Israel News

Israeli and Lebanese flags with diplomatic officials after the announcement of a US-mediated peace framework aimed at restoring security along the Israel-Lebanon border.
इजरायल-लेबनान के बीच शांति की नई पहल, अमेरिका ने कराया समझौता; हिज्बुल्लाह ने दी गृहयुद्ध जैसी स्थिति की चेतावनी

  यरुशलम/बेरूत: मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी संघर्ष को खत्म करने की दिशा में अमेरिका की मध्यस्थता से इजरायल और लेबनान के बीच एक महत्वपूर्ण फ्रेमवर्क समझौता तैयार किया गया है। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच स्थायी शांति और सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था बहाल करना है। समझौते की घोषणा के तुरंत बाद हिज्बुल्लाह ने इसका कड़ा विरोध करते हुए चेतावनी दी है कि यदि इसे लागू करने की कोशिश की गई तो लेबनान गृहयुद्ध जैसी स्थिति की ओर बढ़ सकता है। अमेरिका ने किया समझौते का ऐलान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने शुक्रवार को इस फ्रेमवर्क समझौते की घोषणा करते हुए कहा कि यह इजरायल और लेबनान के बीच स्थायी शांति की दिशा में पहला बड़ा कदम है। उन्होंने बताया कि अमेरिका ने पूरे समझौते में मध्यस्थ और सहयोगी की भूमिका निभाई है। इस समझौते पर लेबनान की राजदूत नादा हमादेह, इजरायल के राजदूत येचिएल लेइटर और अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारियों ने हस्ताक्षर किए। क्या हैं समझौते की प्रमुख शर्तें? समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान में तत्काल युद्धविराम लागू करने और हिज्बुल्लाह द्वारा सभी तरह की सैन्य गतिविधियां एवं रॉकेट हमले रोकने की शर्त रखी गई है। इसके साथ ही संगठन को दक्षिणी लेबनान से पीछे हटना होगा। जिन इलाकों से इजरायली सेना और हिज्बुल्लाह पीछे हटेंगे, वहां लेबनानी सेना की तैनाती की जाएगी ताकि सीमा क्षेत्र में स्थायी सुरक्षा व्यवस्था स्थापित की जा सके। अमेरिका करेगा निगरानी, लेबनान को मिलेगी आर्थिक सहायता मार्को रुबियो ने बताया कि समझौते के क्रियान्वयन की निगरानी अमेरिका की अगुवाई में बनाए गए त्रिपक्षीय सैन्य समन्वय समूह द्वारा की जाएगी। इसके अलावा अमेरिका ने लेबनान के लिए तत्काल 10 करोड़ डॉलर की मानवीय सहायता देने की घोषणा की है। साथ ही लेबनानी सशस्त्र बलों को मजबूत करने और सरकारी नियंत्रण बढ़ाने के लिए 3 करोड़ डॉलर से अधिक की अतिरिक्त सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी। दक्षिणी लेबनान में बनाए जाएंगे दो पायलट जोन समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान में दो पायलट सुरक्षा क्षेत्र विकसित किए जाएंगे। इन क्षेत्रों से इजरायली सेना चरणबद्ध तरीके से पीछे हटेगी और उनकी जगह लेबनानी सेना तैनात होगी। इजरायल ने स्पष्ट किया है कि सेना की पूरी वापसी तभी होगी जब हिज्बुल्लाह अपने हथियार छोड़ेगा और उसका सैन्य ढांचा पूरी तरह समाप्त होगा। लेबनान ने बताया संप्रभुता बहाल करने की दिशा में बड़ा कदम अमेरिका में लेबनान की राजदूत नादा हमादेह ने इस समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि इससे लेबनान की संप्रभुता मजबूत होगी, सीमा पर संघर्ष समाप्त होगा और विस्थापित नागरिक अपने घर लौट सकेंगे। उन्होंने इस पहल का श्रेय लेबनान के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सशस्त्र बलों के सहयोग को दिया। नेतन्याहू बोले- हिज्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण पर निर्भर करेगी आगे की कार्रवाई इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि लेबनानी सेना जल्द ही सीमावर्ती इलाकों का नियंत्रण संभालेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इजरायली सेना की आगे की वापसी पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगी कि लेबनानी सेना हिज्बुल्लाह को हथियार छोड़ने और उसके सैन्य ढांचे को खत्म करने में कितनी सफल रहती है। इजरायल के राजदूत येचिएल लेइटर ने भी इस समझौते को "परफॉर्मेंस आधारित" बताते हुए कहा कि इसकी सफलता पूरी तरह जमीनी स्तर पर लागू होने वाले कदमों पर निर्भर करेगी। हिज्बुल्लाह ने किया समझौते का विरोध समझौते की घोषणा के तुरंत बाद हिज्बुल्लाह ने इसका कड़ा विरोध किया। संगठन के वरिष्ठ सांसद हसन फदलल्लाह ने कहा कि यदि लेबनानी सरकार अमेरिकी समर्थन के साथ इस समझौते को लागू करने की कोशिश करती है तो देश गृहयुद्ध जैसी स्थिति में पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि हिज्बुल्लाह किसी भी कीमत पर अपने हथियार नहीं छोड़ेगा और इस दिशा में किए जाने वाले हर प्रयास का विरोध करेगा। हजारों लोगों की जान ले चुका है संघर्ष इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच मौजूदा संघर्ष में अब तक भारी जनहानि हो चुकी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजरायली सैन्य कार्रवाई में 4,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 10 लाख से ज्यादा लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। वहीं संघर्ष के दौरान 37 इजरायली सैनिकों के भी मारे जाने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में यह समझौता क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है, हालांकि हिज्बुल्लाह के विरोध के चलते इसके सफल क्रियान्वयन को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।  

Deepshikha जून 27, 2026 0
Israeli military vehicles near the southern Lebanon border amid ongoing tensions despite ceasefire efforts.
अमेरिकी दावे से बढ़ी हलचल: दक्षिणी लेबनान के कुछ इलाकों से पीछे हटा इज़राइल! लोगों में अब भी डर और अनिश्चितता

  Israel-Lebanon Conflict: दक्षिणी लेबनान में इज़राइल की सैन्य मौजूदगी को लेकर एक नया दावा सामने आने के बाद क्षेत्र में हलचल तेज हो गई है। एक अमेरिकी अधिकारी ने दावा किया है कि इज़राइल ने दक्षिणी लेबनान के कुछ कब्जे वाले इलाकों से अपनी सेना हटा ली है। लेबनान के अधिकारियों ने इस दावे की पुष्टि करने से इनकार किया है। ऐसे में सीमा पर हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं और विस्थापित नागरिक अपने घर लौटने का इंतजार कर रहे हैं। अमेरिकी अधिकारी का दावा, लेबनान ने नहीं की पुष्टि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि इज़राइली सेना दक्षिणी लेबनान के कुछ इलाकों से पीछे हट चुकी है और अब वहां सुरक्षा की जिम्मेदारी लेबनानी सेना को संभालनी चाहिए। यह दावा ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिका क्षेत्रीय तनाव कम करने के लिए लगातार कूटनीतिक प्रयास कर रहा है। लेबनान के एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि दक्षिणी लेबनान में इज़राइल द्वारा बनाए गए तथाकथित "बफर जोन" से सेना हटने की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। युद्धविराम के बावजूद सीमा पर तनाव कायम इज़राइल और हिज्बुल्लाह के बीच लंबे समय से जारी संघर्ष के बीच कई बार युद्धविराम की घोषणा की गई, लेकिन सीमा पर तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। हाल के महीनों में छिटपुट घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। फिलहाल अमेरिका की मध्यस्थता से क्षेत्र में तनाव कम करने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात अब भी सामान्य नहीं हो पाए हैं। ईरान और हिज्बुल्लाह की स्पष्ट शर्त ईरान ने कहा है कि किसी भी व्यापक शांति समझौते में लेबनान की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और इज़राइल को दक्षिणी लेबनान से पूरी तरह सेना हटानी होगी। वहीं, हिज्बुल्लाह ने भी स्पष्ट किया है कि वह अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में किसी भी तरह की इज़राइली सैन्य मौजूदगी स्वीकार नहीं करेगा और कब्जे का विरोध जारी रखेगा। घर लौटने का इंतजार कर रहे हजारों विस्थापित दक्षिणी लेबनान के कई गांव युद्ध के दौरान भारी तबाही का शिकार हुए हैं। बड़ी संख्या में लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए थे और अब भी सुरक्षित वापसी का इंतजार कर रहे हैं। दिब्बीन गांव की निवासी मिलिया अल-शेख ने बताया कि उनका घर अब भी बंद सैन्य क्षेत्र में है। गांव तक जाने वाले रास्तों पर कंटीले तार लगे हैं और आम नागरिकों की आवाजाही प्रतिबंधित है। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि उन्हें अपने घर की मौजूदा स्थिति तक की जानकारी नहीं है। स्थायी शांति पर टिकी दुनिया की नजर दक्षिणी लेबनान में हालात को लेकर अब भी असमंजस बना हुआ है। एक ओर सेना हटने के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन इसकी पुष्टि नहीं कर रहा। ऐसे में क्षेत्र के हजारों विस्थापित लोगों की सुरक्षित वापसी और स्थायी शांति को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर आने वाले घटनाक्रम पर टिकी हुई है।  

Deepshikha जून 26, 2026 0
Smoke rises over southern Lebanon after Israeli airstrikes as Hezbollah and Israeli forces exchange attacks amid escalating regional tensions.
Israel-Hezbollah Conflict: लेबनान में इजरायली हमले तेज, 18 लोगों की मौत; ईरान-अमेरिका वार्ता टली

  बेरूत/तेल अवीव: इजराइल और हिजबुल्ला के बीच तनाव एक बार फिर हिंसक टकराव में बदल गया है। इजरायली सेना ने शुक्रवार (19 जून) को दक्षिणी लेबनान और पूर्वी बेका घाटी में हिजबुल्ला के ठिकानों पर रातभर हवाई हमले किए, जबकि जवाबी कार्रवाई में हिजबुल्ला ने इजरायली सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। संघर्ष में अब तक कम से कम 18 लोगों की मौत की खबर है, जबकि कई अन्य घायल बताए जा रहे हैं। लेबनान की सरकारी समाचार एजेंसी नेशनल न्यूज एजेंसी (NNA) के अनुसार, इजरायली हवाई हमलों में मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है, क्योंकि कई इलाकों में राहत और बचाव अभियान जारी है। वहीं, इजराइल ने कहा है कि उसकी सैन्य कार्रवाई अभी समाप्त नहीं हुई है और हिजबुल्ला के सैन्य ढांचे को निशाना बनाया जा रहा है। इजराइल के चार सैनिक भी मारे गए इजराइली सेना के मुताबिक, दक्षिणी लेबनान में जारी संघर्ष के दौरान एक लेफ्टिनेंट कर्नल समेत चार सैनिक मारे गए हैं। इसके अलावा एक विस्फोटक ड्रोन हमले में पांच सैनिक घायल हुए हैं, जिनका इलाज किया जा रहा है। बेका घाटी में भी सैन्य कार्रवाई दक्षिणी लेबनान के अलावा इजरायली सेना ने पूर्वी बेका घाटी में भी कई ठिकानों पर हमले किए। सेना का कहना है कि इन हमलों का उद्देश्य हिजबुल्ला की सैन्य क्षमताओं और बुनियादी ढांचे को कमजोर करना है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट किया है कि जब तक हिजबुल्ला से उत्पन्न खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता, तब तक इजरायली सेना लेबनान में अपनी कार्रवाई जारी रखेगी। ईरान-अमेरिका वार्ता स्थगित इजराइल-हिजबुल्ला संघर्ष के बीच शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित ईरान-अमेरिका वार्ता को स्थगित कर दिया गया है। इस बैठक में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के शामिल होने की संभावना थी। क्षेत्रीय अधिकारियों के अनुसार, मध्यस्थ नई तारीख तय करने और वार्ता प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के प्रयास कर रहे हैं। मौजूदा हालात ने हाल ही में हुए ईरान-अमेरिका प्रारंभिक युद्धविराम समझौते के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। युद्धविराम समझौते पर संकट हालिया समझौते में लेबनान समेत सभी मोर्चों पर तत्काल सैन्य कार्रवाई रोकने और क्षेत्रीय अखंडता एवं संप्रभुता का सम्मान करने की प्रतिबद्धता जताई गई थी। लेकिन जमीनी हालात इस समझौते की भावना के विपरीत दिखाई दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लेबनान में हिंसा नहीं थमी, तो पश्चिम एशिया में तनाव कम करने की कूटनीतिक कोशिशों को बड़ा झटका लग सकता है। हॉर्मुज जलमार्ग खुलने से राहत इस बीच, ईरान और अमेरिका के बीच हुए प्रारंभिक समझौते के बाद हॉर्मुज जलमार्ग अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए फिर से खुल गया है। इससे वैश्विक तेल आपूर्ति को राहत मिली है। युद्ध के दौरान इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर बढ़े तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता पैदा हो गई थी। इजराइल-हिजबुल्ला के बीच फिर बढ़ते संघर्ष ने पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की संभावनाओं को एक बार फिर अनिश्चितता के दौर में पहुंचा दिया है।  

Deepshikha जून 20, 2026 0
US Vice President JD Vance speaks on diplomacy and Middle East security amid criticism of the America-Iran agreement from Israeli leaders.
‘हर समस्या का हल युद्ध नहीं’, जेडी वेंस ने इजराइल को दिया दो टूक संदेश; अमेरिका-ईरान समझौते का किया बचाव

  वॉशिंगटन/तेल अवीव: अमेरिका-ईरान समझौते को लेकर इजराइली नेताओं की लगातार आलोचना के बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजराइल को स्पष्ट संदेश दिया है कि हर क्षेत्रीय और राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती का समाधान केवल सैन्य ताकत या युद्ध के जरिए नहीं निकाला जा सकता। उन्होंने कहा कि दीर्घकालिक समस्याओं के समाधान के लिए बातचीत, कूटनीति और राजनीतिक प्रयासों पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है। अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में वेंस ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान नीति और हालिया अमेरिका-ईरान समझौते का बचाव करते हुए इजराइली नेतृत्व से अमेरिका के कूटनीतिक प्रयासों का समर्थन करने की अपील की। ‘हर समस्या का समाधान लोगों को मारकर नहीं निकाला जा सकता’ जेडी वेंस ने कहा कि इजराइल को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौतियों के समाधान के लिए केवल सैन्य अभियानों और हमलों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उन्होंने कहा, “आप सिर्फ 90 लाख की आबादी वाला देश हैं। आप अपनी हर राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती का समाधान केवल लोगों को मारकर या सैन्य कार्रवाई के जरिए नहीं निकाल सकते।” वेंस ने संकेत दिया कि सुरक्षा संबंधी जटिल समस्याओं के समाधान के लिए कूटनीतिक संवाद और राजनीतिक समझौते जैसे विकल्पों को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इजराइली नेताओं की आलोचना के बीच आया बयान जेडी वेंस की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री और इजराइल के राजनीतिक नेता अमेरिका-ईरान समझौते पर लगातार सवाल उठा रहे हैं। इजराइली नेतृत्व का आरोप है कि इस समझौते में: ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर पर्याप्त नियंत्रण की व्यवस्था नहीं है। बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से सीमित नहीं किया गया है। लेबनान में हिज्बुल्लाह के खिलाफ इजराइल की सैन्य कार्रवाई की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। अमेरिका की नीति का किया बचाव वेंस ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीति का उद्देश्य पश्चिम एशिया में तनाव कम करना और संघर्ष के स्थायी समाधान की दिशा में आगे बढ़ना है। उन्होंने कहा कि अमेरिका कूटनीतिक माध्यमों से क्षेत्रीय स्थिरता स्थापित करने का प्रयास कर रहा है और सहयोगी देशों से भी इसी दिशा में रचनात्मक समर्थन की अपेक्षा रखता है। उन्होंने इशारों में यह भी कहा कि अमेरिका की नीतियों की सार्वजनिक आलोचना करने के बजाय इजराइल को अपने सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी के साथ समन्वय बढ़ाने की जरूरत है। पश्चिम एशिया की राजनीति में बढ़ सकती है नई बहस विशेषज्ञों का मानना है कि जेडी वेंस का बयान अमेरिका और इजराइल के बीच ईरान नीति को लेकर उभरते मतभेदों को सार्वजनिक रूप से सामने लाता है। अमेरिका जहां कूटनीतिक समाधान और क्षेत्रीय तनाव कम करने पर जोर दे रहा है, वहीं इजराइल ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमताओं को लेकर अपनी सुरक्षा चिंताओं को प्रमुखता दे रहा है। अमेरिका-ईरान समझौते पर जारी बहस आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की रणनीतिक राजनीति और अमेरिका-इजराइल संबंधों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।  

Deepshikha जून 19, 2026 0
Israeli leaders oppose the proposed US-Iran peace deal as Donald Trump announces a breakthrough agreement in the Middle East.
US-Iran Peace Deal: अमेरिका-ईरान शांति समझौते से इजरायल नाराज, बोला- हम इसका हिस्सा नहीं; ट्रंप के सामने नई कूटनीतिक चुनौती

  नई दिल्ली/तेल अवीव: अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते की घोषणा के बाद पश्चिम एशिया की राजनीति में नया भूचाल आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा समझौते को अंतिम रूप दिए जाने की घोषणा के कुछ घंटों के भीतर ही इजरायल ने इसका विरोध शुरू कर दिया। इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर और विपक्षी नेता बेनी गैंट्ज ने समझौते पर गंभीर आपत्तियां जताते हुए स्पष्ट कर दिया कि इजरायल अपनी सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि अमेरिका की मध्यस्थता में हुआ कोई भी समझौता इजरायल पर बाध्यकारी नहीं है। उन्होंने कहा, "इजरायल एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र है। हमारी पहली जिम्मेदारी इजरायल के नागरिकों, इजरायली रक्षा बलों (आईडीएफ) और यहूदी समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।" 'इजरायल कोई बनाना रिपब्लिक नहीं' बेन-गवीर ने कहा कि इतिहास गवाह है कि जब-जब इजरायल ने अंतरराष्ट्रीय दबाव में सुरक्षा समझौते किए, तब उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी। उन्होंने ओस्लो समझौते, 2006 के लेबनान युद्धविराम और गाजा संघर्ष विराम के उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे समझौतों का परिणाम अक्सर नई हिंसा के रूप में सामने आया है। उन्होंने कहा, "हम अमेरिका और राष्ट्रपति ट्रंप का सम्मान करते हैं, लेकिन इजरायल कोई बनाना रिपब्लिक नहीं है। देश के सुरक्षा संबंधी फैसले केवल इजरायल के हितों को ध्यान में रखकर लिए जाएंगे।" हिज्बुल्लाह के खिलाफ सख्त रुख बेन-गवीर ने मांग की कि लेबनान में हिज्बुल्लाह के सैन्य ढांचे को पूरी तरह समाप्त किया जाए और जिन क्षेत्रों को इजरायली सेना ने आतंकवादी गतिविधियों से मुक्त कराया है, वहां से सेना को पीछे नहीं हटना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि लेबनान से इजरायल की ओर कोई ड्रोन या मिसाइल दागी जाती है तो उसका जवाब दाहिया समेत अन्य ठिकानों पर कड़ी सैन्य कार्रवाई के रूप में दिया जाएगा। विपक्षी नेता बेनी गैंट्ज ने भी उठाए सवाल इजरायल के पूर्व रक्षा मंत्री और विपक्षी नेता बेनी गैंट्ज ने भी समझौते पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता जो लेबनान में इजरायल की सैन्य कार्रवाई की स्वतंत्रता को सीमित करता हो। गैंट्ज ने कहा, "ईरान के साथ उभरता यह समझौता एक रणनीतिक विफलता साबित हो सकता है। इसके कारण आने वाले वर्षों में इजरायल को कूटनीतिक, सैन्य और कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।" ट्रंप ने किया था समझौते का ऐलान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर अमेरिका और ईरान के बीच समझौता होने की घोषणा करते हुए कहा था, "इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के साथ समझौता पूरा हो चुका है। सभी को बधाई।" ट्रंप ने यह भी कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य को वाणिज्यिक जहाजों के लिए तत्काल प्रभाव से खोला जाएगा और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाई जाएगी, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद है। 19 जून को हो सकते हैं औपचारिक हस्ताक्षर रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर हो सकते हैं। समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही बहाल करने, क्षेत्रीय तनाव कम करने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम के भविष्य को लेकर आगे की बातचीत का ढांचा तय किया जाएगा। क्या ट्रंप के लिए बढ़ेगी मुश्किल? विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता पश्चिम एशिया में तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, लेकिन इजरायल की खुली नाराजगी ने नई कूटनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। यदि इजरायल समझौते के कुछ प्रावधानों को मानने से इनकार करता है, तो क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करना आसान नहीं होगा और अमेरिकी प्रशासन को अपने दो प्रमुख सहयोगियों के बीच संतुलन बनाने की कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ सकता है।  

Deepshikha जून 16, 2026 0
Benjamin Netanyahu reacts amid reports of a US-Iran peace deal and diplomatic negotiations
ट्रंप-ईरान समझौते से क्या नाराज़ हैं नेतन्याहू? रिपोर्ट में बड़ा दावा, अमेरिका-इजरायल रिश्तों में दरार के संकेत

ईरान पर हमले रोकने के फैसले से चौंके नेतन्याहू अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की खबरों के बीच एक नई रिपोर्ट ने पश्चिम एशिया की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu को उस समय बड़ा झटका लगा जब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान पर प्रस्तावित सैन्य हमले रोकने और कूटनीतिक रास्ता अपनाने का फैसला किया। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रंप ने यह फैसला तब लिया जब उन्हें संकेत मिले कि ईरानी नेतृत्व युद्ध समाप्त करने के लिए तैयार किए गए एक प्रारूप समझौते पर सहमत हो गया है। बताया जा रहा है कि नेतन्याहू को इस बातचीत की पूरी जानकारी नहीं थी और वे अमेरिकी प्रशासन के करीबी लोगों से इसके बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहे थे। क्या इजरायल को वार्ता से दूर रखा गया? सूत्रों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में इजरायल सीधे तौर पर शामिल नहीं है। जब ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ईरान के साथ समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, तो इजरायल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने स्पष्ट किया कि वह इस प्रस्तावित समझौते का हिस्सा नहीं है। यही कारण है कि यह सवाल उठने लगा है कि क्या क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर इजरायल को वार्ता प्रक्रिया से अलग रखा गया। 'इस्लामाबाद समझौता' बन सकता है नया मोड़ रिपोर्ट्स के मुताबिक, कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता में तैयार किए जा रहे इस समझौते को "इस्लामाबाद एग्रीमेंट" नाम दिया जा सकता है। प्रस्तावित समझौते में कई अहम बिंदु शामिल हैं। इसके तहत Strait of Hormuz को तुरंत फिर से खोलने, समुद्री व्यापार सामान्य करने, ईरान को सीमित प्रतिबंध राहत देने और 60 दिनों के युद्धविराम को आगे बढ़ाने जैसे प्रावधान शामिल बताए जा रहे हैं। इस दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी आगे बातचीत हो सकती है। इजरायल की शर्तें अब भी सख्त नेतन्याहू लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने की मांग करते रहे हैं। इजरायल चाहता है कि ईरान अपने समृद्ध यूरेनियम भंडार को हटाए, परमाणु संवर्धन ढांचे को खत्म करे, मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाए और क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों को समर्थन देना बंद करे। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित समझौते में इजरायल की इन मांगों को कितना स्थान मिला है। ट्रंप और नेतन्याहू के बीच बढ़ रही दूरी? रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि हाल के दिनों में ट्रंप और नेतन्याहू के संबंधों में तनाव बढ़ा है। दोनों नेताओं की रणनीति में बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। जहां ट्रंप युद्ध को जल्द समाप्त कर क्षेत्र में स्थिरता लाना चाहते हैं, वहीं नेतन्याहू ईरान और उसके सहयोगी संगठनों के खिलाफ अधिक कठोर और लंबी रणनीति के पक्षधर माने जा रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि बढ़ती तेल कीमतों, वैश्विक आर्थिक दबाव और घरेलू राजनीतिक चुनौतियों के कारण ट्रंप युद्ध को जल्द खत्म करना चाहते हैं, जबकि इजरायल अपनी सुरक्षा चिंताओं को प्राथमिकता दे रहा है। पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव यदि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता अंतिम रूप ले लेता है, तो यह पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। इससे न केवल क्षेत्रीय तनाव कम हो सकता है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार को भी राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि इजरायल की चिंताओं और उसकी भविष्य की रणनीति पर अभी भी कई सवाल बने हुए हैं। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह समझौता क्षेत्र में स्थायी शांति लाता है या नए राजनीतिक मतभेदों को जन्म देता है।  

surbhi जून 13, 2026 0
Donald Trump and Iranian officials discuss draft peace agreement amid hopes of ending conflict
अमेरिका-ईरान युद्ध खत्म होने की उम्मीद? ड्राफ्ट समझौते पर बनी सहमति, जल्द हो सकता है बड़ा ऐलान

युद्धविराम की दिशा में बड़ी प्रगति, समझौते का मसौदा तैयार अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव और सैन्य संघर्ष को समाप्त करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों देशों ने शांति समझौते के एक ड्राफ्ट (मसौदा) के शब्दों पर सहमति बना ली है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया है कि समझौते का अंतिम मसौदा तैयार हो चुका है और मध्यस्थ देश इसे अंतिम रूप देने में जुटे हैं। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में शांति स्थापित करने की दिशा में यह अब तक की सबसे महत्वपूर्ण प्रगति है और समझौता पहले से कहीं ज्यादा करीब दिखाई दे रहा है। ट्रंप और ईरान के विदेश मंत्री ने भी दिए सकारात्मक संकेत अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने भी संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच समझौता जल्द हो सकता है। वहीं ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने कहा कि किसी समझौते के इतने करीब दोनों देश पहले कभी नहीं पहुंचे थे। हालांकि ईरानी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि मसौदा अभी आंतरिक समीक्षा के दौर से गुजर रहा है और अंतिम मंजूरी मिलना बाकी है। क्या जल्द होगा समझौते पर हस्ताक्षर? ईरान की ओर से संकेत मिले हैं कि आने वाले दिनों में एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि हस्ताक्षर किसी आमने-सामने बैठक के बजाय ऑनलाइन या दूरस्थ माध्यम से भी किए जा सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, इस प्रारंभिक समझौते का मुख्य उद्देश्य युद्ध को समाप्त करना और क्षेत्रीय स्थिरता बहाल करना है। परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों को फिलहाल इस समझौते से अलग रखा गया है और उन पर बाद में अलग चरण में बातचीत की जाएगी। किन मुद्दों पर अब भी बनी हुई है असहमति? हालांकि बातचीत में काफी प्रगति हुई है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं। ईरान चाहता है कि उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में राहत मिले और विदेशों में जमा उसकी संपत्तियां मुक्त की जाएं। दूसरी ओर अमेरिका का कहना है कि किसी भी राहत से पहले ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़े कुछ कदम उठाने होंगे। यही कारण है कि अंतिम समझौते से पहले कुछ शर्तों पर और बातचीत हो सकती है। भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह समझौता? इस संभावित समझौते का भारत पर भी सीधा असर पड़ सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, समझौते में Strait of Hormuz को फिर से पूरी तरह खोलने की दिशा में कदम शामिल हो सकते हैं। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। यदि इस क्षेत्र में तनाव कम होता है और जहाजों की आवाजाही सामान्य होती है, तो तेल की कीमतों में स्थिरता आने की संभावना बढ़ जाएगी। इजरायल अभी भी बातचीत का हिस्सा नहीं रिपोर्ट्स के अनुसार, Israel इस वार्ता प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है। इजरायली नेतृत्व पहले ही संकेत दे चुका है कि वह अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रख सकता है और जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र रूप से फैसले लेने का अधिकार सुरक्षित रखता है। अगले कुछ दिन होंगे बेहद अहम कूटनीतिक सूत्रों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के भीतर सभी स्तरों पर मंजूरी मिल जाती है, तो आने वाले कुछ दिनों में आधिकारिक समझौते की घोषणा हो सकती है। इससे पश्चिम एशिया में जारी तनाव कम होने, वैश्विक ऊर्जा बाजार को राहत मिलने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों की सुरक्षा बहाल होने की उम्मीद बढ़ जाएगी।  

surbhi जून 13, 2026 0
US President Donald Trump speaking as Israel-Iran tensions rise amid diplomatic efforts to avoid wider regional conflict.
ट्रंप का नेतन्याहू को सख्त संदेश: ईरान से टकराव बढ़ाया तो अमेरिका नहीं देगा साथ

  वॉशिंगटन: इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि इजराइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को और बढ़ाया, तो उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिका फिलहाल क्षेत्र में युद्ध नहीं, बल्कि कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देना चाहता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप ने नेतन्याहू के साथ हुई बातचीत में कहा कि मध्य पूर्व को एक और बड़े युद्ध की ओर धकेलने वाले कदमों से बचना जरूरी है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष और गहराता है, तो तेहरान के साथ चल रही बातचीत पूरी तरह पटरी से उतर सकती है। बातचीत के रास्ते को बचाना चाहता है अमेरिका व्हाइट हाउस के सूत्रों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन की सबसे बड़ी चिंता यह है कि मौजूदा तनाव कहीं व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में न बदल जाए। अमेरिका इस समय ईरान के साथ बातचीत के जरिए तनाव कम करने की कोशिशों में लगा हुआ है और वह नहीं चाहता कि सैन्य टकराव इन प्रयासों को विफल कर दे। ट्रंप का मानना है कि किसी भी नए बड़े संघर्ष की स्थिति में अमेरिका को भी सीधे या परोक्ष रूप से इसमें शामिल होना पड़ सकता है, जिससे पूरे क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति और जटिल हो जाएगी। बेरूत हमले के बाद बढ़ा तनाव तनाव उस समय और बढ़ गया जब रविवार को इजराइल ने लेबनान की राजधानी बेरूत में हिज्बुल्लाह से जुड़े ठिकानों पर हमला किया। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल की ओर कई मिसाइलें दागीं। इन घटनाओं ने पूरे मध्य पूर्व में बड़े युद्ध की आशंकाओं को फिर से हवा दे दी। क्षेत्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच जवाबी हमलों का सिलसिला जारी रहा, तो स्थिति तेजी से नियंत्रण से बाहर जा सकती है। ट्रंप की आपत्तियों के बावजूद इजराइल ने की सीमित कार्रवाई रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप की ओर से संयम बरतने की सलाह दिए जाने के बावजूद नेतन्याहू ने अमेरिकी प्रशासन को स्पष्ट कर दिया था कि इजराइल अपनी सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं करेगा और आवश्यक होने पर सीमित सैन्य कार्रवाई करेगा। इसके बाद इजराइल ने ईरान से जुड़े कुछ ठिकानों को निशाना बनाया। जवाब में ईरान ने भी मिसाइल हमलों का नया दौर शुरू कर दिया। यह टकराव पूर्ण युद्ध में नहीं बदला, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बना हुआ है। अमेरिका ने सीधे हिस्सा नहीं लिया, लेकिन इजराइल की मदद की अमेरिका इस सैन्य कार्रवाई में सीधे तौर पर शामिल नहीं हुआ, लेकिन क्षेत्र में तैनात अमेरिकी सैन्य संसाधनों ने इजराइल की रक्षा में सहयोग किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने इजराइल की ओर बढ़ रही कई ईरानी मिसाइलों को रोकने में मदद की। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि अमेरिका अपने सहयोगी इजराइल की सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्ध है, लेकिन वह संघर्ष के विस्तार से बचना चाहता है। फोन कॉल में फिर हुई बातचीत तनाव बढ़ने के बाद ट्रंप ने एक बार फिर नेतन्याहू से फोन पर संपर्क किया। इस बातचीत में उन्होंने इजराइली प्रधानमंत्री से बड़े पैमाने पर जवाबी हमले की योजना को रोकने का आग्रह किया। सूत्रों के अनुसार, ट्रंप ने साफ कहा कि मौजूदा हालात में किसी भी आक्रामक कदम से पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है और अमेरिका की कूटनीतिक रणनीति को नुकसान पहुंच सकता है। तनाव कम करने पर बनी सहमति रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत के बाद एक सीमित सहमति बनी। नेतन्याहू ने संकेत दिया कि यदि ईरान की ओर से कोई नया हमला नहीं किया जाता है, तो इजराइल भी आगे सैन्य कार्रवाई नहीं करेगा। इस समझ के बाद क्षेत्र में तत्काल तनाव को कम करने की कोशिश की गई है। हालात अभी भी नाजुक बने हुए हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोनों देशों के अगले कदमों पर करीबी नजर बनाए हुए है। मध्य पूर्व की राजनीति पर दूरगामी असर संभव विशेषज्ञों का मानना है कि इजराइल-ईरान तनाव केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था, वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर पड़ सकता है। ऐसे में ट्रंप प्रशासन की कोशिश है कि सैन्य टकराव को सीमित रखा जाए और संवाद के रास्ते खुले रहें। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि दोनों पक्ष संयम बरतते हैं या क्षेत्र एक नए संकट की ओर बढ़ता है।  

Deepshikha जून 9, 2026 0
Donald Trump and Benjamin Netanyahu amid reports of policy differences and intelligence concerns.
अमेरिका-इजरायल रिश्तों में बढ़ी दरार? जासूसी आशंकाओं के बीच पेंटागन अलर्ट मोड में

  अमेरिका और इजरायल के बीच दशकों पुराने रणनीतिक संबंधों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान में इजरायल की कथित खुफिया गतिविधियों को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। इसी बीच पश्चिम एशिया की नीतियों और ईरान संकट को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के बीच मतभेदों की खबरें भी सामने आई हैं। पेंटागन में बढ़ी सतर्कता रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा विभाग के भीतर इजरायल से जुड़े काउंटर-इंटेलिजेंस जोखिमों को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है। बताया जा रहा है कि कुछ अमेरिकी अधिकारी विदेश यात्राओं के दौरान अस्थायी संचार उपकरणों और कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल का उपयोग कर रहे हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और अमेरिकी प्रशासन ने सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी गंभीर सुरक्षा स्थिति की पुष्टि नहीं की है। खुफिया गतिविधियों को लेकर पुरानी चिंताएं फिर चर्चा में अमेरिका और इजरायल करीबी सहयोगी माने जाते हैं, लेकिन अतीत में भी दोनों देशों के बीच खुफिया गतिविधियों को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सहयोगी देशों के बीच भी संवेदनशील सूचनाओं की सुरक्षा हमेशा एक महत्वपूर्ण विषय रहती है। इसी संदर्भ में कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अमेरिकी अधिकारियों को गोपनीय चर्चाओं के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। ट्रंप और नेतन्याहू के बीच मतभेदों की चर्चा रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि ईरान, लेबनान और व्यापक पश्चिम एशिया नीति को लेकर ट्रंप और नेतन्याहू के बीच हाल के महीनों में कुछ रणनीतिक मतभेद उभरे हैं। बताया गया कि दोनों नेताओं के बीच हुई एक बातचीत के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा और सैन्य कार्रवाइयों को लेकर तीखी चर्चा हुई। इस संबंध में दोनों पक्षों की ओर से आधिकारिक विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है। इजरायल ने आरोपों को किया खारिज वॉशिंगटन स्थित इजरायली अधिकारियों ने जासूसी संबंधी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि इजरायल अपने सहयोगी देशों के खिलाफ ऐसी गतिविधियों में शामिल नहीं है। दूसरी ओर, अमेरिकी प्रशासन के कुछ अधिकारियों ने भी इन रिपोर्टों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताया है और कहा है कि अमेरिका-इजरायल सुरक्षा सहयोग पहले की तरह मजबूत बना हुआ है। पश्चिम एशिया संकट ने बढ़ाई संवेदनशीलता विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान, लेबनान और क्षेत्रीय संघर्षों से जुड़े मुद्दों ने अमेरिका और इजरायल के संबंधों को अधिक संवेदनशील बना दिया है। दोनों देशों के बीच सैन्य और खुफिया सहयोग जारी है, लेकिन क्षेत्रीय रणनीति को लेकर मतभेद समय-समय पर सामने आते रहे हैं। फिलहाल, जासूसी गतिविधियों और सुरक्षा चिंताओं से जुड़े कई दावे मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं। आधिकारिक स्तर पर इनकी पुष्टि सीमित है, इसलिए इन्हें सावधानी के साथ देखने की आवश्यकता है।  

Deepshikha जून 8, 2026 0
Iranian ballistic missiles launched toward Israel as air defense systems activate across multiple regions.
बेरूत एयरस्ट्राइक के बाद बढ़ा तनाव, ईरान ने इजराइल पर दागीं बैलिस्टिक मिसाइलें

  तेहरान: मध्य पूर्व में एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। दक्षिणी बेरूत पर इजराइली हवाई हमलों के कुछ घंटों बाद ईरान ने इजराइल की ओर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इजराइली सेना के अनुसार, रविवार रात कई इलाकों में एयर रेड सायरन बजाए गए और नागरिकों को सुरक्षित स्थानों पर जाने के निर्देश जारी किए गए। इजराइली सेना (IDF) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी बयान में कहा कि ईरान की ओर से दागी गई मिसाइलों का समय रहते पता लगा लिया गया था, जिसके बाद देश की वायु रक्षा प्रणाली को सक्रिय कर दिया गया। सेना का दावा है कि अधिकांश मिसाइलों को हवा में ही इंटरसेप्ट कर नष्ट कर दिया गया। कई इलाकों में बजाए गए सायरन आईडीएफ के मुताबिक, संभावित हमले की चेतावनी मिलने के बाद उत्तरी इजराइल समेत कई क्षेत्रों में सायरन बजाए गए। सुरक्षा एजेंसियों ने लोगों को बंकरों और सुरक्षित स्थानों में रहने की सलाह दी। फिलहाल किसी बड़े नुकसान या जनहानि की सूचना नहीं मिली है। सीजफायर के बाद पहला सीधा हमला 8 अप्रैल को लागू हुए युद्धविराम के बाद यह इजराइल पर ईरान का पहला प्रत्यक्ष मिसाइल हमला माना जा रहा है। हाल के दिनों में दोनों देशों के बीच बयानबाजी तेज हो गई थी, लेकिन अब संघर्ष फिर से सैन्य कार्रवाई के स्तर तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। बेरूत हमले के बाद बढ़ा तनाव इससे पहले इजराइल ने दक्षिणी बेरूत के कई इलाकों में हवाई हमले किए थे। ईरान ने इन हमलों की कड़ी निंदा करते हुए चेतावनी दी थी कि यदि क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई जारी रही तो उसका जवाब दिया जाएगा। इसके बाद तेहरान ने अमेरिका के साथ चल रही कुछ कूटनीतिक वार्ताओं को भी रोकने का फैसला किया। रामत डेविड एयर बेस को निशाना बनाने का दावा ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया कि उसकी एयरोस्पेस फोर्स ने बैलिस्टिक मिसाइलों के जरिए इजराइल के रामत डेविड एयर बेस को निशाना बनाया। इजराइल ने इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की है। ईरान की चेतावनी मिसाइल हमलों के बाद ईरानी अधिकारियों ने कहा कि यदि इजराइल आगे भी सैन्य कार्रवाई जारी रखता है तो जवाब और अधिक कठोर होगा। दूसरी ओर इजराइली सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। क्षेत्रीय स्थिरता पर बढ़ी चिंता विश्लेषकों का मानना है कि बेरूत एयरस्ट्राइक और उसके बाद हुए मिसाइल हमलों ने अप्रैल में लागू युद्धविराम को कमजोर कर दिया है। यदि दोनों पक्षों के बीच सैन्य कार्रवाई जारी रहती है तो पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता और बढ़ सकती है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।  

Deepshikha जून 8, 2026 0
Benjamin Netanyahu speaks on expanding Israeli military control over large parts of Gaza amid ongoing conflict
गाजा के 70% हिस्से पर कब्जे की तैयारी में इजराइल, नेतन्याहू बोले- धीरे-धीरे बढ़ाएंगे नियंत्रण

इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने गाजा पट्टी के 70 प्रतिशत हिस्से पर सैन्य नियंत्रण स्थापित करने का संकेत देकर पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ा दिया है। वेस्ट बैंक में आयोजित एक कॉन्फ्रेंस के दौरान नेतन्याहू ने कहा कि इजराइली सेना धीरे-धीरे गाजा के बड़े हिस्से को अपने नियंत्रण में ले रही है और अब सैन्य दबाव को और बढ़ाया जाएगा। नेतन्याहू बोले- “एक-एक कदम आगे बढ़ेंगे” कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए नेतन्याहू ने कहा, “हम इस समय हमास को दबा रहे हैं। पहले हम गाजा के 50 प्रतिशत हिस्से को नियंत्रित कर रहे थे, अब यह बढ़कर 60 प्रतिशत हो चुका है।” उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने सैन्य नियंत्रण को और बढ़ाने का आदेश दिया है। इसी दौरान भीड़ में मौजूद कुछ लोगों ने “100 प्रतिशत” कब्जे की मांग करते हुए नारे लगाए। इस पर नेतन्याहू ने जवाब दिया, “एक-एक कदम आगे बढ़ते हैं। पहले 70 प्रतिशत तक पहुंचते हैं। फिलहाल वहीं से शुरुआत करते हैं।” सीजफायर समझौते के खिलाफ माना जा रहा कदम विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का मानना है कि इजराइल का यह कदम अक्टूबर 2025 में हुए युद्धविराम समझौते की शर्तों के विपरीत है। समझौते के तहत इजराइली सेना को एक तय “येलो लाइन” के पीछे हटना था। उस समय गाजा का लगभग 53 प्रतिशत हिस्सा इजराइली नियंत्रण में माना जा रहा था। हालांकि हमास का आरोप है कि इजराइल धीरे-धीरे इस सीमा को आगे बढ़ा रहा है और अब गाजा के लगभग 60 से 64 प्रतिशत हिस्से पर उसका नियंत्रण हो चुका है। शांति वार्ता ठप, दोनों पक्ष आमने-सामने इजराइल और हमास के बीच जारी शांति योजना के अगले चरण में हमास के हथियार छोड़ने और इजराइली सेना की वापसी का प्रस्ताव शामिल है। लेकिन दोनों पक्षों के बीच बातचीत फिलहाल पूरी तरह ठप पड़ी हुई है। इजराइल का कहना है कि वह हमास को पूरी तरह कमजोर किए बिना पीछे नहीं हटेगा, जबकि हमास इजराइली सैन्य कार्रवाई को युद्धविराम समझौते का उल्लंघन बता रहा है। गाजा में मानवीय संकट और गहरा सकता है विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इजराइल गाजा के 70 प्रतिशत हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लेता है, तो वहां मानवीय संकट और गंभीर हो सकता है। द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसी स्थिति में गाजा की करीब 22 लाख आबादी को कुल जमीन के एक-तिहाई से भी कम हिस्से में रहने को मजबूर होना पड़ सकता है। युद्ध, बमबारी और लगातार विस्थापन के कारण गाजा के ज्यादातर इलाके पहले ही तबाह हो चुके हैं। “हर खाली जगह पर टेंट लगे हैं” यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के विजिटिंग फेलो मुहम्मद शेहादा ने कहा कि हालात पहले से ही बेहद खराब हैं। उन्होंने कहा, “हर खाली जगह पर विस्थापित परिवारों के टेंट लगे हुए हैं। अगर इलाका और छोटा हो गया, तो बड़ी संख्या में लोगों के पास रहने की जगह नहीं बचेगी।” सीजफायर के बाद भी जारी हैं हमले इजराइल और हमास के बीच अक्टूबर 2025 में युद्धविराम लागू हुआ था, लेकिन इसके बावजूद गाजा में सैन्य कार्रवाई पूरी तरह नहीं रुकी। गाजा के स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, सीजफायर लागू होने के बाद से अब तक करीब 900 फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं। इजराइली सेना ने “येलो लाइन” के आसपास के बड़े इलाके को नो-मैन्स-लैंड घोषित कर दिया है, जहां किसी भी गतिविधि को खतरा मानते हुए कार्रवाई की जा रही है। संयुक्त राष्ट्र ने भी जताई चिंता संयुक्त राष्ट्र की हालिया ब्रीफिंग में उत्तरी गाजा के जबालिया इलाके में इजराइली टैंकों की बढ़ती आवाजाही और ड्रोन हमलों को लेकर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, क्षेत्र में किसी भी संदिग्ध हलचल को निशाना बनाया जा रहा है, जिससे आम नागरिकों में भय और असुरक्षा बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने की संभावना गाजा में बढ़ती सैन्य कार्रवाई और संभावित क्षेत्रीय कब्जे की रणनीति को लेकर इजराइल पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ सकता है। मानवाधिकार संगठनों और कई देशों ने पहले भी गाजा में नागरिकों की स्थिति को लेकर चिंता जताई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर स्थिति इसी तरह आगे बढ़ती रही, तो पश्चिम एशिया में संघर्ष और अधिक व्यापक रूप ले सकता है।  

surbhi मई 29, 2026 0
Lalu yadav news
आज सिंगापुर जायेंगे लालू यादव, क्या रोहिणी आचार्य की पार्टी में वापसी होगी?

पटना, एजेंसियां। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव शुक्रवार 29 मई को रात 11 बजे सिंगापुर के लिए रवाना होंगे। वे दिल्ली से सिंगापुर के लिए फ्लाईट पकड़ेंगे। जानकारी के अनुसार लालू प्रसाद रूटीन हेल्थ चेकअप के लिए सिंगापुर जा रहे हैं। उनकी एक बेटी रोहिणी आचार्य सिंगापुर में ही रहती है। लालू प्रसाद  10 जून तक भारत लौट आयेंगे। 11 जून को लालू प्रसाद का जन्मदिन है, लिहाजा उनकी वापसी की तारीख 10 जून मानी जा रही है। रोहिणी की वापसी का प्रयास करेंगे चर्चा है कि सिंगापुर यात्रा के दौरान लालू प्रसाद अपनी पुत्री रोहिणी आचार्य को वापस पार्टी में लाने का भी प्रयास करेंगे। बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान रोहिणी आचार्य पार्टी से और अपने भाई तेजस्वी यादव से नाराज हो गयीं थी। लालू प्रसाद रोहिणी को राजद में संगठन के किसी पद की जिम्मेदारी दी जा सकती है। इधर, एक चर्चा यह भी है कि लालू प्रसाद के बडे बेटे तेजप्रताप यादव को पार्टी में वापस लाया जायेगा। उन्हें बिहार विधान परिषद में एमएसली बनाया जा सकता है। सन आफ लालू प्रसाद ने की पुष्टि इधर, लालू प्रसाद के बेहद करीबी और सन आफ लालू प्रसाद के नाम से चर्चित राजद नेता इरफान अहमद अंसारी ने लालू प्रसाद के सिंगापुर जाने की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि रोहिणी आचार्या को पार्टी में वापस लाया जा रहा है।

Unknown मई 29, 2026 0
Israeli airstrike in Gaza as Israel claims Hamas military chief Mohammed Odeh was killed
इजरायल का दावा: हमास के नए सैन्य प्रमुख मोहम्मद ओदेह की एयरस्ट्राइक में मौत

इजरायल ने दावा किया है कि गाजा पट्टी में चलाए गए एक बड़े सैन्य अभियान में हमास के नए सैन्य प्रमुख मोहम्मद ओदेह को मार गिराया गया है। इजरायल डिफेंस फोर्स (IDF) के मुताबिक, गाजा के रिमाल इलाके में की गई एयरस्ट्राइक में ओदेह की मौत हुई। इजरायली सेना का कहना है कि मोहम्मद ओदेह 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हुए हमले के प्रमुख योजनाकारों में शामिल था। एक हफ्ते पहले ही बना था हमास का नया सैन्य प्रमुख इजरायल के अनुसार, मोहम्मद ओदेह को करीब एक सप्ताह पहले ही हमास की सैन्य शाखा की कमान सौंपी गई थी। उसने एज्जेदीन अल-हद्दाद की जगह ली थी। इजरायल ने दावा किया था कि एज्जेदीन अल-हद्दाद की भी 15 मई को गाजा में किए गए एक हमले में मौत हो गई थी। नेतन्याहू बोले- सभी जिम्मेदार लोगों तक पहुंचेंगे इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने इस कार्रवाई की पुष्टि करते हुए कहा कि 7 अक्टूबर हमले में शामिल हर व्यक्ति को निशाना बनाया जाएगा। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि इजरायल हमले के सभी जिम्मेदार लोगों तक पहुंचेगा और कार्रवाई जारी रहेगी। ओदेह पर हत्या और अपहरण की साजिश का आरोप इजरायली सेना ने मोहम्मद ओदेह पर कई इजरायली नागरिकों और सैनिकों की हत्या, अपहरण और हमलों की साजिश रचने का आरोप लगाया है। IDF के मुताबिक, 7 अक्टूबर हमले के दौरान वह हमास के इंटेलिजेंस स्टाफ का प्रमुख था और हमले की योजना तैयार करने में उसकी अहम भूमिका थी। दक्षिण लेबनान में भी बढ़े इजरायली हमले गाजा के साथ-साथ इजरायल ने दक्षिण लेबनान में भी अपने हवाई हमले तेज कर दिए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, टायर और मरजायौन जिलों समेत कई इलाकों में लगातार एयरस्ट्राइक की गईं। बुर्ज रहाल, सरीफा, अस-सवाना और कबरिखा जैसे इलाकों को भी निशाना बनाया गया। अरबी मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि मंगलवार को हुए हमलों में 31 लोगों की मौत हुई, जबकि करीब 40 लोग घायल हुए हैं। हिजबुल्लाह पर दबाव बढ़ा रहा इजरायल प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने हाल ही में सेना को हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई और तेज करने के निर्देश दिए थे। उन्होंने कहा था कि इजरायल हिजबुल्लाह के साथ युद्ध जैसी स्थिति में है और हाल के हफ्तों में उसके 600 से ज्यादा लड़ाकों को मार गिराया गया है। इजरायल ने कहा- कार्रवाई और तेज होगी नेतन्याहू ने अपने वीडियो संदेश में कहा कि इजरायल अपनी सैन्य कार्रवाई धीमी नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि सेना को और अधिक तेज और सख्त अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ड्रोन हमलों में बढ़ोतरी के बाद इजरायल ने अपनी सैन्य रणनीति और ज्यादा आक्रामक कर दी है।  

surbhi मई 27, 2026 0
Israeli Prime Minister Benjamin Netanyahu arrives for court proceedings linked to ongoing corruption allegations.Netanyahu Corruption Trial Hearing Delayed
करप्शन केस में फिर टली नेतन्याहू की गवाही, अदालत में सुरक्षा कारणों का हवाला

Benjamin Netanyahu की आपराधिक मामलों में चल रही सुनवाई के दौरान अदालत में होने वाली उनकी गवाही एक बार फिर स्थगित कर दी गई है। इजरायली मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रधानमंत्री के वकील ने अदालत को बताया कि नेतन्याहू पूरे दिन सुरक्षा और कूटनीतिक बैठकों में व्यस्त रहेंगे। बताया गया है कि बचाव पक्ष की ओर से यरुशलम जिला अदालत को एक गोपनीय कार्यक्रम भी सौंपा गया, जिसमें देर रात तक निर्धारित बैठकों का उल्लेख किया गया था। पहले भी टल चुकी है पेशी यह पहली बार नहीं है जब नेतन्याहू की अदालत में पेशी टाली गई हो। इससे पहले 27 अप्रैल को भी सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उनकी गवाही अनिश्चित समय के लिए स्थगित कर दी गई थी। इसी वर्ष अदालत ने सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़ी जिम्मेदारियों को देखते हुए उनकी कुछ अन्य निर्धारित पेशियां भी रद्द कर दी थीं। सरकारी वकीलों ने जताई नाराजगी सरकारी वकीलों ने इस फैसले पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री को अदालत की कार्यवाही के अनुसार अपना कार्यक्रम तय करना चाहिए ताकि जिरह की प्रक्रिया समय पर पूरी हो सके। इसके बावजूद अदालत ने नेतन्याहू की अनुपस्थिति की अनुमति देते हुए दूसरे गवाह की गवाही सुनने का फैसला किया। अदालत ने दूसरे गवाह को बुलाया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह फैसला यरुशलम जिला अदालत के न्यायाधीशों: Rivka Friedman-Feldman Moshe Bar-Am Oded Shaham की पीठ ने लिया। अब अदालत नेतन्याहू के पूर्व सहयोगी और राज्य गवाह Shlomo Filber की पत्नी Ilanit Filber की गवाही सुनेगी। ‘केस 4000’ में गंभीर आरोप यह मामला चर्चित “केस 4000” से जुड़ा है, जिसे Bezeq-Walla प्रकरण भी कहा जाता है। इसे नेतन्याहू के खिलाफ चल रहे सबसे गंभीर मामलों में माना जाता है। आरोप है कि नेतन्याहू ने कारोबारी Shaul Elovitch की टेलीकॉम कंपनी Bezeq को सरकारी स्तर पर लाभ पहुंचाने वाले फैसलों को आगे बढ़ाया। इसके बदले उनसे जुड़े समाचार प्लेटफॉर्म Walla! पर प्रधानमंत्री के पक्ष में सकारात्मक कवरेज प्रकाशित किए जाने का आरोप है। नेतन्याहू ने आरोपों से किया इनकार नेतन्याहू लगातार इन सभी आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते रहे हैं। उन्होंने कथित “डायरेक्टिव मीटिंग” समेत कई आरोपों को खारिज किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, साल 2022 में श्लोमो फिलबर की गवाही में कई विरोधाभास सामने आए थे, जिसके बाद सरकारी वकीलों ने उनके साथ हुए स्टेट विटनेस समझौते को रद्द करने की मांग भी की थी। दिसंबर 2024 से जारी है ट्रायल नेतन्याहू ने पहली बार दिसंबर 2024 में अदालत में गवाही दी थी। जून 2025 से मामले में जिरह का चरण शुरू हुआ, जो अब भी जारी है। इजरायल की राजनीति और न्यायिक व्यवस्था के लिहाज से यह मामला बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि किसी मौजूदा प्रधानमंत्री के खिलाफ चल रहा यह सबसे चर्चित भ्रष्टाचार मुकदमों में शामिल है।  

surbhi मई 19, 2026 0
UAE denies Israeli claim of secret Benjamin Netanyahu visit during Iran conflict
नेतन्याहू के ‘गुप्त यूएई दौरे’ के दावे को अबू धाबी ने किया खारिज, कहा- ऐसा कुछ नहीं हुआ

इजरायल के दावे से मचा कूटनीतिक विवाद Benjamin Netanyahu के कार्यालय द्वारा किए गए एक बड़े दावे को संयुक्त अरब अमीरात ने सिरे से खारिज कर दिया है। इजरायल ने कहा था कि ईरान युद्ध के दौरान नेतन्याहू ने गुप्त रूप से यूएई का दौरा किया और राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद से मुलाकात की थी। हालांकि, United Arab Emirates ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऐसा कोई दौरा या गुप्त बैठक नहीं हुई। इजरायल ने क्या दावा किया? इजरायली प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार मार्च 26 को पश्चिम एशिया में युद्ध के चरम के दौरान नेतन्याहू ने यूएई के अल ऐन शहर में राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से कई घंटों तक बातचीत की। इजरायल ने इस बैठक को दोनों देशों के रिश्तों में “ऐतिहासिक सफलता” बताया और कहा कि चर्चा क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग पर केंद्रित थी। यूएई ने जारी किया आधिकारिक बयान यूएई विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि नेतन्याहू के कथित दौरे और किसी इजरायली सैन्य प्रतिनिधिमंडल के आने की खबरें पूरी तरह गलत हैं। यूएई ने साफ कहा कि इजरायल के साथ उसके संबंध 2020 में हुए Abraham Accords के तहत खुले तौर पर संचालित होते हैं, न कि किसी गुप्त समझौते के जरिए। युद्ध के बीच बढ़ा सुरक्षा सहयोग हालांकि दोनों देशों के बयानों में विरोधाभास है, लेकिन रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि ईरान संघर्ष के दौरान इजरायल और यूएई के बीच सुरक्षा सहयोग बढ़ा था। सूत्रों के मुताबिक इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद के प्रमुख डेडी बरनेआ ने युद्ध के दौरान कम से कम दो बार यूएई का दौरा किया था। इन बैठकों में सैन्य और सुरक्षा मामलों पर समन्वय की चर्चा हुई। यूएई में तैनात किया गया था आयरन डोम अमेरिका के इजरायल में राजदूत माइक हकाबी ने भी दावा किया कि युद्ध के दौरान यूएई के अनुरोध पर इजरायल ने वहां अपनी आयरन डोम एयर डिफेंस प्रणाली और सैन्य कर्मियों को तैनात किया था। यह पहली बार था जब इजरायल की यह रक्षा प्रणाली विदेश में तैनात की गई। ईरान के हमलों से बढ़ा तनाव ईरान ने अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई के जवाब में खाड़ी देशों पर भी हमले किए थे। रिपोर्ट्स के अनुसार यूएई समेत कई देशों में ऊर्जा और नागरिक ढांचे को निशाना बनाया गया। सार्वजनिक दूरी, लेकिन रणनीतिक रिश्ते कायम 2020 के बाद से यूएई और इजरायल के बीच आर्थिक और सुरक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा है। हालांकि, गाजा युद्ध और ईरान संकट के बीच यूएई सार्वजनिक रूप से इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों से दूरी बनाने की कोशिश करता रहा है। इसी वजह से नेतन्याहू के गुप्त दौरे के दावे को लेकर दोनों देशों के बीच बयानबाजी ने नया कूटनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है।  

surbhi मई 14, 2026 0
Hezbollah leader Naim Qassem delivers speech amid rising Israel Lebanon border tensions
हिजबुल्लाह का अल्टीमेटम: "हथियार नहीं छोड़ेंगे", इजराइल से सीधी बातचीत से इनकार

मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर बढ़ता दिख रहा है। लेबनान के शक्तिशाली सशस्त्र समूह Hezbollah ने साफ कर दिया है कि वह न तो अपने हथियार छोड़ेगा और न ही Israel के साथ सीधे बातचीत करेगा। नईम कासिम का दोटूक संदेश Naim Qassem ने कहा कि मौजूदा हालात में इजराइल से किसी भी तरह की प्रत्यक्ष वार्ता संभव नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा: "हम अपने हथियार नहीं छोड़ेंगे।" यह बयान ऐसे समय आया है जब क्षेत्र में युद्धविराम को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। लेबनान सरकार को भी चेतावनी कासिम ने Lebanon की सरकार पर भी निशाना साधा। उनका आरोप है कि सरकार ने इजराइल के सामने जरूरत से ज्यादा रियायतें दी हैं। हिजबुल्लाह चाहता है कि यदि कोई वार्ता हो भी, तो वह केवल अप्रत्यक्ष माध्यमों से हो, सीधे नहीं। दक्षिणी लेबनान में इजराइली कार्रवाई Israel Defense Forces ने बताया कि दक्षिणी लेबनान में उसके सैनिकों ने संदिग्ध गतिविधियां देखीं। इसके बाद वायुसेना ने कार्रवाई करते हुए तीन आतंकवादियों को मार गिराया। आईडीएफ ने हिजबुल्लाह के कई ठिकानों और सैन्य ढांचे को भी निशाना बनाने का दावा किया है। नेतन्याहू का आरोप इजराइली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने हिजबुल्लाह पर युद्धविराम समझौते को कमजोर करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि उत्तरी सीमा की सुरक्षा के लिए लेबनान में सैन्य अभियान जारी रहेगा। क्या युद्धविराम खतरे में है? हालात संकेत दे रहे हैं कि संघर्ष फिर भड़क सकता है। हिजबुल्लाह के सख्त रुख और इजराइल की लगातार सैन्य कार्रवाई से युद्धविराम पर खतरा मंडरा रहा है। अमेरिका की भूमिका अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने हाल ही में इजराइल-लेबनान युद्धविराम को तीन सप्ताह बढ़ाने की घोषणा की थी। साथ ही, अमेरिका ने लेबनान को हिजबुल्लाह से निपटने में सहयोग का आश्वासन भी दिया है। मध्य पूर्व की स्थिति फिलहाल बेहद नाजुक बनी हुई है। आने वाले दिनों में घटनाक्रम पूरे क्षेत्र की दिशा तय कर सकता है।  

surbhi अप्रैल 28, 2026 0
Israeli PM Benjamin Netanyahu speaking after recovery from early-stage prostate cancer treatment
शुरुआती स्टेज में प्रोस्टेट कैंसर से जूझे नेतन्याहू, इलाज के बाद बोले- अब पूरी तरह स्वस्थ

इजरायली प्रधानमंत्री ने खुद दी स्वास्थ्य की जानकारी इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने खुलासा किया है कि उन्हें शुरुआती चरण का प्रोस्टेट कैंसर हुआ था। हालांकि, समय रहते इलाज कराने के बाद अब वह पूरी तरह स्वस्थ हैं। उन्होंने बताया कि यह जानकारी सार्वजनिक करने में देरी इसलिए की गई ताकि मौजूदा युद्ध के दौरान ईरान इसे इजरायल के खिलाफ प्रचार के तौर पर इस्तेमाल न कर सके। नियमित जांच में सामने आई बीमारी नेतन्याहू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बताया कि एक साल पहले बढ़े हुए लेकिन गैर-कैंसरयुक्त प्रोस्टेट की सफल सर्जरी के बाद वह लगातार मेडिकल निगरानी में थे। हाल ही में हुई जांच में प्रोस्टेट में एक सेंटीमीटर से भी छोटा धब्बा पाया गया। डॉक्टरों ने आगे की जांच में इसे शुरुआती चरण का कैंसर बताया। राहत की बात यह रही कि कैंसर शरीर के किसी अन्य हिस्से में नहीं फैला था। डॉक्टरों ने दिए थे दो विकल्प नेतन्याहू के अनुसार, डॉक्टरों ने उन्हें दो विकल्प सुझाए थे। पहला, नियमित निगरानी के जरिए स्थिति पर नजर रखना। दूसरा, लक्षित उपचार के माध्यम से कैंसर को पूरी तरह खत्म करना। उन्होंने दूसरा विकल्प चुना। नेतन्याहू ने बताया कि कुछ छोटी उपचार प्रक्रियाओं के बाद कैंसर का निशान पूरी तरह समाप्त हो गया। इलाज के दौरान भी जारी रखा काम इजरायली प्रधानमंत्री ने कहा कि इलाज के दौरान उन्होंने अपना काम नहीं रोका। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि उपचार के दौरान उन्होंने एक किताब भी पढ़ डाली और अपने सरकारी कार्यों को भी जारी रखा। उन्होंने Hadassah Medical Center के डॉक्टरों और मेडिकल टीम का आभार व्यक्त किया। युद्ध के बीच स्वास्थ्य पर उठे थे सवाल यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है जब मध्य पूर्व में तनाव चरम पर है। इजरायल और लेबनान के बीच संघर्ष लगातार जारी है। ऐसे में नेतन्याहू की सेहत को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा हो रही थी। शुरुआती पहचान से संभव है सफल इलाज प्रोस्टेट कैंसर पुरुषों में होने वाले आम कैंसरों में से एक है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि इसकी पहचान शुरुआती चरण में हो जाए तो इसका इलाज बेहद प्रभावी साबित होता है। नेतन्याहू का मामला भी इसी का उदाहरण है।  

surbhi अप्रैल 25, 2026 0
Massive swarm of bees covering streets and buildings in Netivot Israel causing panic among residents
इज़राइल के नेटीवोट शहर में भयानक घटना: हजारों मधुमक्खियों के झुंड से मचा हड़कंप, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

  शहर पर अचानक मधुमक्खियों का हमला दक्षिणी इज़राइल के नेटीवोट शहर में अचानक हजारों मधुमक्खियों के विशाल झुंड ने लोगों को दहशत में डाल दिया। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में देखा जा सकता है कि पूरा इलाका मधुमक्खियों से ढक गया है, जिससे लोगों को घरों में रहने की सलाह दी गई है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि स्थानीय प्रशासन ने लोगों से अपने घरों के दरवाजे और खिड़कियां बंद रखने को कहा। मधुमक्खियों को हटाने और उनके अचानक आने के कारणों की जांच के लिए टीमें तैनात कर दी गई हैं। वायरल वीडियो और दहशत इस घटना के वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में मधुमक्खियां अचानक शहर में कैसे पहुंच गईं। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि इस कारण हवाई गतिविधियां भी प्रभावित हुईं, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। सोशल मीडिया पर धार्मिक व्याख्याएं इस घटना के बाद इंटरनेट पर अलग-अलग तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कई यूजर्स इसे धार्मिक संकेत या “दैवीय चेतावनी” के रूप में देख रहे हैं। कुछ लोगों ने बाइबिल की पुस्तक Isaiah 7:18 का हवाला दिया, जिसमें मधुमक्खियों और अन्य प्राकृतिक घटनाओं का उल्लेख मिलता है। वहीं कुछ यूजर्स ने कुरान की आयतों का जिक्र करते हुए इसे ऐतिहासिक संकेतों से जोड़ने की कोशिश की। विशेषज्ञों की अलग राय हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाएं अक्सर पर्यावरणीय बदलाव, मौसम या कॉलोनी मूवमेंट जैसे प्राकृतिक कारणों से होती हैं। मधुमक्खियों का एक जगह से दूसरी जगह अचानक बड़ी संख्या में जाना कोई असामान्य जैविक घटना नहीं है। मध्य पूर्व तनाव के बीच चर्चा तेज यह घटना ऐसे समय पर सामने आई है जब मध्य पूर्व पहले से ही राजनीतिक और सैन्य तनावों से गुजर रहा है। इसी कारण सोशल मीडिया पर लोग इसे मौजूदा हालात से जोड़कर अलग-अलग व्याख्याएं कर रहे हैं। नेटीवोट में मधुमक्खियों का यह असामान्य झुंड भले ही प्राकृतिक घटना हो, लेकिन इसने लोगों के बीच डर, जिज्ञासा और धार्मिक बहस को जन्म दे दिया है। फिलहाल प्रशासन स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश कर रहा है और विशेषज्ञ इसके कारणों की जांच कर रहे हैं।  

surbhi अप्रैल 18, 2026 0
Israeli Prime Minister Benjamin Netanyahu addressing citizens about continued military operations against Hezbollah in Lebanon.
लेबनान में ‘सीजफायर नहीं’, हिज़्बुल्लाह पर हमले जारी रहेंगे: नेतन्याहू

Israel-Lebanon Conflict: इजराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने साफ कर दिया है कि लेबनान के साथ किसी भी तरह का संघर्षविराम (सीजफायर) लागू नहीं है। उन्होंने कहा कि इजरायली सेना हिज़्बुल्लाह के खिलाफ अपनी कार्रवाई जारी रखेगी। “हम तब तक नहीं रुकेंगे…” नेतन्याहू ने उत्तरी इजराइल के नागरिकों को संबोधित करते हुए कहा: “लेबनान में कोई संघर्षविराम लागू नहीं है। हम पूरी ताकत से हिज़्बुल्लाह पर हमले कर रहे हैं और तब तक नहीं रुकेंगे, जब तक अपनी सुरक्षा बहाल नहीं हो जाती।” बातचीत के लिए भी दिए निर्देश हालांकि, इससे पहले नेतन्याहू ने एक अलग बयान में संकेत दिया था कि: उन्होंने कैबिनेट को लेबनान के साथ बातचीत शुरू करने के निर्देश दिए हैं यह बातचीत जल्द शुरू हो सकती है बातचीत का फोकस क्या होगा? नेतन्याहू के मुताबिक संभावित बातचीत इन मुद्दों पर केंद्रित होगी: हिज़्बुल्लाह का निरस्त्रीकरण (हथियार छोड़ना) इजराइल और लेबनान के बीच शांतिपूर्ण संबंध स्थापित करना लेबनान के PM के बयान का जिक्र इजरायली प्रधानमंत्री ने लेबनान के प्रधानमंत्री द्वारा बेरूत के निरस्त्रीकरण की अपील की सराहना भी की और इसे बातचीत के लिए सकारात्मक संकेत बताया।  

surbhi अप्रैल 10, 2026 0
Iran Israel US war destruction with missiles, damaged buildings and rising global economic losses
ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध: 4,000 से ज्यादा मौतें, 54.88 लाख करोड़ का नुकसान - किसे सबसे ज्यादा चोट?

मध्य-पूर्व में जारी तनाव ने अब एक बड़े वैश्विक संकट का रूप ले लिया है। Iran, Israel और United States के बीच चल रहे संघर्ष ने न सिर्फ हजारों जिंदगियां छीन ली हैं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी गहरी चोट पहुंचाई है। एक महीने से अधिक समय से जारी इस युद्ध के चलते दुनिया की GDP को अब तक लगभग 54.88 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। ईरान सबसे ज्यादा प्रभावित इस युद्ध की सबसे भारी कीमत ईरान चुका रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान में 7,300 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 25,000 से अधिक लोग घायल हुए हैं। लगातार मिसाइल और हवाई हमलों ने देश के इंफ्रास्ट्रक्चर-स्कूल, अस्पताल और ऐतिहासिक इमारतों-को बुरी तरह तबाह कर दिया है। अनुमान है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो ईरान की GDP में 10% से ज्यादा गिरावट आ सकती है, जो उसे कई दशक पीछे धकेल सकती है। अमेरिका पर भी भारी आर्थिक बोझ हालांकि युद्ध का मुख्य मैदान ईरान है, लेकिन United States भी आर्थिक रूप से बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। अब तक इस युद्ध में अमेरिका को करीब 7.49 लाख करोड़ रुपये (80.4 बिलियन डॉलर) का नुकसान हो चुका है। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो यह नुकसान 210 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। ऊर्जा बाजार और वैश्विक व्यापार में बाधा इसका मुख्य कारण है। इजरायल में भी भारी तबाही Israel में भी इस युद्ध का गंभीर असर देखने को मिला है। यहां 33,000 से ज्यादा मौतें और हजारों घायल सामने आए हैं। आर्थिक रूप से भी इजरायल को करीब 15 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है, जबकि लगातार हमलों से देश की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे पर दबाव बढ़ गया है। खाड़ी देशों और वैश्विक असर इस युद्ध की आंच सिर्फ तीन देशों तक सीमित नहीं रही। Qatar, Kuwait, Saudi Arabia और United Arab Emirates जैसे देशों की अर्थव्यवस्था पर भी इसका गहरा असर पड़ा है। तेल उत्पादन में गिरावट, LNG सुविधाओं पर खतरा और पानी की आपूर्ति तक प्रभावित होने की आशंका जताई गई है। वहीं Lebanon और Iraq जैसे देशों को भी जान-माल और आर्थिक दोनों स्तर पर भारी नुकसान झेलना पड़ा है। लेबनान में 1,400 से ज्यादा मौतें और लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं। भारत और दुनिया पर असर इस युद्ध का सीधा असर भले भारत पर न दिखे, लेकिन आर्थिक झटका हर आम आदमी तक पहुंच रहा है। कच्चे तेल की कीमत $69 प्रति बैरल से बढ़कर $125 तक पहुंच गई है, जिससे पेट्रोल-डीजल महंगे हो रहे हैं। शेयर बाजार में गिरावट से भारतीय निवेशकों के करीब 37 लाख करोड़ रुपये डूब चुके हैं। वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन टूट चुकी है, जिससे 1973 के तेल संकट जैसी स्थिति बन गई है। कई देशों में ऊर्जा आपातकाल, स्कूल बंद और ईंधन निर्यात पर रोक जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। महंगाई का डोमिनो इफेक्ट तेल की कमी का असर अब हर सेक्टर पर दिख रहा है। ट्रांसपोर्टेशन, मैन्युफैक्चरिंग और रोजमर्रा की चीजों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। उर्वरकों की कमी से खाद्य पदार्थ महंगे होने की आशंका है, जबकि प्लास्टिक, टेक्सटाइल और केमिकल इंडस्ट्री की लागत में 30% से 50% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।  

surbhi अप्रैल 8, 2026 0
Israeli Prime Minister Netanyahu reacting to US-Iran 14-day ceasefire announcement by Trump amid Middle East tension
US–Iran Ceasefire: ट्रंप के फैसले से इजरायल असहज, नेतन्याहू पर बढ़ा दबाव

मिडिल ईस्ट की राजनीति में बड़ा मोड़ तब आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक ईरान पर हमले रोकने और 14 दिन के संघर्षविराम का ऐलान कर दिया। इस फैसले ने जहां वैश्विक स्तर पर राहत दी, वहीं इजरायल के लिए यह एक बड़ा रणनीतिक झटका साबित हुआ। ट्रंप के फैसले से क्यों चौंका इजरायल? इजरायल लंबे समय से ईरान के खिलाफ सख्त सैन्य कार्रवाई के पक्ष में था। लेकिन सीजफायर के ऐलान ने उसकी रणनीति को अचानक रोक दिया। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनका सुरक्षा तंत्र इस फैसले से असहज नजर आ रहा है, क्योंकि: इजरायल ईरान को सैन्य रूप से कमजोर करना चाहता था युद्धविराम से उसके अभियान की गति थम गई लेबनान और हिजबुल्लाह को लेकर उसकी चिंताएं बनी हुई हैं ट्रंप ने क्यों लिया यह फैसला? डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि: अमेरिका अपने प्रमुख सैन्य लक्ष्य हासिल कर चुका है अब स्थायी शांति समझौते की दिशा में बातचीत जरूरी है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलना प्राथमिक शर्त थी, जिस पर ईरान राजी हो गया यह फैसला शहबाज शरीफ और पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व के साथ बातचीत के बाद लिया गया। ईरान की शर्तें क्या हैं? ईरान ने संघर्षविराम के लिए 10 सूत्रीय प्रस्ताव रखा, जिसमें प्रमुख बिंदु शामिल हैं: क्षेत्रीय हमलों को पूरी तरह रोकना ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाना फ्रीज की गई संपत्तियों को वापस करना होर्मुज मार्ग को सुरक्षित और खुला रखना परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता ईरान के नेतृत्व, जिसमें मोज्तबा खामेनेई की भूमिका अहम मानी जा रही है, ने इन शर्तों पर सहमति के बाद सीजफायर को मंजूरी दी। इजरायल की सबसे बड़ी चिंता इजरायल के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि: सीजफायर का असर लेबनान और हिजबुल्लाह पर पड़ सकता है उसकी स्वतंत्र सैन्य रणनीति सीमित हो सकती है हालांकि इजरायल ने औपचारिक रूप से सीजफायर का सम्मान करने की बात कही है, लेकिन अंदरूनी असंतोष साफ नजर आ रहा है। आगे क्या होगा? 14 दिन का यह संघर्षविराम बेहद अहम है पाकिस्तान में आगे शांति वार्ता प्रस्तावित है चीन और अन्य देशों की भूमिका भी बढ़ सकती है यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह अस्थायी शांति स्थायी समाधान का रास्ता खोल पाएगी या फिर क्षेत्र में तनाव दोबारा बढ़ेगा।  

surbhi अप्रैल 8, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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abhishek singh जून 30, 2026 0