Pentagon

U.S. military aircraft and naval forces deployed amid rising tensions between the United States and Iran, with new airstrikes and a renewed naval blockade reported in the region.
ईरान पर अमेरिका का फिर हमला, समुद्री नाकेबंदी बहाल; ट्रंप बोले- अब पावर प्लांट भी होंगे निशाने पर

वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिकी सेना ने ईरान के भीतर नए हवाई हमले किए हैं, जबकि समुद्री नाकेबंदी (नेवल ब्लॉकेड) भी दोबारा लागू कर दी गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान बातचीत की मेज पर वापस नहीं आया, तो अमेरिका अपने सैन्य अभियान को और तेज करेगा तथा पावर प्लांट और पुल जैसे अहम ठिकानों को भी निशाना बनाया जा सकता है। ट्रंप ने दी सख्त चेतावनी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक इंटरव्यू में कहा कि ईरान के साथ पिछले महीने हुए समझौते के तहत हटाई गई समुद्री नाकेबंदी अब फिर से लागू कर दी गई है। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपने रणनीतिक लक्ष्य हासिल करने के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा। ट्रंप ने कहा कि ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर आगे क्या कार्रवाई होगी, इस पर अंतिम फैसला बाद में लिया जाएगा, लेकिन अगर हालात नहीं बदले तो अगले चरण में पावर प्लांट और उसके बाद महत्वपूर्ण पुलों को निशाना बनाया जा सकता है। ईरान के सैन्य ठिकानों पर हवाई हमला अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने पुष्टि की कि ईरान के भीतर सैन्य ठिकानों पर नया हवाई हमला किया गया है। अमेरिकी सेना के अनुसार, इस कार्रवाई का उद्देश्य उन सैन्य क्षमताओं को नष्ट करना था, जिनका इस्तेमाल ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों पर हमलों के लिए कर सकता है। समुद्री नाकेबंदी फिर लागू अमेरिकी सेना ने बताया कि 14 जुलाई की शाम से ईरान के बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों की ओर आने-जाने वाले जहाजों पर फिर से नौसैनिक नाकेबंदी लागू कर दी गई है। इससे पहले दोनों देशों के बीच हुए समझौते के तहत यह प्रतिबंध हटा लिया गया था। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ी सैन्य गतिविधियां मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने अपनी सैन्य मौजूदगी भी मजबूत कर दी है। अमेरिकी सेना के मुताबिक, क्षेत्र में 20 से अधिक युद्धपोत और सैकड़ों सैन्य विमान तैनात हैं, जो किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार हैं। समझौते पर मंडराया संकट पिछले महीने अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के उद्देश्य से कुछ कदम उठाए गए थे, लेकिन हालिया सैन्य कार्रवाई और नाकेबंदी की बहाली के बाद दोनों देशों के बीच बना सीमित विश्वास भी कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं हुए तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है।  

Deepshikha जुलाई 15, 2026 0
Kriti Sanon and Kabir Bahia spotted together at Edgbaston Stadium during the India vs England cricket match in Birmingham.
Kriti Sanon और Kabir Bahia फिर आए साथ नजर, बर्मिंघम में India vs England मैच देखते हुए सेल्फी वायरल; ब्रेकअप की अफवाहों पर लगा विराम?

Kriti Sanon Kabir Bahia News: बॉलीवुड अभिनेत्री कृति सेनन एक बार फिर अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर सुर्खियों में हैं। हाल ही में वह इंग्लैंड के एजबेस्टन क्रिकेट स्टेडियम, बर्मिंघम में भारत बनाम इंग्लैंड मैच का आनंद लेते हुए नजर आईं। खास बात यह रही कि उनके साथ कथित बॉयफ्रेंड कबीर बाहिया भी मौजूद थे। दोनों की साथ में ली गई एक सेल्फी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। हालांकि दोनों ने अब तक अपने रिश्ते को आधिकारिक तौर पर स्वीकार नहीं किया है, लेकिन उनकी हालिया तस्वीरों ने एक बार फिर डेटिंग की चर्चाओं को हवा दे दी है। बर्मिंघम में साथ दिखे कृति और कबीर कबीर बाहिया ने अपने इंस्टाग्राम स्टोरी पर एजबेस्टन क्रिकेट स्टेडियम से एक ग्रुप सेल्फी साझा की, जिसमें कृति सेनन और उनके कुछ दोस्त भी नजर आए। तस्वीर में दोनों मुस्कुराते हुए कैमरे के लिए पोज देते दिखाई दिए। इस मौके पर कृति ने ग्रीन टॉप और व्हाइट पैंट पहनी थी, जबकि कबीर व्हाइट टी-शर्ट और ब्राउन लेदर जैकेट में नजर आए। दोनों का कैजुअल लुक सोशल मीडिया पर काफी पसंद किया जा रहा है। ब्रेकअप की अफवाहों के बीच आई नई तस्वीर पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर ऐसी अटकलें लगाई जा रही थीं कि कृति सेनन और कबीर बाहिया का रिश्ता खत्म हो गया है। इन चर्चाओं को तब और बल मिला जब कबीर की एक अन्य महिला के साथ तस्वीर वायरल हुई थी। हालांकि, हालिया तस्वीरों और सार्वजनिक मौजूदगी ने इन अफवाहों को फिर से चर्चा का विषय बना दिया है। इससे पहले भी कृति ने अपने जून फोटो डंप में कबीर के साथ एक तस्वीर साझा की थी, जिसे कई लोगों ने रिश्ते का संकेत माना था। लंबे समय से जुड़ रहा है दोनों का नाम कृति सेनन और कबीर बाहिया के रिश्ते की चर्चा तब तेज हुई थी जब दोनों को कृति की बहन नूपुर सेनन और गायक स्टेबिन बेन की शादी के समारोहों में साथ देखा गया। इसके बाद दोनों की कई तस्वीरें और छुट्टियों की झलकियां भी सोशल मीडिया पर सामने आईं। हालांकि, दोनों ने अपने रिश्ते पर अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है और निजी जिंदगी को लेकर हमेशा चुप्पी बनाए रखी है। वर्क फ्रंट पर चमक रहीं कृति सेनन पेशेवर मोर्चे पर कृति सेनन अपनी हालिया फिल्म 'Cocktail 2' की सफलता का आनंद ले रही हैं। फिल्म को दर्शकों से अच्छा रिस्पॉन्स मिला है और बॉक्स ऑफिस पर भी इसका प्रदर्शन सकारात्मक बताया जा रहा है।  

surbhi जुलाई 15, 2026 0
US President Donald Trump addresses questions about the Minab school missile strike during a media briefing.
150 बच्चों की मौत पर ट्रंप का बड़ा बयान, बोले- 'सबूत नहीं कि मिनाब स्कूल पर अमेरिकी मिसाइल से हुआ हमला'

  Washington: ईरान के मिनाब स्कूल पर हुए घातक मिसाइल हमले को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा बयान दिया है। ट्रंप ने कहा कि अब तक ऐसा कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो सके कि स्कूल पर हमला अमेरिकी मिसाइल से किया गया था। उन्होंने कहा कि युद्ध के दौरान कई पक्षों की ओर से लगातार मिसाइलें दागी जा रही थीं, इसलिए हमले के लिए जिम्मेदार पक्ष की पहचान करना आसान नहीं है। 'हमारी मिसाइल थी, इसका कोई प्रमाण नहीं' हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने कहा कि कुछ लोगों ने दावा किया कि मिनाब स्कूल पर अमेरिकी मिसाइल से हमला हुआ, लेकिन उनके पास इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है। उन्होंने कहा, "युद्ध के दौरान हर दिशा से मिसाइलें दागी जा रही थीं। ऐसे में यह तय करना बेहद मुश्किल है कि किस मिसाइल ने हमला किया। मुझे ऐसा कोई सबूत नहीं दिखा जिससे यह कहा जा सके कि वह हमारी मिसाइल थी।" 28 फरवरी को हुआ था भीषण हमला ईरान-अमेरिका संघर्ष के पहले दिन यानी 28 फरवरी को मिनाब स्थित एक स्कूल पर मिसाइल हमला हुआ था। इस हमले में 150 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जिनमें बड़ी संख्या में स्कूली छात्राएं शामिल थीं। घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली और हमले की निष्पक्ष जांच की मांग उठी। अमेरिका पर लगे थे गंभीर आरोप हमले के तुरंत बाद कई मीडिया रिपोर्टों और विश्लेषकों ने आशंका जताई थी कि इसके पीछे अमेरिकी सैन्य कार्रवाई हो सकती है। अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) ने अब तक इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है और मामले की जांच जारी होने की बात कही है। ट्रंप ने जांच पर भी जताया संदेह डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इतने बड़े सैन्य संघर्ष के दौरान यह तय करना बेहद कठिन है कि किसी विशेष हमले के लिए कौन जिम्मेदार था। उन्होंने यह भी कहा कि संभव है कि इस मामले की पूरी सच्चाई कभी सामने ही न आ सके। उनके मुताबिक, युद्ध क्षेत्र में लगातार हो रहे हमलों और अलग-अलग पक्षों की सैन्य गतिविधियों के कारण जांच एजेंसियों के सामने भी बड़ी चुनौती है। दुनिया की नजर जांच रिपोर्ट पर मिनाब स्कूल पर हुआ हमला ईरान-अमेरिका संघर्ष की सबसे दर्दनाक घटनाओं में गिना जा रहा है। बड़ी संख्या में बच्चों और नागरिकों की मौत के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है। अब दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि जांच एजेंसियां इस हमले के लिए जिम्मेदार पक्ष की पहचान कर पाती हैं या नहीं।  

Deepshikha जून 26, 2026 0
US military headquarters graphic highlighting the renaming of Indo-Pacific Command back to Pacific Command amid strategic debate.
US Indo-Pacific Command का नाम बदला, 'इंडो' शब्द हटाकर फिर बना Pacific Command; भारत और क्वाड पर क्या पड़ेगा असर?

  अमेरिका ने अपने सबसे महत्वपूर्ण सैन्य कमांडों में से एक के नाम में बड़ा बदलाव करते हुए यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड (USINDOPACOM) को फिर से यूएस पैसिफिक कमांड (USPACOM) नाम दे दिया है। अमेरिकी युद्ध विभाग (Department of War) ने कहा कि यह कदम कमांड की ऐतिहासिक विरासत और उसकी मूल पहचान को बहाल करने के लिए उठाया गया है। यह वही नाम है जिसके तहत यह सैन्य कमांड 70 वर्षों से अधिक समय तक कार्य करता रहा था। 2018 में 'इंडो' शब्द जोड़ा गया था साल 2018 में तत्कालीन अमेरिकी रक्षा मंत्री Jim Mattis ने अमेरिकी पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड कर दिया था। उस समय वॉशिंगटन का मानना था कि हिंद महासागर क्षेत्र का रणनीतिक महत्व तेजी से बढ़ रहा है और इसकी सुरक्षा चुनौतियां प्रशांत क्षेत्र से गहराई से जुड़ी हुई हैं। 'इंडो-पैसिफिक' शब्द को भारत और हिंद महासागर की बढ़ती भू-राजनीतिक अहमियत के प्रतीक के रूप में देखा गया था। नाम बदला, लेकिन जिम्मेदारियां नहीं अमेरिकी युद्ध विभाग ने स्पष्ट किया है कि केवल नाम बदला गया है। कमांड की रणनीति, सैन्य मिशन और भौगोलिक दायरे में कोई बदलाव नहीं किया गया है। USPACOM का संचालन क्षेत्र पहले की तरह: अमेरिका के पश्चिमी तट से लेकर भारत की पश्चिमी सीमा तक, प्रशांत महासागर, हिंद महासागर का बड़ा हिस्सा, पूर्वी और दक्षिण-पूर्व एशिया, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण एशिया के कुछ क्षेत्रों तक फैला रहेगा। कमांड आगे भी संयुक्त सैन्य अभ्यास, समुद्री सुरक्षा, आपदा राहत, रक्षा साझेदारी और क्षेत्रीय सुरक्षा अभियानों का नेतृत्व करती रहेगी। क्यों अहम है यह सैन्य कमांड? अमेरिकी पैसिफिक कमांड की स्थापना 1 जनवरी 1947 को Harry S. Truman के कार्यकाल में हुई थी। यह अमेरिका की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी संयुक्त लड़ाकू कमांडों में से एक है। इसने: Korean War Vietnam War जैसे बड़े सैन्य अभियानों में अहम भूमिका निभाई है। इसके अलावा मानवीय सहायता और आपदा राहत अभियानों में भी इसकी महत्वपूर्ण भागीदारी रही है। भारत और क्वाड के लिए क्या मायने? अमेरिका ने कहा है कि यह केवल नाम का बदलाव है, लेकिन कई रणनीतिक विशेषज्ञ इसे प्रतीकात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण मान रहे हैं। 'इंडो-पैसिफिक' अवधारणा पिछले कुछ वर्षों में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच बने Quadrilateral Security Dialogue (क्वाड) सहयोग की आधारशिला मानी जाती रही है। 'इंडो' शब्द हटने से यह सवाल उठ रहे हैं कि: क्या ट्रंप प्रशासन इंडो-पैसिफिक रणनीति की प्राथमिकताओं में बदलाव चाहता है? क्या भारत की रणनीतिक भूमिका को लेकर अमेरिका का दृष्टिकोण बदल रहा है? क्या यह केवल ऐतिहासिक नाम की वापसी है या इसके पीछे कोई बड़ा भू-राजनीतिक संदेश छिपा है? फिलहाल अमेरिकी प्रशासन ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि क्षेत्रीय साझेदारों, भारत सहित सभी सहयोगी देशों के साथ 'स्वतंत्र और खुला क्षेत्र' बनाए रखने की प्रतिबद्धता पहले की तरह कायम रहेगी। हवाई से संचालित होता है विशाल सुरक्षा नेटवर्क हवाई स्थित मुख्यालय से संचालित यह कमांड दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री और सामरिक क्षेत्रों की निगरानी करती है। इसके दायरे में वैश्विक व्यापार मार्ग, ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री सुरक्षा और एशिया-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता जैसे अहम मुद्दे शामिल हैं। ऐसे में नाम परिवर्तन को भले ही प्रशासनिक कदम बताया जा रहा हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हलकों में इसे भारत-अमेरिका संबंधों और इंडो-पैसिफिक सुरक्षा ढांचे के संदर्भ में बारीकी से देखा जा रहा है।  

Deepshikha जून 17, 2026 0
Google AI ethics controversy as senior executive resigns over Pentagon defense agreement concerns
Google के वरिष्ठ अधिकारी ने दिया इस्तीफा, Pentagon-AI समझौते पर उठाए गंभीर सवाल

अमेरिकी रक्षा विभाग के साथ AI समझौते से बढ़ा विवाद दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में शामिल Google एक बार फिर अपने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) प्रोजेक्ट्स को लेकर चर्चा में है। इस बार विवाद की वजह कंपनी का अमेरिकी रक्षा विभाग (Pentagon) के साथ किया गया वह समझौता है, जिसके तहत Google की AI तकनीक का उपयोग गोपनीय और रक्षा संबंधी कार्यों में किया जा सकेगा। इसी मुद्दे को लेकर Google के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। नौ साल बाद कंपनी छोड़ी Google में Android Platform Security के निदेशक रहे रिने मेयरहोफर (René Mayrhofer) ने कंपनी छोड़ने का फैसला किया है। उन्होंने अपने सहयोगियों को भेजे विदाई पत्र में कहा कि जिस Google को उन्होंने 2017 में जॉइन किया था, वह अब पहले जैसा नहीं रहा। उनके अनुसार कंपनी की नीतियों और मूल्यों में बड़ा बदलाव आया है। मेयरहोफर ने कहा कि उनके लिए इस्तीफा देना आसान नहीं था, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में यह फैसला “अनिवार्य” हो गया था। AI के सैन्य इस्तेमाल का किया विरोध अपने पत्र में मेयरहोफर ने स्पष्ट कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से सैन्य अभियानों, विशेषकर आक्रामक युद्ध गतिविधियों, का समर्थन नहीं करते हैं। उन्होंने खुद को शांतिवादी (Pacifist) बताते हुए कहा कि वह ऐसी किसी तकनीक का हिस्सा नहीं बन सकते, जिसका उपयोग लोगों को नुकसान पहुंचाने या युद्ध संचालन में किया जाए। उनका मानना है कि Google द्वारा Pentagon को AI तकनीक उपलब्ध कराना कंपनी के पुराने नैतिक सिद्धांतों के विपरीत है। Google पर नैतिक मूल्यों से भटकने का आरोप इस्तीफा पत्र में उन्होंने Google प्रबंधन पर कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि कंपनी ने AI इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती ऊर्जा खपत के कारण अपने कार्बन-न्यूट्रल लक्ष्यों को पीछे छोड़ दिया है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि कंपनी के शीर्ष स्तर पर बड़े फैसले लिए जा रहे हैं, लेकिन इन पर कर्मचारियों के बीच खुली चर्चा नहीं हो रही। उनके अनुसार कई महत्वपूर्ण बदलावों की जानकारी उन्हें भी आंतरिक माध्यमों से नहीं मिली। कर्मचारियों में पहले भी दिख चुका है विरोध यह पहला मौका नहीं है जब Google के भीतर Pentagon से जुड़े AI प्रोजेक्ट्स का विरोध हुआ हो। इससे पहले भी सैकड़ों कर्मचारियों ने सैन्य उद्देश्यों के लिए AI तकनीक उपलब्ध कराने का विरोध किया था। Google DeepMind के कुछ शोधकर्ताओं ने भी सार्वजनिक रूप से इस फैसले पर असहमति जताई थी। निगरानी और गोपनीयता को लेकर चिंता मेयरहोफर ने अपने पत्र में भविष्य में AI तकनीक के संभावित दुरुपयोग को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने आशंका जताई कि ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर निगरानी (Mass Surveillance) के लिए किया जा सकता है, जिससे नागरिकों की निजता और स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में उन्हें डर है कि AI आधारित सिस्टम का उपयोग आम लोगों की निगरानी के लिए भी किया जा सकता है। अगस्त तक कंपनी में रहेंगे हालांकि इस्तीफा देने के बाद भी मेयरहोफर अगस्त 2026 के अंत तक नोटिस अवधि पूरी करने के लिए Google से जुड़े रहेंगे। उन्होंने कहा कि वह इस दौरान अपने चल रहे प्रोजेक्ट्स को पूरा करेंगे, लेकिन Pentagon समझौते से जुड़े किसी भी AI कार्य से दूरी बनाए रखेंगे। AI नैतिकता पर फिर छिड़ी बहस Google के इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग किस सीमा तक और किन उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए। जैसे-जैसे AI तकनीक अधिक शक्तिशाली होती जा रही है, वैसे-वैसे इसके नैतिक, सामाजिक और सुरक्षा संबंधी पहलुओं पर बहस भी तेज होती जा रही है।  

surbhi जून 13, 2026 0
B-21 Raider stealth bomber highlighted alongside future US missile and fighter jet programs.
अमेरिका के भविष्य के 3 सबसे अहम हथियार कौन से? एयर फोर्स जनरल ने गिनाए नाम

  वॉशिंगटन: अमेरिकी वायुसेना ने अपनी भविष्य की सैन्य रणनीति को लेकर महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। यूनाइटेड स्टेट्स एयर फोर्स (USAF) के जनरल डेल व्हाइट ने तीन प्रमुख रक्षा कार्यक्रमों—बी-21 रेडर स्टेल्थ बॉम्बर, सेंटिनल इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) और एफ-47 अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान—को अमेरिका की दीर्घकालिक सुरक्षा का आधार बताया है। कैलिफोर्निया स्थित एडवर्ड्स एयर फोर्स बेस में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जनरल व्हाइट ने कहा कि किसी बड़े राष्ट्रीय संकट या चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में अमेरिका इन तीन सैन्य क्षमताओं पर सबसे अधिक भरोसा करेगा। उनके अनुसार ये कार्यक्रम केवल नए हथियार नहीं, बल्कि भविष्य की अमेरिकी रक्षा रणनीति के प्रमुख स्तंभ हैं। बी-21 रेडर कार्यक्रम ने हासिल किया अहम पड़ाव जनरल व्हाइट की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब अमेरिकी वायुसेना ने बी-21 रेडर कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल होने की जानकारी दी है। वायुसेना के अनुसार हाल ही में एक ऑपरेशनल टेस्ट पायलट ने एक डेवलपमेंटल टेस्ट पायलट के साथ बी-21 रेडर की संयुक्त उड़ान भरी, जिसे कार्यक्रम के विकास में एक अहम कदम माना जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि विकासात्मक और परिचालन परीक्षणों को शुरुआती चरण में ही एकीकृत करने से विमान को सेवा में शामिल करने की प्रक्रिया तेज होगी। यह पारंपरिक परीक्षण मॉडल से अलग रणनीति है, जिसका उद्देश्य समय बचाना और क्षमता विकास को गति देना है। जनरल व्हाइट ने कहा कि बी-21 कार्यक्रम आधुनिक परीक्षण और उत्पादन प्रणाली का उदाहरण है, जो अमेरिकी वायुसेना को अधिक तेज और प्रभावी तरीके से नई क्षमताएं उपलब्ध कराने में मदद करेगा। क्या है बी-21 रेडर? अमेरिकी रक्षा कंपनी Northrop Grumman द्वारा विकसित बी-21 रेडर अमेरिका की अगली पीढ़ी का स्टेल्थ बॉम्बर है। इसे लंबी दूरी तक पारंपरिक और परमाणु दोनों प्रकार के मिशन संचालित करने के लिए तैयार किया गया है। भविष्य में यह विमान पुराने बी-1 लांसर और बी-2 स्पिरिट बॉम्बर्स की जगह लेगा। साथ ही यह अमेरिका की परमाणु त्रिस्तरीय रणनीति (Nuclear Triad) के हवाई हिस्से की मुख्य ताकत बनेगा। इसमें अत्याधुनिक स्टेल्थ तकनीक, ओपन-सिस्टम आर्किटेक्चर और विभिन्न प्रकार के हथियारों को ले जाने की क्षमता शामिल है। अमेरिकी वायुसेना कम से कम 100 बी-21 रेडर विमानों को अपने बेड़े में शामिल करने की योजना पर काम कर रही है। दूसरे विमान के जुड़ने से बढ़ी परीक्षण की गति वायुसेना के अनुसार, एडवर्ड्स एयर फोर्स बेस पर दूसरे बी-21 विमान के पहुंचने के बाद परीक्षण कार्यक्रम में तेजी आई है। अब केवल उड़ान प्रदर्शन ही नहीं, बल्कि मिशन सिस्टम, सेंसर और हथियार एकीकरण से जुड़े परीक्षण भी किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह चरण विमान को पूर्ण परिचालन क्षमता तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। सेंटिनल: नई पीढ़ी की परमाणु मिसाइल प्रणाली जनरल व्हाइट ने सेंटिनल आईसीबीएम कार्यक्रम को भी अमेरिकी सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया। यह प्रणाली पिछले 50 वर्षों से सेवा में मौजूद मिनुटमैन-III मिसाइलों का स्थान लेगी। सेंटिनल कार्यक्रम के तहत नई मिसाइलों के साथ-साथ कमांड, कंट्रोल और कम्युनिकेशन नेटवर्क का भी व्यापक आधुनिकीकरण किया जा रहा है। इसके अलावा अमेरिका के कई राज्यों में स्थित रणनीतिक सैन्य ढांचे को भी अपग्रेड किया जा रहा है। अमेरिकी वायुसेना का लक्ष्य है कि सेंटिनल प्रणाली 2075 तक प्रभावी रूप से सेवा देती रहे और परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाए रखे। एफ-47: भविष्य का हवाई प्रभुत्व स्थापित करने वाला लड़ाकू विमान जनरल व्हाइट ने एफ-47 लड़ाकू विमान को भी अमेरिका की भविष्य की युद्ध क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। यह विमान नेक्स्ट जनरेशन एयर डॉमिनेंस (NGAD) कार्यक्रम के तहत विकसित किया जा रहा है और इसे अमेरिकी कंपनी Boeing तैयार कर रही है। एफ-47 का उद्देश्य मौजूदा एफ-22 रैप्टर की जगह लेना है। यह विमान भविष्य में सहयोगी कॉम्बैट ड्रोन (Collaborative Combat Aircraft) के साथ मिलकर काम करेगा और अत्यधिक चुनौतीपूर्ण युद्धक्षेत्रों में हवाई श्रेष्ठता बनाए रखने में सक्षम होगा। वायुसेना के अनुसार इसकी लड़ाकू पहुंच 1,000 नॉटिकल मील से अधिक होगी, यह मैक-2 से ज्यादा गति प्राप्त कर सकेगा और उन्नत स्टेल्थ तकनीक से लैस होगा। अमेरिका भविष्य में 185 से अधिक एफ-47 विमानों की खरीद की योजना बना रहा है। भविष्य की अमेरिकी सैन्य रणनीति का आधार विशेषज्ञों के अनुसार बी-21 रेडर, सेंटिनल आईसीबीएम और एफ-47 कार्यक्रम अमेरिका की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता, लंबी दूरी की मारक शक्ति और हवाई श्रेष्ठता को बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाएंगे। जनरल डेल व्हाइट की टिप्पणियां इस बात का संकेत हैं कि आने वाले दशकों में अमेरिकी रक्षा नीति का फोकस इन अत्याधुनिक सैन्य प्रणालियों पर रहने वाला है।  

Deepshikha जून 12, 2026 0
Pentagon building under heightened security after air quality alert triggers emergency response measures.
पेंटागन में एयर क्वालिटी अलर्ट से मचा हड़कंप, कई हिस्से अस्थायी रूप से बंद; बाद में निकला फॉल्स अलार्म

  अमेरिका के रक्षा मुख्यालय पेंटागन में गुरुवार को उस समय सुरक्षा एजेंसियां सक्रिय हो गईं, जब भवन के भीतर लगे मॉनिटरिंग सिस्टम ने हवा की गुणवत्ता से जुड़ी एक संभावित समस्या का संकेत दिया। एहतियात के तौर पर इमारत के कई हिस्सों में सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू किए गए, कुछ क्षेत्रों को अस्थायी रूप से बंद किया गया और विशेष प्रतिक्रिया टीमों को तैनात किया गया। बाद में की गई जांच में किसी खतरनाक पदार्थ की पुष्टि नहीं हुई और पूरा मामला फॉल्स अलार्म साबित हुआ। एयर क्वालिटी अलर्ट के बाद सक्रिय हुई सुरक्षा एजेंसियां अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पेंटागन के निगरानी सिस्टम ने एयर क्वालिटी से संबंधित असामान्य संकेत दर्ज किए थे। इसके बाद अधिकारियों ने तुरंत सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू करते हुए प्रभावित क्षेत्रों में कर्मचारियों को सुरक्षित स्थानों पर रहने के निर्देश दिए। संभावित रासायनिक या खतरनाक पदार्थ की आशंका को देखते हुए हेजमैट (Hazmat) यानी खतरनाक पदार्थों से निपटने वाली विशेष टीमों को भी तैनात किया गया। कई मंजिलें और कॉरिडोर अस्थायी रूप से बंद रिपोर्टों के मुताबिक, दूसरी से पांचवीं मंजिल तक के कुछ हिस्सों पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ा। विशेष रूप से कॉरिडोर 4 से 7 के बीच के क्षेत्रों को जांच पूरी होने तक अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया। सुरक्षा कारणों से इन इलाकों में लोगों की आवाजाही रोक दी गई और अतिरिक्त सैंपलिंग तथा तकनीकी जांच शुरू की गई। कर्मचारियों को भेजे गए आधिकारिक संदेश में बताया गया कि स्थिति की समीक्षा की जा रही है और प्रतिक्रिया दल मौके पर मौजूद हैं। सुरक्षात्मक उपकरणों के साथ तैनात रहीं विशेष टीमें जांच के दौरान कई अधिकारियों को गैस मास्क, रासायनिक सुरक्षा सूट और अन्य सुरक्षात्मक उपकरणों के साथ प्रभावित क्षेत्रों में काम करते देखा गया। इससे सुरक्षा व्यवस्था और अधिक सख्त कर दी गई थी। शुरुआती चरण में यह स्पष्ट नहीं हो सका था कि सेंसर किस कारण सक्रिय हुए और क्या वास्तव में किसी हानिकारक पदार्थ की मौजूदगी थी। पेंटागन ने जारी किया आधिकारिक बयान पेंटागन के प्रवक्ता सीन पार्नेल ने कहा कि निगरानी प्रणालियों ने ऐसी स्थिति का संकेत दिया था, जिसमें तत्काल सावधानी बरतना आवश्यक था। उन्होंने बताया कि मानक सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत प्रभावित क्षेत्रों में "शेल्टर-इन-प्लेस" निर्देश लागू किए गए और प्रतिक्रिया टीमें पूरी तरह तैयार रखी गईं। जांच में नहीं मिला कोई खतरा कुछ घंटों की जांच और सैंपलिंग के बाद अधिकारियों ने पाया कि किसी भी प्रकार का खतरनाक पदार्थ मौजूद नहीं था। इसके बाद सुरक्षा प्रतिबंध धीरे-धीरे हटाए गए और सामान्य गतिविधियां बहाल कर दी गईं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जिस संभावित खतरे के कारण पेंटागन में आपात स्थिति घोषित की गई थी, वह अंततः फॉल्स अलार्म निकला। सुरक्षा व्यवस्था की हुई समीक्षा घटना के बाद अधिकारियों ने मॉनिटरिंग सिस्टम द्वारा जारी चेतावनी के कारणों की समीक्षा शुरू कर दी है। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि सेंसर किस वजह से सक्रिय हुए और भविष्य में ऐसी झूठी चेतावनियों से कैसे बचा जा सकता है। कोई वास्तविक खतरा नहीं मिला, फिर भी इस घटना ने यह दिखाया कि अमेरिकी रक्षा मुख्यालय में सुरक्षा अलर्ट मिलने पर आपात प्रतिक्रिया तंत्र कितनी तेजी से सक्रिय हो जाता है।  

Deepshikha जून 12, 2026 0
US Apache attack helicopter near the Strait of Hormuz after crash, crew rescued safely during military operation.
होर्मुज स्ट्रेट के पास अमेरिकी अपाचे हेलीकॉप्टर क्रैश, चालक दल सुरक्षित; हादसे की वजह की जांच जारी

  वॉशिंगटन/होर्मुज स्ट्रेट: पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच होर्मुज स्ट्रेट के निकट एक अमेरिकी सैन्य अपाचे हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। राहत की बात यह रही कि हेलीकॉप्टर में सवार दोनों पायलटों और चालक दल के अन्य सदस्यों को समय रहते सुरक्षित बचा लिया गया। अमेरिकी अधिकारियों ने हादसे की पुष्टि करते हुए बताया कि दुर्घटना के कारणों की जांच की जा रही है। बचाव अभियान में सुरक्षित निकाला गया चालक दल रिपोर्टों के अनुसार, हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त होने के तुरंत बाद अमेरिकी सैन्य बलों ने रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। बचाव दल ने चालक दल के सभी सदस्यों को सुरक्षित निकाल लिया। प्रारंभिक जानकारी में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है। अमेरिकी प्रशासन की ओर से अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि हेलीकॉप्टर तकनीकी खराबी, मौसम संबंधी कारणों या किसी अन्य वजह से दुर्घटनाग्रस्त हुआ। रणनीतिक क्षेत्र में हुआ हादसा होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक माना जाता है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस क्षेत्र में अमेरिका, ईरान और अन्य देशों की सैन्य गतिविधियां लगातार बनी रहती हैं। ऐसे में अमेरिकी सैन्य हेलीकॉप्टर का दुर्घटनाग्रस्त होना सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है। अमेरिका-ईरान तनाव के बीच बढ़ी संवेदनशीलता यह घटना ऐसे समय हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव को कम करने तथा संभावित समझौते को लेकर कूटनीतिक प्रयास जारी हैं। हाल के दिनों में क्षेत्र में बढ़ी सैन्य गतिविधियों और संघर्ष की घटनाओं ने पहले ही सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि हादसे का सीधा संबंध किसी सैन्य कार्रवाई से है या नहीं, इसका पता जांच पूरी होने के बाद ही चल सकेगा। जांच एजेंसियां जुटीं अमेरिकी रक्षा विभाग ने दुर्घटना के कारणों का पता लगाने के लिए जांच शुरू कर दी है। हेलीकॉप्टर के फ्लाइट डेटा, तकनीकी रिकॉर्ड और घटनास्थल से जुटाए गए साक्ष्यों का विश्लेषण किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने तक दुर्घटना के कारणों को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। क्षेत्रीय हालात पर बनी हुई है नजर होर्मुज स्ट्रेट और आसपास के क्षेत्र में जारी रणनीतिक गतिविधियों के मद्देनजर अमेरिकी सैन्य बल स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। फिलहाल चालक दल के सुरक्षित होने से राहत जरूर मिली है, लेकिन दुर्घटना के वास्तविक कारणों का खुलासा जांच रिपोर्ट आने के बाद ही हो सकेगा।  

Deepshikha जून 10, 2026 0
Donald Trump and Benjamin Netanyahu amid reports of policy differences and intelligence concerns.
अमेरिका-इजरायल रिश्तों में बढ़ी दरार? जासूसी आशंकाओं के बीच पेंटागन अलर्ट मोड में

  अमेरिका और इजरायल के बीच दशकों पुराने रणनीतिक संबंधों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान में इजरायल की कथित खुफिया गतिविधियों को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। इसी बीच पश्चिम एशिया की नीतियों और ईरान संकट को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के बीच मतभेदों की खबरें भी सामने आई हैं। पेंटागन में बढ़ी सतर्कता रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा विभाग के भीतर इजरायल से जुड़े काउंटर-इंटेलिजेंस जोखिमों को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है। बताया जा रहा है कि कुछ अमेरिकी अधिकारी विदेश यात्राओं के दौरान अस्थायी संचार उपकरणों और कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल का उपयोग कर रहे हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और अमेरिकी प्रशासन ने सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी गंभीर सुरक्षा स्थिति की पुष्टि नहीं की है। खुफिया गतिविधियों को लेकर पुरानी चिंताएं फिर चर्चा में अमेरिका और इजरायल करीबी सहयोगी माने जाते हैं, लेकिन अतीत में भी दोनों देशों के बीच खुफिया गतिविधियों को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सहयोगी देशों के बीच भी संवेदनशील सूचनाओं की सुरक्षा हमेशा एक महत्वपूर्ण विषय रहती है। इसी संदर्भ में कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अमेरिकी अधिकारियों को गोपनीय चर्चाओं के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। ट्रंप और नेतन्याहू के बीच मतभेदों की चर्चा रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि ईरान, लेबनान और व्यापक पश्चिम एशिया नीति को लेकर ट्रंप और नेतन्याहू के बीच हाल के महीनों में कुछ रणनीतिक मतभेद उभरे हैं। बताया गया कि दोनों नेताओं के बीच हुई एक बातचीत के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा और सैन्य कार्रवाइयों को लेकर तीखी चर्चा हुई। इस संबंध में दोनों पक्षों की ओर से आधिकारिक विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है। इजरायल ने आरोपों को किया खारिज वॉशिंगटन स्थित इजरायली अधिकारियों ने जासूसी संबंधी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि इजरायल अपने सहयोगी देशों के खिलाफ ऐसी गतिविधियों में शामिल नहीं है। दूसरी ओर, अमेरिकी प्रशासन के कुछ अधिकारियों ने भी इन रिपोर्टों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताया है और कहा है कि अमेरिका-इजरायल सुरक्षा सहयोग पहले की तरह मजबूत बना हुआ है। पश्चिम एशिया संकट ने बढ़ाई संवेदनशीलता विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान, लेबनान और क्षेत्रीय संघर्षों से जुड़े मुद्दों ने अमेरिका और इजरायल के संबंधों को अधिक संवेदनशील बना दिया है। दोनों देशों के बीच सैन्य और खुफिया सहयोग जारी है, लेकिन क्षेत्रीय रणनीति को लेकर मतभेद समय-समय पर सामने आते रहे हैं। फिलहाल, जासूसी गतिविधियों और सुरक्षा चिंताओं से जुड़े कई दावे मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं। आधिकारिक स्तर पर इनकी पुष्टि सीमित है, इसलिए इन्हें सावधानी के साथ देखने की आवश्यकता है।  

Deepshikha जून 8, 2026 0
US military warships and aircraft deployed near Cuba amid rising tensions between Washington and Havana
क्यूबा पर सैन्य कार्रवाई की तैयारी में अमेरिका! बढ़ी सैन्य तैनाती से गहराया तनाव

अमेरिका और क्यूबा के बीच तनाव एक बार फिर तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि पेंटागन ने पिछले कुछ महीनों में क्यूबा के आसपास बड़े पैमाने पर सैन्य संसाधनों की तैनाती की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने कैरेबियाई क्षेत्र में युद्धपोत, मरीन सैनिक, निगरानी ड्रोन और मिसाइल क्षमता वाले जहाज सक्रिय किए हैं। माना जा रहा है कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका बेहद कम समय में क्यूबा के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू करने की स्थिति में है। पेंटागन ने बढ़ाई सैन्य मौजूदगी पोलिटिको की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सेना ने ऐसे सैन्य संसाधन क्षेत्र में तैनात किए हैं, जो सीमित हवाई हमलों से लेकर बड़े सैन्य अभियान तक को अंजाम देने में सक्षम माने जाते हैं। अमेरिका ने यूएसएस निमिट्ज एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप, गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर और क्रूजर जहाजों को क्षेत्र में सक्रिय किया है। ये जहाज लंबी दूरी तक सटीक मिसाइल हमले करने की क्षमता रखते हैं। इसके अलावा निगरानी ड्रोन और सैन्य विमान लगातार क्यूबा के आसपास की गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यूएसएस कियरसार्ज एम्फीबियस रेडी ग्रुप को संभावित तैनाती के लिए तैयार रखा गया है, जिसमें लगभग 2500 मरीन सैनिक शामिल हैं। पूर्व पेंटागन अधिकारी ने दिए बड़े संकेत पूर्व पेंटागन अधिकारी मार्क कैंसियन ने कहा कि यूएसएस निमिट्ज की मौजूदगी फिलहाल दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा हो सकती है, लेकिन जरूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल सैन्य अभियान में भी किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अमेरिका क्यूबा की एयर डिफेंस प्रणाली और शीर्ष नेतृत्व से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाने जैसे विकल्पों पर भी विचार कर सकता है। मार्को रुबियो ने क्यूबा को बताया सुरक्षा के लिए खतरा अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने हाल ही में कैबिनेट बैठक के दौरान क्यूबा को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया था। उन्होंने कहा कि अमेरिका के तट से केवल 90 मील दूर स्थित एक “असफल राज्य” सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा सकता है। रुबियो ने आरोप लगाया कि क्यूबा के चीन, रूस और अन्य अमेरिका विरोधी देशों के साथ बढ़ते संबंध वाशिंगटन के लिए चिंता का विषय हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका बातचीत के जरिए समाधान चाहता है, लेकिन मौजूदा क्यूबाई नेतृत्व के साथ कूटनीतिक समाधान की संभावना कमजोर नजर आती है। ट्रंप ने सैन्य कार्रवाई के संकेत दिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी हाल के दिनों में क्यूबा को लेकर सख्त बयान दिए हैं। व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा, “पिछले 50-60 सालों से कई राष्ट्रपति इस पर विचार करते रहे हैं। शायद मैं वह राष्ट्रपति बनूं जो यह कदम उठाए।” रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों और क्यूबा के प्रतिनिधियों के बीच हाल के महीनों में बातचीत भी हुई, लेकिन उससे कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार पर लगातार हमलावर है अमेरिका डोनाल्ड ट्रंप पहले भी कई बार क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार की आलोचना कर चुके हैं। उन्होंने यह तक कहा था कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भविष्य में क्यूबा के राष्ट्रपति बन सकते हैं। मार्को रुबियो मूल रूप से क्यूबाई मूल के अमेरिकी नेता हैं। माना जाता है कि उनके माता-पिता 1956 में क्यूबा के कम्युनिस्ट शासन से परेशान होकर अमेरिका चले गए थे। गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है क्यूबा इस बीच क्यूबा पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, देश में खाने-पीने की चीजों, दवाओं और बिजली की भारी कमी है। वेनेजुएला से तेल आपूर्ति घटने के बाद हालात और खराब हो गए हैं। क्यूबा सरकार ने अमेरिका पर “शासन परिवर्तन” का माहौल बनाने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। संयुक्त राष्ट्र से क्यूबा की अपील क्यूबा ने पूरे घटनाक्रम को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की मांग की है। क्यूबा के विदेश मंत्री ब्रूनो रोड्रिगेज पारिल्ला ने कहा कि अमेरिकी प्रतिबंध और सैन्य दबाव देश को मानवीय संकट की ओर धकेल रहे हैं। उन्होंने दुनिया से संभावित मानवीय तबाही रोकने के लिए आगे आने और क्यूबा के साथ एकजुटता दिखाने की अपील की। ब्रूनो रोड्रिगेज ने अमेरिका के इस दावे को भी खारिज किया कि क्यूबा अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। उन्होंने कहा कि क्यूबा शांति चाहता है और उसे शांति से जीने दिया जाना चाहिए। वैश्विक स्तर पर बढ़ सकती है चिंता विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका और क्यूबा के बीच तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर पूरे कैरेबियाई क्षेत्र और वैश्विक राजनीति पर पड़ सकता है। चीन और रूस जैसे देशों के साथ क्यूबा के संबंधों को देखते हुए यह मुद्दा केवल द्विपक्षीय विवाद नहीं, बल्कि बड़े भू-राजनीतिक संघर्ष का रूप भी ले सकता है।  

surbhi मई 29, 2026 0
Iranian airspace restrictions announced amid escalating tensions and fears of possible US military action
अमेरिकी हमले की आशंका के बीच अलर्ट मोड पर ईरान, बंद किया एयरस्पेस

Iran ने संभावित अमेरिकी सैन्य हमलों की आशंका के बीच अपना एयरस्पेस पूरी तरह बंद कर दिया है। क्षेत्र में बढ़ते तनाव और रुकती कूटनीतिक बातचीत के बीच यह फैसला लिया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, United States ईरान के खिलाफ नए सैन्य ऑपरेशन पर विचार कर रहा है। अमेरिकी हमले की तैयारी की रिपोर्ट अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, व्हाइट हाउस और रक्षा विभाग के भीतर ईरान के खिलाफ संभावित नए हमलों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। सूत्रों का दावा है कि यदि अगले 24 घंटों में कोई बड़ी कूटनीतिक सफलता नहीं मिलती, तो राष्ट्रपति Donald Trump बड़े स्तर पर सैन्य कार्रवाई को मंजूरी दे सकते हैं। प्रशासन की ओर से अभी तक किसी अंतिम फैसले की औपचारिक पुष्टि नहीं की गई है। इसके बावजूद अमेरिकी सेना और खुफिया एजेंसियों के कई अधिकारियों ने अपनी मेमोरियल डे वीकेंड छुट्टियां रद्द कर दी हैं। ट्रंप ने रद्द किया वीकेंड कार्यक्रम तनावपूर्ण हालात के बीच राष्ट्रपति ट्रंप को न्यू जर्सी में अपना वीकेंड कार्यक्रम छोड़कर वॉशिंगटन लौटना पड़ा। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि मौजूदा सरकारी परिस्थितियों के कारण उनका व्हाइट हाउस में रहना ज्यादा जरूरी है। ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि वह अपने बेटे डोनाल्ड ट्रंप जूनियर की शादी में शामिल नहीं हो पाएंगे। उन्होंने कहा कि देश की मौजूदा स्थिति को देखते हुए राष्ट्रीय जिम्मेदारियां प्राथमिकता हैं। ईरान-अमेरिका बातचीत फिर अटकी दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत जारी रहने के बावजूद शांति वार्ता फिलहाल ठप मानी जा रही है। विवाद की सबसे बड़ी वजह ईरान का संवर्धित यूरेनियम कार्यक्रम बना हुआ है। अमेरिका का कहना है कि ईरान को न केवल परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना होगा, बल्कि उसके पास मौजूद संवर्धित यूरेनियम भी हटाना होगा। दूसरी ओर ईरान इस मांग को मानने के लिए तैयार नहीं है और अपने परमाणु कार्यक्रम को राष्ट्रीय अधिकार बता रहा है। सीजफायर के बावजूद कायम है तनाव अप्रैल में घोषित अस्थायी सीजफायर अब भी तकनीकी रूप से लागू है, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में छिटपुट हमलों और सैन्य गतिविधियों की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। इसी वजह से मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कूटनीतिक बातचीत विफल रहती है, तो आने वाले दिनों में क्षेत्रीय संघर्ष और गहरा सकता है।  

surbhi मई 23, 2026 0
Donald Trump speaks after China visit amid reports of possible US action against Iran
चीन दौरे से लौटते ही ईरान पर फिर सख्त हुए ट्रंप, ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी 2.0’ की तैयारी का दावा

अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के चीन दौरे से लौटने के बाद एक बार फिर मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर कूटनीतिक प्रयास विफल होते हैं तो अमेरिका ईरान पर दोबारा बड़े हवाई हमले कर सकता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी रक्षा मुख्यालय Pentagon संभावित सैन्य कार्रवाई के लिए पूरी तैयारी में जुटा हुआ है। ‘शांति प्रस्ताव पसंद नहीं आया’ रिपोर्ट के अनुसार, ईरान की ओर से भेजे गए हालिया शांति प्रस्ताव को ट्रंप ने खारिज कर दिया। उन्होंने कथित तौर पर कहा, “मैंने उस प्रस्ताव को देखा और उसकी पहली लाइन ही मुझे पसंद नहीं आई, इसलिए मैंने उसे फेंक दिया।” ट्रंप के इस बयान को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी 2.0’ की तैयारी? अमेरिकी अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पिछले संघर्ष के दौरान रोके गए “Operation Epic Fury” को नए रूप में फिर शुरू करने की योजना बनाई जा रही है। हालांकि, अमेरिकी प्रशासन की ओर से आधिकारिक तौर पर “Operation Epic Fury 2.0” नाम की किसी सैन्य कार्रवाई की पुष्टि नहीं की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी और इजरायली सेनाएं संयुक्त युद्धाभ्यास और सैन्य तैयारियों में लगी हुई हैं। अगले सप्ताह हमले की आशंका? मध्य पूर्व के कुछ अधिकारियों के हवाले से दावा किया गया है कि सैन्य तैयारियां काफी आगे बढ़ चुकी हैं और जरूरत पड़ने पर अगले सप्ताह की शुरुआत में कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। होर्मुज स्ट्रेट बना वैश्विक चिंता का केंद्र तनाव के बीच Strait of Hormuz को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। दुनिया के कई देश चाहते हैं कि वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित होने से बचाने के लिए इस समुद्री मार्ग को खुला रखा जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बढ़ता है तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल बाजार, शिपिंग और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। सीजफायर के बाद फिर बढ़ा तनाव पिछले महीने संघर्षविराम के बाद कुछ समय के लिए हालात शांत हुए थे, लेकिन अब दोनों पक्षों के बयानों और सैन्य गतिविधियों ने एक बार फिर तनाव बढ़ा दिया है। ईरान पहले ही साफ कर चुका है कि किसी भी हमले का जवाब दिया जाएगा, जबकि अमेरिका लगातार यह कहता रहा है कि वह ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा। दुनिया की नजर मध्य पूर्व पर मध्य पूर्व में जारी घटनाक्रम पर दुनिया की नजर बनी हुई है। अमेरिका, ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों के बीच बढ़ती गतिविधियों ने क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। किसी आधिकारिक सैन्य कार्रवाई की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट्स और राजनीतिक बयानों ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को फिर से सक्रिय कर दिया है।  

surbhi मई 16, 2026 0
Satellite imagery showing damage at US military bases in the Middle East after reported Iranian strikes
Middle East War: ईरानी हमलों से अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बड़ा नुकसान! 8 देशों में 16 बेस क्षतिग्रस्त होने का दावा

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरानी हमलों में 8 देशों में फैले अमेरिका के कम से कम 16 सैन्य ठिकाने क्षतिग्रस्त हुए हैं, जिससे क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य रणनीति और सुरक्षा तैयारियों पर सवाल खड़े हो गए हैं। CNN रिपोर्ट में बड़ा दावा CNN की रिपोर्ट के अनुसार, जांच और सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि ईरान ने हालिया हमलों में अमेरिका के कई अहम सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इन हमलों में खासतौर पर: एडवांस्ड रडार सिस्टम कम्युनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर एयरक्राफ्ट और सपोर्ट सिस्टम को टारगेट किया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ ठिकाने इतने ज्यादा क्षतिग्रस्त हुए हैं कि वे फिलहाल आंशिक इस्तेमाल के लायक भी नहीं बचे। 8 देशों में फैले ठिकाने बने निशाना रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के जिन सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया, वे मिडिल ईस्ट और खाड़ी क्षेत्र के 8 अलग-अलग देशों में स्थित हैं। हालांकि सभी देशों के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन यह अमेरिकी क्षेत्रीय सैन्य नेटवर्क के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। इन ठिकानों का इस्तेमाल आमतौर पर: निगरानी अभियानों एयर ऑपरेशंस लॉजिस्टिक सपोर्ट क्षेत्रीय सुरक्षा समन्वय के लिए किया जाता है। मरम्मत या बंद? अमेरिका के सामने चुनौती रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी और खाड़ी देशों के अधिकारियों के बीच इस बात पर मतभेद है कि इन ठिकानों की मरम्मत की जाए या कुछ को स्थायी रूप से बंद कर दिया जाए। कुछ अधिकारी मानते हैं कि इन ठिकानों को दोबारा तैयार करना बेहद महंगा और समय लेने वाला होगा। वहीं, रणनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि इन बेस को छोड़ना अमेरिका के लिए क्षेत्रीय प्रभाव कम कर सकता है। महंगे सिस्टम को हुआ नुकसान ईरानी हमलों में जिन सिस्टम्स को नुकसान पहुंचा है, उनमें हाई-टेक रडार और कम्युनिकेशन नेटवर्क शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ये सिस्टम सीमित संख्या में उपलब्ध होते हैं और इन्हें बदलना काफी महंगा साबित हो सकता है। यही वजह है कि इन हमलों को सिर्फ सामरिक नहीं, बल्कि आर्थिक झटका भी माना जा रहा है। युद्ध में अमेरिका का भारी खर्च पेंटागन के कंट्रोलर जूल्स जे हर्स्ट III ने अमेरिकी सांसदों को बताया कि ईरान के साथ संघर्ष में अब तक अमेरिका करीब 25 अरब डॉलर खर्च कर चुका है। हालांकि कुछ आकलनों के मुताबिक, वास्तविक खर्च 40 से 50 अरब डॉलर के बीच हो सकता है। अमेरिकी मौजूदगी पर उठे सवाल मिडिल ईस्ट में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी लंबे समय से उसकी रणनीतिक नीति का हिस्सा रही है। लेकिन लगातार हमलों और बढ़ते खर्च ने इस मॉडल पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऐसे हमले जारी रहे, तो अमेरिका को क्षेत्र में अपनी सैन्य रणनीति पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है। बढ़ता क्षेत्रीय तनाव ईरान और अमेरिका के बीच तनाव पहले से ही चरम पर है। परमाणु विवाद, समुद्री मार्गों पर नियंत्रण और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर दोनों देशों में टकराव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हुए हमलों ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। आगे क्या? फिलहाल अमेरिका की ओर से इन दावों पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन रिपोर्ट्स के बाद यह साफ है कि मिडिल ईस्ट में संघर्ष केवल राजनीतिक या आर्थिक नहीं, बल्कि अब सैन्य ढांचे को भी सीधे प्रभावित कर रहा है।

surbhi मई 2, 2026 0
US military personnel and armored vehicles at an American base in Germany amid troop withdrawal plans
US Troops Germany: जर्मनी से 5000 सैनिक वापस बुलाएगा अमेरिका, ईरान युद्ध पर ट्रंप-यूरोप में बढ़ी खाई

अमेरिका ने यूरोप में अपनी सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए जर्मनी से 5,000 सैनिक वापस बुलाने का फैसला किया है। पेंटागन ने शुक्रवार को इसकी आधिकारिक घोषणा की। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब ईरान को लेकर जारी तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप और यूरोपीय देशों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। 6-12 महीनों में पूरी होगी वापसी पेंटागन के अनुसार, सैनिकों की वापसी चरणबद्ध तरीके से अगले 6 से 12 महीनों में पूरी की जाएगी। इस फैसले के बाद यूरोप में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या घटकर 2022 से पहले के स्तर के करीब आ जाएगी। जर्मनी में अमेरिका की मजबूत सैन्य मौजूदगी जर्मनी में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति यूरोप में सबसे बड़ी मानी जाती है। फिलहाल वहां करीब 35,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जबकि पूरे यूरोप में यह संख्या 80,000 से 1,00,000 के बीच रहती है। जर्मनी में अमेरिका के कई अहम सैन्य ठिकाने मौजूद हैं, जिनमें: रामस्टीन एयर बेस – यूरोप में अमेरिकी वायुसेना का सबसे बड़ा केंद्र पैच बैरक्स – यूएस यूरोपियन और अफ्रीका कमांड का मुख्यालय विस्बाडेन – यूरोप-अफ्रीका कमान का संचालन केंद्र लैंडस्टुहल रीजनल मेडिकल सेंटर – अमेरिका के बाहर सबसे बड़ा सैन्य अस्पताल इसके अलावा ग्राफेनवोहर, होहेनफेल्स और स्पैंगडाहलेम जैसे कई बड़े ट्रेनिंग और एयर बेस भी यहीं स्थित हैं। क्यों बढ़ी अमेरिका-यूरोप में तकरार? यह फैसला ऐसे समय आया है, जब यूरोपीय देशों के साथ अमेरिका के रिश्तों में तनाव बढ़ रहा है। खासतौर पर जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के उस बयान के बाद विवाद गहरा गया, जिसमें उन्होंने ईरान के साथ बातचीत में अमेरिका के “अपमानित” होने की बात कही थी। इस पर जवाब देते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि जर्मनी को ईरान पर टिप्पणी करने के बजाय यूक्रेन युद्ध खत्म करने और अपने आंतरिक हालात सुधारने पर ध्यान देना चाहिए। यूरोप के समर्थन की कमी पर नाराजगी रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका इस बात से भी नाराज है कि कई यूरोपीय देशों ने ईरान के खिलाफ उसके सैन्य अभियानों में अपेक्षित समर्थन नहीं दिया। विशेष रूप से: स्पेन ने सहयोग से इनकार किया इटली ने भी सीमित समर्थन दिया इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और अन्य नेताओं के साथ भी ट्रंप के मतभेद सामने आए हैं। नाटो सहयोगियों पर ट्रंप का आरोप डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से नाटो सहयोगियों पर आरोप लगाते रहे हैं कि वे अमेरिकी सुरक्षा ढांचे का फायदा उठाते हैं, लेकिन पर्याप्त योगदान नहीं करते। उन्होंने खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा में यूरोपीय देशों की निष्क्रियता पर सवाल उठाए। ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों पर असर विशेषज्ञों का मानना है कि जर्मनी से सैनिकों की वापसी का यह फैसला ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों पर दबाव बढ़ा सकता है। अमेरिका चाहता है कि यूरोप अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठाए और नाटो में ज्यादा खर्च करे।

surbhi मई 2, 2026 0
JD Vance questions Pentagon briefings on Iran war amid tensions with Defense Secretary Pete Hegseth
ईरान युद्ध पर ट्रंप को गलत जानकारी? जेडी वेंस को अपने ही रक्षा मंत्री पर शक

बंद कमरे की बैठकों में उठाए गंभीर सवाल अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान युद्ध को लेकर ट्रंप प्रशासन के भीतर नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वेंस को आशंका है कि रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को युद्ध की वास्तविक स्थिति से अलग तस्वीर दिखा रहे हैं। बताया जा रहा है कि निजी बैठकों में वेंस ने सवाल उठाया कि क्या पेंटागन ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान की वास्तविक स्थिति बता रहा है या केवल सकारात्मक तस्वीर पेश की जा रही है। मिसाइल भंडार को लेकर बढ़ी चिंता वेंस की सबसे बड़ी चिंता अमेरिकी मिसाइल भंडार को लेकर है। उनका मानना है कि ईरान युद्ध में बड़ी मात्रा में हथियार खर्च हो रहे हैं, जिससे भविष्य में चीन, रूस या उत्तर कोरिया जैसे देशों के साथ संभावित संघर्ष की स्थिति में अमेरिका कमजोर पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, वेंस ने यह चिंता सीधे राष्ट्रपति ट्रंप के सामने भी रखी है। हेगसेथ पर सीधे आरोप से बच रहे वेंस हालांकि, जेडी वेंस ने अब तक सार्वजनिक रूप से पीट हेगसेथ की आलोचना नहीं की है। उन्होंने कई मौकों पर रक्षा मंत्री की तारीफ भी की है। सूत्रों का कहना है कि वेंस इस मुद्दे को व्यक्तिगत टकराव में बदलने से बचना चाहते हैं। लेकिन उनके करीबी मानते हैं कि पेंटागन की तरफ से पेश की जा रही तस्वीर जरूरत से ज्यादा आशावादी है। खुफिया रिपोर्ट और दावों में अंतर पीट हेगसेथ लगातार दावा कर रहे हैं कि अमेरिका ने ईरान की वायुसेना, नौसेना और रक्षा ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है। लेकिन आंतरिक खुफिया आकलनों में तस्वीर कुछ अलग बताई जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान अब भी अपनी वायुसेना और मिसाइल क्षमता का बड़ा हिस्सा बचाने में सफल रहा है। 2028 की राजनीति पर भी असर विश्लेषकों का मानना है कि जेडी वेंस का राजनीतिक भविष्य भी इस युद्ध के नतीजों से जुड़ा हुआ है। यदि ईरान युद्ध लंबा खिंचता है या अमेरिका को भारी नुकसान उठाना पड़ता है, तो इसका असर 2028 के राष्ट्रपति चुनाव में वेंस की संभावनाओं पर पड़ सकता है। ट्रंप प्रशासन में बढ़ सकती है खींचतान ईरान युद्ध को लेकर व्हाइट हाउस के भीतर मतभेद सामने आने से साफ है कि ट्रंप प्रशासन के शीर्ष स्तर पर रणनीति को लेकर एकराय नहीं है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ट्रंप अपने उपराष्ट्रपति की चिंताओं को कितना महत्व देते हैं और पेंटागन की रणनीति में कोई बदलाव करते हैं या नहीं।  

surbhi अप्रैल 29, 2026 0
US President Donald Trump proposes $1.5 trillion defense budget with focus on Golden Dome missile system and new battleships
ट्रंप का बड़ा दांव: 1.5 ट्रिलियन डॉलर रक्षा बजट की मांग, क्या है प्लान?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2027 वित्तीय वर्ष के लिए 1.5 ट्रिलियन डॉलर (करीब 139 लाख करोड़ रुपये) के विशाल रक्षा बजट का प्रस्ताव रखा है। अगर इसे कांग्रेस मंजूरी देती है, तो यह अमेरिका के इतिहास का सबसे बड़ा रक्षा बजट होगा। 42% की रिकॉर्ड बढ़ोतरी यह बजट पिछले साल के मुकाबले करीब 42% ज्यादा है रक्षा खर्च में इतनी बड़ी बढ़ोतरी पहले कभी नहीं देखी गई ‘गोल्डन डोम’ डिफेंस सिस्टम पर फोकस इस बजट में ट्रंप के प्रस्तावित ‘Golden Dome’ मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए फंड शामिल है इसका उद्देश्य अमेरिका को आधुनिक और अगली पीढ़ी के हवाई खतरों से बचाना है नए ‘Trump-Class’ बैटलशिप बजट में दर्जनों सैन्य जहाजों के निर्माण का प्रावधान अमेरिकी नौसेना के लिए नई ‘Trump-Class’ बैटलशिप सीरीज भी शामिल घरेलू उत्पादन पर जोर यह प्रस्ताव ट्रंप प्रशासन के घरेलू रक्षा उत्पादन और बड़े प्रोजेक्ट्स पर फोकस को दर्शाता है इसका मकसद अमेरिका की मिलिट्री ताकत को और मजबूत करना है ईरान युद्ध से अलग बजट यह रक्षा बजट प्रस्ताव ईरान के साथ चल रहे संघर्ष से अलग है पेंटागन ने ‘Operation Epic Fury’ के लिए अलग से 200 अरब डॉलर (करीब 18.5 लाख करोड़ रुपये) की मांग की है क्या है इसका मतलब? अमेरिका अपनी सैन्य ताकत को अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ाने की तैयारी में है बढ़ते वैश्विक तनाव और तकनीकी युद्ध को देखते हुए यह कदम रणनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है

surbhi अप्रैल 4, 2026 0
Damaged US military base in Middle East after Iranian missile and drone attacks
मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर: रिपोर्ट में दावा—ईरानी हमलों से अमेरिका के 13 सैन्य ठिकाने तबाह, सैनिकों को होटल में लेना पड़ा शरण

मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। The New York Times की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान द्वारा किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों में अमेरिका के कम से कम 13 सैन्य ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचा है। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि कई बेस अब संचालन के लायक नहीं बचे, जिससे अमेरिकी सैनिकों को अस्थायी रूप से होटल और दफ्तरों में शरण लेनी पड़ रही है। कुवैत में सबसे ज्यादा तबाही रिपोर्ट के मुताबिक कुवैत में स्थित अमेरिकी ठिकानों को सबसे अधिक नुकसान हुआ है। पोर्ट शुवैबा, अली अल सलेम एयर बेस और कैंप बुहरिंग जैसे प्रमुख ठिकानों पर हमलों से ऑपरेशनल सेंटर, विमानन ढांचा और ईंधन आपूर्ति सिस्टम गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं। इससे सैन्य आपूर्ति श्रृंखला और सुरक्षा व्यवस्था पर गहरा असर पड़ा है। कतर, बहरीन और सऊदी अरब भी निशाने पर ईरानी हमलों का असर केवल कुवैत तक सीमित नहीं रहा। अल उदेद एयर बेस (कतर) में स्थित अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुख्यालय का अर्ली वार्निंग रडार सिस्टम क्षतिग्रस्त हो गया। वहीं बहरीन में अमेरिकी फिफ्थ फ्लीट के संचार उपकरणों और सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर रिफ्यूलिंग टैंकरों को भी नुकसान पहुंचा है। ‘रिमोट वॉरफेयर’ की स्थिति सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, मौजूदा हालात ‘रिमोट वॉरफेयर’ का रूप ले चुके हैं, जहां सैनिक स्थायी बेस के बजाय अस्थायी ठिकानों से ऑपरेशन चला रहे हैं। इससे समन्वय और प्रतिक्रिया समय पर असर पड़ रहा है। सैनिकों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया लगातार हमलों के चलते अमेरिकी सैनिकों को बेस से हटाकर अलग-अलग सुरक्षित स्थानों, जैसे होटल और कार्यालयों में ठहराया जा रहा है। इससे सैन्य संचालन में कठिनाई और जोखिम दोनों बढ़ गए हैं। ईरान की चेतावनी और जवाबी कार्रवाई Islamic Revolutionary Guard Corps ने अमेरिका और इजरायल को कड़ी चेतावनी दी है कि वे जमीनी युद्ध से बचें। साथ ही ईरान ने ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस-4’ के तहत इजरायल के कई शहरों—हाइफा, डिमोना और तेल अवीव—पर मिसाइल हमलों का दावा किया है। अमेरिका की जवाबी तैयारी दूसरी ओर, Pentagon मिडिल ईस्ट में अपनी 82nd एयरबोर्न डिवीजन की तैनाती की तैयारी कर रहा है। यह यूनिट आपात स्थितियों में तेजी से कार्रवाई के लिए जानी जाती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ईरान के रणनीतिक ठिकानों पर आगे और हमले करने की योजना बना रहा है। बढ़ता खतरा, टलती कूटनीति ईरान के विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल किसी भी युद्धविराम या समझौते का सवाल नहीं है। उनका कहना है कि देश ‘प्रतिरोध’ की नीति पर कायम रहेगा। ऐसे में क्षेत्र में तनाव और बढ़ने की आशंका है।  

kalpana मार्च 26, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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इंग्लैंड से सीरीज हार के बाद टीम इंडिया का होगा प्रदर्शन रिव्यू, BCCI करेगा खिलाड़ियों और कोचिंग स्टाफ का मूल्यांकन

anjali kumari जुलाई 11, 2026 0