इस्लामाबाद: पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के ग्वादर जिले के जिवानी क्षेत्र में स्थित पाकिस्तान कोस्ट गार्ड के एक कैंप पर कथित आत्मघाती हमले का दावा किया गया है। प्रतिबंधित अलगाववादी संगठन बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने कहा है कि उसके आत्मघाती हमलावर ने इस कार्रवाई को अंजाम दिया, जिसमें 30 से अधिक पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मी मारे गए और कई अन्य घायल हुए। हालांकि, पाकिस्तान सरकार, सेना या किसी आधिकारिक एजेंसी ने अब तक इस दावे की पुष्टि नहीं की है। BLA ने क्या दावा किया? BLA के प्रवक्ता जीयंद बलोच के नाम से जारी बयान में कहा गया है कि संगठन की मजीद ब्रिगेड ने ग्वादर जिले के जिवानी के पनवान इलाके में स्थित पाकिस्तान कोस्ट गार्ड कैंप को निशाना बनाया। संगठन का दावा है कि आत्मघाती हमलावर पहले सुरक्षा कैंप के भीतर प्रवेश करने में सफल रहे और इसके बाद विस्फोट किया, जिससे भारी नुकसान हुआ। जिवानी क्यों है महत्वपूर्ण? जिवानी, ग्वादर जिले का एक रणनीतिक तटीय क्षेत्र है। यह अरब सागर के किनारे स्थित होने के कारण पाकिस्तान की समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों के लिहाज से अहम माना जाता है। वायरल वीडियो पर नहीं हुई पुष्टि हमले से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर @Bahotblch नाम के अकाउंट से साझा किया गया है। दावा किया जा रहा है कि यह वीडियो हमले का है। हालांकि, इस वीडियो की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और इसकी सत्यता स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं की जा सकी है। पाकिस्तान की ओर से नहीं आया बयान हमले के दावे के बावजूद पाकिस्तान सरकार, सेना या सुरक्षा एजेंसियों की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया जारी नहीं की गई है। इसलिए हताहतों की संख्या और घटना के वास्तविक स्वरूप की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल उपलब्ध नहीं है। जांच और आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही घटना की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
मुंबई, एजेंसियां। सलमान खान की बहुप्रतीक्षित फिल्म 'मातृभूमि: मे वॉर रेस्ट इन पीस' को लेकर सोशल मीडिया पर चल रही सेंसर बोर्ड (CBFC) से जुड़े विवाद की खबरों पर आखिरकार मेकर्स ने चुप्पी तोड़ दी है। हाल के दिनों में दावा किया जा रहा था कि फिल्म का सर्टिफिकेशन रोक दिया गया है और यह केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) में अटक गई है। इन खबरों के बाद फिल्म की रिलीज को लेकर प्रशंसकों के बीच असमंजस की स्थिति बन गई थी। इन तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए सलमान खान फिल्म्स (SKF) ने आधिकारिक बयान जारी किया। प्रोडक्शन हाउस ने स्पष्ट किया कि फिल्म को अभी तक सर्टिफिकेशन के लिए CBFC के पास भेजा ही नहीं गया है। ऐसे में सेंसर बोर्ड द्वारा फिल्म रोकने या सर्टिफिकेट देने से इनकार करने जैसी खबरें पूरी तरह निराधार और भ्रामक हैं। आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर जारी बयान में कहा सलमान खान फिल्म्स ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर जारी बयान में कहा कि फिल्म को लेकर प्रसारित की जा रही अपुष्ट जानकारी पर विश्वास न करें। मेकर्स ने मीडिया और सोशल मीडिया यूजर्स से अपील की कि किसी भी खबर को साझा करने से पहले उसकी पुष्टि अवश्य करें। उन्होंने यह भी कहा कि फिल्म से जुड़ी हर आधिकारिक जानकारी केवल सलमान खान फिल्म्स के अधिकृत प्लेटफॉर्म से ही साझा की जाएगी। क्या है मामला ? गौरतलब है कि निर्देशक अपूर्व लाखिया की इस फिल्म का शुरुआती नाम 'बैटल ऑफ गलवान' था। फिल्म 2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुए संघर्ष से प्रेरित बताई जाती है। बाद में कहानी के व्यापक भावनात्मक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए इसका नाम बदलकर 'मातृभूमि: मे वॉर रेस्ट इन पीस' कर दिया गया। फिल्म में सलमान खान के साथ चित्रांगदा सिंह, अभिलाष चौधरी और अंकुर भाटिया अहम भूमिकाओं में नजर आएंगे। पहले इसकी रिलीज अप्रैल 2026 में प्रस्तावित थी, लेकिन इसे आगे बढ़ा दिया गया। फिलहाल निर्माता नई रिलीज डेट तय करने में जुटे हैं। ऐसे में मेकर्स ने साफ कर दिया है कि सेंसर बोर्ड से जुड़े विवाद की खबरों में कोई सच्चाई नहीं है और फिल्म की आधिकारिक प्रक्रिया अभी शुरू ही नहीं हुई है।
बीजिंग/ढाका: चीन अब पाकिस्तान के बाद दक्षिण एशिया में अपनी रणनीतिक मौजूदगी और मजबूत करने की दिशा में एक और बड़ा कदम बढ़ा रहा है। चीन ने म्यांमार और बांग्लादेश के जरिए नए आर्थिक गलियारे (Economic Corridor) के निर्माण की योजना पर काम तेज कर दिया है। इस प्रस्तावित परियोजना का उद्देश्य सड़क, रेल और बंदरगाहों के नेटवर्क के माध्यम से चीन को सीधे बंगाल की खाड़ी से जोड़ना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना आगे बढ़ती है तो इसका असर केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका क्षेत्रीय सामरिक संतुलन पर भी प्रभाव पड़ सकता है। क्या है चीन का नया इकोनॉमिक कॉरिडोर? रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्तावित कॉरिडोर के तहत चीन के कुनमिंग शहर को म्यांमार के रास्ते बांग्लादेश के मोंगला बंदरगाह समेत अन्य प्रमुख समुद्री बंदरगाहों से जोड़ा जाएगा। इस परियोजना के जरिए चीन माल ढुलाई के लिए वैकल्पिक मार्ग विकसित करना चाहता है, साथ ही बंगाल की खाड़ी तक अपनी पहुंच को भी मजबूत करना चाहता है। बांग्लादेश-चीन वार्ता में हुई चर्चा हाल ही में चीन की यात्रा पर गए बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने इस परियोजना पर चीनी नेतृत्व के साथ विस्तृत चर्चा की। इसके बाद बांग्लादेश में चीन के राजदूत याओ वेन ने बताया कि दोनों देश आर्थिक सहयोग के साथ-साथ कूटनीतिक और रक्षा मामलों में '2+2 संवाद' की व्यवस्था विकसित करने पर भी सहमत हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में इस आर्थिक गलियारे में अन्य इच्छुक देशों की भागीदारी के लिए भी चीन खुला रुख अपनाएगा। CPEC की तर्ज पर नया प्रोजेक्ट विश्लेषकों के अनुसार, यह परियोजना काफी हद तक चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की तर्ज पर तैयार की जा रही है। जिस तरह CPEC के माध्यम से चीन को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के जरिए अरब सागर तक सीधी पहुंच मिली, उसी प्रकार नया कॉरिडोर चीन को बंगाल की खाड़ी तक एक वैकल्पिक संपर्क मार्ग उपलब्ध करा सकता है। भारत की रणनीतिक चिंता क्यों बढ़ी? भारत के लिए इस परियोजना का महत्व केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक भी माना जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, सड़क, रेल और बंदरगाह जैसी आधारभूत संरचनाओं का उपयोग सामान्य परिस्थितियों में व्यापार और परिवहन के लिए होता है, लेकिन किसी सैन्य या आपात स्थिति में इन्हीं मार्गों का इस्तेमाल सैनिकों, सैन्य उपकरणों और रसद की तेज आवाजाही के लिए भी किया जा सकता है। इसी कारण भारत इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और समुद्री पहुंच पर करीबी नजर बनाए हुए है। क्षेत्रीय समीकरणों पर रहेगी नजर चीन की यह पहल ऐसे समय सामने आई है जब दक्षिण एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। यदि यह परियोजना आगे बढ़ती है, तो इसका प्रभाव क्षेत्रीय व्यापार, कनेक्टिविटी और सुरक्षा समीकरणों पर पड़ सकता है। हालांकि, परियोजना के सभी पहलुओं और संभावित प्रभावों को लेकर अभी आगे की कूटनीतिक और तकनीकी प्रक्रियाएं बाकी हैं।
ढाका: तीस्ता नदी परियोजना को लेकर भारत की चिंताओं के बीच चीन ने पहली बार अपना आधिकारिक रुख स्पष्ट किया है। बांग्लादेश में चीन के राजदूत याओ वेन ने कहा कि चीन इस परियोजना में केवल बांग्लादेश के अनुरोध पर सहयोग कर रहा है और इसके पीछे उसका कोई अन्य रणनीतिक उद्देश्य नहीं है। ढाका स्थित चीनी दूतावास में आयोजित प्रेस वार्ता में याओ वेन ने कहा कि तीस्ता परियोजना पूरी तरह बांग्लादेश के विकास और वहां के लोगों की जरूरतों से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि चीन इस परियोजना को सफल बनाने के लिए हरसंभव तकनीकी और आर्थिक सहयोग देने को तैयार है। तारिक रहमान की चीन यात्रा में रही तीस्ता परियोजना की चर्चा चीन के राजदूत का यह बयान बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की हालिया चीन यात्रा के बाद सामने आया है। इस दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच कई अहम परियोजनाओं पर चर्चा हुई, जिनमें तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना प्रमुख रही। याओ वेन ने कहा कि तीस्ता नदी के आसपास रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका इस परियोजना से जुड़ी हुई है। ऐसे में चीन बांग्लादेश की जरूरतों के अनुरूप इस परियोजना में अधिकतम सहयोग देगा। यूनुस सरकार के समय हुए समझौते पर भी दी सफाई प्रेस वार्ता के दौरान जब पिछली अंतरिम सरकार के कार्यकाल में एक चीनी कंपनी और बांग्लादेशी संस्था के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के बारे में सवाल पूछा गया तो याओ वेन ने कहा कि वह समझौता केवल एक कंपनी और सरकारी संस्था के बीच था। उन्होंने बताया कि अब परियोजना सरकार-स्तर पर आगे बढ़ रही है और चीन पहले विस्तृत सर्वेक्षण कराएगा, जिसके बाद आगे की प्रक्रिया तय होगी। भारत की चिंताओं पर क्या कहा? जब पत्रकारों ने पूछा कि भारत इस परियोजना को लेकर चिंता जता रहा है और यदि ऊपरी हिस्से से पर्याप्त पानी नहीं छोड़ा गया तो परियोजना पर क्या असर पड़ेगा, तो याओ वेन ने कहा कि यह चीन का विषय नहीं है। उन्होंने कहा, "चीन केवल बांग्लादेश की अपेक्षाओं के अनुरूप इस परियोजना में सहयोग कर रहा है। इसके अलावा हमारा कोई अन्य उद्देश्य या चिंता नहीं है।" बांग्लादेश-म्यांमार-चीन कॉरिडोर पर भी रखी बात याओ वेन ने बांग्लादेश-म्यांमार-चीन आर्थिक कॉरिडोर (BMCC) का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह कोई नई अवधारणा नहीं है। करीब 15 वर्ष पहले चीन ने बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार (BCIM) आर्थिक कॉरिडोर का प्रस्ताव रखा था, लेकिन यह योजना अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी। भारत के लिए भी खुला रखा प्रस्ताव चीन के राजदूत ने कहा कि यदि भारत भविष्य में इस आर्थिक कॉरिडोर से जुड़ना चाहता है तो चीन उसका स्वागत करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसमें शामिल होना या नहीं होना पूरी तरह भारत का निर्णय होगा। उन्होंने कहा कि फिलहाल चीन बांग्लादेश और म्यांमार के साथ क्षेत्रीय संपर्क और आर्थिक सहयोग बढ़ाने की दिशा में प्रतिबद्धता के साथ काम कर रहा है। भारत की क्यों बढ़ी है चिंता? तीस्ता नदी पूर्वी हिमालय से निकलकर सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है। नदी के जल बंटवारे और प्रबंधन का मुद्दा लंबे समय से भारत और बांग्लादेश के बीच चर्चा का विषय रहा है। भारत की चिंता इस बात को लेकर भी है कि प्रस्तावित परियोजना सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के निकट स्थित है, जिसे देश के पूर्वोत्तर राज्यों से संपर्क बनाए रखने के लिहाज से बेहद रणनीतिक क्षेत्र माना जाता है। ऐसे में इस परियोजना को क्षेत्रीय और सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस्लामाबाद/रावलकोट: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। मंगलवार को रावलकोट के ईदगाह ग्राउंड में हजारों लोग एकत्र हुए और पाकिस्तान सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि PoK पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है और स्थानीय लोगों के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है। यह आंदोलन जम्मू-कश्मीर अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में चल रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, JAAC के प्रमुख शौकत नवाज मीर को उनके दो सहयोगियों के साथ धीरकोट के सांगर फत्तारे इलाके से गिरफ्तार कर लिया गया। इसके अलावा JAAC के 600 से अधिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी हिरासत में लिया गया है। शौकत नवाज पर था एक करोड़ रुपये का इनाम रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान सरकार ने शौकत नवाज मीर और अन्य JAAC नेताओं की सूचना देने वालों के लिए एक करोड़ रुपये के इनाम की घोषणा की थी। गिरफ्तारी के बाद इलाके में सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी गई है। 'हमें नहीं, पाकिस्तान को हमारी जरूरत' प्रदर्शन को संबोधित करते हुए JAAC नेता सरदार अमन खान ने पाकिस्तान सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सरकार आंदोलन को दबाने के लिए जानबूझकर आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति रोक रही है। उन्होंने कहा, "हमें आपके राशन की जरूरत नहीं है, बल्कि आपको हमारी जरूरत है। यदि जरूरी सामान की सप्लाई नहीं हुई तो लोग जिंदा रहने के लिए दूसरा रास्ता चुनने को मजबूर होंगे।" महंगाई से शुरू हुआ आंदोलन, अब बना राजनीतिक विरोध बताया जा रहा है कि यह आंदोलन शुरुआत में महंगाई, खाद्य संकट, बढ़ती कीमतों और स्थानीय प्रशासन की नीतियों के खिलाफ शुरू हुआ था। अब यह पाकिस्तान सरकार के खिलाफ व्यापक राजनीतिक विरोध में बदल गया है। हाल ही में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ द्वारा रावलकोट और मीरपुर के लोगों को "असल कश्मीरी नहीं" बताए जाने के बाद लोगों में नाराजगी और बढ़ गई। JAAC पर प्रतिबंध, आतंकवाद विरोधी कानून के तहत कार्रवाई रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान सरकार ने 5 जून को JAAC पर आतंकवाद विरोधी कानून के तहत प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बाद संगठन के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ आतंकवाद निरोधक कानून के तहत मुकदमे दर्ज किए गए हैं। इंटरनेट सेवाएं प्रभावित, 22 लोगों की मौत का दावा स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जून की शुरुआत से PoK के कई हिस्सों में इंटरनेट सेवाएं सीमित कर दी गई हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि आंदोलन की तस्वीरें और वीडियो बाहर जाने से रोकने के लिए ऐसा किया गया। दावा किया जा रहा है कि पिछले दो सप्ताह के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़पों में 22 लोगों की मौत हुई है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। 27 जुलाई को होंगे विधानसभा चुनाव पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में 27 जुलाई को विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। विधानसभा में कुल 53 सीटें हैं, जिनमें 45 सीटों पर प्रत्यक्ष चुनावहोंगे, जबकि 8 सीटें महिलाओं, तकनीकी विशेषज्ञों और धार्मिक विद्वानों के लिए आरक्षित हैं। चुनाव से पहले बढ़ते विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक तनाव ने क्षेत्र की सुरक्षा और राजनीतिक स्थिति को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं।
काबुल/इस्लामाबाद: अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने दावा किया है कि उसने पाकिस्तान के भीतर मौजूद Islamic State – Khorasan Province के ठिकानों पर ड्रोन और हवाई हमले किए हैं। तालिबान के अनुसार, इन ठिकानों का इस्तेमाल अफगानिस्तान के खिलाफ आतंकी गतिविधियों और साजिशों के लिए किया जा रहा था। रिपोर्टों के मुताबिक, हमले पाकिस्तान के बलूचिस्तान और Khyber Pakhtunkhwa के कुछ सीमावर्ती इलाकों में किए गए। तालिबान का दावा- आतंकियों को बनाया निशाना तालिबान सरकार का कहना है कि कार्रवाई केवल ISIS-K के ठिकानों के खिलाफ की गई और इसमें कई आतंकवादी मारे गए। सरकार ने यह भी दावा किया कि ऑपरेशन के दौरान किसी भी नागरिक को नुकसान नहीं पहुंचा। अफगान मीडिया TOLOnews ने भी तालिबान के हवाले से बताया कि निशाना बनाए गए ठिकानों का उपयोग अफगानिस्तान के भीतर हमलों की योजना बनाने के लिए किया जा रहा था। स्कूल को भी बनाया गया निशाना तालिबान के अनुसार, पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा के सरान क्षेत्र में एक स्कूल भी हमले की चपेट में आया। उसका दावा है कि इस इमारत का इस्तेमाल ISIS-K के लड़ाके अपने ठिकाने के रूप में कर रहे थे, इसलिए उसे निशाना बनाया गया। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। तनाव पहले से था बढ़ा यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब कुछ दिन पहले पाकिस्तान ने अफगानिस्तान सीमा से लगे इलाकों में हवाई हमले किए थे। United Nations Assistance Mission in Afghanistan के अनुसार, उन हमलों में कम से कम 28 नागरिकों की मौत और 49 लोग घायल हुए थे। वहीं, तालिबान सरकार के प्रवक्ता Hamdullah Fitrat ने इससे अधिक नुकसान का दावा करते हुए कहा कि पाकिस्तानी हमलों में 38 नागरिकों की मौत हुई और 163 लोग घायल हुए। उनके अनुसार, मृतकों और घायलों में बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल थे। क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका अफगानिस्तान द्वारा पाकिस्तान के भीतर की गई इस कथित सैन्य कार्रवाई के बाद दोनों पड़ोसी देशों के बीच तनाव और बढ़ने की आशंका है। फिलहाल पाकिस्तान की ओर से इन हमलों और तालिबान के दावों पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत ने अफगानिस्तान के भीतर पाकिस्तान द्वारा किए गए हवाई हमलों की कड़ी निंदा करते हुए इसे "आक्रामक कार्रवाई" और अफगानिस्तान की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता पर सीधा हमला बताया है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि किसी भी देश की संप्रभुता का उल्लंघन क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए गंभीर खतरा है। विदेश मंत्रालय ने क्या कहा? विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई में महिलाओं और बच्चों सहित कई निर्दोष नागरिकों के हताहत होने की खबरें बेहद चिंताजनक हैं। भारत ने कहा कि आतंकवाद और सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के नाम पर किसी दूसरे देश की सीमा का उल्लंघन स्वीकार्य नहीं है। भारत ने अफगानिस्तान की संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति अपना समर्थन दोहराया है। अफगानिस्तान ने भी जताया विरोध अफगान अधिकारियों के अनुसार, पाकिस्तान के हवाई हमलों में कम से कम 36 नागरिकों की मौत और 160 से अधिक लोगों के घायल होने की सूचना है। हमलों के बाद अफगानिस्तान ने पाकिस्तान के वरिष्ठ राजनयिक को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया है। बढ़ा क्षेत्रीय तनाव भारत ने कहा कि दक्षिण एशिया में शांति बनाए रखने के लिए सभी देशों को अंतरराष्ट्रीय कानून और एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटनाक्रम से आने वाले दिनों में भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच कूटनीतिक तनाव और बढ़ सकता है।
Islamabad: सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान ने एक बार फिर तीखी प्रतिक्रिया दी है। पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक ने भारत को धमकी भरे लहजे में चेतावनी देते हुए कहा कि "जो पाकिस्तान के हिस्से का पानी छीनने या रोकने की कोशिश करेगा, उसके हाथ काट दिए जाएंगे।" उनके इस बयान ने दोनों देशों के बीच पहले से चल रहे जल विवाद को और गर्मा दिया है। संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में दी चेतावनी पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार और जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत के फैसलों पर कड़ी आपत्ति जताई। दोनों नेताओं ने आरोप लगाया कि भारत सिंधु जल संधि के तहत पाकिस्तान के हिस्से के पानी को रोकने की कोशिश कर रहा है। मुसादिक मलिक ने कहा कि पाकिस्तान अपने जल अधिकारों की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएगा और किसी भी तरह के हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। भारत के फैसले के बाद बढ़ा विवाद दरअसल, 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का निर्णय लिया था। इसके बाद से दोनों देशों के बीच जल संसाधनों को लेकर तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। पाकिस्तान का दावा है कि भारत संधि के प्रावधानों के विपरीत उसके हिस्से के पानी पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, जबकि भारत का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा पार आतंकवाद को देखते हुए उसने अपने हितों के अनुरूप कदम उठाए हैं। पाकिस्तानी अखबार का दावा पाकिस्तानी अखबार Dawn के अनुसार, मुसादिक मलिक ने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री के हाथ में "पानी का नल" है और वे पाकिस्तान को एक बूंद पानी भी नहीं देने की बात कर रहे हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने विवादित टिप्पणी करते हुए कहा कि पाकिस्तान के हिस्से का पानी रोकने की कोशिश करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। सिंधु जल संधि क्यों है अहम? साल 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई सिंधु जल संधि दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का आधार है। इस समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के जल उपयोग को लेकर दोनों देशों के अधिकार तय किए गए हैं। हाल के वर्षों में सीमा पार आतंकवाद और सुरक्षा मुद्दों के कारण इस संधि को लेकर दोनों देशों के संबंधों में लगातार तनाव बना हुआ है।
बीजिंग/नई दिल्ली: भारत की सुरक्षा चिंताओं के बीच चीन ने तीस्ता नदी परियोजना पर अपना रुख स्पष्ट किया है। चीन ने कहा है कि बांग्लादेश के साथ उसका सहयोग किसी तीसरे देश, विशेष रूप से भारत, को निशाना बनाकर नहीं किया जा रहा है। साथ ही उसने जोर देकर कहा कि दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध किसी भी बाहरी प्रभाव से मुक्त होने चाहिए। तीस्ता परियोजना को चीन का खुला समर्थन बीजिंग में आयोजित नियमित प्रेस वार्ता के दौरान चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा कि चीन बांग्लादेश की 'तीस्ता नदी व्यापक उपचार एवं पुनर्वास परियोजना' का समर्थन करने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि यह परियोजना आम लोगों की आजीविका से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पहल है और बांग्लादेश सरकार इसे प्राथमिकता दे रही है। चीन इस परियोजना के जरिए दोनों देशों के बीच विकास सहयोग को और मजबूत करना चाहता है। आर्थिक और जल संसाधन क्षेत्रों में बढ़ेगा सहयोग गुओ जियाकुन ने कहा कि चीन और बांग्लादेश अपनी विकास रणनीतियों में बेहतर तालमेल स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि दोनों देश अर्थव्यवस्था, व्यापार, जल संरक्षण और जनकल्याण जैसे क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार करने के इच्छुक हैं। भारत की आपत्तियों पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "चीन-बांग्लादेश सहयोग किसी तीसरे पक्ष को लक्षित नहीं करता और इसे किसी भी बाहरी प्रभाव से मुक्त रखा जाना चाहिए।" भारत पहले ही जता चुका है आपत्ति भारत ने तीस्ता नदी से जुड़ी परियोजनाओं में चीन की संभावित भागीदारी पर पहले ही चिंता जताई है। नई दिल्ली का मानना है कि यह परियोजना भारत-बांग्लादेश सीमा के अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र के निकट स्थित है, इसलिए इसमें चीन की मौजूदगी सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है। क्यों अहम है तीस्ता नदी? तीस्ता नदी का उद्गम पूर्वी हिमालय में होता है। यह सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है, जहां यह सिंचाई, कृषि और लाखों लोगों की आजीविका का प्रमुख स्रोत है। 'चिकन नेक' के कारण बढ़ी भारत की चिंता भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि तीस्ता नदी परियोजना सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के बेहद करीब स्थित है। यह संकरा भूभाग भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्से से जोड़ने वाला एकमात्र स्थलीय संपर्क मार्ग है और सामरिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र में चीन की वित्तीय, तकनीकी या बुनियादी ढांचा संबंधी मौजूदगी बढ़ती है, तो इसका असर भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन पर पड़ सकता है। इसी कारण भारत पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है।
इस्लामाबाद: कराची में हुए आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान ने अफगानिस्तान सीमा पर बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चलाया है। पाकिस्तानी अधिकारियों के मुताबिक, रविवार (28 जून) को सुरक्षा बलों ने पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा से लगे इलाकों में जमीनी और हवाई कार्रवाई करते हुए 29 आतंकियों को मार गिराया। समाचार एजेंसी AP के अनुसार, पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बताया कि यह अभियान हाल के आतंकी हमलों के जवाब में शुरू किया गया। उन्होंने कहा कि सुरक्षा बलों ने आतंकियों के ठिकानों और उनके सुरक्षित ठिकानों को सटीक निशाना बनाया। हालांकि, इस कार्रवाई पर अफगानिस्तान की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। कराची हमले के बाद तेज हुई कार्रवाई यह सैन्य अभियान ऐसे समय शुरू किया गया है, जब एक दिन पहले कराची में हथियारों और विस्फोटकों से लैस आतंकियों ने पैरामिलिट्री रेंजर्स के क्षेत्रीय मुख्यालय पर हमला किया था। इस हमले में तीन पाकिस्तानी सैनिकों की मौत हो गई थी। सुरक्षा बलों की जवाबी कार्रवाई में तीन हमलावर मारे गए, जबकि एक घायल आतंकी को जिंदा गिरफ्तार किया गया। पाकिस्तान का दावा है कि गिरफ्तार हमलावर अफगान नागरिक है। जमात-उल-अहरार ने ली हमले की जिम्मेदारी शनिवार रात जारी बयान में प्रतिबंधित आतंकी संगठन जमात-उल-अहरार ने कराची हमले की जिम्मेदारी ली। यह संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) से अलग हुआ धड़ा माना जाता है और पहले भी कई बड़े आतंकी हमलों में इसका नाम सामने आ चुका है। सीमा पार आतंकियों के ठिकानों पर निशाना पाकिस्तान के सूचना मंत्री ने कहा कि अफगान सीमा पर चलाए गए अभियान में पाकिस्तानी तालिबान (TTP) के ठिकानों और सुरक्षित ठिकानों को निशाना बनाया गया। उन्होंने कहा कि टीटीपी और अफगान तालिबान अलग-अलग संगठन हैं, लेकिन दोनों के बीच करीबी संबंध होने के आरोप लंबे समय से लगाए जाते रहे हैं। बढ़े हैं आतंकी हमले पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान में पुलिस, सेना और सुरक्षा प्रतिष्ठानों पर आतंकी हमलों में लगातार वृद्धि हुई है। पाकिस्तानी अधिकारियों का आरोप है कि इन हमलों के पीछे मुख्य रूप से टीटीपी और उससे जुड़े उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं, जो सीमा पार से भी गतिविधियां संचालित करते हैं। फिलहाल सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था और सतर्कता बढ़ा दी गई है। पाकिस्तान का कहना है कि आतंकवाद के खिलाफ अभियान आगे भी जारी रहेगा, जबकि क्षेत्रीय सुरक्षा हालात पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर रखी जा रही है।
ढाका/नई दिल्ली: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने स्पष्ट कहा है कि वह हर हाल में इसी साल अपने देश लौटेंगी, चाहे उन्हें मौत की सजा का सामना ही क्यों न करना पड़े। करीब दो वर्षों से भारत में रह रहीं हसीना ने कहा कि राजनीतिक दबाव और कानूनी कार्रवाई उनके फैसले को नहीं बदल सकती। उन्होंने अपने खिलाफ दिए गए फैसले को राजनीतिक प्रतिशोध करार देते हुए लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष जारी रखने की बात कही। 'मौत की सजा से नहीं डरती' एक इंटरव्यू में शेख हसीना ने कहा कि उन्हें मौत की सजा का कोई भय नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है और इसका उद्देश्य उनकी पार्टी अवामी लीग को कमजोर करना है। उनके अनुसार, पार्टी जनता की ताकत पर खड़ी है और उसे खत्म नहीं किया जा सकता। हसीना ने कहा कि उनका जीवन हमेशा बांग्लादेश की जनता और लोकतंत्र के लिए समर्पित रहा है तथा वह हर परिस्थिति में अपने देश लौटने का प्रयास करेंगी। 'अवामी लीग को खत्म करने की साजिश' पूर्व प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार उनके नेतृत्व और अवामी लीग को राजनीतिक रूप से खत्म करना चाहती है। उन्होंने कहा कि यह पहली बार नहीं है जब उनकी पार्टी पर दबाव बनाया गया हो, लेकिन हर बार जनता ने उनका साथ दिया है। उनका दावा है कि उनके खिलाफ सुनाया गया फैसला न्यायिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडा का हिस्सा है। परिवार की त्रासदी का किया जिक्र शेख हसीना ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में कई कठिन दौर देखे हैं। उन्होंने 1975 में अपने पिता और बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की हत्या का जिक्र करते हुए कहा कि उस हमले में उनके परिवार के अधिकांश सदस्य मारे गए थे। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि उन पर पहले भी जानलेवा हमले हुए, जिनमें वह बच निकलीं। उनके मुताबिक, इन घटनाओं ने उन्हें और अधिक मजबूत बनाया है। मौजूदा सरकार पर लगाए गंभीर आरोप हसीना ने दावा किया कि बांग्लादेश में लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हुई हैं और कानून का शासन प्रभावित हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी नेताओं और अवामी लीग के कार्यकर्ताओं को राजनीतिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिति पर नकारात्मक असर पड़ा है तथा अल्पसंख्यक समुदायों पर हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं। अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर जताई चिंता पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय पर हमला पूरे देश की लोकतांत्रिक भावना पर हमला है। उन्होंने कहा कि सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना किसी भी सरकार की जिम्मेदारी होती है और इस दिशा में गंभीर प्रयास होने चाहिए। 'दिल आज भी बांग्लादेश में ही है' शेख हसीना ने कहा कि निर्वासन में रहने के बावजूद उनका मन हमेशा बांग्लादेश में ही रहता है। उन्होंने कहा कि देश में अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं और आम लोगों की मुश्किलों की खबरें सुनना उनके लिए बेहद पीड़ादायक है। उन्होंने कहा कि वह लगातार अपने सहयोगियों के संपर्क में हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बांग्लादेश में लोकतंत्र एवं मानवाधिकारों के मुद्दे उठाने का प्रयास कर रही हैं। 'जनता के दम पर फिर खड़ी होगी अवामी लीग' अपने संदेश के अंत में हसीना ने भरोसा जताया कि बांग्लादेश की जनता एक बार फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करेगी। उन्होंने कहा कि अवामी लीग जनता के समर्थन से दोबारा मजबूती के साथ उभरेगी और वह अपने अंतिम दिन तक इस संघर्ष का हिस्सा बनी रहेंगी।
ढाका/नई दिल्ली: भारत ने बांग्लादेशी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा सेवा दोबारा शुरू करने का ऐलान किया है। भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने गुरुवार को ढाका स्थित भारतीय वीजा आवेदन केंद्र में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बताया कि 28 जून से बांग्लादेशी नागरिक फिर से भारत आने के लिए टूरिस्ट वीजा के लिए आवेदन कर सकेंगे। यह फैसला दोनों पड़ोसी देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। पिछले लगभग दो वर्षों से बांग्लादेशी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा सेवा बंद थी। राष्ट्रपति शहाबुद्दीन से मुलाकात के बाद हुई घोषणा इस घोषणा से पहले भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन से शिष्टाचार मुलाकात की। मुलाकात के बाद उन्होंने प्रेस वार्ता में कहा कि भारत और बांग्लादेश के बीच लोगों के आपसी संपर्क को बढ़ावा देने के लिए वीजा सेवाओं को फिर से शुरू किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि रविवार, 28 जून से पर्यटक वीजा के लिए आवेदन स्वीकार किए जाएंगे। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बंद हुई थी सेवा 5 अगस्त 2024 को तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के पतन और उसके बाद दोनों देशों के संबंधों में आए तनाव के चलते भारत ने बांग्लादेशी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा जारी करना बंद कर दिया था। इस दौरान मेडिकल और बिजनेस वीजा जारी किए जाते रहे। अब करीब दो साल बाद पर्यटक वीजा सेवा भी बहाल कर दी गई है। इन चार केंद्रों से जारी होंगे पर्यटक वीजा दिनेश त्रिवेदी ने बताया कि बांग्लादेश में स्थित ढाका, राजशाही, चटगांव और खुलना के भारतीय वीजा आवेदन केंद्रों से पर्यटक वीजा जारी किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि बेनापोल सीमा के रास्ते यात्रा करने वाले यात्रियों की सुविधा और दोनों देशों के बीच आवाजाही को आसान बनाने के उद्देश्य से यह निर्णय लिया गया है। अप्रैल में बने थे भारत के नए उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी को अप्रैल में बांग्लादेश में भारत का नया उच्चायुक्त नियुक्त किया गया था। वह इस पद पर नियुक्त होने वाले पहले भारतीय राजनेता हैं। उनसे पहले वरिष्ठ राजनयिक प्रणय वर्मा इस पद पर कार्यरत थे। भारत-बांग्लादेश संबंधों में सुधार की दिशा में अहम कदम विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यटक वीजा सेवा की बहाली से दोनों देशों के बीच पर्यटन, व्यापार, चिकित्सा यात्रा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिलेगा। इसे भारत और बांग्लादेश के रिश्तों को सामान्य बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
ढाका/बीजिंग: भारत की सुरक्षा और सामरिक हितों से जुड़े संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के करीब स्थित तीस्ता नदी परियोजना को लेकर चीन और बांग्लादेश के बीच सहयोग और गहरा होने जा रहा है। बीजिंग में हुई उच्चस्तरीय बैठक में दोनों देशों ने तीस्ता समेत अन्य नदियों के जल प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण और नदी पुनरुद्धार परियोजनाओं पर सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने चीन से तीस्ता परियोजना के लिए तकनीकी और वित्तीय सहायता मांगी, जिस पर बीजिंग ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। यह घटनाक्रम भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि तीस्ता नदी परियोजना भारत के अत्यंत संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर के नजदीक स्थित है, जो पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला एकमात्र संकरा भू-मार्ग है। बीजिंग में हुई अहम बैठक बांग्लादेश की सरकारी समाचार एजेंसी बीएसएस (Bangladesh Sangbad Sangstha) के अनुसार, चीन के जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग ने बीजिंग में प्रधानमंत्री तारिक रहमान से मुलाकात की। इस दौरान दोनों नेताओं ने तीस्ता और अन्य साझा नदियों के बेहतर प्रबंधन को लेकर सहयोग बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह तारिक रहमान का दूसरा विदेश दौरा है। इससे पहले उन्होंने मलेशिया की यात्रा की थी। चीन दौरे के दौरान उनकी मुलाकात राष्ट्रपति शी चिनफिंग, प्रधानमंत्री ली च्यांग और अन्य वरिष्ठ चीनी नेताओं से भी प्रस्तावित है। बाढ़ नियंत्रण और जल प्रबंधन में चीन से मांगी मदद बैठक के दौरान तारिक रहमान ने कहा कि उनकी सरकार देशभर में नदी पुनरुद्धार और खुदाई अभियान चला रही है ताकि बाढ़ की समस्या कम हो, पर्यावरण संरक्षण हो सके और जल संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित किया जा सके। उन्होंने चीन से— नदी किनारों के कटाव को रोकने, सिंचाई व्यवस्था को आधुनिक बनाने, अंतर्देशीय जल परिवहन मजबूत करने, तथा तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना के लिए तकनीकी और वित्तीय सहायता की मांग की। चीन ने दिया पूरा सहयोग का भरोसा चीनी जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग ने कहा कि चीन जल संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में बांग्लादेश को हरसंभव सहयोग देगा। उन्होंने वर्ष 2005 के दोनों देशों के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) और हाल के वर्षों में चीनी विशेषज्ञों की यात्राओं का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों देशों का सहयोग शोध और तकनीकी आधार पर आगे बढ़ रहा है। उन्होंने बांग्लादेश के जल विशेषज्ञों और अधिकारियों को प्रशिक्षण के लिए चीन आने का भी निमंत्रण दिया। भारत के लिए क्यों अहम है तीस्ता परियोजना? तीस्ता नदी पूर्वी हिमालय से निकलकर सिक्किम, पश्चिम बंगाल और फिर बांग्लादेश में प्रवेश करती है। बांग्लादेश में यह सिंचाई और कृषि के लिए जीवनरेखा मानी जाती है। रणनीतिक दृष्टि से इसकी सबसे बड़ी अहमियत यह है कि प्रस्तावित तीस्ता परियोजना भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के बेहद करीब स्थित है। लगभग 20-22 किलोमीटर चौड़ा यह गलियारा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को मुख्य भूमि से जोड़ता है। ऐसे में इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी को भारत की सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है। भारत की पेशकश ठुकरा चुका है बांग्लादेश भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल बंटवारे का मुद्दा लंबे समय से लंबित है। वर्ष 2024 में भारत ने तीस्ता बेसिन के संरक्षण और तकनीकी विकास में सहयोग देने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन बांग्लादेश ने इस दिशा में आगे बढ़ने के बजाय चीन के साथ सहयोग का रास्ता चुना। पिछले महीने बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने भी बीजिंग दौरे के दौरान औपचारिक रूप से चीन से तीस्ता नदी पुनरुद्धार परियोजना में सहयोग का अनुरोध किया था। गंगा जल संधि पर भी टिकी हैं निगाहें भारत और बांग्लादेश के बीच जल साझेदारी का एक और महत्वपूर्ण मुद्दा 1996 की गंगा जल संधि है, जिसकी 30 वर्षीय अवधि इस वर्ष पूरी हो रही है। यदि दोनों देश इसे आगे बढ़ाने पर सहमत नहीं होते, तो यह समझौता समाप्त हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में तीस्ता परियोजना और गंगा जल बंटवारा दोनों ही भारत-बांग्लादेश संबंधों के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक और कूटनीतिक मुद्दों में शामिल रहेंगे।
ढाका: भारत के नए उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने बांग्लादेश में अपनी नई जिम्मेदारी संभालने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। शुक्रवार सुबह वह बेनापोल भूमि बंदरगाह के रास्ते बांग्लादेश पहुंचे, जहां भारतीय उप उच्चायुक्त पवन बधे ने उनका स्वागत किया। त्रिवेदी मौजूदा उच्चायुक्त प्रणय वर्मा का स्थान लेंगे और ऐसे समय में कार्यभार संभाल रहे हैं जब भारत और बांग्लादेश के संबंध कई महत्वपूर्ण कूटनीतिक और रणनीतिक मुद्दों के दौर से गुजर रहे हैं। भारत सरकार ने 27 अप्रैल को दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश में अगला उच्चायुक्त नियुक्त करने की घोषणा की थी। इसके बाद 5 जून को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें औपचारिक रूप से प्रत्यय पत्र (Letters of Credence) सौंपे, जिससे उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी हुई। द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने पर रहेगा जोर भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापार, सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सहयोग जैसे कई मुद्दे लंबे समय से द्विपक्षीय एजेंडे का हिस्सा रहे हैं। हाल के वर्षों में दोनों देशों के संबंधों में कुछ चुनौतियां भी सामने आईं, जिनमें सीमा सुरक्षा, अवैध घुसपैठ और क्षेत्रीय राजनीतिक घटनाक्रम प्रमुख रहे हैं। कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, नई नियुक्ति का प्रमुख उद्देश्य दोनों देशों के बीच सहयोग को और मजबूत करना तथा लंबित मुद्दों पर संवाद को आगे बढ़ाना होगा। राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव का मिलेगा लाभ दिनेश त्रिवेदी भारतीय राजनीति का एक जाना-पहचाना नाम हैं। वह पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री और पूर्व सांसद रह चुके हैं। राजनीतिक अनुभव के साथ-साथ बांग्ला भाषा और क्षेत्रीय सामाजिक-सांस्कृतिक समझ को भी उनकी नियुक्ति में एक महत्वपूर्ण कारक माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि उनका अनुभव दोनों देशों के बीच जन-स्तर और संस्थागत स्तर पर संबंधों को मजबूत बनाने में मददगार साबित हो सकता है। ढाका रवाना होने से पहले पहुंचे नेताजी भवन बांग्लादेश रवाना होने से पहले दिनेश त्रिवेदी ने कोलकाता स्थित नेताजी भवन का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि साझा इतिहास, लोकतांत्रिक मूल्यों और लोगों के बीच गहरे जुड़ाव पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के लोगों के बीच मजबूत संबंध भविष्य में सहयोग के नए अवसर पैदा कर सकते हैं। साथ ही उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचारों को अपने सार्वजनिक जीवन की प्रेरणा बताया। सुरक्षा और रक्षा सहयोग पर भी रहेगा ध्यान नई जिम्मेदारी संभालने से पहले दिनेश त्रिवेदी ने भारतीय सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी से भी मुलाकात की थी। इस दौरान भारत-बांग्लादेश रक्षा सहयोग, सीमा सुरक्षा और सैन्य समन्वय जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ा है और इसे भविष्य में और मजबूत करने की दिशा में प्रयास जारी हैं। रणनीतिक महत्व की नियुक्ति विश्लेषकों के अनुसार, ढाका में दिनेश त्रिवेदी की नियुक्ति केवल एक नियमित राजनयिक बदलाव नहीं, बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से एक महत्वपूर्ण कदम है। भारत और बांग्लादेश दक्षिण एशिया में आर्थिक, सामरिक और भू-राजनीतिक दृष्टि से एक-दूसरे के महत्वपूर्ण साझेदार हैं। ऐसे में आने वाले समय में व्यापार, ऊर्जा, संपर्क परियोजनाओं, सीमा प्रबंधन और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के सहयोग को नई गति देने में दिनेश त्रिवेदी की भूमिका अहम मानी जा रही है।
इस्लामाबाद/नई दिल्ली: पाकिस्तान ने पिछले 16 महीनों में अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को अभूतपूर्व गति देते हुए छह नए अर्थ-ऑब्जर्वेशन (पृथ्वी अवलोकन) सैटेलाइट लॉन्च किए हैं। सुरक्षा और अंतरिक्ष मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि इन उपग्रहों ने पाकिस्तान की निगरानी क्षमता को पहले की तुलना में काफी मजबूत बना दिया है। रिपोर्टों के अनुसार, इनमें से कई सैटेलाइट भारत, विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर और उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्रों की बार-बार निगरानी करने में सक्षम हैं। इस तेज विस्तार में चीन की तकनीकी और प्रक्षेपण सहायता को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 16 महीनों में छह नए मिशन रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2025 से जून 2026 के बीच पाकिस्तान ने छह प्रमुख अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजे हैं। इनमें PAUSAT-1, PRSC-EO1, PRSS-2, HS-1, PRSC-EO2 और PRSC-EO3 शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इतने कम समय में लगातार छह सैटेलाइट मिशनों का सफल संचालन पाकिस्तान के अंतरिक्ष कार्यक्रम में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। यह विस्तार ऐसे समय में हुआ है जब दक्षिण एशिया में सामरिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। नागरिक परियोजना या रणनीतिक निगरानी? पाकिस्तान की अंतरिक्ष एजेंसी सुपारको (SUPARCO) इन उपग्रहों को कृषि, पर्यावरण अध्ययन, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और आपदा निगरानी जैसी नागरिक आवश्यकताओं से जुड़ा बताती रही है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट्स आमतौर पर दोहरे उपयोग (Dual-Use) की क्षमता रखते हैं। यानी इन्हें नागरिक उद्देश्यों के साथ-साथ सैन्य और रणनीतिक निगरानी के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। कौन-कौन से सैटेलाइट हुए लॉन्च? PAUSAT-1: शुरुआत जनवरी 2025 में 14 जनवरी 2025 को पाकिस्तान ने PAUSAT-1 लॉन्च किया। यह एक अर्थ-ऑब्जर्वेशन क्यूबसैट है जिसे पृथ्वी की निम्न कक्षा में स्थापित किया गया। PRSC-EO1: तीन दिन बाद दूसरा मिशन 17 जनवरी 2025 को PRSC-EO1 लॉन्च किया गया। इसका उद्देश्य भू-स्थानिक डेटा एकत्र करना और पृथ्वी की सतह की निगरानी करना बताया गया। PRSS-2: हाई-रिजॉल्यूशन इमेजिंग क्षमता जुलाई 2025 में लॉन्च किया गया PRSS-2 उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें लेने में सक्षम माना जाता है। इससे जमीन पर होने वाली गतिविधियों की अधिक स्पष्ट निगरानी संभव होती है। HS-1: पहला हाइपरस्पेक्ट्रल सैटेलाइट अक्टूबर 2025 में पाकिस्तान ने HS-1 लॉन्च किया, जिसे उसका पहला हाइपरस्पेक्ट्रल अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट बताया गया। यह विभिन्न तरंगदैर्घ्यों पर डेटा एकत्र कर जमीन पर मौजूद वस्तुओं और संरचनाओं की बेहतर पहचान करने में सक्षम है। PRSC-EO2 और PRSC-EO3 फरवरी और अप्रैल 2026 में लॉन्च किए गए PRSC-EO2 और PRSC-EO3 को पाकिस्तान के पृथ्वी अवलोकन कार्यक्रम का अगला चरण माना जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, PRSC-EO3 की कक्षा को विशेष रूप से अधिक निगरानी क्षमता प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है। जम्मू-कश्मीर पर विशेष फोकस? रिपोर्ट में सबसे अधिक चर्चा PRSC-EO3 को लेकर की गई है। दावा किया गया है कि इसे ऐसी कक्षा में स्थापित किया गया है, जिससे दक्षिण एशिया के कुछ क्षेत्रों, खासकर जम्मू-कश्मीर और उत्तरी भारत के ऊपर अधिक बार निगरानी संभव हो सके। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी क्षेत्र की बार-बार तस्वीरें लेने की क्षमता से सीमावर्ती गतिविधियों, बुनियादी ढांचे में बदलाव और सैन्य तैनाती पर लगातार नजर रखना आसान हो जाता है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। आधुनिक तकनीक से लैस हैं नए उपग्रह रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के हालिया सैटेलाइट मिशनों में हाई-रिजॉल्यूशन ऑप्टिकल इमेजिंग, हाइपरस्पेक्ट्रल सेंसर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित डेटा विश्लेषण जैसी उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। इन तकनीकों की मदद से बड़े पैमाने पर डेटा संग्रहण, गतिविधियों की पहचान और विस्तृत भू-स्थानिक विश्लेषण संभव हो सकता है। 1961 के बाद सबसे तेज विस्तार पाकिस्तान की अंतरिक्ष एजेंसी सुपारको की स्थापना 1961 में हुई थी। रिपोर्ट के अनुसार, स्थापना के बाद से पाकिस्तान ने कुल 15 सैटेलाइट मिशन संचालित किए हैं। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से छह मिशन केवल पिछले 16 महीनों में पूरे किए गए हैं। विशेषज्ञ इसे पाकिस्तान के अंतरिक्ष कार्यक्रम का सबसे तेज विस्तार मान रहे हैं। चीन बना सबसे बड़ा सहयोगी हाल के अधिकांश पाकिस्तानी सैटेलाइट मिशनों में चीन की भूमिका प्रमुख रही है। कई उपग्रहों को चीनी रॉकेटों की सहायता से लॉन्च किया गया, जबकि कुछ परियोजनाएं संयुक्त तकनीकी सहयोग के तहत विकसित की गईं। विश्लेषकों का मानना है कि चीन के सहयोग के बिना इतने कम समय में इस स्तर का विस्तार संभव नहीं होता। यही कारण है कि पाकिस्तान-चीन अंतरिक्ष सहयोग को क्षेत्रीय रणनीतिक समीकरणों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह घटनाक्रम? विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक युद्ध और राष्ट्रीय सुरक्षा में अंतरिक्ष आधारित निगरानी की भूमिका लगातार बढ़ रही है। सीमाओं की निगरानी, सैन्य गतिविधियों का आकलन, संचार नेटवर्क और वास्तविक समय की खुफिया जानकारी जुटाने में सैटेलाइट्स की अहम भूमिका होती है। ऐसे में पाकिस्तान की बढ़ती अंतरिक्ष निगरानी क्षमता को भारत के रणनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि भारत को भी अपनी पृथ्वी अवलोकन, संचार और निगरानी उपग्रह क्षमताओं को लगातार मजबूत बनाए रखना होगा। भविष्य की सामरिक प्रतिस्पर्धा का नया मोर्चा विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष केवल वैज्ञानिक अनुसंधान का क्षेत्र नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक प्रतिस्पर्धा का प्रमुख मंच भी बनेगा। पाकिस्तान के हालिया सैटेलाइट मिशन इस बात का संकेत हैं कि दक्षिण एशिया में अंतरिक्ष आधारित निगरानी और खुफिया क्षमताओं की दौड़ अब और तेज होने वाली है।
पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में विधानसभा चुनाव से पहले हिंसा की एक बड़ी घटना सामने आई है। पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) की एक चुनावी रैली के दौरान हुई फायरिंग में दो लोगों की मौत हो गई, जबकि दो अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। चुनावी रैली में चली गोलियां मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गिलगित के तांगीर क्षेत्र में PML-N की चुनावी रैली आयोजित की गई थी। इसी दौरान हवाई फायरिंग की जा रही थी, तभी एक व्यक्ति के हाथ से AK-47 राइफल फिसल गई और गोलियां सीधे भीड़ की ओर चल गईं। पुलिस के मुताबिक, गोली लगने से एक बच्चे की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि तीन अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। सभी घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया, जहां इलाज के दौरान एक अन्य व्यक्ति ने दम तोड़ दिया। इस तरह मृतकों की संख्या बढ़कर दो हो गई। वायरल हुआ घटना का वीडियो घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में देखा जा सकता है कि रैली में शामिल एक व्यक्ति राइफल को लोड कर हवा में फायरिंग करता है। कुछ ही क्षण बाद हथियार उसके नियंत्रण से बाहर हो जाता है और गोलियां भीड़ की दिशा में चलने लगती हैं। वीडियो में मौके पर मौजूद लोगों के बीच भगदड़ और अफरा-तफरी भी साफ दिखाई देती है। फुटेज से यह भी संकेत मिलता है कि रैली में एक से अधिक लोगों द्वारा फायरिंग की जा रही थी। पुलिस ने शुरू की जांच स्थानीय पुलिस ने मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि घटना के सभी पहलुओं की जांच की जा रही है और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। घटना के बाद क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी कर दी गई है। पीड़ित परिवारों के लिए सहायता का ऐलान पाकिस्तान सरकार में कश्मीर मामलों के मंत्री अमीर मकाम ने मृतकों और घायलों के परिवारों के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा की है। उन्होंने घटना पर दुख व्यक्त करते हुए निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया। 7 जून को होने हैं चुनाव गिलगित-बाल्टिस्तान में 7 जून 2026 को विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। 10 जिलों की 24 सीटों पर मतदान होना है। चुनाव प्रचार के दौरान हुई इस घटना ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत ने चुनावों को बताया अवैध भारत लगातार कहता रहा है कि गिलगित-बाल्टिस्तान सहित पूरा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा है तथा पाकिस्तान का वहां कब्जा अवैध है। इसी कारण भारत ने गिलगित-बाल्टिस्तान में कराए जा रहे चुनावों का विरोध करते हुए कहा है कि ऐसे कदम क्षेत्र की वास्तविक स्थिति को नहीं बदल सकते।
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान अपनी पहली विदेश यात्रा को लेकर चर्चा में हैं। फरवरी 2026 में सत्ता संभालने के बाद वह पहली बार किसी विदेशी दौरे पर जा रहे हैं, लेकिन उनकी पहली मंजिल न तो भारत है और न ही चीन। इसके बजाय उन्होंने पहले मलेशिया जाने का फैसला किया है। इसके बाद वह चीन का दौरा करेंगे। ढाका ने बदली रणनीति, चीन से पहले तय किया कुआलालंपुर का कार्यक्रम मई 2026 में बांग्लादेशी मीडिया में खबरें आई थीं कि तारिक रहमान सीधे चीन जा सकते हैं। बाद में सरकार ने 21-22 जून को मलेशिया और उसके बाद 23 जून से चीन यात्रा का कार्यक्रम तय किया। विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को ध्यान में रखकर लिया गया है। भारत और चीन के बीच संतुलन साधने की कोशिश में नई सरकार बांग्लादेश सरकार नहीं चाहती कि उसकी पहली विदेश यात्रा को किसी एक शक्ति केंद्र के प्रति झुकाव के रूप में देखा जाए। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बीएनपी सरकार की 'बांग्लादेश फर्स्ट' नीति इसी संतुलन को दर्शाती है। कुआलालंपुर क्यों बना पहली पसंद? मलेशिया एक मुस्लिम बहुल देश होने के साथ-साथ बांग्लादेश का महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक साझेदार भी है। वहां बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिक काम और पढ़ाई कर रहे हैं। इसलिए पहली यात्रा के लिए मलेशिया अपेक्षाकृत सुरक्षित और कम विवादास्पद विकल्प माना गया। नई दिल्ली ने पहले ही बढ़ाया था रिश्तों का हाथ फरवरी 2026 में शपथ ग्रहण के दौरान भारत की ओर से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला शामिल हुए थे। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश और भारत आने का निमंत्रण भी सौंपा था। इसे दोनों देशों के संबंधों को नया आयाम देने की कोशिश माना गया था। मलेशिया दौरे में प्रवासी श्रमिकों और निवेश पर रहेगा फोकस कुआलालंपुर यात्रा के दौरान प्रवासी बांग्लादेशी कामगारों के हित, शिक्षा सहयोग, व्यापार, निवेश और रोजगार के अवसरों पर चर्चा होने की संभावना है। मलेशिया में लाखों बांग्लादेशी नागरिक कार्यरत हैं। बीजिंग यात्रा पर टिकी क्षेत्रीय कूटनीति की नजरें मलेशिया के बाद होने वाला चीन दौरा ज्यादा रणनीतिक माना जा रहा है। चीन बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदारों में से एक है और दोनों देशों के बीच कई बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट लंबित हैं। तीस्ता परियोजना पर भारत की चिंता बढ़ा सकता है चीन-बांग्लादेश संवाद रिपोर्टों के अनुसार, चीन यात्रा के दौरान तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना पर चर्चा हो सकती है। यह परियोजना भारत के लिए भी संवेदनशील मानी जाती है क्योंकि इसका संबंध भारत-बांग्लादेश जल बंटवारे और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। ढाका की नई विदेश नीति का पहला बड़ा परीक्षण तारिक रहमान की पहली विदेश यात्रा को केवल एक राजनयिक कार्यक्रम नहीं बल्कि बांग्लादेश की नई विदेश नीति की दिशा तय करने वाले कदम के रूप में देखा जा रहा है। मलेशिया और चीन के दौरे से यह स्पष्ट होगा कि ढाका आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों के बीच किस तरह संतुलन बनाकर चलना चाहता है।
भारत और पाकिस्तान के संबंधों को लेकर हाल में आई कुछ अहम टिप्पणियों ने दोनों देशों के बीच संवाद की संभावनाओं पर नई बहस छेड़ दी है। Rashtriya Swayamsevak Sangh के महासचिव Dattatreya Hosabale और पूर्व सेना प्रमुख Manoj Naravane के बयानों पर पाकिस्तान ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। ‘संवाद के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं होने चाहिए’ RSS महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि भारत को पाकिस्तान के साथ बातचीत के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आतंकवाद के खिलाफ भारत का सख्त रुख जारी रहना चाहिए। उनके बयान के बाद पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे ने भी लोगों के बीच संपर्क बनाए रखने की वकालत की। उन्होंने कहा, “सीमा के दोनों ओर आम लोग रहते हैं और उनकी रोजमर्रा की समस्याएं काफी हद तक समान हैं। लोगों के बीच संपर्क बेहतर संबंध बनाने में मदद कर सकते हैं।” पाकिस्तान ने क्या कहा? इन बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए Ministry of Foreign Affairs के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने इन्हें “सकारात्मक संकेत” बताया। उन्होंने कहा, “हमें उम्मीद है कि भारत में समझदारी की आवाजें और मजबूत होंगी। पिछले कई वर्षों से जो आक्रामक बयानबाजी और तनाव देखने को मिला है, वह खत्म होना चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान संवाद को एक विकल्प के रूप में स्वीकार किए जाने का स्वागत करता है। बैकचैनल बातचीत पर टिप्पणी से इनकार ताहिर अंद्राबी ने बैकचैनल या अनौपचारिक संपर्कों को लेकर चल रही अटकलों पर टिप्पणी करने से इनकार किया। उन्होंने कहा, “अगर मैं बैकचैनल पर टिप्पणी करूंगा, तो वह बैकचैनल नहीं रहेगा। इस विषय पर मैं कुछ नहीं कहना चाहता।” पाकिस्तान में RSS को कैसे देखा जाता है? पाकिस्तान में RSS को आमतौर पर एक हिंदू राष्ट्रवादी संगठन के रूप में देखा जाता है, जिसका भारत की मौजूदा सत्तारूढ़ व्यवस्था से करीबी संबंध माना जाता है। ऐसे में RSS नेतृत्व की ओर से संवाद पर दिया गया बयान पाकिस्तान में विशेष रूप से चर्चा का विषय बना हुआ है। क्या बदल सकते हैं भारत-पाक संबंध? विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच फिलहाल कई संवेदनशील मुद्दे मौजूद हैं, जिनमें आतंकवाद, सीमा सुरक्षा और राजनीतिक तनाव शामिल हैं। हालांकि, संवाद और लोगों के बीच संपर्क को लेकर आई हालिया टिप्पणियां भविष्य में कूटनीतिक माहौल को प्रभावित कर सकती हैं। भारत सरकार की ओर से इन बयानों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और Strait of Hormuz पर संकट के बीच बांग्लादेश गंभीर ईंधन संकट का सामना कर रहा है। ऐसे मुश्किल समय में भारत ने एक बार फिर पड़ोसी देश का साथ देते हुए डीजल की आपूर्ति कर राहत पहुंचाई है। पाइपलाइन के जरिए डीजल सप्लाई भारत ने Bangladesh को Numaligarh Refinery से पाइपलाइन के माध्यम से लगभग 7,000 टन डीजल की नई खेप भेजी है। इससे पहले भी हाल के दिनों में कई खेप भेजी जा चुकी हैं, जिससे कुल आपूर्ति बढ़कर लगभग 15,000 टन तक पहुंच गई है। यह सप्लाई India-Bangladesh Friendship Pipeline के जरिए की जा रही है, जो दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग का एक अहम उदाहरण है। क्यों बढ़ा संकट? Iran और अमेरिका के बीच तनाव के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य पर असर पड़ा है, जिससे वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हुई है। बांग्लादेश जैसे देश, जो समुद्री आयात पर निर्भर हैं, इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। वहां ईंधन की कमी के साथ-साथ जमाखोरी भी एक बड़ी समस्या बन गई है। आंतरिक संकट ने बढ़ाई परेशानी बांग्लादेश में हालात और बिगड़ गए जब आठ जिलों में टैंकर कर्मचारियों ने हड़ताल शुरू कर दी। इससे दिनाजपुर, रंगपुर, निलफामारी समेत कई इलाकों में ईंधन आपूर्ति पूरी तरह ठप हो गई। इसका सीधा असर परिवहन व्यवस्था पर पड़ा है, जिससे आम लोगों की परेशानी बढ़ गई है। भारत-बांग्लादेश संबंधों की मिसाल भारत का यह कदम दोनों देशों के मजबूत रिश्तों को दर्शाता है। संकट के समय भारत ने त्वरित मदद देकर यह साबित किया है कि वह क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है। ऊर्जा आपूर्ति जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह सहयोग बांग्लादेश के लिए बड़ी राहत लेकर आया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।