में सेना की एंट्री रिपोर्ट्स बताती हैं कि IRGC से जुड़े अधिकारियों को अब बातचीत करने वाले प्रतिनिधिमंडल में भी शामिल किया जा रहा है, ताकि कोई भी फैसला “सिस्टम लाइन” से बाहर न जाए। इससे संकेत मिलता है कि: विदेश नीति पर भी सैन्य नियंत्रण बढ़ रहा है पश्चिमी देशों के साथ समझौते की संभावना और कम हो सकती है अमेरिका के सामने क्या विकल्प? अब United States के सामने तीन संभावित रास्ते माने जा रहे हैं: डिप्लोमैटिक दबाव बढ़ाना – प्रतिबंध और अंतरराष्ट्रीय समर्थन के जरिए मिलिट्री विकल्प – होर्मुज और क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करना मध्यस्थता के जरिए समझौता – तीसरे देशों के माध्यम से बातचीत जारी रखना लेकिन मौजूदा हालात में किसी भी विकल्प के आसान होने की संभावना कम दिख रही है। क्षेत्र में अनिश्चितता बढ़ी कमजोर संघर्षविराम (सीजफायर) के बावजूद हालात बेहद नाजुक बने हुए हैं। बातचीत ठप पड़ती दिख रही है सैन्य गतिविधियां बढ़ रही हैं खाड़ी क्षेत्र में बड़े संघर्ष का खतरा बना हुआ है ईरान में सत्ता संतुलन में बदलाव की ये खबरें भले पूरी तरह पुष्टि नहीं हुई हों, लेकिन संकेत साफ हैं–सैन्य ताकत का असर बढ़ रहा है और कूटनीति कमजोर पड़ रही है। ऐसे में आने वाले दिन न सिर्फ ईरान-अमेरिका रिश्तों, बल्कि पूरे मिडिल ईस्ट की स्थिरता के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं।
वॉशिंगटन/इस्लामाबाद: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत फिर शुरू होने की उम्मीद जगी है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने संकेत दिया है कि अगले दो दिनों में वार्ता का नया दौर शुरू हो सकता है। हालांकि, इस बार अमेरिका ने बातचीत से पहले दो अहम शर्तें रख दी हैं। बताया जा रहा है कि वार्ता का अगला दौर एक बार फिर Islamabad में हो सकता है, जहां पहले भी दोनों देशों के बीच बातचीत हुई थी। क्या हैं अमेरिका की शर्तें? पहली शर्त: होर्मुज स्ट्रेट को खोलना होगा अमेरिका चाहता है कि Strait of Hormuz को पूरी तरह और बिना किसी रुकावट के खोला जाए। यह समुद्री मार्ग दुनिया की तेल सप्लाई के लिए बेहद अहम है। अमेरिका ने साफ किया है कि अगर ईरान जहाजों की आवाजाही रोकेगा, तो उसके जहाजों को भी गुजरने नहीं दिया जाएगा। दूसरी शर्त: ईरानी टीम को मिले पूरा अधिकार अमेरिका की दूसरी शर्त है कि बातचीत करने वाली ईरानी टीम के पास अंतिम फैसला लेने का अधिकार हो। वॉशिंगटन चाहता है कि इस्लामाबाद में जो भी समझौता हो, उसे Iran के सभी बड़े संस्थान मंजूरी दें। ईरान के अंदर बढ़ रहे मतभेद रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद सामने आ रहे हैं। एक तरफ राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian और विदेश मंत्री Abbas Araghchi जैसे राजनीतिक नेता हैं दूसरी तरफ शक्तिशाली Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) है बताया जा रहा है कि पहले दौर की वार्ता में IRGC के कुछ अधिकारियों ने राजनीतिक टीम को जवाब देने से रोक दिया था। ट्रंप का दावा Donald Trump ने कहा है कि उन्हें “सही लोगों” की तरफ से संपर्क मिला है और ईरान समझौते के लिए तैयार हो सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत फिर शुरू होने की संभावना तो बनी है, लेकिन ट्रंप की सख्त शर्तें और ईरान के अंदरूनी मतभेद इस प्रक्रिया को मुश्किल बना सकते हैं। अब देखना होगा कि कूटनीति तनाव कम कर पाती है या हालात और बिगड़ते हैं।
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव अब एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। पानी और तेल मार्गों को लेकर पहले से जारी टकराव के बीच अब रणनीतिक पुलों को निशाना बनाने की आशंका बढ़ गई है। हालिया घटनाक्रम में अमेरिका द्वारा ईरान के एक महत्वपूर्ण पुल पर किए गए हमले ने इस संकट को और भड़का दिया है, जिसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई के संकेत दिए हैं। अमेरिका का हमला और बढ़ता तनाव रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी हमले में ईरान के सबसे ऊंचे माने जा रहे B1 पुल को निशाना बनाया गया। यह पुल राजधानी तेहरान को करज शहर से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट था, जो अभी निर्माणाधीन था। इस हमले में कम से कम 8 लोगों की मौत और करीब 95 लोग घायल बताए जा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस हमले के बाद कड़ा रुख अपनाते हुए ईरान को चेतावनी दी कि यदि वह वार्ता के लिए आगे नहीं आता, तो और भी कड़े कदम उठाए जा सकते हैं। ईरान का पलटवार: 8 अहम पुल निशाने पर हमले के बाद ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरान की अर्ध-सरकारी एजेंसी के मुताबिक, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने खाड़ी क्षेत्र और आसपास के देशों के 8 महत्वपूर्ण पुलों को संभावित निशाने के रूप में चिन्हित किया है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं: कुवैत का शेख जाबेर अल-अहमद अल-सबा सी ब्रिज UAE के शेख जायद, अल मकता और शेख खलीफा ब्रिज सऊदी अरब और बहरीन को जोड़ने वाला किंग फहद कॉज़वे जॉर्डन के किंग हुसैन, दामिया और अब्दौन ब्रिज यह सूची इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में संघर्ष और व्यापक हो सकता है, जिससे पूरे खाड़ी क्षेत्र की कनेक्टिविटी और सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। ईरान का सख्त संदेश ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ कहा कि नागरिक ढांचे पर हमले ईरान को झुकाने में सफल नहीं होंगे। उन्होंने इसे विरोधी पक्ष की ‘नैतिक हार’ बताया और संकेत दिया कि जवाबी कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। वैश्विक असर की आशंका विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पुलों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले बढ़ते हैं, तो इसका असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। यह वैश्विक व्यापार, तेल सप्लाई और समुद्री मार्गों को भी प्रभावित कर सकता है। खासकर खाड़ी क्षेत्र के पुल कई देशों के बीच व्यापार और लॉजिस्टिक्स की लाइफलाइन माने जाते हैं।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि वह पीछे हटने वाला नहीं है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने दो टूक कहा है कि जब तक अमेरिका और इजरायल अपने “हमलों पर पछतावा” नहीं जताते, तब तक जंग जारी रहेगी। चीन के विदेश मंत्री वांग यी से फोन पर बातचीत में अराघची ने कहा कि ईरान अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा आखिरी दम तक करेगा। उन्होंने तेहरान के सिविल और डिफेंस ठिकानों पर हुए हमलों को क्षेत्रीय अस्थिरता की असली वजह बताया। IRGC का पलटवार: इजरायल पर ताबड़तोड़ हमले जमीनी स्तर पर संघर्ष और तेज हो गया है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने इजरायल के कई अहम ठिकानों को निशाना बनाया है। खैबर शिकन, इमाद और सज्जील जैसी बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल कामिकाज़े ड्रोन से हमले तेल अवीव, रामत गन और नेगेव के सैन्य केंद्र टारगेट बीरशेबा में लॉजिस्टिक और कमांड हेडक्वार्टर पर सीधा प्रहार ईरान का दावा है कि इन हमलों ने इजरायल के एयर डिफेंस सिस्टम को भी भेद दिया। ट्रंप का बड़ा बयान: “ईरान में बदलाव, जल्द होगी डील” इन हमलों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चौंकाने वाला दावा किया है। ट्रंप के मुताबिक: ईरान में “नई लीडरशिप” आ चुकी है पुरानी व्यवस्था और खामेनेई अब सीन से बाहर अमेरिका की बातचीत “सही लोगों” से जारी ईरान ने तेल-गैस से जुड़ा बड़ा “तोहफा” दिया ईरान की नेवी और एयरफोर्स लगभग खत्म ट्रंप ने कहा कि अब ईरान के पास बातचीत के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। अंतरराष्ट्रीय कानून पर ईरान का हमला अराघची ने पश्चिमी देशों पर “डबल स्टैंडर्ड” अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि: यूक्रेन और गाजा के मामलों में अलग-अलग नियम अपनाए जा रहे हैं इससे अंतरराष्ट्रीय कानून कमजोर हो रहा है हालांकि, उन्होंने जर्मनी के राष्ट्रपति फ्रैंक-वाल्टर स्टाइनमीयर की सराहना की, जिन्होंने अमेरिकी और इजरायली हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया। रूस की चेतावनी: न्यूक्लियर खतरा बढ़ा रूस ने भी इस तनाव पर चिंता जताई है। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने बुशहर न्यूक्लियर प्लांट के पास हो रहे हमलों को बेहद खतरनाक बताया। रूस के मुताबिक: न्यूक्लियर ठिकानों को नुकसान हुआ तो बड़ा पर्यावरणीय संकट हो सकता है यह पूरे क्षेत्र के लिए विनाशकारी साबित होगा
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।