रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए चल रही सियासी जंग अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। 18 जून को सुबह नौ बजे से चार बजे तक विधानसभा भवन में वोट डाले जाएंगे। इसके ठीक बाद शाम पांच बजे से वोटों की गिनती शुरू होगी। कागज पर सत्ताधारी गठबंधन का पलड़ा भारी है, लेकिन राज्यसभा की अनूठी वोटिंग प्रक्रिया और क्रॉस वोटिंग के अंदरूनी खतरे ने राज्य के सियासी पारे को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राज्यसभा चुनाव में पार्टियां भले ही व्हिप जारी कर दें, लेकिन विधायक मुख्य रूप से चार शातिर तरीकों से अपनी ही पार्टी को गच्चा देते आए हैं। पहला (सीधा बगावती रास्ता) : इसमें विधायक पार्टी के अधिकृत फरमान को सीधे दरकिनार करते हुए खुलेआम विरोधी उम्मीदवार के पक्ष में पहली वरीयता का वोट डाल देते हैं। दूसरा (एजेंट से आंख मिचौली) : नियमों के मुताबिक विधायकों को अपने दल के पोलिंग एजेंट को बैलेट पेपर दिखाना होता है। लेकिन, क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायक जानबूझकर एजेंट को बैलेट पेपर दिखाए बिना ही उसे मतपेटी में डाल देते हैं। हालांकि ऐसे मामलों में बाद में पार्टी कार्रवाई कर सकती है, लेकिन वोट काउंट हो जाता है। तीसरा (तकनीकी खेल – वोट रिजेक्ट कराना) : इस तरीके में विधायक अपनी पार्टी के दबाव से बचने के लिए पेन से टिक मार्क लगाने या वरीयता अंक लिखने में ऐसी जानबूझकर तकनीकी गलती कर देते हैं, जिससे उनका वोट अवैध घोषित हो जाए। इससे पार्टी का कुल वोट बैंक घट जाता है। चौथा (सदन से ‘रहस्यमयी’ तरीके से गायब होना) : वोटिंग के ठीक पहले या वोटिंग के दिन विधायक अचानक बीमारी या किसी अन्य बहाने से सदन से नदारद हो जाते हैं। इससे जीत के लिए आवश्यक न्यूनतम वोटों का ‘कोरम’ (कोटा) कम हो जाता है। जिसका सीधा फायदा विरोधी खेमे को मिलता है।
रांची। झारखंड में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। क्रॉस वोटिंग की आशंका को देखते हुए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने अपने सभी विधायकों को रांची के होटल रेडिसन ब्लू में ठहराने का फैसला किया है। चुनाव संपन्न होने तक सभी विधायक एक साथ इसी होटल में रहेंगे और यहीं से चुनावी रणनीति तैयार की जाएगी। एक साथ रहेंगे, एक साथ करेंगे मतदान गठबंधन नेतृत्व ने सभी एनडीए विधायकों को निर्धारित समय तक होटल पहुंचने के निर्देश दिए हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार, मतदान तक सभी विधायक एक ही स्थान पर रहेंगे, ताकि संगठनात्मक एकजुटता बनी रहे और किसी भी तरह की क्रॉस वोटिंग की संभावना को रोका जा सके। मतदान के दिन सभी विधायक होटल से एक साथ विधानसभा के लिए रवाना होंगे। इस दौरान उन्हें राज्यसभा चुनाव की मतदान प्रक्रिया और वरीयता क्रम के अनुसार वोट डालने का प्रशिक्षण भी दिया जा सकता है। परिमल नथवाणी की जीत पर पूरा जोर एनडीए इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवाणी की जीत सुनिश्चित करने के लिए पूरी ताकत लगा रहा है। राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए प्रथम वरीयता के 28 मतों की आवश्यकता होती है। फिलहाल एनडीए के पास कुल 24 विधायक हैं, जिनमें भाजपा के 21 तथा आजसू, लोजपा और जदयू के एक-एक विधायक शामिल हैं। चार अतिरिक्त वोट जुटाने की रणनीति बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए एनडीए को अभी चार और वोटों की जरूरत है। माना जा रहा है कि होटल में आयोजित बैठकों के दौरान इन्हीं अतिरिक्त मतों के समर्थन को लेकर रणनीति तैयार की जाएगी। गठबंधन नेतृत्व का उद्देश्य न केवल अपने विधायकों को एकजुट रखना है, बल्कि चुनाव के दौरान किसी भी तरह की राजनीतिक टूट-फूट या क्रॉस वोटिंग की संभावना को भी पूरी तरह खत्म करना है। ऐसे में राज्यसभा चुनाव से पहले एनडीए की यह बाड़ेबंदी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है।
रांची। झारखंड में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। दो सीटों के लिए हो रहे इस चुनाव में झामुमो के बैद्यनाथ राम, कांग्रेस के प्रणव झा और भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी मैदान में हैं। चुनावी गणित के बीच सबसे अधिक दबाव कांग्रेस पर दिखाई दे रहा है, जिसे अपने उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने के साथ-साथ किसी बड़ी राजनीतिक असहज स्थिति से भी बचना होगा। विधानसभा में पार्टी के 34 विधायक हैं झामुमो उम्मीदवार बैद्यनाथ राम की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। विधानसभा में पार्टी के 34 विधायक हैं, जबकि जीत के लिए केवल 28 मतों की आवश्यकता है। ऐसे में उनकी जीत लगभग तय मानी जा रही है। दूसरी ओर कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की राह अपेक्षाकृत कठिन है। उन्हें झामुमो के अतिरिक्त वोटों के साथ कांग्रेस, राजद और भाकपा (माले) के सभी विधायकों का समर्थन चाहिए, ताकि 28 का आवश्यक आंकड़ा पूरा हो सके। हालांकि, चुनाव को लेकर सबसे बड़ी चिंता क्रॉस वोटिंग की आशंका है। यदि गठबंधन के एक-दो विधायक भी पार्टी लाइन से हटकर मतदान करते हैं या वोट अमान्य हो जाता है, तो कांग्रेस की रणनीति प्रभावित हो सकती है। इसी कारण सत्तारूढ़ गठबंधन अपने विधायकों को एकजुट रखने की कोशिश में जुटा है। भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी है इस बीच भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी लगातार सक्रिय हैं और विभिन्न नेताओं से मुलाकात कर समर्थन जुटाने का प्रयास कर रहे हैं। एनडीए के पास 24 विधायक हैं, जबकि जीत के लिए उन्हें कम से कम चार अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नाथवानी की कोशिश सत्तारूढ़ गठबंधन में सेंध लगाने की रहेगी। वर्तमान विधानसभा संख्या बल के अनुसार महागठबंधन के पास 56 और एनडीए के पास 24 विधायक हैं। ऐसे में चुनाव का परिणाम काफी हद तक दलों की एकजुटता और क्रॉस वोटिंग की स्थिति पर निर्भर करेगा। 18 जून का मतदान झारखंड की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा साबित हो सकता है। '
रांची। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश कार्यालय में सोमवार को प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू की अध्यक्षता में प्रदेश पदाधिकारियों की बैठक हुई। इसमें संगठन महामंत्री कर्मवीर सिंह, नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी समेत सभी प्रदेश पदाधिकारी मौजूद रहे। बैठक में संगठनात्मक गतिविधियों की समीक्षा के साथ आगामी कार्यक्रमों और पार्टी की रणनीतियों पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए प्रदेश महामंत्री अमर कुमार बाउरी ने बताया कि राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के निर्देशानुसार अब प्रत्येक माह की 15 तारीख को प्रदेश पदाधिकारियों की बैठक होगी। उन्होंने कहा कि आज की बैठक में पूर्व में किए गए कार्यों की समीक्षा की गई और आने वाले कार्यक्रमों को लेकर रूपरेखा तय की गई। एसआईआर को बूथ स्तर तक मजबूत करने पर जोर एसआईआर पर अमर बाउरी ने कहा कि भाजपा ने अपने सभी जिलों में प्रशिक्षण कार्यक्रम पूरा कर लिया है, जबकि सरकार की ओर से अभी प्रशिक्षण का कार्य पूरा नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि बूथ स्तर तक एसआईआर को प्रभावी ढंग से लागू करवाना भाजपा की प्राथमिकताओं में शामिल है और इसके लिए संगठन स्तर पर लगातार काम किया जा रहा है। राज्यसभा चुनाव में जीत का दावा राज्यसभा चुनाव को लेकर भाजपा प्रदेश महामंत्री ने दावा किया कि पार्टी का उम्मीदवार पूर्ण बहुमत के साथ जीत हासिल करेगा। उन्होंने कांग्रेस के बयानों पर पलटवार करते हुए कहा कि यदि कांग्रेस के पास पर्याप्त संख्या बल है, तो उसे किसी प्रकार की चिंता नहीं होनी चाहिए। बाउरी ने कहा कि भाजपा राज्यसभा चुनाव को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है और पार्टी का प्रत्याशी विजयी होगा।
रांची। झारखंड में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। इसी बीच भाजपा विधायक प्रकाश राम की तबीयत अचानक बिगड़ने से सियासी हलकों में हलचल बढ़ गई है। उन्हें रांची के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा है। हालांकि भाजपा नेताओं का कहना है कि उनकी हालत स्थिर है और मतदान तक उनके स्वस्थ होकर विधानसभा पहुंचने की पूरी उम्मीद है। मतदान से पहले बढ़ी चुनावी चिंता प्रकाश राम के अस्पताल में भर्ती होने की खबर के बाद भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी की चुनावी रणनीति को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। हालांकि पार्टी नेताओं का दावा है कि विधायक मतदान में हिस्सा लेंगे और इससे चुनावी गणित पर कोई असर नहीं पड़ेगा। प्रकाश राम का राजनीतिक सफर लातेहार से विधायक प्रकाश राम का राजनीतिक सफर काफी दिलचस्प रहा है। वह सबसे पहले झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम) के टिकट पर विधायक बने थे। बाद में उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। 2024 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने तत्कालीन मंत्री और वर्तमान राज्यसभा उम्मीदवार बैजनाथ राम को हराकर जीत दर्ज की थी। दो सीटों पर कांटे की टक्कर झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए मुकाबला बेहद दिलचस्प माना जा रहा है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने बैजनाथ राम, कांग्रेस ने प्रणव झा, जबकि भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में परिमल नाथवानी मैदान में हैं। इंडिया गठबंधन के सामने अपने 56 विधायकों को एकजुट बनाए रखने की चुनौती है, जबकि परिमल नाथवानी को एनडीए के 24 विधायकों के अलावा अतिरिक्त चार वोट जुटाने होंगे। ऐसे में प्रत्येक विधायक का वोट बेहद अहम माना जा रहा है। बैठकों और संपर्क अभियान पर जोर चुनाव से पहले परिमल नाथवानी ने भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास से मुलाकात की, जिसे राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वहीं भाजपा ने सोमवार शाम अपने विधायकों की बैठक भी बुलाई है, जिसमें राज्यसभा चुनाव की रणनीति, विधायकों की एकजुटता और मतदान की तैयारियों पर चर्चा होने की संभावना है। 18 जून को होने वाले मतदान से पहले झारखंड की राजनीति में हर गतिविधि पर नजर बनी हुई है और सभी दल अपने-अपने विधायकों को एकजुट रखने की कोशिश में जुटे हैं।
रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर कांग्रेस ने अपने विधायकों को एकजुट रखने की पुख्ता तैयारी कर ली है। पार्टी किसी भी तरह की चूक नहीं चाहती। इससे बचने के लिए पार्टी विधायकों पर विशेष नजर बनाए हुए है और संगठन के वरिष्ठ नेताओं को अहम जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, विधायक दल के नेता प्रदीप यादव समेत कई वरिष्ठ नेताओं को विधायकों के साथ लगातार संपर्क में रहने और मतदान प्रक्रिया को लेकर समन्वय बनाए रखने का निर्देश दिया गया है। साथ ही विधायकों की समस्याओं और सुझावों को पार्टी आलाकमान तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी तय की गई है। मुख्यमंत्री आवास में रात्रिभोज कांग्रेस को झामुमो के समर्थन के बाद अपने उम्मीदवार की जीत को लेकर भरोसा है। हालांकि पार्टी किसी भी तरह की ढिलाई नहीं बरतना चाहती और हर विधायक के साथ लगातार संवाद बनाए हुए है। राजनीतिक गलियारों में मुख्यमंत्री आवास पर लगातार दो दिनों तक आयोजित रात्रिभोज की चर्चा भी तेज है। माना जा रहा है कि इन बैठकों के जरिए गठबंधन दलों के बीच बेहतर समन्वय और एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ पर्यवेक्षक आ रहे रांची राज्यसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ पर्यवेक्षक अजय शर्मा, नासिर हुसैन और प्रदेश प्रभारी के रांची पहुंचने की संभावना है। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री के साथ रात्रिभोज के दौरान उनकी महत्वपूर्ण बैठक भी हो सकती है, जिसमें चुनावी रणनीति और गठबंधन की मजबूती पर चर्चा होगी। विधायकों के संपर्क में प्रदीप यादव विधायक दल के नेता प्रदीप यादव लगातार कांग्रेस विधायकों के संपर्क में हैं। पार्टी नेतृत्व की कोशिश है कि मतदान के दौरान कोई भी विधायक पार्टी लाइन से अलग न जाए। यही वजह है कि रांची से लेकर नई दिल्ली तक कांग्रेस नेतृत्व पूरी तरह सक्रिय नजर आ रहा है।
राज्यसभा चुनाव का दो तीन चरणों के समाप्त होने के बाद अब सबकी निगाहें 18 जून पर टिकी है। क्योंकि भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी का नोमिनेशन पेपर निर्वाची पदाधिकारी द्वारा Valid करार दिए जाने के बाद मतदान सुनिश्चित हो गया है। इसलिए कि दो सीटों के विरुद्ध अब चुनाव मैदान में तीन प्रत्याशी हो गए हैं। झामुमो से बैजनाथ राम, कांग्रेस से प्रणव झा और निर्दलीय परिमल नाथवानी। इस स्थिति में अब राजनीतिक दलों के अधिकृत पोलिंग एजेंट की नियुक्ति और उसकी भूमिका सबसे अधिक प्रभावकारी होने वाली है। क्योंकि प्रत्येक राजनीतिक दल के विधायकों को अपनी पार्टी के अधिकृत पोलिंग एजेंट को बैलेट पेपर दिखाने की बाध्यता है। यह अलग बात है कि विधायक अपनी पार्टी के अधिकृत पोलिंग एजेंट को अपना बैलेट पेपर सिर्फ दिखाने के लिए बाध्य हैं। क्योंकि बैलेट पेपर नहीं दिखाने पर उनका मत रद्द किया जा सकता है। जबकि क्रास वोटिंग करने के बाद भी अगर वह विधायक अपना मतपत्र दिखा भर देता है तो उसका मत रद्द नहीं होगा। इस प्रावधान के कारण अब पोलिंग एजेंटों की नियुक्ति काफी अहम मानी जा रही है। क्योंकि मतदान के दिन संबंधित राजनीतिक दल के अधिकृत पोलिंग एजेंट की इंटीग्रिटी काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। अब सारा दारोमदार पोलिंग एजेंट पर ही जाकर टिकता है, जो यह स्पष्ट कर सकेगा कि उनके दल का अमुक विधायक पार्टी लाइन से इतर जाकर क्रास वोटिंग किया है। अगर किसी दल का विधायक और उसका पोलिंग एजेंट सेटिंग कर लेता है तो क्रास वोटिंग करने वाले विधायक की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। झारखंड में ऐसा हुआ भी है जब माले, कांग्रेस और अन्य दलों के विधायकों ने क्रास वोटिंग किया, लेकिन विधायक और पोलिंग एजेंट के बीच बनी अंदरुनी सहमति के कारण पहचान को धुंधला बना दिया गया। पहचान हुई भी तो कोई कार्रवाई नहीं की गयी। मालूम हो कि निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार राज्यसभा चुनाव में विधायकों (MLAs) को अपनी पार्टी के अधिकृत एजेंट (Authorized Agent) को बैलेट पेपर दिखाने का स्पष्ट प्रावधान है। राज्यसभा चुनाव ओपन बैलेट सिस्टम (Open Ballot System) यानी खुली मतदान प्रणाली के तहत कराए जाते हैं। पीपुल्स रिप्रजेंटेशन एक्ट, 1951 (जनप्रतिनिधित्व अधिनियम) की धारा 59 के तहत, किसी भी राजनीतिक दल से जुड़े विधायक को वोट को मतपेटी (Ballot Box) में डालने से पहले अपने दल के अधिकृत एजेंट को चिन्हित बैलेट पेपर दिखाना अनिवार्य होता है। इस व्यवस्था को साल 2003 में कानून में संशोधन करके लागू किया गया था, ताकि विधायकों द्वारा की जाने वाली क्रॉस-वोटिंग, खरीद-फरोख्त (Horse-trading) और भ्रष्टाचार को रोका जा सके। यदि कोई दलीय विधायक अपने अधिकृत एजेंट को बैलेट पेपर दिखाने से मना करता है, तो उसका वोट अमान्य (Invalid) घोषित कर दिया जाता है। इसके अलावा, यदि वह अपनी पार्टी के एजेंट के अलावा किसी अन्य दल के एजेंट या बाहरी व्यक्ति को बैलेट पेपर दिखाता है, तब भी उसका मत खारिज हो जाता है। यह नियम निर्दलीय विधायकों (Independent MLAs) पर लागू नहीं होता है।
रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर होने जा रहे चुनाव के लिए कांग्रेस ने प्रवीण झा को प्रत्याशी घोषित कर दिया है। इसके बाद से ही झारखंड का सियासी गलियारा गरमाया हुआ है। अंदर खाने से खबरें आ रही हैं कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और झारखंड मुक्ति मोर्चा कांग्रेस के इस कदम से नाराज हैं। इसके बाद से ही प्रदेश कांग्रेस के कई नेताओं की नींद उड़ी हुई है। कई कांग्रेस नेता तो सार्वजनिक रूप माफी भी मांग रहे हैं। उधर विपक्षी खेमा इसे लेकर मजे ले रहा हैं। दरअसल, राज्यसभा चुनाव की घोषणा के बाद से ही कांग्रेस एक सीट की मांग कर रही थी। वहीं, झारखंड मुक्ति मोर्चा ने साफ इशारा दे दिया था कि उसे दोनों सीटें चाहिए। कांग्रेस प्रभारी को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 2-3 दिन में जबाव देने की बात कही थी, लेकिन उनकी चुप्पी भी मामले में सस्पेंस बढ़ाती जा रही थी। इसी बीच कांग्रेस आलाकमान ने दिल्ली से ही झारखंड में प्रत्याशी दिये जाने की घोषणा कर दी। कांग्रेस द्वारा दिल्ली से राज्यसभा प्रत्याशी घोषित किए जाने के बाद झामुमो ने नाराजगी व्यक्त की। झामुमो और कांग्रेस में तनातनी बढ़ गई है। गुरुवार रात कांग्रेस प्रत्याशी की घोषणा के बाद शुक्रवार को झामुमो विधायकों ने दोनों सीटों पर दावा ठोक दिया। झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा कि एकतरफा प्यार कब तक चलेगा। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सभी सरकारी कार्यक्रमों को स्थगित कर अपने आवास पर पार्टी विधायकों और वरिष्ठ नेताओं की बैठक की। केंद्रीय अध्यक्ष हेमंत सोरेन फैसला लेने के लिए अधिकृत करीब दो घंटे चली बैठक में सभी नेताओं ने एक सुर में दोनों सीटों पर प्रत्याशी उतारने का सुझाव दिया। साथ ही केंद्रीय अध्यक्ष हेमंत सोरेन को इस पर फैसला लेने के लिए अधिकृत कर दिया। इन दोनों सीटों पर उम्मीदवार कौन होंगे, यह निर्णय भी मुख्यमंत्री लेंगे। अब झामुमो में अंजनी सोरेन, विनोद कुमार पांडेय, फागू बेसरा और प्रणव वर्मा के नाम पर चर्चा शुरू हो गई है। झामुमो नेता कांग्रेस से नाराज बैठक के बाद मंत्री हफीजुल हसन और योगेंद्र प्रसाद ने कहा कि हमने अपनी भावनाओं से केंद्रीय अध्यक्ष को अवगत करा दिया है। इसमें दोनों सीटों पर प्रत्याशी उतारने की सलाह दी गई है। इसके लिए हेमंत सोरेन को अधिकृत कर दिया गया है। वहीं पूर्व मंत्री बैजनाथ राम के अनुसार-कांग्रेस ने कहा था कि मुख्यमंत्री की पसंद का प्रत्याशी होगा। फिर अचानक प्रत्याशी के नाम की घोषणा कर दी। कांग्रेस के इस कदम पर सबने नाराजगी जताई। हम पूरे त्याग के साथ एकतरफा प्यार करते आ रहे हैं : सुप्रियो झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा कि महागठबंधन में हम पूरे त्याग के साथ एकतरफा प्यार करते आ रहे हैं। वर्ष 2019 में सिर्फ एक विधायक वाले राजद के सत्यानंद भोक्ता को मंत्री बनाया। कांग्रेस को चार मंत्री पद मिले। वर्ष 2024 में भी कांग्रेस को चार मंत्री पद मिले। इसके बावजूद इन दोनों दलों ने बिहार विधानसभा चुनाव में वादाखिलाफी की। पहले राजद ने दरकिनार किया, फिर कांग्रेस ने भी साथ नहीं दिया। असम विधानसभा चुनाव में भी हमें दरकिनार किया गया। 2024 का लोकसभा चुनाव में झामुमो की बदौलत कांग्रेस को दोनों सीटें मिलीं। विधानसभा चुनाव में भी हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली महागठबंधन को 56 सीटें आईं। इस हिसाब से दोनों सीटों पर झामुमो का दावा बनता है। कांग्रेस ने जब कहा था कि सीएमओ की पंसद का उम्मीदवार होगा, तो अंतिम निर्णय पर पहुंचने के पहले प्रत्याशी क्यों घोषित कर दिया गया। झामुमो से दूरी पाटने के लिए सीएम से मिलेंगे : प्रदीप... कांग्रेस विधायक दल की शुक्रवार शाम बैठक हुई। इसमें राज्यसभा चुनाव को लेकर रणनीति तय की गई। बैठक के बाद विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने कहा कि झामुमो के साथ जो थोड़ी बहुत दूरी दिख रही है, उसे दूर करने के लिए कांग्रेस नेता मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिलेंगे। कांग्रेस का तर्क उधर, झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य के एक तरफा प्यार वाले बयान पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने कहा-प्रत्याशी की घोषणा से पहले प्रदेश कांग्रेस प्रभारी के. राजू और तेलंगाना के डिप्टी सीएम मल्लू भट्टी विक्रमार्क ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात की थी। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी मुख्यमंत्री से बात की थी। इसके बाद प्रत्याशी की घोषणा की गई। कमलेश ने कहा कि गठबंधन से राज्यसभा चुनाव के लिए दो प्रत्याशी होंगे और दोनों ही जीतेंगे। कांग्रेस नेताओं ने मांगी माफी इधर, झारखंड मुक्ति मोर्चा की नाराजगी पर कांग्रेस के कई नेताओं ने माफी मांग ली है। प्रदेश प्रभारी के राजू के साथ कांग्रेस विधायक दल के नेताओं की हुई बैठक के बाद वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि अगर मुख्यमंत्री का दिल दुखा है, तो हम क्षमा प्रार्थी हैं। उन्होंने गठबंधन में किसी दरार से साफ इंकार किया। वहीं, बोकारो से कांग्रेस की विधायक श्वेता सिंह ने भी लगभग इसी प्रकार का बयान दिया। उन्होंने कहा कि झामुमो का दिल दुखा है, तो वह क्षमा प्रार्थी हैं। वहीं विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने कहा कि कांग्रेस और झामुमो के बीच की खाई को पाटने की कोशिश की जा रही है। अब प्रदेश कांग्रेस प्रभारी के राजू मुख्यमंत्री से मिल कर गिला-शिकवा दूर करने की कोशिश करेंगे, ताकि गठबंधन में आयी दरार के नहीं पटने पर भी राज्य की जनता के बीच यह संदेश जा सके कि कांग्रेस ने गठबंधन को बनाए रखने के लिए अपना धर्म निभाया। अब गठबंधन धर्म का पालन करने की जिम्मेदारी झामुमो पर है।
रांची। झारखंड में होने वाले राज्यसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी एक सीट पर जीत सुनिश्चित करने के साथ-साथ दूसरी सीट के लिए भी मजबूत रणनीति बनाने में जुटी है। भाजपा को उम्मीद है कि चुनाव के दौरान सत्ता पक्ष के कुछ विधायक भी उसके प्रत्याशी का समर्थन कर सकते हैं। एनडीए सहयोगियों से होगी चर्चा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू सहित पार्टी के वरिष्ठ नेता जल्द ही एनडीए सहयोगी दलों जदयू, लोजपा (रामविलास) और आजसू नेताओं से मुलाकात करेंगे। बैठक में राज्यसभा चुनाव के लिए संयुक्त रणनीति और एनडीए प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित करने पर चर्चा होगी। सूत्रों के मुताबिक भाजपा फिलहाल उम्मीदवार के नाम से ज्यादा जरूरी वोटों के आंकड़े जुटाने पर ध्यान दे रही है। पार्टी नेतृत्व को उम्मीद है कि कुछ विधायक क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं। जून में झारखंड आएंगे नितिन नवीन राज्यसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के जून के पहले सप्ताह में झारखंड दौरे की संभावना है। इस दौरान वे पार्टी की कोर कमेटी की बैठक में शामिल होकर चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देंगे। भाजपा नेता दीनदयाल वर्णवाल ने कहा कि पार्टी ने प्रत्याशी उतारने का निर्णय ले लिया है। उन्होंने दावा किया कि केंद्र की मोदी सरकार के विकास कार्यों और देश की वैश्विक पहचान को देखते हुए कई विधायक भाजपा उम्मीदवार का समर्थन कर सकते हैं। 18 जून को होगा मतदान राज्यसभा Elections 2026 के तहत झारखंड की दो सीटों पर 18 जून को मतदान होना है। एक सीट Shibu Soren के निधन के बाद खाली हुई, जबकि दूसरी सीट सांसद दीपक प्रकाश का कार्यकाल पूरा होने के कारण रिक्त हो रही है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार सत्तारूढ़ गठबंधन जेएमएम, कांग्रेस और राजद के पास कुल 56 विधायक हैं, जबकि एनडीए के पास 24 विधायकों का समर्थन है। ऐसे में दूसरी सीट पर मुकाबला दिलचस्प होने की संभावना जताई जा रही है।
कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने की अटकलों के बीच कांग्रेस नेतृत्व ने स्थिति को सामान्य बताने की कोशिश की है। कांग्रेस महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल ने साफ कहा है कि राज्य में “सब ऑल इज वेल” है और नेतृत्व परिवर्तन को लेकर चल रही चर्चाओं में कोई सच्चाई नहीं है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस आलाकमान की बैठक केवल राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों को लेकर आयोजित की गई थी। मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चल रही बाकी चर्चाएं महज अटकलें हैं। खरगे और राहुल गांधी के साथ हुई अहम बैठक दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की मौजूदगी में कर्नाटक को लेकर अहम बैठक हुई। इस बैठक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार, कर्नाटक प्रभारी और केसी वेणुगोपाल शामिल हुए। बैठक के बाद वेणुगोपाल ने कहा कि पूरी चर्चा आगामी राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों के उम्मीदवारों को लेकर केंद्रित थी। उन्होंने कहा कि उम्मीदवारों की घोषणा अन्य राज्यों के साथ की जाएगी और बैठक में इसके अलावा कोई दूसरा मुद्दा नहीं उठाया गया। तीन घंटे चली बैठक, कई राजनीतिक संकेत कांग्रेस मुख्यालय इंदिरा भवन में हुई यह बैठक करीब तीन घंटे तक चली। माना जा रहा है कि बैठक में राज्यसभा की खाली हो रही सीटों और विधान परिषद चुनावों को लेकर रणनीति बनाई गई। कर्नाटक में राज्यसभा की चार सीटें खाली हो रही हैं, जिनमें कांग्रेस के पास तीन सीट जीतने की मजबूत स्थिति है, जबकि एक सीट भाजपा के खाते में जा सकती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का कार्यकाल समाप्त हो रहा है और उनके दोबारा राज्यसभा भेजे जाने की संभावना जताई जा रही है। डीके सुरेश को राज्यसभा भेज सकती है कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के भाई और पूर्व सांसद डीके सुरेश को राज्यसभा भेज सकती है। इसके अलावा पार्टी किसी महिला उम्मीदवार या पिछड़े वर्ग के नेता को भी मैदान में उतारने पर विचार कर रही है। विधान परिषद की सात रिक्त सीटों में से कांग्रेस को चार सीटें मिलने की संभावना मानी जा रही है। तीन साल पूरे होते ही फिर तेज हुई सीएम बदलने की चर्चा कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के 20 मई को तीन साल पूरे होने के बाद नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें फिर तेज हो गई हैं। राजनीतिक हलकों में लंबे समय से यह चर्चा है कि 2023 विधानसभा चुनाव के बाद सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री कार्यकाल को लेकर कोई फार्मूला तय हुआ था। कांग्रेस नेतृत्व ने कभी सार्वजनिक रूप से ऐसे किसी समझौते की पुष्टि नहीं की है। शिवकुमार समर्थक कर रहे नेतृत्व परिवर्तन की मांग डीके शिवकुमार के समर्थक लगातार यह मांग उठा रहे हैं कि अब उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए। उनका दावा है कि चुनाव में पार्टी की जीत में शिवकुमार की बड़ी भूमिका रही थी। वहीं मुख्यमंत्री सिद्धारमैया बार-बार यह कह चुके हैं कि वे अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे और नेतृत्व परिवर्तन का कोई सवाल नहीं है। शिवकुमार बोले- हाईकमान का फैसला मानेंगे उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने भी अब तक संयमित रुख अपनाया है। उन्होंने कहा है कि वे कांग्रेस नेतृत्व के फैसले का पालन करेंगे। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि समय आने पर सबकुछ स्पष्ट हो जाएगा। कर्नाटक कांग्रेस में जारी इन चर्चाओं के बीच अब सबकी नजर कांग्रेस हाईकमान के अगले फैसले और राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची पर टिकी हुई है।
रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए 18 जून को चुनाव होगा। इसको लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। भाजपा ने अपना प्रत्याशी उतारने की घोषणा कर दी है। पार्टी की चुनाव समिति की बैठक में प्रत्याशी उतारने का फैसला हुआ। इसी बीच सत्तारूढ़ झामुमो ने भारत निर्वाचन आयोग को पत्र लिखकर चुनाव में हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका जताई है। भाजपा की चुनाव समिति की बैठक में कहा गया कि पार्टी को चुनाव लड़ना चाहिए। एक सीट पर सशक्त उम्मीदवार देना चाहिए। पार्टी और उसके सहयोगी दलों को मिलाकर 24 वोट हैं। जीत के लिए सिर्फ चार वोट की जरूरत है। सभी विधायकों से राष्ट्रहित में आग्रह किया जाए कि वे पीएम नरेंद्र मोदी को और मजबूत करें, जिससे झारखंड सहित पूरे देश का विकास हो। बैठक में पार्टी की रणनीति को लेकर भी चर्चा हुई। साथ ही जेएलकेएम विधायक जयराम महतो, आजसू, जदयू व लोजपा (आर) के विधायकों व प्रदेश अध्यक्षों के साथ भी बैठक करने पर सहमति बनी। दावा-पार्टी का कार्यकर्ता ही चुनाव लड़ेगा बैठक के बाद प्रदेश महामंत्री अमर बाउरी ने कहा कि कोई बाहरी नहीं, पार्टी का कार्यकर्ता ही राज्यसभा चुनाव लडेगा। झामुमो के हॉर्स ट्रेडिंग को बढ़ावा देने की आशंका पर उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले ही महागठबंधन का अपने विधायकों पर से भरोसा खत्म हो गया है। झारखंड में राज्यसभा चुनाव में खरीद-फरोख्त की शुरुआत महागठबंधन की पार्टियों ने ही की थी। झामुमो ने आयोग को लिखा पत्र इधर, झामुमो के महासचिव विनोद पांडेय ने चुनाव आयोग को पत्र लिखा है। इसमें उन्होंने हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका जताई है। कहा है कि गठबंधन के पास दोनों सीटें जीतने के लिए पर्याप्त विधायक हैं। लेकिन, एनडीए के पास सिर्फ 24 विधायक हैं, जो एक सीट जीतने के लिए काफी नहीं है। ऐसे में भाजपा के प्रत्याशी उतारने पर विधायकों को प्रभावित करने के लिए आर्थिक प्रलोभन, बाहरी दबाव या अन्य अनैतिक तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। झामुमो ने आयोग से निष्पक्ष, पारदर्शी और भयमुक्त माहौल में राज्यसभा चुनाव कराने के लिए विशेष निगरानी व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है। पार्टी ने सीबीआई, ईडी, राज्य खुफिया निदेशालय, केंद्रीय सतर्कता आयोग और राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को भी सतर्क रखने का आग्रह किया है। मतलब साफ है, झारखंड में राज्यसभा की एक सीट को लेकर सियासी घमासान स्क्रिप्ट तैयार दिख रही है। आनेवाले दिनों रोमांचक संघर्ष की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
तीन विधायकों की गैरमौजूदगी से उठे सवाल, प्रदेश नेतृत्व पर बढ़ा दबाव, पार्टी में असंतोष खुलकर आया सामने राज्यसभा चुनाव ने खोली अंदरूनी कलह की परतें बिहार की राजनीति में कांग्रेस इस समय गंभीर अंदरूनी संकट से जूझ रही है। हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान पार्टी के तीन विधायकों का मतदान से अनुपस्थित रहना संगठन में गहरी दरार की ओर इशारा करता है। इस घटना ने प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम के नेतृत्व को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया है। यह मामला अब केवल अनुशासनहीनता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पार्टी के भीतर लंबे समय से चल रहे असंतोष को उजागर कर चुका है। स्थिति ऐसी बन गई है कि केंद्रीय नेतृत्व के लिए भी इस विवाद को सुलझाना आसान नहीं दिख रहा। विधायकों की नाराजगी ने बढ़ाई मुश्किलें मतदान से दूर रहने वाले विधायकों में मनिहारी के मनोहर सिंह और वाल्मीकि नगर के सुरेंद्र प्रसाद ने खुलकर प्रदेश नेतृत्व पर सवाल उठाए हैं। दोनों नेताओं ने संगठन में उपेक्षा और सम्मान की कमी का आरोप लगाया है। वहीं, फारबिसगंज के विधायक मनोज विश्वास का रुख भी अलग नहीं दिखा। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम की जिम्मेदारी नेतृत्व पर डालते हुए संकेत दिया कि फैसलों में पारदर्शिता की कमी है, जिससे असंतोष बढ़ा है। 2025 के टिकट विवाद से जुड़ा है मौजूदा संकट इस विवाद की जड़ें 2025 के विधानसभा चुनाव तक जाती हैं। उस समय टिकट वितरण को लेकर पार्टी में भारी असंतोष देखने को मिला था। कई पुराने और जमीनी नेताओं को नजरअंदाज कर नए चेहरों को मौका दिया गया, जिससे कार्यकर्ताओं और नेताओं में नाराजगी फैल गई। पार्टी के अंदर यह धारणा बनी कि टिकट बंटवारे में पारदर्शिता नहीं रखी गई, जिसके चलते संगठन में भरोसे का संकट लगातार गहराता गया। अनुशासनात्मक कार्रवाई से बढ़ी बगावत स्थिति को संभालने के बजाय पार्टी नेतृत्व द्वारा की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई ने विवाद को और भड़का दिया। सात नेताओं को निष्कासित करने और कई को कारण बताओ नोटिस देने से असंतुष्ट गुट और आक्रामक हो गया। पटना में आयोजित ‘कांग्रेस बचाओ महासम्मेलन’ के जरिए नाराज नेताओं ने शक्ति प्रदर्शन किया और साफ संकेत दिया कि वे प्रदेश नेतृत्व में बदलाव चाहते हैं। गठबंधन में भी कमजोर हो रही पकड़ कांग्रेस की यह अंदरूनी खींचतान अब उसके सहयोगी दलों के लिए भी चिंता का विषय बन गई है। विपक्षी गठबंधन INDIA में पार्टी की साख पर असर पड़ रहा है। सहयोगी दलों को अब कांग्रेस की एकजुटता और वोट ट्रांसफर करने की क्षमता पर संदेह होने लगा है। केंद्रीय नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौती मौजूदा हालात को देखते हुए यह स्पष्ट है कि अगर जल्द ही केंद्रीय नेतृत्व ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो पार्टी को आगामी चुनावों में भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। बिहार में अपनी खोई हुई पकड़ को वापस पाने के लिए कांग्रेस को न सिर्फ आंतरिक विवाद सुलझाने होंगे, बल्कि संगठन में भरोसा भी दोबारा कायम करना होगा। वरना यह संकट आने वाले समय में और गहराता जा सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।