Chinmayi Sripada ने भोपाल की एक्ट्रेस Twisha Sharma और ग्रेटर नोएडा की Deepika Nagar की मौत के मामलों पर गहरी नाराजगी जताई है। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा कर समाज की उस मानसिकता पर सवाल उठाए, जिसमें शादी के बाद बेटियों को “ससुराल की जिम्मेदारी” मान लिया जाता है। इन दोनों मामलों ने एक बार फिर दहेज प्रताड़ना और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर देशभर में बहस छेड़ दी है। चिन्मयी श्रीपदा ने क्या कहा? चिन्मयी श्रीपदा ने अपने पोस्ट में भारतीय समाज और कुछ माता-पिताओं की सोच पर तीखा हमला बोला। उन्होंने लिखा कि कई परिवार बेटियों को “सामान” की तरह ससुराल भेज देते हैं, मानो उनकी कोई वापसी नहीं हो सकती। उन्होंने अपने पोस्ट में कहा: “ट्विशा की मौत इस बात का सबूत है कि कई भारतीय माता-पिता अपनी बेटी को एक वस्तु मानते हैं, जिसे ससुराल में सौंप दिया जाता है और जिसकी कोई रिटर्न पॉलिसी नहीं होती। लड़की ससुराल में मर जाए। कन्यादान के बाद यही सम्मान की बात है। है ना?” उनके इस बयान ने सोशल मीडिया पर बड़ी बहस को जन्म दे दिया है। सोशल मीडिया पर बंटे लोगों के रिएक्शन चिन्मयी के पोस्ट पर सोशल मीडिया यूजर्स की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ लोगों ने उनके बयान का समर्थन करते हुए कहा कि: दहेज की मांग को शुरुआत में ही सख्ती से रोकना चाहिए बेटियों को प्रताड़ना सहने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए परिवारों को बेटियों के लिए सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करना चाहिए वहीं कुछ यूजर्स ने सवाल उठाया कि: क्या परिवारों को स्थिति की पूरी जानकारी थी? अगर प्रताड़ना हो रही थी तो पुलिस शिकायत क्यों नहीं की गई? क्या है दीपिका नागर केस? ग्रेटर नोएडा की रहने वाली दीपिका नागर की शादी करीब 14 महीने पहले हुई थी। परिवार का आरोप है कि शादी के कुछ समय बाद ससुराल पक्ष ने अतिरिक्त दहेज की मांग शुरू कर दी। परिवार के मुताबिक: शादी में करीब 1 करोड़ रुपये खर्च किए गए टोयोटा कार भी दी गई इसके बावजूद 50 लाख रुपये और फॉर्च्यूनर गाड़ी की मांग की गई परिजनों का आरोप है कि मांग पूरी न होने पर दीपिका को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। 17 मई को उनकी मौत की खबर सामने आई। ट्विशा शर्मा केस में क्या आरोप हैं? भोपाल की एक्ट्रेस ट्विशा शर्मा 12 मई को अपने घर में मृत पाई गई थीं। उनके परिवार ने: पति समर्थ सिंह और सास, रिटायर्ड जज गिरिबाला सिंह पर दहेज प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाए हैं। परिवार का दावा है कि ट्विशा को लगातार परेशान किया जा रहा था। वहीं ससुराल पक्ष ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि ट्विशा को ड्रग्स की समस्या थी। परिवार ने इस दावे को पूरी तरह खारिज किया है। दहेज प्रथा पर फिर उठे बड़े सवाल इन दोनों मामलों ने एक बार फिर दहेज प्रथा, महिलाओं की सुरक्षा और शादी के बाद बेटियों के प्रति समाज की सोच पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर लोग: दहेज विरोधी कानूनों को और सख्त बनाने महिलाओं के लिए सपोर्ट सिस्टम मजबूत करने और परिवारों को जागरूक करने की मांग कर रहे हैं।
Narendra Modi को लेकर नॉर्वे के एक प्रमुख अखबार में प्रकाशित कार्टून पर विवाद गहरा गया है। सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों ने इस कार्टून को नस्लवादी, भारत विरोधी और औपनिवेशिक मानसिकता से प्रेरित बताया है। यह विवाद नॉर्वे के अखबार Aftenposten में प्रकाशित एक कार्टून को लेकर शुरू हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी को ‘स्नेक चार्मर’ यानी सपेरे के रूप में दिखाया गया था। कार्टून में क्या दिखाया गया? कार्टून में पीएम मोदी को हाथ में बीन जैसी पाइप पकड़े दिखाया गया है। सामने लकड़ी के बॉक्स में सांप की जगह पेट्रोल स्टेशन के पाइप जैसा चित्र बनाया गया है। यह कार्टून एक ओपिनियन आर्टिकल के साथ प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था — “एक चालाक और थोड़ा परेशान करने वाला आदमी।” कार्टून सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे भारत की पुरानी और रूढ़िवादी छवि से जोड़ने की कोशिश बताया। सोशल मीडिया पर लोगों का फूटा गुस्सा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स और अन्य माध्यमों पर लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। कई यूजर्स ने कहा कि यह कार्टून पश्चिमी देशों की उस पुरानी सोच को दर्शाता है, जिसमें भारत को “सांप-सपेरों का देश” के रूप में देखा जाता था। एक यूजर ने लिखा कि यह चित्रण साफ तौर पर नस्लवादी है और भारत की आधुनिक छवि को कमजोर करने की कोशिश करता है। कुछ लोगों ने कहा कि पश्चिमी मीडिया के कुछ हिस्से आज भी औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाए हैं। पीएम मोदी पहले भी उठा चुके हैं यह मुद्दा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार सार्वजनिक मंचों से कह चुके हैं कि दुनिया कभी भारत को “सपेरों का देश” मानती थी, लेकिन अब भारत तकनीक, डिजिटल इनोवेशन और वैश्विक नेतृत्व के क्षेत्र में नई पहचान बना चुका है। इसी वजह से कार्टून को लेकर लोगों की नाराजगी और बढ़ गई है। कई यूजर्स का कहना है कि इस तरह का चित्रण आधुनिक भारत की उपलब्धियों को नजरअंदाज करता है। पत्रकार के सवाल के बाद बढ़ा विवाद यह मामला उस समय और ज्यादा चर्चा में आ गया जब नॉर्वे दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी से मीडिया के सवाल नहीं लेने को लेकर एक पत्रकार ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया। इसके बाद प्रकाशित कार्टून को कुछ लोगों ने उसी विवाद से जोड़कर देखा, इस मामले पर अभी तक नॉर्वे सरकार या अखबार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
मनोरंजन जगत के जाने-माने कॉमेडियन Sunil Pal एक सम्मान समारोह के दौरान कथित तौर पर अपमानजनक स्थिति का सामना करते नजर आए। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसने दर्शकों और फैंस के बीच बहस छेड़ दी है। मंच पर बुलाया, लेकिन बोलने नहीं दिया कार्यक्रम में Sunil Pal को सम्मानित करने के लिए मंच पर आमंत्रित किया गया। उन्हें गुलदस्ता देकर सम्मान जताया गया, लेकिन जैसे ही उन्होंने कुछ शब्द कहने के लिए माइक लेने की कोशिश की, आयोजकों ने उन्हें बोलने का अवसर नहीं दिया। वीडियो में देखा जा सकता है कि कॉमेडियन विनम्रता से बार-बार अनुरोध करते हैं कि उन्हें कम से कम धन्यवाद देने दिया जाए। हालांकि, मंच पर मौजूद लोग उन्हें लगातार अपनी सीट पर लौटने का इशारा करते रहे। सोशल मीडिया पर गुस्सा घटना के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर यूजर्स ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। कई लोगों ने इसे कलाकार का अपमान बताते हुए आयोजकों के व्यवहार की आलोचना की। कुछ प्रतिक्रियाएं इस तरह रहीं: “अगर बुलाया है तो सम्मान भी दीजिए” “यह बहुत असभ्य व्यवहार है” “किसी कलाकार को बोलने का मौका न देना गलत है” फैंस ने Sunil Pal के संयम और विनम्रता की भी सराहना की। वजह अब भी साफ नहीं इस पूरे घटनाक्रम के पीछे क्या कारण था, इसे लेकर अब तक आयोजकों की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। हालांकि, कुछ लोगों का मानना है कि यह विवाद कॉमेडियन के पहले दिए गए कुछ बयानों से जुड़ा हो सकता है। कौन हैं सुनील पाल? Sunil Pal ने साल 2005 में The Great Indian Laughter Challenge जीतकर पहचान बनाई थी। इसके बाद उन्होंने टीवी और लाइव शो के जरिए अपनी खास कॉमिक स्टाइल से दर्शकों के बीच जगह बनाई।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।