मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका के साथ युद्धविराम (ceasefire) बातचीत के लिए कड़ी शर्तें रख दी हैं। तेहरान ने साफ कहा है कि जब तक खाड़ी क्षेत्र (Gulf) में मौजूद सभी अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद नहीं किया जाता और उस पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध (sanctions) पूरी तरह नहीं हटाए जाते, तब तक वह किसी समझौते के लिए तैयार नहीं होगा। ईरान की मुख्य मांगें ईरान ने बातचीत से पहले कई अहम शर्तें सामने रखी हैं: खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य बेस पूरी तरह बंद किए जाएं ईरान पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएं युद्ध के दौरान हुए नुकसान के लिए वित्तीय मुआवजा दिया जाए हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर ईरान का अधिक नियंत्रण हो इस जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों से फीस वसूली का अधिकार भविष्य में किसी भी हमले को रोकने के लिए ठोस सुरक्षा गारंटी सख्ती के बीच नरमी के संकेत हालांकि सार्वजनिक तौर पर ईरान कड़ा रुख दिखा रहा है, लेकिन अंदरखाने कुछ लचीलापन भी दिख रहा है: 5 साल के लिए बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम रोकने पर विचार यूरेनियम संवर्धन (enrichment) कम करने की संभावना IAEA को सेंट्रीफ्यूज निरीक्षण की अनुमति 60% समृद्ध यूरेनियम के स्टॉक पर बातचीत की तैयारी हिज़्बुल्लाह, हमास जैसे प्रॉक्सी समूहों से समर्थन खत्म करने पर चर्चा ट्रंप के शांति प्रस्ताव पर शक अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पेश किए गए 15-सूत्रीय शांति प्रस्ताव पर भी ईरान ने अविश्वास जताया है। ईरान का कहना है कि पहले भी कई बार बातचीत के बीच हमले हुए हैं, इसलिए वह “फिर से धोखा” नहीं खाना चाहता। क्यों है अविश्वास? पिछले साल जून में, परमाणु वार्ता से ठीक पहले इजरायल ने US समर्थन से हमला किया हाल ही में जेनेवा में बातचीत के बाद भी सैन्य कार्रवाई जारी रही कैसे शुरू हुआ युद्ध? ईरान-इजरायल-अमेरिका के बीच यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ, जब एक संयुक्त US-इजरायल हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और कई बड़े अधिकारी मारे गए। इसके जवाब में ईरान ने: इराक, कतर, UAE, बहरीन, कुवैत और सऊदी अरब में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए भारी नुकसान ईरान में अब तक 2300 से ज्यादा लोगों की मौत इनमें 1300 से अधिक नागरिक करीब 200 बच्चे (12 साल से कम उम्र) भी शामिल
मध्य-पूर्व में जारी भीषण संघर्ष अब और खतरनाक मोड़ ले चुका है। ईरान और इजरायल के बीच चल रही जंग 19वें दिन में प्रवेश कर चुकी है, और हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। ईरान ने अपने शीर्ष नेताओं की मौत के बाद पहले शोक मनाया, लेकिन अब वह पूरी ताकत से जवाबी कार्रवाई में जुट गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने इजरायल पर क्लस्टर बम और मल्टी-वॉरहेड मिसाइलों से ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए हैं। नेताओं की मौत के बाद बदले की कार्रवाई तेहरान में हाल ही में हुए इजरायली हमले में ईरान के सुरक्षा प्रमुख अली लारिजानी और बसीज बलों के कमांडर गुलारजा सुलेमानी की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद पूरे तेहरान में शोक की लहर दौड़ गई। लेकिन कुछ ही समय में ईरान ने बदले की कसम खाते हुए इजरायल पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू कर दिए। क्लस्टर बम और मिसाइलों से हमला ईरान ने अपने हमलों में क्लस्टर बम और मल्टी वॉरहेड मिसाइलों का इस्तेमाल किया है, जिन्हें अत्यधिक विनाशकारी माना जाता है। इन हथियारों के इस्तेमाल से नागरिक इलाकों में भारी नुकसान की आशंका बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के हमले युद्ध को और व्यापक और खतरनाक बना सकते हैं। क्षेत्रीय तनाव: कई देशों में हमले और धमाके संघर्ष का असर अब पूरे मध्य-पूर्व में फैलता नजर आ रहा है: सऊदी अरब में प्रिंस सुल्तान एयरबेस के पास बैलिस्टिक मिसाइल को इंटरसेप्ट किया गया दुबई और दोहा में धमाकों की खबरें बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास पर ड्रोन हमला लेबनान में हिज्बुल्लाह और इजरायल के बीच हिंसक झड़पें इन घटनाओं से साफ है कि यह युद्ध अब एक बड़े क्षेत्रीय संकट में बदलता जा रहा है। अमेरिका और NATO के बीच मतभेद इस युद्ध में अमेरिका को अपेक्षित अंतरराष्ट्रीय समर्थन नहीं मिल पा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने NATO देशों पर सहयोग न करने को लेकर नाराजगी जताई है। इस बीच तेल की कीमतों में हल्की गिरावट दर्ज की गई है, जो वैश्विक बाजार में अनिश्चितता को दर्शाता है। बढ़ती मौतें और मानवीय संकट संयुक्त राष्ट्र में ईरान के राजदूत के अनुसार, अमेरिका-इजरायल हमलों में 1300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कुछ स्वतंत्र रिपोर्ट्स में यह आंकड़ा 1800 के पार बताया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर भी इस बढ़ते मानवीय संकट को लेकर चिंता जताई जा रही है। कूटनीतिक प्रयासों को झटका इसी बीच खबर है कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े मोजतबा खामेनेई ने अमेरिका के साथ किसी भी समझौते से इनकार कर दिया है। दो देशों द्वारा मध्यस्थता के प्रयास भी फिलहाल विफल होते नजर आ रहे हैं, जिससे युद्ध के जल्द खत्म होने की संभावना कम हो गई है। क्या और भड़केगा युद्ध? ईरान की आक्रामक प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय विस्तार के संकेत बताते हैं कि यह संघर्ष अब और लंबा और खतरनाक हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जल्द कूटनीतिक समाधान नहीं निकला, तो यह युद्ध पूरे मध्य-पूर्व को अपनी चपेट में ले सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया है कि उनके आदेश पर अमेरिकी सेना ने मध्य पूर्व के इतिहास के सबसे शक्तिशाली हवाई हमलों में से एक को अंजाम देते हुए ईरान के रणनीतिक रूप से बेहद अहम Kharg Island पर मौजूद सभी सैन्य ठिकानों को तबाह कर दिया है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर लिखा कि “मानवीय और नैतिक कारणों से” उन्होंने फिलहाल इस द्वीप के तेल ढांचे को निशाना नहीं बनाने का फैसला किया है। क्यों अहम है खार्ग द्वीप Kharg Island को ईरान की अर्थव्यवस्था की ‘लाइफ़लाइन’ माना जाता है। यह द्वीप ईरान के सबसे बड़े तेल भंडारण और निर्यात केंद्रों में से एक है और देश के करीब 90 प्रतिशत कच्चे तेल का निर्यात यहीं से होता है। इसलिए किसी भी सैन्य कार्रवाई या संभावित कब्जे को ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। युद्ध के बीच तेल ठिकाने निशाने पर Israel, United States और Iran के बीच बढ़ते तनाव के बीच पूरे मध्य पूर्व में तेल रिफाइनरियां और भंडारण टैंक हमलों का निशाना बन रहे हैं। इज़राइली सेना पहले ही Tehran के रेय, शहरान और अकदसियेह इलाकों के तेल डिपो और Karaj शहर के फरदिस क्षेत्र में हमले कर चुकी है। इज़राइल का कहना है कि इन स्थानों का इस्तेमाल ईरानी सरकार सैन्य ईंधन भंडारण के लिए कर रही थी। ईरान की जवाबी कार्रवाई दूसरी ओर Iran ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए फारस की खाड़ी के कई देशों में रिफाइनरियों और तेल डिपो को निशाना बनाया है। ऐसे में खार्ग द्वीप पर हमले के बाद यह अटकलें तेज हो गई हैं कि अमेरिका भविष्य में इस द्वीप पर कब्जा करने की रणनीति अपना सकता है। पहले भी उठ चुका है मुद्दा इज़राइल के पूर्व प्रधानमंत्री Yair Lapid ने भी पहले कहा था कि खार्ग द्वीप पर मौजूद ईरान के तेल ढांचे को नष्ट करना उसकी अर्थव्यवस्था को गंभीर झटका दे सकता है। वहीं अमेरिकी रिपब्लिकन सीनेटर Lindsey Graham ने कहा कि ईरान की तेल अर्थव्यवस्था इस संघर्ष में अहम भूमिका निभा सकती है और रणनीतिक लक्ष्यों का चयन सावधानी से किया जाना चाहिए। कब्जे की संभावना पर चर्चा समाचार वेबसाइट Axios की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी अधिकारियों के बीच खार्ग द्वीप पर कब्जे की संभावना पर भी चर्चा हुई है। पेंटागन के पूर्व वरिष्ठ सलाहकार Michael Rubin का मानना है कि यदि अमेरिका ईरान पर दबाव और बढ़ाना चाहता है, तो खार्ग द्वीप पर कब्जा करना ईरानी शासन को उसके सबसे बड़े वित्तीय स्रोत से वंचित कर सकता है।
मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध अब और गंभीर होता जा रहा है। Iran और Israel के बीच चल रहे संघर्ष का 11वां दिन है, लेकिन हालात शांत होने के बजाय और ज्यादा तनावपूर्ण होते जा रहे हैं। लगातार हो रहे हमलों और जवाबी कार्रवाई के कारण पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ गई है, जबकि इस युद्ध का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजारों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी साफ दिखाई देने लगा है। इस बीच Iran ने एक बड़ा बयान देते हुए चेतावनी दी है कि अगर तनाव इसी तरह जारी रहा तो हॉर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आपूर्ति पूरी तरह रोक दी जाएगी। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि “हॉर्मुज से एक लीटर तेल भी नहीं जाने दिया जाएगा।” तेहरान में धमाके, ईरान का जवाबी हमला रिपोर्टों के मुताबिक ईरान की राजधानी तेहरान में कई जोरदार धमाकों की आवाजें सुनी गईं। इसके जवाब में ईरान ने भी इजराइल की ओर मिसाइलें दागने का दावा किया है। यह हमला उस समय हुआ जब हाल ही में देश में नेतृत्व परिवर्तन के बाद Mojtaba Khamenei को नया सुप्रीम लीडर बनाए जाने की खबर सामने आई। वह पूर्व सुप्रीम लीडर Ali Khamenei के बेटे हैं। दूसरी ओर इजराइली सेना ने कहा कि उसने ईरान के कई रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाते हुए जवाबी हमले किए हैं। इनमें मिसाइल लॉन्च साइट्स और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े कमांड सेंटर शामिल बताए गए हैं। लेबनान और कतर तक पहुंचा तनाव संघर्ष का असर अब पड़ोसी देशों तक भी फैलता दिख रहा है। Lebanon की राजधानी क्षेत्र में भी तनाव बढ़ गया है, जहां इजराइल ने बेरूत के दक्षिणी इलाकों पर हवाई हमले किए। इन इलाकों को Hezbollah से जुड़े ठिकानों के रूप में देखा जाता है। वहीं Qatar की राजधानी दोहा में भी धमाकों की खबरें सामने आईं। कतर के अधिकारियों ने बताया कि सोशल मीडिया पर भ्रामक जानकारी और तस्वीरें फैलाने के आरोप में 300 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है। मानवाधिकार संगठन Human Rights Watch ने आरोप लगाया है कि दक्षिणी लेबनान के रिहायशी इलाकों में इजराइल द्वारा व्हाइट फॉस्फोरस का इस्तेमाल किया गया, जो अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन माना जाता है। वैश्विक बाजारों पर असर इस युद्ध का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी पड़ रहा है। तनाव बढ़ने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई है। वहीं यूरोप में प्राकृतिक गैस की कीमतों में भी तेज उछाल देखा गया है। तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका के चलते एशिया और यूरोप के कई प्रमुख शेयर बाजारों में गिरावट दर्ज की गई है। खाड़ी देशों में भी बढ़ी सतर्कता इस संघर्ष के बीच Saudi Arabia ने बताया कि उसने शायबह तेल क्षेत्र की ओर बढ़ रहे एक ड्रोन को मार गिराया। वहीं Bahrain ने भी ईरानी हमलों के बाद अपने ऊर्जा ढांचे को नुकसान पहुंचने की जानकारी दी है। ट्रंप-पुतिन की बातचीत इस बीच युद्ध को लेकर कूटनीतिक स्तर पर भी गतिविधियां तेज हो गई हैं। Donald Trump और Vladimir Putin के बीच करीब एक घंटे तक फोन पर बातचीत हुई। रूस की ओर से इस युद्ध को रोकने के लिए कुछ संभावित प्रस्तावों पर चर्चा की गई और साथ ही मिडिल ईस्ट में बढ़ते ऊर्जा संकट को लेकर भी चेतावनी दी गई। फिलहाल हालात ऐसे हैं कि युद्ध के जल्द खत्म होने के संकेत दिखाई नहीं दे रहे हैं। लगातार बढ़ती सैन्य गतिविधियों और कूटनीतिक बयानबाजी के बीच पूरी दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या आने वाले दिनों में इस संघर्ष का कोई राजनीतिक या कूटनीतिक समाधान निकल पाएगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।