Russia Ukraine War

Donald Trump announces temporary Russia-Ukraine ceasefire agreement and prisoner exchange amid ongoing war
रूस-यूक्रेन में 3 दिन का सीजफायर, ट्रंप बोले- मेरे कहने पर बनी सहमति

रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध के बीच तीन दिन के युद्धविराम का ऐलान किया गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि उनकी पहल और मध्यस्थता के बाद दोनों देशों ने अस्थायी सीजफायर पर सहमति जताई है. ट्रंप के मुताबिक, यह युद्धविराम 9, 10 और 11 मई तक लागू रहेगा. इस दौरान दोनों देशों के बीच सभी सैन्य गतिविधियां रोकी जाएंगी और युद्धबंदियों की अदला-बदली भी की जाएगी. ट्रंप ने किया सीजफायर का ऐलान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर पोस्ट कर कहा, “मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध में तीन दिन का सीजफायर होगा.” उन्होंने कहा कि रूस में यह अवधि “विक्ट्री डे” समारोह के कारण महत्वपूर्ण है, जबकि यूक्रेन भी द्वितीय विश्व युद्ध का अहम हिस्सा रहा है. ट्रंप ने दावा किया कि युद्धविराम के लिए अनुरोध उन्होंने सीधे किया था और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तथा यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की दोनों ने इस पर सहमति जताई. 1,000-1,000 युद्धबंदियों की अदला-बदली सीजफायर के तहत दोनों देशों के बीच 1,000-1,000 युद्धबंदियों की अदला-बदली भी होगी. ट्रंप ने कहा कि इस दौरान सभी “काइनेटिक एक्टिविटी” यानी सैन्य हमलों और लड़ाई को पूरी तरह रोका जाएगा. उन्होंने उम्मीद जताई कि यह समझौता लंबे और विनाशकारी युद्ध को समाप्त करने की दिशा में पहला बड़ा कदम साबित हो सकता है. जेलेंस्की ने भी की पुष्टि यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने भी इस अस्थायी युद्धविराम की पुष्टि की है. उन्होंने टेलीग्राम पर लिखा कि अमेरिकी मध्यस्थता में चल रही बातचीत के तहत रूस ने युद्धबंदियों की अदला-बदली पर सहमति दी है. जेलेंस्की ने कहा, “हमें 1,000 के बदले 1,000 युद्धबंदियों की अदला-बदली के लिए रूस की मंजूरी मिल गई है.” उन्होंने इसे शांति वार्ता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया. युद्ध खत्म करने की कोशिशें तेज ट्रंप ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह सबसे बड़ा सैन्य संघर्ष है और इसे खत्म करने के लिए लगातार बातचीत चल रही है. उन्होंने लिखा, “हम हर दिन युद्ध खत्म होने के और करीब पहुंच रहे हैं.” हालांकि यह सीजफायर फिलहाल केवल तीन दिनों के लिए है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे संभावित व्यापक शांति समझौते की शुरुआत के रूप में देख रहा है.  

surbhi मई 9, 2026 0
Russian President Vladimir Putin amid heightened security concerns and reports of bunker-based operations
बढ़ी सुरक्षा, बंकर और तख्तापलट की आशंका… क्या सच में डर के साये में हैं पुतिन?

रूस के राष्ट्रपति Vladimir Putin को लेकर एक बड़ी रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें दावा किया गया है कि यूक्रेन युद्ध, ड्रोन हमलों और तख्तापलट की आशंकाओं के बीच उनकी सुरक्षा पहले से कहीं ज्यादा कड़ी कर दी गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, हालात ऐसे बन चुके हैं कि पुतिन अब लंबे समय तक जमीन के नीचे बने हाई-सिक्योरिटी बंकरों में रहकर काम कर रहे हैं. फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट में बड़ा दावा ब्रिटिश अखबार Financial Times की रिपोर्ट के अनुसार, रूस की फेडरल प्रोटेक्टिव सर्विस (FSO) ने पिछले कुछ महीनों में पुतिन की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया है. यूरोपीय खुफिया एजेंसियों से जुड़े सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि पुतिन अब पहले की तुलना में ज्यादा अलग-थलग हो गए हैं और सार्वजनिक गतिविधियों में भी उनकी भागीदारी कम हो गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड-19 महामारी के बाद से ही पुतिन का दायरा सीमित होने लगा था, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद सुरक्षा चिंताएं कई गुना बढ़ गईं. ड्रोन हमलों ने बढ़ाई चिंता रिपोर्ट में यूक्रेन के कथित ड्रोन ऑपरेशन “स्पाइडरवेब” का भी जिक्र किया गया है. दावा है कि पिछले साल यूक्रेनी ड्रोन ने आर्कटिक सर्कल के पास रूसी एयरफील्ड्स को निशाना बनाया था, जिससे क्रेमलिन की सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट मोड में आ गईं. सूत्रों के मुताबिक, मार्च तक रूस को तख्तापलट और ड्रोन हमलों का खतरा और ज्यादा गंभीर लगने लगा था. इसके बाद पुतिन की यात्राएं सीमित कर दी गईं और उनसे मिलने वालों की जांच बेहद सख्त कर दी गई. बंकर में बिताते हैं लंबा समय? रिपोर्ट के अनुसार, पुतिन दक्षिणी रूस के क्रास्नोदार क्षेत्र में बने एक सुरक्षित बंकर में कई-कई हफ्तों तक रहते हैं और वहीं से सरकारी कामकाज और युद्ध से जुड़ी गतिविधियों की निगरानी करते हैं. यह भी दावा किया गया है कि रूसी सरकारी मीडिया कई बार पहले से रिकॉर्ड किए गए वीडियो प्रसारित कर सामान्य माहौल दिखाने की कोशिश करता है, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि सब कुछ सामान्य है. करीबी लोगों पर भी कड़ी निगरानी रिपोर्ट में कहा गया है कि पुतिन के बेहद करीबी लोगों के लिए भी सख्त सुरक्षा नियम लागू किए गए हैं. उनके रसोइयों, फोटोग्राफरों और बॉडीगार्ड्स तक को सार्वजनिक परिवहन इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है. इसके अलावा: इंटरनेट वाले मोबाइल फोन रखने पर रोक है उनके घरों में CCTV निगरानी बढ़ाई गई है व्यक्तिगत संपर्क और आवाजाही सीमित कर दी गई है रूस की ओर से नहीं आई आधिकारिक पुष्टि हालांकि, इन दावों पर रूस की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. क्रेमलिन ने पहले भी पुतिन की सेहत और सुरक्षा से जुड़ी कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों को खारिज किया है. लेकिन यूक्रेन युद्ध लंबा खिंचने, रूस के भीतर बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों और लगातार ड्रोन हमलों के बीच यह साफ है कि मॉस्को अब किसी भी तरह के खतरे को हल्के में नहीं लेना चाहता.  

surbhi मई 8, 2026 0
Ukrainian military experts training Middle East forces on anti-drone systems amid rising Iran drone threat
मिडिल ईस्ट में यूक्रेन की ‘ड्रोन डिप्लोमेसी’: रूस से जंग के बीच 200+ मिलिट्री एक्सपर्ट क्यों तैनात?

रूस के साथ जारी युद्ध के बीच एक सवाल वैश्विक रणनीतिक हलकों में तेजी से उभरा है-जब यूक्रेन खुद मोर्चे पर है, तो उसके 200 से अधिक सैन्य विशेषज्ञ मिडिल ईस्ट में क्या कर रहे हैं? इस सवाल का जवाब खुद वोलोडिमीर ज़ेलेंस्की ने ब्रिटेन की संसद में दिया, और इसके साथ ही एक नई भू-राजनीतिक तस्वीर सामने आई। यूक्रेन की ‘नई भूमिका’: युद्ध से सहयोग तक ज़ेलेंस्की के मुताबिक, यूक्रेन के 200 से ज्यादा एंटी-ड्रोन मिलिट्री एक्सपर्ट इस समय खाड़ी और मिडिल ईस्ट के कई देशों में तैनात हैं। ये सैनिक पारंपरिक युद्ध नहीं लड़ रहे, बल्कि: ईरानी ड्रोन हमलों से बचाव की ट्रेनिंग दे रहे हैं   स्थानीय सुरक्षा एजेंसियों को तकनीकी सहायता प्रदान कर रहे हैं   एंटी-ड्रोन सिस्टम को मजबूत करने में मदद कर रहे हैं   यह यूक्रेन की रणनीति में बड़ा बदलाव दर्शाता है- ‘सिर्फ युद्ध लड़ने वाला देश’ से ‘सुरक्षा समाधान देने वाला साझेदार’। किन देशों में है तैनाती? यूक्रेनी राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि उनकी टीमें: संयुक्त अरब अमीरात   कतर   सऊदी अरब   में पहले से मौजूद हैं, जबकि अगला पड़ाव कुवैत है। इसके अलावा, कई अन्य देशों के साथ भी समझौते हो चुके हैं। ईरान के ड्रोन: असली खतरा क्या है? मिडिल ईस्ट में तनाव की जड़ है ईरान के ‘शाहेद’ ड्रोन, जिन्हें कम लागत और आत्मघाती हमले की क्षमता के कारण बेहद घातक माना जाता है। ज़ेलेंस्की ने कहा: यही ड्रोन रूस 2022 से यूक्रेन के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है   ईरान ने न सिर्फ रूस को ये ड्रोन दिए, बल्कि इनके इस्तेमाल और निर्माण की तकनीक भी साझा की   यानी यूक्रेन अब उसी खतरे से दूसरों को बचाने की कोशिश कर रहा है, जिससे वह खुद जूझ चुका है। ‘रूस-ईरान गठजोड़’ पर सीधा हमला अपने भाषण में ज़ेलेंस्की ने साफ कहा: “रूस और ईरान नफरत के साझेदार हैं, और हथियारों में भी सहयोगी।” उनका संदेश स्पष्ट था- यह केवल यूक्रेन की जंग नहीं है   बल्कि वैश्विक सुरक्षा का मुद्दा है   ड्रोन टेक्नोलॉजी: यूक्रेन की असली ताकत यूक्रेन ने पिछले कुछ वर्षों में ड्रोन युद्ध में असाधारण प्रगति की है। ज़ेलेंस्की के अनुसार: रूस को होने वाले 90% नुकसान ड्रोन के जरिए हो रहे हैं   यूक्रेन अब रोजाना 2000 तक इंटरसेप्टर ड्रोन बना सकता है   इनमें शामिल हैं: FPV इंटरसेप्टर ड्रोन   समुद्री ड्रोन   एंटी-एयर डिफेंस ड्रोन   यह तकनीक अब यूक्रेन की ‘एक्सपोर्टेबल सिक्योरिटी स्ट्रेंथ’ बन चुकी है। अमेरिका क्यों अलग खड़ा है? दिलचस्प बात यह है कि जहां खाड़ी देश यूक्रेन की मदद ले रहे हैं, वहीं डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कहा कि अमेरिका को इस मामले में यूक्रेन की मदद की जरूरत नहीं है। अमेरिका ने अपने स्तर पर ‘लुकास’ ड्रोन सिस्टम विकसित किया है, जो ईरानी ड्रोन का मुकाबला करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। असली कहानी: रणनीति या मजबूरी? यूक्रेन का यह कदम केवल सहयोग नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश भी है: वैश्विक मंच पर अपनी उपयोगिता साबित करना   सहयोगी देशों के साथ सैन्य रिश्ते मजबूत करना   रूस-ईरान गठजोड़ के खिलाफ व्यापक मोर्चा तैयार करना   क्यों अहम है यह घटनाक्रम? मिडिल ईस्ट में यूक्रेन की यह सक्रियता कई बड़े संकेत देती है: युद्ध अब सीमाओं तक सीमित नहीं रहा   ड्रोन टेक्नोलॉजी आधुनिक युद्ध का केंद्र बन चुकी है   छोटे लेकिन तकनीकी रूप से सक्षम देश भी वैश्विक समीकरण बदल सकते हैं  

surbhi मार्च 18, 2026 0
Ukraine Proposes Drone Defense Swap for Advanced Systems
ड्रोन रक्षा के बदले फंड और तकनीक की मांग: जेलेंस्की ने अमेरिका और खाड़ी देशों के सामने रखा प्रस्ताव

  रूस के साथ जारी युद्ध और बढ़ते ड्रोन हमलों के बीच Ukraine ने अपनी रक्षा रणनीति को और मजबूत करने के लिए एक नया प्रस्ताव रखा है। यूक्रेन के राष्ट्रपति Volodymyr Zelenskyy ने कहा है कि उनका देश अपने विकसित किए गए सस्ते ड्रोन इंटरसेप्टर के बदले अमेरिका और खाड़ी देशों से आर्थिक सहायता, तकनीक और उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम चाहता है। राष्ट्रपति जेलेंस्की ने स्पष्ट किया कि विदेशी सरकारें या कंपनियां यूक्रेनी ड्रोन सीधे निर्माताओं से खरीदकर सरकार को दरकिनार नहीं कर सकतीं। उन्होंने कहा कि रक्षा से जुड़े किसी भी सौदे को आधिकारिक सरकारी प्रक्रिया के जरिए ही पूरा किया जाना चाहिए, क्योंकि इसका सीधा असर देश की सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ता है।   ड्रोन तकनीक में बढ़ती वैश्विक दिलचस्पी हाल के महीनों में यूक्रेन द्वारा विकसित कम लागत वाले ड्रोन इंटरसेप्टर ने कई देशों का ध्यान आकर्षित किया है। खासकर मध्य पूर्व में बढ़ते ड्रोन खतरे के बीच अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की रुचि इन तकनीकों में बढ़ी है। जेलेंस्की ने कहा कि उनकी सरकार ने एक निजी कंपनी को फटकार भी लगाई है, जिसने सरकारी अनुमति के बिना ड्रोन इंटरसेप्टर बेचने की कोशिश की थी। उन्होंने कहा कि रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों को भी राष्ट्रीय सुरक्षा के नियमों का पालन करना होगा।   पैट्रियट सिस्टम की मांग यूक्रेन ने यह भी संकेत दिया है कि वह अपने कम लागत वाले इंटरसेप्टर के बदले उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम हासिल करना चाहता है। कीव ने विशेष रूप से अमेरिकी निर्मित Patriot Missile System की मांग की है, जो बैलिस्टिक मिसाइलों को मार गिराने में सक्षम माना जाता है। जेलेंस्की का कहना है कि रूस ने फरवरी 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद से यूक्रेन पर हजारों ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं। इनसे निपटने के लिए यूक्रेन फिलहाल सस्ते इंटरसेप्टर ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग सिस्टम और विमान-रोधी हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि, उन्नत रूसी बैलिस्टिक मिसाइलों के खतरे से निपटने के लिए पैट्रियट जैसे आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत पहले से अधिक महसूस की जा रही है।   रणनीतिक सहयोग की तलाश यूक्रेन का मानना है कि ड्रोन इंटरसेप्टर तकनीक साझा करने के बदले उसे वित्तीय सहायता और आधुनिक रक्षा उपकरण मिल सकते हैं। इससे न केवल उसकी अपनी रक्षा क्षमता मजबूत होगी, बल्कि उसके सहयोगी देशों को भी कम लागत में प्रभावी ड्रोन-रोधी तकनीक उपलब्ध हो सकेगी। जेलेंस्की ने जोर देकर कहा कि ऐसे सभी रक्षा समझौते यूक्रेनी सरकार की मंजूरी से ही किए जाएंगे, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य जरूरतों के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके।  

surbhi मार्च 16, 2026 0
Military drones flying near air defense systems highlighting modern warfare shift toward low-cost drone threats
सस्ते ड्रोन बनाम महंगे मिसाइल सिस्टम: पश्चिम एशिया के युद्ध से सबक लेते हुए भारत ने बदली रणनीति

  पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने आधुनिक युद्ध की रणनीतियों को लेकर दुनिया भर की सेनाओं को नया सबक दिया है। Iran, Israel और United States के बीच बढ़े तनाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब युद्ध केवल अत्याधुनिक और महंगे हथियारों के दम पर नहीं जीते जा सकते। सस्ते लेकिन प्रभावी ड्रोन और मिसाइलों ने पारंपरिक सैन्य रणनीतियों को चुनौती दी है। इन घटनाओं से सीख लेते हुए भारत भी अपनी वायु रक्षा रणनीति को नए सिरे से मजबूत करने में जुट गया है। रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय वायुसेना ने रूस से कम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली खरीदने की प्रक्रिया तेज कर दी है, ताकि सस्ते ड्रोन और कम ऊंचाई वाले खतरों से प्रभावी तरीके से निपटा जा सके।   युद्ध ने बदला आधुनिक रक्षा रणनीति का गणित विशेषज्ञों के मुताबिक हाल के संघर्षों में Iran ने अपेक्षाकृत कम लागत वाले ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल कर शक्तिशाली सैन्य प्रणालियों को चुनौती दी। दूसरी ओर United States और Israel को इन ड्रोन हमलों को रोकने के लिए अत्यंत महंगे इंटरसेप्टर मिसाइल और उन्नत रक्षा प्रणालियों का उपयोग करना पड़ा। इस स्थिति ने युद्ध की अर्थव्यवस्था को भी एक अहम कारक बना दिया है-जहां कम लागत के हथियार महंगे डिफेंस सिस्टम पर भारी पड़ते दिखाई दिए।   महंगे सिस्टम से सस्ते ड्रोन गिराना क्यों पड़ता है भारी उदाहरण के तौर पर रूस का अत्याधुनिक वायु रक्षा सिस्टम S-400 air defense system लंबी दूरी के खतरों को खत्म करने के लिए बनाया गया है। यह 400 किलोमीटर तक की दूरी से आने वाले फाइटर जेट, बैलिस्टिक मिसाइल और अवाक्स जैसे बड़े सैन्य लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम है। लेकिन इसकी एक मिसाइल दागने की लागत कई करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। ऐसे में यदि इसी सिस्टम का इस्तेमाल छोटे और सस्ते ड्रोन को गिराने के लिए किया जाए तो यह सैन्य दृष्टि से आर्थिक रूप से बेहद महंगा पड़ सकता है।   रूस से कम दूरी के सिस्टम की खरीद की तैयारी इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए भारतीय वायुसेना ने रूस के Pantsir-S1 air defense system को खरीदने का निर्णय लिया है। यह एक शॉर्ट-रेंज एयर डिफेंस सिस्टम है, जिसे विशेष रूप से ड्रोन, क्रूज मिसाइल और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है। रिपोर्टों के मुताबिक भारत ऐसे 13 सिस्टम खरीदने की योजना बना रहा है। इनकी खरीद पर करीब 6,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है और इन्हें आपातकालीन खरीद नीति के तहत हासिल किया जाएगा, जिससे डिलीवरी प्रक्रिया तेज हो सके।   S-400 और Pantsir-S1 में मुख्य अंतर लागत: S-400 से मिसाइल दागने की लागत कई करोड़ रुपये तक हो सकती है।   Pantsir-S1 से इंटरसेप्शन की लागत लगभग 90 लाख से 1.3 करोड़ रुपये के बीच मानी जाती है।   रेंज: S-400 की मारक क्षमता लगभग 400 किलोमीटर तक है।   Pantsir-S1 की प्रभावी रेंज लगभग 20 किलोमीटर है।   टार्गेट: S-400: बैलिस्टिक मिसाइल, फाइटर जेट और बड़े हवाई खतरे।   Pantsir-S1: ड्रोन, क्रूज मिसाइल और कम ऊंचाई वाले हवाई लक्ष्य।   विशेषज्ञों का मानना है कि Pantsir-S1 जैसे सिस्टम का मुख्य उद्देश्य S-400 जैसे लंबी दूरी के रक्षा सिस्टम को सुरक्षा कवच देना और छोटे खतरों को पहले ही निष्क्रिय कर देना होता है।   युद्धों से मिल रही रणनीतिक सीख Russia-Ukraine War में भी सस्ते ड्रोन ने बड़े सैन्य उपकरणों को नुकसान पहुंचाकर युद्ध की रणनीति बदल दी थी। इसी तरह पश्चिम एशिया के हालिया संघर्ष ने भी दिखाया है कि भविष्य के युद्धों में लो-कॉस्ट ड्रोन और मिसाइलों का उपयोग निर्णायक भूमिका निभा सकता है। भारत अब बहुस्तरीय वायु रक्षा प्रणाली विकसित करने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है, जिसमें लंबी दूरी के सिस्टम के साथ-साथ कम दूरी के एंटी-ड्रोन सिस्टम भी शामिल होंगे।  

surbhi मार्च 13, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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surbhi मई 15, 2026 0