रांची। हर साल 16 जुलाई को दुनिया भर में विश्व सर्प दिवस (World Snake Day) मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों में सांपों के प्रति जागरूकता बढ़ाना, उनसे जुड़े भ्रम दूर करना और पर्यावरण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को समझाना है। झारखंड जैसे राज्यों में, जहां मानसून के दौरान सांप निकलने की घटनाएं बढ़ जाती हैं, यह दिन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। राज्य स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 से अप्रैल 2026 तक झारखंड में स्नेकबाइट के 9,438 मामले दर्ज किए गए हैं। इस दौरान कई लोगों की जान भी गई है। हर साल बढ़ रहे हैं स्नेकबाइट के मामले स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, वर्ष 2022 में 392, 2023 में 1,647, 2024 में 2,760 और 2025 में 4,078 स्नेकबाइट के मामले दर्ज किए गए। अप्रैल 2026 तक ही 561 मामले सामने आ चुके हैं। बढ़ती घटनाओं को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने सभी सरकारी अस्पतालों और चिकित्सकों को केंद्र सरकार की स्नेकबाइट उपचार संबंधी गाइडलाइन का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया है। झारखंड में 40 से 50 प्रजाति के सांप वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक झारखंड में 40 से 50 प्रजातियों के सांप पाए जाते हैं। इनमें इंडियन कोबरा (नाग), कॉमन करैत, बैंडेड करैत, रसेल वाइपर और बांस पिट वाइपर प्रमुख विषैले सांप हैं। वहीं धामिन, ग्रीन वाइन स्नेक और वुल्फ स्नेक जैसी कई प्रजातियां विषहीन हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश सांप इंसानों पर हमला नहीं करते और वे पर्यावरण में चूहों व अन्य कीटों की संख्या नियंत्रित कर पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। सांप काटने पर झाड़-फूंक नहीं, तुरंत अस्पताल जाएं डॉक्टरों का कहना है कि सांप काटने की स्थिति में घबराने के बजाय मरीज को शांत रखें और जितनी जल्दी हो सके अस्पताल पहुंचाएं। प्रभावित अंग को स्थिर रखें, रस्सी या कपड़ा कसकर न बांधें और झाड़-फूंक या घरेलू उपचार के बजाय समय पर एंटी स्नेक वेनम (ASV) उपलब्ध कराना सबसे प्रभावी इलाज है। विशेषज्ञों का मानना है कि सही समय पर चिकित्सकीय उपचार मिलने से अधिकांश मरीजों की जान बचाई जा सकती है।
कार्डिफ, एजेंसियां। भारत और इंग्लैंड के बीच तीन मैचों की वनडे सीरीज का दूसरा मुकाबला गुरुवार को कार्डिफ के सोफिया गार्डन्स मैदान में खेला जाएगा। पहला मुकाबला छह विकेट से जीतकर टीम इंडिया सीरीज में 1-0 की बढ़त बना चुकी है। अब भारतीय टीम की नजर इंग्लैंड के खिलाफ लगातार चौथी वनडे सीरीज जीतने पर होगी। भारत ने इससे पहले 2021 में घरेलू मैदान पर 2-1, 2022 में इंग्लैंड में 2-1 और 2025 में भारत में 3-0 से सीरीज अपने नाम की थी। कार्डिफ में शानदार रहा है भारत का रिकॉर्ड कार्डिफ में भारतीय टीम का रिकॉर्ड बेहद मजबूत रहा है। टीम इंडिया को इस मैदान पर आखिरी वनडे हार 2011 में इंग्लैंड के खिलाफ मिली थी। इसके बाद भारत ने यहां 2013 चैंपियंस ट्रॉफी में दक्षिण अफ्रीका और श्रीलंका को हराया, जबकि 2014 में इंग्लैंड को 133 रन से शिकस्त दी थी। ऐसे में भारतीय टीम आत्मविश्वास के साथ मैदान पर उतरेगी। गिल, अक्षर और बुमराह पर रहेंगी नजरें कप्तान शुभमन गिल शानदार फॉर्म में हैं। उन्होंने इस साल सात वनडे मैचों में 453 रन बनाए हैं और पहले वनडे में भी 80 रनों की कप्तानी पारी खेली थी। हालांकि उन्हें हल्की चोट के कारण रिटायर्ड हर्ट होना पड़ा था, लेकिन दूसरे मुकाबले में उनके खेलने की उम्मीद है। वहीं अक्षर पटेल ने पहले मैच में नाबाद अर्धशतक लगाने के साथ चार विकेट भी झटके थे। तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह की वापसी से भारतीय गेंदबाजी और मजबूत हुई है, जबकि प्रसिद्ध कृष्णा भी लगातार विकेट निकाल रहे हैं। इंग्लैंड वापसी की कोशिश में इंग्लैंड की उम्मीदें अनुभवी बल्लेबाज जो रूट पर टिकी होंगी, जिन्होंने पहले वनडे में नाबाद 76 रन बनाए थे। कप्तान हैरी ब्रूक की टीम गेंदबाजी संयोजन में बदलाव कर चौथे तेज गेंदबाज को मौका दे सकती है। पिच और मौसम बल्लेबाजी के अनुकूल सोफिया गार्डन्स की पिच पर शुरुआती ओवरों में तेज गेंदबाजों को मदद मिलने की संभावना है, लेकिन बाद में बल्लेबाजी आसान हो जाती है। पिछले वर्षों में यहां लक्ष्य का पीछा करने वाली टीमों का रिकॉर्ड बेहतर रहा है। मौसम साफ रहने और बारिश की संभावना नहीं होने से पूरे 50 ओवर का मुकाबला होने की उम्मीद है। भारत इस मैच को जीतकर सीरीज अपने नाम करने के इरादे से मैदान में उतरेगा।
रांची। मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और गुणवत्तापूर्ण सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से रिम्स (राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान) के निदेशक प्रो. डॉ. डी. के. सिन्हा ने मंगलवार को सेंट्रल किचन और मेडिसिन विभाग का औचक निरीक्षण किया। इस दौरान चिकित्सा अधीक्षक प्रो. डॉ. हिरेन्द्र बिरुआ, उप चिकित्सा अधीक्षक सहित कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। निरीक्षण के दौरान अस्पताल की व्यवस्थाओं, भोजन की गुणवत्ता और विभागीय कार्यप्रणाली की गहन समीक्षा की गई। सेंट्रल किचन की सफाई पर जताई नाराजगी निरीक्षण के दौरान निदेशक ने भोजन तैयार करने की प्रक्रिया, खाद्य सामग्री के भंडारण, रसोईघर की स्वच्छता और भोजन वितरण व्यवस्था का जायजा लिया। किचन के कुछ हिस्सों में सफाई व्यवस्था संतोषजनक नहीं मिलने पर उन्होंने नाराजगी जताई और संबंधित अधिकारियों को तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए। साथ ही सभी रिकॉर्ड और व्यवस्थाओं को नियमित रूप से अपडेट रखने पर भी जोर दिया। मरीजों को मिले पौष्टिक और सुरक्षित भोजन डॉ. सिन्हा ने स्पष्ट किया कि अस्पताल में भर्ती प्रत्येक मरीज को निर्धारित मानकों के अनुरूप स्वच्छ, पौष्टिक और गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उन्होंने संबंधित एजेंसी और अधिकारियों को खाद्य सुरक्षा के सभी मानकों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। साथ ही चेतावनी दी कि यदि भोजन की गुणवत्ता या स्वच्छता में किसी भी प्रकार की लापरवाही पाई गई तो संबंधित लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। मेडिसिन विभाग की कार्यप्रणाली की भी समीक्षा सेंट्रल किचन के निरीक्षण के बाद निदेशक ने मेडिसिन विभाग का भी दौरा किया। उन्होंने विभाग में उपलब्ध चिकित्सकीय सुविधाओं, संसाधनों और मरीजों के इलाज की व्यवस्था की समीक्षा की। विभागाध्यक्ष के अवकाश पर रहने के कारण उन्होंने मौजूद चिकित्सकों और अधिकारियों से मरीजों की संख्या, उपचार व्यवस्था और सामने आ रही चुनौतियों पर चर्चा की। बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं पर जोर निदेशक ने चिकित्सकों से मरीजों को समयबद्ध, संवेदनशील और गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध कराने की अपील की। उन्होंने कहा कि मेडिसिन विभाग किसी भी अस्पताल की रीढ़ होता है, इसलिए इसे संसाधनों से मजबूत बनाना आवश्यक है। रिम्स प्रबंधन ने भी भरोसा दिलाया कि निरीक्षण के दौरान सामने आई कमियों को जल्द दूर किया जाएगा, ताकि मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधाओं के साथ सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराया जा सके।
लोहरदगा। झारखंड के लोहरदगा सदर अस्पताल में डॉक्टरों और आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता के बावजूद मरीजों, खासकर गर्भवती महिलाओं को निजी अस्पतालों में रेफर किए जाने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। हाल ही में एक गर्भवती महिला को रेफर किए जाने के बाद स्कूटी से निजी अस्पताल ले जाने की घटना ने स्वास्थ्य व्यवस्था और अस्पताल में सक्रिय बिचौलियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सिजेरियन के नाम पर बढ़ रहे रेफरल जानकारी के अनुसार, सामान्य प्रसव की तुलना में सिजेरियन डिलीवरी के मामलों में मरीजों को अक्सर निजी अस्पताल भेज दिया जाता है। जबकि सदर अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ, शिशु रोग विशेषज्ञ और एनेस्थेटिस्ट जैसी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हैं। चिकित्सा पदाधिकारियों के 11 स्वीकृत पदों में से फिलहाल पांच चिकित्सक कार्यरत हैं, जिनमें तीन महिला चिकित्सक और दोनों स्वीकृत स्त्री रोग विशेषज्ञ भी शामिल हैं। बिचौलियों की भूमिका पर उठ रहे सवाल स्थानीय लोगों का आरोप है कि निजी अस्पतालों के एजेंट अस्पताल परिसर में सक्रिय रहते हैं और मरीजों व उनके परिजनों को बहलाकर निजी अस्पतालों में ले जाते हैं। कई मामलों में मरीजों को सुरक्षित एंबुलेंस के बजाय निजी वाहनों से ले जाया जाता है, जिससे उनकी जान भी जोखिम में पड़ सकती है। हालिया घटना के बाद जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग ने जांच शुरू कर दी है। सरकारी सुविधाओं के बावजूद निजी अस्पतालों का रुख स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, केवल मई 2026 में लोहरदगा सदर प्रखंड की 18 गर्भवती महिलाओं का प्रसव निजी अस्पतालों में हुआ। यह सवाल खड़ा होता है कि जब सरकारी अस्पताल में आवश्यक संसाधन मौजूद हैं, तब भी मरीजों को बाहर क्यों जाना पड़ रहा है। सुधार की जरूरत स्वास्थ्य विभाग ने मामले की जांच का आश्वासन दिया है, लेकिन लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों से स्पष्ट है कि केवल संसाधन उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। अस्पताल प्रबंधन, रेफरल प्रक्रिया और बिचौलियों पर प्रभावी नियंत्रण के बिना मरीजों का सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर भरोसा बहाल करना बड़ी चुनौती बना हुआ है।
रांची। रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में इलाज के लिए आने वाले न्यूरो मरीजों के लिए अच्छी खबर है। मरीजों की लगातार बढ़ती संख्या और बेड की कमी को देखते हुए न्यूरोसर्जरी विभाग में 70 नए बेड जोड़ने का निर्णय लिया गया है। इस पहल से विभाग की क्षमता में बड़ा इजाफा होगा और मरीजों को समय पर भर्ती एवं बेहतर इलाज की सुविधा मिल सकेगी। हर दिन बड़ी संख्या में पहुंचते हैं मरीज रिम्स झारखंड का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल होने के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों के मरीजों के लिए भी प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र है। न्यूरोसर्जरी विभाग में प्रतिदिन बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। कई बार बेड उपलब्ध नहीं होने के कारण मरीजों और उनके परिजनों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। गंभीर मरीजों को अस्थायी व्यवस्था के तहत इलाज कराना पड़ता था, जिससे परेशानी और बढ़ जाती थी। गंभीर बीमारियों के इलाज में होगी सुविधा न्यूरोसर्जरी विभाग में ब्रेन ट्यूमर, सिर की गंभीर चोट, रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याएं और अन्य जटिल न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का इलाज किया जाता है। नए बेड जुड़ने से मरीजों को जल्द भर्ती करने में मदद मिलेगी और इलाज में देरी की संभावना कम होगी। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इससे गंभीर मरीजों को सबसे अधिक लाभ मिलेगा। स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने की दिशा में कदम रिम्स प्रशासन पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार पर लगातार काम कर रहा है। विभिन्न विभागों में बेड बढ़ाने, नए आईसीयू शुरू करने और आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में कई योजनाएं लागू की जा रही हैं। न्यूरोसर्जरी विभाग में 70 अतिरिक्त बेड जोड़ना इसी प्रयास का हिस्सा है। मरीजों और परिजनों में बढ़ी उम्मीद नई व्यवस्था की जानकारी सामने आने के बाद मरीजों और उनके परिजनों में राहत की उम्मीद जगी है। लंबे समय से बेड की कमी से जूझ रहे लोगों का मानना है कि इस फैसले से अस्पताल में भर्ती प्रक्रिया आसान होगी और मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकेंगी। रिम्स की यह पहल राज्य के स्वास्थ्य ढांचे को और मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
हजारीबाग। झारखंड के प्रमुख सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में शामिल शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल एक बार फिर अपनी अव्यवस्थाओं को लेकर चर्चा में है। इस बार अस्पताल के शौचालयों की बदहाल स्थिति ने मरीजों और उनके परिजनों की परेशानी बढ़ा दी है। अस्पताल के कई शौचालयों में दरवाजे नहीं हैं, जबकि कुछ जगहों पर लगे दरवाजे इतने जर्जर हो चुके हैं कि उनका उपयोग करना संभव नहीं है। गोपनीयता और सम्मान पर संकट अस्पताल में इलाज करा रहे मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि शौचालय का इस्तेमाल करना उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया है। दरवाजे नहीं होने के कारण लोगों को अपनी गोपनीयता बनाए रखने के लिए परिजनों को बाहर खड़ा करना पड़ता है या फिर चादर लगाकर किसी तरह शौचालय का उपयोग करना पड़ता है। मरीजों का कहना है कि अस्पताल में भर्ती होने के बाद उन्हें बीमारी के साथ-साथ इस तरह की असुविधाओं का भी सामना करना पड़ रहा है। विशेष रूप से महिलाओं और बुजुर्ग मरीजों को काफी परेशानी झेलनी पड़ रही है। सरकारी योजनाओं पर उठे सवाल परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार पूरे देश में स्वच्छता और शौचालय निर्माण को बढ़ावा देने के लिए अभियान चला रही है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में घर-घर शौचालय बनाए गए हैं, लेकिन राज्य के बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल में ही बुनियादी सुविधाओं का अभाव चिंताजनक है। उन्होंने मांग की कि अस्पताल प्रशासन जल्द से जल्द शौचालयों की मरम्मत कराए और सभी टूटे हुए दरवाजों को बदले, ताकि मरीजों को सम्मानजनक वातावरण मिल सके। प्रबंधन ने मानी समस्या शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के डिप्टी सुपरिटेंडेंट (डीएस) डॉ. राजकिशोर ने भी शौचालयों की खराब स्थिति को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि महिला और पुरुष दोनों वार्डों के कुछ शौचालयों में ऐसी समस्या मौजूद है। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि अब तक मरम्मत का कार्य क्यों नहीं कराया गया। डॉ. राजकिशोर ने आश्वासन दिया कि आने वाले दिनों में आवश्यक कदम उठाए जाएंगे और शौचालयों की स्थिति सुधारने का प्रयास किया जाएगा। तत्काल सुधार की जरूरत अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान पर शौचालयों की ऐसी स्थिति न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाती है, बल्कि मरीजों की गरिमा और सुविधा पर भी सवाल खड़े करती है। स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ स्वच्छ और सुरक्षित बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना भी अस्पताल प्रबंधन की जिम्मेदारी है। ऐसे में मरीजों और परिजनों को उम्मीद है कि प्रशासन जल्द कार्रवाई कर इस समस्या का स्थायी समाधान करेगा।
रांची। राजधानी रांची समेत पूरे झारखंड में लगातार बढ़ रही गर्मी और हीट वेव को देखते हुए रिम्स प्रशासन अलर्ट मोड में आ गया है। लू और हीट स्ट्रोक के मामलों में बढ़ोतरी की आशंका को देखते हुए अस्पताल में मरीजों के इलाज के लिए विशेष तैयारियां की गई हैं। रिम्स प्रबंधन ने बताया कि गर्मी के इस दौर में आम लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है। रिम्स के अनुसार, हीट स्ट्रोक से प्रभावित मरीजों का इलाज मुख्य रूप से मेडिसीन और पीडियाट्रिक्स विभाग में किया जाएगा। मरीज की स्थिति और लक्षणों के आधार पर उपचार की व्यवस्था की गई है। अस्पताल प्रशासन ने यह भी कहा है कि यदि आने वाले दिनों में मरीजों की संख्या बढ़ती है, तो अलग से डेडिकेटेड बेड की व्यवस्था भी की जा सकती है। बच्चों और बुजुर्गों को ज्यादा खतरा डॉक्टरों का कहना है कि तेज गर्मी और लगातार बढ़ते तापमान के कारण बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों में हीट स्ट्रोक का खतरा अधिक रहता है। ऐसे में इन वर्गों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। रिम्स प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि बिना जरूरी काम के दोपहर के समय घर से बाहर न निकलें। धूप से बचाव के लिए जरूरी सलाह अस्पताल प्रबंधन ने आम लोगों को पर्याप्त मात्रा में पानी पीने, हल्के और ढीले सूती कपड़े पहनने तथा बाहर निकलते समय सिर और शरीर को ढककर रखने की सलाह दी है। तेज धूप में निकलने पर छाता, गमछा या टोपी का इस्तेमाल करने को कहा गया है। इसके अलावा शरीर में पानी की कमी से बचने के लिए ओआरएस, नींबू पानी और अन्य तरल पदार्थ लेने की सलाह भी दी गई है। रिम्स प्रशासन ने कहा कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करना बेहद जरूरी है, ताकि हीट वेव के खतरे से बचा जा सके। लगातार बढ़ती गर्मी को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग भी स्थिति पर नजर बनाए हुए है।
देवघर। झारखंड के देवघर स्थित सदर अस्पताल में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। यहां इलाज के लिए आने वाले मरीजों को जांच की उचित व्यवस्था नहीं मिलने से भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। राज्य सरकार भले ही स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के दावे कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग नजर आ रही है। कई जिलों के मरीजों का केंद्र, फिर भी सुविधाओं का अभाव देवघर का सदर अस्पताल न केवल जिले, बल्कि Dumka, Godda, Pakur, Sahibganj और Jamtara जैसे आसपास के जिलों के मरीजों के लिए भी प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र है। इसके बावजूद यहां बुनियादी सुविधाओं की कमी मरीजों के लिए बड़ी समस्या बनी हुई है। बंद पड़ी विशेष चिकित्सा व्यवस्था साल 2025 में गंभीर मरीजों के लिए शुरू की गई विशेष चिकित्सा सलाह सेवा कुछ ही महीनों में ठप हो गई। शुरुआत में मरीजों को इसका लाभ मिला, लेकिन बाद में विशेषज्ञ डॉक्टरों ने सेवा देना बंद कर दिया, जिससे यह व्यवस्था पूरी तरह बंद हो गई। एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड सेवा भी अधूरी अस्पताल में CSR फंड से शुरू की गई एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड मशीनें भी अब तक पूरी तरह चालू नहीं हो सकी हैं। मरीजों का कहना है कि अस्पताल में जांच सुविधा नहीं होने के कारण उन्हें निजी केंद्रों में महंगे दाम पर जांच करानी पड़ती है, जो गरीबों के लिए मुश्किल है। प्रशासन ने दी सफाई अस्पताल की उपाधीक्षक डॉ. सुषमा वर्मा के अनुसार, विशेषज्ञ डॉक्टरों को डेली वेजेस पर नियुक्त किया गया था, जिसके कारण उन्होंने काम जारी रखने से इनकार कर दिया। वहीं, जांच मशीनों के संचालन में कुछ कागजी प्रक्रियाएं बाकी हैं, जिन्हें जल्द पूरा कर सेवा शुरू करने का दावा किया गया है। सवालों के घेरे में स्वास्थ्य व्यवस्था ऐसे में सवाल उठता है कि जब सरकार बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का दावा कर रही है, तो देवघर जैसे महत्वपूर्ण केंद्र में ही मरीजों को बुनियादी जांच सुविधाएं क्यों नहीं मिल पा रही हैं।
रांची। झारखंड में ब्लड बैंकों में खून की भारी कमी सामने आई है। राज्य के कई सरकारी और निजी अस्पतालों में सीमित स्टॉक बचा है, जिसके कारण मरीजों को रिप्लेसमेंट डोनर लाने के बाद ही ब्लड उपलब्ध कराया जा रहा है। राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल Rajendra Institute of Medical Sciences (रिम्स) में भी ब्लड की कमी देखी जा रही है। यहां मरीजों के परिजनों को उसी ब्लड ग्रुप का डोनर लाने के बाद ही खून दिया जा रहा है। वर्तमान में रिम्स ब्लड बैंक में पॉजिटिव ग्रुप में ए-20, बी-22, ओ-30 और एबी-7 यूनिट ब्लड मौजूद है, जबकि निगेटिव ग्रुप में सिर्फ ए-निगेटिव की चार यूनिट बची हैं। वहीं सदर अस्पताल रांची में भी ब्लड का स्टॉक बेहद कम है। यहां ए-2, बी-3, ओ-3 और एबी-1 यूनिट पॉजिटिव ब्लड मौजूद है, जबकि किसी भी निगेटिव ग्रुप का ब्लड उपलब्ध नहीं है। रिप्लेसमेंट डोनर के बाद मिल रहा ब्लड अस्पतालों में स्थिति यह है कि जिस मरीज को जिस ग्रुप का ब्लड चाहिए, उसी ग्रुप का डोनर परिजनों को लाना पड़ रहा है। रिम्स में भर्ती मरीजों के अलावा निजी अस्पतालों के मरीजों के परिजन भी खून के लिए यहां पहुंच रहे हैं, जिससे दबाव और बढ़ गया है। हाईकोर्ट ने दिया था निर्देश Jharkhand High Court ने 18 दिसंबर 2025 को आदेश दिया था कि राज्य के किसी भी सरकारी या निजी अस्पताल में रिप्लेसमेंट डोनेशन नहीं कराया जाएगा। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने भी सभी ब्लड बैंकों को इस संबंध में निर्देश जारी किए थे। इसके बावजूद कई जगहों पर मरीजों को रिप्लेसमेंट डोनर लाने के बाद ही ब्लड मिल रहा है। स्वैच्छिक रक्तदान बढ़ाने पर जोर Jharkhand State AIDS Control Society के निदेशक छवि रंजन ने कहा कि जरूरतमंद करीब 90 प्रतिशत मरीजों को स्वैच्छिक रक्तदान के जरिए ब्लड उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इसके लिए लोगों को जागरूक करने के प्रयास किए जा रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि अगर कहीं रिप्लेसमेंट डोनेशन की शिकायत मिलती है तो इसकी जांच कराई जाएगी। फिलहाल राज्य में ब्लड की कमी को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
झारखंड के धनबाद में गुरुवार को सदर अस्पताल परिसर स्थित कुपोषण उपचार केंद्र का NITI Aayog की टीम ने औचक निरीक्षण किया। टीम ने करीब आधे घंटे तक केंद्र में रहकर वहां की व्यवस्थाओं और कुपोषित बच्चों के इलाज से जुड़ी सुविधाओं का जायजा लिया। निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने केंद्र में भर्ती बच्चों की संख्या, उनकी स्वास्थ्य स्थिति और उन्हें मिल रही चिकित्सा सुविधाओं के बारे में विस्तृत जानकारी ली। टीम ने डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों से बातचीत कर यह भी जाना कि बच्चों के इलाज की प्रक्रिया किस तरह से चल रही है। पोषण आहार और इलाज की व्यवस्था की जांच निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने कुपोषित बच्चों को दिए जा रहे पोषण आहार की गुणवत्ता और उपलब्धता की भी जानकारी ली। साथ ही यह देखा गया कि बच्चों को समय पर दवाइयां और नियमित स्वास्थ्य जांच की सुविधा मिल रही है या नहीं। टीम ने यह भी जाना कि बच्चों के साथ आने वाली माताओं को केंद्र में किस प्रकार की सुविधाएं और स्वास्थ्य संबंधी परामर्श दिए जा रहे हैं। साफ-सफाई और वार्ड व्यवस्था का लिया जायजा निरीक्षण के दौरान टीम ने केंद्र की साफ-सफाई, वार्ड की स्थिति और उपलब्ध संसाधनों का भी अवलोकन किया। स्वास्थ्यकर्मियों ने बताया कि कुपोषण से ग्रसित बच्चों के उपचार के लिए केंद्र में आवश्यक दवाएं और पोषण सामग्री उपलब्ध कराई जाती है और बच्चों के स्वास्थ्य की नियमित निगरानी की जाती है। करीब आधे घंटे तक निरीक्षण करने के बाद NITI Aayog की टीम अस्पताल परिसर से रवाना हो गई। अधिकारियों ने केंद्र की व्यवस्थाओं की समीक्षा कर संबंधित जानकारी एकत्र की।
पीजी सीटें बढ़ाने की प्रक्रिया तेज झारखंड के जमशेदपुर स्थित कोल्हान क्षेत्र के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान महात्मा गांधी मेमोरियल (MGM) मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में पोस्ट ग्रेजुएट (पीजी) सीटों की संख्या बढ़ाने की तैयारी तेज हो गई है। कॉलेज प्रबंधन ने विभिन्न विभागों में 38 नई पीजी सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव तैयार किया है। यह प्रस्ताव नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के मानकों के अनुरूप तैयार किया जा रहा है और आवश्यक दस्तावेजों के साथ रिपोर्ट भेजने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। यदि इस प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाती है तो अगले शैक्षणिक सत्र से कॉलेज में पीजी सीटों की कुल संख्या 51 से बढ़कर लगभग 89 हो सकती है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या में होगा इजाफा मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय कुमार के अनुसार, पीजी सीटों में वृद्धि होने से मेडिकल शिक्षा को नई मजबूती मिलेगी। इसके साथ ही एमजीएम अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या भी बढ़ेगी। उन्होंने बताया कि वर्तमान में कई विभागों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी के कारण मरीजों को इलाज के लिए दूसरे शहरों या निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है। पीजी छात्रों की संख्या बढ़ने से अस्पताल में विशेषज्ञ सेवाएं बेहतर होंगी और मरीजों को समय पर इलाज मिल सकेगा। रिसर्च और मेडिकल शिक्षा को मिलेगा बढ़ावा पीजी सीटों में बढ़ोतरी से मेडिकल कॉलेज में रिसर्च गतिविधियों और शैक्षणिक गुणवत्ता में भी सुधार होने की उम्मीद है। ज्यादा पीजी छात्र होने से अस्पताल में इलाज के साथ-साथ शोध कार्यों को भी गति मिलेगी। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इससे राज्य के मेडिकल छात्रों को भी बड़ा लाभ मिलेगा। उन्हें उच्च शिक्षा के लिए दूसरे राज्यों के मेडिकल कॉलेजों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और झारखंड में ही बेहतर अवसर उपलब्ध होंगे। कोल्हान क्षेत्र के लिए अहम पहल MGM मेडिकल कॉलेज कोल्हान क्षेत्र के लाखों लोगों के लिए प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र है। यहां पीजी सीटों की संख्या बढ़ने से न केवल चिकित्सा शिक्षा को मजबूती मिलेगी, बल्कि क्षेत्र के मरीजों को भी बेहतर और विशेषज्ञ इलाज की सुविधा मिलने की उम्मीद है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।