रांची। स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने जैक को आवेदन जमा करने की तारीख भी 20 जुलाई तक बढ़ाने के लिए कहा है। वर्तमान में आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 20 जून तक निर्धारित है।
रांची। Jharkhand JTET Dispute: झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) की जिलावार सूची में भोजपुरी, मगही और अंगिका भाषा को शामिल करने का मामला पूरी तरह उलझ गया है। इस विवाद को सुलझाने के लिए गठित मंत्रियों की उच्च स्तरीय कमेटी की बैठक बेनतीजा रही। पूर्व की पांच सदस्यीय कमेटी के विस्तार के बाद यह पहली बैठक थी, जिसमें मंत्रियों के बीच आपसी सहमति नहीं बन सकी। अब कमेटी अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को सौंपेगी, जिनका फैसला इस विषय पर अंतिम होगा। समर्थन में 3, तो विरोध में 4 मंत्री बैठक में कमेटी के भीतर भाषाई प्राथमिकताओं को लेकर मंत्रियों के बीच स्पष्ट विभाजन देखने को मिला। कमेटी में शामिल दो नए मंत्रियों- शिल्पी नेहा तिर्की और हफिजुल हसन अंसारी ने भोजपुरी, मगही और अंगिका को जेटेट में शामिल करने पर कड़ी असहमति जताई। पहले से कमेटी में शामिल मंत्री सुदिव्य सोनू और योगेंद्र महतो पहले से ही इसके विरोध में थे। इसके साथ ही विरोध करने वाले मंत्रियों की संख्या बढ़कर चार हो गई है। कमेटी के संयोजक व वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर, मंत्री दीपिका पांडेय सिंह और मंत्री संजय सिंह यादव इन तीनों भाषाओं को शामिल करने के पक्ष में डटे हैं। राधाकृष्ण किशोर ने चला नया दांव बैठक के दौरान सहमति न बनते देख कमेटी के संयोजक राधाकृष्ण किशोर ने एक नया प्रस्ताव सामने रखा। उनका कहना था कि यदि ये तीन भाषाएं शामिल नहीं की जाती हैं, तो हिंदी को पेपर टू (Paper 2) में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। उन्होंने दलील देते हुए कहा कि पलामू और गढ़वा में नागपुरी भाषा को सूची में शामिल किया गया है, जबकि वहां दो प्रतिशत आबादी भी इस भाषा को नहीं बोलती। उन्होंने जोर दिया कि राज्य का गठन जनजातीय भावना के साथ-साथ यहां के सामाजिक व आर्थिक उत्थान के लिए सभी वर्गों को ध्यान में रखकर हुआ था। हालांकि, इस प्रस्ताव पर बाकी मंत्रियों ने साफ कहा कि पेपर वन (Paper 1) में हिंदी पहले से ही मौजूद है। किस मंत्री ने क्या तर्क दिया बैठक में कमेटी की नई सदस्य और कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि राज्य में अभी स्पष्ट स्थानीय नीति नहीं है, ऐसे में भाषा से ही स्थानीय युवाओं के अधिकारों की रक्षा और बाहरी तत्वों पर नियंत्रण संभव है। शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) राज्य अपनी जरूरत और योग्य शिक्षकों की तलाश के लिए लेता है, वरना सीटेट (CTET) ही काफी था। जनजातीय व क्षेत्रीय भाषाएं हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक हितों से जुड़ी हैं। जब स्कूलों में मगही, भोजपुरी और अंगिका की पढ़ाई ही नहीं होती, तो इन्हें परीक्षा में कैसे शामिल किया जा सकता है।” हफिजुल हसन अंसारी ने क्या कहा मंत्री हफिजुल हसन अंसारी ने कहा कि मगही, भोजपुरी और अंगिका बिहार की मूल भाषाएं हैं। जब खुद बिहार ने अपनी प्रशासनिक सेवा (BPSC) की परीक्षाओं में इन भाषाओं को शामिल नहीं किया है, तो झारखंड इन्हें अपनी परीक्षा में क्यों शामिल करें? इन्हें किसी भी हाल में शामिल नहीं किया जा सकता।” मंत्री सुदिव्य सोनू ने क्या कहा मंत्री सुदिव्य सोनू ने इस विवाद पर तर्क देते हुए कहा कि झारखंड राज्य का गठन जिन मूल भावनाओं और उद्देश्यों के लिए हुआ था, उसका हर हाल में सम्मान किया जाना चाहिए। वहीं, मंत्री योगेंद्र प्रसाद महतो ने दलील दी कि मगही, भोजपुरी और अंगिका झारखंड की मूल क्षेत्रीय भाषाएं नहीं हैं, इसलिए इन्हें शामिल करने का कोई औचित्य नहीं है।” दीपिका पांडेय और राधाकृष्ण किशोर ने किया समर्थन हालांकि, दीपिका पांडेय सिंह इन 3 भाषाओं को शामिल करने के पक्ष में दिखीं। उन्होंने कहा कि अंगिका, भोजपुरी और मगही को परीक्षा में शामिल किया जाना चाहिए। हर भाषा का अपना सम्मान होना चाहिए।” मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कमेटी की सदस्य और मंत्री दीपिका की बात का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि राज्य में किसी भी क्षेत्र के अभ्यर्थियों के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए, परीक्षा में सबको समान अवसर मिलना चाहिए।” मुख्यमंत्री को भेजी जाएगी रिपोर्ट कमेटी के संयोजक राधाकृष्ण किशोर ने स्पष्ट कर दिया है कि यह इस संबंध में आखिरी बैठक थी। उन्होंने कमेटी के सभी सदस्यों से कहा है कि यदि वे चाहें तो अपनी बातें लिखित रूप में एक-दो दिन के भीतर दे सकते हैं। इसके बाद मंत्रियों की इस भावना और लिखित दलीलों से अवगत कराते हुए पूरी रिपोर्ट मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भेज दी जाएगी, जिसके बाद इस पूरे विवाद पर अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री स्तर से ही लिया जाएगा।
रांची। रांची में आयोजित पुनर्गठित भाषा समिति की बैठक में झारखंड की कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने JTET-2026 में राज्य की स्थानीय और जनजातीय भाषाओं को प्राथमिकता देने की जोरदार वकालत की। उन्होंने कहा कि 'शिक्षक पात्रता परीक्षा' (TET) केवल एक प्रतियोगी परीक्षा नहीं, बल्कि ऐसी योग्यता परीक्षा है जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शिक्षक विद्यार्थियों की भाषाई, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझते हुए प्रभावी ढंग से शिक्षण कर सकें। स्थानीय भाषाओं को बताया शिक्षा का आधार मंत्री ने कहा कि झारखंड जैसे बहुभाषी राज्य में भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि शिक्षण का महत्वपूर्ण उपकरण है। उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य की पांच प्रमुख जनजातीय भाषाएं कुड़ुख, मुंडारी, संथाली, खड़िया और हो तथा चार क्षेत्रीय भाषाएं खोरठा, कुरमाली, नागपुरी और पंचपरगनिया लंबे समय से शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा रही हैं। इसलिए इन्हें JTET में उचित स्थान मिलना चाहिए। भाषाई न्याय और स्थानीय हितों पर जोर शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि जिन भाषाओं में विद्यार्थियों की पढ़ाई होती है, उन्हीं भाषाओं को शिक्षक पात्रता परीक्षाओं में प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उनके अनुसार इससे शिक्षा व्यवस्था अधिक व्यावहारिक, प्रभावी और विद्यार्थियों की जरूरतों के अनुरूप बनेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्थानीय भाषाओं को प्राथमिकता देना किसी वर्ग को बाहर करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि शिक्षक बच्चों से उनकी परिचित भाषा में संवाद कर सकें। भोजपुरी, मगही और अंगिका को शामिल करने का विरोध मंत्री ने JTET में भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसी भाषाओं को शामिल करने का विरोध करते हुए कहा कि झारखंड का गठन उसकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय अधिकारों की रक्षा के लिए हुआ था। उन्होंने तर्क दिया कि इन भाषाओं को शामिल करना राज्य के मूल निवासियों के रोजगार अवसरों और स्थानीय हितों के खिलाफ होगा। साथ ही उन्होंने 13 मार्च 2023 के राजपत्र के आधार पर भाषा नीति तय करने की मांग की।
झारखंड विधानसभा में शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। जमशेदपुर पूर्वी की विधायक Purnima Sahu ने राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि वर्षों से परीक्षा नहीं होने के कारण राज्य के युवाओं का भविष्य अधर में लटक गया है। 2016 के बाद से नहीं हुई JTET परीक्षा विधानसभा के प्रश्नकाल के दौरान Jharkhand Teacher Eligibility Test का मुद्दा जोरदार तरीके से उठा। विधायक पूर्णिमा साहू ने सरकार से सवाल करते हुए कहा कि वर्ष 2016 के बाद से अब तक JTET परीक्षा आयोजित नहीं की गई है। सरकार ने सदन में स्वीकार किया कि 2016 के बाद से राज्य में अब तक JTET का आयोजन नहीं हो सका है। इस जवाब पर प्रतिक्रिया देते हुए विधायक ने कहा कि यह राज्य के युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। हाईकोर्ट की डेडलाइन पर भी उठाए सवाल विधायक पूर्णिमा साहू ने सरकार से यह भी पूछा कि क्या शिक्षा विभाग ने Jharkhand High Court में 31 मार्च 2026 तक JTET परीक्षा आयोजित कराने का शपथ पत्र दिया है। सरकार ने जवाब में बताया कि हरिकेश महतो बनाम राज्य सरकार मामले में हाईकोर्ट ने 31 मार्च 2026 तक परीक्षा कराने का आदेश दिया है। हालांकि सरकार ने यह भी कहा कि नई नियमावली का प्रारूप तैयार है, लेकिन उसे मंजूरी मिलने की प्रक्रिया अभी जारी है। 20 दिन में परीक्षा कैसे संभव? इस पर विधायक पूर्णिमा साहू ने सरकार को घेरते हुए कहा कि जब परीक्षा कराने के लिए केवल 20 दिन का समय बचा है, तो इतने कम समय में नियमावली को मंजूरी और परीक्षा का आयोजन कैसे संभव होगा। उन्होंने इसे सरकार का चिंताजनक और शर्मनाक रवैया बताते हुए कहा कि वर्ष 2024 में भी नई नियमावली के नाम पर आवेदन लेकर परीक्षा टाल दी गई थी। युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ का आरोप पूर्णिमा साहू ने आरोप लगाया कि जो सरकार दो वर्षों में नियमावली को मंजूरी नहीं दिला सकी, वह 31 मार्च तक परीक्षा आयोजित कराने का दावा कैसे कर सकती है। उन्होंने सरकार पर हाईकोर्ट के आदेशों की अनदेखी करने और राज्य के युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने का भी आरोप लगाया।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।