इस्लामाबाद/मुजफ्फराबाद: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में सरकार विरोधी आंदोलन के बीच हालात लगातार बिगड़ने के दावे सामने आ रहे हैं। स्थानीय लोगों, ट्रक चालकों और प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पाकिस्तान प्रशासन ने खाद्य सामग्री, ईंधन और दवाओं की आपूर्ति सीमित कर आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश की है। पाकिस्तान सरकार ने इन आरोपों से इनकार किया है, लेकिन विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कई इलाकों में आवश्यक वस्तुओं की कमी की शिकायतें बढ़ रही हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में चल रहे विरोध प्रदर्शन और बंद के कारण आम लोगों की परेशानियां बढ़ गई हैं। राजधानी मुजफ्फराबाद सहित कई शहरों में बाजार बंद हैं और इंटरनेट सेवाओं में भी रुकावट की खबरें सामने आई हैं। खाद्य सामग्री और दवाओं की कमी का दावा स्थानीय निवासियों का कहना है कि आटा, चावल, दाल, चीनी, दवाइयों और अन्य जरूरी सामान की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही है। दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों का आरोप है कि राशन डिपो पर कई दिनों तक इंतजार करने के बावजूद उन्हें आवश्यक वस्तुएं नहीं मिल रही हैं, जबकि खुले बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं। ईंधन संकट से बढ़ी मुश्किलें ईंधन की कमी भी लोगों के लिए बड़ी समस्या बन गई है। कई जिलों में पेट्रोल पंप बंद होने की खबरें हैं। वाहन चालकों का दावा है कि उन्हें ब्लैक मार्केट से ऊंचे दामों पर पेट्रोल खरीदना पड़ रहा है, जिससे आम लोगों और व्यापारियों दोनों की परेशानियां बढ़ गई हैं। जरूरी सामान लाने वालों को रोके जाने के आरोप रिपोर्टों के अनुसार, कई लोग आवश्यक सामान खरीदने के लिए पाकिस्तान के अन्य शहरों जैसे रावलपिंडी और इस्लामाबाद जा रहे हैं। कुछ स्थानीय लोगों का आरोप है कि लौटते समय उन्हें खाद्य सामग्री, दवाइयां और ईंधन लेकर PoK में प्रवेश नहीं करने दिया जा रहा। कुछ लोगों ने यह भी दावा किया कि पुलिस ने चेकपोस्ट पर उनके वाहनों को रोककर सामान वापस ले जाने या फेंकने के लिए दबाव बनाया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। ट्रकों की आवाजाही प्रभावित होने का दावा स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, आवश्यक वस्तुओं से भरे कई ट्रकों को रास्ते में रोके जाने के कारण सप्लाई प्रभावित हुई है। ट्रक चालकों का कहना है कि कई वाहन घंटों और कुछ मामलों में कई दिनों तक रास्ते में खड़े रहे, जिससे खराब होने वाला सामान भी नुकसान का शिकार हुआ। पाकिस्तान प्रशासन ने आरोपों से किया इनकार पाकिस्तान प्रशासन ने खाद्य सामग्री और ईंधन की आपूर्ति रोकने के आरोपों को खारिज किया है। अधिकारियों का कहना है कि आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई सामान्य रूप से जारी है और किसी भी वाहन को जानबूझकर नहीं रोका गया है। कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह दावा किया गया है कि आंदोलन को कमजोर करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कुछ रणनीतिक कदम उठाए गए हैं। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। क्या है पूरे विवाद की वजह? PoK में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत विधानसभा की उन 12 आरक्षित सीटों को लेकर हुई, जो भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर से आए शरणार्थियों के लिए निर्धारित हैं। आंदोलनकारी संगठनों का आरोप है कि इन सीटों के जरिए इस्लामाबाद क्षेत्र की राजनीति को प्रभावित करता है। इसी मुद्दे को लेकर ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया। बाद में पाकिस्तान सरकार ने JAAC को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर उसके समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी। आंदोलन के और तेज होने के संकेत रिपोर्टों के अनुसार, PoK के कई शहरों और कस्बों में प्रदर्शन लगातार फैल रहे हैं। आंदोलनकारी संगठन दावा कर रहे हैं कि रावलाकोट में चल रहे धरने में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए हैं। JAAC ने आने वाले दिनों में रावलाकोट से मुजफ्फराबाद तक बड़े मार्च का भी आह्वान किया है। इस बीच क्षेत्र में तनाव बना हुआ है और प्रशासन स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है।
रावलकोट: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) के रावलकोट में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच तनाव हिंसक रूप लेता नजर आया। स्थानीय सूत्रों और प्रदर्शनकारी संगठनों के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तानी सेना और रेंजर्स की कथित गोलीबारी में कम से कम 16 लोगों की मौत हो गई, जबकि 37 से अधिक लोग घायल हुए हैं। इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। रिपोर्टों के मुताबिक, रावलकोट के ईदगाह मैदान में हजारों लोग महंगाई, बिजली दरों में वृद्धि और बुनियादी राजनीतिक एवं आर्थिक अधिकारों की मांग को लेकर एकत्र हुए थे। प्रदर्शन के दौरान हालात तनावपूर्ण हो गए और सुरक्षा बलों द्वारा बल प्रयोग किए जाने के आरोप लगाए गए। घटना के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई तथा घायलों को नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया। कई दिनों से जारी है आंदोलन POK में पिछले कई दिनों से सस्ती बिजली, सब्सिडी वाले खाद्यान्न और अधिक प्रशासनिक अधिकारों की मांग को लेकर आंदोलन जारी है। प्रदर्शनकारी संगठनों का कहना है कि बढ़ती महंगाई और आर्थिक चुनौतियों के कारण आम लोगों का असंतोष लगातार बढ़ रहा है। हाल के दिनों में जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) पर लगाए गए प्रतिबंधों और आंदोलन से जुड़े कई कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, प्रशासन ने कुछ इलाकों में इंटरनेट सेवाएं भी बंद कर दी हैं। रावलकोट घटना के बाद विरोध प्रदर्शन तेज रावलकोट की घटना के बाद खाई गाला समेत कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। कई बाजार बंद रहे और लोगों ने सुरक्षा बलों की कार्रवाई के खिलाफ मार्च निकाले। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की भी इन प्रदर्शनों में भागीदारी देखी गई। प्रदर्शनकारी नेताओं का दावा है कि 5 जून से जारी आंदोलन के दौरान अब तक 53 नागरिकों की मौत हो चुकी है। इस संख्या की भी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। नेताओं ने कहा है कि वे आर्थिक राहत और लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग को लेकर अपना आंदोलन जारी रखेंगे। भारत की प्रतिक्रिया भारत ने घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए इसकी कड़ी निंदा की है। भारत ने इसे गंभीर मानवाधिकार मुद्दा बताते हुए कहा कि यह पाकिस्तान के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में नागरिक अधिकारों की स्थिति पर सवाल खड़े करता है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मामले का संज्ञान लेने और प्रभावित लोगों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की गई है। फिलहाल क्षेत्र में तनाव बना हुआ है और स्थिति पर सभी पक्षों की नजर है। घटना से जुड़े दावों और हताहतों के आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार किया जा रहा है।
पहलगाम आतंकी हमले की जांच में सुरक्षा एजेंसियों के हाथ एक महत्वपूर्ण सुराग लगा है, जिसने हमले के संभावित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की ओर संकेत किया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और जम्मू-कश्मीर पुलिस की जांच में पता चला है कि आतंकियों के पास से बरामद दो मोबाइल फोन पाकिस्तान में आयात की गई खेप का हिस्सा थे। हैरानी की बात यह है कि दोनों उपकरण वर्षों तक निष्क्रिय रहे और हमले से ठीक पहले सक्रिय किए गए। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम स्थित बैसरन घाटी में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की जान गई थी। इसके बाद शुरू हुई जांच के दौरान सुरक्षा बलों ने जुलाई 2025 में दाचीगाम के मुलनार महादेव क्षेत्र में मुठभेड़ में तीन आतंकियों को मार गिराया। मारे गए आतंकियों के पास से दो शाओमी रेडमी सीरीज के मोबाइल फोन बरामद हुए थे। पाकिस्तान से आयातित खेप का हिस्सा था मोबाइल जांच में सामने आया कि बरामद रेडमी 9टी मोबाइल वर्ष 2021 में पाकिस्तान पहुंची एक आयातित खेप का हिस्सा था। तकनीकी विश्लेषण से पता चला कि फोन पाकिस्तान पहुंचने के बाद कभी इस्तेमाल नहीं किया गया और पहली बार हमले की तैयारी के दौरान सक्रिय हुआ। दूसरा फोन, रेडमी नोट 12, भी पाकिस्तान से आयातित था और उसके उपयोग का पैटर्न भी लगभग समान पाया गया। जांच अधिकारियों का मानना है कि दोनों मोबाइल फोन विशेष उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखे गए थे और बाद में आतंकियों तक पहुंचाए गए। मोबाइल में मिले नक्शे और तस्वीरें फोन से कोई कॉल रिकॉर्ड, चैट या संदेश बरामद नहीं हुए हैं, लेकिन जांचकर्ताओं को इनमें पहलगाम और उसके आसपास के क्षेत्रों के नक्शे तथा कई तस्वीरें मिली हैं। एक तस्वीर 30 मार्च 2025 की बताई जा रही है, जिससे संकेत मिलता है कि हमलावर घटना से कई सप्ताह पहले इलाके में डेरा डाले हुए थे। तस्वीरों में एक अस्थायी टेंट और अन्य सामान भी दिखाई दे रहे हैं, जिससे सुरक्षा एजेंसियों को हमले की पूर्व तैयारी के संबंध में अहम संकेत मिले हैं। आतंकियों ने अपनाई थी वैकल्पिक संचार प्रणाली प्रारंभिक जांच के अनुसार, आतंकी मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट आधारित संचार पर निर्भर नहीं थे। अधिकारियों का मानना है कि वे लंबी दूरी की रेडियो संचार प्रणाली का इस्तेमाल कर रहे थे, जिससे उनकी गतिविधियां डिजिटल निगरानी से काफी हद तक बची रहीं। जांच को मिली नई दिशा मोबाइल फोन की उत्पत्ति, उनका वर्षों तक निष्क्रिय रहना और फिर हमले से ठीक पहले सक्रिय होना जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है। एनआईए और जम्मू-कश्मीर पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि ये उपकरण पाकिस्तान से आतंकियों तक कैसे पहुंचे और हमले की साजिश में उनकी क्या भूमिका रही। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इन डिजिटल सबूतों से हमले के पूरे नेटवर्क, उसके संचालकों और सीमा पार मौजूद संभावित समर्थन तंत्र तक पहुंचने में मदद मिल सकती है। जांच अधिकारियों का मानना है कि दोनों मोबाइल फोन विशेष उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखे गए थे और बाद में आतंकियों तक पहुंचाए गए। मोबाइल में मिले नक्शे और तस्वीरें फोन से कोई कॉल रिकॉर्ड, चैट या संदेश बरामद नहीं हुए हैं, लेकिन जांचकर्ताओं को इनमें पहलगाम और उसके आसपास के क्षेत्रों के नक्शे तथा कई तस्वीरें मिली हैं। एक तस्वीर 30 मार्च 2025 की बताई जा रही है, जिससे संकेत मिलता है कि हमलावर घटना से कई सप्ताह पहले इलाके में डेरा डाले हुए थे। तस्वीरों में एक अस्थायी टेंट और अन्य सामान भी दिखाई दे रहे हैं, जिससे सुरक्षा एजेंसियों को हमले की पूर्व तैयारी के संबंध में अहम संकेत मिले हैं। आतंकियों ने अपनाई थी वैकल्पिक संचार प्रणाली प्रारंभिक जांच के अनुसार, आतंकी मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट आधारित संचार पर निर्भर नहीं थे। अधिकारियों का मानना है कि वे लंबी दूरी की रेडियो संचार प्रणाली का इस्तेमाल कर रहे थे, जिससे उनकी गतिविधियां डिजिटल निगरानी से काफी हद तक बची रहीं। जांच को मिली नई दिशा मोबाइल फोन की उत्पत्ति, उनका वर्षों तक निष्क्रिय रहना और फिर हमले से ठीक पहले सक्रिय होना जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है। एनआईए और जम्मू-कश्मीर पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि ये उपकरण पाकिस्तान से आतंकियों तक कैसे पहुंचे और हमले की साजिश में उनकी क्या भूमिका रही। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इन डिजिटल सबूतों से हमले के पूरे नेटवर्क, उसके संचालकों और सीमा पार मौजूद संभावित समर्थन तंत्र तक पहुंचने में मदद मिल सकती है।
श्रीनगर, एजेंसियां। भारतीय खुफिया एजेंसियों ने जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को लेकर बड़ा अलर्ट जारी किया है। एजेंसियों के अनुसार लंबे समय से कमजोर पड़े आतंकी संगठन अल-बद्र अब एक बार फिर घाटी में सक्रिय होने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए वह हिजबुल मुजाहिदीन के साथ मिलकर संयुक्त रणनीति पर काम कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI घाटी में “होमग्रोन टेरर मॉडल” के जरिए आतंकवाद को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है। एजेंसियों का मानना है कि स्थानीय चेहरों और पुराने नेटवर्क के सहारे आतंकी गतिविधियों को दोबारा सक्रिय करने की योजना बनाई जा रही है। ISI की रणनीति और नए भर्ती अभियान की आशंका खुफिया अधिकारियों के अनुसार, अल-बद्र और हिजबुल मुजाहिदीन को घरेलू आतंकी संगठनों के रूप में पेश करना ISI की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। इन संगठनों में कई ऐसे लोग शामिल बताए जा रहे हैं, जो पहले पढ़ाई के बहाने पाकिस्तान गए थे और बाद में वहां प्रशिक्षण लेकर घाटी में आतंकी गतिविधियों से जुड़े। सूत्रों ने बताया कि अल-बद्र के शीर्ष कमांडर हमजा बुरहान की हालिया मौत संगठन के लिए बड़ा झटका थी, लेकिन इसके बावजूद संगठन फिर से नेटवर्क खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। एजेंसियों के मुताबिक दोनों संगठन जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के असंतुष्ट आतंकियों को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। युवाओं को निशाना बनाने की साजिश खुफिया एजेंसियों के अनुसार, हमजा बुरहान युवाओं की भर्ती और प्रचार अभियान का जिम्मा संभाल रहा था। पोस्टर और सोशल मीडिया के जरिए युवाओं को कट्टरपंथ की ओर आकर्षित करने की योजना बनाई जा रही थी। हाल ही में हमजा बुरहान के अंतिम संस्कार में अल-बद्र और हिजबुल के कई नेताओं की मौजूदगी ने दोनों संगठनों की बढ़ती नजदीकियों को उजागर किया। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि घाटी में आतंकवाद को दोबारा सक्रिय करने की यह कोशिश आने वाले समय में बड़ी चुनौती बन सकती है।
श्रीनगर, एजेंसियां। जम्मू और कश्मीर में चल रही डिजिटल जनगणना 2027 के बीच गुर्जर और बकरवाल समुदाय के खानाबदोश परिवारों ने अपनी चिंता जताई है। ऊंचे पहाड़ी इलाकों और चरागाहों की ओर पलायन कर चुके इन समुदायों का कहना है कि इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क की कमी के कारण वे जनगणना प्रक्रिया से बाहर रह सकते हैं। इंटरनेट और जागरूकता सबसे बड़ी चुनौती 17 मई से शुरू हुई ऑनलाइन सेल्फ-एन्यूमरेशन प्रक्रिया 31 मई तक चलेगी। नागरिकों को पोर्टल पर अपनी जानकारी खुद दर्ज करनी है, लेकिन कश्मीर घाटी के दूरदराज पहाड़ी इलाकों में रहने वाले खानाबदोश परिवारों के पास न इंटरनेट है और न ही इस प्रक्रिया की पर्याप्त जानकारी। गुर्जर बकरवाल स्टूडेंट्स अलायंस के प्रवक्ता आमिर चौधरी ने कहा कि जनगणना सर्दियों में होनी चाहिए, जब ये समुदाय मैदानी इलाकों में मौजूद रहते हैं। 2011 जैसी गलती दोहराने का डर आदिवासी कार्यकर्ताओं का कहना है कि 2011 की जनगणना में भी बड़ी संख्या में खानाबदोश समुदाय छूट गया था। उनके मुताबिक वास्तविक आबादी करीब 30 लाख है, लेकिन आधिकारिक आंकड़ों में केवल 11 लाख लोगों को दर्ज किया गया। कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी कि अगर इस बार भी यही स्थिति रही तो सरकारी योजनाओं, आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ेगा। विशेष व्यवस्था की मांग समुदाय के प्रतिनिधियों ने सरकार से समय-सीमा बढ़ाने और विशेष फील्ड एजेंसियों की मदद लेने की मांग की है। उनका सुझाव है कि ऑफलाइन डिजिटल डिवाइस, सैटेलाइट तकनीक और मोबाइल टीमों के जरिए जनगणना कराई जाए ताकि कोई परिवार छूट न जाए। प्रशासन ने दिया भरोसा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के जनगणना निदेशक अमित शर्मा ने भरोसा दिलाया कि गुर्जर-बकरवाल समुदाय का एक भी व्यक्ति जनगणना से बाहर नहीं रहेगा। उन्होंने कहा कि वन, पशुपालन और शिक्षा विभाग की मदद से विशेष टीमें बनाकर पहाड़ी इलाकों तक पहुंच सुनिश्चित की जाएगी।
जम्मू-कश्मीर की राजधानी Srinagar में सुरक्षा एजेंसियों को बड़ी कामयाबी मिली है। पुलिस ने आतंकियों को लॉजिस्टिक सपोर्ट देने के आरोप में चार ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) को गिरफ्तार किया है, जिनमें एक महिला भी शामिल है। हजरतबल इलाके से हुई गिरफ्तारी पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, यह कार्रवाई बुधवार रात शहर के Hazratbal इलाके में की गई। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान जाहूर अहमद मीर, बशीर अहमद भट, गुलाम मोहम्मद भट और शाजिया मोहम्मद के रूप में हुई है। सभी आरोपी हजरतबल क्षेत्र के निवासी बताए जा रहे हैं। हथियार और नकदी बरामद सुरक्षा बलों ने आरोपियों के कब्जे से एक हैंड ग्रेनेड, AK-47 की 15 गोलियां, चार मोबाइल फोन और नकदी बरामद की है। अधिकारियों का कहना है कि ये लोग आतंकियों को जरूरी सामग्री और जानकारी उपलब्ध कराते थे, जिससे उनकी गतिविधियों को मदद मिलती थी। कड़े कानूनों के तहत मामला दर्ज पुलिस ने चारों आरोपियों के खिलाफ Unlawful Activities (Prevention) Act (UAPA) और आर्म्स एक्ट के तहत केस दर्ज किया है। जांच एजेंसियां अब इस नेटवर्क के अन्य संभावित कनेक्शन की भी जांच कर रही हैं। सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता जारी अधिकारियों का कहना है कि घाटी में आतंकवाद के खिलाफ अभियान लगातार जारी है और ऐसे तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है। इस गिरफ्तारी को सुरक्षा बलों की एक महत्वपूर्ण सफलता माना जा रहा है, जिससे आतंकियों के नेटवर्क को कमजोर करने में मदद मिलेगी।
शहीदों को पीएम मोदी ने दी श्रद्धांजलि प्रधानमंत्री Narendra Modi ने पहलगाम आतंकी हमले की पहली बरसी पर पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि इस हमले में जान गंवाने वाले निर्दोष लोगों को देश कभी नहीं भूलेगा। प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि यह हमला देश की आत्मा को झकझोर देने वाला था और पीड़ित परिवारों के साथ पूरा देश खड़ा है। “भारत आतंक के सामने नहीं झुकेगा” पीएम मोदी ने अपने संदेश में साफ कहा कि भारत किसी भी तरह के आतंक के आगे नहीं झुकेगा। उन्होंने कहा कि आतंकियों की साजिशें कभी सफल नहीं होंगी और देश मजबूती से उनका मुकाबला करेगा। उन्होंने यह भी दोहराया कि देश दुख की इस घड़ी में एकजुट है और पीड़ित परिवारों के साथ खड़ा है। 2025 में हुआ था भीषण हमला 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के Pahalgam में आतंकियों ने हमला कर 26 लोगों की हत्या कर दी थी, जिनमें ज्यादातर पर्यटक शामिल थे। इस हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था और इसके बाद बड़े स्तर पर सुरक्षा और सैन्य कार्रवाई की गई थी। ऑपरेशन सिंदूर और महादेव से जवाब हमले के बाद भारत ने “ऑपरेशन सिंदूर” के तहत पाकिस्तान और पीओके में आतंकियों के ठिकानों पर कार्रवाई की थी। इस दौरान कई आतंकी ठिकानों को नष्ट किया गया और बड़ी संख्या में आतंकियों को मार गिराया गया। इसके बाद “ऑपरेशन महादेव” के तहत सुरक्षा बलों ने हमले में शामिल तीन आतंकियों को भी ढेर कर दिया। सुरक्षा बढ़ी, स्मारक बना हमले की बरसी को देखते हुए पहलगाम में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। यहां अतिरिक्त सुरक्षाबल तैनात किए गए हैं और निगरानी बढ़ा दी गई है। हमले में मारे गए लोगों की याद में एक स्मारक भी बनाया गया है, जिसमें सभी 26 पीड़ितों के नाम दर्ज हैं। यह स्मारक लिद्दर नदी के किनारे बनाया गया है और लोगों के लिए श्रद्धांजलि का केंद्र बन गया है।
अमेरिका-इज़राइल हमलों के बाद घाटी में तनाव, कई अखबारों के सोशल मीडिया पेज भी ब्लॉक जम्मू-कश्मीर में ईरान के सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei की हत्या के बाद हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। विरोध प्रदर्शनों के बीच पुलिस ने सख्त रुख अपनाते हुए Aga Syed Ruhullah Mehdi और पूर्व श्रीनगर मेयर Junaid Azim Mattu समेत कई लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। पुलिस का आरोप है कि इन नेताओं ने सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भ्रामक और भड़काऊ सामग्री साझा की, जिससे सार्वजनिक शांति भंग होने का खतरा पैदा हुआ। लगातार चार दिनों से प्रदर्शन, स्कूल 7 मार्च तक बंद Kashmir में पिछले चार दिनों से बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। कई जगहों पर पथराव की घटनाएं भी सामने आई हैं। हालात को देखते हुए प्रशासन ने स्कूलों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों को 7 मार्च तक बंद रखने का फैसला किया है। इन प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में United States और Israel द्वारा ईरान पर किए गए सैन्य हमले बताए जा रहे हैं, जिनसे घाटी में गुस्सा और तनाव बढ़ गया है। सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर दर्ज हुआ मामला पुलिस के मुताबिक, विश्वसनीय जानकारी मिलने के बाद कार्रवाई की गई। अधिकारियों का कहना है कि कुछ सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए भय और अस्थिरता फैलाने की कोशिश की गई। इसी आधार पर Bharatiya Nyaya Sanhita की संबंधित धाराओं के तहत श्रीनगर के साइबर पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई है। पुलिस का कहना है कि इन पोस्ट में अपुष्ट जानकारी और विकृत तथ्यों को फैलाया गया, जिससे सामाजिक सौहार्द और कानून-व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। रुहुल्लाह और मट्टू ने की थी हमलों की आलोचना सांसद रुहुल्लाह और जुनैद मट्टू ने सार्वजनिक रूप से अमेरिका और इज़राइल की कार्रवाई की आलोचना की थी। रुहुल्लाह ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया था, जिसमें कथित तौर पर एक पुलिसकर्मी महिलाओं के साथ धक्का-मुक्की करता दिख रहा था। इस पर उन्होंने पुलिस की कार्रवाई की तीखी आलोचना की और कहा कि प्रदर्शनकारियों के साथ कठोर व्यवहार किया जा रहा है। मेहबूबा मुफ्ती भी प्रदर्शन में शामिल पूर्व मुख्यमंत्री Mehbooba Mufti ने भी बुधवार को विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया। उन्होंने Donald Trump और Benjamin Netanyahu के पोस्टर जलाकर अमेरिका-इज़राइल की कार्रवाई के खिलाफ नाराजगी जताई। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि वह उन लोगों के साथ खड़ी हैं जो शांति के पक्ष में हैं और अन्याय के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। कई अखबारों के सोशल मीडिया अकाउंट ब्लॉक इस बीच एक और विवाद तब खड़ा हो गया जब Meta ने घाटी के कुछ समाचार पत्रों के फेसबुक और इंस्टाग्राम पेज ब्लॉक कर दिए। इनमें Greater Kashmir, Kashmir Life और Rising Kashmir शामिल बताए जा रहे हैं। कुछ मीडिया संस्थानों का कहना है कि यह कार्रवाई कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के अनुरोध पर की गई है। विपक्ष ने उठाए सेंसरशिप के आरोप मेहबूबा मुफ्ती ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए “सेंसरशिप” करार दिया और सरकार से ऐसे मामलों को वापस लेने की मांग की। वहीं Sajad Lone ने भी कहा कि मीडिया प्लेटफॉर्म को बंद करना समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि इससे हालात और बिगड़ सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।