दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर लापता हुए अनुभवी नेपाली गाइड Hilary Dawa Sherpa छह दिन बाद जीवित मिले हैं। उन्हें मृत मान लिया गया था, लेकिन उन्होंने विषम परिस्थितियों से लड़ते हुए खुद बेस कैंप तक पहुंचकर सभी को चौंका दिया। एवरेस्ट शिखर फतह करने के बाद अचानक हो गए थे गायब हिलेरी दावा शेरपा 30 मई की सुबह एवरेस्ट के ऊपरी हिस्से में लापता हो गए थे। उन्होंने एक दिन पहले सफलतापूर्वक शिखर पर पहुंचने का लक्ष्य हासिल किया था, जिसके बाद वापसी के दौरान उनका संपर्क टूट गया। रेंगते हुए तय किया मौत और जिंदगी के बीच का सफर खोज अभियान से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, शेरपा गंभीर शारीरिक कमजोरी की स्थिति में रेंगते हुए नीचे उतरते रहे। अंततः उन्हें बेस कैंप के निकट जीवित पाया गया, जहां से उन्हें तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई गई। सर्च टीम भी नहीं ढूंढ पाई, खुद लौटकर दिया जीवन का संकेत कई दिनों तक चले खोज अभियान के बावजूद बचाव दल उनका पता नहीं लगा सका। गुरुवार सुबह जब वे स्वयं नीचे पहुंचते दिखाई दिए, तब जाकर उनके जीवित होने की पुष्टि हुई। साथी पर्वतारोही ने मान लिया था मौत, सोशल मीडिया पर जताया था शोक ब्रिटिश पर्वतारोही Chris Thrall ने सोशल मीडिया पर शेरपा को मृत समझकर श्रद्धांजलि दी थी। उन्होंने उन्हें "पहाड़ों का टाइगर" और बेहद शांत व दयालु व्यक्ति बताया था। ‘तुम आगे बढ़ो, मैं ठीक हूं’— यही थे आखिरी शब्द थ्रॉल के अनुसार, कैंप-4 से नीचे उतरते समय शेरपा आराम करने के लिए रुके थे। जब उनसे हालचाल पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया, “मैं ठीक हूं, तुम आगे बढ़ो।” इसके बाद दोनों का संपर्क टूट गया। खराब मौसम ने बढ़ाई मुश्किलें, पांच दिन का अभियान 11 दिन तक खिंचा पर्वतारोहियों के मुताबिक, इस सीजन में मौसम बेहद प्रतिकूल रहा। जो चढ़ाई और वापसी सामान्यतः पांच दिनों में पूरी हो जाती है, उसमें इस बार 11 दिन तक लग गए। हेलीकॉप्टर से काठमांडू ले जाने की तैयारी बचाव अभियान का नेतृत्व कर रहे अधिकारियों ने बताया कि शेरपा को उपचार के लिए हेलीकॉप्टर से Kathmandu ले जाने की व्यवस्था की गई है। एवरेस्ट सीजन बना सबसे व्यस्त, मौतों का आंकड़ा भी बढ़ा सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस सीजन में 1,000 से अधिक पर्वतारोही एवरेस्ट शिखर तक पहुंचे हैं। वहीं अब तक कम से कम पांच लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें दो भारतीय और तीन नेपाली नागरिक शामिल हैं। एवरेस्ट ने फिर दिखाया अपना कठिन चेहरा यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि Mount Everest पर सफलता और त्रासदी के बीच की दूरी बेहद कम होती है। छह दिनों तक लापता रहने के बाद हिलेरी दावा शेरपा का जीवित लौटना इस सीजन की सबसे असाधारण बचाव कहानियों में शामिल हो गया है।
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के एक बयान ने भारत-नेपाल सीमा विवाद को लेकर नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। संसद में अपने संबोधन के दौरान शाह ने कहा कि केवल भारत ने ही नहीं, बल्कि नेपाल ने भी कुछ स्थानों पर भारतीय भूमि का उपयोग या कब्जा किया है। उनके इस बयान के बाद विपक्ष ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा, जिसके बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय को आधिकारिक सफाई जारी करनी पड़ी। पहली संसदीय स्पीच में उठाया सीमा विवाद का मुद्दा प्रधानमंत्री बनने के बाद संसद में अपने पहले संबोधन में बालेन शाह ने कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे विवादित क्षेत्रों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सीमा विवाद का समाधान दोनों देशों को विशेषज्ञों और इतिहासकारों की मदद से बातचीत के जरिए निकालना चाहिए। विपक्ष ने मांगे सबूत प्रधानमंत्री के बयान के बाद विपक्षी दलों ने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि नेपाल द्वारा भारतीय भूमि पर कब्जे का दावा किया जा रहा है, तो सरकार इसके प्रमाण पेश करे। कई नेताओं ने बयान वापस लेने की भी मांग की। सीमा विशेषज्ञों ने दावे पर जताई असहमति नेपाल-भारत सीमा मामलों के जानकारों ने कहा कि नेपाल द्वारा भारतीय क्षेत्र पर आधिकारिक अतिक्रमण का कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। हालांकि सीमावर्ती इलाकों में दोनों देशों के नागरिकों द्वारा जमीन के उपयोग के कुछ मामले सामने आते रहे हैं। विदेश मंत्रालय ने दी सफाई विवाद बढ़ने के बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री का आशय किसी सरकारी कब्जे से नहीं था। मंत्रालय के अनुसार, उन्होंने सीमावर्ती इलाकों में दोनों देशों के नागरिकों द्वारा भूमि उपयोग की स्थिति का जिक्र किया था। लिपुलेख-कालापानी विवाद फिर चर्चा में यह बयान ऐसे समय आया है जब नेपाल हाल ही में लिपुलेख मार्ग से होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भी आपत्ति जता चुका है। कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से सीमा विवाद जारी है।
Sher Bahadur Deuba और उनकी पत्नी Arzu Rana Deuba को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ी राहत मिली है। Supreme Court of Nepal ने उनकी गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी है। सोमवार को जस्टिस महेश शर्मा पौडेल और नित्यानंद पांडे की बेंच ने दंपती की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि गिरफ्तारी वारंट जारी करने में उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। काठमांडू जिला अदालत ने जारी किया था वारंट Kathmandu District Court ने 6 अप्रैल को देउबा दंपती के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। उस समय दोनों इलाज के लिए विदेश में थे। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि अगली सुनवाई तक दोनों को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। इंटरपोल ने भी ठुकराया अनुरोध नेपाल पुलिस ने देउबा दंपती के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने के लिए इंटरपोल से संपर्क किया था। हालांकि, इंटरपोल ने दस्तावेजों को अपर्याप्त बताते हुए यह अनुरोध खारिज कर दिया। प्रदर्शनकारियों ने किया था हमला पिछले साल जेन-जी प्रदर्शनकारियों ने देउबा के घर के बाहर प्रदर्शन किया था। इस दौरान हिंसा भी हुई, जिसमें दंपती घायल हो गए थे। सोशल मीडिया पर उस समय एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें नेपाली मुद्रा और अमेरिकी डॉलर जलाते हुए दिखाए गए थे। इसके बाद मनी लॉन्ड्रिंग विभाग ने मामले की जांच शुरू की और फोरेंसिक रिपोर्ट तैयार कराई।
Kami Rita Sherpa ने एक बार फिर इतिहास रचते हुए दुनिया की सबसे ऊंची चोटी Mount Everest को 32वीं बार फतह कर नया विश्व रिकॉर्ड बना दिया है। 56 वर्षीय नेपाली पर्वतारोही रविवार सुबह 10 बजकर 12 मिनट पर 8,849 मीटर ऊंची चोटी पर पहुंचे। उन्हें दुनियाभर में “एवरेस्ट मैन” के नाम से भी जाना जाता है। नेपाल के पर्यटन विभाग के अनुसार, कामी रीता शेरपा ने एवरेस्ट पर सबसे अधिक बार चढ़ाई करने का अपना ही रिकॉर्ड तोड़ दिया है। 14 Peaks Expedition का कर रहे थे नेतृत्व पर्यटन विभाग ने बताया कि शेरपा इस बार 14 Peaks Expedition द्वारा संचालित अभियान का नेतृत्व कर रहे थे। उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि को नेपाल के पर्वतारोहण इतिहास में एक और बड़ी सफलता माना जा रहा है। लाकपा शेरपा ने भी बनाया रिकॉर्ड वहीं “माउंटेन क्वीन” के नाम से मशहूर Lhakpa Sherpa ने भी 11वीं बार माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई कर महिलाओं में सबसे अधिक बार एवरेस्ट फतह करने का विश्व रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया। बताया गया कि लाकपा शेरपा रविवार सुबह 9:30 बजे एवरेस्ट शिखर पर पहुंचीं। नेपाल के प्रधानमंत्री ने दी बधाई Balen Shah ने दोनों पर्वतारोहियों को बधाई देते हुए कहा कि माउंट एवरेस्ट सिर्फ एक पर्वत नहीं, बल्कि नेपाल के साहस, आत्मसम्मान और हिमालयी संस्कृति का प्रतीक है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि नेपाली पर्वतारोहियों ने एक बार फिर दुनिया के सामने नया इतिहास रच दिया है। पर्यटन विभाग ने सराहा उपलब्धि नेपाल के पर्यटन विभाग ने कहा कि कामी रीता शेरपा की यह उपलब्धि देश के पर्वतारोहण उद्योग और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को मजबूत करती है। विभाग के अनुसार, एवरेस्ट अभियान नेपाल की अर्थव्यवस्था और पर्यटन क्षेत्र के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। कौन हैं कामी रीता शेरपा? Kami Rita Sherpa का जन्म जनवरी 1970 में नेपाल के कोशी प्रांत के सोलुखुम्बु जिले के एक गांव में हुआ था। उन्होंने 1992 में पेशेवर पर्वतारोहण की शुरुआत की और पहली बार 1994 में माउंट एवरेस्ट फतह किया था। इसके बाद से वह लगातार रिकॉर्ड बनाते रहे हैं और दुनिया के सबसे अनुभवी एवरेस्ट पर्वतारोहियों में गिने जाते हैं।
Balen Shah एक बार फिर चर्चा में हैं, लेकिन इस बार वजह कोई राजनीतिक बयान नहीं बल्कि उनका बदला हुआ लुक है। काठमांडू के मेयर से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक अक्सर ब्लैक टी-शर्ट, ब्लैक कोट और काले चश्मे में नजर आने वाले बालेन शाह अब अचानक सफेद कपड़ों में दिखाई दिए हैं, जिसके बाद नेपाल में राजनीतिक और सोशल मीडिया हलकों में नई बहस शुरू हो गई है। सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीर 10 मई को बालेन शाह ने Facebook और TikTok पर अपनी नई तस्वीर और वीडियो पोस्ट की। इसमें वह: सफेद शर्ट धारीदार ट्राउजर सफेद स्नीकर्स पहने नजर आए। खास बात यह रही कि उन्होंने पोस्ट के साथ कोई कैप्शन नहीं लिखा, लेकिन कुछ ही मिनटों में तस्वीर वायरल हो गई। नेपाल में फेसबुक, इंस्टाग्राम और टिकटॉक पर उनके नए स्टाइल को लेकर जमकर चर्चा शुरू हो गई। जूतों की कीमत भी बनी चर्चा का विषय सोशल मीडिया पर लोगों ने उनके सफेद स्नीकर्स को लेकर भी चर्चा शुरू कर दी। कुछ यूजर्स ने दावा किया कि प्रधानमंत्री के जूतों की कीमत सिर्फ 1200 नेपाली रुपये है। कई टिकटॉक यूजर्स ने वीडियो बनाकर कहा कि बालेन शाह की लोकप्रियता इतनी ज्यादा है कि साधारण जूते भी ट्रेंड बन गए हैं। एक यूजर ने कहा: “प्रधानमंत्री बनने के लिए महंगे जूते जरूरी नहीं हैं।” अब तक मीडिया से दूरी Balen Shah प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक बेहद कम सार्वजनिक रूप से नजर आए हैं। उन्होंने: देश को संबोधित नहीं किया कोई बड़ा इंटरव्यू नहीं दिया प्रेस कॉन्फ्रेंस से दूरी बनाए रखी हालांकि इसके बावजूद वह लगातार चर्चा में बने हुए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, शाह “कम बोलो, ज्यादा काम करो” की रणनीति पर चल रहे हैं। ब्लैक लुक से बनी थी अलग पहचान राजनीति में आने से पहले बालेन शाह एक रैपर और परफॉर्मर भी रह चुके हैं। ऐसे में फैशन और विजुअल पहचान को लेकर उनकी अलग शैली पहले से चर्चा में रही है। काठमांडू के मेयर रहते हुए भी उन्होंने पारंपरिक राजनीतिक ड्रेस कोड से दूरी बनाए रखी थी। औपचारिक कार्यक्रमों में भी वह अक्सर: ब्लैक आउटफिट सनग्लासेस मॉडर्न स्टाइल में नजर आते थे। यहां तक कि प्रधानमंत्री पद की शपथ के दौरान पहनी गई पारंपरिक नेपाली पोशाक “दौरा-सुरुवाल” का रंग भी काला था। सफेद कपड़ों के पीछे क्या है संदेश? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनका अचानक सफेद कपड़ों में नजर आना सिर्फ फैशन बदलाव नहीं हो सकता। कुछ विशेषज्ञ इसे: सॉफ्ट इमेज बनाने की कोशिश राजनीतिक संदेश विवादों के बीच नई शुरुआत का संकेत मानकर देख रहे हैं। विवादों में रही है बालेन सरकार हाल के महीनों में बालेन सरकार कई मुद्दों को लेकर आलोचना झेल रही है। इनमें: काठमांडू में बुलडोजर कार्रवाई नदी किनारे बसे लोगों को हटाना चीफ जस्टिस की नियुक्ति विवाद प्रशासनिक फैसलों को लेकर सवाल शामिल हैं। इसी वजह से कुछ लोग उनके सफेद लुक को “इमेज मेकओवर” की कोशिश भी बता रहे हैं। हालांकि बालेन शाह ने खुद इस बदलाव पर कोई टिप्पणी नहीं की है। नेपाल में बना फैशन ट्रेंड बालेन शाह की लोकप्रियता का असर बाजार में भी दिखाई देने लगा है। नेपाल में कई दुकानदार अब: उनके जैसे काले चश्मे सफेद स्नीकर्स ब्लैक और व्हाइट आउटफिट बेचते नजर आ रहे हैं। सोशल मीडिया पर उनके स्टाइल को लेकर मीम्स, वीडियो और फैशन पोस्ट लगातार वायरल हो रहे हैं।
नेपाल की राजधानी काठमांडू स्थित Tribhuvan International Airport पर सोमवार सुबह उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब Turkish Airlines के एक विमान के लैंडिंग के दौरान टायर में आग लग गई। हादसे के समय विमान में 277 यात्री और 11 क्रू मेंबर सवार थे। राहत की बात यह रही कि सभी यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। लैंडिंग के दौरान लगी आग अधिकारियों के अनुसार, Turkish Airlines की फ्लाइट TK726 इस्तांबुल से काठमांडू पहुंची थी। सुबह करीब 6:45 बजे विमान जैसे ही रनवे पर उतरा, उसके दाएं लैंडिंग गियर से धुआं और आग की लपटें दिखाई देने लगीं। स्थिति गंभीर होते देख एयरपोर्ट प्रशासन ने तुरंत इमरजेंसी अलर्ट जारी किया और फायर ब्रिगेड तथा रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंच गई। इमरजेंसी दरवाजों से निकाले गए यात्री नेपाल सिविल एविएशन अथॉरिटी के सूचना अधिकारी Gyanendra Bhul ने बताया कि आग लगने के तुरंत बाद विमान के इमरजेंसी एग्जिट खोले गए और यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकाला गया। निकासी के दौरान कुछ यात्रियों को मामूली चोटें आईं, लेकिन किसी के गंभीर रूप से घायल होने की खबर नहीं है। विमान में कुछ United Nations अधिकारी भी सवार बताए गए हैं। कुछ समय के लिए प्रभावित हुआ एयरपोर्ट संचालन घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का संचालन कुछ समय के लिए प्रभावित रहा। सुरक्षा जांच और रनवे क्लियर होने के बाद एयरपोर्ट सेवाओं को सामान्य किया गया। 2015 में भी हुआ था बड़ा हादसा यह पहला मौका नहीं है जब Turkish Airlines का विमान काठमांडू एयरपोर्ट पर हादसे का शिकार हुआ हो। साल 2015 में घने कोहरे के बीच एयरलाइन का एक विमान रनवे से फिसल गया था। उस घटना के बाद एयरपोर्ट कई दिनों तक बंद रहा था, हालांकि तब भी कोई बड़ा जानमाल का नुकसान नहीं हुआ था।
Nepal में नई सरकार ने भ्रष्टाचार और कथित राजनीतिक हस्तक्षेप पर बड़ा प्रहार करते हुए 1,500 से अधिक सार्वजनिक नियुक्तियों को एक झटके में रद्द कर दिया है। Balendra Shah के नेतृत्व वाली सरकार के इस फैसले से प्रशासनिक तंत्र में भारी उथल-पुथल मच गई है और देशभर में बहस छिड़ गई है। राष्ट्रपति के अध्यादेश से लागू हुआ फैसला राष्ट्रपति Ram Chandra Poudel ने मंत्रिमंडल की सिफारिश पर ‘सार्वजनिक पद धारकों को हटाने के लिए विशेष प्रावधानों पर अध्यादेश, 2083’ जारी किया। इस अध्यादेश के लागू होते ही 26 मार्च से पहले की गई 1,594 से अधिक नियुक्तियां तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी गईं। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ये नियुक्तियां प्रशासन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे अहम क्षेत्रों में की गई थीं, जिससे इन विभागों में अचानक रिक्तियां पैदा हो गई हैं। ‘राजनीतिक नियुक्तियों’ पर सरकार का प्रहार सरकार का दावा है कि पिछली सरकारों ने बड़े पैमाने पर राजनीतिक आधार पर नियुक्तियां की थीं, जिन्हें अब निष्प्रभावी करना जरूरी था। इस कार्रवाई का मकसद प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करना बताया जा रहा है। बताया जा रहा है कि ‘जेन-जी’ आंदोलन के बाद बनी अंतरिम व्यवस्था के दौरान भी कई नियुक्तियां की गई थीं, जिन्हें अब रद्द कर दिया गया है। ‘जेन-जी आंदोलन’ से सत्ता तक का सफर नेपाल की राजनीति में यह बड़ा बदलाव तब आया जब पारंपरिक दलों के खिलाफ जनाक्रोश बढ़ा और ‘जेन-जी’ (नई पीढ़ी) आंदोलन ने जोर पकड़ा। इसी लहर पर सवार होकर नई राजनीतिक ताकत उभरी और Balendra Shah के नेतृत्व में सरकार बनी। इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री K. P. Sharma Oli की सरकार का पतन हुआ था, जिसके बाद राजनीतिक अस्थिरता का दौर देखा गया। बड़े फैसलों से चर्चा में बालेन सरकार प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन सरकार लगातार सख्त और विवादास्पद फैसले ले रही है। काठमांडू में नदी किनारे अवैध निर्माणों पर बुलडोजर कार्रवाई शिक्षा सुधार के लिए 100 दिन का एक्शन प्लान निजी स्कूलों के नाम नेपाली भाषा में करने का निर्देश छात्र राजनीति पर रोक और सरकारी स्कूलों को बढ़ावा इसके अलावा, भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री K. P. Sharma Oli की गिरफ्तारी भी चर्चा में रही, हालांकि बाद में अदालत से उन्हें राहत मिल गई। फैसले से खड़ी हुई नई चुनौतियां सरकार के इस फैसले ने जहां एक ओर भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त संदेश दिया है, वहीं दूसरी ओर कई चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं। प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होने का खतरा स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्रों में स्टाफ की कमी बर्खास्त किए गए अधिकारियों की कानूनी चुनौती राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने की आशंका विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर नियुक्तियां रद्द करना एक साहसिक कदम जरूर है, लेकिन इसके प्रभाव को संभालना सरकार के लिए बड़ी परीक्षा होगी।
नेपाल के पहाड़ी जिले में एक भीषण सड़क हादसे ने पूरे इलाके को दहला दिया है। रोल्पा जिला में गुरुवार को श्रद्धालुओं से भरी एक जीप गहरी खाई में गिर गई, जिसमें कम से कम 17 लोगों की मौत हो गई। यह हादसा उस समय हुआ जब सभी लोग बैसाख पूर्णिमा के मौके पर धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होने जा रहे थे। हादसे का पूरा घटनाक्रम पुलिस के अनुसार, जीप थवांग ग्रामीण नगरपालिका के जलजला इलाके की तरफ बढ़ रही थी। लगातार हो रही बारिश से सड़क पूरी तरह कीचड़ में बदल चुकी थी पहाड़ी मोड़ों पर वाहन का संतुलन बिगड़ गया अचानक जीप फिसली और करीब 700 मीटर गहरी खाई में जा गिरी हादसे की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वाहन पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और कई लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। धार्मिक यात्रा पर निकले थे सभी लोग पुलिस इंस्पेक्टर सुनील थापा नेपाली ने बताया कि जीप में सवार लोग स्थानीय निवासी थे, जिन्होंने वाहन किराए पर लिया था। सभी श्रद्धालु बैसाख पूर्णिमा के अवसर पर जलजला तीर्थस्थल जा रहे थे यह क्षेत्र धार्मिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है हर साल यहां बड़ी संख्या में लोग पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं इस बार यह यात्रा कई परिवारों के लिए कभी न भूलने वाला दुख बन गई। मौत का आंकड़ा और आशंका अब तक: 17 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है कई शव बुरी तरह क्षत-विक्षत हालत में मिले यात्रियों की कुल संख्या अभी भी स्पष्ट नहीं है अधिकारियों का कहना है कि मलबे और कठिन भौगोलिक स्थिति के कारण पूरी जानकारी जुटाने में समय लग सकता है। बचाव कार्य में बड़ी चुनौतियां हादसे के तुरंत बाद राहत और बचाव कार्य शुरू किया गया, लेकिन परिस्थितियां बेहद कठिन हैं: लगातार बारिश से रास्ते फिसलन भरे खाई की गहराई और दुर्गम इलाका मशीनरी पहुंचाने में मुश्किल स्थानीय लोग और पुलिस मिलकर रेस्क्यू में जुटे मुख्य जिला अधिकारी गंगा बहादुर छेत्री ने बताया कि सूचना मिलते ही प्रशासन हरकत में आ गया और सभी एजेंसियों को मौके पर भेजा गया। नेपाल में सड़क हादसों का कड़वा सच नेपाल के पहाड़ी इलाकों में इस तरह के हादसे बार-बार सामने आते हैं। इसके पीछे कई वजहें हैं: संकरी और बिना सुरक्षा रेलिंग वाली सड़कें खराब मौसम, खासकर बारिश और भूस्खलन पुराने और ओवरलोडेड वाहन ट्रैफिक नियमों का कमजोर पालन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं होगा, तब तक ऐसे हादसे रोकना मुश्किल है। स्थानीय लोगों में शोक और गुस्सा घटना के बाद पूरे क्षेत्र में मातम पसरा हुआ है। कई परिवारों ने अपने एक से ज्यादा सदस्य खो दिए ग्रामीणों में प्रशासन के खिलाफ नाराजगी भी देखी जा रही है लोग बेहतर सड़क और सुरक्षा व्यवस्था की मांग कर रहे हैं प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती यह हादसा सरकार और प्रशासन के लिए एक चेतावनी है। जरूरी है कि: पहाड़ी सड़कों की स्थिति सुधारी जाए वाहनों की नियमित जांच हो धार्मिक आयोजनों के दौरान विशेष सुरक्षा इंतजाम किए जाएं
नेपाल और भारत के बीच लंबे समय से मजबूत व्यापारिक संबंध रहे हैं, खासकर सीमावर्ती इलाकों में। लेकिन नेपाल सरकार के एक नए कस्टम नियम ने इस संतुलन को अचानक बिगाड़ दिया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि सीमा के प्रमुख चेकप्वाइंट पर सैकड़ों कंटेनर अटक गए हैं और व्यापारिक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। क्या है पूरा मामला? नेपाल सरकार ने अपनी आय (रेवेन्यू) बढ़ाने के उद्देश्य से हाल ही में एक नया कस्टम नियम लागू किया। इस नियम के तहत: भारत से आने वाले किसी भी व्यक्ति को 100 नेपाली रुपए (NPR) से ज्यादा का सामान लाने पर कस्टम ड्यूटी देनी होगी हर सामान पर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) लिखा होना अनिवार्य किया गया कागज पर यह नियम व्यवस्थित लगता है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसे लागू करना बेहद मुश्किल साबित हुआ। बीरगंज बॉर्डर बना जाम का केंद्र इस फैसले का सबसे ज्यादा असर बीरगंज बॉर्डर पर देखने को मिला, जो भारत-नेपाल के बीच सबसे व्यस्त व्यापारिक मार्गों में से एक है। यहां करीब 600 कंटेनर फंसे हुए हैं कस्टम क्लीयरेंस में भारी देरी हो रही है ट्रकों की लंबी कतारें लग गई हैं कई दिनों तक माल सीमा पर ही रुका रह रहा है यह स्थिति सिर्फ लॉजिस्टिक समस्या नहीं, बल्कि एक बड़े आर्थिक संकट का संकेत बनती जा रही है। नियम क्यों पड़ा भारी? इस पूरे मामले में सबसे बड़ी दिक्कत MRP नियम को लेकर आई। असल में: भारत से आने वाले कई सामान (खासकर थोक या खुले उत्पाद) पर MRP नहीं लिखा होता छोटे व्यापारी या स्थानीय लोग हर सामान की कीमत का दस्तावेज नहीं रख पाते कस्टम अधिकारियों के पास इतनी बड़ी मात्रा में सामान की जांच के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं नतीजा–हर ट्रक और हर कंटेनर की जांच में समय लगने लगा, जिससे सिस्टम जाम हो गया। स्थानीय लोगों और व्यापारियों में नाराजगी सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोग रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भारत पर काफी हद तक निर्भर रहते हैं। नए नियम के बाद: छोटे स्तर का व्यापार लगभग ठप हो गया आम लोगों को जरूरी सामान लाने में दिक्कतें आने लगीं व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान होने लगा इस वजह से जगह-जगह विरोध शुरू हो गया और सरकार पर दबाव बढ़ने लगा। सरकार को क्यों लेना पड़ा यू-टर्न? बढ़ते विरोध और बिगड़ते हालात को देखते हुए नेपाल सरकार को अपने फैसले में ढील देनी पड़ी। अब सरकार ने कुछ राहत उपाय लागू किए हैं: लोग खुद अपने सामान की कीमत (MRP) घोषित कर सकते हैं उसी आधार पर कस्टम क्लियरेंस मिलेगा उद्योगों के कच्चे माल और जल्दी खराब होने वाले सामान (फल, सब्जी आदि) को अस्थायी छूट दी गई है हालांकि यह राहत अस्थायी है, लेकिन इससे कुछ हद तक स्थिति सामान्य होने की उम्मीद है। आर्थिक और कूटनीतिक असर इस पूरे घटनाक्रम का असर सिर्फ सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक प्रभाव हो सकते हैं: व्यापार पर असर: भारत-नेपाल के बीच छोटे और मध्यम व्यापार पर बड़ा झटका सप्लाई चेन बाधित: जरूरी सामान की उपलब्धता प्रभावित कीमतों में बढ़ोतरी: बाजार में वस्तुओं के दाम बढ़ सकते हैं कूटनीतिक संकेत: दोनों देशों के बीच व्यापारिक नीतियों पर नए सिरे से चर्चा की जरूरत आगे की चुनौती नेपाल सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह: राजस्व बढ़ाने की अपनी नीति को जारी रखे साथ ही व्यापार और आम लोगों की जरूरतों को भी संतुलित करे
भ्रष्टाचार आरोपों के बीच अचानक इस्तीफा Sudhan Gurung ने गृहमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। उनका नाम कथित तौर पर वित्तीय लेनदेन और मनी लॉन्ड्रिंग जांच से जुड़े मामलों में सामने आने के बाद यह कदम उठाया गया। नेपाल की राजनीति में यह घटनाक्रम बड़ा माना जा रहा है, क्योंकि गुरुंग सरकार के सबसे मुखर चेहरों में गिने जाते थे। पीएम को सौंपा इस्तीफा, खुद संभालेंगे मंत्रालय सूत्रों के मुताबिक, Sudhan Gurung ने अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री Balendra Shah को सौंप दिया है। फिलहाल गृहमंत्रालय की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री खुद संभालेंगे। गुरुंग ने 27 मार्च को ही इस पद की जिम्मेदारी संभाली थी, लेकिन एक महीने के भीतर ही विवादों में घिर गए। पावर ब्रोकर से संबंधों के आरोप मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि गुरुंग का नाम Dipak Bhatta से जुड़ा है, जिन पर सरकारी ठेकों और फैसलों को प्रभावित करने के आरोप हैं। बताया जा रहा है कि यह मामला उस समय का भी है जब K P Sharma Oli देश के प्रधानमंत्री थे। ‘जनता का भरोसा सबसे जरूरी’ – गुरुंग इस्तीफा देते हुए गुरुंग ने कहा कि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने और हितों के टकराव से बचने के लिए उन्होंने यह फैसला लिया है। उन्होंने कहा, “सार्वजनिक जीवन में सबसे बड़ी ताकत नैतिकता और लोगों का भरोसा है, इससे बड़ा कुछ नहीं।” पहले भी विवादों में रहे गुरुंग पूर्व डीजे और सामाजिक कार्यकर्ता रहे गुरुंग अपने बेबाक बयानों के लिए जाने जाते हैं। वे 2025 में भ्रष्टाचार विरोधी “Gen Z” आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल थे। हालांकि, उनके काम करने के तरीके और प्रशासन में दखल को लेकर पुलिस नेतृत्व के साथ मतभेद भी सामने आए थे।
नेपाल की राजनीति में एक बड़ा और चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है। Sher Bahadur Deuba, जो पांच बार देश के प्रधानमंत्री रह चुके हैं, उनके खिलाफ Kathmandu की जिला अदालत ने गिरफ्तारी वारंट जारी किया है। यह मामला कथित मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध धन लेन-देन से जुड़ा बताया जा रहा है। पत्नी पर भी कार्रवाई, जांच तेज अदालत ने देउबा के साथ उनकी पत्नी और पूर्व विदेश मंत्री Arzu Rana Deuba के खिलाफ भी वारंट जारी किया है। मनी लॉन्ड्रिंग जांच विभाग की मांग पर यह कदम उठाया गया, जिससे साफ है कि एजेंसियां इस मामले को गंभीरता से आगे बढ़ा रही हैं। विदेश में हैं देउबा दंपति सूत्रों के अनुसार, देउबा और उनकी पत्नी फिलहाल नेपाल से बाहर हैं। वे पहले इलाज के लिए सिंगापुर गए थे और अब उनके हांगकांग में होने की खबर है। ऐसे में नेपाल सरकार इंटरपोल के जरिए रेड नोटिस जारी कर उन्हें वापस लाने की तैयारी कर रही है। अन्य पूर्व प्रधानमंत्रियों पर भी जांच इस मामले में सिर्फ देउबा ही नहीं, बल्कि KP Sharma Oli और Pushpa Kamal Dahal जैसे बड़े नेताओं के नाम भी जांच के दायरे में बताए जा रहे हैं। इससे नेपाल की राजनीति में हलचल और तेज हो गई है। जले हुए नोटों से खुला मामला पिछले साल हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान कुछ नेताओं के आवासों से जले हुए नोटों की तस्वीरें और वीडियो सामने आए थे। शुरुआती संदेह था कि ये तस्वीरें AI से बनाई गई हो सकती हैं, लेकिन फोरेंसिक जांच में नोट असली पाए गए। इसके बाद मामले ने गंभीर रूप ले लिया और जांच एजेंसियां सक्रिय हो गईं। क्या है राजनीतिक असर? देउबा नेपाल की राजनीति का बड़ा चेहरा रहे हैं और 1990 के दशक से लगातार सक्रिय रहे हैं। ऐसे में उनके खिलाफ यह कार्रवाई न सिर्फ कानूनी, बल्कि राजनीतिक रूप से भी बड़ा झटका मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला आने वाले समय में नेपाल की सत्ता और राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी होना नेपाल के लिए एक असाधारण स्थिति है। अब सबकी नजर इस पर टिकी है कि क्या देउबा दंपति देश लौटेंगे और जांच का सामना करेंगे या मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और जटिल होगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।