रांची। झारखंड सरकार ने मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना के तहत आठ हजार करोड़ रुपये विभिन्न जिलों को आवंटित कर दिए हैं। यह राशि चालू वित्तीय वर्ष के छह माह के लिए है। जिलों को जारी आवंटन आदेश में विभाग द्वारा पूर्व में जारी दिशा-निर्देशों के तहत ही लाभुकों के खाते में राशि हस्तांतरित करने का निर्देश है। 2 माह की राशि एकसाथ मिलेगी इधर, जिलों को राशि आवंटित होने से लाभुकों को राशि शीघ्र मिलने की संभावना है। अप्रैल और मई दोनों माह की राशि एक साथ खाते में हस्तांतरित की जा सकती है। खाते में आएंगे 5000 रुपये इस तरह प्रत्येक लाभुक के खाते में पांच हजार रुपये हस्तांतरित होंगे। संभावना जताई जा रही है कि 15 मई के बाद विभिन्न जिलों में राशि हस्तांतरित करने की प्रकिया शुरू कर दी जाएगी। लाभुकों का सत्यापन जारी हालांकि, कुछ जिलों में लाभुकों का सत्यापन भी कराया जा रहा है। कई प्रखंडों में अपने-अपने नाम का फार्म प्राप्त करने के लिए महिलाओं में होड़ मची रही। पंचायत भवन में सुबह से ही लाभुक महिलाओं और युवतियों का आना-जाना लगा रहा।
रांची। आखिरकार पांच साल के लंबे इंतजार के बाद झारखंड को लोकाउक्त मिल ही गया। झारखंड हाईकोर्ट के रिटायर जज जस्टिस अमिताभ कुमार गुप्ता ने मंगलवार को लोकभवन में पद और गोपनीयता की शपथ ली। उन्हें संतोष कुमार गंगवार ने शपथ दिलाई। इस मौके पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी मौजूद रहे। लंबा न्यायिक अनुभव जस्टिस अमिताभ कुमार गुप्ता 1997 से न्यायिक सेवा में रहे। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं। वे बहुचर्चित चारा घोटाला मामले की सुनवाई से भी जुड़े रहे हैं। इसके अलावा वे झारखंड विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष जैसे अहम पद पर भी कार्य कर चुके हैं। शपथ के तुरंत बाद संभाला पदभारः शपथ ग्रहण के तुरंत बाद जस्टिस गुप्ता ने लोकायुक्त के का पदभार संभाले लिया। उनके कार्यभार ग्रहण करने के साथ ही लोकायुक्त कार्यालय में लंबे समय से पसरा सन्नाटा भी खत्म हो गया है। भ्रष्टाचार से मामलों की जांच में आएगी तेजी माना जा रहा है कि नए लोकायुक्त के आने से भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच में तेजी आएगी और कार्यालय में फिर से न्यायिक सक्रियता देखने को मिलेगी। पांच साल बाद इस नियुक्ति को प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक अहम कदम माना जा रहा है।
रांची। झारखंड में होमगार्ड जवानों के कर्तव्य भत्ते (ड्यूटी अलाउंस) के भुगतान को लेकर नई गाइडलाइन लागू कर दी गई है। अब राज्यभर के सभी जवानों के बैंक खातों का सत्यापन किया जाएगा। वित्त विभाग ने इसके लिए एक निर्धारित फॉर्मेट जारी किया है, जिसे भरकर संबंधित जिला कार्यालय में जमा करना अनिवार्य होगा। विभागीय आदेश नीचे तक पहुंचा इस संबंध में वित्त विभाग ने गृहरक्षा वाहिनी के महानिदेशक को पत्र जारी कर प्रक्रिया जल्द पूरी करने का निर्देश दिया है। इसके बाद यह आदेश जिला स्तर तक भेज दिया गया है और सभी होमगार्ड जवानों को नोटिस जारी कर आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने को कहा गया है। सत्यापन के बिना नहीं मिलेगा भत्ता विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक बैंक खाते का सत्यापन नहीं हो जाता, तब तक किसी भी जवान को ड्यूटी अलाउंस का भुगतान नहीं किया जाएगा। इससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि भत्ता सही व्यक्ति के खाते में ही पहुंचे। फॉर्म में देनी होगी विस्तृत जानकारी जारी किए गए फॉर्म में जवानों को अपनी पूरी व्यक्तिगत और बैंकिंग जानकारी भरनी होगी। इसमें पेयी आईडी, नाम, सैन्य संख्या, मोबाइल नंबर, जन्म तिथि, नामांकन तिथि, आधार नंबर, पैन नंबर, बैंक खाता संख्या और आईएफएससी कोड शामिल हैं। इसके साथ सभी दस्तावेजों को स्व-अभिप्रमाणित कर जमा करना भी जरूरी होगा। होमगार्ड एसोसिएशन ने जताई नाराजगी इस नई प्रक्रिया को लेकर झारखंड होमगार्ड वेलफेयर एसोसिएशन ने आपत्ति जताई है। प्रदेश अध्यक्ष रवि मुखर्जी ने कहा कि यह प्रक्रिया अनावश्यक रूप से जटिल है और इससे जवानों को परेशानी होगी। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे राज्य का पूरा खजाना होमगार्ड जवानों के पास ही है। फैसले पर पुनर्विचार की मांग एसोसिएशन ने सरकार से इस निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग की है। उनका कहना है कि व्यवस्था को सरल बनाया जाना चाहिए ताकि जवानों को अनावश्यक प्रक्रियाओं में न उलझना पड़े और उन्हें समय पर भत्ता मिल सके।
रांची। झारखंड में मतदाता विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया अब जून 2026 में शुरू की जाएगी। पहले इसके जल्द शुरू होने की संभावना थी, लेकिन अब इसे आगे बढ़ा दिया गया है। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के रवि कुमार ने बताया कि राज्य में चल रही जनगणना और संबंधित प्रक्रियाओं के कारण इसमें देरी हुई है। जनगणना के कारण बदला कार्यक्रम राज्य में 2026-2027 की जनगणना का पहला चरण 1 मई 2026 से 14 जून 2026 तक चलेगा। इसमें 1 से 15 मई तक स्व-गणना और 16 मई से 14 जून तक फील्ड सर्वे किया जाएगा। इसी वजह से SIR की गतिविधियों को फिलहाल टाल दिया गया है, ताकि दोनों महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में किसी तरह का टकराव न हो। प्री-एक्टिविटी में बीएलओ को आ रही दिक्कतें SIR से पहले चल रही प्री-एक्टिविटी के तहत बीएलओ (बूथ लेवल अधिकारी) घर-घर जाकर मतदाताओं से जानकारी एकत्र कर रहे हैं। हालांकि, कई जगहों पर उन्हें सहयोग नहीं मिल रहा है। कुछ मामलों में बीएलओ को घरों में प्रवेश तक नहीं करने दिया जा रहा है, जिससे काम प्रभावित हो रहा है। शहरी क्षेत्रों में ज्यादा परेशानी मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के अनुसार यह समस्या खासकर शहरी क्षेत्रों में अधिक देखने को मिल रही है। रांची, धनबाद और जमशेदपुर जैसे शहर प्री-एक्टिविटी में पिछड़ते दिख रहे हैं। हाल ही में किए गए फील्ड निरीक्षण में भी ऐसी शिकायतें सामने आई हैं। ‘पारेंटल मैपिंग’ 75 प्रतिशत पूरी के रवि कुमार ने बताया कि प्री-एक्टिविटी के तहत चल रही पारेंटल मैपिंग का कार्य लगभग 75 प्रतिशत पूरा हो चुका है। उन्होंने आम लोगों से अपील की है कि वे बीएलओ का सहयोग करें, ताकि भविष्य में उन्हें सरकारी कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें। सहयोग की अपील निर्वाचन विभाग ने लोगों से अपील की है कि वे बीएलओ को आवश्यक दस्तावेज और जानकारी उपलब्ध कराएं। विभाग का कहना है कि यह प्रक्रिया मतदाताओं के हित में है और इससे चुनावी रिकॉर्ड को और अधिक सटीक बनाया जा सकेगा।
रांची। झारखंड में सरकारी खजाने (ट्रेजरी) से करोड़ों रुपये की अवैध निकासी के मामले ने राज्य की सियासत में भूचाल ला दिया है। विपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी ने इस प्रकरण की तुलना बहुचर्चित 'चारा घोटाले' से करते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखा है। उन्होंने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच सीबीआई (CBI) या किसी न्यायिक एजेंसी से कराने की पुरजोर मांग की है। राज्य के पुलिस विभाग सहित अन्य महत्वपूर्ण विभागों में हुई इस वित्तीय हेराफेरी के कारण प्रदेश का वित्तीय प्रबंधन पूरी तरह चरमरा गया है। चारा घोटाले की तर्ज पर सरकारी खजाने में सेंध नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' के जरिए सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल पुलिस विभाग ही नहीं, बल्कि ऊर्जा, पेयजल और पर्यटन जैसे विभागों के खजानों से भी अवैध रूप से करोड़ों रुपये निकाले गए हैं। मरांडी का आरोप है कि सरकारी संरक्षण के बिना इतनी बड़ी राशि की हेराफेरी संभव नहीं है। उन्होंने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में आग्रह किया है कि दोषियों को सजा दिलाने और सच्चाई सामने लाने के लिए निष्पक्ष जांच जरूरी है, जो केवल केंद्रीय एजेंसियों के माध्यम से ही संभव है। सीआईडी जांच का विरोध और सीबीआई-ईडी की मांग भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राज्य सरकार द्वारा कराई जा रही सीआईडी (CID) जांच पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि ट्रेजरी में निकासी के जिम्मेदार अधिकारी (DDO) अक्सर एएसपी या डीएसपी स्तर के होते हैं, और सीआईडी में जांच करने वाले अधिकारी भी इसी रैंक के होते हैं। ऐसे में पुलिसकर्मी ही अपने विभाग के दूसरे पुलिसकर्मियों की निष्पक्ष जांच कैसे करेंगे? भाजपा ने मांग की है कि इस घोटाले के तार कई राज्यों से जुड़े होने के कारण इसमें प्रवर्तन निदेशालय (ED) और सीबीआई को शामिल किया जाना चाहिए। सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि घोटाले का पैसा अन्य राज्यों के बैंक खातों में स्थानांतरित किया गया है, जिसकी गहराई से जांच आवश्यक है। वेतन संकट: 2.80 लाख से अधिक परिवारों की टूटी कमर ट्रेजरी घोटाले का सबसे भयावह असर राज्य के सरकारी कर्मचारियों पर पड़ा है। प्रदेश के इतिहास में संभवतः यह पहली बार हुआ है कि महीने की 11 तारीख बीत जाने के बाद भी कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला है। आंकड़ों के अनुसार, राज्य के पेरोल पर मौजूद 2,35,930 नियमित अधिकारी व कर्मचारी और लगभग 45,000 संविदाकर्मी वर्तमान में भारी अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं। प्रतुल शाहदेव ने वित्तीय प्रबंधन की विफलता पर चिंता जताते हुए कहा कि कर्मचारियों के घरों की अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। वेतन न मिलने से लोगों की बैंकों की ईएमआई (EMI) बाउंस हो रही है और दैनिक खर्च चलाना मुश्किल हो गया है। सरकार की स्थिति यह है कि कर्ज लेने के बावजूद वह अपने कर्मचारियों को समय पर भुगतान करने में असमर्थ सिद्ध हो रही है। मास्टरमाइंड की ऐयाशी और प्रशासनिक ढिलाई इस पूरे घोटाले में 'शंभू' नामक मास्टरमाइंड की भूमिका चर्चा का केंद्र बनी हुई है। खबरों के अनुसार, घोटाले की राशि का उपयोग विलासिता के लिए किया गया और आरोपी हेलीकॉप्टर से दीघा (पश्चिम बंगाल) जाकर पार्टी कर रहा था। भाजपा ने आरोप लगाया है कि जब सरकारी खजाने की लूट हो रही थी, तब प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। विपक्षी दलों का मानना है कि यदि इस मामले में तुरंत कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो यह देश के सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में से एक बनकर उभरेगा। फिलहाल, राज्य में इस मुद्दे पर जनआक्रोश और राजनीतिक तनाव चरम पर है।
पूर्वी सिहंभूम। झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के बहरागोड़ा प्रखंड में सुवर्णरेखा नदी किनारे द्वितीय विश्व युद्ध काल का 227 किलोग्राम वजनी बम मिलने से हड़कंप मच गया है। दशकों पुराना यह अनएक्सप्लोडेड ऑर्डिनेंस (UXO) आज भी बेहद खतरनाक बताया जा रहा है। सेना ने संभाली कमान मामले की गंभीरता को देखते हुए भारतीय सेना की स्पेशल बम निरोधक टीम मौके पर पहुंच चुकी है। लेफ्टिनेंट कर्नल धर्मेंद्र सिंह के नेतृत्व में टीम ने ऑपरेशन की पूरी रणनीति तैयार कर ली है। बुधवार को इस बम को निष्क्रिय करने के लिए हाई-रिस्क डिफ्यूज ऑपरेशन चलाया जाएगा। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था सुरक्षा के मद्देनजर बम स्थल के एक किलोमीटर दायरे को पूरी तरह खाली करा लिया गया है। इलाके में नो-एंट्री लागू कर दी गई है और बैरिकेडिंग की गई है। साथ ही पश्चिम बंगाल सीमा से सटे गांवों को भी अलर्ट पर रखा गया है। ऑपरेशन के दौरान हवाई गतिविधियों पर भी रोक रहेगी। ऐसे किया जा रहा है सुरक्षित बम को निष्क्रिय करने के लिए उसके चारों ओर बालू भरी बोरियों का घेरा बनाया गया है और करीब 10 फीट गहरे गड्ढे में सुरक्षित रखा गया है, ताकि संभावित विस्फोट की ऊर्जा जमीन के भीतर ही सीमित रहे। रिमोट से होगा ऑपरेशन जानकारी के मुताबिक, यह डिफ्यूज ऑपरेशन करीब एक किलोमीटर दूर से रिमोट सिस्टम के जरिए किया जाएगा, जिससे किसी भी खतरे की स्थिति में जोखिम कम किया जा सके। आठ दिन पहले चला था पता करीब आठ दिन पहले स्थानीय लोगों ने इस बम को देखा था, जिसके बाद पुलिस और प्रशासन ने तुरंत सेना को सूचना दी। बम पर “AN-M64 500-LB American Made” अंकित है, जिससे इसकी पहचान द्वितीय विश्व युद्ध के बम के रूप में हुई है।
पश्चिम बंगाल सरकार ने मंत्रियों और उनके परिवार के चिकित्सा खर्च को लेकर सख्त कदम उठाया है। अब राज्य के बाहर किसी भी अस्पताल में इलाज कराने से पहले मुख्यमंत्री से पूर्व अनुमति लेना जरूरी होगा। इस संबंध में गृह विभाग की ओर से अधिसूचना जारी कर दी गई है, जिसे कोलकाता गजट में प्रकाशित किया गया है। नए नियम के तहत मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और उपमंत्री इसके दायरे में आएंगे। साथ ही उनके कुछ परिजनों को भी इस सुविधा में शामिल किया गया है। क्यों लिया गया फैसला? सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य चिकित्सा खर्चों पर नियंत्रण रखना और प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना है। अधिकारियों के मुताबिक, हाल के वर्षों में कुछ मामलों में बिना गंभीर बीमारी के भी अन्य राज्यों में इलाज कराकर भारी-भरकम बिल जमा किए गए थे, जिसके बाद यह फैसला लिया गया। पहले क्या थी व्यवस्था? पहले मंत्रियों को राज्य के बाहर इलाज कराने के लिए किसी तरह की पूर्व अनुमति की जरूरत नहीं थी। इसी कारण कई बार मेडिकल खर्च को लेकर विवाद भी सामने आए थे। किन पर लागू होगा नियम? इस नई व्यवस्था में मंत्रियों के परिवार के कुछ सदस्य भी शामिल होंगे, जैसे: अविवाहित बेटियां आश्रित माता-पिता 18 वर्ष तक के आश्रित भाई-बहन किन अस्पतालों में मिलेगा लाभ? अब चिकित्सा सुविधाओं का दायरा बढ़ा दिया गया है। इसमें शामिल हैं: सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त अस्पताल पश्चिम बंगाल क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स एक्ट, 2017 के तहत पंजीकृत निजी अस्पताल और नर्सिंग होम कौन-कौन सी सुविधाएं होंगी शामिल? नई व्यवस्था के तहत निम्न सेवाएं कवर होंगी: डॉक्टर से परामर्श पैथोलॉजी और रेडियोलॉजी जांच दवाएं और टीकाकरण सर्जरी और दंत चिकित्सा खर्च कैसे होगा कवर? सरकारी अस्पतालों में इलाज पूरी तरह मुफ्त रहेगा निजी या पंजीकृत अस्पतालों में इलाज पर सरकार खर्च वहन करेगी या प्रतिपूर्ति देगी इसके अलावा डॉक्टर के निजी चैंबर, मंत्री आवास पर इलाज, अस्पताल के उच्च श्रेणी के वार्ड और विशेष नर्सिंग सेवाओं का खर्च भी योजना के तहत कवर किया जाएगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।