रांची। झारखंड के कथित शराब घोटाले मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा पूर्व वित्त मंत्री एवं कांग्रेस विधायक डॉ. रामेश्वर उरांव और उनके बेटे रोहित उरांव को पूछताछ के लिए समन जारी किए जाने के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई है। इस कार्रवाई पर कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा पर राजनीतिक दुर्भावना से काम करने का आरोप लगाया है। झारखंड कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व शिक्षामंत्री बंधु तिर्की ने कहा कि भाजपा केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने के लिए कर रही है। 'समन से बाल भी बांका नहीं होगा' बंधु तिर्की ने कहा कि डॉ. रामेश्वर उरांव एक सम्मानित जनप्रतिनिधि हैं और ईडी के समन से उनका "बाल भी बांका नहीं होगा।" उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा आगामी राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए विपक्षी नेताओं को निशाना बना रही है। तिर्की ने दावा किया कि उन्हें भी पहले बिना ठोस तथ्यों के मामलों में फंसाकर जनता के बीच गलत संदेश देने की कोशिश की गई थी। उन्होंने कहा कि झारखंड की जनता भाजपा की कार्यशैली और राजनीतिक रणनीति को अच्छी तरह समझती है। भाजपा पर लगाए गंभीर आरोप पूर्व मंत्री ने भाजपा पर पलटवार करते हुए कहा कि पार्टी के कई नेताओं पर भी भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोप लग चुके हैं, लेकिन उन मामलों में एजेंसियों की कार्रवाई नहीं होती। उन्होंने पूर्व स्वास्थ्य मंत्री और भाजपा नेता भानु प्रताप शाही का नाम लेते हुए कहा कि जिन पर पहले घोटालों के आरोप लगे, वे भाजपा में शामिल होने के बाद "पाक-साफ" हो गए। बंधु तिर्की ने आरोप लगाया कि राज्य के कई हिस्सों में भ्रष्टाचार के पैसे से जमीन खरीदने और संपत्ति बनाने के मामले सामने आए हैं, लेकिन उन पर कोई जांच नहीं हो रही। उन्होंने भाजपा को चुनौती देते हुए कहा कि ईडी या अन्य एजेंसियों के जरिए दबाव बनाने से पार्टी को कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिलेगा। तिर्की ने कहा कि 2 अगस्त को रांची में होने वाला आदिवासी महाजुटान भाजपा को जनता की वास्तविक ताकत का एहसास करा देगा। उन्होंने दोहराया कि कांग्रेस इस कार्रवाई से डरने वाली नहीं है और लोकतांत्रिक तरीके से अपना संघर्ष जारी रखेगी।
रांची। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को गुरुवार को झारखंड हाईकोर्ट से बड़ी कानूनी राहत मिली। जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की अदालत ने सरायकेला-खरसावां जिले के आदित्यपुर थाना में वर्ष 2014 में दर्ज आचार संहिता उल्लंघन मामले की प्राथमिकी (FIR) को निरस्त कर दिया। इस फैसले के साथ ही मुख्यमंत्री के खिलाफ इस मामले में चल रही समस्त कानूनी कार्रवाई पर पूरी तरह विराम लग गया है। क्या था पूरा मामला? यह मामला 2014 के झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान कथित आचार संहिता उल्लंघन से जुड़ा था। आदित्यपुर थाना में कांड संख्या 418/2014 के तहत हेमंत सोरेन के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी। उनकी ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर यह दलील दी गई थी कि दर्ज प्राथमिकी और उस पर आधारित कार्रवाई कानून सम्मत नहीं है। पहले ही ट्रायल पर लग चुकी थी रोक मामले की पूर्व सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने निचली अदालत में चल रही ट्रायल प्रक्रिया पर पहले ही रोक लगा दी थी। अंतिम सुनवाई में अदालत ने दोनों पक्षों याचिकाकर्ता हेमंत सोरेन और राज्य सरकार की दलीलें तथा उपलब्ध अभिलेखों का अवलोकन किया। इसके बाद याचिका स्वीकार करते हुए FIR निरस्त करने का आदेश दिया गया। राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो गई है। यह मामला करीब एक दशक से न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बना हुआ था। अब FIR रद्द होने के बाद इसे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी जीत और राज्य की राजनीति में अहम घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है।
रांची। झारखंड में 2 सीटों के लिए हुए राज्यसभा चुनाव को लेकर चल रहे कयासों का बाजार अब पूरी तरह खत्म हो चुका है। दो बार झारखंड से राज्यसभा सांसद रहे परिमल नथवाणी ने एक बार फिर जीत का सेहरा पहना है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि परिमल नाथवाणी कौन हैं, जिन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा को हरा दिया? क्या वे सिर्फ एक अच्छे राजनीतिज्ञ हैं या फिर एक बड़े बिजनेसमैन? अगर हम उनके करियर पर नजर डालें, तो वे एक शानदार ऑलराउंडर की तरह नजर आते हैं, जिन्होंने हर क्षेत्र में अपना बड़ा योगदान दिया है। दरअसल, वे रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड यानी RIL में कॉर्पोरेट अफेयर्स (Corporate Affairs) के डायरेक्टर हैं। रिलायंस के मालिक मुकेश अंबानी के वे बेहद करीबी और उनके सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक माने जाते हैं। रिलायंस के कई बड़े प्रोजेक्ट्स, खासकर गुजरात के जामनगर में बनी दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी के जमीनी काम को संभालने में इनकी मुख्य भूमिका रही है। लगातार तीन बार पहुंचे हैं राज्यसभा परिमल नथवाणी न केवल बिजनेस मैन हैं, बल्कि राजनीति के भी शानदार खिलाड़ी हैं। यही वजह है कि वे लंबे समय तक राज्यसभा से सांसद भी रहे हैं। उनकी खास बात ये है कि वे हर दल के लोगों के साथ में अच्छा तालमेल बनाकर के रखते हैं। यही कारण है कि वे झारखंड से ही लगातार दो बार राज्यसभा पहुंचे थे। साल 2008 में वे पहली बार और फिर 2014 में झारखंड से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा पहुंचे, जिसमें उन्हें सभी प्रमुख दलों मसलन जेएमएम, भाजपा और कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था। केवल झारखंड से ही नहीं, बल्कि वे आंध्र प्रदेश से भी राज्यसभा जा चुके हैं। साल 2020 में वे वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के टिकट पर राज्यसभा पहुंचे थे। क्रिकेट एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में भी बनाई है पहचान राजनीति और बिजनेस के अलावा परिमल नथवाणी का खेल प्रशासन में भी बड़ा नाम है। वे गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन (GCA) के पूर्व उपाध्यक्ष (Vice President) रह चुके हैं। अहमदाबाद के विश्व प्रसिद्ध ‘नरेंद्र मोदी स्टेडियम’ (मोटेरा स्टेडियम) के पुनर्निर्माण और उसे दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम बनाने के प्रोजेक्ट में उनका बहुत बड़ा योगदान था। वन्यजीव संरक्षण के लिए भी करते हैं काम परिमल नथवाणी अपने करियर में वन्यजीव संरक्षण के लिए बड़ा काम किये हुए हैं। जानकारी के मुताबिक गुजरात के गिर जंगलों में पाए जाने वाले एशियाई शेरों (Asiatic Lions) के संरक्षण के लिए भी वे काफी काम करते हैं। वे गिर राष्ट्रीय उद्यान के विकास और शेरों की सुरक्षा को लेकर अक्सर आवाज उठाते रहते हैं।
रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए गुरुवार को मतदान शांतिपूर्ण ढंग से जारी है। इसी क्रम में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और विधायक कल्पना सोरेन विधानसभा पहुंचे और अपने मताधिकार का प्रयोग किया। दोनों नेताओं के विधानसभा पहुंचने के साथ ही राजनीतिक गतिविधियां और तेज हो गईं। सुबह से ही विधानसभा परिसर में विधायकों की आवाजाही बनी रही और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता मतदान प्रक्रिया पर लगातार नजर रखे हुए हैं।राज्यसभा चुनाव के लिए मतदान सुबह 9 बजे से शुरू हुआ, जो शाम 4 बजे तक चलेगा। इसके बाद शाम 5 बजे से मतगणना शुरू होगी और देर शाम तक परिणाम आने की संभावना है। चुनाव को देखते हुए विधानसभा परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं।
रांची। झारखंड में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। दो सीटों के लिए हो रहे इस चुनाव में झामुमो के बैद्यनाथ राम, कांग्रेस के प्रणव झा और भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी मैदान में हैं। चुनावी गणित के बीच सबसे अधिक दबाव कांग्रेस पर दिखाई दे रहा है, जिसे अपने उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने के साथ-साथ किसी बड़ी राजनीतिक असहज स्थिति से भी बचना होगा। विधानसभा में पार्टी के 34 विधायक हैं झामुमो उम्मीदवार बैद्यनाथ राम की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। विधानसभा में पार्टी के 34 विधायक हैं, जबकि जीत के लिए केवल 28 मतों की आवश्यकता है। ऐसे में उनकी जीत लगभग तय मानी जा रही है। दूसरी ओर कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की राह अपेक्षाकृत कठिन है। उन्हें झामुमो के अतिरिक्त वोटों के साथ कांग्रेस, राजद और भाकपा (माले) के सभी विधायकों का समर्थन चाहिए, ताकि 28 का आवश्यक आंकड़ा पूरा हो सके। हालांकि, चुनाव को लेकर सबसे बड़ी चिंता क्रॉस वोटिंग की आशंका है। यदि गठबंधन के एक-दो विधायक भी पार्टी लाइन से हटकर मतदान करते हैं या वोट अमान्य हो जाता है, तो कांग्रेस की रणनीति प्रभावित हो सकती है। इसी कारण सत्तारूढ़ गठबंधन अपने विधायकों को एकजुट रखने की कोशिश में जुटा है। भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी है इस बीच भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी लगातार सक्रिय हैं और विभिन्न नेताओं से मुलाकात कर समर्थन जुटाने का प्रयास कर रहे हैं। एनडीए के पास 24 विधायक हैं, जबकि जीत के लिए उन्हें कम से कम चार अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नाथवानी की कोशिश सत्तारूढ़ गठबंधन में सेंध लगाने की रहेगी। वर्तमान विधानसभा संख्या बल के अनुसार महागठबंधन के पास 56 और एनडीए के पास 24 विधायक हैं। ऐसे में चुनाव का परिणाम काफी हद तक दलों की एकजुटता और क्रॉस वोटिंग की स्थिति पर निर्भर करेगा। 18 जून का मतदान झारखंड की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा साबित हो सकता है। '
रांची। झारखंड में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। इसी बीच भाजपा विधायक प्रकाश राम की तबीयत अचानक बिगड़ने से सियासी हलकों में हलचल बढ़ गई है। उन्हें रांची के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा है। हालांकि भाजपा नेताओं का कहना है कि उनकी हालत स्थिर है और मतदान तक उनके स्वस्थ होकर विधानसभा पहुंचने की पूरी उम्मीद है। मतदान से पहले बढ़ी चुनावी चिंता प्रकाश राम के अस्पताल में भर्ती होने की खबर के बाद भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी की चुनावी रणनीति को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। हालांकि पार्टी नेताओं का दावा है कि विधायक मतदान में हिस्सा लेंगे और इससे चुनावी गणित पर कोई असर नहीं पड़ेगा। प्रकाश राम का राजनीतिक सफर लातेहार से विधायक प्रकाश राम का राजनीतिक सफर काफी दिलचस्प रहा है। वह सबसे पहले झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम) के टिकट पर विधायक बने थे। बाद में उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। 2024 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने तत्कालीन मंत्री और वर्तमान राज्यसभा उम्मीदवार बैजनाथ राम को हराकर जीत दर्ज की थी। दो सीटों पर कांटे की टक्कर झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए मुकाबला बेहद दिलचस्प माना जा रहा है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने बैजनाथ राम, कांग्रेस ने प्रणव झा, जबकि भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में परिमल नाथवानी मैदान में हैं। इंडिया गठबंधन के सामने अपने 56 विधायकों को एकजुट बनाए रखने की चुनौती है, जबकि परिमल नाथवानी को एनडीए के 24 विधायकों के अलावा अतिरिक्त चार वोट जुटाने होंगे। ऐसे में प्रत्येक विधायक का वोट बेहद अहम माना जा रहा है। बैठकों और संपर्क अभियान पर जोर चुनाव से पहले परिमल नाथवानी ने भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास से मुलाकात की, जिसे राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वहीं भाजपा ने सोमवार शाम अपने विधायकों की बैठक भी बुलाई है, जिसमें राज्यसभा चुनाव की रणनीति, विधायकों की एकजुटता और मतदान की तैयारियों पर चर्चा होने की संभावना है। 18 जून को होने वाले मतदान से पहले झारखंड की राजनीति में हर गतिविधि पर नजर बनी हुई है और सभी दल अपने-अपने विधायकों को एकजुट रखने की कोशिश में जुटे हैं।
राज्यसभा चुनाव का दो तीन चरणों के समाप्त होने के बाद अब सबकी निगाहें 18 जून पर टिकी है। क्योंकि भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी का नोमिनेशन पेपर निर्वाची पदाधिकारी द्वारा Valid करार दिए जाने के बाद मतदान सुनिश्चित हो गया है। इसलिए कि दो सीटों के विरुद्ध अब चुनाव मैदान में तीन प्रत्याशी हो गए हैं। झामुमो से बैजनाथ राम, कांग्रेस से प्रणव झा और निर्दलीय परिमल नाथवानी। इस स्थिति में अब राजनीतिक दलों के अधिकृत पोलिंग एजेंट की नियुक्ति और उसकी भूमिका सबसे अधिक प्रभावकारी होने वाली है। क्योंकि प्रत्येक राजनीतिक दल के विधायकों को अपनी पार्टी के अधिकृत पोलिंग एजेंट को बैलेट पेपर दिखाने की बाध्यता है। यह अलग बात है कि विधायक अपनी पार्टी के अधिकृत पोलिंग एजेंट को अपना बैलेट पेपर सिर्फ दिखाने के लिए बाध्य हैं। क्योंकि बैलेट पेपर नहीं दिखाने पर उनका मत रद्द किया जा सकता है। जबकि क्रास वोटिंग करने के बाद भी अगर वह विधायक अपना मतपत्र दिखा भर देता है तो उसका मत रद्द नहीं होगा। इस प्रावधान के कारण अब पोलिंग एजेंटों की नियुक्ति काफी अहम मानी जा रही है। क्योंकि मतदान के दिन संबंधित राजनीतिक दल के अधिकृत पोलिंग एजेंट की इंटीग्रिटी काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। अब सारा दारोमदार पोलिंग एजेंट पर ही जाकर टिकता है, जो यह स्पष्ट कर सकेगा कि उनके दल का अमुक विधायक पार्टी लाइन से इतर जाकर क्रास वोटिंग किया है। अगर किसी दल का विधायक और उसका पोलिंग एजेंट सेटिंग कर लेता है तो क्रास वोटिंग करने वाले विधायक की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। झारखंड में ऐसा हुआ भी है जब माले, कांग्रेस और अन्य दलों के विधायकों ने क्रास वोटिंग किया, लेकिन विधायक और पोलिंग एजेंट के बीच बनी अंदरुनी सहमति के कारण पहचान को धुंधला बना दिया गया। पहचान हुई भी तो कोई कार्रवाई नहीं की गयी। मालूम हो कि निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार राज्यसभा चुनाव में विधायकों (MLAs) को अपनी पार्टी के अधिकृत एजेंट (Authorized Agent) को बैलेट पेपर दिखाने का स्पष्ट प्रावधान है। राज्यसभा चुनाव ओपन बैलेट सिस्टम (Open Ballot System) यानी खुली मतदान प्रणाली के तहत कराए जाते हैं। पीपुल्स रिप्रजेंटेशन एक्ट, 1951 (जनप्रतिनिधित्व अधिनियम) की धारा 59 के तहत, किसी भी राजनीतिक दल से जुड़े विधायक को वोट को मतपेटी (Ballot Box) में डालने से पहले अपने दल के अधिकृत एजेंट को चिन्हित बैलेट पेपर दिखाना अनिवार्य होता है। इस व्यवस्था को साल 2003 में कानून में संशोधन करके लागू किया गया था, ताकि विधायकों द्वारा की जाने वाली क्रॉस-वोटिंग, खरीद-फरोख्त (Horse-trading) और भ्रष्टाचार को रोका जा सके। यदि कोई दलीय विधायक अपने अधिकृत एजेंट को बैलेट पेपर दिखाने से मना करता है, तो उसका वोट अमान्य (Invalid) घोषित कर दिया जाता है। इसके अलावा, यदि वह अपनी पार्टी के एजेंट के अलावा किसी अन्य दल के एजेंट या बाहरी व्यक्ति को बैलेट पेपर दिखाता है, तब भी उसका मत खारिज हो जाता है। यह नियम निर्दलीय विधायकों (Independent MLAs) पर लागू नहीं होता है।
रांची। झारखंड में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा चरम पर है। सत्तापक्ष और विपक्ष की ओर से हाई-वोल्टेज राजनीतिक ड्रामा देखने को मिल रहा है। भाजपा समर्थित परिमल नाथवानी के नामांकन दाखिल करने के बाद चुनाव के रिटर्निंग ऑफिसर ने उनका नामांकन होल्ड पर रख दिया था। उनके नाम को लेकर भ्रम की स्थिति थी, क्योंकि कहीं उनका नाम परिमल नाथवानी तो कहीं नाथवानी परिमल दर्ज था। इसी को लेकर कांग्रेस की ओर से विधायक नमन विक्सल कोंगाड़ी ने आपत्ति जताई थी। जिसके बाद परिमल नाथवानी का नामांकन होल्ड पर रख दिया गया था, लेकिन दो दिनों तक चले विवाद के बाद आखिरकार परिमल नाथवानी का नामांकन मंजूर कर लिया गया है। रिटर्निंग ऑफिसर ने उनके नामांकन को हरी झंडी दे दी है। राज्यसभा की दो सीटों के लिए अब 3 प्रत्याशी झारखंड से राज्यसभा की दो सीटें खाली हैं, लेकिन उम्मीदवार तीन हैं। परिमल नाथवानी एक निर्दलीय उम्मीदवार हैं, जिन्हें भाजपा समर्थन दे रही है। वहीं, गठबंधन की ओर से झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के बैजनाथ राम और कांग्रेस के प्रणव झा चुनावी मैदान में हैं। नामांकन पर आपत्ति के बाद मचा था घमासान नामांकन होल्ड पर किए जाने की खबर मिलते ही परिमल नाथवानी विधानसभा पहुंचे थे और अपनी ओर से सफाई दी थी। वहीं, निर्वाचन आयोग के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के. रवि कुमार भी विधानसभा पहुंचे थे और पूरे मामले की जानकारी ली थी। बुधवार को सुबह से ही कांग्रेस समर्थक नाथवानी का नामांकन रद्द करने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। वहीं, बीजेपी कार्यकर्ताओं को गेट के बाहर ही रोक दिया गया था। मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के एक सीनियर वकील भी पहुंचे थे। इधर, कांग्रेस के वरीय नेता सलमान खुर्शीद भी दिल्ली से रांची पहुंच गये। यहां वह सीधे विधानसभा पहुंचे। विधानसभा के गेट के बाहर भाजपा कार्यकताओं ने उन्हें रोका और जमकर नारेबाजी की। करीब एक बजे मामले में बहस पूरी हुई और रिटर्निंग ऑफिसर ने नाथवानी के नामांकन पत्र को सही घोषित कर दिया।
रांची। झारखंड में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा चढ़ा हुआ है। इस बीच नामांकन पत्रों की स्क्रूटनी के दौरान एक दिलचस्प मोड़ आ गया है। एक ओर सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस के प्रत्याशियों ने तकनीकी परीक्षा आसानी से पास कर ली है, वहीं निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी का नामांकन नाम-विवाद के कारण अधर में लटक गया है। नाथवानी के दस्तावेजों में नाम के हेर-फेर को लेकर दर्ज कराई गई आपत्ति के बाद चुनाव अधिकारी ने उनके नामांकन को होल्ड पर रख दिया है, जिस पर अब बुधवार सुबह फैसला होना है। नाम के आगे-पीछे का फेर, थम गई नाथवानी की रेस दस्तावेजों की जांच के दौरान निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी के कागजातों में एक तकनीकी त्रुटि सामने आई। शिकायत के मुताबिक, कुछ दस्तावेजों में उनका नाम परिमल नाथवानी दर्ज है, तो कुछ जगहों पर इसे नाथवानी परिमल लिखा गया है। इस तकनीकी उलटफेर को आधार बनाकर उनके नामांकन पर आपत्ति दर्ज कराई गई। मामला गरमाते ही रिटर्निंग ऑफिसर ने फिलहाल नामांकन को होल्ड पर डाल दिया है। पहुंचे नाथवानी, भाजपा नेता जुटे रास्ता निकालने मे विवाद की भनक लगते ही परिमल नाथवानी तुरंत विधानसभा सचिवालय पहुंचे। उन्होंने विधानसभा के प्रभारी सचिव सह रिटर्निंग ऑफिसर रंजीत कुमार के समक्ष उपस्थित होकर अपनी स्थिति स्पष्ट की। इस दौरान रिटर्निंग ऑफिसर के कक्ष में कानूनी पहलुओं को लेकर लंबी मैराथन बैठक और विचार-विमर्श का दौर चला। दिलचस्प बात यह रही कि निर्दलीय उम्मीदवार होने के बावजूद भाजपा के कई वरिष्ठ नेता भी इस दौरान सचिवालय पहुंचे और पूरी प्रक्रिया पर पैनी नजर बनाए रखी, जिससे इस चुनाव के सियासी समीकरणों को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। बैजनाथ राम और प्रणव झा की राह आसान उधर, जेएमएम उम्मीदवार बैजनाथ राम के नामांकन पत्रों की जांच पूरी हो चुकी है और उसे वैध पाया गया है। इसके साथ ही, कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा का पर्चा भी पूरी तरह सही मिला, जिससे उनकी उम्मीदवारी को हरी झंडी मिल गई है। अब बुधवार सुबह 11 बजे होगी सुनवाई रिटर्निंग ऑफिसर ने निर्देश दिया है कि दर्ज आपत्ति पर अंतिम सुनवाई बुधवार सुबह 11 बजे होगी। इस दौरान परिमल नाथवानी या उनके अधिकृत एजेंट को खुद उपस्थित रहना होगा। अब सबकी नजरें कल की सुनवाई पर टिकी हैं कि क्या चुनाव आयोग इस नाम-विवाद को महज एक लिपिकीय (तार्किक) भूल मानकर नाथवानी का नामांकन वैध करता है, या फिर यह तकनीकी पेंच उनकी उम्मीदवारी के लिए कोई बड़ा रोड़ा बनेगा।
रांची। झारखंड में राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां सोमवार को चरम पर रहीं। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि पर सत्तारूढ़ गठबंधन के उम्मीदवारों ने अपना नामांकन पत्र जमा कर दिया। झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) की ओर से बैद्यनाथ राम और कांग्रेस की ओर से प्रणव झा ने राज्यसभा चुनाव के लिए अपनी दावेदारी पेश की। दोनों उम्मीदवारों के नामांकन के साथ ही राज्य की राजनीति में चुनावी माहौल और गर्म हो गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मौजूदगी रही खास नामांकन प्रक्रिया के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी मौजूद रहे। उन्होंने दोनों प्रत्याशियों का स्वागत करते हुए गठबंधन की मजबूती और एकजुटता का संदेश दिया। उनके साथ गठबंधन के कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री की मौजूदगी राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन की एकजुटता का स्पष्ट संकेत है। जीत को लेकर उम्मीदवारों ने जताया भरोसा नामांकन दाखिल करने के बाद बैद्यनाथ राम और प्रणव झा ने अपनी जीत को लेकर विश्वास जताया। दोनों नेताओं ने कहा कि उन्हें गठबंधन के सभी विधायकों का समर्थन प्राप्त है और वे राज्य के हितों को राज्यसभा में मजबूती से उठाने का प्रयास करेंगे। उन्होंने महागठबंधन के प्रति आभार व्यक्त करते हुए जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का भरोसा भी दिया। समर्थकों की रही भारी मौजूदगी नामांकन केंद्र के बाहर सुबह से ही समर्थकों और कार्यकर्ताओं की भीड़ देखने को मिली। चुनावी नारों और उत्साह के बीच दोनों उम्मीदवारों ने अपना नामांकन दाखिल किया। इस दौरान गठबंधन के नेताओं ने विपक्ष को भी एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की। अब चुनावी समीकरणों पर टिकी निगाहें नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब राजनीतिक दलों और पर्यवेक्षकों की नजर आगामी चुनावी प्रक्रिया पर टिकी है। राज्यसभा सीटों के लिए संख्या बल और समर्थन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति में राज्यसभा चुनाव को लेकर गतिविधियां और तेज होने की संभावना है। गठबंधन को उम्मीद है कि उसके उम्मीदवार आसानी से जीत दर्ज करेंगे, जबकि विपक्ष भी अपनी रणनीति पर नजर बनाए हुए है।
रांची। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को बड़गाईं जमीन और कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अदालत से बड़ी राहत नहीं मिली है। पीएमएलए (प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट) की विशेष अदालत ने उनकी डिस्चार्ज याचिका खारिज कर दी है। अदालत के इस फैसले के बाद मामला अब ट्रायल की प्रक्रिया की ओर बढ़ सकता है। यह मामला रांची के बड़गाईं क्षेत्र स्थित 8.86 एकड़ जमीन से जुड़ा है, जिसकी जांच के दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कथित अनियमितताओं और मनी लॉन्ड्रिंग के पहलुओं को लेकर कार्रवाई की थी। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस मामले में स्वयं को निर्दोष बताते हुए अदालत से आरोपमुक्त किए जाने की मांग की थी। दिसंबर 2025 में दाखिल की गई थी याचिका मुख्यमंत्री की ओर से 5 दिसंबर 2025 को विशेष अदालत में डिस्चार्ज याचिका दाखिल की गई थी। याचिका में कहा गया था कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों का कोई ठोस आधार नहीं है और उन्हें मामले से मुक्त किया जाना चाहिए। इस पर अदालत ने ईडी और बचाव पक्ष दोनों की दलीलें विस्तार से सुनी थीं। पिछली सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की बहस पूरी होने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। सोमवार को अदालत ने फैसला सुनाते हुए याचिका को खारिज कर दिया। ट्रायल का रास्ता हुआ साफ कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, डिस्चार्ज याचिका खारिज होने का अर्थ यह है कि अदालत को प्रथम दृष्टया मामले में सुनवाई जारी रखने के पर्याप्त आधार दिखाई दिए हैं। अब इस मामले में आरोप तय करने और ट्रायल की प्रक्रिया आगे बढ़ने की संभावना है। राजनीतिक और कानूनी नजरें मामले पर यह मामला लंबे समय से राज्य की राजनीति और कानूनी गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। अदालत के ताजा फैसले के बाद एक बार फिर इस प्रकरण पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज होने की संभावना है। हालांकि मुख्यमंत्री पक्ष की ओर से आगे की कानूनी रणनीति को लेकर अभी कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। फिलहाल सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मामले में अगली सुनवाई कब होती है और ट्रायल की प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है।
रांची। झारखंड में राज्यसभा चुनाव की तारीखें नजदीक आते ही सियासी पारा हाई हो चुका है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि क्या झामुमो-कांग्रेस के बीच सब ठीक है या नहीं। क्योंकि, चुनाव के ऐलान के बाद से ही दोनों दलों के बीच खींचतान चल रही थी। हालांकि, अब दोनों दलों के बीच सहमति बन चुकी है। दोनों दलों में हुई डील के तहत झामुमो और कांग्रेस ने आपस में एक-एक सीट बांट ली है। झामुमो ने पूर्व मंत्री बैद्यनाथ राम को अपना उम्मीदवार बनाया है, जबकि कांग्रेस ने अपने वरिष्ठ नेता और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के कम्युनिकेशन इंचार्ज प्रणव झा को मैदान में उतारा है। हालांकि यह समझौता इतना आसान नहीं था। इस समझौते को कराने में बड़ी भूमिका छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और अजय शर्मा ने निभाई है। राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस द्वारा इन्हें विशेष पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया था। दोनों कद्दावर नेताओं ने शनिवार और रविवार को भी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात की। सीएम आवास में इन तीनों नेताओं के बीच लगभग एक घंटे तक बेहद गोपनीय बातचीत हुई। इसके बाद इंडी गठबंधन की हुई एक और बैठक में मामला पूरी तरह सुलझ गया। हालांकि बंद कमरे में क्या गोपनीय बात हुई यह बाहर नहीं आ सकी। कांग्रेस के नेताओं ने नहीं किया कोई खुलासा शनिवार की शाम को भी भूपेश बघेल और अजय शर्मा ने मुख्यमंत्री से मुलाकात की थी और ठीक अगले ही दिन रविवार को दोबारा एक घंटे की लंबी बैठक होना, इस बात का साफ संकेत है कि गठबंधन के भीतर पर्दे के पीछे जरूर कोई बड़ी रणनीति बनी है। हालांकि, बैठक खत्म होने के बाद बाहर आए नेताओं ने इस बातचीत का कोई भी खुलासा नहीं किया। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तैरता रहा कि आखिर इस एक घंटे की सीक्रेट मीटिंग क्या बातचीत हुई? JMM का बड़ा ‘मास्टरस्ट्रोक’... एक तरफ जहां इस सीक्रेट मीटिंग पर सस्पेंस बना हुआ है, वहीं दूसरी तरफ झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने पूर्व विधायक और राज्य के बड़े दलित चेहरे बैजनाथ राम को अपना उम्मीदवार घोषित कर एक बड़ा दांव चल दिया है। राजनीतिक जानकार इसे पलामू प्रमंडल में पार्टी की पैठ मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं। क्योंकि, आजतक किसी भी राजनीतिक दल ने पलामू जोन से किसी भी दलित चेहरे को राज्यसभा में जगह नहीं दी है। जहां तक जीतने के चांसेस की बात है, तो इंडिया गठबंधन के विधायक अगर एकजुट रहे तो दोनों सीटों पर जीत लगभग तय है, क्योंकि गठबंधन के पास 56 विधायकों का मजबूत आंकड़ा है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी खुद सोशल मीडिया पर इस फैसले को ‘सामाजिक न्याय’ की आवाज को मजबूत करने वाला कदम बताया है। JMM के इस अचानक लिए गए फैसले और बैजनाथ राम की उम्मीदवारी के बाद राजनीति के जानकार इस कदम को बेहद महत्वपूर्ण मान रहे हैं। आज खत्म होगा सस्पेंस झारखंड की दो रिक्त राज्यसभा सीटों के लिए सोमवार, 8 जून को नामांकन का अंतिम दिन है। दिलचस्प पहलू यह है कि चुनाव के लिए कुल 6 प्रत्याशियों ने परचा खरीदा है, लेकिन रविवार शाम तक किसी ने भी अपना नामांकन दाखिल नहीं किया था। सोमवार को नामांकन के आखिरी दिन सभी उम्मीदवार अपने परचे दाखिल करेंगे, जिससे यह साफ हो जाएगा कि इस सियासी बिसात पर कौन-कौन से चेहरे आमने-सामने हैं। इसके बाद 18 जून को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक वोटिंग होगी और उसी दिन परिणाम भी घोषित कर दिए जाएंगे।
रांची। राज्यसभा चुनाव को लेकर जारी सरगर्मी के बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अपने एक प्रत्याशी की घोषणा कर दी है। पार्टी विधायक बैजनाथ राम को अपना पहला उम्मीदवार बनाया है। पार्टी का कहना है कि देर शाम तक दूसरे प्रत्याशी की भी घोषणा हो सकती है। मालूम हो कि आज शाम ही प्रदेश कांग्रेस प्रभारी के राजू मुख्यमंत्री से मिलकर अपनी बात रखने वाले थे, लेकिन उससे पहले ही झामुम ने प्रत्याशी के नाम की घोषणा कर दी है।
रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर होने जा रहे चुनाव के लिए कांग्रेस ने प्रवीण झा को प्रत्याशी घोषित कर दिया है। इसके बाद से ही झारखंड का सियासी गलियारा गरमाया हुआ है। अंदर खाने से खबरें आ रही हैं कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और झारखंड मुक्ति मोर्चा कांग्रेस के इस कदम से नाराज हैं। इसके बाद से ही प्रदेश कांग्रेस के कई नेताओं की नींद उड़ी हुई है। कई कांग्रेस नेता तो सार्वजनिक रूप माफी भी मांग रहे हैं। उधर विपक्षी खेमा इसे लेकर मजे ले रहा हैं। दरअसल, राज्यसभा चुनाव की घोषणा के बाद से ही कांग्रेस एक सीट की मांग कर रही थी। वहीं, झारखंड मुक्ति मोर्चा ने साफ इशारा दे दिया था कि उसे दोनों सीटें चाहिए। कांग्रेस प्रभारी को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 2-3 दिन में जबाव देने की बात कही थी, लेकिन उनकी चुप्पी भी मामले में सस्पेंस बढ़ाती जा रही थी। इसी बीच कांग्रेस आलाकमान ने दिल्ली से ही झारखंड में प्रत्याशी दिये जाने की घोषणा कर दी। कांग्रेस द्वारा दिल्ली से राज्यसभा प्रत्याशी घोषित किए जाने के बाद झामुमो ने नाराजगी व्यक्त की। झामुमो और कांग्रेस में तनातनी बढ़ गई है। गुरुवार रात कांग्रेस प्रत्याशी की घोषणा के बाद शुक्रवार को झामुमो विधायकों ने दोनों सीटों पर दावा ठोक दिया। झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा कि एकतरफा प्यार कब तक चलेगा। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सभी सरकारी कार्यक्रमों को स्थगित कर अपने आवास पर पार्टी विधायकों और वरिष्ठ नेताओं की बैठक की। केंद्रीय अध्यक्ष हेमंत सोरेन फैसला लेने के लिए अधिकृत करीब दो घंटे चली बैठक में सभी नेताओं ने एक सुर में दोनों सीटों पर प्रत्याशी उतारने का सुझाव दिया। साथ ही केंद्रीय अध्यक्ष हेमंत सोरेन को इस पर फैसला लेने के लिए अधिकृत कर दिया। इन दोनों सीटों पर उम्मीदवार कौन होंगे, यह निर्णय भी मुख्यमंत्री लेंगे। अब झामुमो में अंजनी सोरेन, विनोद कुमार पांडेय, फागू बेसरा और प्रणव वर्मा के नाम पर चर्चा शुरू हो गई है। झामुमो नेता कांग्रेस से नाराज बैठक के बाद मंत्री हफीजुल हसन और योगेंद्र प्रसाद ने कहा कि हमने अपनी भावनाओं से केंद्रीय अध्यक्ष को अवगत करा दिया है। इसमें दोनों सीटों पर प्रत्याशी उतारने की सलाह दी गई है। इसके लिए हेमंत सोरेन को अधिकृत कर दिया गया है। वहीं पूर्व मंत्री बैजनाथ राम के अनुसार-कांग्रेस ने कहा था कि मुख्यमंत्री की पसंद का प्रत्याशी होगा। फिर अचानक प्रत्याशी के नाम की घोषणा कर दी। कांग्रेस के इस कदम पर सबने नाराजगी जताई। हम पूरे त्याग के साथ एकतरफा प्यार करते आ रहे हैं : सुप्रियो झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा कि महागठबंधन में हम पूरे त्याग के साथ एकतरफा प्यार करते आ रहे हैं। वर्ष 2019 में सिर्फ एक विधायक वाले राजद के सत्यानंद भोक्ता को मंत्री बनाया। कांग्रेस को चार मंत्री पद मिले। वर्ष 2024 में भी कांग्रेस को चार मंत्री पद मिले। इसके बावजूद इन दोनों दलों ने बिहार विधानसभा चुनाव में वादाखिलाफी की। पहले राजद ने दरकिनार किया, फिर कांग्रेस ने भी साथ नहीं दिया। असम विधानसभा चुनाव में भी हमें दरकिनार किया गया। 2024 का लोकसभा चुनाव में झामुमो की बदौलत कांग्रेस को दोनों सीटें मिलीं। विधानसभा चुनाव में भी हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली महागठबंधन को 56 सीटें आईं। इस हिसाब से दोनों सीटों पर झामुमो का दावा बनता है। कांग्रेस ने जब कहा था कि सीएमओ की पंसद का उम्मीदवार होगा, तो अंतिम निर्णय पर पहुंचने के पहले प्रत्याशी क्यों घोषित कर दिया गया। झामुमो से दूरी पाटने के लिए सीएम से मिलेंगे : प्रदीप... कांग्रेस विधायक दल की शुक्रवार शाम बैठक हुई। इसमें राज्यसभा चुनाव को लेकर रणनीति तय की गई। बैठक के बाद विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने कहा कि झामुमो के साथ जो थोड़ी बहुत दूरी दिख रही है, उसे दूर करने के लिए कांग्रेस नेता मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिलेंगे। कांग्रेस का तर्क उधर, झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य के एक तरफा प्यार वाले बयान पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने कहा-प्रत्याशी की घोषणा से पहले प्रदेश कांग्रेस प्रभारी के. राजू और तेलंगाना के डिप्टी सीएम मल्लू भट्टी विक्रमार्क ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात की थी। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी मुख्यमंत्री से बात की थी। इसके बाद प्रत्याशी की घोषणा की गई। कमलेश ने कहा कि गठबंधन से राज्यसभा चुनाव के लिए दो प्रत्याशी होंगे और दोनों ही जीतेंगे। कांग्रेस नेताओं ने मांगी माफी इधर, झारखंड मुक्ति मोर्चा की नाराजगी पर कांग्रेस के कई नेताओं ने माफी मांग ली है। प्रदेश प्रभारी के राजू के साथ कांग्रेस विधायक दल के नेताओं की हुई बैठक के बाद वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि अगर मुख्यमंत्री का दिल दुखा है, तो हम क्षमा प्रार्थी हैं। उन्होंने गठबंधन में किसी दरार से साफ इंकार किया। वहीं, बोकारो से कांग्रेस की विधायक श्वेता सिंह ने भी लगभग इसी प्रकार का बयान दिया। उन्होंने कहा कि झामुमो का दिल दुखा है, तो वह क्षमा प्रार्थी हैं। वहीं विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने कहा कि कांग्रेस और झामुमो के बीच की खाई को पाटने की कोशिश की जा रही है। अब प्रदेश कांग्रेस प्रभारी के राजू मुख्यमंत्री से मिल कर गिला-शिकवा दूर करने की कोशिश करेंगे, ताकि गठबंधन में आयी दरार के नहीं पटने पर भी राज्य की जनता के बीच यह संदेश जा सके कि कांग्रेस ने गठबंधन को बनाए रखने के लिए अपना धर्म निभाया। अब गठबंधन धर्म का पालन करने की जिम्मेदारी झामुमो पर है।
पाकुड़। पाकुड़ विधानसभा क्षेत्र के पूर्व भाजपा विधायक बेनी प्रसाद गुप्ता का बुधवार को हृदयाघात (हार्ट अटैक) से निधन हो गया। उनके निधन की खबर मिलते ही पूरे जिले में शोक की लहर दौड़ गई। भाजपा कार्यकर्ताओं, समर्थकों और आम लोगों ने इसे क्षेत्र की राजनीति के लिए अपूरणीय क्षति बताया है। जानकारी के अनुसार, बेनी प्रसाद गुप्ता पिछले तीन दिनों से रांची में थे। बुधवार सुबह वे रांची-भागलपुर वनांचल एक्सप्रेस से पाकुड़ लौटे थे। घर पहुंचने के कुछ समय बाद उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। परिजन और सहयोगी उन्हें तत्काल पाकुड़ सदर अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन चिकित्सकों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया। बेनी प्रसाद गुप्ता का करियर बेनी प्रसाद गुप्ता भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में शामिल थे और वर्ष 1990 तथा 1995 में पाकुड़ विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके थे। उस समय झारखंड राज्य का गठन नहीं हुआ था और यह क्षेत्र अविभाजित बिहार का हिस्सा था। विधायक रहते हुए उन्होंने क्षेत्रीय विकास, सड़क, शिक्षा और जनसुविधाओं से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया था। कैसे इंसान थे बेनी प्रसाद गुप्ता? अपने राजनीतिक जीवन के अलावा वे सरल, मिलनसार और जनसरोकारों से जुड़े नेता के रूप में पहचाने जाते थे। क्षेत्र के लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता का कारण उनका सहज व्यवहार और आम जनता से सीधा जुड़ाव था। स्थानीय लोग बताते हैं कि वे हमेशा लोगों की समस्याओं को सुनने और उनके समाधान के लिए प्रयासरत रहते थे। उनके समर्थक अक्सर उनके व्यक्तित्व की तुलना पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सादगी और सौम्यता से करते थे। अविवाहित रहे बेनी प्रसाद गुप्ता ने अपना अधिकांश जीवन सामाजिक और राजनीतिक सेवा को समर्पित किया।भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। गुरुवार को धुलियान गंगा घाट पर पूरे राजकीय एवं धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक क्षेत्र के लोगों के शामिल होने की संभावना है। क्षेत्र की राजनीति में बड़ा खालीपन बेनी प्रसाद गुप्ता के निधन से पाकुड़ की राजनीति में एक ऐसे जननेता का अध्याय समाप्त हो गया है, जिन्होंने दशकों तक जनता के बीच रहकर सेवा और समर्पण की मिसाल पेश की।
रांची। झारखंड में मतदाताओं के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से पहले चल रहे वोटर मैपिंग अभियान को लेकर चुनाव आयोग ने सख्ती दिखानी शुरू कर दी है। राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी (सीईओ) के. रवि कुमार ने सभी जिला निर्वाचन पदाधिकारियों के साथ ऑनलाइन समीक्षा बैठक कर वोटर मैपिंग की प्रगति का आकलन किया और कार्य में तेजी लाने के निर्देश दिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि राज्यभर में मतदाताओं की मैपिंग का कार्य हर हाल में 15 जून तक पूरा किया जाए। कई जिलों में धीमी गति पर नाराजगी समीक्षा बैठक के दौरान रांची समेत कुछ जिलों में अनमैप्ड मतदाताओं की संख्या अधिक होने और कार्य की धीमी रफ्तार पर मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी ने नाराजगी जताई। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि सभी लंबित मामलों की नियमित समीक्षा कर मैपिंग प्रक्रिया को तय समयसीमा के भीतर पूरा करें। के. रवि कुमार ने बताया कि अब तक राज्य के लगभग 76 प्रतिशत मतदाताओं की मैपिंग पूरी हो चुकी है। हालांकि शहरी क्षेत्रों में यह कार्य अपेक्षाकृत धीमा है, जबकि ग्रामीण इलाकों में बेहतर प्रगति दर्ज की गई है। मैप्ड और अनमैप्ड मतदाताओं के लिए अलग प्रक्रिया मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी ने बताया कि जिन मतदाताओं की मैपिंग पूरी हो चुकी है, उन्हें विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने की आवश्यकता नहीं होगी। वहीं जिन मतदाताओं की मैपिंग नहीं हो पाएगी, उनका नाम तत्काल मतदाता सूची से नहीं हटाया जाएगा। ऐसे मतदाताओं को निर्वाचन पंजीकरण पदाधिकारी (ERO) द्वारा नोटिस जारी किया जाएगा, जिसके बाद उन्हें अपनी जन्मतिथि और पारिवारिक पहचान से जुड़े आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे। दावे और आपत्तियों के निपटारे के बाद अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन 7 अक्टूबर 2026 को किया जाएगा। गलत मैपिंग पर भी होगी कार्रवाई बैठक में अधिकारियों को चेतावनी दी गई कि गलत मैपिंग वाले मामलों को "एनोमली केस" के रूप में चिन्हित किया जाएगा। ऐसे मामलों की सुनवाई ERO द्वारा की जाएगी और संबंधित मतदाताओं को भी अनमैप्ड मतदाताओं की तरह सत्यापन प्रक्रिया से गुजरना होगा। अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे अनमैप्ड मतदाताओं तक व्यक्तिगत रूप से पहुंचने का प्रयास करें तथा अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत, डुप्लीकेट और गैर-नागरिक श्रेणी के मतदाताओं की पहचान भी सुनिश्चित करें। पात्र नागरिकों को जोड़ना है उद्देश्य के. रवि कुमार ने कहा कि SIR अभियान का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी पात्र भारतीय नागरिक मतदाता सूची से वंचित न रहे। साथ ही यह भी जरूरी है कि गैर-भारतीय नागरिक इस प्रक्रिया का लाभ न उठा सकें। उन्होंने निर्देश दिया कि 15 जून तक फॉर्म-6, फॉर्म-7 और फॉर्म-8 से संबंधित सभी लंबित मामलों का निपटारा कर शून्य पेंडेंसी सुनिश्चित की जाए। समीक्षा बैठक में राज्य निर्वाचन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी तथा सभी जिलों के निर्वाचन पदाधिकारी ऑनलाइन माध्यम से शामिल हुए।
रांची। झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव विनय सिन्हा दीपू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर राज्य विधानसभा की सीटों की संख्या 81 से बढ़ाकर 150 करने की मांग की है। उनका कहना है कि इससे आदिवासी, मूलवासी, पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति समेत सभी वर्गों को बेहतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल सकेगा। दिलचस्प बात है कि पिछले दिनों लोकसभा में परिसीमन को लेकर पेश बिल का कांग्रेस और विपक्षी दलों ने विरोध किया था, जिसके कारण यह बिल पास नहीं हो सका। अब उसी कांग्रेस के नेता झारखंड सीटें बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। आदिवासी-मूलवासी हितों के लिए सीटें बढ़ाने की मांग विनय सिन्हा दीपू ने कहा कि आगामी परिसीमन को लेकर राज्य के आदिवासी और मूलवासी समाज में चिंता है। उनका मानना है कि जनसंख्या के बदलते आंकड़ों के कारण कई पारंपरिक जनजातीय सीटों पर असर पड़ सकता है, जिससे इन समुदायों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कमजोर होने की आशंका है। विनय सिन्हा दीपू ने पत्र में लिखा है कि झारखंड का क्षेत्रफल करीब 79 हजार वर्ग किलोमीटर है और राज्य के कई हिस्से जंगलों व पहाड़ी इलाकों में स्थित हैं। मौजूदा व्यवस्था में एक विधानसभा क्षेत्र का दायरा काफी बड़ा है जिससे जनप्रतिनिधियों के लिए सभी क्षेत्रों तक प्रभावी ढंग से पहुंचना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। विधानसभा सीटें बढ़ाने के पीछे का तर्क कांग्रेस नेता विनय सिन्हा दीपू का तर्क है कि विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ने से क्षेत्रों का आकार छोटा होगा और जनप्रतिनिधि लोगों की समस्याओं पर अधिक ध्यान दे सकेंगे। साथ ही संताल परगना, कोल्हान और दक्षिणी छोटानागपुर जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में आरक्षित सीटों के संरक्षण में भी मदद मिलेगी। उन्होंने केंद्र सरकार से झारखंड की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ाने पर गंभीरता से विचार करने का आग्रह किया है।
रांची। झारखंड में होने वाले राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। विधानसभा में मौजूदा संख्या बल के आधार पर इंडिया गठबंधन की स्थिति मजबूत मानी जा रही है और दोनों सीटों पर उसकी जीत की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती गठबंधन के भीतर सीट शेयरिंग को लेकर सहमति बनाना है। कांग्रेस प्रभारी करेंगे मुख्यमंत्री से चर्चा इसी मुद्दे पर कांग्रेस अब पूरी तरह सक्रिय हो गई है। प्रदेश कांग्रेस प्रभारी के.राजू दो दिवसीय दौरे पर झारखंड पहुंच रहे हैं। वे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात कर राज्यसभा चुनाव की रणनीति और सीट बंटवारे पर चर्चा करेंगे। इस अहम बैठक में तेलंगाना के उपमुख्यमंत्री मल्लु भट्टी विक्रमार्क भी मौजूद रहेंगे। कांग्रेस की कोशिश है कि झामुमो और कांग्रेस को एक-एक सीट मिले। आलाकमान का संदेश और गठबंधन समन्वय सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस नेता पार्टी आलाकमान का संदेश भी मुख्यमंत्री तक पहुंचाएंगे। वे मुख्यमंत्री को इस बात के लिए मनाने का प्रयास करेंगे कि राज्यसभा की एक सीट कांग्रेस को दी जाए। इसके बाद कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल राजद और वाम दलों से भी बातचीत करेगा ताकि गठबंधन में एकजुटता बनी रहे और चुनाव से पहले किसी तरह का विवाद न हो। कांग्रेस में कई दावेदार सक्रिय राज्यसभा सीट को लेकर कांग्रेस के भीतर कई नेताओं के नाम चर्चा में हैं। इनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर, प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता, शहजादा अनवर और पूर्व सांसद फुरकान अंसारी शामिल हैं। पार्टी सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन के आधार पर उम्मीदवार तय करने पर विचार कर रही है। शहजादा अनवर ने फिर जताई दावेदारी शहजादा अनवर ने एक बार फिर राज्यसभा टिकट की मांग की है और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पत्र लिखकर खुद को उम्मीदवार बनाने की अपील की है। गठबंधन का गणित मजबूत विधानसभा में झामुमो के 34, कांग्रेस के 16, राजद के 4 और माले के 2 विधायक हैं, जिससे कुल संख्या 56 हो जाती है। इस मजबूत आंकड़े के आधार पर अगर गठबंधन एकजुट रहता है तो दोनों राज्यसभा सीटों पर उसकी जीत लगभग तय मानी जा रही है।
रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है। 18 जून को होने वाले मतदान से पहले कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। कांग्रेस ने भाजपा पर हॉर्स ट्रेडिंग यानी विधायकों की खरीद-फरोख्त की कोशिश करने का आरोप लगाया है, जबकि भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को उसकी अंदरूनी कमजोरी बताया है। कांग्रेस बोली- जनता ने नकारा, अब खरीद-फरोख्त का सहारा कांग्रेस के प्रदेश मीडिया प्रभारी राकेश सिन्हा ने भाजपा पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि विधानसभा चुनाव में जनता ने भाजपा को साफ तौर पर नकार दिया था। अब भाजपा राज्यसभा सीट जीतने के लिए हॉर्स ट्रेडिंग का सहारा लेना चाहती है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा अपने “थैलीशाह मित्रों” की मदद से गलत हथकंडे अपनाकर चुनाव जीतने की कोशिश कर रही है। राकेश सिन्हा ने दावा किया कि महागठबंधन के सभी विधायक एकजुट हैं और भाजपा की कोई भी चाल सफल नहीं होगी। उन्होंने कहा कि भाजपा पहले भी इस तरह की कोशिश कर चुकी है, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। भाजपा का पलटवार- कांग्रेस को अपने विधायकों पर भरोसा नहीं भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अजय साह ने कांग्रेस के आरोपों को निराधार बताते हुए पलटवार किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को अब अपने ही विधायकों पर भरोसा नहीं रह गया है। अजय साह ने कहा कि कांग्रेस को आरोप लगाने के बजाय अपने विधायकों को एकजुट रखने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जब कांग्रेस को राज्यसभा भेजने का मौका मिला, तब उसने ऐसे नेताओं को चुना जिनके यहां सैकड़ों करोड़ रुपये बरामद हुए थे। भाजपा को चाहिए चार अतिरिक्त वोट 81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में NDA के पास कुल 24 विधायक हैं। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 28 वोटों की जरूरत है। ऐसे में भाजपा को चार अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता होगी। भाजपा को उम्मीद है कि क्रॉस वोटिंग के जरिए उसे फायदा मिल सकता है।
रांची। झारखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत वोटरों की मैपिंग का काम लोगों और बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) के लिए बड़ी परेशानी बन गया है। चुनाव आयोग द्वारा 2003 की वोटर लिस्ट के आधार पर 70 लाख से अधिक अनमैप्ड मतदाताओं का सत्यापन किया जाना है, लेकिन तकनीकी दिक्कतों और अधूरी जानकारी के कारण प्रक्रिया धीमी पड़ गई है। सबसे अधिक परेशानी ग्रामीण और बुजुर्ग मतदाताओं को हो रही है, जिन्हें अपना सही मतदान केंद्र खोजने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। 2003 की वोटर लिस्ट से हो रही जांच चुनाव आयोग के निर्देश के अनुसार, किसी भी मतदाता या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम वर्ष 2003 की वोटर सूची में होना जरूरी है। इसी आधार पर वर्तमान मतदाता की मैपिंग की जा रही है। प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन होने के कारण लोगों को पहले अनमैप्ड सूची में अपना नाम देखना पड़ता है और फिर संबंधित बीएलओ से संपर्क करना पड़ता है। बीएलओ वोटर आईडी या आधार नंबर लेकर 2003 की सूची में नाम खोजते हैं। लेकिन तकनीकी समस्याओं ने इस काम को बेहद कठिन बना दिया है। रांची के बूथ नंबर 181 के बीएलओ राकेश मुंडा ने बताया कि मोबाइल पर वेबसाइट खोलने पर केवल दो पेज दिखाई देते हैं, जिनमें लगभग 100 नाम ही उपलब्ध हैं। पूरी वोटर सूची नहीं खुलने से सही जानकारी ढूंढना मुश्किल हो रहा है। मतदान केंद्र खोजने में भटक रहे लोग अधिकांश मतदाता पिछले चुनाव के मतदान केंद्र पर पहुंच रहे हैं, लेकिन वहां उन्हें बताया जा रहा है कि उनका नाम किसी अन्य केंद्र में स्थानांतरित हो चुका है। इससे लोगों को एक केंद्र से दूसरे केंद्र तक भटकना पड़ रहा है। हरमू निवासी कोलेश्वर महतो पिछले दो दिनों से अपना सही मतदान केंद्र खोज रहे हैं। वे पहले डीएवी कपिलदेव और संत फ्रांसिस स्कूल बूथ जा चुके हैं, लेकिन वहां जानकारी नहीं मिलने के बाद अब दूसरे केंद्र पहुंचे। मतदाताओं ने उठाई मांग मतदाताओं का कहना है कि चुनाव आयोग को उन लोगों की सूची भी सार्वजनिक करनी चाहिए जिनकी मैपिंग पूरी हो चुकी है। साथ ही 2003 की वोटर सूची की हार्ड कॉपी प्रत्येक मतदान केंद्र पर उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि लोगों को ऑनलाइन तकनीकी दिक्कतों से राहत मिल सके। चुनाव आयोग का आश्वासन मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी रवि कुमार ने कहा कि जिन मतदाताओं की मैपिंग सफलतापूर्वक हो जाएगी, उन्हें अतिरिक्त दस्तावेज देने की आवश्यकता नहीं होगी। केवल गणना प्रपत्र भरने से प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। वहीं जिनकी मैपिंग नहीं होगी, उन्हें दस्तावेज सत्यापन के लिए नोटिस भेजा जाएगा। चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि विशेष शिविर खत्म होने के बाद बीएलओ घर-घर जाकर भी सत्यापन करेंगे।
रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए 18 जून को चुनाव होगा। इसको लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। भाजपा ने अपना प्रत्याशी उतारने की घोषणा कर दी है। पार्टी की चुनाव समिति की बैठक में प्रत्याशी उतारने का फैसला हुआ। इसी बीच सत्तारूढ़ झामुमो ने भारत निर्वाचन आयोग को पत्र लिखकर चुनाव में हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका जताई है। भाजपा की चुनाव समिति की बैठक में कहा गया कि पार्टी को चुनाव लड़ना चाहिए। एक सीट पर सशक्त उम्मीदवार देना चाहिए। पार्टी और उसके सहयोगी दलों को मिलाकर 24 वोट हैं। जीत के लिए सिर्फ चार वोट की जरूरत है। सभी विधायकों से राष्ट्रहित में आग्रह किया जाए कि वे पीएम नरेंद्र मोदी को और मजबूत करें, जिससे झारखंड सहित पूरे देश का विकास हो। बैठक में पार्टी की रणनीति को लेकर भी चर्चा हुई। साथ ही जेएलकेएम विधायक जयराम महतो, आजसू, जदयू व लोजपा (आर) के विधायकों व प्रदेश अध्यक्षों के साथ भी बैठक करने पर सहमति बनी। दावा-पार्टी का कार्यकर्ता ही चुनाव लड़ेगा बैठक के बाद प्रदेश महामंत्री अमर बाउरी ने कहा कि कोई बाहरी नहीं, पार्टी का कार्यकर्ता ही राज्यसभा चुनाव लडेगा। झामुमो के हॉर्स ट्रेडिंग को बढ़ावा देने की आशंका पर उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले ही महागठबंधन का अपने विधायकों पर से भरोसा खत्म हो गया है। झारखंड में राज्यसभा चुनाव में खरीद-फरोख्त की शुरुआत महागठबंधन की पार्टियों ने ही की थी। झामुमो ने आयोग को लिखा पत्र इधर, झामुमो के महासचिव विनोद पांडेय ने चुनाव आयोग को पत्र लिखा है। इसमें उन्होंने हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका जताई है। कहा है कि गठबंधन के पास दोनों सीटें जीतने के लिए पर्याप्त विधायक हैं। लेकिन, एनडीए के पास सिर्फ 24 विधायक हैं, जो एक सीट जीतने के लिए काफी नहीं है। ऐसे में भाजपा के प्रत्याशी उतारने पर विधायकों को प्रभावित करने के लिए आर्थिक प्रलोभन, बाहरी दबाव या अन्य अनैतिक तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। झामुमो ने आयोग से निष्पक्ष, पारदर्शी और भयमुक्त माहौल में राज्यसभा चुनाव कराने के लिए विशेष निगरानी व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है। पार्टी ने सीबीआई, ईडी, राज्य खुफिया निदेशालय, केंद्रीय सतर्कता आयोग और राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को भी सतर्क रखने का आग्रह किया है। मतलब साफ है, झारखंड में राज्यसभा की एक सीट को लेकर सियासी घमासान स्क्रिप्ट तैयार दिख रही है। आनेवाले दिनों रोमांचक संघर्ष की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।