United States Dollar के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है। मंगलवार को कारोबार शुरू होते ही रुपया डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 96.85 तक पहुंच गया। ट्रेडिंग के दौरान यह और गिरकर 96.93 प्रति डॉलर तक पहुंच गया। लगातार 13वें कारोबारी दिन रुपये में कमजोरी देखने के बाद बाजार में चिंता बढ़ गई है। पिछले सप्ताह रुपया पहली बार 96 प्रति डॉलर के पार गया था और अब गिरावट का सिलसिला जारी है। जानकारों का मानना है कि मजबूत डॉलर, महंगे कच्चे तेल और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ा दिया है। डॉलर इतना मजबूत क्यों हो रहा है? अमेरिका में बॉन्ड यील्ड तेजी से बढ़ रही है, जिससे डॉलर को मजबूती मिल रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार 30 साल के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड 5.18% तक पहुंच गई है, जो 2007 की वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद सबसे ऊंचे स्तरों में से एक मानी जा रही है। वहीं 10 साल की बॉन्ड यील्ड भी करीब 4.66% तक पहुंच गई। जब अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो वैश्विक निवेशक वहां निवेश को ज्यादा सुरक्षित मानते हैं। इसका असर यह होता है कि उभरते बाजारों से पैसा निकलने लगता है और डॉलर मजबूत हो जाता है। इसी वजह से भारतीय रुपये जैसी मुद्राओं पर दबाव बढ़ रहा है। कच्चे तेल की कीमतें भी बनी बड़ी वजह भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था और रुपये पर असर डालती है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव की वजह से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। तेल महंगा होने पर भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपया कमजोर पड़ता है। महंगे तेल का असर सिर्फ करेंसी तक सीमित नहीं रहता। इससे: ट्रांसपोर्ट महंगा हो सकता है रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है RBI क्या कर रहा है? Reserve Bank of India रुपये की गिरावट को नियंत्रित करने के लिए बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक RBI डॉलर बेचकर रुपये को सपोर्ट देने की कोशिश कर रहा है, ताकि गिरावट बहुत ज्यादा तेज न हो। हालांकि मौजूदा वैश्विक हालात भारतीय मुद्रा के लिए चुनौती बने हुए हैं। अगर: डॉलर मजबूत बना रहता है तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं वैश्विक तनाव बढ़ता है तो आने वाले दिनों में रुपये पर दबाव जारी रह सकता है। आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर? रुपये की कमजोरी का असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है। इससे: विदेश यात्रा महंगी हो सकती है आयातित इलेक्ट्रॉनिक्स और गैजेट्स के दाम बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है विदेशी शिक्षा और ऑनलाइन सेवाएं महंगी पड़ सकती हैं हालांकि निर्यात करने वाली कंपनियों को कमजोर रुपये से कुछ फायदा भी हो सकता है, क्योंकि उन्हें डॉलर में ज्यादा कमाई होती है।
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) में लगातार तीन सप्ताह की बढ़त के बाद एक बार फिर गिरावट दर्ज की गई है। Reserve Bank of India (RBI) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, 24 अप्रैल 2026 को समाप्त सप्ताह में देश के विदेशी मुद्रा भंडार में 4.82 अरब डॉलर की कमी आई है। कुल भंडार में आई गिरावट ताजा गिरावट के बाद भारत का कुल विदेशी मुद्रा भंडार घटकर 698.487 अरब डॉलर रह गया है। इससे पहले 27 फरवरी 2026 को यह 728.494 अरब डॉलर के ऑल टाइम हाई स्तर पर पहुंच गया था। उल्लेखनीय है कि अप्रैल के पहले तीन हफ्तों में भंडार में 14 अरब डॉलर से अधिक की बढ़ोतरी हुई थी, जबकि मार्च 2026 में इसमें भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला था। FCA में कमी बना बड़ा कारण विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा मानी जाने वाली विदेशी मुद्रा आस्तियां (FCA) भी इस गिरावट की मुख्य वजह रही हैं। FCA में 2.841 अरब डॉलर की कमी कुल FCA भंडार घटकर 554.622 अरब डॉलर FCA में यूरो, पाउंड और येन जैसी मुद्राओं के उतार-चढ़ाव का भी असर शामिल होता है, जिससे कुल भंडार प्रभावित होता है। सोने के भंडार पर भी असर इस दौरान भारत के गोल्ड रिजर्व की वैल्यू में भी गिरावट दर्ज की गई है। सोने की वैल्यू में 1.897 अरब डॉलर की कमी कुल वैल्यू घटकर 120.236 अरब डॉलर हालांकि, मार्च 2026 के अंत तक भारत के पास कुल 880.52 टन सोना मौजूद था, जो कुल विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 16.7% हिस्सा है। SDR और IMF रिजर्व में भी गिरावट स्पेशल ड्रॉइंग राइट (SDR) में 67 मिलियन डॉलर की कमी, अब 18.774 अरब डॉलर International Monetary Fund (IMF) के पास रखे भारत के रिजर्व में 15 मिलियन डॉलर की गिरावट, कुल 4.855 अरब डॉलर क्यों आई गिरावट? विशेषज्ञों के मुताबिक, पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता का असर विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव, डॉलर की मजबूती और अन्य मुद्राओं में गिरावट भी इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। क्या है इसका मतलब? विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट अल्पकालिक दबाव का संकेत हो सकता है, लेकिन भारत का कुल भंडार अभी भी मजबूत स्थिति में बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले हफ्तों में वैश्विक हालात के आधार पर इसमें फिर सुधार देखने को मिल सकता है।
भारतीय बैंकिंग सेक्टर में एक बड़ा और सख्त कदम उठाते हुए Reserve Bank of India (RBI) ने Paytm Payments Bank Limited (PPBL) का बैंकिंग लाइसेंस रद्द कर दिया है। यह फैसला 24 अप्रैल 2026 की शाम से प्रभावी हो गया, जिसके बाद बैंक की सभी बैंकिंग गतिविधियों पर पूर्ण रोक लग गई है। यह कार्रवाई लंबे समय से चल रही नियामकीय जांच और बार-बार चेतावनियों के बावजूद सुधार न होने के चलते की गई है। RBI ने क्यों उठाया इतना बड़ा कदम? RBI के अनुसार, Paytm Payments Bank का संचालन जमाकर्ताओं के हित में नहीं पाया गया। बैंक निर्धारित नियमों और शर्तों का पालन करने में विफल रहा मैनेजमेंट की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे बार-बार चेतावनी के बावजूद सुधार नहीं हुआ इसी आधार पर बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 की धारा 22(4) के तहत लाइसेंस रद्द करने का निर्णय लिया गया। अब बैंक का क्या होगा? लाइसेंस रद्द होने के बाद: बैंक किसी भी प्रकार की नई बैंकिंग सेवा नहीं दे सकेगा नए ग्राहक जोड़ना और ट्रांजैक्शन पूरी तरह बंद RBI अब बैंक को बंद (Winding Up) करने की प्रक्रिया शुरू करेगा इसके लिए हाईकोर्ट में आवेदन किया जाएगा सरल शब्दों में, बैंक अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। क्या ग्राहकों का पैसा सुरक्षित है? RBI ने ग्राहकों को राहत देते हुए कहा है कि: बैंक के पास पर्याप्त लिक्विडिटी मौजूद है सभी जमाकर्ताओं को उनका पैसा वापस किया जाएगा रिफंड प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जाएगी हालांकि, ग्राहकों को सलाह दी गई है कि वे आधिकारिक अपडेट्स पर नजर बनाए रखें और निर्देशों का पालन करें। क्या यह फैसला अचानक लिया गया? यह कार्रवाई अचानक नहीं, बल्कि एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम है: मार्च 2022: नए ग्राहक जोड़ने पर रोक जनवरी–फरवरी 2024: डिपॉजिट, वॉलेट टॉप-अप और क्रेडिट ट्रांजैक्शन पर प्रतिबंध लगातार चेतावनियों के बावजूद सुधार न होने पर अंतिम कार्रवाई ग्राहकों के लिए क्या करें? अपने खाते और बैलेंस की जानकारी नियमित रूप से जांचें RBI और बैंक की आधिकारिक घोषणाओं को फॉलो करें किसी भी अफवाह से बचें रिफंड प्रक्रिया शुरू होते ही आवश्यक कार्रवाई करें
नोटबंदी को लगभग दस साल बीत चुके हैं, लेकिन उससे जुड़े कुछ मामले आज भी अदालतों में पहुंच रहे हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प मामला महाराष्ट्र से सामने आया है, जहां Bombay High Court की नागपुर बेंच ने Reserve Bank of India को 2016 में जब्त किए गए पुराने ₹500 के नोट नई करेंसी में बदलने का आदेश दिया है। यह फैसला इसलिए खास है, क्योंकि नोटबंदी के बाद पुराने नोट बदलने की समयसीमा कब की समाप्त हो चुकी है। क्या है पूरा मामला? यह मामला महाराष्ट्र के गिरीश मलानी से जुड़ा है। 1 दिसंबर 2016 को, जब देश में नोटबंदी लागू थी, मलानी माहूर जा रहे थे। उस दौरान स्थानीय निकाय चुनावों के चलते पुलिस ने जांच के दौरान उनके पास से ₹500 के 400 पुराने नोट, यानी कुल ₹2 लाख, जब्त कर लिए थे। महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय पुराने नोट बदलने की आधिकारिक समयसीमा अभी समाप्त नहीं हुई थी। यानी अगर रकम जब्त न होती, तो मलानी नियमानुसार बैंक में जमा या बदल सकते थे। आयकर जांच में रकम निकली वैध पुलिस द्वारा जब्त की गई राशि की जांच बाद में आयकर विभाग ने की। जांच में पाया गया कि यह पैसा पूरी तरह वैध था और इसमें किसी प्रकार की अनियमितता या अवैध लेनदेन का कोई सबूत नहीं मिला। हालांकि, आयकर विभाग की जांच पूरी होने तक पुराने नोट जमा या बदलने की सरकारी समयसीमा समाप्त हो चुकी थी। इसके बाद मलानी ने RBI से पुराने नोट बदलने का अनुरोध किया, लेकिन केंद्रीय बैंक ने नियमों का हवाला देते हुए उनकी मांग ठुकरा दी। हाई कोर्ट ने क्या कहा? मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने साफ कहा कि जब नोट बदलने की समयसीमा चल रही थी, उस दौरान रकम पुलिस की हिरासत में थी। ऐसे में याचिकाकर्ता को देरी के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने यह भी माना कि जब आयकर विभाग ने रकम को वैध घोषित कर दिया है, तो केवल तकनीकी कारणों से किसी नागरिक को उसकी वैध कमाई से वंचित नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने RBI को आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी कर नई मुद्रा जारी करने का आदेश दिया। क्या यह फैसला सभी पर लागू होगा? यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है। इसका सीधा जवाब है–नहीं। यह आदेश एक विशेष मामले में, खास परिस्थितियों को देखते हुए दिया गया है। अगर किसी व्यक्ति के पुराने नोट सरकारी एजेंसी की कार्रवाई, न्यायिक प्रक्रिया या अन्य वैध कारणों से समयसीमा के भीतर जमा नहीं हो सके थे, तो वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अब आम नागरिक पुराने नोट लेकर RBI पहुंच सकते हैं। क्यों अहम है यह फैसला? यह फैसला बताता है कि अदालतें तकनीकी नियमों से ऊपर न्याय के मूल सिद्धांत को प्राथमिकता देती हैं। यदि किसी व्यक्ति की गलती न हो और उसकी वैध संपत्ति प्रशासनिक प्रक्रिया में फंस जाए, तो न्यायपालिका राहत दे सकती है। नोटबंदी के वर्षों बाद आया यह फैसला उन मामलों के लिए मिसाल बन सकता है, जहां सरकारी कार्रवाई के कारण लोग अपने वैध धन से वंचित रह गए थे।
देश के बैंकिंग सेक्टर की साइबर सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार सतर्क हो गई है। वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman ने गुरुवार को बैंकों के प्रमुखों के साथ उच्चस्तरीय बैठक कर Anthropic के अत्याधुनिक AI मॉडल Claude Mythos से उत्पन्न संभावित खतरों पर चर्चा की। क्या है Claude Mythos? Anthropic द्वारा विकसित Claude Mythos को साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में बेहद शक्तिशाली AI मॉडल माना जा रहा है। दावा है कि यह हजारों ऐसी सुरक्षा खामियों का पता लगा सकता है, जिन्हें मानव विशेषज्ञ भी नहीं खोज पाए। इसकी क्षमताओं को देखते हुए कंपनी ने इसे आम लोगों के लिए उपलब्ध नहीं कराया है। क्यों बढ़ी चिंता? रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ अनधिकृत यूजर्स Claude Mythos तक पहुंच बनाने में सफल रहे। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि इसका दुरुपयोग कर साइबर अपराधी बैंकिंग नेटवर्क, वित्तीय संस्थानों और अन्य महत्वपूर्ण सिस्टम को निशाना बना सकते हैं। वित्त मंत्री ने क्या कहा? बैठक में निर्मला सीतारमण ने कहा कि Claude Mythos से उत्पन्न खतरा अभूतपूर्व है और इससे निपटने के लिए उच्च स्तर की सतर्कता, तैयारी और समन्वय आवश्यक है। उन्होंने बैंकों को अपने आईटी सिस्टम मजबूत करने और ग्राहकों के डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। रियल-टाइम थ्रेट इंटेलिजेंस पर जोर वित्त मंत्रालय ने बैंकों, Indian Computer Emergency Response Team और अन्य एजेंसियों के बीच रियल-टाइम थ्रेट इंटेलिजेंस साझा करने के लिए मजबूत तंत्र विकसित करने की सलाह दी है। इससे किसी भी संभावित साइबर हमले का तेजी से पता लगाया जा सकेगा। RBI और IBA भी सक्रिय भारतीय रिजर्व बैंक और Indian Banks' Association को भी इस जोखिम का आकलन करने को कहा गया है। साथ ही, IBA को सभी बैंकों के लिए एक समन्वित प्रतिक्रिया तंत्र तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। वैश्विक स्तर पर भी चिंता Claude Mythos को लेकर सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका समेत कई देशों में भी चिंता बढ़ी है। बताया जा रहा है कि अमेरिकी प्रशासन और वॉल स्ट्रीट के बड़े बैंक भी इस AI मॉडल से जुड़े जोखिमों का आकलन कर रहे हैं।
भारत की मुद्रा बाजार में इस सप्ताह दबाव और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी ने भारतीय रुपये की स्थिति को कमजोर कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में रुपया ₹93.50 प्रति डॉलर तक गिर सकता है। वैश्विक तनाव का सीधा असर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने बाजार की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाई है। अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक प्रयासों की विफलता और Strait of Hormuz में नौसैनिक नाकेबंदी की स्थिति ने तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। यही वजह है कि Brent Crude Oil की कीमतें $102 प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, इस उछाल से सीधे प्रभावित होता है। अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमत में हर $10 की वृद्धि से देश के चालू खाता घाटे (CAD) में सालाना लगभग $15 बिलियन की बढ़ोतरी हो सकती है। रुपये में भारी उतार-चढ़ाव पिछले सप्ताह रुपये में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला। यह पहले ₹95.23 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंचा, फिर सुधार के साथ ₹92.40 तक आया। हालांकि, मौजूदा तनाव के चलते यह फिर से कमजोर होकर ₹93.30 के आसपास कारोबार कर रहा है। साथ ही, सुरक्षित निवेश के तौर पर डॉलर की बढ़ती मांग और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल ने उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ा दिया है। विदेशी निवेशकों की निकासी से बढ़ा दबाव स्थिति को और जटिल बना रही है विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की निकासी। फरवरी 2026 से अब तक $20 बिलियन से अधिक की पूंजी भारतीय बाजार से बाहर जा चुकी है। यह ट्रेंड रुपये की कमजोरी को और गहरा कर रहा है। RBI बना ‘डिफेंसिव कवच’ हालांकि, इस बीच राहत की बात यह है कि Reserve Bank of India के पास $697.1 बिलियन का मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार है। यह भंडार रुपये में अत्यधिक गिरावट को रोकने में सहायक साबित हो सकता है और बाजार को स्थिरता देने का काम करेगा। महंगाई और CAD का बढ़ता खतरा महंगे कच्चे तेल का असर सिर्फ रुपये तक सीमित नहीं है। इससे ‘आयातित महंगाई’ बढ़ने का खतरा भी पैदा हो गया है, जो आम उपभोक्ताओं पर सीधा असर डाल सकती है। साथ ही, व्यापार संतुलन और चालू खाता घाटा भी दबाव में आ सकता है।
नई दिल्ली: भारत की वित्तीय व्यवस्था को अगले स्तर पर ले जाने के लिए Reserve Bank of India (RBI) ने अपनी मीडियम-टर्म रणनीति ‘उत्कर्ष 2029’ पेश की है। गवर्नर Sanjay Malhotra के नेतृत्व में तैयार इस फ्रेमवर्क का लक्ष्य है - लोन को सस्ता और आसान बनाना, UPI को वैश्विक स्तर पर विस्तार देना और eRupee को आम लेनदेन का हिस्सा बनाना। यह रणनीति 2026 से 2029 के बीच लागू होगी, जिसमें कुल 49 लक्ष्यों को छह बड़े स्तंभों में बांटा गया है। इसका उद्देश्य भारत के वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र को अधिक आधुनिक, सरल और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाना है। क्या बदलने वाला है? RBI की बड़ी तैयारी RBI का फोकस सिर्फ नीतियां बनाने पर नहीं, बल्कि उन्हें जमीन पर प्रभावी बनाने पर है। इसके तहत: पुराने नियमों और सर्कुलर को सरल और आधुनिक बनाया जाएगा बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए प्रक्रियाएं आसान होंगी शिकायत निवारण प्रणाली को मजबूत किया जाएगा जोखिम प्रबंधन (Risk Assessment) को और बेहतर किया जाएगा मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर में ऑटोमेशन और सेंट्रल क्लियरिंग को बढ़ावा मिलेगा डिजिटल और टेक्नोलॉजी क्षमताओं का विस्तार किया जाएगा अब लोन लेना होगा आसान और सस्ता RBI का सबसे बड़ा फोकस आम लोगों और छोटे कारोबारियों के लिए कर्ज को आसान बनाना है। इसके लिए Unified Lending Interface (ULI) का विस्तार किया जाएगा। कम कागजी प्रक्रिया तेज अप्रूवल कम लागत पर लोन किसानों और छोटे व्यापारियों तक आसान पहुंच इससे फाइनेंसिंग का लोकतंत्रीकरण होगा और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलेगी। UPI और रुपया बनेगा ग्लोबल UPI को दुनिया भर में फैलाने की योजना इस विजन का अहम हिस्सा है। अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में UPI का उपयोग व्यापार में भारतीय रुपये की हिस्सेदारी बढ़ाना डॉलर पर निर्भरता कम करना इससे विदेशी लेनदेन की लागत घटेगी और भारत की आर्थिक ताकत वैश्विक स्तर पर मजबूत होगी। eRupee: डिजिटल करेंसी का अगला चरण eRupee (CBDC) को लेकर RBI की योजना काफी महत्वाकांक्षी है: दो देशों के केंद्रीय बैंकों के बीच सीधे ट्रांजैक्शन रियल-टाइम और सस्ता अंतरराष्ट्रीय भुगतान बिना इंटरनेट के भी भुगतान की सुविधा सरकारी सब्सिडी और योजनाओं में लक्षित उपयोग eRupee डिजिटल कैश की तरह काम करेगा - सुरक्षित, तेज और ट्रैक करने में आसान। आम आदमी और अर्थव्यवस्था पर असर लोन सस्ता और जल्दी मिलेगा छोटे व्यापारियों और किसानों को बड़ा फायदा विदेशी व्यापार में लागत घटेगी रुपये की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ेगी डिजिटल पेमेंट सिस्टम और मजबूत होगा
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) की पहली तिमाही के लिए GDP ग्रोथ अनुमान 6.9% से घटाकर 6.8% कर दिया है। यह कटौती ऐसे समय में की गई है, जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव और खासकर होर्मुज स्ट्रेट में आई बाधा से आर्थिक अनिश्चितता बढ़ी है। क्या कहा RBI गवर्नर ने? RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा के अनुसार: भारत मजबूत मैक्रोइकोनॉमिक फंडामेंटल्स के साथ नए वित्त वर्ष में प्रवेश कर रहा है लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और संघर्ष से ग्रोथ पर असर पड़ सकता है होर्मुज स्ट्रेट में बाधा से तेल सप्लाई और कीमतों पर दबाव बढ़ा है उन्होंने माना कि इन परिस्थितियों का असर भारत की आर्थिक रफ्तार पर पड़ना तय है। FY27 के लिए नया GDP अनुमान RBI ने अलग-अलग तिमाहियों के लिए ग्रोथ अनुमान में बदलाव किया है: Q1: 6.9% ➝ 6.8% Q2: 7.0% ➝ 6.7% Q3: 7.0% (स्थिर) Q4: 7.2% पूरे FY27 के लिए ग्रोथ अनुमान करीब 6.9% रखा गया है। क्यों बढ़ा जोखिम? 1. तेल-गैस की कीमतों में उछाल होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक तेल सप्लाई का अहम रास्ता है। यहां बाधा आने से: क्रूड ऑयल महंगा हो सकता है भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर दबाव बढ़ता है 2. महंगाई का खतरा फिलहाल कोर महंगाई कंट्रोल में है लेकिन खाद्य कीमतों और मौसम का असर बढ़ सकता है 3. ग्लोबल मार्केट में अस्थिरता ईरान-अमेरिका तनाव से वित्तीय बाजार प्रभावित निवेशक सुरक्षित विकल्प (Safe Haven) की ओर बढ़े डॉलर मजबूत, अन्य मुद्राओं पर दबाव फिर भी भारत की स्थिति क्यों बेहतर? RBI के मुताबिक: भारत की अर्थव्यवस्था पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत घरेलू मांग और आर्थिक गतिविधियों में अच्छा मोमेंटम वैश्विक झटकों को झेलने की क्षमता बेहतर
भारतीय मुद्रा पर बढ़ते दबाव के बीच रुपया शुक्रवार को ऐतिहासिक गिरावट के साथ पहली बार 93 के स्तर को पार कर गया। शुरुआती कारोबार में रुपया भारतीय रुपया 93.15 प्रति डॉलर पर पहुंच गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। क्यों आई रुपया में इतनी बड़ी गिरावट रुपये में यह तेज गिरावट कई वैश्विक और घरेलू कारणों के चलते देखने को मिली है। खासतौर पर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई हैं, जिससे भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ता है और डॉलर की मांग तेज होती है, जिससे रुपया कमजोर होता है। ‘सेफ हेवन’ की ओर भाग रहे निवेशक वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा अमेरिकी डॉलर को मिल रहा है, जो लगातार मजबूत हो रहा है। डॉलर के मजबूत होने से उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बढ़ता है, जिसमें रुपया भी शामिल है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली से बढ़ा दबाव विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) भी भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। जब विदेशी निवेशक अपनी पूंजी निकालते हैं, तो वे रुपये को डॉलर में बदलते हैं, जिससे रुपये की गिरावट और तेज हो जाती है। अमेरिकी फेड की नीति भी बनी वजह फेडरल रिजर्व की सख्त मौद्रिक नीति और ब्याज दरों को लेकर सतर्क रुख ने भी डॉलर को मजबूती दी है। इससे वैश्विक तरलता कम हो रही है और उभरते बाजारों में निवेश आकर्षण घट रहा है। भारत पर क्या होगा असर कमजोर होता रुपया और महंगा कच्चा तेल मिलकर भारत में महंगाई को बढ़ा सकते हैं। खासकर ईंधन और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। इससे कंपनियों की लागत बढ़ेगी और आम लोगों की जेब पर भी बोझ पड़ेगा। आगे क्या देखें अब बाजार की नजर तीन अहम कारकों पर रहेगी- पश्चिम एशिया में तनाव की स्थिति कच्चे तेल की कीमतों का रुख भारतीय रिजर्व बैंक की संभावित दखलअंदाजी अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो रुपये पर दबाव जारी रह सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।