Mental Wellness

Person performing Navasana yoga pose to strengthen core muscles and improve balance
100 सिट-अप्स से भी ज्यादा असरदार है यह योगासन, पेट की चर्बी घटाने के साथ Cortisol भी करता है कम

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में फिटनेस और मानसिक स्वास्थ्य दोनों ही लोगों की प्राथमिकता बन चुके हैं। ऐसे में योग का एक खास आसन तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, जिसे विशेषज्ञ 100 पारंपरिक सिट-अप्स के बराबर प्रभावी मानते हैं। यह आसन है नौकासन (Navasana) या Boat Pose, जो न केवल पेट और कोर मसल्स को मजबूत बनाता है बल्कि तनाव कम करने और शरीर को संतुलित रखने में भी मदद करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, नौकासन शरीर की गहरी मांसपेशियों पर काम करता है और नियमित अभ्यास से शरीर की कार्यक्षमता में उल्लेखनीय सुधार लाता है। यही कारण है कि इसे योग की सबसे प्रभावशाली कोर-स्ट्रेंथ एक्सरसाइज में गिना जाता है। 100 सिट-अप्स जितना असरदार क्यों माना जाता है नौकासन? अमेरिका की Auburn University at Montgomery द्वारा किए गए एक अध्ययन में नौकासन को योग और पिलेट्स की सबसे प्रभावी कोर एक्सरसाइज में शामिल किया गया। प्रसिद्ध योग शिक्षक Sharath Jois का मानना था कि यदि कोई व्यक्ति इस आसन को 25 गहरी सांसों तक सही तरीके से होल्ड करता है, तो इसका प्रभाव 100 पारंपरिक सिट-अप्स के बराबर हो सकता है। पेट, पीठ और कूल्हों को बनाता है मजबूत योग प्रशिक्षकों के अनुसार, नौकासन केवल एब्स तक सीमित नहीं है। यह पेट की मांसपेशियों, हिप फ्लेक्सर्स, ग्लूट्स, पेल्विक मसल्स और पीठ को भी मजबूत करता है। इस आसन के दौरान कोर को सक्रिय रखने से पेट के अंदरूनी अंगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे पाचन तंत्र बेहतर काम करता है और मेटाबॉलिज्म को भी समर्थन मिलता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित अभ्यास पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी कम करने में भी सहायक हो सकता है। तनाव कम करने में भी मददगार नौकासन का फायदा केवल शारीरिक फिटनेस तक सीमित नहीं है। यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है। साल 2023 में जर्नल Biomedicine में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि नियमित योग और ध्यान का अभ्यास करने वाले छात्रों में छह सप्ताह के भीतर कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर कम हुआ। नौकासन करते समय संतुलन बनाए रखना, सांसों को नियंत्रित करना और मन को केंद्रित रखना पड़ता है। यही प्रक्रिया तंत्रिका तंत्र को शांत करने और तनाव को नियंत्रित करने में मदद करती है। दिमाग की क्षमता भी बढ़ाता है नौकासन एक ऐसा आसन है जिसमें शरीर को संतुलन और स्थिरता दोनों बनाए रखनी होती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तरह के बैलेंसिंग अभ्यास मस्तिष्क और शरीर के बीच समन्वय को मजबूत करते हैं। नियमित अभ्यास से एकाग्रता, फोकस और न्यूरोमस्कुलर कनेक्शन बेहतर होता है। यही वजह है कि इसे शरीर और मन दोनों के लिए फायदेमंद माना जाता है। नौकासन करने का सही तरीका जमीन पर सीधे बैठ जाएं और पैरों को सामने फैलाएं। घुटनों को मोड़ें और पैरों को जमीन से ऊपर उठाएं। धीरे-धीरे पैरों को सीधा करके शरीर को V आकार में लाने का प्रयास करें। रीढ़ को सीधा रखें और छाती को खुला रखें। दोनों हाथों को सामने की ओर फैलाएं। नजर हल्की ऊपर रखें और कोर को सक्रिय रखें। 5 से 10 गहरी सांसों तक इस स्थिति में बने रहें। आराम करें और 3 से 5 बार दोहराएं। शुरुआती लोग घुटनों को मोड़कर आसान रूप में भी इसका अभ्यास कर सकते हैं। इन गलतियों से बचें पीठ को गोल कर लेना सांस रोककर रखना कंधों में अनावश्यक तनाव पैदा करना क्षमता से अधिक पैरों को ऊपर उठाने की कोशिश करना विशेषज्ञों का कहना है कि इस आसन में ऊंचाई से ज्यादा स्थिरता महत्वपूर्ण होती है। किन लोगों को नहीं करना चाहिए नौकासन? निम्न समस्याओं से जूझ रहे लोगों को विशेषज्ञ की सलाह के बिना नौकासन नहीं करना चाहिए: कमर की गंभीर चोट हिप फ्लेक्सर स्ट्रेन हर्निया हाल ही में हुई पेट की सर्जरी गर्भावस्था के कुछ चरण

surbhi जून 8, 2026 0
Veteran using a wearable health tracker to monitor sleep, stress and daily activity levels
Serious Mental Illness से जूझ रहे मरीजों ने Wearable Devices को बताया उपयोगी, नई स्टडी में खुलासा

एक नई स्टडी में सामने आया है कि गंभीर मानसिक बीमारियों (Serious Mental Illness - SMI) से जूझ रहे Veterans ने स्वास्थ्य निगरानी के लिए इस्तेमाल होने वाले Wearable Devices को काफी सकारात्मक तरीके से स्वीकार किया। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये डिवाइस मरीजों की मानसिक और शारीरिक स्थिति पर लगातार नजर रखने में मदद कर सकते हैं, खासकर तब जब डॉक्टर की अपॉइंटमेंट्स के बीच लंबा अंतर हो। Veterans पर किया गया अध्ययन यह अध्ययन अमेरिका के Greater Los Angeles Veterans Affairs System के तहत इलाज करा रहे मरीजों पर किया गया। इसमें schizophrenia spectrum disorders, bipolar disorder और post-traumatic stress disorder (PTSD) से पीड़ित 15 Veterans को शामिल किया गया। प्रतिभागियों ने दो हफ्ते से लेकर एक महीने तक wearable health devices का इस्तेमाल किया। इसके बाद शोधकर्ताओं ने उनके अनुभवों को समझने के लिए विस्तृत इंटरव्यू किए। Sleep, Stress और Activity Monitoring से मिला फायदा स्टडी में शामिल कई मरीजों ने बताया कि wearable devices को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल करना आसान था। इन डिवाइस की मदद से वे अपनी: नींद की गुणवत्ता (Sleep Patterns) Heart Rate Stress Levels Physical Activity Daily Step Count जैसी चीजों को ट्रैक कर पा रहे थे। कई प्रतिभागियों ने कहा कि इन आंकड़ों को देखने से उन्हें अपने स्वास्थ्य के प्रति ज्यादा जागरूकता मिली और स्वस्थ आदतें अपनाने की प्रेरणा भी मिली। कुछ मरीजों ने नियमित वॉक, एक्सरसाइज और बेहतर नींद की दिनचर्या बनाए रखने की बात कही। Privacy को लेकर नहीं दिखी चिंता स्टडी की एक अहम बात यह रही कि अधिकांश प्रतिभागियों ने Privacy या Location Tracking को लेकर कोई चिंता नहीं जताई। मरीजों का मानना था कि डॉक्टरों के साथ यह स्वास्थ्य डेटा साझा करने से बेहतर इलाज और सही निर्णय लेने में मदद मिल सकती है। शोधकर्ताओं ने कहा कि मरीजों ने Patient-Generated Health Data को Healthcare Providers के लिए उपयोगी माना। तकनीकी दिक्कतें बनी चुनौती हालांकि, लंबे समय तक wearable devices इस्तेमाल करने में कुछ चुनौतियां भी सामने आईं। प्रतिभागियों ने बताया कि: Smartphone Apps को समझना कभी-कभी मुश्किल था तकनीकी समस्याएं उपयोग में बाधा बनीं लंबे समय तक डिवाइस पहनना असहज महसूस हुआ कुछ लोगों को संदेह था कि डिवाइस मानसिक स्वास्थ्य के जटिल लक्षणों को सही तरीके से पकड़ पाएंगे या नहीं विशेष रूप से Anxiety और Relapse जैसे संकेतों को ट्रैक करने की क्षमता पर सवाल उठाए गए। भविष्य में Mental Healthcare बदल सकते हैं Wearables शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर तकनीकी सहायता बेहतर की जाए और Mood Tracking, Medication Reminders जैसे फीचर्स जोड़े जाएं, तो यह तकनीक मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में बड़ा बदलाव ला सकती है। हालांकि विशेषज्ञों ने कहा कि अभी बड़े स्तर पर और अध्ययन की जरूरत है ताकि यह समझा जा सके कि नियमित इलाज में Wearable Data को शामिल करने से मरीजों के Clinical Outcomes में कितना सुधार हो सकता है।  

surbhi मई 25, 2026 0
Young people attending bhajan clubbing and spiritual music event with lights, chanting and live instruments
क्या Gen Z ने आध्यात्म को दिया नया रूप? भजन क्लबिंग, टैरो और कीर्तन नाइट्स बन रहे नई पहचान

आज की Gen Z सिर्फ करियर, सोशल मीडिया और ट्रेंड्स तक सीमित नहीं है। यह पीढ़ी अब आध्यात्म को भी अपने अंदाज में जी रही है। कभी मंदिरों और पारिवारिक परंपराओं तक सीमित रहने वाले भजन, कीर्तन और ध्यान अब क्लब, ऑडिटोरियम और सोशल स्पेस का हिस्सा बनते जा रहे हैं। मुंबई के St Andrew's Auditorium में हाल ही में आयोजित एक भजन-क्लबिंग इवेंट इसका बड़ा उदाहरण बना, जहां इलेक्ट्रिक गिटार, ड्रम्स और हारमोनियम की धुनों के बीच युवा “Achyutam Keshavam” और “Raghupati Raghav Raja Ram” जैसे भजन गाते नजर आए। माहौल किसी लाइव कॉन्सर्ट जैसा था, लेकिन केंद्र में आध्यात्मिक संगीत था। आध्यात्म अब सिर्फ परंपरा नहीं, पर्सनल एक्सपीरियंस शामैनिक फैसिलिटेटर Barkha Punjabi के अनुसार, Gen Z अब सिर्फ इसलिए किसी धार्मिक मान्यता को नहीं मानती क्योंकि परिवार मानता है। यह पीढ़ी सवाल पूछती है, प्रयोग करती है और आध्यात्म को अपने अनुभव के हिसाब से समझना चाहती है। यही वजह है कि आज– Bhajan Clubbing Tarot Reading Crystal Healing Kirtan Nights Reiki Sessions जैसी चीजें युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं। कीर्तन अब लिविंग रूम से निकलकर बड़े मंचों तक लंदन के कीर्तन कलाकार Radhika Das, मुंबई आधारित Kirtan Mumbai और Backstage Siblings जैसे प्लेटफॉर्म्स ने कीर्तन को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है। अब ये आयोजन छोटे सत्संगों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि टिकटेड इवेंट्स और बड़े वेन्यू तक पहुंच चुके हैं। “स्पिरिचुअल कॉन्सर्ट” का नया कॉन्सेप्ट Nirvaan Birla का मानना है कि यह बदलाव भक्ति का नया मंच नहीं, बल्कि क्लब कल्चर का आध्यात्म से जुड़ना है। उनके अनुसार, यह ऐसे कॉन्सर्ट्स हैं जहां गाने किसी इंसान के लिए नहीं, बल्कि self-love और divinity के लिए होते हैं। उनका उद्देश्य युवाओं को कुछ देर रुककर खुद से जुड़ने का मौका देना है। अस्थिर दुनिया में “ग्राउंडिंग” की तलाश Meghna Siraj के मुताबिक, आज के युवा सामाजिक, आर्थिक और भावनात्मक अस्थिरता के बीच खुद को खोया हुआ महसूस करते हैं। ऐसे में सामूहिक chanting और rituals उन्हें belongingness और mental grounding का एहसास कराते हैं। जब सैकड़ों लोग एक साथ मंत्र गाते हैं, तो एक सामूहिक ऊर्जा बनती है, जो लोगों को डिजिटल दुनिया से बाहर वास्तविक जुड़ाव का अनुभव देती है। टैरो और क्रिस्टल हीलिंग की तरफ भी बढ़ रहा रुझान आध्यात्म का यह नया रूप सिर्फ संगीत तक सीमित नहीं है। टैरो कार्ड्स, क्रिस्टल्स और ज्योतिष जैसी चीजों में भी Gen Z की दिलचस्पी तेजी से बढ़ रही है। Ishita Bangera बताती हैं कि लगातार डिजिटल दबाव और तुलना के माहौल में Reiki और Tarot जैसे अभ्यास उन्हें खुद से जुड़ने में मदद करते हैं। एक सर्वे के मुताबिक– 16% Gen Z singles अपने love life decisions के लिए Tarot का सहारा लेते हैं 30% लोग डेट से पहले सामने वाले की zodiac sign चेक करते हैं क्या यह आध्यात्म है या सिर्फ ट्रेंड? हालांकि इस नए ट्रेंड को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि भजन और कीर्तन को “क्लबिंग” जैसा रूप देना उनकी पवित्रता को कम कर सकता है। लेकिन आयोजकों का कहना है कि असली फर्क intention यानी भावना का होता है। अगर उद्देश्य भीतर की शांति और जुड़ाव है, तो जगह और प्रस्तुति उतनी मायने नहीं रखती। बदल गया है अंदाज, लेकिन तलाश वही है आज का satsang पहले जैसा नहीं दिखता। अब वहां LED लाइट्स, लाइव बैंड और सोशल मीडिया भी है। लेकिन मूल भावना वही है– जुड़ाव आत्म-खोज शांति belongingness Gen Z शायद आध्यात्म को नया aesthetic दे रही है, लेकिन उसकी तलाश वही पुरानी है– खुद को समझने और भीतर की शांति पाने की।  

surbhi मई 7, 2026 0
Person practicing short mental exercise for depression relief using mindfulness and cognitive techniques
क्या सिर्फ 10 मिनट का मानसिक व्यायाम कम कर सकता है डिप्रेशन? नई रिसर्च में सामने आए चौंकाने वाले नतीजे

  डिप्रेशन से जूझ रहे लोगों के लिए उम्मीद की नई किरण दुनियाभर में डिप्रेशन एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। हर साल करोड़ों लोग इससे प्रभावित होते हैं, लेकिन महंगी थेरेपी, सामाजिक झिझक और विशेषज्ञों की कमी के कारण बहुत से मरीज समय पर इलाज नहीं करा पाते। इसी बीच एक नई रिसर्च ने उम्मीद की किरण दिखाई है। जर्नल Nature Human Behaviour में प्रकाशित 2026 के अध्ययन के अनुसार, सिर्फ 10 मिनट के मनोवैज्ञानिक अभ्यास भी डिप्रेशन के लक्षणों को कम करने में मदद कर सकते हैं और इसका असर एक महीने तक बना रह सकता है।   10 मिनट के छोटे अभ्यास से दिखा असर इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने अमेरिका के 7,505 वयस्कों को शामिल किया, जो डिप्रेशन के लक्षणों से जूझ रहे थे। शोधकर्ताओं ने इन प्रतिभागियों को अलग-अलग डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य अभ्यासों के समूहों में बांटा। हर अभ्यास 10 मिनट से कम समय का था और इसमें ऐसे व्यावहारिक कौशल सिखाए गए, जो आमतौर पर मनोचिकित्सा (Psychotherapy) में इस्तेमाल किए जाते हैं। इन अभ्यासों में शामिल थे: नकारात्मक विचारों को नए नजरिए से देखना लक्ष्य तय करना और प्रेरणा बढ़ाना दूसरों की मदद करके जीवन के अर्थ को समझना प्रतिभागियों की मानसिक स्थिति का आकलन अभ्यास के तुरंत बाद और फिर एक महीने बाद किया गया।   दो तकनीकों ने दिखाया सबसे बेहतर परिणाम अध्ययन में पाया गया कि कुछ अभ्यासों से लोगों में तुरंत उम्मीद और प्रेरणा बढ़ी। लेकिन दो विशेष तकनीकों ने लंबे समय तक असर दिखाया: नकारात्मक विचारों को नए और सकारात्मक नजरिए से समझने की मानसिक तकनीक। ध्यान केंद्रित करना इन तकनीकों का उपयोग करने वाले प्रतिभागियों में एक महीने बाद भी डिप्रेशन के लक्षणों में औसतन 4% अधिक कमी देखी गई, जो कंट्रोल ग्रुप के मुकाबले बेहतर थी।   छोटे उपाय भी बन सकते हैं बड़ी मदद शोधकर्ताओं के अनुसार यह सुधार भले ही छोटा लगे, लेकिन इसका महत्व काफी बड़ा है। क्योंकि ऐसे छोटे डिजिटल अभ्यास लाखों लोगों तक आसानी से पहुंच सकते हैं, खासकर उन लोगों तक जिन्हें मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि ये अभ्यास थेरेपी का विकल्प नहीं हैं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए शुरुआती सहायक उपकरण के रूप में देखे जाने चाहिए।   अन्य शोध भी देते हैं इसी तरह के संकेत मानसिक स्वास्थ्य पर छोटे-छोटे अभ्यासों के सकारात्मक प्रभाव को लेकर पहले भी कई अध्ययन सामने आ चुके हैं। 2024 में British Journal of Health Psychology में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि रोजाना 10 मिनट की माइंडफुलनेस प्रैक्टिस से लोगों के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार हुआ और डिप्रेशन व एंग्जायटी के लक्षण कम हुए। इसके अलावा National Institutes of Health की 2019 की समीक्षा में भी बताया गया कि शारीरिक गतिविधि और व्यायाम मूड बेहतर करने और डिप्रेशन के लक्षण घटाने में मदद कर सकते हैं।   छोटे कदम भी बदल सकते हैं मानसिक स्थिति डिप्रेशन से जूझ रहे लोगों को अक्सर लगता है कि स्थिति से बाहर निकलना मुश्किल है। लेकिन यह नई रिसर्च बताती है कि छोटे-छोटे कदम भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं। कभी-कभी सिर्फ 10 मिनट का मानसिक अभ्यास, नई सोच सीखना या किसी छोटे लक्ष्य पर काम करना भी मनोदशा को बेहतर बनाने की दिशा में पहला कदम बन सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में ऐसे छोटे लेकिन प्रभावी डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य अभ्यास मानसिक स्वास्थ्य देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं।  

surbhi मार्च 7, 2026 0
Popular post
शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Top week

Bihar Assistant Professor
जॉब्स

बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर बनने के नियम बदले, जानिए कब जरूरी होगा NET ?

abhishek singh जुलाई 2, 2026 0