नई दिल्ली: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई के राजकीय अंतिम संस्कार में भारत सरकार की ओर से एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल शामिल होगा। सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारतीय प्रतिनिधिमंडल में बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन और विदेश राज्य मंत्री पबित्र मार्गेरिटा शामिल होंगे। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए औपचारिक निमंत्रण भेजा था। प्रधानमंत्री के पूर्व निर्धारित अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों के कारण भारत ने उनके स्थान पर वरिष्ठ प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया है। 4 जुलाई से शुरू होंगे अंतिम संस्कार के कार्यक्रम सूत्रों के मुताबिक, अंतिम संस्कार से जुड़े कार्यक्रम 4 जुलाई से ईरान में शुरू होंगे। इन समारोहों के दौरान भारतीय प्रतिनिधिमंडल तेहरान पहुंचकर भारत की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित करेगा। भारत-ईरान संबंधों का महत्वपूर्ण संदेश विशेषज्ञों का मानना है कि वरिष्ठ स्तर का प्रतिनिधिमंडल भेजना भारत और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे कूटनीतिक एवं रणनीतिक संबंधों को दर्शाता है। भारत ईरान को अपने विस्तारित पड़ोस (Extended Neighbourhood) की नीति के तहत एक महत्वपूर्ण साझेदार मानता है। कौन हैं भारतीय प्रतिनिधि? लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन वर्तमान में बिहार के राज्यपाल हैं और सैन्य एवं सामरिक मामलों के विशेषज्ञ माने जाते हैं। वहीं, पबित्र मार्गेरिटा विदेश राज्य मंत्री के रूप में भारत की विदेश नीति और कूटनीतिक पहल का प्रतिनिधित्व करते हैं। कई देशों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना ईरान में आयोजित होने वाले अंतिम संस्कार कार्यक्रम में भारत के अलावा रूस, चीन, इराक, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और मध्य एशिया के कई देशों के प्रतिनिधिमंडलों के भी शामिल होने की संभावना जताई जा रही है।
तेहरान/नई दिल्ली: ईरान के सर्वोच्च नेता रहे Ayatollah Ali Khamenei के अंतिम संस्कार को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तैयारियां तेज हो गई हैं। इसी बीच ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi को अंतिम संस्कार कार्यक्रम में शामिल होने के लिए विशेष आमंत्रण भेजा है। भारत सरकार की ओर से अब तक इस निमंत्रण की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। 5 से 9 जुलाई तक होंगे अंतिम संस्कार से जुड़े कार्यक्रम ईरानी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, खामेनेई के अंतिम संस्कार से संबंधित धार्मिक और राजकीय कार्यक्रम 5 जुलाई से 9 जुलाई तक आयोजित किए जाएंगे। कार्यक्रमों का आयोजन तेहरान, कोम और मशहद सहित कई प्रमुख शहरों में किया जाएगा। बताया जा रहा है कि 5, 6 और 7 जुलाई को तेहरान और कोम में श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित होंगी, जबकि अंतिम और सबसे बड़ा कार्यक्रम 9 जुलाई को मशहद में रखा गया है, जहां बड़ी संख्या में देशी-विदेशी प्रतिनिधियों के पहुंचने की संभावना है। तीन दशक तक ईरान की राजनीति के केंद्र में रहे खामेनेई अयातुल्ला अली खामेनेई पिछले तीन दशकों से अधिक समय तक ईरान की राजनीति और शासन व्यवस्था के सबसे प्रभावशाली नेता रहे। उनकी अगुवाई में ईरान ने कई क्षेत्रीय और वैश्विक चुनौतियों का सामना किया। रिपोर्टों के अनुसार, 28 फरवरी को ईरान पर हुए संयुक्त सैन्य हमले के दौरान उनकी मृत्यु हुई थी। इसके बाद से देश में राजनीतिक संक्रमण और नई नेतृत्व व्यवस्था को लेकर चर्चाएं जारी हैं। भारत-ईरान संबंधों पर टिकी निगाहें विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस कार्यक्रम में शामिल होते हैं, तो यह भारत और ईरान के संबंधों के लिहाज से एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत माना जाएगा। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार, चाबहार बंदरगाह और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर लंबे समय से रणनीतिक सहयोग रहा है। अंतिम निर्णय भारत सरकार के आधिकारिक कार्यक्रम और कूटनीतिक प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा। अमेरिका-ईरान समझौते के बाद बदला क्षेत्रीय माहौल इस बीच, अमेरिका और ईरान के बीच हाल में हुए अंतरिम समझौते के बाद पश्चिम एशिया में तनाव कुछ कम होता दिखाई दे रहा है। समझौते के तहत दोनों पक्षों ने वार्ता जारी रखने पर सहमति जताई है। होर्मुज स्ट्रेट में फिर शुरू हुई जहाजों की आवाजाही समझौते के बाद रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण Strait of Hormuz में जहाजों की आवाजाही भी फिर से शुरू हो गई है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने ईरानी तेल पर लागू कुछ प्रतिबंधों में 60 दिनों की अस्थायी छूट देने का लाइसेंस जारी किया है। विश्लेषकों का कहना है कि इस कदम से वैश्विक ऊर्जा बाजार को राहत मिल सकती है और क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को भी गति मिलने की संभावना है। पीएम मोदी की मौजूदगी पर बनी रहेगी नजर अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईरान के इस विशेष निमंत्रण को स्वीकार करते हैं या नहीं। यदि ऐसा होता है, तो यह हाल के वर्षों में भारत और ईरान के बीच सबसे महत्वपूर्ण उच्चस्तरीय कूटनीतिक संपर्कों में से एक माना जाएगा।
ईरान और अमेरिका के बीच जारी कूटनीतिक प्रयासों के बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान का पाकिस्तान दौरा कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस यात्रा के दौरान पाकिस्तान ने ईरानी राष्ट्रपति का विशेष स्वागत किया और उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया। इसके बाद क्षेत्रीय राजनीति और दोनों देशों के संबंधों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। पाकिस्तानी सीमा में प्रवेश करते ही मिला विशेष सैन्य सम्मान राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के विशेष विमान के पाकिस्तान की वायुसीमा में प्रवेश करते ही पाकिस्तानी वायुसेना के JF-17 थंडर लड़ाकू विमानों ने उसे एस्कॉर्ट किया। इस्लामाबाद पहुंचने पर उन्हें 21 तोपों की सलामी दी गई और औपचारिक गार्ड ऑफ ऑनर भी प्रदान किया गया। विश्लेषकों का मानना है कि यह स्वागत दोनों देशों के बीच बढ़ते कूटनीतिक और रणनीतिक संबंधों का संकेत माना जा सकता है। पाकिस्तान ने प्रदान की मानद डॉक्टरेट की उपाधि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय में आयोजित एक विशेष समारोह में राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान को कार्डियक सर्जरी के क्षेत्र में योगदान के लिए मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई। कराची स्थित कॉलेज ऑफ फिजिशियंस एंड सर्जन्स पाकिस्तान (CPSP) की ओर से यह सम्मान दिया गया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने स्वयं उन्हें यह उपाधि प्रदान की। पेजेश्कियान पेशे से हृदय रोग विशेषज्ञ और कार्डियक सर्जन रहे हैं तथा राजनीति में आने से पहले चिकित्सा क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं। पहले भी ईरानी राष्ट्रपति को मिल चुका है सम्मान यह पहला अवसर नहीं है जब पाकिस्तान ने किसी ईरानी राष्ट्रपति को इस प्रकार का सम्मान दिया हो। इससे पहले दिवंगत ईरानी राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी को भी पाकिस्तान की ओर से मानद उपाधि प्रदान की गई थी। इससे संकेत मिलता है कि इस्लामाबाद और तेहरान के बीच संबंधों को मजबूत करने के लिए प्रतीकात्मक और कूटनीतिक कदम लगातार उठाए जाते रहे हैं। क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर हुई चर्चा यात्रा के दौरान राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और अन्य वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की। दोनों पक्षों के बीच द्विपक्षीय संबंधों, सीमा सुरक्षा, व्यापार, ऊर्जा सहयोग तथा क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। सूत्रों के अनुसार, पश्चिम एशिया की स्थिति, ईरान-अमेरिका वार्ता और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े विषय भी बातचीत का हिस्सा रहे। अमेरिका-ईरान वार्ता के बीच बढ़ा दौरे का महत्व यह दौरा ऐसे समय हुआ है जब हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गतिविधियां तेज हुई हैं। स्विट्जरलैंड में हुई वार्ताओं के बाद दोनों देशों के बीच संभावित समझौते को लेकर कई दौर की चर्चाएं जारी हैं। ऐसे में पाकिस्तान की भूमिका और ईरान के साथ उसके बढ़ते संपर्कों को क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति पेजेश्कियान को दिया गया सम्मान केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच राजनीतिक विश्वास और सहयोग को मजबूत करने का संदेश भी है। ऊर्जा, व्यापार, सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर पाकिस्तान और ईरान लंबे समय से सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में यह दौरा भविष्य में दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा देने वाला साबित हो सकता है।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान मंगलवार को एक दिवसीय आधिकारिक दौरे पर पाकिस्तान रवाना हुए। वह एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ विशेष विमान ‘मिनाब 168’ से इस्लामाबाद पहुंचेंगे। इस यात्रा को दोनों देशों के बीच राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा सहयोग को नई मजबूती देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने स्वयं सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट कर अपने पाकिस्तान दौरे की जानकारी साझा की। पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व से करेंगे मुलाकात अपने दौरे के दौरान ईरानी राष्ट्रपति पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से मुलाकात करेंगे। इसके अलावा उप-प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री इशाक डार, सीनेट के चेयरमैन तथा नेशनल असेंबली के स्पीकर के साथ भी उनकी बैठकें प्रस्तावित हैं। इन बैठकों में द्विपक्षीय संबंधों के अलावा क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक सहयोग, ऊर्जा, सीमा प्रबंधन और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर व्यापक चर्चा होने की संभावना है। समझौता ज्ञापनों के क्रियान्वयन पर रहेगा फोकस ईरानी राष्ट्रपति ने कहा है कि इस यात्रा का प्रमुख उद्देश्य दोनों देशों के बीच हुए समझौता ज्ञापनों (MoUs) के प्रभावी क्रियान्वयन को आगे बढ़ाना है। उनके अनुसार, आपसी समझौतों का सफल कार्यान्वयन क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने कहा कि सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों में पहले से हुई सहमतियों को धरातल पर उतारना दोनों देशों की साझा प्राथमिकता है। ‘दायित्वों का पालन ही सफलता की कसौटी’ पाकिस्तान रवाना होने से पहले राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने सोशल मीडिया पर कहा कि किसी भी वार्ता या समझौते की सफलता केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि उसके ईमानदार क्रियान्वयन से तय होती है। उन्होंने कहा कि प्रगति का मूल्यांकन व्यावहारिक परिणामों और किए गए वादों के पालन के आधार पर किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, दायित्वों का सम्मान और प्रतिबद्धताओं का पालन ही किसी भी समझौते की वास्तविक सफलता का पैमाना है। ईरान-अमेरिका वार्ता के बाद अहम मानी जा रही यात्रा ईरानी राष्ट्रपति का यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब हाल ही में स्विट्जरलैंड में ईरान और अमेरिका के बीच उच्चस्तरीय वार्ता हुई है। दोनों देशों ने कथित तौर पर अगले 60 दिनों के भीतर व्यापक समझौते की दिशा में बातचीत आगे बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की है। ऐसे में माना जा रहा है कि पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व के साथ होने वाली बैठकों में पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियों, क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक कूटनीतिक घटनाक्रमों पर भी विस्तार से चर्चा हो सकती है। द्विपक्षीय संबंधों को मिल सकती है नई गति विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा ईरान और पाकिस्तान के बीच आर्थिक, व्यापारिक और रणनीतिक सहयोग को नई दिशा दे सकता है। दोनों देश पहले से ऊर्जा, सीमा सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क और व्यापार विस्तार जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर काम कर रहे हैं। ऐसे में राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की यह यात्रा न केवल द्विपक्षीय संबंधों बल्कि क्षेत्रीय कूटनीतिक समीकरणों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि तेहरान अमेरिका के साथ हुए अंतरिम समझौते का पालन नहीं करता है, तो वाशिंगटन सख्त कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर ईरान का रवैया ठीक नहीं रहा, तो वह वही करेंगे जो आवश्यक होगा। पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा, "अगर ईरान अपने समझौते पर खरा नहीं उतरता या उसका व्यवहार सही नहीं रहता है, तो मुझे जो करना पड़ेगा, मैं वह करूंगा।" उनके इस बयान को ईरान के लिए सीधी चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है। अमेरिका-ईरान अंतरिम समझौते के बाद ट्रंप का सख्त संदेश गौरतलब है कि पिछले सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian के बीच एक अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब कुछ महीने पहले अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर सैन्य कार्रवाई तथा उसके जवाब में ईरान के हमलों ने पूरे पश्चिम एशिया को युद्ध की स्थिति में पहुंचा दिया था। समझौते के बावजूद ट्रंप का यह बयान संकेत देता है कि वाशिंगटन ईरान के हर कदम पर कड़ी निगरानी रखेगा और किसी भी उल्लंघन पर कठोर प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार है। अमेरिकी किसानों को मिलेगा फायदा ट्रंप ने कहा कि ईरान की जो धनराशि पहले से रोकी गई थी, उसका इस्तेमाल केवल अमेरिका से खाद्य उत्पाद खरीदने के लिए किया जाएगा। उन्होंने दावा किया कि इस व्यवस्था से अमेरिकी किसानों को सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा। ट्रंप ने कहा, "वह सारा पैसा भोजन की खरीद के रूप में वापस अमेरिका आ रहा है। ईरान की आबादी 9.1 करोड़ है और वे अपने लोगों का पेट भरने में सक्षम नहीं हैं। इसलिए जो पैसा जारी किया जा रहा है, वह सीधे हमारे किसानों के पास जाएगा।" युद्ध के बाद गहरा मानवीय और आर्थिक संकट ईरान, इजरायल और लेबनान में जारी संघर्ष ने पश्चिम एशिया में भारी मानवीय संकट पैदा कर दिया है। युद्ध और सैन्य कार्रवाइयों के कारण हजारों लोगों की जान जा चुकी है, जबकि लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। इस संघर्ष का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं ने दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। समझौते के भविष्य पर टिकी दुनिया की नजर विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-ईरान अंतरिम समझौते की सफलता काफी हद तक दोनों देशों की प्रतिबद्धता पर निर्भर करेगी। यदि समझौते की शर्तों का पालन नहीं हुआ, तो पश्चिम एशिया में एक बार फिर तनाव बढ़ सकता है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ने की आशंका है।
बर्गेनस्टॉक/वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल करते हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance स्विट्जरलैंड पहुंच गए हैं। दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों के बीच होने वाली इस वार्ता में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, जमे हुए वित्तीय संसाधनों, लेबनान युद्धविराम और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है। ईरान की ओर से प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व Mohammad Bagher Ghalibaf कर रहे हैं। इसके अलावा ईरानी विदेश मंत्री Abbas Araghchi और केंद्रीय बैंक के गवर्नर भी वार्ता में शामिल हैं। ईरान को मिल सकता है 6 अरब डॉलर का फंड रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका ईरान के कुछ फ्रीज किए गए फंड जारी करने पर विचार कर रहा है। शुरुआती चरण में कतर में जमा करीब 6 अरब डॉलर की राशि को मानवीय जरूरतों से जुड़ी खरीदारी के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है। इसके बदले अमेरिका चाहता है कि ईरान संयुक्त राष्ट्र के परमाणु निरीक्षकों को अपने परमाणु ठिकानों के निरीक्षण की अनुमति दे। यही इस वार्ता के प्रमुख एजेंडों में शामिल है। ट्रंप-पेजेशकियन समझौते के बाद पहली बड़ी वार्ता यह बैठक अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और ईरानी राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian के बीच हुए अंतरिम समझौते के बाद आयोजित की जा रही है। समझौते में 60 दिनों की वार्ता अवधि तय की गई है, जिसका उद्देश्य लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करना और स्थायी समाधान की दिशा में आगे बढ़ना है। जेडी वेंस बोले- वास्तविक ढांचा तैयार करना लक्ष्य स्विट्जरलैंड रवाना होने से पहले जेडी वेंस ने कहा कि उनका उद्देश्य केवल बातचीत करना नहीं, बल्कि भविष्य की वार्ताओं के लिए एक "वास्तविक और व्यावहारिक ढांचा" तैयार करना है। उन्होंने उम्मीद जताई कि परमाणु मुद्दे और लेबनान युद्धविराम जैसे संवेदनशील विषयों पर प्रगति संभव है। पाकिस्तान भी निभा रहा मध्यस्थ की भूमिका सूत्रों के मुताबिक, वार्ता में मध्यस्थ के रूप में Shehbaz Sharif और Asim Munir भी मौजूद हैं। वार्ता स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक रिसॉर्ट में आयोजित होने की संभावना है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी बनी रहेगी नजर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक Strait of Hormuz को लेकर भी तनाव बना हुआ है। ईरान पहले कह चुका है कि उसकी मंजूरी के बिना कोई जहाज इस मार्ग से नहीं गुजर सकता। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि जलडमरूमध्य खुला है और जहाजों की आवाजाही जारी है। डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर कहा है कि 60 दिनों के युद्धविराम के दौरान और उसके बाद भी इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर कोई टोल नहीं लगाया जाएगा। इजरायल से वार्ता प्रभावित होने की आशंका अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने आशंका जताई है कि Benjamin Netanyahu की नीतियां और लेबनान में जारी सैन्य गतिविधियां अमेरिका-ईरान वार्ता को प्रभावित कर सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि स्विट्जरलैंड में होने वाली यह वार्ता पश्चिम एशिया की राजनीति, परमाणु कूटनीति और वैश्विक ऊर्जा बाजारों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
तेहरान/वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर होने के एक दिन बाद ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने पहली बार अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस समझौते को लेकर “बेहद बेताब” थे और इसे अंतिम रूप देने के लिए उन्होंने हर संभव दबाव और प्रभाव का इस्तेमाल किया। खामेनेई ने कहा कि उन्होंने शुरुआत में सिद्धांत के तौर पर इस समझौते का विरोध किया था, लेकिन बाद में राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा देशहित और क्षेत्रीय हितों की सुरक्षा का भरोसा दिए जाने के बाद ही इस समझौते को मंजूरी दी। ‘देश के हितों और रेजिस्टेंस फ्रंट की रक्षा का मिला भरोसा’ अपने लिखित बयान में मोजतबा खामेनेई ने कहा कि ईरानी अधिकारियों ने उन्हें आश्वस्त किया था कि समझौते में देश के रणनीतिक हितों, राष्ट्रीय सुरक्षा और तथाकथित ‘रेजिस्टेंस फ्रंट’ के अधिकारों की पूरी तरह रक्षा की जाएगी। उन्होंने कहा, “ईरानी अधिकारियों ने नेक इरादे और देश की चिंता को ध्यान में रखते हुए इस समझौते के लिए कड़ी मेहनत की। मुझे भरोसा दिलाया गया कि ईरान के हितों से कोई समझौता नहीं होगा।” 18 जून को हुआ था समझौते पर हस्ताक्षर 18 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने कई महीनों से जारी तनाव को समाप्त करने और बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के उद्देश्य से समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर किए थे। इससे पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी वार्ताकार मोहम्मद बाकेर कालीबाफ ने समझौते के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए, जिसके बाद दोनों देशों के राष्ट्रपतियों ने वर्चुअल माध्यम से इसे अंतिम मंजूरी प्रदान की। ‘ईरान अपने राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता नहीं करेगा’ खामेनेई ने कहा कि राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने उन्हें स्पष्ट रूप से आश्वस्त किया था कि यदि भविष्य में अमेरिका की ओर से कोई ऐसी मांग रखी जाती है जो ईरान के राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध या अत्यधिक हो, तो तेहरान उसे स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने कहा, “ईरान अपने राष्ट्रीय हितों, संप्रभुता और रणनीतिक प्राथमिकताओं से कोई समझौता नहीं करेगा।” बातचीत का मतलब अमेरिकी नीतियों से सहमति नहीं समझौते का समर्थन करते हुए भी खामेनेई ने स्पष्ट किया कि भविष्य में अमेरिका के साथ होने वाली प्रत्यक्ष बातचीत को अमेरिकी नीतियों या दृष्टिकोण की स्वीकृति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बातचीत का उद्देश्य केवल अपने हितों की रक्षा करना और विवादों का समाधान तलाशना है, न कि किसी दबाव के सामने झुकना। समझौते पर ईरान के भीतर भी हुई व्यापक चर्चा खामेनेई के बयान से यह संकेत मिला है कि अमेरिका-ईरान समझौते को लेकर ईरान के शीर्ष नेतृत्व के भीतर व्यापक विचार-विमर्श हुआ था। सर्वोच्च नेता ने स्वयं स्वीकार किया कि उन्होंने प्रारंभ में इस समझौते का विरोध किया था, लेकिन राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के आश्वासन के बाद ही इसे मंजूरी दी। विश्लेषकों का मानना है कि खामेनेई का बयान एक ओर घरेलू राजनीतिक वर्ग को संदेश देने की कोशिश है, वहीं दूसरी ओर यह संकेत भी है कि ईरान भविष्य में अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखेगा, लेकिन अपने रणनीतिक हितों पर किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा।
Iran 300 Billion Dollar Fund: अमेरिका और ईरान के बीच हुए 14 सूत्रीय समझौते में 300 अरब डॉलर (300 Billion Dollar) के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास फंड का प्रावधान सबसे अधिक चर्चा में है। यह फंड युद्ध से प्रभावित ईरान के पुनर्निर्माण, ऊर्जा, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक परियोजनाओं को दोबारा खड़ा करने के लिए प्रस्तावित किया गया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी रकम आएगी कहां से और इसे देगा कौन? समझौते में क्या है प्रावधान? समझौते के छठे बिंदु के अनुसार अमेरिका अपने क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की योजना तैयार करेगा। इस योजना का विस्तृत ढांचा अगले 60 दिनों में अंतिम समझौते के दौरान तय किया जाएगा। क्या अमेरिका अपनी जेब से देगा पैसा? अब तक सामने आई जानकारी के मुताबिक इसका जवाब 'नहीं' है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन खबरों को खारिज किया है जिनमें कहा गया था कि अमेरिका सीधे ईरान को सैकड़ों अरब डॉलर देगा। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि अमेरिकी करदाताओं के पैसे से ईरान को कोई वित्तीय सहायता नहीं दी जाएगी। फिर पैसा देगा कौन? अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के मुताबिक, इस फंड का वित्तपोषण मुख्य रूप से खाड़ी देशों, क्षेत्रीय साझेदारों और वैश्विक निजी निवेशकों के जरिए किया जा सकता है। यानी वे खाड़ी देश, जिन्हें हालिया संघर्ष के दौरान ईरान के हमलों का सामना करना पड़ा, भविष्य में ईरान के पुनर्निर्माण में निवेश कर सकते हैं। आधे से ज्यादा फंड पहले ही जुटने का दावा रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार प्रस्तावित 300 अरब डॉलर के फंड का आधे से अधिक हिस्सा पहले ही कमिट किया जा चुका है। यह फंड किसी सरकारी राहत पैकेज की तरह नहीं, बल्कि एक प्राइवेट इन्वेस्टमेंट प्लेटफॉर्म के रूप में काम करेगा, जिसमें ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर, परिवहन और विनिर्माण क्षेत्रों में निवेश किया जाएगा। ईरान पहले मांग रहा था 400 अरब डॉलर रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान ने शुरुआत में अमेरिका से 400 अरब डॉलर के मुआवजे की मांग की थी। अमेरिका की असहमति के बाद पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास फंड का विचार सामने आया। इसके तहत ऋण गारंटी, क्रेडिट लाइन और सीधे निवेश के जरिए ईरान की क्षतिग्रस्त परियोजनाओं को दोबारा खड़ा करने की योजना बनाई गई है। किन परियोजनाओं पर खर्च होगा पैसा? यह फंड ईरान के स्टील प्लांट, रिफाइनरी, एयरपोर्ट, परिवहन नेटवर्क, ऊर्जा परियोजनाओं और युद्ध में क्षतिग्रस्त अन्य बुनियादी ढांचों के पुनर्निर्माण में इस्तेमाल किया जा सकता है। सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी 300 अरब डॉलर का यह फंड फिलहाल केवल प्रस्तावित स्तर पर है। इसके अस्तित्व में आने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच अंतिम और बाध्यकारी समझौते का होना जरूरी है। साथ ही यह भी देखना होगा कि क्या ईरान समझौते की सभी शर्तों का पालन कर पाएगा और क्या खाड़ी देश एवं वैश्विक निवेशक वास्तव में इतनी बड़ी राशि निवेश करने के लिए तैयार होंगे। यदि यह योजना सफल होती है, तो यह न केवल ईरान की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकती है, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की भू-राजनीति और ऊर्जा बाजार पर भी गहरा प्रभाव डाल सकती है।
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक बड़ा कूटनीतिक कदम उठाया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। समझौते के लागू होने के साथ ही दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव कम करने, होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और आर्थिक एवं परमाणु मुद्दों पर व्यापक बातचीत शुरू करने का रास्ता साफ हो गया है। अमेरिकी प्रशासन ने इस दस्तावेज को ‘संयुक्त राज्य अमेरिका और इस्लामी गणराज्य ईरान के बीच इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन’ के रूप में जारी किया है। समझौते का उद्देश्य 60 दिनों के विस्तारित युद्धविराम को लागू करना और लंबित मुद्दों पर अंतिम समझौते की रूपरेखा तैयार करना है। होर्मुज जलडमरूमध्य तुरंत खोलने पर सहमति समझौते का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन इसी समुद्री मार्ग से होता है। समझौते के तहत ईरान ने 60 दिनों तक फारस की खाड़ी और ओमान सागर के बीच वाणिज्यिक जहाजों को सुरक्षित और निर्बाध मार्ग देने पर सहमति जताई है। प्रतिबंधों में चरणबद्ध राहत का रोडमैप अमेरिका ने ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से हटाने की प्रतिबद्धता जताई है। इसके तहत ईरानी तेल निर्यात, बैंकिंग, बीमा और परिवहन सेवाओं को तत्काल राहत देने का प्रावधान किया गया है। साथ ही अमेरिका ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों और धनराशि को भी जारी करने पर सहमत हुआ है। परमाणु कार्यक्रम पर आगे होगी विस्तृत बातचीत समझौते में ईरान ने एक बार फिर दोहराया है कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा और न ही उन्हें हासिल करने की कोशिश करेगा। दोनों देशों ने संवर्धित यूरेनियम भंडार, यूरेनियम संवर्धन और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े अन्य मुद्दों पर अंतिम समझौते के तहत विस्तृत चर्चा करने पर सहमति जताई है। 14 सूत्रीय समझौते की प्रमुख बातें सभी सैन्य अभियानों और युद्ध गतिविधियों को तत्काल प्रभाव से रोकना। एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना। 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते की दिशा में काम करना। अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की प्रक्रिया शुरू करना। होर्मुज जलडमरूमध्य से वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित और मुफ्त आवाजाही सुनिश्चित करना। ईरान के लिए 300 अरब डॉलर की आर्थिक पुनर्निर्माण योजना तैयार करना। संयुक्त राष्ट्र और अमेरिकी प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से हटाने का रोडमैप बनाना। ईरान द्वारा परमाणु हथियार नहीं बनाने की प्रतिबद्धता दोहराना। अंतिम समझौते तक दोनों देशों द्वारा यथास्थिति बनाए रखना। ईरानी तेल निर्यात, बैंकिंग और बीमा सेवाओं को तत्काल राहत देना। ईरान की जमी हुई संपत्तियों और धनराशि को जारी करना। समझौते के अनुपालन के लिए विशेष निगरानी तंत्र स्थापित करना। अंतिम समझौते के लिए औपचारिक वार्ता शुरू करना। अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के बाध्यकारी प्रस्ताव के माध्यम से वैधता प्रदान करना। पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा मोड़ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह समझौता तय शर्तों के अनुसार लागू होता है, तो इससे न केवल अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा टकराव समाप्त होगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, तेल बाजार, क्षेत्रीय सुरक्षा और पश्चिम एशिया की भू-राजनीति पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने से वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार में स्थिरता आने की उम्मीद भी बढ़ गई है।
सिवान, एजेंसियां। बिहार में सिपाही भर्ती परीक्षा के दौरान फर्जीवाड़े का बड़ा मामला सामने आया है। सिवान जिले में केंद्रीय चयन पर्षद (सिपाही भर्ती) द्वारा आयोजित परीक्षा के दौरान दो फर्जी अभ्यर्थियों को गिरफ्तार किया गया। दोनों आरोपी दूसरे अभ्यर्थियों के स्थान पर परीक्षा देने पहुंचे थे। पुलिस ने उनके पास से फर्जी दस्तावेज, एक ही परीक्षा के दो अलग-अलग प्रवेश पत्र और अन्य संदिग्ध कागजात बरामद किए हैं। दो परीक्षा केंद्रों से हुई गिरफ्तारी यह कार्रवाई 17 जून को प्रथम और द्वितीय पाली की परीक्षा के दौरान सरस्वती शिशु मंदिर परीक्षा केंद्र और दाउद मेमोरियल उर्दू गर्ल्स हाई स्कूल परीक्षा केंद्र पर की गई। परीक्षा केंद्रों पर तैनात दंडाधिकारी और पुलिस टीम ने संदिग्ध गतिविधियों के आधार पर दोनों अभ्यर्थियों को पकड़ लिया। पूछताछ में उन्होंने अपनी वास्तविक पहचान बताई और परीक्षा में फर्जी तरीके से शामिल होने की बात स्वीकार की। पहले भी दे चुके थे परीक्षा गिरफ्तार आरोपियों की पहचान पटना जिले के पीरपुरा थाना क्षेत्र निवासी सियाराम कुमार और जहानाबाद जिले के मखदूमपुर थाना क्षेत्र निवासी गौतम कुमार के रूप में हुई है। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि दोनों आरोपी 14 जून को मोतिहारी और गोपालगंज में आयोजित इसी भर्ती परीक्षा में भी शामिल हो चुके थे। इससे पुलिस को संगठित परीक्षा गिरोह की आशंका है। नेटवर्क की जांच में जुटी पुलिस तलाशी के दौरान दोनों के पास से एक ही परीक्षा के दो अलग-अलग प्रवेश पत्र मिले, जिनमें जन्मतिथि अलग-अलग दर्ज थी। सभी संदिग्ध दस्तावेज जब्त कर लिए गए हैं। सिवान पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस अब इस फर्जीवाड़े से जुड़े पूरे नेटवर्क की तलाश में जुटी है। सिवान के एसपी पुरन कुमार झा ने कहा कि परीक्षा की शुचिता बनाए रखना पुलिस की प्राथमिकता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि परीक्षा में किसी भी तरह की अनियमितता या संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत पुलिस नियंत्रण कक्ष के हेल्पलाइन नंबर 9031683607 या निकटतम थाने को दें।
अमेरिका और ईरान के बीच कई महीनों से जारी तनाव के बाद आखिरकार शांति समझौते पर मुहर लग गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने युद्ध समाप्त करने, क्षेत्रीय तनाव कम करने और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने के लिए एक डिजिटल मेमोरैंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। समझौते पर हस्ताक्षर के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप काफी उत्साहित नजर आए। जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि क्या डील साइन हो गई है, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "It's Signed!" डिजिटल हस्ताक्षर से लागू हुआ समझौता अमेरिकी और ईरानी अधिकारियों के अनुसार, बुधवार (17 जून) को राष्ट्रपति ट्रंप और मसूद पेजेशकियन ने डिजिटल माध्यम से समझौते पर हस्ताक्षर किए। इससे पहले रविवार को अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाकर कालिबाफ भी इलेक्ट्रॉनिक तरीके से इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर चुके थे। हस्ताक्षर के तुरंत बाद यह समझौता प्रभावी हो गया, जिसके कारण इस सप्ताह स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित औपचारिक हस्ताक्षर समारोह को रद्द कर दिया गया। होर्मुज स्ट्रेट फिर से खोलने पर बनी सहमति समझौते के तहत ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही सामान्य करने पर सहमत हुआ है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का प्रमुख केंद्र माना जाता है और दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन इसी रास्ते से होता है। होर्मुज स्ट्रेट के खुलने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता आने और तेल की कीमतों में राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। ईरान को मिलेगी प्रतिबंधों में राहत समझौते के तहत ईरान पर लगाए गए कुछ आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देने और उसके तेल निर्यात को फिर से शुरू करने का रास्ता भी खुल सकता है। माना जा रहा है कि इससे ईरानी अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिलेगी और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को भी मजबूती मिलेगी। वर्साय पैलेस में हार्ड कॉपी पर भी किए हस्ताक्षर अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार रात फ्रांस के वर्साय पैलेस में आयोजित एक डिनर कार्यक्रम के दौरान समझौते की हार्ड कॉपी पर भी आधिकारिक हस्ताक्षर किए। उस समय फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी मौजूद थे। व्हाइट हाउस ने इस साइनिंग का वीडियो भी जारी किया है, जिसमें ट्रंप डिनर टेबल पर दस्तावेज पर हस्ताक्षर करते नजर आ रहे हैं। कई महीनों की तनातनी और सैन्य तनाव के बाद हुआ यह समझौता अमेरिका और ईरान के रिश्तों में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम माना जा रहा है। इसके साथ ही पश्चिम एशिया में शांति और वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता की नई उम्मीद भी जगी है।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के इस्तीफे की खबरों ने राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है। कुछ विदेशी मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि देश की निर्णय प्रक्रिया में बढ़ते सैन्य प्रभाव और सरकार की सीमित भूमिका से नाराज होकर उन्होंने इस्तीफा देने की पेशकश की है। ईरानी सरकार और राष्ट्रपति कार्यालय ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। रिपोर्ट में क्या किया गया दावा? ब्रिटिश-ईरानी मीडिया संस्थान 'ईरान इंटरनेशनल' की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने दावा किया कि राष्ट्रपति पेजेशकियन ने सर्वोच्च नेतृत्व को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। रिपोर्ट में कहा गया कि महत्वपूर्ण राष्ट्रीय फैसलों में सरकार की भूमिका कम होने से वह असंतुष्ट थे। राष्ट्रपति कार्यालय ने बताया निराधार राष्ट्रपति कार्यालय के अधिकारियों ने इन खबरों को अफवाह करार देते हुए कहा कि पेजेशकियन सामान्य रूप से अपने सभी सरकारी दायित्व निभा रहे हैं। राष्ट्रपति कार्यालय के संचार विभाग ने कहा कि विदेशी मीडिया द्वारा फैलाई जा रही खबरों का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। तस्नीम एजेंसी ने भी किया खंडन आईआरजीसी से संबद्ध तस्नीम न्यूज एजेंसी ने सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा कि राष्ट्रपति ने इस्तीफा नहीं दिया है और सरकार अपना कामकाज सामान्य रूप से चला रही है। सरकार और सुरक्षा संस्थाओं के रिश्तों पर चर्चा पिछले कुछ महीनों से ईरान की निर्वाचित सरकार और सैन्य-सुरक्षा संस्थाओं के बीच मतभेदों की खबरें सामने आती रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में इस्तीफे की अटकलों को बल मिला। हालांकि, सरकार का कहना है कि देश की एकता और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर फैलाई जा रही ऐसी खबरों का कोई आधार नहीं है। सत्ता के केंद्र को लेकर बहस जारी विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की नीतिगत निर्णय प्रक्रिया में कई प्रभावशाली संस्थाओं और वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका रहती है। लेकिन फिलहाल राष्ट्रपति के इस्तीफे को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और सरकार लगातार इन दावों को भ्रामक प्रचार बता रही है।
ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। एक तरफ दोनों देशों के बीच युद्ध टालने को लेकर बातचीत तेज हो गई है, वहीं दूसरी तरफ संभावित सैन्य कार्रवाई को लेकर भी अटकलें जारी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों ने इस संकट को लेकर सस्पेंस और बढ़ा दिया है। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत “निर्णायक मोड़” पर पहुंच चुकी है और अगले कुछ दिन बेहद अहम होंगे। ईरान ने कहा- बातचीत के विकल्प खुले ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने कहा कि तेहरान की ओर से बातचीत के सभी रास्ते अब भी खुले हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि ईरान ने हमेशा अपने वादों का सम्मान किया है और युद्ध टालने के लिए हर संभव प्रयास किया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दबाव बनाकर ईरान को झुकाने की कोशिश सफल नहीं होगी। उनके मुताबिक, समस्या का समाधान केवल सम्मानजनक बातचीत से ही निकल सकता है। परमाणु कार्यक्रम बना सबसे बड़ा विवाद पिछले कुछ दिनों में दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत और प्रस्तावों का आदान-प्रदान हुआ, लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सहमति नहीं बन पाई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने अपने प्रस्ताव में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कड़ी शर्तें रखीं, जिन्हें तेहरान ने खारिज कर दिया। इसके बाद ईरान ने पाकिस्तान के मध्यस्थों के जरिए अमेरिका को 14 बिंदुओं वाला नया प्रस्ताव भेजा। वॉशिंगटन इस प्रस्ताव से भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। ऐसे में दोनों देशों के बीच तनाव और अनिश्चितता अभी बनी हुई है। ट्रंप ने टाला सैन्य हमला ट्रंप ने बताया कि उन्होंने ईरान पर प्रस्तावित सैन्य हमले को फिलहाल रोक दिया है। उनके अनुसार सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के नेताओं ने बातचीत को मौका देने की अपील की थी। उन्होंने कहा कि खाड़ी देशों को उम्मीद है कि जल्द कोई समझौता हो सकता है। हालांकि ट्रंप ने यह भी साफ किया कि किसी भी समझौते की स्थिति में ईरान को परमाणु हथियार रखने की अनुमति नहीं दी जाएगी। “जरूरत पड़ी तो बड़ा हमला करेंगे” अमेरिकी राष्ट्रपति ने चेतावनी देते हुए कहा कि वह युद्ध नहीं चाहते, लेकिन यदि बातचीत विफल रही तो अमेरिका “एक और बड़ा हमला” करने के लिए तैयार है। ट्रंप के मुताबिक, सैन्य कार्रवाई को लेकर अंतिम फैसला अगले कुछ दिनों में लिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि शुक्रवार, शनिवार, रविवार या अगले सप्ताह की शुरुआत तक स्थिति स्पष्ट हो सकती है। दुनिया की नजर मध्य पूर्व पर मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार नजर बनाए हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं होते तो क्षेत्र में बड़ा सैन्य संघर्ष छिड़ सकता है। वहीं कई अरब देश दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता कर हालात को शांत करने की कोशिश कर रहे हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच तेहरान की ओर से एक बार फिर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei के करीबी और वरिष्ठ सलाहकार Mohsen Rezaei ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump को कड़ी चेतावनी दी है। ‘ईरान की सेना अमेरिका को पीछे हटने पर मजबूर करेगी’ मोहसिन रेजाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि अमेरिका यह गलतफहमी पाल रहा है कि दबाव बनाकर ईरान को झुकाया जा सकता है। उन्होंने लिखा कि ईरान की “लोहे जैसी मजबूत” सशस्त्र सेनाएं अमेरिका को पीछे हटने और आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर देंगी। रेजाई ने ट्रंप के हालिया बयान पर भी निशाना साधा, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा था कि उन्होंने ईरान पर प्रस्तावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल टाल दिया है। ट्रंप ने क्या कहा था? ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि अमेरिका ने ईरान पर संभावित हमला “कुछ समय के लिए” रोक दिया है। उनके मुताबिक, Saudi Arabia, Qatar और United Arab Emirates समेत कई खाड़ी देशों ने वॉशिंगटन से अपील की थी कि सैन्य कार्रवाई को कुछ दिनों के लिए टाल दिया जाए ताकि बातचीत के जरिए समाधान निकल सके। ट्रंप ने कहा था कि अगर बिना युद्ध और बमबारी के समझौता हो जाए तो यह सबसे बेहतर विकल्प होगा। ईरान बोला- बातचीत का मतलब समर्पण नहीं ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने भी साफ किया कि बातचीत का मतलब आत्मसमर्पण नहीं होता। उन्होंने कहा कि ईरान अपने परमाणु अधिकारों और राष्ट्रीय हितों से पीछे नहीं हटेगा। ईरानी नेतृत्व का कहना है कि देश किसी भी दबाव या धमकी के आगे झुकने वाला नहीं है। पाकिस्तान के जरिए पहुंचा नया प्रस्ताव रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने हाल ही में पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका को संशोधित शांति प्रस्ताव भेजा है। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि नए प्रस्ताव में बड़े बदलाव नहीं किए गए हैं। वॉशिंगटन अब भी यह मानता है कि तेहरान परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर पर्याप्त रियायतें देने को तैयार नहीं है। परमाणु कार्यक्रम बना तनाव की सबसे बड़ी वजह ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की चिंता लगातार बढ़ रही है। अमेरिका का आरोप है कि ईरान संवर्धित यूरेनियम के भंडार को बढ़ा रहा है, जबकि तेहरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। पश्चिम एशिया में जारी इस तनातनी के बीच अब दुनिया की नजर अमेरिका-ईरान बातचीत और संभावित समझौते पर टिकी हुई है।
सीजफायर के बावजूद बातचीत अटकी, बढ़ा कूटनीतिक तनाव Iran और United States के बीच जारी तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने साफ कहा है कि दोनों देशों के बीच बातचीत आगे नहीं बढ़ पा रही है और इसके पीछे अमेरिका की नीतियां जिम्मेदार हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए अमेरिका पर “दोहरी नीति” अपनाने का आरोप लगाया और कहा कि दुनिया अब इन विरोधाभासी बयानों और कार्रवाइयों को देख रही है। बातचीत में रुकावट के 3 बड़े कारण ईरान ने बातचीत के असफल रहने के पीछे तीन मुख्य वजहें बताई हैं: वायदों का उल्लंघन (Breach of commitments) समुद्री नाकेबंदी (Naval blockade) लगातार धमकियां (Threats) Masoud Pezeshkian ने कहा कि ईरान कभी भी बातचीत के खिलाफ नहीं रहा, लेकिन मौजूदा हालात में भरोसे की कमी सबसे बड़ी बाधा बन गई है। ट्रंप के सीजफायर विस्तार के बाद टली बातचीत रिपोर्ट्स के अनुसार, इस सप्ताह Pakistan में अमेरिका-ईरान के बीच वार्ता होने वाली थी, लेकिन Donald Trump द्वारा सीजफायर बढ़ाने के ऐलान के बाद इसे फिलहाल टाल दिया गया। अमेरिका का कहना है कि ईरान को एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार करने के लिए अतिरिक्त समय दिया गया है। तनाव बरकरार: जहाज जब्ती और नाकेबंदी जारी सीजफायर के बावजूद दोनों देशों के बीच तनाव कम नहीं हुआ है। ईरान ने हाल ही में तीन जहाजों को जब्त किया, जबकि अमेरिका ने Strait of Hormuz के पास अपनी नौसैनिक नाकेबंदी जारी रखी है। व्हाइट हाउस की ओर से साफ किया गया है कि ईरान के प्रस्ताव पर कोई तय समयसीमा नहीं दी गई है और आगे की रणनीति राष्ट्रपति के निर्णय पर निर्भर करेगी। नाकेबंदी हटाने पर टिकी अगली बातचीत United Nations में ईरान के प्रतिनिधि ने संकेत दिया है कि यदि अमेरिका नाकेबंदी हटाता है, तो अगली वार्ता जल्द हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में भरोसे की बहाली और ठोस कदम ही दोनों देशों को बातचीत की टेबल तक वापस ला सकते हैं।
सेना का बढ़ता प्रभाव, सत्ता पर पकड़ मजबूत ईरान में सत्ता के समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) पर आरोप है कि वह देश की राजनीतिक व्यवस्था में अपनी पकड़ लगातार मजबूत कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, IRGC ने राष्ट्रपति के कई अहम फैसलों में हस्तक्षेप करते हुए सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रभाव बढ़ा दिया है। राष्ट्रपति की नियुक्तियों पर रोक Masoud Pezeshkian द्वारा किए गए महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति के प्रयासों को कथित तौर पर रोक दिया गया। खासकर खुफिया मंत्री की नियुक्ति को लेकर राष्ट्रपति और सैन्य नेतृत्व के बीच टकराव सामने आया है। बताया जा रहा है कि IRGC के दबाव के चलते प्रस्तावित सभी नामों को खारिज कर दिया गया। सुप्रीम लीडर तक पहुंच भी सीमित रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि Mojtaba Khamenei के आसपास सुरक्षा घेरा कड़ा कर दिया गया है और उनकी पहुंच को सीमित किया गया है। सूत्रों के अनुसार, अब शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच और संवाद को सैन्य अधिकारियों की एक परिषद नियंत्रित कर रही है, जिससे सरकार और नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ गई है। क्या यह तख्तापलट है? विशेषज्ञ इसे अचानक हुआ सत्ता परिवर्तन नहीं मानते, बल्कि इसे लंबे समय से चल रही प्रक्रिया का हिस्सा बताते हैं। उनका कहना है कि IRGC का प्रभाव पहले से ही बढ़ रहा था और अब वह खुलकर सामने आ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर IRGC का दबदबा और बढ़ता है, तो ईरान की विदेश नीति और अधिक सख्त हो सकती है। इससे अमेरिका जैसे देशों के साथ बातचीत में तनाव बढ़ने की संभावना है। राजनीतिक संकट गहराने के संकेत ईरान के भीतर सत्ता संघर्ष और बढ़ते तनाव से राजनीतिक संकट गहराता दिख रहा है। राष्ट्रपति पेजेशकियन के लिए यह स्थिति बड़ी चुनौती बन गई है, जहां उन्हें एक ऐसे सिस्टम में काम करना पड़ रहा है, जहां वास्तविक नियंत्रण धीरे-धीरे सैन्य संस्थाओं के हाथ में जाता नजर आ रहा है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच Masoud Pezeshkian ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर ट्रंप को किसने यह अधिकार दिया कि वह Iran को उसके परमाणु अधिकारों से वंचित करें। “ट्रंप कौन होते हैं रोकने वाले?” ईरानी राष्ट्रपति ने कहा कि अमेरिका बिना किसी वैध आधार के ईरान के तकनीकी और परमाणु अधिकारों पर रोक लगाने की कोशिश कर रहा है। उनके मुताबिक, “कोई भी देश किसी स्वतंत्र राष्ट्र को उसके अधिकारों से वंचित नहीं कर सकता।” होर्मुज को लेकर टकराव चरम पर तनाव का सबसे बड़ा केंद्र Strait of Hormuz बना हुआ है। ईरान ने एक बार फिर इस अहम समुद्री मार्ग पर आवाजाही सीमित कर दी जहाजों पर गोलीबारी की खबरों के बाद कई देशों के जहाजों को रास्ता बदलना पड़ा ईरान ने साफ कहा है कि जब तक अमेरिकी नाकेबंदी जारी रहेगी, तब तक वह होर्मुज में ढील नहीं देगा अमेरिका भी पीछे हटने को तैयार नहीं दूसरी ओर अमेरिका ने भी अपना रुख सख्त बनाए रखा है। ट्रंप ने कहा कि जब तक परमाणु कार्यक्रम पर समझौता नहीं होता, नाकेबंदी जारी रहेगी अमेरिकी बलों ने कई जहाजों को वापस मोड़ दिया है बातचीत की कोशिशें जारी हालांकि तनाव के बीच कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं। Pakistan मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है और 22 अप्रैल की डेडलाइन से पहले समझौते की कोशिशें तेज हैं। हाल ही में पाकिस्तानी सेना प्रमुख Asim Munir ने तेहरान का दौरा कर अमेरिकी प्रस्ताव सौंपा, जिस पर ईरान विचार कर रहा है। सीजफायर की घड़ी नजदीक गौरतलब है कि दोनों देशों के बीच लागू संघर्षविराम 22 अप्रैल को खत्म हो रहा है। ऐसे में आने वाले दिन बेहद अहम माने जा रहे हैं। ईरान और अमेरिका के बीच टकराव अब सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समुद्री मार्ग, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक राजनीति पर सीधा असर डाल रहा है। एक ओर प्रतिबंध और नाकेबंदी है, तो दूसरी ओर बातचीत की कोशिशें–अब देखना होगा कि हालात समझौते की ओर बढ़ते हैं या टकराव और गहराता है।
वॉशिंगटन/इस्लामाबाद: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत फिर शुरू होने की उम्मीद जगी है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने संकेत दिया है कि अगले दो दिनों में वार्ता का नया दौर शुरू हो सकता है। हालांकि, इस बार अमेरिका ने बातचीत से पहले दो अहम शर्तें रख दी हैं। बताया जा रहा है कि वार्ता का अगला दौर एक बार फिर Islamabad में हो सकता है, जहां पहले भी दोनों देशों के बीच बातचीत हुई थी। क्या हैं अमेरिका की शर्तें? पहली शर्त: होर्मुज स्ट्रेट को खोलना होगा अमेरिका चाहता है कि Strait of Hormuz को पूरी तरह और बिना किसी रुकावट के खोला जाए। यह समुद्री मार्ग दुनिया की तेल सप्लाई के लिए बेहद अहम है। अमेरिका ने साफ किया है कि अगर ईरान जहाजों की आवाजाही रोकेगा, तो उसके जहाजों को भी गुजरने नहीं दिया जाएगा। दूसरी शर्त: ईरानी टीम को मिले पूरा अधिकार अमेरिका की दूसरी शर्त है कि बातचीत करने वाली ईरानी टीम के पास अंतिम फैसला लेने का अधिकार हो। वॉशिंगटन चाहता है कि इस्लामाबाद में जो भी समझौता हो, उसे Iran के सभी बड़े संस्थान मंजूरी दें। ईरान के अंदर बढ़ रहे मतभेद रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद सामने आ रहे हैं। एक तरफ राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian और विदेश मंत्री Abbas Araghchi जैसे राजनीतिक नेता हैं दूसरी तरफ शक्तिशाली Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) है बताया जा रहा है कि पहले दौर की वार्ता में IRGC के कुछ अधिकारियों ने राजनीतिक टीम को जवाब देने से रोक दिया था। ट्रंप का दावा Donald Trump ने कहा है कि उन्हें “सही लोगों” की तरफ से संपर्क मिला है और ईरान समझौते के लिए तैयार हो सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत फिर शुरू होने की संभावना तो बनी है, लेकिन ट्रंप की सख्त शर्तें और ईरान के अंदरूनी मतभेद इस प्रक्रिया को मुश्किल बना सकते हैं। अब देखना होगा कि कूटनीति तनाव कम कर पाती है या हालात और बिगड़ते हैं।
तेहरान/वॉशिंगटन: ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने अमेरिकी नागरिकों को संबोधित करते हुए एक खुला पत्र लिखा है, जिसे उन्होंने बुधवार को सोशल मीडिया पर साझा किया। इस पत्र में उन्होंने युद्धविराम का कोई उल्लेख नहीं किया, जबकि इससे कुछ ही घंटे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि ईरान की ओर से सीजफायर की मांग की गई है। “ईरान ने कभी युद्ध शुरू नहीं किया” अपने पत्र में पेज़ेश्कियान ने कहा कि ईरान ने “कभी कोई युद्ध शुरू नहीं किया” और देश लंबे समय से “हमलों और कब्ज़े” का सामना करता रहा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरानी जनता का अमेरिका, यूरोप या पड़ोसी देशों के लोगों के प्रति कोई दुर्भावना नहीं है। ट्रंप के दावे से अलग संदेश ईरानी राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया था कि ईरान के “नए शासन” ने युद्धविराम की अपील की है। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि यह अपील किसने की। ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका युद्धविराम पर तभी विचार करेगा जब होर्मुज़ जलडमरूमध्य पूरी तरह सुरक्षित और खुला होगा। उन्होंने ईरान के खिलाफ कड़ी चेतावनी देते हुए सख्त कार्रवाई की बात भी कही। संवाद बनाम टकराव की अपील पेज़ेश्कियान ने अपने पत्र के अंत में कहा कि दुनिया के सामने आज सबसे बड़ा विकल्प “टकराव और संवाद” के बीच है। उन्होंने चेतावनी दी कि आज लिया गया फैसला आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को तय करेगा। बढ़ते तनाव के बीच कूटनीतिक संदेश विशेषज्ञों के मुताबिक, यह पत्र सीधे अमेरिकी सरकार की बजाय वहां के नागरिकों को संबोधित कर एक कूटनीतिक संदेश देने की कोशिश है। इसमें शांति और संवाद की बात तो की गई है, लेकिन औपचारिक रूप से युद्धविराम का प्रस्ताव नहीं रखा गया।
मध्य-पूर्व में जारी तनाव और अमेरिका-इसराइल के साथ टकराव के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने वैश्विक प्रतिक्रिया को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने पाकिस्तान, तुर्की, इराक़, लेबनान, मिस्र और अन्य अरब देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन देशों के लोग अमेरिका और इसराइल की नीतियों के खिलाफ खुलकर अपनी नाराज़गी जता रहे हैं। राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान ने कहा, “आज हम दुनिया के कई देशों के लोगों को जागते हुए देख रहे हैं। पाकिस्तान, तुर्की, इराक़, लेबनान, मिस्र और अरब देशों के लोग अमेरिका, इसराइल और उनके अपराधों के प्रति अपनी नाराज़गी को मुखरता से व्यक्त कर रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा कि दुनिया के स्वतंत्र लोग “ज़ायनिस्टों” के साथ नहीं हैं और क्षेत्र में स्थिरता केवल आपसी सहयोग और देशों की संप्रभुता के सम्मान से ही संभव है। पाकिस्तान की मध्यस्थता की पेशकश ईरानी राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान ने इस तनाव को कम करने के लिए मध्यस्थता की पेशकश की है। पाकिस्तान ने दोनों पक्षों से बातचीत के ज़रिए समाधान निकालने की अपील की है। 15 सूत्रीय योजना की चर्चा इस बीच अमेरिकी और इसराइली मीडिया की कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका ने समझौते के लिए पाकिस्तान के माध्यम से ईरान को 15 सूत्रीय प्रस्ताव सौंपा है। हालांकि, इस प्रस्ताव की आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं हुई है। बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक नजर मध्य-पूर्व की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। लगातार हो रहे हमलों और बयानों के बीच कूटनीतिक कोशिशें भी तेज़ हो गई हैं, लेकिन हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं।
मिडिल ईस्ट संकट के बीच ईरान की नई रणनीति मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच ईरान ने अपनी रणनीति में अहम बदलाव का संकेत दिया है। ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने घोषणा की है कि अब ईरान किसी भी पड़ोसी देश पर हमला नहीं करेगा। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर किसी देश की जमीन से ईरान पर हमला किया गया, तो तेहरान जवाबी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पूरे क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। “ईरान किसी के सामने सरेंडर नहीं करेगा” अपने संबोधन में राष्ट्रपति पेजेशकियान ने साफ कहा कि ईरान किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। उन्होंने कहा कि देश न तो Israel और न ही United States के सामने आत्मसमर्पण करेगा। उनके मुताबिक, ईरानी जनता और सरकार अपनी संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है। पड़ोसी देशों से जताया खेद राष्ट्रपति पेजेशकियान ने अपने बयान में पड़ोसी देशों को लेकर नरम रुख दिखाया। उन्होंने कहा कि हालिया संघर्ष के दौरान जिन पड़ोसी देशों को हमलों का सामना करना पड़ा, उसके लिए उन्हें खेद है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि ईरान की तरफ से अब ऐसे हमले नहीं किए जाएंगे और क्षेत्रीय शांति बनाए रखने की कोशिश की जाएगी। माफी के साथ रखी अहम शर्त हालांकि इस माफी के साथ एक महत्वपूर्ण शर्त भी जोड़ी गई है। ईरानी राष्ट्रपति ने कहा कि यदि किसी पड़ोसी देश की जमीन का इस्तेमाल ईरान पर हमला करने के लिए किया जाता है, तो ईरान चुप नहीं बैठेगा और जवाबी कार्रवाई करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान ईरान की नई सुरक्षा नीति का संकेत हो सकता है, जिसमें वह सीधे टकराव से बचते हुए अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहा है। खामेनेई की मौत से बढ़ा तनाव हाल के सैन्य हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद पूरे मध्य पूर्व में राजनीतिक और सैन्य तनाव और बढ़ गया है। खामेनेई की मौत के बाद ईरान के भीतर सत्ता संतुलन और आगे की रणनीति को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ी चिंता इस संकट के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में भी चिंता बढ़ गई है। खासतौर पर Strait of Hormuz को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। अगर यहां तनाव और बढ़ता है या मार्ग बंद होता है, तो इसका असर सीधे वैश्विक तेल कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। क्षेत्रीय शांति की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा बयान विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति पेजेशकियान का यह बयान मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव को कम करने की कोशिश हो सकती है। हालांकि हालात अभी भी बेहद संवेदनशील बने हुए हैं और आने वाले दिनों में क्षेत्र की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी रहेगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।