जमशेदपुर। जमशेदपुर में 21 जून को आयोजित होने वाली NEET-UG 2026 परीक्षा को पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए जिला प्रशासन ने व्यापक तैयारियां शुरू कर दी हैं। उपायुक्त राजीव रंजन की अध्यक्षता में आयोजित समीक्षा बैठक में परीक्षा संचालन से जुड़े सभी पहलुओं पर चर्चा की गई। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि परीक्षा केंद्रों पर केवल सरकारी कर्मियों को ही इनविजिलेटर (वीक्षक) के रूप में नियुक्त किया जाएगा। पूरी परीक्षा प्रक्रिया की होगी वीडियोग्राफी परीक्षा के दौरान किसी भी प्रकार की अनियमितता को रोकने के लिए सभी केंद्रों पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था रहेगी। अभ्यर्थियों की प्रवेश से पहले सघन फ्रिस्किंग की जाएगी और पूरी परीक्षा प्रक्रिया की वीडियोग्राफी कराई जाएगी। इसके अलावा परीक्षा से एक दिन पहले सभी परीक्षा केंद्रों को सैनिटाइज कर सील कर दिया जाएगा, ताकि किसी भी तरह की गड़बड़ी की संभावना समाप्त हो सके। भीड़ नियंत्रण और ट्रैफिक व्यवस्था पर विशेष ध्यान उपायुक्त ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि परीक्षा के दिन शहर में सुचारु यातायात और भीड़ प्रबंधन सुनिश्चित किया जाए। प्रमुख चौक-चौराहों तथा परीक्षा केंद्रों के बाहर मजिस्ट्रेट और पुलिस बल की तैनाती की जाएगी। साथ ही बिजली, पेयजल और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता भी सुनिश्चित की जाएगी। 8 केंद्रों पर होगी परीक्षा, 4 हजार से अधिक परीक्षार्थी होंगे शामिल जिले के छह शिक्षण संस्थानों में कुल आठ परीक्षा केंद्र बनाए गए हैं, जहां 4,000 से अधिक अभ्यर्थी परीक्षा देंगे। परीक्षा दोपहर 2:00 बजे से शाम 5:15 बजे तक आयोजित होगी। परीक्षार्थियों को सुबह 11:00 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक ही प्रवेश मिलेगा। इसके बाद किसी भी परिस्थिति में प्रवेश की अनुमति नहीं होगी। इन केंद्रों पर आयोजित होगी परीक्षा परीक्षा एलबीएसएम कॉलेज करनडीह, जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज, जमशेदपुर वीमेंस यूनिवर्सिटी, द ग्रेजुएट स्कूल कॉलेज फॉर वीमेंस, राजकीय आदिवासी हाई स्कूल सीतारामडेरा और एलबीएसएम कॉलेज गोलमुरी सहित कुल आठ केंद्रों पर आयोजित की जाएगी। अधिकारियों ने की तैयारियों की समीक्षा बैठक में सिटी एसपी ललित मीणा, एसडीएम धालभूम अर्णव मिश्रा, एएसपी ऋषभ त्रिवेदी, एडीएम लॉ एंड ऑर्डर राहुलजी आनंदजी समेत विभिन्न कॉलेजों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। प्रशासन का लक्ष्य परीक्षा को सुरक्षित, पारदर्शी और कदाचारमुक्त तरीके से संपन्न कराना है।
नई दिल्ली: सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि 30 जून 2026 से भारत में कागज के नोटों की जगह प्लास्टिक करेंसी शुरू कर दी जाएगी। वीडियो में यह भी कहा गया है कि 10, 20, 50 और 100 रुपये के मौजूदा नोट धीरे-धीरे बंद कर दिए जाएंगे। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) ने इन दावों को पूरी तरह फर्जी बताया है। सोशल मीडिया पर क्या किया जा रहा है दावा? वायरल वीडियो में कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार और RBI जल्द ही पॉलीमर यानी प्लास्टिक के नोट जारी करने वाले हैं और 30 जून 2026 तक पुराने कागजी नोटों को बदल दिया जाएगा। वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कथित आवाज का भी इस्तेमाल किया गया है। क्या है वायरल दावे की सच्चाई? इन दावों के सामने आने के बाद प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) ने फैक्ट चेक जारी कर स्थिति स्पष्ट की। RBI के हवाले से बताया गया कि फिलहाल कागज के नोटों को वापस लेने या उनकी जगह प्लास्टिक करेंसी लाने की कोई योजना नहीं है। PIB ने यह भी कहा कि वायरल वीडियो डिजिटल रूप से एडिट किया गया है और उसमें किए गए दावे भ्रामक हैं। लोगों से क्या अपील की गई? सरकार ने लोगों से अपील की है कि नोटों और बैंकिंग से जुड़ी किसी भी जानकारी के लिए केवल भारतीय रिजर्व बैंक की आधिकारिक वेबसाइट पर ही भरोसा करें। सोशल मीडिया पर वायरल किसी भी संदेश या वीडियो को बिना जांचे-परखे साझा न करें। अगर किसी को सरकार से जुड़ा कोई संदिग्ध या फर्जी कंटेंट दिखाई देता है, तो उसकी शिकायत @PIBFactCheck के माध्यम से की जा सकती है। किन देशों में चलते हैं प्लास्टिक के नोट? दुनिया के कई देशों में पॉलीमर आधारित नोट पहले से इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इनमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया, न्यूजीलैंड और वियतनाम जैसे देश शामिल हैं। प्लास्टिक के नोट कैसे बनते हैं? विशेषज्ञों के अनुसार, ये नोट सामान्य प्लास्टिक से नहीं बल्कि पॉलीमर सामग्री, विशेष रूप से पॉलीप्रोपलीन से बनाए जाते हैं। ये पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में अधिक मजबूत और टिकाऊ होते हैं तथा जल्दी खराब नहीं होते।
रांची। झारखंड में चिकित्सा शिक्षा को नई दिशा देने की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य के प्रमुख चिकित्सा संस्थान रिम्स रांची में स्नातक (UG), स्नातकोत्तर (PG) और सुपर स्पेशियलिटी पाठ्यक्रमों की सीटों में उल्लेखनीय वृद्धि की जाएगी। स्वास्थ्य विभाग ने इस संबंध में रिम्स प्रशासन को विस्तृत प्रस्ताव तैयार करने का निर्देश दिया है। इस पहल का उद्देश्य राज्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या बढ़ाना और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना है। केंद्र और राज्य मिलकर उठाएंगे खर्च केंद्र प्रायोजित योजना के तहत मेडिकल कॉलेजों में सीटें बढ़ाने के लिए प्रति सीट लगभग 1.5 करोड़ रुपये तक की वित्तीय सहायता दी जाएगी। इसमें 60 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार और 40 प्रतिशत राज्य सरकार वहन करेगी। योजना के तहत रिम्स में UG सीटों को 180 से बढ़ाकर 250, PG सीटों को 176 से बढ़ाकर 275 और सुपर स्पेशियलिटी सीटों को 11 से बढ़ाकर 100 करने का लक्ष्य रखा गया है। MGM और धनबाद मेडिकल कॉलेज को मिल चुकी मंजूरी स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, एमजीएम मेडिकल कॉलेज, जमशेदपुर में UG सीटें 150 से बढ़ाकर 250 और PG सीटें 49 से बढ़ाकर 200 करने के प्रस्ताव को पहले ही मंजूरी मिल चुकी है। वहीं, धनबाद मेडिकल कॉलेज में UG सीटें 100 से बढ़ाकर 250 और PG सीटें 19 से बढ़ाकर 200 करने के प्रस्ताव को भी भारत सरकार की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है। PPP मॉडल पर बनेंगे नए छात्रावास रिम्स-टू परियोजना के तहत छात्रावास निर्माण के लिए नई रणनीति अपनाई जाएगी। राज्य सरकार ने निर्णय लिया है कि हॉस्टल निर्माण पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर किया जाएगा। इसके लिए केंद्र सरकार के वायबिलिटी गैप फंड (VGF) से सहायता लेने की योजना है। इससे सरकारी खर्च कम होगा और छात्रों को आधुनिक सुविधाओं से युक्त बेहतर आवास उपलब्ध कराया जा सकेगा। चिकित्सा शिक्षा को मिलेगा नया आयाम सीटों में बढ़ोतरी और आधुनिक बुनियादी ढांचे के विकास से झारखंड में मेडिकल शिक्षा को बड़ा लाभ मिलेगा। इससे राज्य के छात्रों को अधिक अवसर मिलेंगे और भविष्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी को दूर करने में मदद मिलेगी।
रांची। झारखंड में आजसू पार्टी ने धनबाद में अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ कथित पुलिस कार्रवाई के विरोध में बड़ा आंदोलन करने का ऐलान किया है। बोकारो में आयोजित पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक में 22 जून को धनबाद में आक्रोश मार्च निकालने का निर्णय लिया गया। पार्टी का कहना है कि यह आंदोलन पुलिस बर्बरता और कार्यकर्ताओं के साथ हुए कथित अन्याय के खिलाफ होगा। केंद्रीय नेतृत्व ने बनाई आगे की रणनीति बैठक में सुदेश महतो , चंद्र प्रकाश चौधरी सहित पार्टी के केंद्रीय और जिला स्तरीय पदाधिकारी शामिल हुए। इस दौरान संगठन को मजबूत करने, राज्य के समसामयिक राजनीतिक मुद्दों और जनसरोकार से जुड़े विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। पार्टी नेतृत्व ने आगामी कार्यक्रमों और संगठन विस्तार की रणनीति पर भी मंथन किया। 22 जून को होगा आक्रोश मार्च आजसू पार्टी के मुख्य प्रवक्ता डॉ। देवशरण भगत ने बताया कि धनबाद की घटना को लेकर कार्यकर्ताओं और आम लोगों में नाराजगी है। इसी के मद्देनजर पार्टी स्थापना दिवस और बलिदान दिवस के अवसर पर 22 जून को धनबाद में आक्रोश मार्च आयोजित करेगी। पार्टी का दावा है कि इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक शामिल होंगे। महिला और युवा सम्मेलन पर भी जोर संगठन विस्तार को गति देने के लिए पार्टी ने आगामी महीनों में दो बड़े कार्यक्रमों की घोषणा की है। 5 जुलाई को रांची में महिला सम्मेलन आयोजित किया जाएगा, जबकि 7 और 8 अगस्त को जमशेदपुर में युवा सम्मेलन होगा। पार्टी का मानना है कि इन आयोजनों से महिलाओं और युवाओं की भागीदारी बढ़ेगी और उन्हें नेतृत्व की मुख्यधारा में आने का अवसर मिलेगा। सड़क से सदन तक संघर्ष का दावा सुदेश महतो ने आरोप लगाया कि धनबाद की घटना में पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ अन्याय हुआ है, जिससे लोगों में असंतोष है। उन्होंने कहा कि आजसू जनसरोकार के मुद्दों को लेकर सड़क से लेकर सदन तक संघर्ष जारी रखेगी। पार्टी का लक्ष्य आगामी कार्यक्रमों के माध्यम से संगठन को और मजबूत करना तथा राज्यभर में कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना है।
वार्ड 18 के पार्षद अंकुर सिंह ने वार्ड 29 की पार्षद अर्चना सिंह को महज एक वोट से हराया, जीत के बाद समर्थकों में जश्न एक वोट से तय हुआ डिप्टी मेयर का चुनाव आदित्यपुर नगर निगम में उप महापौर (डिप्टी मेयर) पद के लिए हुए चुनाव में बेहद रोमांचक मुकाबला देखने को मिला। वार्ड संख्या 18 के पार्षद अंकुर सिंह ने वार्ड संख्या 29 की पार्षद अर्चना सिंह को मात्र एक वोट से हराकर डिप्टी मेयर पद पर जीत दर्ज की। मतगणना के दौरान दोनों प्रत्याशियों के बीच कांटे की टक्कर रही और नतीजों को लेकर पार्षदों और समर्थकों में काफी उत्सुकता बनी रही। अंततः जब अंतिम परिणाम घोषित हुआ तो अंकुर सिंह को एक वोट की बढ़त मिली, जिसके साथ ही उन्होंने यह चुनाव अपने नाम कर लिया। परिणाम सामने आते ही उनके समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ गई। समर्थकों ने फूल-मालाओं से उनका स्वागत किया और जीत का जश्न मनाया। जीत के बाद विकास का भरोसा नवनिर्वाचित डिप्टी मेयर अंकुर सिंह ने अपनी जीत के बाद सभी पार्षदों और समर्थकों का आभार जताया। उन्होंने कहा कि आदित्यपुर नगर निगम क्षेत्र के विकास के लिए वे सभी जनप्रतिनिधियों के साथ मिलकर काम करेंगे। अंकुर सिंह ने कहा कि उनकी प्राथमिकता शहर की बुनियादी समस्याओं को दूर करना और जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना होगा। मैनेजमेंट की पढ़ाई कर चुके हैं अंकुर सिंह अंकुर सिंह की शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी काफी मजबूत रही है। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई लोयोला स्कूल, जमशेदपुर से 10वीं तक पूरी की। इसके बाद 12वीं की पढ़ाई गुड शेफर्ड इंटरनेशनल स्कूल, ऊटी से की। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने एसपी जैन स्कूल ऑफ ग्लोबल मैनेजमेंट से मैनेजमेंट की शिक्षा हासिल की। इसके अलावा उन्होंने पहले मुंबई से और बाद में कोविड काल के दौरान दुबई से ऑनलाइन फाइनेंस में स्पेशलाइजेशन का कोर्स भी किया। वर्तमान में वे अपने बिजनेस फर्म में डायरेक्टर हैं और एक इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी में पार्टनर के रूप में भी काम कर रहे हैं। शहर की रैंकिंग सुधारने की योजना डिप्टी मेयर बनने के बाद अंकुर सिंह ने आदित्यपुर के विकास के लिए कई योजनाओं की रूपरेखा तैयार की है। उनका कहना है कि वे सबसे पहले आदित्यपुर शहर की राष्ट्रीय स्तर पर रैंकिंग सुधारने पर काम करेंगे। इसके साथ ही शहर में जलापूर्ति की समस्या को दूर करने, बेहतर ठोस कचरा प्रबंधन प्लांट स्थापित करने और आदित्यपुर को अन्य राज्यों के विकसित शहरों की तरह पहचान दिलाने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। कम उम्र में माता-पिता को खोया अंकुर सिंह के जीवन में व्यक्तिगत चुनौतियां भी रही हैं। जब वे 18 वर्ष के थे, तब वर्ष 2017 में उनकी मां का असामयिक निधन हो गया। इसके चार साल बाद 2021 में कोरोना संक्रमण के कारण उनके पिता प्रवीण सिंह का भी निधन हो गया। परिवार में उनकी एक छोटी बहन है और दोनों ने मिलकर कठिन परिस्थितियों का सामना किया। परिवार का राजनीति से भी जुड़ाव अंकुर सिंह के बड़े पापा अरविंद सिंह ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक रह चुके हैं। इसके अलावा उनके परिवार का सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी खास योगदान रहा है। ओल्ड हाउसिंग कॉलोनी में उनके घर के पास आयोजित होने वाली दुर्गा पूजा अपने भव्य और अलग-अलग थीम वाले पंडालों के लिए पूरे कोल्हान क्षेत्र में चर्चित रहती है।
जमशेदपुर। गैंगस्टर विक्रम शर्मा की हत्या के मामले में पुलिस ने जांच तेज कर दी है। इस मामले में अदालत ने जमशेदपुर के छह आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया है। वारंट जारी होने के बाद पुलिस उनकी तलाश में लगातार छापेमारी कर रही है। बताया जा रहा है कि सभी आरोपियों पर पहले से ही 25-25 हजार रुपये का इनाम घोषित है। हत्या के 26 दिन बाद भी मुख्य शूटर और साजिशकर्ता पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। इन आरोपियों के खिलाफ जारी हुआ वारंट अदालत द्वारा जिन आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है, उनमें बागबेड़ा थाना क्षेत्र के अंकित वर्मा, आशुतोष सिंह, विशाल सिंह, आकाश कुमार प्रसाद और यशराज सिंह शामिल हैं। इसके अलावा मानगो के ओलीडीह निवासी जितेंद्र कुमार साहू का नाम भी इस सूची में शामिल है। जमशेदपुर में लगातार दबिश सूत्रों के अनुसार, Uttarakhand Special Task Force और Dehradun Police की टीम लगातार Jamshedpur में छापेमारी कर रही है। टीम ने बागबेड़ा, जुगसलाई और मानगो इलाके में कई बार दबिश दी है, लेकिन अब तक मुख्य आरोपी पुलिस की पकड़ में नहीं आ सके हैं। अब तक दो मददगार गिरफ्तार इस हत्याकांड में पुलिस अब तक दो लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है। इनमें बागबेड़ा थाना क्षेत्र के गाराबासा निवासी राजकुमार सिंह और ग्रेटर नोएडा से मोहित उर्फ अक्षत ठाकुर शामिल हैं। पुलिस के अनुसार, इन दोनों पर हत्या में आरोपियों की मदद करने का आरोप है। 13 फरवरी को हुई थी हत्या बताया जाता है कि 13 फरवरी को Dehradun के सिल्वर मॉल के पास गैंगस्टर विक्रम शर्मा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। घटना के बाद इलाके में सनसनी फैल गई थी और पुलिस ने तुरंत जांच शुरू कर दी थी। जांच में जमशेदपुर कनेक्शन सामने आने के बाद से पुलिस की टीमें झारखंड में लगातार छापेमारी कर रही हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।