अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के खिलाफ प्रस्तावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल कुछ समय के लिए टाल दिया है। ट्रंप ने कहा कि खाड़ी देशों के शीर्ष नेताओं की अपील और ईरान के साथ जारी गंभीर बातचीत को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। ट्रंप के मुताबिक, Tamim bin Hamad Al Thani, Mohammed bin Salman और Mohammed bin Zayed Al Nahyan ने उनसे सीधे संपर्क कर सैन्य कार्रवाई को कुछ दिनों के लिए टालने का अनुरोध किया था। “समझौते की संभावना बढ़ी” ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर जारी बयान में कहा कि खाड़ी देशों की ईरान के साथ “गंभीर बातचीत” चल रही है और कूटनीतिक समाधान की संभावना पहले से अधिक मजबूत दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि इन देशों का मानना है कि यदि अमेरिका कुछ समय इंतजार करे तो बातचीत के जरिए ऐसा समझौता हो सकता है, जिससे ईरान परमाणु हथियार हासिल न कर सके। “उम्मीद है हमला हमेशा के लिए टल जाए” ट्रंप ने कहा कि उन्होंने सैन्य कार्रवाई को “कुछ समय के लिए” रोका है और उम्मीद जताई कि शायद इसकी जरूरत कभी न पड़े। उन्होंने कहा, “अगर बिना बमबारी के मामला सुलझ जाए तो मुझे बहुत खुशी होगी।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बातचीत विफल रहती है तो अमेरिका बड़े सैन्य अभियान के लिए तैयार रहेगा। अमेरिकी सेना को अलर्ट रहने के निर्देश ट्रंप ने बताया कि उन्होंने अमेरिकी रक्षा मंत्री Pete Hegseth, ज्वाइंट चीफ्स चेयरमैन Daniel Caine और अमेरिकी सेना को किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार रहने के निर्देश दिए हैं। खाड़ी देशों में बढ़ी चिंता पिछले कुछ महीनों में कतर, सऊदी अरब और यूएई पर ईरान समर्थित हमलों का दबाव बढ़ा है। ईरान ने 28 फरवरी के बाद हुए हमलों के जवाब में अमेरिकी सहयोगी देशों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की चेतावनी दी थी। ऐसे में खाड़ी देशों का एकजुट होकर अमेरिका से सैन्य कार्रवाई टालने का अनुरोध करना क्षेत्रीय तनाव को कम करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। पाकिस्तान फिर मध्यस्थ की भूमिका में रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। बताया गया है कि ईरान का संशोधित शांति प्रस्ताव पाकिस्तान के जरिए अमेरिका तक पहुंचाया गया। हालांकि अमेरिकी प्रशासन इस प्रस्ताव से पूरी तरह संतुष्ट नहीं बताया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, नए प्रस्ताव में पहले की तुलना में केवल सीमित बदलाव किए गए हैं। परमाणु कार्यक्रम बना सबसे बड़ा विवाद अमेरिका और ईरान के बीच मुख्य विवाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बना हुआ है। अमेरिका का दावा है कि ईरान के पास बड़ी मात्रा में संवर्धित यूरेनियम मौजूद है और वह परमाणु हथियार क्षमता की दिशा में बढ़ सकता है। वहीं ईरान ने यूरेनियम संवर्धन के अधिकार से पीछे हटने से इनकार कर दिया है। तेहरान प्रतिबंधों में राहत, जब्त संपत्तियों की वापसी और भविष्य में सैन्य कार्रवाई न होने की गारंटी की मांग कर रहा है। CENTCOM ने जारी रखी नाकेबंदी इस बीच United States Central Command (CENTCOM) ने कहा है कि अमेरिकी सेना ईरानी बंदरगाहों पर लागू प्रतिबंधों को सख्ती से लागू कर रही है। CENTCOM के अनुसार, अब तक 85 व्यावसायिक जहाजों का रास्ता बदला जा चुका है ताकि अमेरिकी प्रतिबंधों और नाकेबंदी का पालन सुनिश्चित किया जा सके। कूटनीति और सैन्य दबाव दोनों जारी अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन अब भी बातचीत के जरिए समाधान चाहता है, लेकिन साथ ही सैन्य विकल्पों को भी खुला रखा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ दिन पश्चिम एशिया की स्थिति के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के नए बातचीत प्रस्ताव को साफ तौर पर खारिज कर दिया है। इससे पहले पाकिस्तान की मध्यस्थता से आए इस ऑफर को लेकर कुछ उम्मीदें जगी थीं, लेकिन अब हालात फिर से तनावपूर्ण हो गए हैं। ट्रंप का सख्त रुख डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान द्वारा रखी गई शर्तें अमेरिका के लिए स्वीकार्य नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान भले ही समझौता करना चाहता है, लेकिन उसकी मांगें ऐसी हैं जिन पर सहमति संभव नहीं है। ट्रंप ने ईरानी नेतृत्व को “बिखरा हुआ” बताते हुए कहा कि वहां अलग-अलग गुटों में तालमेल की कमी है, जिससे बातचीत और भी मुश्किल हो रही है। सबसे बड़ी शर्त: परमाणु हथियार डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर दोहराया कि उनकी सबसे बड़ी शर्त यह है कि ईरान किसी भी हाल में परमाणु हथियार विकसित न करे। उनका कहना है कि बिना इस शर्त को माने कोई भी डील संभव नहीं है। वहीं ईरान लंबे समय से दावा करता रहा है कि उसका यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देश इसे परमाणु हथियार की दिशा में संभावित कदम मानते हैं। ट्रंप ने बताए दो विकल्प ट्रंप ने कहा कि अमेरिका के सामने दो ही रास्ते हैं– या तो सैन्य कार्रवाई या फिर बातचीत के जरिए समाधान उन्होंने कहा कि अमेरिका “सीधा हमला करके समस्या खत्म कर सकता है”, लेकिन वे इंसानियत के आधार पर बातचीत को प्राथमिकता देना चाहते हैं। पाकिस्तान की मध्यस्थता और बातचीत इस पूरे विवाद में पाकिस्तान की मध्यस्थता भी चर्चा में रही है। ट्रंप ने संकेत दिया कि बातचीत जारी रखने में पाकिस्तान की भूमिका अहम रही है और फोन पर लगातार संवाद हो रहा है। हालांकि, इसके बावजूद किसी अंतिम समझौते की संभावना अभी कमजोर दिख रही है। समझौते की उम्मीद कम ट्रंप ने माना कि बातचीत में कुछ प्रगति हुई है, लेकिन उन्हें नहीं लगता कि यह किसी अंतिम समझौते तक पहुंचेगी। उनके अनुसार, ईरान ऐसी मांगें रख रहा है जिन्हें अमेरिका स्वीकार नहीं कर सकता, इसलिए डील अभी काफी दूर है। तनाव क्यों बढ़ रहा है? विशेषज्ञों के अनुसार, तनाव की सबसे बड़ी वजह ईरान का यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम और अमेरिका की सख्त नीति है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह सीमित करे, जबकि ईरान इसे अपना अधिकार बताता है।
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच Donald Trump ने ईरान को कड़ा संदेश दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने साफ चेतावनी दी है कि अगर तेहरान ने जल्द समझौता नहीं किया, तो उसकी तेल आपूर्ति व्यवस्था गंभीर संकट में पड़ सकती है। “तीन दिन का समय, नहीं तो बड़ा नुकसान” फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में Donald Trump ने कहा कि ईरान के पास समझौते के लिए केवल तीन दिन हैं। उनका दावा है कि अगर ईरान तेल निर्यात जारी नहीं रख पाया, तो उसकी पाइपलाइनें तकनीकी और प्राकृतिक कारणों से खराब होकर फट सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि एक बार नुकसान होने के बाद ईरान अपनी पाइपलाइन क्षमता को पूरी तरह बहाल नहीं कर पाएगा और उत्पादन करीब 50% तक सीमित हो सकता है। बातचीत के लिए अमेरिका की शर्त Donald Trump ने दोहराया कि अगर ईरान बातचीत करना चाहता है, तो उसे खुद पहल करनी होगी। उन्होंने कहा कि तेहरान सीधे वॉशिंगटन से संपर्क कर सकता है—“फोन मौजूद हैं और सुरक्षित लाइनें भी।” पाकिस्तान में बढ़ी कूटनीतिक हलचल इस बीच अब्बास अराघची एक बार फिर पाकिस्तान पहुंचे हैं। तीन दिनों में यह उनका दूसरा दौरा है, जहां उन्होंने आर्मी चीफ असीम मुनीर और अन्य अधिकारियों से मुलाकात की। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने पाकिस्तान के जरिए अमेरिका को कुछ अहम मुद्दों पर लिखित संदेश भी भेजा है, जिससे संकेत मिलता है कि बैक-चैनल डिप्लोमेसी जारी है। रूस भी बना अहम खिलाड़ी कूटनीतिक प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए अब्बास अराघची अब रूस के दौरे पर जा रहे हैं, जहां उनकी मुलाकात राष्ट्रपति Vladimir Putin से होने वाली है। क्या बढ़ेगा टकराव या बनेगी डील? एक तरफ Donald Trump का सख्त अल्टीमेटम है, तो दूसरी ओर ईरान लगातार कूटनीतिक रास्ते तलाश रहा है। ऐसे में सवाल यही है कि क्या दोनों देशों के बीच समझौता होगा या तनाव और गहराएगा।
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका को एक नया शांति प्रस्ताव भेजा है, जिसने वैश्विक कूटनीति में हलचल मचा दी है। यह प्रस्ताव पाकिस्तान के जरिए वॉशिंगटन तक पहुंचाया गया है और इसमें दो चरणों में तनाव कम करने की रणनीति सामने रखी गई है। क्या है ईरान का नया प्रस्ताव? रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने सबसे पहले दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग Strait of Hormuz को खोलने की बात कही है। इसके बाद दूसरे चरण में परमाणु मुद्दे पर बातचीत करने का प्रस्ताव रखा गया है। ईरान का मानना है कि पहले समुद्री व्यापार सामान्य होना चाहिए और क्षेत्र में सैन्य तनाव कम होना जरूरी है, तभी परमाणु वार्ता सार्थक हो सकती है। ट्रंप का सख्त रुख दूसरी ओर Donald Trump ने साफ कर दिया है कि अगर तेहरान बातचीत करना चाहता है, तो उसे सीधे वॉशिंगटन से संपर्क करना होगा। उन्होंने यह भी दोहराया कि ईरान को किसी भी हाल में परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका चाहता है कि ईरान कम से कम 10 साल तक यूरेनियम संवर्धन बंद करे और अपने मौजूदा स्टॉक को देश से बाहर भेजे। पाकिस्तान की भूमिका और कूटनीतिक हलचल इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची हाल ही में इस्लामाबाद के कई दौरों पर रहे हैं, जहां उन्होंने पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व से बातचीत की। इसके साथ ही वे जल्द ही रूस के दौरे पर भी जाएंगे और राष्ट्रपति Vladimir Putin से मुलाकात करेंगे, जिससे यह संकेत मिलता है कि ईरान इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है। क्या बन सकती है डील? कूटनीतिक सूत्रों का मानना है कि एक संभावित फ्रेमवर्क तैयार किया जा रहा है, जिसमें न सिर्फ अमेरिका और ईरान, बल्कि खाड़ी देश भी शामिल हो सकते हैं। हालांकि, परमाणु मुद्दे पर दोनों देशों के बीच मतभेद अभी भी सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं। Strait of Hormuz से दुनिया का करीब 20% तेल गुजरता है, ऐसे में इसका खुलना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है। यही वजह है कि इस प्रस्ताव पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।
इस्लामाबाद पहुंचा ईरानी प्रतिनिधिमंडल ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच कूटनीतिक हल तलाशने की कोशिशें तेज हो गई हैं। ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi शुक्रवार को एक वरिष्ठ प्रतिनिधिमंडल के साथ इस्लामाबाद पहुंचे। हालांकि, तेहरान ने स्पष्ट कर दिया है कि इस बार अमेरिका के साथ कोई सीधी बातचीत नहीं होगी। अराघची अपने दौरे के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif, सेना प्रमुख Asim Munir और विदेश मंत्री Ishaq Dar से मुलाकात करेंगे। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmaeil Baqaei ने कहा कि पाकिस्तान ही तेहरान की चिंताओं और प्रस्तावों को वॉशिंगटन तक पहुंचाएगा। हॉर्मुज और परमाणु मुद्दे पर टिकी निगाहें दूसरी ओर, अमेरिका भी वार्ता को फिर से शुरू करने की तैयारी कर रहा है। अमेरिकी विशेष दूत Steve Witkoff और Jared Kushner के जल्द इस्लामाबाद पहुंचने की संभावना है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा है कि ईरान अमेरिकी मांगों को ध्यान में रखते हुए एक नया प्रस्ताव तैयार कर रहा है। अमेरिका की प्रमुख शर्तों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण और Strait of Hormuz में जहाजों की निर्बाध आवाजाही शामिल है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव ने वैश्विक तेल बाजारों और समुद्री व्यापार को प्रभावित किया है। ऐसे में पाकिस्तान की मध्यस्थता से दोनों देशों के बीच जमी बर्फ पिघलने की उम्मीद बढ़ गई है।
सीजफायर के बीच फिर शुरू हो सकती है बातचीत Donald Trump ने ईरान-अमेरिका तनाव के बीच बड़ा संकेत देते हुए कहा है कि अगले 36 से 72 घंटों में शांति वार्ता को लेकर “अच्छी खबर” आ सकती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों देशों के बीच दूसरी दौर की बातचीत की संभावना बन रही है, हालांकि स्थिति अभी भी अनिश्चित बनी हुई है। पाकिस्तान बना मध्यस्थ, बैकचैनल बातचीत तेज Pakistan इस पूरे मामले में अहम भूमिका निभा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इस्लामाबाद के जरिए बैकचैनल डिप्लोमेसी जारी है, जिससे बातचीत दोबारा शुरू होने की उम्मीद बढ़ी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों पक्षों के बीच सीजफायर अभी तक काफी हद तक कायम है, जो सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। ईरान से ‘एकजुट प्रस्ताव’ का इंतजार Donald Trump ने हाल ही में सीजफायर को आगे बढ़ाने का ऐलान किया था और कहा था कि अमेरिका, Iran की ओर से एक “संयुक्त प्रस्ताव” का इंतजार कर रहा है। इसके बाद ही आगे की वार्ता शुरू होगी। हालांकि, ईरान ने अभी तक नए दौर की बातचीत में शामिल होने की पुष्टि नहीं की है। होर्मुज जलडमरूमध्य में हमले, बढ़ी चिंता इस बीच Strait of Hormuz में हालात फिर तनावपूर्ण हो गए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने तीन जहाजों पर हमला किया, जिनमें से दो को कब्जे में ले लिया गया। यह इलाका दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है, ऐसे में यहां बढ़ती गतिविधियां वैश्विक चिंता का कारण बन रही हैं। लेबनान में भी जारी हिंसा Lebanon में भी स्थिति स्थिर नहीं है। दक्षिणी इलाके में एक वाहन पर हुए हमले में दो लोगों की मौत हो गई। यह हमला सीजफायर लागू होने के बावजूद हुआ, जिससे क्षेत्रीय शांति पर सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों की राय: उम्मीद और खतरे दोनों विशेषज्ञों का मानना है कि एक तरफ बातचीत की संभावना बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर जारी हिंसा शांति प्रक्रिया को कमजोर कर सकती है। अगर अगले 72 घंटों में सकारात्मक संकेत मिलते हैं, तो यह मिडिल ईस्ट में तनाव कम करने की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है।
Iran US Tension: ईरान और अमेरिका के बीच संभावित बातचीत की अटकलों के बीच तेहरान ने सख्त रुख अपनाया है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिकी दबाव और धमकियों के बीच किसी भी वार्ता को स्वीकार नहीं करेगा। ईरान का तीखा बयान ईरानी संसद (मजलिस) के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अमेरिका पर तीखा हमला बोला। उन्होंने लिखा: “ट्रंप घेराबंदी और युद्धविराम तोड़कर बातचीत की मेज़ को आत्मसमर्पण की मेज़ बनाना चाहते हैं या फिर युद्ध को सही ठहराना चाहते हैं।” ग़ालिबाफ़ ने साफ कहा कि ईरान “धमकियों के साये में बातचीत” नहीं करेगा। ‘मैदान-ए-जंग में नए पत्ते खोलने की तैयारी’ ग़ालिबाफ़ ने अपने बयान में संकेत दिया कि ईरान सैन्य विकल्पों के लिए भी तैयार है। उन्होंने कहा: “पिछले दो हफ्तों से हमने मैदान-ए-जंग में नए पत्ते खोलने की तैयारी कर ली है।” यह बयान ऐसे समय आया है जब क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है। ट्रंप की रणनीति पर सवाल अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump लगातार ईरान पर दबाव बना रहे हैं और समझौते की बात कर रहे हैं। लेकिन ईरान का आरोप है कि: अमेरिका एक तरफ बातचीत की बात करता है दूसरी तरफ सैन्य दबाव और नाकेबंदी जारी रखता है पाकिस्तान में वार्ता पर अनिश्चितता Islamabad में दूसरे दौर की बातचीत की तैयारियां चल रही हैं। अमेरिका ने अपना प्रतिनिधिमंडल भेजने की बात कही है। हालांकि, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmail Baghaei ने कहा: अभी तक वार्ता को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है ईरान फिलहाल स्थिति का आकलन कर रहा है पहले दौर की बातचीत का संदर्भ ईरान और अमेरिका के बीच पहले दौर की बातचीत पहले ही हो चुकी है, जिसमें Mohammad Bagher Ghalibaf ने ईरान का नेतृत्व किया था। हालांकि, वह वार्ता किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी।
US Iran War: ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। इस्लामाबाद में प्रस्तावित दूसरे दौर की वार्ता फिलहाल स्थगित हो गई है, क्योंकि ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह फिलहाल किसी भी बातचीत में शामिल होने के मूड में नहीं है। इसी बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच फोन पर बातचीत की खबर सामने आई है। ईरान ने बातचीत से किया इनकार ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने साफ कहा है कि तेहरान के पास फिलहाल अमेरिका के साथ किसी भी नए दौर की वार्ता की कोई योजना नहीं है। यह बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान में शांति वार्ता की कोशिशें तेज थीं और मध्यस्थता की तैयारी चल रही थी। मुनीर-ट्रंप फोन कॉल में क्या हुआ? रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बातचीत की। इस बातचीत में बताया गया कि: होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव वार्ता के लिए सबसे बड़ा रोड़ा है ईरान की स्थिति के कारण बातचीत आगे बढ़ना मुश्किल हो रहा है बताया जा रहा है कि ट्रंप ने इस मुद्दे पर “गंभीरता से विचार करने” की बात कही है। होर्मुज संकट बना मुख्य वजह होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका और ईरान दोनों एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। हाल ही में: अमेरिका ने ईरानी ध्वज वाले मालवाहक पोत को रोका ईरान ने इसे “समुद्री डकैती” बताया दोनों देशों के बीच समुद्री तनाव और बढ़ गया अमेरिकी कार्रवाई और ईरान की चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार, ईरानी जहाज “तुस्का” को रुकने की चेतावनी दी गई और फिर उसे नियंत्रित कर लिया गया। अमेरिका का दावा है कि: जहाज प्रतिबंधों से बचने की कोशिश कर रहा था अमेरिकी मरीन ने उसे सुरक्षित रूप से कब्जे में लिया वहीं ईरान ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी है। पहली बार नाकेबंदी के बाद बड़ी घटना अमेरिकी नाकेबंदी अभियान शुरू होने के बाद यह पहली बड़ी घटना है जब किसी ईरानी पोत को सीधे रोका गया है। ईरान का कहना है कि यह: समुद्री डकैती जैसा कदम है और युद्धविराम की शर्तों का उल्लंघन है सीजफायर पर भी खतरा ईरान और अमेरिका के बीच जारी 14 दिनों का सीजफायर 22 अप्रैल को खत्म हो रहा है। ऐसे में: वार्ता की अनिश्चितता बढ़ गई है होर्मुज तनाव ने स्थिति और जटिल बना दी है पाकिस्तान की मध्यस्थता पर भी सवाल उठ रहे हैं
Iran US Ceasefire: ईरान और अमेरिका के बीच जारी 14 दिनों का युद्धविराम 22 अप्रैल को खत्म होने वाला है। ऐसे में दोनों देशों के बीच नए दौर की बातचीत की तैयारी तेज हो गई है। लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव और ईरानी जहाज की कथित जब्ती के बाद हालात फिर से अनिश्चित हो गए हैं। पाकिस्तान इस बातचीत का मध्यस्थ बनकर एक बार फिर शांति वार्ता कराने की कोशिश कर रहा है, लेकिन मौजूदा हालात इसे मुश्किल बना रहे हैं। होर्मुज तनाव से बढ़ी चिंता हाल ही में अमेरिका द्वारा एक ईरानी ध्वज वाले मालवाहक जहाज को रोककर जब्त करने के बाद ईरान ने कड़ा विरोध जताया है। अमेरिका का दावा है कि यह जहाज उसके लगाए गए प्रतिबंधों से बचने की कोशिश कर रहा था। इस कार्रवाई के बाद ईरान की संयुक्त सैन्य कमान ने जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। वहीं, ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री से बातचीत में कहा कि अमेरिका का रवैया “दोहरा और अस्थिर” है। ईरान का सख्त रुख: अभी कोई वार्ता नहीं ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल अमेरिका के साथ किसी भी तरह की बातचीत की कोई योजना नहीं है। उन्होंने कहा: “अभी हमारे पास अगले दौर की वार्ता के लिए कोई निर्णय नहीं है।” यह बयान उस समय आया है जब पाकिस्तान में दूसरे दौर की बातचीत की तैयारी चल रही थी। ट्रंप की चेतावनी से बढ़ा तनाव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका ने ईरान को एक “बेहतरीन डील” दी है और अब फैसला ईरान को करना है। ट्रंप ने चेतावनी देते हुए कहा: ईरान या तो समझौता करे या फिर “तबाही” के लिए तैयार रहे अमेरिकी सेना ईरान के पावर प्लांट और पुलों को निशाना बना सकती है उनके इस बयान ने तनाव और बढ़ा दिया है। बातचीत में सबसे बड़ा रोड़ा क्या है? ईरान का आरोप है कि अमेरिका लगातार युद्धविराम की शर्तों का उल्लंघन कर रहा है। इनमें शामिल हैं: ईरानी जहाजों पर कार्रवाई समुद्री रास्तों पर दबाव क्षेत्रीय संघर्षों में हस्तक्षेप ईरान का कहना है कि इन हालात में बातचीत का माहौल नहीं बन पा रहा है। पाकिस्तान की कूटनीतिक कोशिशें तेज पाकिस्तान एक बार फिर मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। पिछले 24 घंटों में पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान दोनों से संपर्क तेज कर दिए हैं। पाक गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने ईरानी दूतावास का दौरा किया ईरान को बातचीत के लिए मनाने की कोशिश जारी दूसरे दौर की बैठक की तैयारी चल रही है पहली वार्ता रही थी बेनतीजा 11–12 अप्रैल को इस्लामाबाद में दोनों देशों के बीच 21 घंटे लंबी बातचीत हुई थी, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। अब सभी की नजरें दूसरे दौर की संभावित बैठक पर टिकी हैं, जो या तो तनाव कम कर सकती है या हालात और बिगाड़ सकती है।
तेहरान में उच्चस्तरीय मुलाकात पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर अपने महत्वपूर्ण विदेश दौरे पर ईरान की राजधानी तेहरान पहुंचे, जहां उनका स्वागत ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने किया। यह मुलाकात केवल औपचारिक नहीं बल्कि क्षेत्रीय राजनीति में एक अहम कूटनीतिक संकेत के रूप में देखी जा रही है। वार्ता के नए दौर की तैयारी सूत्रों के अनुसार, इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य अमेरिका और ईरान के बीच संभावित दूसरे दौर की बातचीत के लिए आधार तैयार करना है। इससे पहले हुई चर्चाएं किसी ठोस समझौते तक नहीं पहुंच पाई थीं, जिसके बाद तनाव लगातार बढ़ता गया। अब पाकिस्तान की भूमिका एक मध्यस्थ के रूप में फिर से सामने आ रही है, जो दोनों देशों के बीच संवाद को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। बैकचैनल डिप्लोमेसी में पाकिस्तान की सक्रिय भूमिका हाल के महीनों में अमेरिका और ईरान के बीच सीधे संवाद लगभग ठप पड़े थे, जिसके बाद बैकचैनल डिप्लोमेसी को फिर से सक्रिय करने की कोशिशें शुरू हुईं। पाकिस्तान ने इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और दोनों पक्षों के बीच भरोसा बनाने का प्रयास किया है। पाकिस्तानी अधिकारियों का मानना है कि अगर यह संवाद आगे बढ़ता है, तो ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर समाधान निकल सकता है। इस्लामाबाद शांति वार्ता की पृष्ठभूमि इस पूरे घटनाक्रम की नींव 11 और 12 अप्रैल को हुई इस्लामाबाद शांति वार्ता से जुड़ी है। यह बैठक बेहद अहम मानी गई क्योंकि यह 1979 की ईरानी क्रांति के बाद पहली बार था जब अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि आमने-सामने बातचीत के लिए बैठे थे। हालांकि यह वार्ता किसी अंतिम समझौते तक नहीं पहुंच सकी, लेकिन इसे एक शुरुआती और ऐतिहासिक प्रयास के रूप में देखा गया, जिसने आगे बातचीत की संभावना को पूरी तरह खत्म नहीं होने दिया। खाड़ी क्षेत्र में तनाव और कूटनीतिक दबाव पिछले कुछ हफ्तों से खाड़ी क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ा हुआ है, खासकर हॉर्मुज जलडमरूमध्य और ईरान-अमेरिका संबंधों को लेकर। ऐसे माहौल में पाकिस्तान की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि वह दोनों देशों के बीच संवाद का एक भरोसेमंद माध्यम बनकर उभर रहा है। विशेषज्ञों की राय अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि आसिम मुनीर की यह यात्रा केवल एक औपचारिक कूटनीतिक कदम नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती है। अगर बातचीत सफल होती है, तो इससे न केवल ईरान-अमेरिका तनाव कम होगा बल्कि वैश्विक ऊर्जा संकट पर भी असर पड़ सकता है। ईरान दौरे पर गए पाक सेना प्रमुख की यह पहल एक बार फिर यह संकेत देती है कि कूटनीतिक रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। हालांकि हालात अभी भी जटिल हैं, लेकिन बातचीत और मध्यस्थता की कोशिशें यह उम्मीद जरूर जगा रही हैं कि खाड़ी क्षेत्र में तनाव को कम किया जा सकता है।
तेहरान/इस्लामाबाद: अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव को कम करने के लिए पाकिस्तान ने सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी है। इसी कड़ी में पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ तेहरान पहुंचे हैं। तेहरान में हाई-लेवल बातचीत तेहरान में आसिम मुनीर का स्वागत ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने किया। यह मुलाकात अमेरिका-ईरान के बीच होने वाले दूसरे दौर की वार्ता को सफल बनाने की दिशा में अहम मानी जा रही है। अराघची ने सोशल मीडिया पर पाकिस्तान की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि इस पहल से पश्चिम एशिया में शांति कायम करने की उम्मीद बढ़ी है। शांति के लिए पाकिस्तान की कूटनीति पाकिस्तान खुद को एक मध्यस्थ (Mediator) के तौर पर पेश कर रहा है। इससे पहले इस्लामाबाद में दोनों देशों के बीच शुरुआती बातचीत भी कराई गई थी। अब इस पूरी प्रक्रिया का लक्ष्य है— अमेरिका और ईरान के बीच गतिरोध खत्म करना एक स्थायी समझौते की दिशा में बढ़ना क्षेत्र में युद्ध की संभावना को टालना 21 अप्रैल को खत्म होगा सीजफायर इस बीच डोनाल्ड ट्रंप का रुख सख्त नजर आ रहा है। उन्होंने संकेत दिया है कि वह मौजूदा सीजफायर को आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं, जो 21 अप्रैल को समाप्त होने वाला है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले दिनों में बातचीत से कोई बड़ा और सकारात्मक नतीजा निकल सकता है। सऊदी अरब भी बना अहम कड़ी दूसरी ओर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सऊदी अरब के जेद्दा में क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाकात की। इस दौरान: शांति प्रयासों पर चर्चा हुई पाकिस्तान ने दावा किया कि उसकी कोशिशों से ही सीजफायर संभव हुआ स्थायी समझौते की दिशा में सहयोग की बात हुई आगे क्या? पश्चिम एशिया की नजर अब अमेरिका-ईरान के बीच होने वाली अगली बातचीत पर टिकी है। अगर बातचीत सफल रही, तो क्षेत्र में स्थायी शांति की राह खुल सकती है। लेकिन अगर वार्ता विफल होती है और सीजफायर खत्म होता है, तो तनाव एक बार फिर बढ़ सकता है। फिलहाल, पाकिस्तान की मध्यस्थता इस पूरे घटनाक्रम में एक अहम कड़ी बनकर उभर रही है।
तेहरान: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका और इजरायल पर गंभीर आरोप लगाते हुए पड़ोसी देशों से अहम अपील की है। ईरान का कहना है कि अमेरिका और इजरायल क्षेत्र में अस्थिरता फैला रहे हैं और उन्हें यहां के लोगों की सुरक्षा से कोई मतलब नहीं है। ‘हमले के लिए अपनी जमीन न दें’ ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने साफ कहा कि पड़ोसी देश अपनी जमीन, समुद्र या हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए न होने दें। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि कुछ देशों ने “अनजाने में” अपनी सुविधाओं का गलत इस्तेमाल होने दिया है, जिसे तुरंत रोका जाना चाहिए। ‘अमेरिका-इजरायल से शांति को खतरा’ ईरान का आरोप है कि पिछले 40 दिनों की घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि अमेरिका और इजरायल की नीतियां क्षेत्र में शांति के बजाय तनाव बढ़ाने वाली हैं। तेहरान ने दोहराया कि वह अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध और संप्रभुता के सम्मान में विश्वास रखता है, लेकिन किसी भी तरह की सैन्य साझेदारी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। पाकिस्तान के जरिए बातचीत की कोशिश तनाव के बीच कूटनीतिक प्रयास भी तेज हो गए हैं। पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर तेहरान पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से हुई। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान, वॉशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत का नया रास्ता निकालने की कोशिश कर रहा है। ट्रंप का रुख सख्त वहीं डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि वह सीजफायर बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं, हालांकि उन्होंने बातचीत के जरिए समाधान की उम्मीद जताई है। डिप्लोमैटिक सूत्रों के मुताबिक, आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर बड़ा अपडेट सामने आ सकता है। बढ़ सकता है क्षेत्रीय तनाव मिडिल ईस्ट में हालात तेजी से बदल रहे हैं। एक तरफ सैन्य तनाव बना हुआ है, तो दूसरी तरफ कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं। अब नजर इस बात पर है कि क्या बातचीत के जरिए समाधान निकलता है या क्षेत्र में टकराव और गहराता है।
ईरान और अमेरिका के बीच हालिया युद्धविराम ने वैश्विक राजनीति में नया मोड़ ला दिया है। शुरुआती तौर पर जहां इस सीजफायर का श्रेय Shehbaz Sharif और पाकिस्तान की मध्यस्थता को दिया गया, वहीं अब नई रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि असल ‘गेम चेंजर’ China रहा। रिपोर्ट के मुताबिक, एक महीने तक चले संघर्ष के दौरान चीन ने खुलकर कोई भूमिका नहीं निभाई, लेकिन आखिरी समय में उसकी ‘डिस्क्रीट डिप्लोमेसी’ यानी पर्दे के पीछे की बातचीत ने हालात बदल दिए। जब युद्ध तेज होने की कगार पर था और Donald Trump ने सख्त चेतावनी दी, उसी दौरान चीन ने सीधे हस्तक्षेप कर ईरान को वार्ता के लिए तैयार किया। 10 घंटे में बदला खेल बताया जा रहा है कि ट्रंप की कड़ी चेतावनी के बाद महज 10 घंटों में हालात पूरी तरह बदल गए। ईरान ने न केवल सीजफायर पर सहमति दी, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए अहम Strait of Hormuz को फिर से खोलने का फैसला भी किया। चीन की रणनीतिक चाल सूत्रों के अनुसार, शुरुआत में चीन ने पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से बातचीत कराई। लेकिन जैसे ही पूर्ण युद्ध का खतरा बढ़ा, चीन ने सीधे ईरान से संपर्क साधा। यही निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन और रूस ने उस प्रस्ताव को भी रोक दिया, जिसमें हॉरमुज़ जलडमरूमध्य को बलपूर्वक खोलने की बात थी। चीन ने इसे ईरान के खिलाफ पक्षपाती बताया। अमेरिका ने क्यों नहीं दिया खुला श्रेय? हालांकि Donald Trump ने अनौपचारिक तौर पर चीन की भूमिका को स्वीकार किया, लेकिन आधिकारिक बयान में पाकिस्तान को ही श्रेय दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अमेरिका की रणनीति का हिस्सा था, ताकि चीन को वैश्विक स्तर पर ‘बराबरी का मध्यस्थ’ न माना जाए। पाकिस्तान की भूमिका पर उठे सवाल इस घटनाक्रम के बाद पाकिस्तान की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान सिर्फ संदेशवाहक की भूमिका में था, जबकि असली कूटनीतिक दबाव चीन ने बनाया। Shehbaz Sharif के एक सोशल मीडिया पोस्ट के ड्राफ्ट को लेकर भी विवाद हुआ, जिसमें “Draft” शब्द दिखने के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि संदेश कहीं और से तैयार किया गया था। चीन के हित भी जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की इस सक्रियता के पीछे उसके आर्थिक हित भी हैं। चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है और मध्य पूर्व में अस्थिरता उसकी ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकती थी। अगर युद्ध बढ़ता, तो न केवल ईरान का तेल निर्यात रुक सकता था, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन भी बुरी तरह प्रभावित होती-जिसका सीधा असर चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ता। निष्कर्ष कुल मिलाकर, यह घटनाक्रम दिखाता है कि वैश्विक राजनीति में कई बार असली फैसले पर्दे के पीछे लिए जाते हैं। इस मामले में चीन की चुप्पी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी, जिसने अंतिम समय में युद्धविराम को संभव बनाया।
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच बड़ी कूटनीतिक पहल सामने आई है। Iran और United States के बीच दो हफ्ते के सीजफायर पर सहमति बनने के बाद अब दोनों देशों के बीच औपचारिक वार्ता शुरू होने जा रही है। यह अहम बातचीत Islamabad में शुक्रवार को आयोजित होगी, जिसकी मेजबानी Pakistan करेगा। ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अनुसार, यह बातचीत तेहरान के 10-सूत्रीय प्रस्ताव के आधार पर होगी। इस प्रस्ताव में सबसे अहम मांग Strait of Hormuz पर नियंत्रण और सभी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को हटाने की है। सीजफायर के बाद शुरू हुई कूटनीतिक प्रक्रिया यह घटनाक्रम तब सामने आया जब Donald Trump ने ईरान पर हमले अस्थायी रूप से रोकने का ऐलान किया। इसके जवाब में ईरान ने भी अपनी सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति जताई। दोनों पक्षों ने दो हफ्ते के भीतर स्थायी समझौते की दिशा में काम करने की बात कही है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य बना मुख्य मुद्दा दुनिया के लगभग 20% तेल सप्लाई का रास्ता Strait of Hormuz से होकर गुजरता है। ईरान द्वारा आंशिक नाकेबंदी के कारण वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल मच गई थी, जिससे ईंधन की कीमतें बढ़ीं और कई देशों में सप्लाई प्रभावित हुई। अब अमेरिका ने इस जलमार्ग को पूरी तरह खोलने की शर्त रखी है, जबकि ईरान इसके बदले आर्थिक प्रतिबंध हटाने और क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखने की मांग कर रहा है। पाकिस्तान की मध्यस्थता से बढ़ी उम्मीदें Shehbaz Sharif ने दोनों देशों के बीच सीजफायर की पुष्टि करते हुए इस्लामाबाद में बातचीत के लिए आमंत्रण दिया है। उन्होंने इसे क्षेत्रीय शांति की दिशा में बड़ा कदम बताया है। प्रस्ताव में क्या-क्या शामिल? ईरान के 10-सूत्रीय प्रस्ताव में शामिल प्रमुख मांगें: हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर निगरानी और नियंत्रण मध्य-पूर्व से अमेरिकी सैनिकों की वापसी युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई सभी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना विदेशी बैंकों में जमा ईरानी संपत्तियों की रिहाई हालांकि, ईरान ने साफ कहा है कि वह अमेरिका पर “पूरी तरह भरोसा नहीं करता” और किसी भी गलती पर कड़ी प्रतिक्रिया देगा। इजरायल की चुप्पी बरकरार इस पूरे घटनाक्रम पर Israel की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, जबकि वह इस संघर्ष का अहम पक्ष रहा है।
मिडिल ईस्ट की राजनीति में बड़ा मोड़ तब आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक ईरान पर हमले रोकने और 14 दिन के संघर्षविराम का ऐलान कर दिया। इस फैसले ने जहां वैश्विक स्तर पर राहत दी, वहीं इजरायल के लिए यह एक बड़ा रणनीतिक झटका साबित हुआ। ट्रंप के फैसले से क्यों चौंका इजरायल? इजरायल लंबे समय से ईरान के खिलाफ सख्त सैन्य कार्रवाई के पक्ष में था। लेकिन सीजफायर के ऐलान ने उसकी रणनीति को अचानक रोक दिया। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनका सुरक्षा तंत्र इस फैसले से असहज नजर आ रहा है, क्योंकि: इजरायल ईरान को सैन्य रूप से कमजोर करना चाहता था युद्धविराम से उसके अभियान की गति थम गई लेबनान और हिजबुल्लाह को लेकर उसकी चिंताएं बनी हुई हैं ट्रंप ने क्यों लिया यह फैसला? डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि: अमेरिका अपने प्रमुख सैन्य लक्ष्य हासिल कर चुका है अब स्थायी शांति समझौते की दिशा में बातचीत जरूरी है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलना प्राथमिक शर्त थी, जिस पर ईरान राजी हो गया यह फैसला शहबाज शरीफ और पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व के साथ बातचीत के बाद लिया गया। ईरान की शर्तें क्या हैं? ईरान ने संघर्षविराम के लिए 10 सूत्रीय प्रस्ताव रखा, जिसमें प्रमुख बिंदु शामिल हैं: क्षेत्रीय हमलों को पूरी तरह रोकना ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाना फ्रीज की गई संपत्तियों को वापस करना होर्मुज मार्ग को सुरक्षित और खुला रखना परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता ईरान के नेतृत्व, जिसमें मोज्तबा खामेनेई की भूमिका अहम मानी जा रही है, ने इन शर्तों पर सहमति के बाद सीजफायर को मंजूरी दी। इजरायल की सबसे बड़ी चिंता इजरायल के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि: सीजफायर का असर लेबनान और हिजबुल्लाह पर पड़ सकता है उसकी स्वतंत्र सैन्य रणनीति सीमित हो सकती है हालांकि इजरायल ने औपचारिक रूप से सीजफायर का सम्मान करने की बात कही है, लेकिन अंदरूनी असंतोष साफ नजर आ रहा है। आगे क्या होगा? 14 दिन का यह संघर्षविराम बेहद अहम है पाकिस्तान में आगे शांति वार्ता प्रस्तावित है चीन और अन्य देशों की भूमिका भी बढ़ सकती है यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह अस्थायी शांति स्थायी समाधान का रास्ता खोल पाएगी या फिर क्षेत्र में तनाव दोबारा बढ़ेगा।
करीब 39 दिनों तक चले तनाव और हमलों के बाद आखिरकार अमेरिका और ईरान के बीच संघर्षविराम पर सहमति बन गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्तों के अस्थायी सीजफायर का ऐलान किया, जिस पर ईरान ने भी सहमति जताई है। इस फैसले से पूरे मिडिल ईस्ट और वैश्विक स्तर पर राहत की सांस ली जा रही है। होर्मुज खोलने पर बनी सहमति सीजफायर की सबसे अहम शर्त स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर रही। ईरान ने इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को जहाजों की आवाजाही के लिए खोलने पर सहमति दे दी है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर मंडरा रहा खतरा फिलहाल टल गया है। ट्रंप का बयान डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जानकारी देते हुए कहा: अमेरिका दो हफ्तों के लिए सैन्य कार्रवाई रोक रहा है अधिकांश सैन्य लक्ष्य हासिल कर लिए गए हैं अब दोनों देश स्थायी शांति समझौते की दिशा में आगे बढ़ेंगे ट्रंप के अनुसार यह फैसला शहबाज शरीफ और पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व के साथ बातचीत के बाद लिया गया। ईरान का रुख ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने स्पष्ट किया: अगर अमेरिका हमले रोकता है, तो ईरान भी पलटवार नहीं करेगा 14 दिनों तक होर्मुज से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही जारी रहेगी आगे की बातचीत साझा प्रस्तावों के आधार पर होगी 14 दिन क्यों अहम? यह संघर्षविराम सिर्फ अस्थायी है, लेकिन बेहद महत्वपूर्ण: इस दौरान स्थायी शांति समझौते पर बातचीत होगी क्षेत्रीय तनाव कम करने की कोशिश होगी वैश्विक बाजार और तेल आपूर्ति स्थिर रह सकती है आगे की राह सीजफायर के बाद अब नजरें आने वाले 14 दिनों पर टिकी हैं। अगर बातचीत सफल रहती है, तो यह समझौता मिडिल ईस्ट में लंबे समय की शांति का रास्ता खोल सकता है।
मध्य पूर्व में तनाव चरम पर था, दुनिया युद्ध की आशंका से सहमी हुई थी। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अल्टीमेटम की समयसीमा खत्म होने से ठीक पहले अमेरिका और ईरान के बीच संघर्षविराम पर सहमति बन गई। इस फैसले ने खाड़ी क्षेत्र समेत पूरी दुनिया को राहत दी है। आखिरी घंटे का ड्रामा अमेरिका ने ईरान को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने के लिए सख्त चेतावनी दी थी। समयसीमा खत्म होने से करीब डेढ़ घंटे पहले ट्रंप ने सोशल मीडिया पर सीजफायर का ऐलान किया। इसके तुरंत बाद ईरान की तरफ से भी इसकी पुष्टि कर दी गई। ट्रंप या मोज्तबा खामेनेई – कौन झुका? विश्लेषकों के अनुसार, यह समझौता “बीच का रास्ता” है। अमेरिका पर तेल कीमतों और वैश्विक दबाव का असर था ईरान पर हालिया हमलों और आर्थिक दबाव का प्रभाव पड़ा ईरान के शीर्ष नेतृत्व, जिसमें मोज्तबा खामेनेई का नाम प्रमुख है, ने भी रणनीतिक तौर पर लचीलापन दिखाया। वहीं ट्रंप ने भी अपने सख्त रुख को कुछ हद तक नरम किया। पर्दे के पीछे कौन था? इस समझौते में पाकिस्तान ने अहम मध्यस्थ की भूमिका निभाई। पाकिस्तानी नेतृत्व ने दोनों देशों के बीच संदेश पहुंचाए शहबाज शरीफ ने बातचीत की पुष्टि की इसके अलावा चीन ने भी ईरान को मनाने में अहम भूमिका निभाई और कूटनीतिक दबाव बनाया। समझौते की मुख्य शर्तें 14 दिनों का अस्थायी संघर्षविराम होर्मुज जलडमरूमध्य को जहाजों के लिए खोलना जहाजों पर शुल्क लगाने की सीमित अनुमति इस दौरान स्थायी समाधान पर बातचीत क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज? स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है। इसके बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति और अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ सकता था। आगे क्या? ईरान ने साफ किया है कि यह युद्ध का अंत नहीं, बल्कि अस्थायी विराम है अमेरिका ने भी सैन्य कार्रवाई की धमकी फिलहाल टाल दी है आने वाले 14 दिन स्थायी शांति के लिए बेहद अहम होंगे
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव कम होने के आसार फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं। सीजफायर के लिए चल रही कूटनीतिक कोशिशों को बड़ा झटका लगा है, क्योंकि ईरान ने अमेरिका के साथ प्रस्तावित बातचीत में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है। क्या है पूरा मामला? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक: ईरान ने मध्यस्थों को स्पष्ट कर दिया है कि वह अमेरिकी अधिकारियों से मिलने को तैयार नहीं है उसने अमेरिका की शर्तों को “अस्वीकार्य” बताया है इस वजह से सीजफायर के लिए चल रही बातचीत ठप पड़ गई है पाकिस्तान की कोशिशें भी नाकाम इस मामले में पाकिस्तान समेत कई क्षेत्रीय देश मध्यस्थता की कोशिश कर रहे थे। पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में बातचीत की मेजबानी का प्रस्ताव दिया था विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा था कि पाकिस्तान इस प्रक्रिया में सहयोग देने को तैयार है लेकिन ईरान के इनकार के बाद यह पहल फिलहाल अधर में लटक गई है। बढ़ सकता है तनाव विशेषज्ञों का मानना है कि: बातचीत रुकने से क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है सीजफायर की संभावना फिलहाल कमजोर पड़ गई है आगे क्या? अब नजर इस बात पर है कि क्या दोनों देश किसी नए मंच या शर्तों के तहत बातचीत के लिए तैयार होंगे या फिर हालात और बिगड़ेंगे।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच खुद को “पीस ब्रोकर” के तौर पर पेश करने की पाकिस्तान की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है। इस्लामाबाद में आयोजित विदेश मंत्रियों की अहम बैठक तय समय से पहले ही समाप्त हो गई, जिससे इस पहल की गंभीरता और तैयारी पर सवाल खड़े हो गए हैं। एक दिन में खत्म हुआ दो दिन का समिट यह बैठक 29–30 मार्च तक दो दिन चलने वाली थी, लेकिन यह सिर्फ एक दिन में ही खत्म हो गई। इस सम्मेलन में तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्रियों ने हिस्सा लिया था। बैठक का मकसद अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के लिए एक मध्यस्थता ढांचा तैयार करना था, लेकिन इसमें कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। क्यों नहीं बनी सहमति? कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, बैठक के विफल होने के पीछे कई कारण रहे: ईरान की कड़ी शर्तें, जिसमें सुरक्षा की गारंटी की मांग अमेरिका पर भरोसे को लेकर स्पष्ट आश्वासन का अभाव शामिल देशों के बीच आपसी मतभेद जहां पाकिस्तान और तुर्की बातचीत को आगे बढ़ाने के पक्ष में थे, वहीं सऊदी अरब और मिस्र ने अधिक सतर्क रुख अपनाया। सऊदी और मिस्र ने क्यों छोड़ी बैठक? रिपोर्ट्स के मुताबिक, सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्री पहले ही दिन बैठक छोड़कर लौट गए। इन देशों का मानना था कि: किसी भी मध्यस्थता से पहले सीधे अमेरिका से बातचीत जरूरी है बिना स्पष्ट रणनीति के आगे बढ़ना जोखिम भरा हो सकता है इससे बैठक में एकजुटता की कमी साफ नजर आई। क्या आगे बनेगा रास्ता? हालांकि बैठक से कोई ठोस परिणाम नहीं निकला, लेकिन सभी देशों ने कूटनीतिक बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई है। पाकिस्तान और तुर्की, ईरान को शर्तों में नरमी लाने के लिए मनाने की कोशिश करेंगे अगर अमेरिका और ईरान सकारात्मक संकेत देते हैं, तो जल्द नई बैठक हो सकती है फिलहाल, यह साफ है कि क्षेत्रीय स्तर पर भी इस मुद्दे पर एकमत बनाना आसान नहीं है।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच युद्धविराम की कोशिशें अब तेज होती नजर आ रही हैं। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, JD Vance (अमेरिका के उपराष्ट्रपति) अगले तीन दिनों के भीतर Pakistan का दौरा कर सकते हैं। इस संभावित यात्रा का उद्देश्य Iran और United States के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए बातचीत को आगे बढ़ाना बताया जा रहा है। क्या कहती हैं रिपोर्ट्स? अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान में उच्चस्तरीय बैठक आयोजित करने की कोशिश कर रहा है, जिसमें जेडी वेंस की भागीदारी संभव है। हालांकि, अभी तक इस यात्रा की तारीख, स्थान और भागीदारी को लेकर अंतिम पुष्टि नहीं हुई है। ईरान ने किनसे बातचीत से किया इनकार? सूत्रों के मुताबिक, ईरान ने Steve Witkoff और Jared Kushner जैसे अमेरिकी दूतों के साथ दोबारा बातचीत करने से साफ इनकार कर दिया है। इसके बाद पाकिस्तान ने नए चेहरे के तौर पर जेडी वेंस का नाम आगे बढ़ाया है, जिससे वार्ता को नई दिशा मिल सके। पाकिस्तान क्यों बना रहा है खुद को मध्यस्थ? Shehbaz Sharif ने हाल ही में कहा था कि उनका देश “सार्थक और निर्णायक बातचीत” को संभव बनाने के लिए तैयार है। पाकिस्तान लगातार यह कोशिश कर रहा है कि वह अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाए और इस्लामाबाद को बातचीत का केंद्र बनाया जाए। व्हाइट हाउस का क्या रुख? व्हाइट हाउस ने फिलहाल इस यात्रा को लेकर कोई स्पष्ट पुष्टि नहीं की है। प्रेस सचिव ने कहा कि जेडी वेंस पहले से ही राष्ट्रीय सुरक्षा टीम का अहम हिस्सा हैं, लेकिन उनकी भूमिका में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। साथ ही, अमेरिका ने यह भी साफ नहीं किया कि वह ईरान से किस स्तर पर बातचीत कर रहा है। क्या जल्द खत्म होगा युद्ध? विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पाकिस्तान में यह वार्ता होती है, तो यह युद्धविराम की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है। हालांकि, दोनों देशों के बीच अविश्वास और सख्त रुख को देखते हुए बातचीत आसान नहीं मानी जा रही।
मध्य-पूर्व में जारी तनाव और अमेरिका-इसराइल के साथ टकराव के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने वैश्विक प्रतिक्रिया को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने पाकिस्तान, तुर्की, इराक़, लेबनान, मिस्र और अन्य अरब देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन देशों के लोग अमेरिका और इसराइल की नीतियों के खिलाफ खुलकर अपनी नाराज़गी जता रहे हैं। राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान ने कहा, “आज हम दुनिया के कई देशों के लोगों को जागते हुए देख रहे हैं। पाकिस्तान, तुर्की, इराक़, लेबनान, मिस्र और अरब देशों के लोग अमेरिका, इसराइल और उनके अपराधों के प्रति अपनी नाराज़गी को मुखरता से व्यक्त कर रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा कि दुनिया के स्वतंत्र लोग “ज़ायनिस्टों” के साथ नहीं हैं और क्षेत्र में स्थिरता केवल आपसी सहयोग और देशों की संप्रभुता के सम्मान से ही संभव है। पाकिस्तान की मध्यस्थता की पेशकश ईरानी राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान ने इस तनाव को कम करने के लिए मध्यस्थता की पेशकश की है। पाकिस्तान ने दोनों पक्षों से बातचीत के ज़रिए समाधान निकालने की अपील की है। 15 सूत्रीय योजना की चर्चा इस बीच अमेरिकी और इसराइली मीडिया की कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका ने समझौते के लिए पाकिस्तान के माध्यम से ईरान को 15 सूत्रीय प्रस्ताव सौंपा है। हालांकि, इस प्रस्ताव की आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं हुई है। बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक नजर मध्य-पूर्व की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। लगातार हो रहे हमलों और बयानों के बीच कूटनीतिक कोशिशें भी तेज़ हो गई हैं, लेकिन हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।