ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। एक तरफ दोनों देशों के बीच युद्ध टालने को लेकर बातचीत तेज हो गई है, वहीं दूसरी तरफ संभावित सैन्य कार्रवाई को लेकर भी अटकलें जारी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों ने इस संकट को लेकर सस्पेंस और बढ़ा दिया है। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत “निर्णायक मोड़” पर पहुंच चुकी है और अगले कुछ दिन बेहद अहम होंगे। ईरान ने कहा- बातचीत के विकल्प खुले ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने कहा कि तेहरान की ओर से बातचीत के सभी रास्ते अब भी खुले हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि ईरान ने हमेशा अपने वादों का सम्मान किया है और युद्ध टालने के लिए हर संभव प्रयास किया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दबाव बनाकर ईरान को झुकाने की कोशिश सफल नहीं होगी। उनके मुताबिक, समस्या का समाधान केवल सम्मानजनक बातचीत से ही निकल सकता है। परमाणु कार्यक्रम बना सबसे बड़ा विवाद पिछले कुछ दिनों में दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत और प्रस्तावों का आदान-प्रदान हुआ, लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सहमति नहीं बन पाई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने अपने प्रस्ताव में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कड़ी शर्तें रखीं, जिन्हें तेहरान ने खारिज कर दिया। इसके बाद ईरान ने पाकिस्तान के मध्यस्थों के जरिए अमेरिका को 14 बिंदुओं वाला नया प्रस्ताव भेजा। वॉशिंगटन इस प्रस्ताव से भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। ऐसे में दोनों देशों के बीच तनाव और अनिश्चितता अभी बनी हुई है। ट्रंप ने टाला सैन्य हमला ट्रंप ने बताया कि उन्होंने ईरान पर प्रस्तावित सैन्य हमले को फिलहाल रोक दिया है। उनके अनुसार सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के नेताओं ने बातचीत को मौका देने की अपील की थी। उन्होंने कहा कि खाड़ी देशों को उम्मीद है कि जल्द कोई समझौता हो सकता है। हालांकि ट्रंप ने यह भी साफ किया कि किसी भी समझौते की स्थिति में ईरान को परमाणु हथियार रखने की अनुमति नहीं दी जाएगी। “जरूरत पड़ी तो बड़ा हमला करेंगे” अमेरिकी राष्ट्रपति ने चेतावनी देते हुए कहा कि वह युद्ध नहीं चाहते, लेकिन यदि बातचीत विफल रही तो अमेरिका “एक और बड़ा हमला” करने के लिए तैयार है। ट्रंप के मुताबिक, सैन्य कार्रवाई को लेकर अंतिम फैसला अगले कुछ दिनों में लिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि शुक्रवार, शनिवार, रविवार या अगले सप्ताह की शुरुआत तक स्थिति स्पष्ट हो सकती है। दुनिया की नजर मध्य पूर्व पर मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार नजर बनाए हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं होते तो क्षेत्र में बड़ा सैन्य संघर्ष छिड़ सकता है। वहीं कई अरब देश दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता कर हालात को शांत करने की कोशिश कर रहे हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच तेहरान की ओर से एक बार फिर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei के करीबी और वरिष्ठ सलाहकार Mohsen Rezaei ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump को कड़ी चेतावनी दी है। ‘ईरान की सेना अमेरिका को पीछे हटने पर मजबूर करेगी’ मोहसिन रेजाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि अमेरिका यह गलतफहमी पाल रहा है कि दबाव बनाकर ईरान को झुकाया जा सकता है। उन्होंने लिखा कि ईरान की “लोहे जैसी मजबूत” सशस्त्र सेनाएं अमेरिका को पीछे हटने और आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर देंगी। रेजाई ने ट्रंप के हालिया बयान पर भी निशाना साधा, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा था कि उन्होंने ईरान पर प्रस्तावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल टाल दिया है। ट्रंप ने क्या कहा था? ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि अमेरिका ने ईरान पर संभावित हमला “कुछ समय के लिए” रोक दिया है। उनके मुताबिक, Saudi Arabia, Qatar और United Arab Emirates समेत कई खाड़ी देशों ने वॉशिंगटन से अपील की थी कि सैन्य कार्रवाई को कुछ दिनों के लिए टाल दिया जाए ताकि बातचीत के जरिए समाधान निकल सके। ट्रंप ने कहा था कि अगर बिना युद्ध और बमबारी के समझौता हो जाए तो यह सबसे बेहतर विकल्प होगा। ईरान बोला- बातचीत का मतलब समर्पण नहीं ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने भी साफ किया कि बातचीत का मतलब आत्मसमर्पण नहीं होता। उन्होंने कहा कि ईरान अपने परमाणु अधिकारों और राष्ट्रीय हितों से पीछे नहीं हटेगा। ईरानी नेतृत्व का कहना है कि देश किसी भी दबाव या धमकी के आगे झुकने वाला नहीं है। पाकिस्तान के जरिए पहुंचा नया प्रस्ताव रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने हाल ही में पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका को संशोधित शांति प्रस्ताव भेजा है। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि नए प्रस्ताव में बड़े बदलाव नहीं किए गए हैं। वॉशिंगटन अब भी यह मानता है कि तेहरान परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर पर्याप्त रियायतें देने को तैयार नहीं है। परमाणु कार्यक्रम बना तनाव की सबसे बड़ी वजह ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की चिंता लगातार बढ़ रही है। अमेरिका का आरोप है कि ईरान संवर्धित यूरेनियम के भंडार को बढ़ा रहा है, जबकि तेहरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। पश्चिम एशिया में जारी इस तनातनी के बीच अब दुनिया की नजर अमेरिका-ईरान बातचीत और संभावित समझौते पर टिकी हुई है।
सीजफायर के बावजूद बातचीत अटकी, बढ़ा कूटनीतिक तनाव Iran और United States के बीच जारी तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने साफ कहा है कि दोनों देशों के बीच बातचीत आगे नहीं बढ़ पा रही है और इसके पीछे अमेरिका की नीतियां जिम्मेदार हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए अमेरिका पर “दोहरी नीति” अपनाने का आरोप लगाया और कहा कि दुनिया अब इन विरोधाभासी बयानों और कार्रवाइयों को देख रही है। बातचीत में रुकावट के 3 बड़े कारण ईरान ने बातचीत के असफल रहने के पीछे तीन मुख्य वजहें बताई हैं: वायदों का उल्लंघन (Breach of commitments) समुद्री नाकेबंदी (Naval blockade) लगातार धमकियां (Threats) Masoud Pezeshkian ने कहा कि ईरान कभी भी बातचीत के खिलाफ नहीं रहा, लेकिन मौजूदा हालात में भरोसे की कमी सबसे बड़ी बाधा बन गई है। ट्रंप के सीजफायर विस्तार के बाद टली बातचीत रिपोर्ट्स के अनुसार, इस सप्ताह Pakistan में अमेरिका-ईरान के बीच वार्ता होने वाली थी, लेकिन Donald Trump द्वारा सीजफायर बढ़ाने के ऐलान के बाद इसे फिलहाल टाल दिया गया। अमेरिका का कहना है कि ईरान को एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार करने के लिए अतिरिक्त समय दिया गया है। तनाव बरकरार: जहाज जब्ती और नाकेबंदी जारी सीजफायर के बावजूद दोनों देशों के बीच तनाव कम नहीं हुआ है। ईरान ने हाल ही में तीन जहाजों को जब्त किया, जबकि अमेरिका ने Strait of Hormuz के पास अपनी नौसैनिक नाकेबंदी जारी रखी है। व्हाइट हाउस की ओर से साफ किया गया है कि ईरान के प्रस्ताव पर कोई तय समयसीमा नहीं दी गई है और आगे की रणनीति राष्ट्रपति के निर्णय पर निर्भर करेगी। नाकेबंदी हटाने पर टिकी अगली बातचीत United Nations में ईरान के प्रतिनिधि ने संकेत दिया है कि यदि अमेरिका नाकेबंदी हटाता है, तो अगली वार्ता जल्द हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में भरोसे की बहाली और ठोस कदम ही दोनों देशों को बातचीत की टेबल तक वापस ला सकते हैं।
सेना का बढ़ता प्रभाव, सत्ता पर पकड़ मजबूत ईरान में सत्ता के समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) पर आरोप है कि वह देश की राजनीतिक व्यवस्था में अपनी पकड़ लगातार मजबूत कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, IRGC ने राष्ट्रपति के कई अहम फैसलों में हस्तक्षेप करते हुए सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रभाव बढ़ा दिया है। राष्ट्रपति की नियुक्तियों पर रोक Masoud Pezeshkian द्वारा किए गए महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति के प्रयासों को कथित तौर पर रोक दिया गया। खासकर खुफिया मंत्री की नियुक्ति को लेकर राष्ट्रपति और सैन्य नेतृत्व के बीच टकराव सामने आया है। बताया जा रहा है कि IRGC के दबाव के चलते प्रस्तावित सभी नामों को खारिज कर दिया गया। सुप्रीम लीडर तक पहुंच भी सीमित रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि Mojtaba Khamenei के आसपास सुरक्षा घेरा कड़ा कर दिया गया है और उनकी पहुंच को सीमित किया गया है। सूत्रों के अनुसार, अब शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच और संवाद को सैन्य अधिकारियों की एक परिषद नियंत्रित कर रही है, जिससे सरकार और नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ गई है। क्या यह तख्तापलट है? विशेषज्ञ इसे अचानक हुआ सत्ता परिवर्तन नहीं मानते, बल्कि इसे लंबे समय से चल रही प्रक्रिया का हिस्सा बताते हैं। उनका कहना है कि IRGC का प्रभाव पहले से ही बढ़ रहा था और अब वह खुलकर सामने आ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर IRGC का दबदबा और बढ़ता है, तो ईरान की विदेश नीति और अधिक सख्त हो सकती है। इससे अमेरिका जैसे देशों के साथ बातचीत में तनाव बढ़ने की संभावना है। राजनीतिक संकट गहराने के संकेत ईरान के भीतर सत्ता संघर्ष और बढ़ते तनाव से राजनीतिक संकट गहराता दिख रहा है। राष्ट्रपति पेजेशकियन के लिए यह स्थिति बड़ी चुनौती बन गई है, जहां उन्हें एक ऐसे सिस्टम में काम करना पड़ रहा है, जहां वास्तविक नियंत्रण धीरे-धीरे सैन्य संस्थाओं के हाथ में जाता नजर आ रहा है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच Masoud Pezeshkian ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर ट्रंप को किसने यह अधिकार दिया कि वह Iran को उसके परमाणु अधिकारों से वंचित करें। “ट्रंप कौन होते हैं रोकने वाले?” ईरानी राष्ट्रपति ने कहा कि अमेरिका बिना किसी वैध आधार के ईरान के तकनीकी और परमाणु अधिकारों पर रोक लगाने की कोशिश कर रहा है। उनके मुताबिक, “कोई भी देश किसी स्वतंत्र राष्ट्र को उसके अधिकारों से वंचित नहीं कर सकता।” होर्मुज को लेकर टकराव चरम पर तनाव का सबसे बड़ा केंद्र Strait of Hormuz बना हुआ है। ईरान ने एक बार फिर इस अहम समुद्री मार्ग पर आवाजाही सीमित कर दी जहाजों पर गोलीबारी की खबरों के बाद कई देशों के जहाजों को रास्ता बदलना पड़ा ईरान ने साफ कहा है कि जब तक अमेरिकी नाकेबंदी जारी रहेगी, तब तक वह होर्मुज में ढील नहीं देगा अमेरिका भी पीछे हटने को तैयार नहीं दूसरी ओर अमेरिका ने भी अपना रुख सख्त बनाए रखा है। ट्रंप ने कहा कि जब तक परमाणु कार्यक्रम पर समझौता नहीं होता, नाकेबंदी जारी रहेगी अमेरिकी बलों ने कई जहाजों को वापस मोड़ दिया है बातचीत की कोशिशें जारी हालांकि तनाव के बीच कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं। Pakistan मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है और 22 अप्रैल की डेडलाइन से पहले समझौते की कोशिशें तेज हैं। हाल ही में पाकिस्तानी सेना प्रमुख Asim Munir ने तेहरान का दौरा कर अमेरिकी प्रस्ताव सौंपा, जिस पर ईरान विचार कर रहा है। सीजफायर की घड़ी नजदीक गौरतलब है कि दोनों देशों के बीच लागू संघर्षविराम 22 अप्रैल को खत्म हो रहा है। ऐसे में आने वाले दिन बेहद अहम माने जा रहे हैं। ईरान और अमेरिका के बीच टकराव अब सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समुद्री मार्ग, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक राजनीति पर सीधा असर डाल रहा है। एक ओर प्रतिबंध और नाकेबंदी है, तो दूसरी ओर बातचीत की कोशिशें–अब देखना होगा कि हालात समझौते की ओर बढ़ते हैं या टकराव और गहराता है।
वॉशिंगटन/इस्लामाबाद: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत फिर शुरू होने की उम्मीद जगी है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने संकेत दिया है कि अगले दो दिनों में वार्ता का नया दौर शुरू हो सकता है। हालांकि, इस बार अमेरिका ने बातचीत से पहले दो अहम शर्तें रख दी हैं। बताया जा रहा है कि वार्ता का अगला दौर एक बार फिर Islamabad में हो सकता है, जहां पहले भी दोनों देशों के बीच बातचीत हुई थी। क्या हैं अमेरिका की शर्तें? पहली शर्त: होर्मुज स्ट्रेट को खोलना होगा अमेरिका चाहता है कि Strait of Hormuz को पूरी तरह और बिना किसी रुकावट के खोला जाए। यह समुद्री मार्ग दुनिया की तेल सप्लाई के लिए बेहद अहम है। अमेरिका ने साफ किया है कि अगर ईरान जहाजों की आवाजाही रोकेगा, तो उसके जहाजों को भी गुजरने नहीं दिया जाएगा। दूसरी शर्त: ईरानी टीम को मिले पूरा अधिकार अमेरिका की दूसरी शर्त है कि बातचीत करने वाली ईरानी टीम के पास अंतिम फैसला लेने का अधिकार हो। वॉशिंगटन चाहता है कि इस्लामाबाद में जो भी समझौता हो, उसे Iran के सभी बड़े संस्थान मंजूरी दें। ईरान के अंदर बढ़ रहे मतभेद रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद सामने आ रहे हैं। एक तरफ राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian और विदेश मंत्री Abbas Araghchi जैसे राजनीतिक नेता हैं दूसरी तरफ शक्तिशाली Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) है बताया जा रहा है कि पहले दौर की वार्ता में IRGC के कुछ अधिकारियों ने राजनीतिक टीम को जवाब देने से रोक दिया था। ट्रंप का दावा Donald Trump ने कहा है कि उन्हें “सही लोगों” की तरफ से संपर्क मिला है और ईरान समझौते के लिए तैयार हो सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत फिर शुरू होने की संभावना तो बनी है, लेकिन ट्रंप की सख्त शर्तें और ईरान के अंदरूनी मतभेद इस प्रक्रिया को मुश्किल बना सकते हैं। अब देखना होगा कि कूटनीति तनाव कम कर पाती है या हालात और बिगड़ते हैं।
तेहरान/वॉशिंगटन: ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने अमेरिकी नागरिकों को संबोधित करते हुए एक खुला पत्र लिखा है, जिसे उन्होंने बुधवार को सोशल मीडिया पर साझा किया। इस पत्र में उन्होंने युद्धविराम का कोई उल्लेख नहीं किया, जबकि इससे कुछ ही घंटे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि ईरान की ओर से सीजफायर की मांग की गई है। “ईरान ने कभी युद्ध शुरू नहीं किया” अपने पत्र में पेज़ेश्कियान ने कहा कि ईरान ने “कभी कोई युद्ध शुरू नहीं किया” और देश लंबे समय से “हमलों और कब्ज़े” का सामना करता रहा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरानी जनता का अमेरिका, यूरोप या पड़ोसी देशों के लोगों के प्रति कोई दुर्भावना नहीं है। ट्रंप के दावे से अलग संदेश ईरानी राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया था कि ईरान के “नए शासन” ने युद्धविराम की अपील की है। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि यह अपील किसने की। ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका युद्धविराम पर तभी विचार करेगा जब होर्मुज़ जलडमरूमध्य पूरी तरह सुरक्षित और खुला होगा। उन्होंने ईरान के खिलाफ कड़ी चेतावनी देते हुए सख्त कार्रवाई की बात भी कही। संवाद बनाम टकराव की अपील पेज़ेश्कियान ने अपने पत्र के अंत में कहा कि दुनिया के सामने आज सबसे बड़ा विकल्प “टकराव और संवाद” के बीच है। उन्होंने चेतावनी दी कि आज लिया गया फैसला आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को तय करेगा। बढ़ते तनाव के बीच कूटनीतिक संदेश विशेषज्ञों के मुताबिक, यह पत्र सीधे अमेरिकी सरकार की बजाय वहां के नागरिकों को संबोधित कर एक कूटनीतिक संदेश देने की कोशिश है। इसमें शांति और संवाद की बात तो की गई है, लेकिन औपचारिक रूप से युद्धविराम का प्रस्ताव नहीं रखा गया।
मध्य-पूर्व में जारी तनाव और अमेरिका-इसराइल के साथ टकराव के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने वैश्विक प्रतिक्रिया को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने पाकिस्तान, तुर्की, इराक़, लेबनान, मिस्र और अन्य अरब देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन देशों के लोग अमेरिका और इसराइल की नीतियों के खिलाफ खुलकर अपनी नाराज़गी जता रहे हैं। राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान ने कहा, “आज हम दुनिया के कई देशों के लोगों को जागते हुए देख रहे हैं। पाकिस्तान, तुर्की, इराक़, लेबनान, मिस्र और अरब देशों के लोग अमेरिका, इसराइल और उनके अपराधों के प्रति अपनी नाराज़गी को मुखरता से व्यक्त कर रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा कि दुनिया के स्वतंत्र लोग “ज़ायनिस्टों” के साथ नहीं हैं और क्षेत्र में स्थिरता केवल आपसी सहयोग और देशों की संप्रभुता के सम्मान से ही संभव है। पाकिस्तान की मध्यस्थता की पेशकश ईरानी राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान ने इस तनाव को कम करने के लिए मध्यस्थता की पेशकश की है। पाकिस्तान ने दोनों पक्षों से बातचीत के ज़रिए समाधान निकालने की अपील की है। 15 सूत्रीय योजना की चर्चा इस बीच अमेरिकी और इसराइली मीडिया की कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका ने समझौते के लिए पाकिस्तान के माध्यम से ईरान को 15 सूत्रीय प्रस्ताव सौंपा है। हालांकि, इस प्रस्ताव की आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं हुई है। बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक नजर मध्य-पूर्व की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। लगातार हो रहे हमलों और बयानों के बीच कूटनीतिक कोशिशें भी तेज़ हो गई हैं, लेकिन हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं।
मिडिल ईस्ट संकट के बीच ईरान की नई रणनीति मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच ईरान ने अपनी रणनीति में अहम बदलाव का संकेत दिया है। ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने घोषणा की है कि अब ईरान किसी भी पड़ोसी देश पर हमला नहीं करेगा। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर किसी देश की जमीन से ईरान पर हमला किया गया, तो तेहरान जवाबी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पूरे क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। “ईरान किसी के सामने सरेंडर नहीं करेगा” अपने संबोधन में राष्ट्रपति पेजेशकियान ने साफ कहा कि ईरान किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। उन्होंने कहा कि देश न तो Israel और न ही United States के सामने आत्मसमर्पण करेगा। उनके मुताबिक, ईरानी जनता और सरकार अपनी संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है। पड़ोसी देशों से जताया खेद राष्ट्रपति पेजेशकियान ने अपने बयान में पड़ोसी देशों को लेकर नरम रुख दिखाया। उन्होंने कहा कि हालिया संघर्ष के दौरान जिन पड़ोसी देशों को हमलों का सामना करना पड़ा, उसके लिए उन्हें खेद है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि ईरान की तरफ से अब ऐसे हमले नहीं किए जाएंगे और क्षेत्रीय शांति बनाए रखने की कोशिश की जाएगी। माफी के साथ रखी अहम शर्त हालांकि इस माफी के साथ एक महत्वपूर्ण शर्त भी जोड़ी गई है। ईरानी राष्ट्रपति ने कहा कि यदि किसी पड़ोसी देश की जमीन का इस्तेमाल ईरान पर हमला करने के लिए किया जाता है, तो ईरान चुप नहीं बैठेगा और जवाबी कार्रवाई करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान ईरान की नई सुरक्षा नीति का संकेत हो सकता है, जिसमें वह सीधे टकराव से बचते हुए अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहा है। खामेनेई की मौत से बढ़ा तनाव हाल के सैन्य हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद पूरे मध्य पूर्व में राजनीतिक और सैन्य तनाव और बढ़ गया है। खामेनेई की मौत के बाद ईरान के भीतर सत्ता संतुलन और आगे की रणनीति को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ी चिंता इस संकट के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में भी चिंता बढ़ गई है। खासतौर पर Strait of Hormuz को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। अगर यहां तनाव और बढ़ता है या मार्ग बंद होता है, तो इसका असर सीधे वैश्विक तेल कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। क्षेत्रीय शांति की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा बयान विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति पेजेशकियान का यह बयान मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव को कम करने की कोशिश हो सकती है। हालांकि हालात अभी भी बेहद संवेदनशील बने हुए हैं और आने वाले दिनों में क्षेत्र की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी रहेगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।