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Bihar Rajya Sabha election
राज्यसभा चुनाव में ‘क्रॉस वोटिंग’ का खुलासा: कांग्रेस विधायक के बयान से मचा सियासी घमासान, प्रदेश नेतृत्व पर उठे सवाल

पटना: बिहार में हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव के नतीजों के बाद सियासत गरमा गई है। राजद उम्मीदवार अमरेंद्र धारी सिंह की हार के बाद अब कांग्रेस के भीतर ही मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। वोटिंग से गैरहाजिर रहे तीन कांग्रेस विधायकों में से एक मनोज विश्वास ने मीडिया के सामने आकर बड़ा बयान दिया है।   वोटिंग से दूरी पर कांग्रेस विधायक का बड़ा खुलासा 16 मार्च को हुई वोटिंग में कांग्रेस के तीन विधायक-मनिहारी से मनोहर सिंह, फारबिसगंज से मनोज विश्वास और वाल्मीकिनगर से सुरेंद्र कुशवाहा-ने मतदान नहीं किया था। अब मनोज विश्वास ने साफ कहा कि उम्मीदवार चयन में पार्टी के प्रदेश नेतृत्व की अनदेखी की गई, जिसके चलते यह स्थिति बनी।   “नेतृत्व का सम्मान नहीं, तो वोट क्यों दें?” विधायक मनोज विश्वास ने आरोप लगाया कि उम्मीदवार चयन में न तो प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका रही और न ही स्थानीय नेताओं को विश्वास में लिया गया। उनका कहना था कि जब पार्टी के नेताओं को ही महत्व नहीं दिया गया, तो विधायकों को वोट देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।   अंतिम समय में उम्मीदवार बदलने पर नाराजगी उन्होंने दावा किया कि पहले किसी अन्य नाम पर चर्चा चल रही थी, लेकिन अंतिम समय में अचानक अमरेंद्र धारी सिंह को उम्मीदवार बना दिया गया, जिनका राजनीतिक अनुभव सीमित है। इस फैसले से कई विधायकों में असंतोष पैदा हुआ।   प्रदेश अध्यक्ष पर ही उठाए सवाल अपने बयान में मनोज विश्वास ने सीधे तौर पर राजेश राम को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान पार्टी के शीर्ष नेताओं को पूरी तरह शामिल नहीं किया गया, जिससे कार्यकर्ताओं और विधायकों में भ्रम की स्थिति बनी रही।   “हमें स्वतंत्र निर्णय लेने को कहा गया” विधायक ने यह भी कहा कि पार्टी नेतृत्व की ओर से स्पष्ट निर्देश नहीं मिला, बल्कि विधायकों को अपने विवेक से निर्णय लेने को कहा गया। ऐसे में उन्होंने मतदान से दूरी बनाई।   राजद की हार के बाद बढ़ा राजनीतिक दबाव इस पूरे घटनाक्रम के बाद विपक्षी गठबंधन में दरार की चर्चाएं तेज हो गई हैं। तेजस्वी यादव की रणनीति पर भी सवाल उठ रहे हैं कि आखिर उम्मीदवार चयन और सहयोगी दलों के साथ समन्वय में कहां चूक हुई।   दल के प्रति निष्ठा पर भी दी सफाई हालांकि, मनोज विश्वास ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने पार्टी के साथ कोई गलत नहीं किया है और आगे भी कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़े रहेंगे। उन्होंने कहा कि पार्टी हमेशा वंचित, अल्पसंख्यक और कमजोर वर्गों की आवाज उठाती रही है, लेकिन उम्मीदवार चयन में इन मूल्यों को नजरअंदाज किया गया।   सियासी असर दूर तक संभव बिहार की राजनीति में यह बयान किसी ‘सियासी विस्फोट’ से कम नहीं माना जा रहा है। आने वाले दिनों में इसका असर गठबंधन की रणनीति और आंतरिक समीकरणों पर साफ दिखाई दे सकता है।  

surbhi मार्च 17, 2026 0
Tejashwi Yadav calls Mahagathbandhan meeting in Patna amid Nishant Kumar’s JDU political entry
बिहार की राजनीति में हलचल: निशांत कुमार की एंट्री के बीच तेजस्वी यादव ने महागठबंधन की अहम बैठक बुलाई

  बिहार की राजनीति इन दिनों तेजी से बदलते घटनाक्रमों के कारण सुर्खियों में है। एक ओर जहां मुख्यमंत्री Nitish Kumar के बेटे Nishant Kumar ने औपचारिक रूप से Janata Dal (United) में शामिल होकर सक्रिय राजनीति में कदम रखा है, वहीं दूसरी ओर नेता प्रतिपक्ष Tejashwi Yadav ने बदलते राजनीतिक माहौल के बीच Rashtriya Janata Dal और महागठबंधन के नेताओं की एक महत्वपूर्ण बैठक बुला ली है। यह बैठक 10 मार्च को दोपहर 2 बजे पटना स्थित तेजस्वी यादव के सरकारी आवास 1 पोलो रोड पर आयोजित की जाएगी। सूत्रों के अनुसार इस बैठक में महागठबंधन के सभी विधायक (MLA) और विधान पार्षद (MLC) को शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है। माना जा रहा है कि बैठक में आगामी राज्यसभा चुनाव, बिहार के बदलते राजनीतिक समीकरण और हाल के सियासी घटनाक्रमों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। दरअसल, पिछले कुछ दिनों में बिहार की राजनीति में कई बड़े संकेत देखने को मिले हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के संभावित रूप से राज्यसभा जाने की चर्चाओं ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। ऐसे में यह सवाल भी उठने लगा है कि अगर ऐसा होता है तो राज्य की सत्ता में अगला नेतृत्व किसके हाथ में होगा। इसी बीच निशांत कुमार की जेडीयू में एंट्री ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि निशांत कुमार का सक्रिय राजनीति में आना जेडीयू के भीतर संभावित पीढ़ीगत बदलाव का संकेत माना जा रहा है। पटना स्थित पार्टी कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम के दौरान निशांत कुमार ने पार्टी की सदस्यता ग्रहण की और इसे उनके राजनीतिक करियर की औपचारिक शुरुआत माना जा रहा है। इधर विपक्ष भी इन घटनाक्रमों को देखते हुए अपनी रणनीति को मजबूत करने में जुट गया है। तेजस्वी यादव द्वारा बुलाई गई महागठबंधन की बैठक को इसी संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बैठक में इस बात पर भी विचार किया जा सकता है कि राज्यसभा चुनाव के दौरान गठबंधन के वोटों को किस तरह संगठित रखा जाए और विपक्ष किस रणनीति के साथ चुनाव मैदान में उतरे। इसके अलावा मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में विपक्ष की भूमिका, गठबंधन की एकजुटता और आगे के राजनीतिक कार्यक्रमों पर भी चर्चा होने की संभावना है। महागठबंधन के नेताओं के बीच यह भी मंथन हो सकता है कि बदलते राजनीतिक माहौल में जनता के मुद्दों को किस तरह मजबूती से उठाया जाए। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बिहार में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही आगामी राजनीतिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए अपनी-अपनी रणनीति तय कर रहे हैं। एक तरफ जेडीयू में निशांत कुमार की एंट्री से नई राजनीतिक संभावनाएं बनती दिख रही हैं, तो दूसरी तरफ विपक्ष भी खुद को संगठित कर आगामी चुनावी मुकाबलों की तैयारी में जुट गया है। ऐसे में तेजस्वी यादव द्वारा बुलाई गई यह बैठक बिहार की राजनीति में आगे की दिशा तय करने के लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि इस बैठक से क्या राजनीतिक संकेत निकलते हैं और राज्यसभा चुनाव के साथ-साथ आने वाले दिनों में बिहार की सियासत किस दिशा में आगे बढ़ती है।  

surbhi मार्च 9, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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नालंदा मंदिर हादसा: भीड़ ने ली 8 महिलाओं की जान, धार्मिक आयोजन में मची भगदड़ जैसी स्थिति

surbhi मार्च 31, 2026 0