भगवान श्रीकृष्ण को सनातन धर्म में केवल विष्णु के अवतार के रूप में ही नहीं, बल्कि ऐसे आदर्श व्यक्तित्व के रूप में भी देखा जाता है जिन्होंने जीवन के हर रिश्ते को प्रेम, समर्पण और जिम्मेदारी के साथ निभाया। मित्रता, परिवार, प्रेम, गुरु-भक्ति और धर्म पालन—हर क्षेत्र में उनका जीवन आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। सच्ची मित्रता का सबसे बड़ा उदाहरण भगवान श्रीकृष्ण की मित्रता का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण उनके बाल सखा सुदामा हैं। आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद श्रीकृष्ण ने सुदामा का हमेशा सम्मान किया और बिना किसी अपेक्षा के उनकी सहायता की। वहीं अर्जुन के साथ उनका रिश्ता केवल मित्रता तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने जीवन के कठिन समय में उनके मार्गदर्शक और सारथी बनकर धर्म का मार्ग दिखाया। श्रीदामा और बड़े भाई बलराम के साथ भी श्रीकृष्ण का संबंध प्रेम, विश्वास और सहयोग का प्रतीक माना जाता है। राधा-कृष्ण का प्रेम भक्ति का प्रतीक श्रीकृष्ण और राधा का संबंध भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिक प्रेम और पूर्ण समर्पण का प्रतीक माना जाता है। यह प्रेम सांसारिक इच्छाओं से ऊपर उठकर आत्मा और परमात्मा के मिलन का संदेश देता है। वृंदावन की गोपियों के साथ उनकी रासलीला भी ईश्वर के प्रति अटूट भक्ति और समर्पण की भावना को दर्शाती है। परिवार के प्रति निभाई हर जिम्मेदारी धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की आठ प्रमुख रानियां थीं—रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिंदी, मित्रविंदा, नाग्नजिति, भद्रा और लक्ष्मणा। उन्होंने अपने परिवार की जिम्मेदारियों का सदैव संतुलित ढंग से निर्वहन किया और सभी के प्रति समान सम्मान का भाव रखा। माता-पिता और भाई के प्रति अटूट सम्मान श्रीकृष्ण का जन्म देवकी और वसुदेव के घर हुआ, लेकिन उनका पालन-पोषण नंद बाबा और यशोदा माता ने किया। उन्होंने दोनों परिवारों के प्रति समान प्रेम, सम्मान और कृतज्ञता दिखाई। बड़े भाई बलराम के साथ उनका रिश्ता भी आदर्श भाईचारे का उदाहरण माना जाता है, जिसमें सहयोग, विश्वास और सम्मान की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। हर रिश्ते में निभाया कर्तव्य श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में बुआ कुंती, बहन सुभद्रा, भांजे अभिमन्यु और पांडवों के साथ हर संबंध को पूरी जिम्मेदारी से निभाया। महाभारत के कठिन समय में उन्होंने अपने प्रियजनों को सही मार्ग दिखाया और धर्म की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। धर्म की रक्षा के लिए अधर्म का किया अंत जहां श्रीकृष्ण ने प्रेम और करुणा का संदेश दिया, वहीं अधर्म और अन्याय के विरुद्ध कठोर रुख भी अपनाया। उन्होंने कंस, शिशुपाल, नरकासुर और कालिय नाग जैसे अत्याचारियों का अंत कर समाज में धर्म और न्याय की स्थापना की। आदर्श शिष्य और जनरक्षक भगवान श्रीकृष्ण ने गुरु सांदीपनि से शिक्षा ग्रहण कर आदर्श शिष्य होने का उदाहरण प्रस्तुत किया। गुरु-दक्षिणा के रूप में उन्होंने उनके पुत्र को वापस लाकर अपनी गुरु भक्ति का परिचय दिया। वहीं, गोवर्धन पर्वत उठाकर उन्होंने वृंदावनवासियों की रक्षा की और यह संदेश दिया कि सच्चा नेतृत्व हमेशा अपने लोगों की सुरक्षा और कल्याण के लिए समर्पित होता है। श्रीकृष्ण का जीवन देता है यह संदेश भगवान श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन सिखाता है कि किसी भी रिश्ते की नींव प्रेम, विश्वास, सम्मान और कर्तव्य पर टिकी होती है। मित्रता हो, परिवार हो, गुरु का सम्मान हो या समाज के प्रति जिम्मेदारी—हर संबंध को ईमानदारी और निष्ठा से निभाना ही जीवन की सबसे बड़ी सफलता है।
नई दिल्ली: दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के डॉक्टरों ने एक दुर्लभ और जटिल लिवर ट्रांसप्लांट को सफलतापूर्वक अंजाम देकर फिलीपींस के जुड़वां भाइयों को नई जिंदगी दी है। जन्मजात गंभीर बीमारी से जूझ रहे दोनों बच्चों का सफल लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट किया गया, जिसमें उनकी मां और मामा ने अपने लिवर का हिस्सा दान किया। जन्मजात बीमारी से जूझ रहे थे दोनों बच्चे एएनआई के मुताबिक, फिलीपींस के जुड़वां भाई केली और टायलर जन्म से ही 'कोलेडोकल सिस्ट' (Choledochal Cyst) नामक दुर्लभ बीमारी से पीड़ित थे। यह बीमारी पित्त नलिकाओं (बाइल डक्ट) को प्रभावित करती है और समय के साथ लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। डॉक्टरों के अनुसार, दोनों बच्चों का लिवर इस बीमारी से इतना प्रभावित हो चुका था कि उनके इलाज के लिए लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प बचा था। एक लाख में एक को होती है यह बीमारी इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के ट्रांसप्लांट एवं सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. नीरव गोयल ने बताया कि जुड़वां बच्चों में एक साथ इस बीमारी का होना बेहद दुर्लभ है। उन्होंने बताया कि यह बीमारी लगभग एक लाख बच्चों में किसी एक को होती है। इनमें भी केवल करीब 10 प्रतिशत मरीजों में लिवर इतना खराब होता है कि प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है। मां और मामा बने जीवनदाता इलाज के दौरान बच्चों के माता-पिता ने लिवर दान करने की इच्छा जताई। जांच में पिता चिकित्सकीय रूप से दान के लिए उपयुक्त नहीं पाए गए। इसके बाद बच्चों की मां और उनके मामा ने आगे आकर अपने-अपने लिवर का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा दान किया। विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने दोनों बच्चों का सफल ट्रांसप्लांट किया, जिसके बाद उनकी हालत में तेजी से सुधार हुआ। अब सामान्य जीवन जी सकेंगे दोनों भाई डॉ. नीरव गोयल ने बताया कि लिवर मानव शरीर का ऐसा अंग है, जो समय के साथ दोबारा विकसित होने की क्षमता रखता है। यही वजह है कि दानदाता और मरीज, दोनों का लिवर धीरे-धीरे सामान्य आकार में लौट आता है। सफल सर्जरी के बाद केली और टायलर पूरी तरह स्वस्थ हैं और अब सामान्य बच्चों की तरह जीवन जी सकेंगे। भारत की चिकित्सा विशेषज्ञता को मिली नई पहचान अस्पताल का कहना है कि यह दुर्लभ ट्विन लिवर ट्रांसप्लांट भारत की उन्नत चिकित्सा तकनीक, विशेषज्ञ डॉक्टरों और अंग प्रत्यारोपण क्षमता का महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस सफलता ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता को एक बार फिर मजबूत किया है।
Masik Krishna Janmashtami 2026: हिंदू धर्म में मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यह पर्व हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। ज्येष्ठ माह की मासिक कृष्ण जन्माष्टमी इस वर्ष 9 मई को पड़ रही है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत एवं पूजा करने से भगवान Krishna की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख, शांति व समृद्धि आती है। मान्यता है कि इस दिन कुछ खास नियमों का पालन करने से शुभ फल मिलते हैं, जबकि छोटी-छोटी गलतियां पूजा के प्रभाव को कम कर सकती हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन क्या करना शुभ माना जाता है और किन बातों से बचना चाहिए। मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन क्या करें? भगवान कृष्ण को पीले वस्त्र पहनाएं भगवान Krishna को पीला रंग अत्यंत प्रिय माना जाता है। पूजा के दौरान उन्हें पीले वस्त्र अर्पित करें और मुकुट में मोरपंख जरूर लगाएं। इससे पूजा का विशेष फल प्राप्त होता है। भोग में तुलसी दल जरूर रखें धार्मिक मान्यता के अनुसार बिना तुलसी के भगवान कृष्ण भोग स्वीकार नहीं करते। इसलिए माखन-मिश्री, फल या अन्य प्रसाद में तुलसी दल अवश्य रखें। मंत्र जाप और भजन करें इस दिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” जैसे मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है। साथ ही भजन-कीर्तन और Bhagavad Gita का पाठ करने से मन को शांति मिलती है। दान-पुण्य करें जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र या धन का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। मान्यता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। गौ सेवा करें भगवान कृष्ण को गोपाल कहा जाता है। इस दिन गाय को हरा चारा, गुड़ या रोटी खिलाना शुभ माना जाता है। इसे विशेष पुण्यदायी कार्य माना गया है। मध्यरात्रि में करें पूजा भगवान कृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था, इसलिए रात 12 बजे विशेष आरती और पूजा का महत्व माना जाता है। इस समय घंटी, शंख और भजन के साथ जन्मोत्सव मनाया जाता है। मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन क्या न करें? तामसिक भोजन से बचें इस दिन मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन का सेवन नहीं करना चाहिए। घर का वातावरण सात्विक और शांत रखना शुभ माना जाता है। अन्न और चावल का सेवन न करें यदि आप व्रत कर रहे हैं तो चावल और सामान्य अन्न से परहेज करें। फलाहार में साबूदाना, कुट्टू का आटा और फल ग्रहण किए जा सकते हैं। तुलसी के पत्ते न तोड़ें जन्माष्टमी के दिन तुलसी तोड़ना अशुभ माना जाता है। पूजा के लिए आवश्यक तुलसी के पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें। काले कपड़े पहनने से बचें पूजा के दौरान काले रंग के वस्त्र पहनना शुभ नहीं माना जाता। पीले, सफेद या लाल रंग के कपड़े पहनना बेहतर माना गया है। क्रोध और नकारात्मकता से दूर रहें व्रत केवल भोजन का त्याग नहीं बल्कि मन की शुद्धता का भी प्रतीक माना जाता है। इस दिन झूठ बोलने, किसी की निंदा करने और क्रोध करने से बचना चाहिए। दिन में ज्यादा न सोएं धार्मिक मान्यता के अनुसार व्रत वाले दिन आलस्य नहीं करना चाहिए। समय को भजन, ध्यान और धार्मिक पाठ में लगाना अधिक शुभ माना जाता है। क्या है धार्मिक मान्यता? मान्यता है कि मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत रखने और श्रद्धा से पूजा करने से भगवान Krishna भक्तों के सभी कष्ट दूर करते हैं। दांपत्य जीवन में सुख, संतान सुख और मानसिक शांति के लिए भी यह व्रत विशेष फलदायी माना जाता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।