Rohini Vrat 2026: जैन धर्म में रोहिणी व्रत को अत्यंत शुभ और पुण्य प्रदान करने वाला व्रत माना जाता है। यह व्रत भगवान वासुपूज्य स्वामी को समर्पित होता है और श्रद्धालु इसे पूरे नियम, संयम और भक्ति भाव से करते हैं। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से जीवन में सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। जून 2026 में कब है रोहिणी व्रत? ज्योतिषीय गणना और पंचांग के अनुसार, 14 जून 2026, रविवार को रोहिणी व्रत रखा जाएगा। इस दिन सूर्योदय के समय रोहिणी नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, जिसके कारण यह तिथि व्रत, ध्यान और पूजा-अर्चना के लिए विशेष रूप से शुभ मानी जा रही है। जैन धर्म में रोहिणी व्रत का महत्व रोहिणी व्रत जैन समाज के प्रमुख धार्मिक व्रतों में शामिल है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखकर भगवान वासुपूज्य स्वामी की आराधना करते हैं और अपने जीवन में सुख, शांति तथा कल्याण की प्रार्थना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को विधि-विधान और श्रद्धा के साथ करने से जीवन की कई बाधाएं दूर होती हैं। साथ ही आर्थिक परेशानियों, मानसिक तनाव और पारिवारिक समस्याओं से मुक्ति मिलने की भी मान्यता है। वैवाहिक सुख और समृद्धि के लिए रखा जाता है व्रत कई महिलाएं अपने पति के उत्तम स्वास्थ्य, लंबी आयु और दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि की कामना से भी रोहिणी व्रत करती हैं। माना जाता है कि यह व्रत परिवार में सकारात्मक ऊर्जा और खुशहाली लाने में सहायक होता है। कितने वर्षों तक किया जाता है रोहिणी व्रत? परंपरा के अनुसार, रोहिणी व्रत का संकल्प सामान्यतः 3 वर्ष, 5 वर्ष या 7 वर्ष के लिए लिया जाता है। इनमें 5 वर्ष 5 माह की अवधि को विशेष रूप से श्रेष्ठ माना गया है। संकल्प की अवधि पूरी होने के बाद व्रत का विधिवत उद्यापन किया जाता है, जिससे व्रत पूर्ण माना जाता है। आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग जैन धर्म में रोहिणी व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मसंयम, तप और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक माना जाता है। इस दिन की गई पूजा और आराधना से आत्मिक शुद्धि तथा मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा मिलती है।
नई दिल्ली: हस्तरेखा शास्त्र और सामुद्रिक शास्त्र में हथेली की रेखाओं, पर्वतों और विभिन्न चिह्नों का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि हथेली पर बने कुछ निशान व्यक्ति के स्वभाव, करियर, धन और भविष्य से जुड़े संकेत देते हैं। इनमें त्रिभुज का चिह्न विशेष रूप से शुभ माना जाता है। अलग-अलग स्थानों पर बना यह निशान अलग-अलग प्रकार के फल प्रदान करता है। पर्वतों पर त्रिभुज के निशान का महत्व गुरु पर्वत पर त्रिभुज यदि गुरु पर्वत पर त्रिभुज का निशान बना हो तो ऐसे व्यक्ति समाजहित के कार्यों में रुचि रखते हैं। उन्हें करियर में उच्च पद और सम्मान मिलने की संभावना रहती है। शनि पर्वत पर त्रिभुज शनि पर्वत पर बना त्रिभुज व्यक्ति को ज्योतिष, रहस्य और गुप्त विद्याओं की ओर आकर्षित करता है। ऐसे लोग शोध और आध्यात्मिक विषयों में विशेष रुचि रखते हैं। सूर्य पर्वत पर त्रिभुज सूर्य पर्वत पर यह निशान शुभ माना जाता है। ऐसे व्यक्ति कला, विज्ञान, चिकित्सा और शिल्प के क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। बुध पर्वत पर त्रिभुज बुध पर्वत पर त्रिभुज का चिह्न व्यवसाय, राजनीति, विज्ञान और गहन अध्ययन में सफलता का संकेत माना जाता है। मंगल पर्वत पर त्रिभुज मंगल स्थान पर बना यह निशान व्यक्ति को आत्मविश्वासी और योजनाबद्ध तरीके से कार्य करने वाला बनाता है। ऐसे लोग दृढ़ निश्चयी होते हैं। शुक्र पर्वत पर त्रिभुज शुक्र पर्वत पर त्रिभुज का निशान होने पर व्यक्ति गणित और तार्किक विषयों में अच्छा माना जाता है। इंद्र क्षेत्र में त्रिभुज ऐसे लोगों की रुचि गुप्त विद्याओं और रहस्यमयी विषयों में अधिक हो सकती है। रेखाओं पर त्रिभुज का क्या होता है अर्थ? पितृ रेखा पर त्रिभुज यह पैतृक संपत्ति या परिवार की ओर से मिलने वाले लाभ का संकेत माना जाता है। मातृ रेखा पर त्रिभुज ऐसे लोगों को ननिहाल पक्ष से सहयोग और लाभ मिलने की संभावना रहती है। आयु रेखा पर त्रिभुज सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार यह सबसे शुभ संकेतों में से एक माना जाता है। ऐसे व्यक्ति अपनी मेहनत और प्रयास से धन, भूमि, वाहन और सुख-सुविधाएं प्राप्त करते हैं। मणिबंध रेखा पर त्रिभुज हथेली के निचले हिस्से में मणिबंध रेखा पर बना त्रिभुज वृद्धावस्था में धन और सम्मान मिलने का संकेत देता है। भाग्य रेखा पर त्रिभुज भाग्य रेखा पर बना त्रिभुज आर्थिक समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। त्रिभुज जितना बड़ा होगा, धन लाभ की संभावनाएं उतनी अधिक मानी जाती हैं। नोट: हस्तरेखा और सामुद्रिक शास्त्र से जुड़ी मान्यताएं पारंपरिक विश्वासों पर आधारित हैं। इनके परिणाम व्यक्ति विशेष और परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
नई दिल्ली: 11 जून 2026 का दिन अंक ज्योतिष के अनुसार रिश्तों, सहयोग और भावनात्मक संतुलन पर केंद्रित है। आज का मुख्य प्रभाव अंक 2 का है, जो संवेदनशीलता, धैर्य और सामंजस्य का प्रतीक माना जाता है। वहीं, पूरी तारीख का योग 9 आता है, जो करुणा, क्षमा और आत्मिक विकास का संकेत देता है। ऐसे में आज का दिन भागदौड़ से ज्यादा ठहरकर रिश्तों को मजबूत करने और मन की बात सुनने का संदेश दे रहा है। मूलांक 1 (1, 10, 19, 28) आज टीमवर्क से बेहतर परिणाम मिलने के योग हैं। दूसरों की राय को महत्व दें और अनावश्यक दबाव से बचें। लकी रंग: सुनहरा, सफेद सुझाव: नेतृत्व में संवेदनशीलता जोड़ें, सफलता और सम्मान दोनों बढ़ेंगे। मूलांक 2 (2, 11, 20, 29) आज का दिन आपके लिए शुभ और लाभदायक रहेगा। पुराना विवाद बातचीत से सुलझ सकता है और लोग आपकी भावनाओं को समझेंगे। लकी रंग: सफेद, सिल्वर सुझाव: अपने दिल की आवाज पर भरोसा रखें। मूलांक 3 (3, 12, 21, 30) रचनात्मकता चरम पर रहेगी। सामाजिक मेलजोल से खुशी मिलेगी और आपकी बातों का सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। लकी रंग: पीला, बैंगनी सुझाव: अपने शब्दों का इस्तेमाल दूसरों को प्रेरित करने के लिए करें। मूलांक 4 (4, 13, 22, 31) धैर्य और संयम से काम बनेंगे। रिश्तों पर ध्यान देने की जरूरत है और आलोचना से बचना बेहतर रहेगा। लकी रंग: हरा, भूरा सुझाव: हर चीज को नियंत्रित करने की कोशिश न करें। मूलांक 5 (5, 14, 23) नए अवसर और नए लोगों से जुड़ने का मौका मिल सकता है। नेटवर्किंग आपके लिए फायदेमंद साबित होगी। लकी रंग: आसमानी, सफेद सुझाव: सीखते रहना ही असली प्रगति है। मूलांक 6 (6, 15, 24) घर-परिवार और रिश्तों के लिहाज से दिन शुभ रहेगा। आपकी छोटी कोशिशें बड़े बदलाव ला सकती हैं। लकी रंग: गुलाबी, क्रीम सुझाव: बिना किसी अपेक्षा के प्यार बांटें। मूलांक 7 (7, 16, 25) आत्मचिंतन और एकांत आपके लिए लाभकारी रहेगा। अंतर्ज्ञान पर भरोसा रखें। लकी रंग: बैंगनी, सिल्वर सुझाव: शांति के क्षणों में ही सही दिशा मिलती है। मूलांक 8 (8, 17, 26) काम के साथ परिवार और रिश्तों को भी समय दें। संतुलन बनाए रखना जरूरी होगा। लकी रंग: गहरा नीला, काला सुझाव: खुशियों को अपनों के साथ साझा करें। मूलांक 9 (9, 18, 27) पुरानी बातों को भूलकर आगे बढ़ने का समय है। क्षमा और सकारात्मक सोच आपको मानसिक शांति देगी। लकी रंग: लाल, मरून सुझाव: दिल का बोझ हल्का करें और नई शुरुआत करें।
सनातन धर्म में अधिक मास यानी पुरुषोत्तम मास का विशेष महत्व माना गया है। यह पवित्र मास लगभग हर तीन वर्ष में एक बार आता है और इसमें किए गए जप, तप, दान और पूजा का फल अक्षय माना जाता है। ज्येष्ठ अधिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाई जाने वाली अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी इस वर्ष 12 जून 2026 को पड़ रही है। इस बार यह तिथि कई शुभ योगों के साथ आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन रवि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और उन्मीलिनी महाद्वादशी का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिससे इस व्रत और पूजा का महत्व और भी बढ़ गया है। भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता की होती है विशेष पूजा अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी के दिन भगवान श्रीराम, उनके अनुज लक्ष्मण जी और माता सीता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यह पर्व भाईचारे, पारिवारिक प्रेम और धर्म के आदर्श मूल्यों का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और सच्चे मन से इस व्रत को करने वाले भक्तों के जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। 'चंपक द्वादशी' के नाम से भी प्रसिद्ध है यह पर्व अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी को "चंपक द्वादशी" भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु, श्रीराम या श्रीकृष्ण को चंपा के फूल अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। पूजा विधि प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। सूर्य देव को अर्घ्य देकर व्रत का संकल्प लें। एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। भगवान को पीले या सफेद वस्त्र, चंदन और चंपा के फूल अर्पित करें। मौसमी फल और सात्विक मिठाई का भोग लगाएं। दीपक और धूप जलाकर रामलक्ष्मण द्वादशी व्रत कथा का पाठ करें। श्रीराम के मंत्रों का जाप करें और अंत में आरती करके पूजा संपन्न करें। अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी का धार्मिक महत्व रुके हुए कार्यों में मिलती है सफलता मान्यता है कि इस दिन श्रीराम और लक्ष्मण जी की पूजा करने से लंबे समय से रुके हुए कार्यों में सफलता मिलने लगती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। परिवार में बढ़ता है प्रेम और सौहार्द यह पर्व भगवान राम और लक्ष्मण के आदर्श भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। इस दिन पूजा करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और भाइयों के बीच प्रेम और विश्वास मजबूत होता है। अक्षय पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति पुरुषोत्तम मास में किए गए दान-पुण्य का फल कभी समाप्त नहीं होता। इस दिन अन्न, वस्त्र या धन का दान करने से दरिद्रता दूर होने की मान्यता है और साधक के लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। श्रद्धा और भक्ति का विशेष दिन अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम के आदर्शों और पारिवारिक मूल्यों को जीवन में अपनाने का संदेश भी देती है। इस पावन अवसर पर श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई पूजा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता और सुख-समृद्धि लाने वाली मानी जाती है।
आज का पंचांग, 8 जून 2026: आज सोमवार, 8 जून 2026 को अधिक ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि है। आज शतभिषा नक्षत्र के बाद पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र का शुभ संयोग बन रहा है। विष्कुम्भ योग के बाद प्रीति योग का आरंभ होगा। भगवान शिव की आराधना और धार्मिक कार्यों के लिए आज का दिन विशेष माना गया है। आइए जानते हैं आज का संपूर्ण पंचांग, शुभ मुहूर्त, राहुकाल और विशेष उपाय। आज का पंचांग तिथि: कृष्ण अष्टमी 9 जून तड़के 03:23 बजे तक, इसके बाद नवमी तिथि प्रारंभ होगी। नक्षत्र: शतभिषा नक्षत्र – प्रातः 09:09 बजे तक इसके बाद पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र योग: विष्कुम्भ योग – प्रातः 09:28 बजे तक इसके बाद प्रीति योग करण: बालव करण – दोपहर 03:29 बजे तक इसके बाद कौलव करण सूर्य और चंद्रमा की स्थिति सूर्योदय: प्रातः 05:23 बजे सूर्यास्त: सायं 07:18 बजे चंद्रोदय: 9 जून को रात्रि 12:50 बजे चंद्रास्त: दोपहर 12:06 बजे चंद्रमा: कुंभ राशि में 9 जून तड़के 03:36 बजे तक रहेंगे, इसके बाद मीन राशि में प्रवेश करेंगे। आज के शुभ मुहूर्त अभिजीत मुहूर्त प्रातः 11:52 बजे से दोपहर 12:48 बजे तक ब्रह्म मुहूर्त प्रातः 03:52 बजे से 04:38 बजे तक अमृत काल 9 जून तड़के 01:29 बजे से 03:07 बजे तक आज के अशुभ मुहूर्त राहुकाल प्रातः 07:30 बजे से 09:00 बजे तक यमगंड काल प्रातः 10:30 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक गुलिक काल दोपहर 01:30 बजे से 03:00 बजे तक आज का नक्षत्र विशेष आज पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र का प्रभाव रहेगा। इससे पहले प्रातः तक शतभिषा नक्षत्र रहेगा, जिसका स्वामी राहु और देवता वरुण माने जाते हैं। यह नक्षत्र शोध, चिकित्सा, आध्यात्मिकता, रहस्य और नवाचार से जुड़े कार्यों के लिए शुभ माना जाता है। इस नक्षत्र में जन्मे लोग सामान्यतः बुद्धिमान, सत्यनिष्ठ, स्वतंत्र विचारों वाले और समस्याओं का समाधान खोजने में कुशल माने जाते हैं। इनमें रचनात्मकता और नेतृत्व क्षमता भी प्रबल होती है। आज का विशेष उपाय सोमवार के दिन भगवान शिव का दूध से अभिषेक करें तथा शिव चालीसा का पाठ करें। जरूरतमंद लोगों को चावल, चीनी या मिश्री का दान करना भी अत्यंत शुभ माना गया है। ऐसा करने से मानसिक शांति, सुख-समृद्धि और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।
अंक ज्योतिष के अनुसार 4 जून 2026 का दिन अनुशासन, स्थिरता और जिम्मेदारियों को पूरा करने का संकेत देता है। आज का मूल अंक 4 है, जिसका संबंध राहु से माना जाता है, जबकि दिन गुरुवार होने के कारण गुरु ग्रह का प्रभाव भी रहेगा। ऐसे में आज का दिन योजनाबद्ध तरीके से कार्य करने, रिश्तों में संतुलन बनाए रखने और धैर्य के साथ आगे बढ़ने का संदेश देता है। आइए जानते हैं सभी मूलांक वालों के लिए कैसा रहेगा आज का दिन। मूलांक 1 (1, 10, 19, 28) आज कार्यक्षेत्र में धैर्य और अनुशासन बनाए रखने की आवश्यकता होगी। किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय से पहले अनुभवी लोगों की सलाह अवश्य लें। रिश्तों में अहंकार से बचें और साथी की भावनाओं को समझने की कोशिश करें। शुभ अंक: 1, 4 शुभ रंग: लाल, सफेद आज की सीख: आत्मविश्वास तभी प्रभावी बनता है जब उसमें विनम्रता भी शामिल हो। मूलांक 2 (2, 11, 20, 29) आज सहयोग और सामंजस्य आपके लिए सफलता की कुंजी साबित होंगे। परिवार और मित्रों के साथ समय बिताने का अवसर मिलेगा। कार्यक्षेत्र में आपकी समझदारी और कूटनीति लाभ पहुंचा सकती है। शुभ अंक: 2, 4 शुभ रंग: सफेद, क्रीम आज की सीख: मिल-जुलकर काम करने से बड़ी से बड़ी चुनौती आसान हो जाती है। मूलांक 3 (3, 12, 21, 30) आज अपनी सेहत और खान-पान पर विशेष ध्यान दें। कार्यक्षेत्र में आपकी रचनात्मकता सराही जाएगी, लेकिन सफलता के लिए अनुशासन जरूरी रहेगा। टीमवर्क से अच्छे परिणाम मिल सकते हैं। शुभ अंक: 3, 2 शुभ रंग: पीला, सफेद आज की सीख: रचनात्मकता और अनुशासन का मेल सफलता की राह खोलता है। मूलांक 4 (4, 13, 22, 31) आज का दिन आपके लिए विशेष रूप से शुभ माना जा रहा है। मेहनत, लगन और सही योजना के दम पर अधूरे कार्य पूरे हो सकते हैं। कार्यक्षेत्र में सकारात्मक परिणाम मिलने की संभावना है। शुभ अंक: 4, 2 शुभ रंग: हरा, सफेद आज की सीख: आपकी मेहनत ही आपकी सबसे बड़ी ताकत और उपलब्धि है। मूलांक 5 (5, 14, 23) व्यापारिक चर्चाओं और महत्वपूर्ण बैठकों के लिए दिन अनुकूल है। आज जल्दबाजी से बचें और सोच-समझकर निर्णय लें। मानसिक शांति बनाए रखने के लिए योग और ध्यान लाभदायक रहेगा। शुभ अंक: 5, 2 शुभ रंग: आसमानी नीला, सफेद आज की सीख: शांत मन से लिए गए फैसले अधिक सफल साबित होते हैं। मूलांक 6 (6, 15, 24) परिवार और रिश्तों के लिए दिन अच्छा रहेगा। कार्यक्षेत्र में आपके प्रयासों की सराहना हो सकती है। आर्थिक योजनाएं बनाने और भविष्य की रणनीति तय करने के लिए समय अनुकूल है। शुभ अंक: 6, 2 शुभ रंग: गुलाबी, क्रीम आज की सीख: प्रेम और विश्वास हर रिश्ते को मजबूत बनाते हैं। मूलांक 7 (7, 16, 25) आज मानसिक स्पष्टता बनी रहेगी और महत्वपूर्ण कार्यों में सफलता मिल सकती है। हालांकि काम के साथ आराम को भी प्राथमिकता दें। परिवार के साथ संवाद बनाए रखें। शुभ अंक: 7, 2 शुभ रंग: जामुनी, सिल्वर आज की सीख: संतुलित जीवन ही वास्तविक सफलता की पहचान है। मूलांक 8 (8, 17, 26) आर्थिक मामलों में आज का दिन मजबूत रहने वाला है। निवेश, बचत और वित्तीय योजनाओं पर ध्यान देने से लाभ मिल सकता है। कार्यक्षेत्र में अनुशासन और धैर्य बनाए रखें। शुभ अंक: 8, 4 शुभ रंग: भूरा, सफेद आज की सीख: संयम और धैर्य सफलता के सबसे मजबूत आधार हैं। मूलांक 9 (9, 18, 27) आज आपकी रचनात्मक ऊर्जा बढ़ी हुई रहेगी। नए कार्यों की शुरुआत के लिए समय अनुकूल है। नकारात्मक विचारों से दूर रहें और रिश्तों में स्पष्ट संवाद बनाए रखें। शुभ अंक: 9, 2 शुभ रंग: लाल, क्रीम आज की सीख: सकारात्मक सोच हर मुश्किल को आसान बना सकती है।
सनातन धर्म में गायत्री मंत्र को अत्यंत पवित्र, शक्तिशाली और कल्याणकारी मंत्रों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि नियमित रूप से गायत्री मंत्र का जप करने से मन को शांति मिलती है, बुद्धि का विकास होता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, इस मंत्र के जप के लिए कुछ विशेष नियमों का पालन करना भी आवश्यक माना गया है। गायत्री मंत्र ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।। गायत्री मंत्र का अर्थ गायत्री मंत्र का अर्थ है— "हम उस परम प्रकाशमान, सर्वशक्तिमान और दिव्य परमात्मा के तेज का ध्यान करते हैं। वह परम तेज हमारी बुद्धि को प्रकाशित करे और हमें सत्य तथा सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करे।" यह मंत्र ज्ञान, विवेक और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक माना जाता है। गायत्री मंत्र जप का सही समय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गायत्री मंत्र का जप विशेष रूप से इन समयों में शुभ माना जाता है— सूर्योदय से पहले ब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय के समय सूर्यास्त के बाद संध्या काल में मान्यता है कि इन समयों में वातावरण अपेक्षाकृत शांत और सात्विक होता है, जिससे ध्यान और मंत्र जप में एकाग्रता बढ़ती है। गायत्री मंत्र जप के प्रमुख नियम 1. स्वच्छता का रखें विशेष ध्यान मंत्र जप से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। शारीरिक और मानसिक पवित्रता पर विशेष बल दिया जाता है। 2. शांत स्थान का चयन करें जप के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करें जहां शांति हो और ध्यान भंग न हो। मंत्र जप शुरू करने से पहले माता गायत्री का स्मरण और ध्यान करें। 3. रुद्राक्ष की माला का प्रयोग परंपरागत मान्यताओं के अनुसार गायत्री मंत्र के जप के लिए रुद्राक्ष की माला का उपयोग शुभ माना जाता है। 4. 108 बार जप का महत्व एक माला में 108 मनके होते हैं। इसलिए कम से कम 108 बार मंत्र जप करना शुभ माना जाता है। 5. सकारात्मक भाव रखें मंत्र जप करते समय मन में सकारात्मक विचार और शुभ संकल्प रखना चाहिए। मान्यता है कि श्रद्धा और एकाग्रता के साथ किया गया जप अधिक फलदायी माना जाता है। 6. संध्या से पहले जप करते समय मौन रहें कुछ धार्मिक परंपराओं में माना जाता है कि यदि सूर्यास्त से पहले जप किया जाए तो यथासंभव मौन रहकर जप करना चाहिए। क्या कोई भी कर सकता है गायत्री मंत्र का जप? इस विषय में विभिन्न धार्मिक परंपराओं और मतों में अलग-अलग विचार मिलते हैं। कई परंपराएं मानती हैं कि गायत्री मंत्र का जप गुरु से दीक्षा लेकर करना चाहिए और गुरु द्वारा बताए गए नियमों का पालन करना चाहिए। वहीं कई आधुनिक आध्यात्मिक संस्थाएं श्रद्धा और उचित उच्चारण के साथ सभी लोगों को गायत्री मंत्र जप की अनुमति देती हैं। यदि आप किसी विशेष धार्मिक परंपरा का पालन करते हैं, तो अपने गुरु या आध्यात्मिक मार्गदर्शक से परामर्श लेना उचित रहेगा। गायत्री मंत्र जप के बताए गए लाभ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नियमित गायत्री मंत्र जप से— मानसिक शांति प्राप्त होती है। एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ती है। सकारात्मक सोच विकसित होती है। आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। निर्णय लेने की क्षमता बेहतर हो सकती है। विद्यार्थियों को अध्ययन में लाभ मिलने की मान्यता है। हालांकि इन लाभों को धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
रक्तबीज के आतंक से कांप उठे थे तीनों लोक हिंदू धर्म में काली को आदिशक्ति का सबसे उग्र और शक्तिशाली स्वरूप माना जाता है। वह दुष्ट शक्तियों के विनाश और धर्म की रक्षा के लिए जानी जाती हैं। उनकी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा रक्तबीज नामक राक्षस के वध और उसके बाद शांत हुए उनके प्रचंड क्रोध से जुड़ी है। मान्यता है कि रक्तबीज ने कठोर तपस्या करके भगवान ब्रह्मा से ऐसा वरदान प्राप्त किया था कि उसके रक्त की हर बूंद से उसके जैसा ही एक नया दैत्य पैदा हो जाता था। इस वरदान के बल पर उसने देवताओं, ऋषियों और समस्त प्राणियों को परेशान करना शुरू कर दिया। देवताओं की पुकार पर प्रकट हुईं महाकाली जब देवता रक्तबीज का सामना करने में असफल हो गए, तब उन्होंने आदिशक्ति से सहायता की प्रार्थना की। देवताओं की विनती सुनकर देवी दुर्गा ने अपना विकराल और उग्र स्वरूप धारण किया, जिसे महाकाली कहा जाता है। महाकाली का स्वरूप अत्यंत भयावह बताया गया है। उनके हाथों में अस्त्र-शस्त्र, गले में मुंडमाला और बाहर निकली हुई लंबी जिह्वा उनके रौद्र रूप का प्रतीक मानी जाती है। हालांकि यह रूप दुष्टों के लिए विनाशकारी और भक्तों के लिए रक्षक माना जाता है। कैसे हुआ रक्तबीज का अंत? युद्ध के दौरान जब भी रक्तबीज घायल होता, उसके शरीर से गिरने वाली रक्त की बूंदों से हजारों नए राक्षस पैदा हो जाते। इससे युद्ध लगातार कठिन होता जा रहा था। तब महाकाली ने अपनी विशाल जिह्वा फैला दी और रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले रक्त को धरती पर गिरने से पहले ही ग्रहण करना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप रक्त की एक भी बूंद भूमि पर नहीं गिर सकी और नए राक्षसों का जन्म रुक गया। अंततः मां काली ने रक्तबीज का वध कर तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त कराया। रक्तबीज वध के बाद भी शांत नहीं हुआ क्रोध रक्तबीज के संहार के बाद भी मां काली का रौद्र रूप शांत नहीं हुआ। उनका क्रोध इतना प्रचंड था कि संपूर्ण सृष्टि संकट में पड़ गई। देवताओं को भय होने लगा कि यदि यह क्रोध जारी रहा तो ब्रह्मांड का संतुलन बिगड़ सकता है। तब सभी देवता सहायता के लिए भगवान शिव के पास पहुंचे। जब भगवान शिव मां काली के चरणों में लेट गए देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव ने मां काली को शांत करने का प्रयास किया, लेकिन उनका क्रोध कम नहीं हुआ। आखिरकार भगवान शिव स्वयं मां काली के मार्ग में लेट गए। युद्ध के उन्माद में आगे बढ़ती मां काली का पैर जैसे ही शिवजी के वक्षस्थल पर पड़ा, वे अचानक ठहर गईं। अपने आराध्य पति को अपने चरणों के नीचे देखकर उन्हें अपनी स्थिति का एहसास हुआ। उसी क्षण उनका क्रोध शांत हो गया और उन्होंने अपना उग्र रूप त्याग दिया। इसी घटना के कारण मां काली की कई प्रतिमाओं में उन्हें भगवान शिव के ऊपर खड़े हुए दिखाया जाता है। क्या संदेश देती है यह कथा? यह पौराणिक कथा केवल एक धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि शक्ति और संतुलन का प्रतीक भी मानी जाती है। मां काली धर्म की रक्षा के लिए आवश्यक शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं, जबकि भगवान शिव उस शक्ति के नियंत्रण और संतुलन का। यह कथा बताती है कि शक्ति चाहे कितनी भी महान क्यों न हो, उसका संयम और संतुलन भी उतना ही आवश्यक है। नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित है। विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में कथा के विवरण में कुछ भिन्नताएं मिल सकती हैं।
पूजा में हर वस्तु का होता है विशेष महत्व सनातन धर्म में पूजा-पाठ के दौरान इस्तेमाल होने वाली प्रत्येक वस्तु का अपना धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। अलग-अलग देवी-देवताओं की प्रिय सामग्री भी अलग होती है। इसी कारण कुछ वस्तुएं कुछ देवताओं को अर्पित की जाती हैं, जबकि कुछ वस्तुओं का उपयोग वर्जित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद (वट वृक्ष) का पत्ता कुछ देवी-देवताओं की पूजा में अर्पित नहीं किया जाता। आइए जानते हैं इसके पीछे की मान्यताएं। भगवान विष्णु को क्यों नहीं चढ़ाया जाता बरगद का पत्ता? Lord Vishnu की पूजा में तुलसी दल का विशेष महत्व माना गया है। तुलसी को भक्ति, पवित्रता और सात्विकता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद का वृक्ष तप, वैराग्य और स्थिरता का प्रतीक है, जबकि भगवान विष्णु को कोमल और सात्विक अर्पण अधिक प्रिय माने जाते हैं। इसी कारण उनकी पूजा में बरगद के पत्ते चढ़ाने की परंपरा नहीं है। मां लक्ष्मी की पूजा में क्यों माना जाता है वर्जित? Goddess Lakshmi धन, वैभव और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद का वृक्ष स्थायित्व, तपस्या और मोक्ष का प्रतीक माना जाता है। गृहस्थ जीवन में लक्ष्मी पूजा के दौरान कमल, गुलाब और अन्य शुभ पुष्पों का प्रयोग अधिक शुभ माना जाता है। इसलिए मां लक्ष्मी को बरगद का पत्ता अर्पित करने की परंपरा नहीं है। गणेश जी की पूजा में भी नहीं होता उपयोग Lord Ganesha की पूजा में दूर्वा, मोदक और लाल पुष्पों का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणेश जी को ऐसी वस्तुएं अर्पित की जाती हैं जो मंगल, सौभाग्य और शुभता का प्रतीक हों। बरगद का पत्ता वैराग्य और कठोर तपस्या से जुड़ा माना जाता है, इसलिए इसे गणेश पूजा में उपयोग नहीं किया जाता। बरगद के वृक्ष का धार्मिक महत्व हालांकि कुछ देवताओं की पूजा में बरगद का पत्ता अर्पित नहीं किया जाता, लेकिन वट वृक्ष स्वयं हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना गया है। Vat Savitri Vrat और वट पूजा जैसे धार्मिक अनुष्ठानों में बरगद के वृक्ष की विशेष पूजा की जाती है। इसे दीर्घायु, अखंड सौभाग्य और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। पूजा करते समय रखें इन बातों का ध्यान देवी-देवताओं की प्रिय और वर्जित वस्तुओं की जानकारी रखें। ताजे और स्वच्छ फूल-पत्तियों का ही उपयोग करें। श्रद्धा और विधि-विधान के साथ पूजा करें। पूजा सामग्री का चयन धार्मिक परंपराओं के अनुसार करें। धार्मिक मान्यता क्या कहती है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा में बरगद का पत्ता अर्पित नहीं किया जाता। माना जाता है कि प्रत्येक देवता की प्रिय सामग्री अलग होती है और उसी के अनुरूप पूजा करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं। नोट: यह जानकारी प्रचलित धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। विभिन्न क्षेत्रों और परंपराओं में मान्यताएं अलग-अलग हो सकती हैं।
सनातन धर्म में तिलक केवल एक धार्मिक चिन्ह नहीं, बल्कि आस्था, ऊर्जा और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना जाता है। पूजा-पाठ, यज्ञ, दान और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में तिलक का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार तिलक धारण करने से व्यक्ति को शुभ फल प्राप्त होते हैं और उसकी आध्यात्मिक शक्ति में वृद्धि होती है। शास्त्रों में तिलक का महत्व धार्मिक ग्रंथों में तिलक को अत्यंत पवित्र माना गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मपर्व में उल्लेख मिलता है कि स्नान, दान, तप, हवन, देवपूजन और पितरों से जुड़े कर्म यदि तिलक लगाए बिना किए जाएं तो उनका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। यही कारण है कि वैदिक परंपरा में पूजा और धार्मिक अनुष्ठान से पहले तिलक धारण करने की परंपरा रही है। किस अंगुली से तिलक लगाने का क्या फल मिलता है? स्कंदपुराण में तिलक लगाने की विधि और उसके प्रभाव का विस्तार से वर्णन किया गया है। अनामिका (रिंग फिंगर) से तिलक लगाने पर शांति और मानसिक संतुलन की प्राप्ति होती है। मध्यमा अंगुली से तिलक करने पर आयु वृद्धि का फल बताया गया है। अंगूठे से लगाया गया तिलक स्वास्थ्य और बल प्रदान करने वाला माना जाता है। तर्जनी अंगुली से तिलक लगाने को मोक्ष प्राप्ति से जोड़ा गया है। देवी-देवताओं के अनुसार अलग-अलग तिलक हिंदू धर्म में विभिन्न संप्रदायों और उपासना पद्धतियों के अनुसार तिलक के स्वरूप भी अलग-अलग होते हैं। विष्णु भक्तों का ऊर्ध्व तिलक भगवान विष्णु के उपासक माथे पर दो सीधी रेखाओं वाला ऊर्ध्व तिलक धारण करते हैं, जो भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। शक्ति उपासकों का तिलक मां शक्ति की आराधना करने वाले साधक प्रायः दो बिंदुओं या विशेष स्वरूप का तिलक लगाते हैं, जो शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक होता है। शिव भक्तों का त्रिपुंड भगवान शिव के भक्त भस्म से तीन आड़ी रेखाओं वाला त्रिपुंड धारण करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि त्रिपुंड धारण कर जप, तप और पूजा करने से आध्यात्मिक उन्नति होती है। तिलक का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व माथे के बीच का भाग, जहां तिलक लगाया जाता है, शरीर का एक महत्वपूर्ण ऊर्जा केंद्र माना जाता है। योग और ध्यान परंपरा में इसे आज्ञा चक्र कहा जाता है। यह स्थान दोनों भौंहों के बीच स्थित होता है और मानसिक एकाग्रता तथा चेतना से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि इस स्थान पर चंदन, कुमकुम या भस्म का तिलक लगाने से मन को शांति मिलती है, एकाग्रता बढ़ती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि माथे के इस हिस्से पर हल्का दबाव मानसिक तनाव को कम करने और ध्यान केंद्रित करने में सहायक हो सकता है। केवल परंपरा नहीं, आस्था और ऊर्जा का प्रतीक तिलक सनातन संस्कृति की एक महत्वपूर्ण पहचान है। यह व्यक्ति की धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है। पूजा, व्रत और शुभ कार्यों में तिलक लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी श्रद्धालु इसे शुभता, सकारात्मकता और ईश्वरीय कृपा का प्रतीक मानते हैं।
Narada Purana में जीवन, मृत्यु, कर्म और परलोक से जुड़े कई गूढ़ रहस्यों का विस्तार से वर्णन मिलता है। पुराणों के अनुसार मनुष्य को मृत्यु के बाद अपने कर्मों के आधार पर फल प्राप्त होता है। अच्छे कर्म करने वाले जीव जहां सुखपूर्वक धर्मलोक की यात्रा करते हैं, वहीं पाप कर्म करने वालों को कठोर यातनाएं सहनी पड़ती हैं। नारद पुराण में यमलोक के मार्ग और वहां मिलने वाले दंड एवं सुखों का अत्यंत विस्तृत और रहस्यमयी वर्णन किया गया है। छियासी हजार योजन लंबा बताया गया है यमलोक का मार्ग नारद पुराण के अनुसार यमलोक का मार्ग लगभग 86,000 योजन तक फैला हुआ है। मान्यता के अनुसार एक योजन लगभग 13 किलोमीटर के बराबर माना जाता है। इस हिसाब से यह दूरी करीब 11 लाख किलोमीटर से भी अधिक बताई गई है। कहा गया है कि: धर्म और दान-पुण्य करने वाले लोग इस मार्ग को सुखपूर्वक पार कर लेते हैं पाप कर्म करने वाले जीव अत्यंत कष्ट झेलते हुए यात्रा करते हैं पापी जीवों के बारे में वर्णन मिलता है कि उनके कंठ सूख जाते हैं, वे भय और पीड़ा से रोते-चिल्लाते हैं और Yamdoot उन्हें चाबुक और अस्त्रों से दंडित करते हुए आगे ले जाते हैं। यमलोक के मार्ग में मिलती हैं भयानक यातनाएं पुराण में यमलोक के रास्ते को बेहद कठिन और भयावह बताया गया है। मार्ग में: जलती हुई अग्नि तपती रेत कांटेदार वृक्ष तीखी धार वाली चट्टानें अंधेरी गुफाएं सुई जैसे कांटे मौजूद रहते हैं। कहीं बाघों की डरावनी गर्जना सुनाई देती है तो कहीं जीवों को रस्सियों और अंकुशों से खींचा जाता है। पाप कर्म करने वाले जीव इन यातनाओं को सहते हुए अपने कर्मों पर पछतावा करते हैं। पुराणों के अनुसार इस यात्रा में न छाया मिलती है और न पानी। पुण्यात्माओं को मिलते हैं दिव्य सुख नारद पुराण में यह भी बताया गया है कि जिन्होंने जीवन में धर्म, दया और दान किया हो, उन्हें यमलोक की यात्रा में विशेष सुख प्राप्त होते हैं। उदाहरण के तौर पर: अन्न दान करने वालों को स्वादिष्ट भोजन मिलता है जल दान करने वालों को उत्तम पेय प्राप्त होते हैं वस्त्र दान करने वालों को दिव्य वस्त्र मिलते हैं दीपदान करने वालों के मार्ग प्रकाशित रहते हैं गोदान करने वालों को विशेष सुख प्राप्त होते हैं जो व्यक्ति माता-पिता की सेवा करता है, ब्राह्मणों और जरूरतमंदों की सहायता करता है तथा सभी जीवों के प्रति दया भाव रखता है, उसे धर्मराज के लोक में सम्मान प्राप्त होता है। धर्मराज पुण्यात्माओं का करते हैं सम्मान Yama पुण्यात्माओं का स्वागत मित्र की तरह करते हैं। पुराण के अनुसार धर्मराज कहते हैं कि मानव जीवन पाकर भी जो व्यक्ति धर्म और पुण्य नहीं करता, उससे बड़ा पापी कोई नहीं। नारद पुराण में धर्म, दान और भगवान के स्मरण को जीवन का सबसे बड़ा साधन बताया गया है। चित्रगुप्त याद दिलाते हैं कर्मों का हिसाब वहीं पाप कर्म करने वाले जीवों को यमदूत भयावह रूप में दिखाई देते हैं। पुराण में वर्णन है कि उनकी आंखें लाल होती हैं और वे प्रलयकाल के बादलों जैसी गर्जना करते हैं। इसके बाद Chitragupta जीवों को उनके कर्मों का पूरा हिसाब याद दिलाते हैं और उसी अनुसार उन्हें नरक की यातनाएं भोगनी पड़ती हैं। पुराणों के अनुसार पापों का फल भोगने के बाद जीव फिर पृथ्वी पर विभिन्न योनियों में जन्म लेते हैं। क्या संदेश देता है नारद पुराण? नारद पुराण का मुख्य संदेश यह है कि: मनुष्य को हमेशा धर्म और सद्कर्म करने चाहिए दया, सेवा और दान जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं हर कर्म का फल अवश्य मिलता है मानव जीवन को केवल भौतिक सुखों में नहीं गंवाना चाहिए पुराणों के अनुसार धर्म का मार्ग ही अंततः जीव को सुख, सम्मान और मोक्ष की ओर ले जाता है।
जैन धर्म में रोहिणी व्रत को बेहद पवित्र और फलदायी माना जाता है। यह व्रत भगवान वासुपूज्य की आराधना को समर्पित होता है और मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा तथा आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक माना जाता है। साल 2026 में रोहिणी व्रत 18 मई, सोमवार को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत को करने से जीवन में सुख-शांति, समृद्धि और मानसिक संतुलन बना रहता है। रोहिणी व्रत 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त रोहिणी व्रत किसी निश्चित तिथि पर नहीं बल्कि रोहिणी नक्षत्र के प्रभाव के अनुसार रखा जाता है। जब सूर्योदय के बाद रोहिणी नक्षत्र विद्यमान रहता है, तब यह व्रत किया जाता है। मुख्य व्रत तिथि: 18 मई 2026, सोमवार रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ: 17 मई 2026, रात 9:43 बजे रोहिणी नक्षत्र समाप्त: 18 मई 2026, शाम 5:55 बजे विशेष पूजा मुहूर्त: सुबह 08:00 बजे से 10:00 बजे तक व्रत पारण का समय: 18 मई को सुबह 11:32 बजे के बाद क्या है रोहिणी व्रत का महत्व? रोहिणी व्रत मुख्य रूप से जैन समुदाय द्वारा रखा जाता है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखते हैं और भगवान वासुपूज्य की पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि यह व्रत आत्मिक शुद्धि, संयम और सकारात्मक सोच को बढ़ावा देता है। रोहिणी व्रत के प्रमुख नियम यह व्रत लगातार 3, 5 या 7 वर्षों तक किया जाता है। हर महीने रोहिणी नक्षत्र के दिन उपवास रखा जाता है। व्रत के दौरान सात्विक जीवनशैली और धार्मिक नियमों का पालन जरूरी माना जाता है। निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद विधि-विधान से ‘उद्यापन’ किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, बिना उद्यापन के लंबे समय तक किए गए व्रत को पूर्ण नहीं माना जाता।
Masik Krishna Janmashtami 2026: हिंदू धर्म में मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यह पर्व हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। ज्येष्ठ माह की मासिक कृष्ण जन्माष्टमी इस वर्ष 9 मई को पड़ रही है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत एवं पूजा करने से भगवान Krishna की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख, शांति व समृद्धि आती है। मान्यता है कि इस दिन कुछ खास नियमों का पालन करने से शुभ फल मिलते हैं, जबकि छोटी-छोटी गलतियां पूजा के प्रभाव को कम कर सकती हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन क्या करना शुभ माना जाता है और किन बातों से बचना चाहिए। मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन क्या करें? भगवान कृष्ण को पीले वस्त्र पहनाएं भगवान Krishna को पीला रंग अत्यंत प्रिय माना जाता है। पूजा के दौरान उन्हें पीले वस्त्र अर्पित करें और मुकुट में मोरपंख जरूर लगाएं। इससे पूजा का विशेष फल प्राप्त होता है। भोग में तुलसी दल जरूर रखें धार्मिक मान्यता के अनुसार बिना तुलसी के भगवान कृष्ण भोग स्वीकार नहीं करते। इसलिए माखन-मिश्री, फल या अन्य प्रसाद में तुलसी दल अवश्य रखें। मंत्र जाप और भजन करें इस दिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” जैसे मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है। साथ ही भजन-कीर्तन और Bhagavad Gita का पाठ करने से मन को शांति मिलती है। दान-पुण्य करें जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र या धन का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। मान्यता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। गौ सेवा करें भगवान कृष्ण को गोपाल कहा जाता है। इस दिन गाय को हरा चारा, गुड़ या रोटी खिलाना शुभ माना जाता है। इसे विशेष पुण्यदायी कार्य माना गया है। मध्यरात्रि में करें पूजा भगवान कृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था, इसलिए रात 12 बजे विशेष आरती और पूजा का महत्व माना जाता है। इस समय घंटी, शंख और भजन के साथ जन्मोत्सव मनाया जाता है। मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन क्या न करें? तामसिक भोजन से बचें इस दिन मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन का सेवन नहीं करना चाहिए। घर का वातावरण सात्विक और शांत रखना शुभ माना जाता है। अन्न और चावल का सेवन न करें यदि आप व्रत कर रहे हैं तो चावल और सामान्य अन्न से परहेज करें। फलाहार में साबूदाना, कुट्टू का आटा और फल ग्रहण किए जा सकते हैं। तुलसी के पत्ते न तोड़ें जन्माष्टमी के दिन तुलसी तोड़ना अशुभ माना जाता है। पूजा के लिए आवश्यक तुलसी के पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें। काले कपड़े पहनने से बचें पूजा के दौरान काले रंग के वस्त्र पहनना शुभ नहीं माना जाता। पीले, सफेद या लाल रंग के कपड़े पहनना बेहतर माना गया है। क्रोध और नकारात्मकता से दूर रहें व्रत केवल भोजन का त्याग नहीं बल्कि मन की शुद्धता का भी प्रतीक माना जाता है। इस दिन झूठ बोलने, किसी की निंदा करने और क्रोध करने से बचना चाहिए। दिन में ज्यादा न सोएं धार्मिक मान्यता के अनुसार व्रत वाले दिन आलस्य नहीं करना चाहिए। समय को भजन, ध्यान और धार्मिक पाठ में लगाना अधिक शुभ माना जाता है। क्या है धार्मिक मान्यता? मान्यता है कि मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत रखने और श्रद्धा से पूजा करने से भगवान Krishna भक्तों के सभी कष्ट दूर करते हैं। दांपत्य जीवन में सुख, संतान सुख और मानसिक शांति के लिए भी यह व्रत विशेष फलदायी माना जाता है।
आज की Gen Z सिर्फ करियर, सोशल मीडिया और ट्रेंड्स तक सीमित नहीं है। यह पीढ़ी अब आध्यात्म को भी अपने अंदाज में जी रही है। कभी मंदिरों और पारिवारिक परंपराओं तक सीमित रहने वाले भजन, कीर्तन और ध्यान अब क्लब, ऑडिटोरियम और सोशल स्पेस का हिस्सा बनते जा रहे हैं। मुंबई के St Andrew's Auditorium में हाल ही में आयोजित एक भजन-क्लबिंग इवेंट इसका बड़ा उदाहरण बना, जहां इलेक्ट्रिक गिटार, ड्रम्स और हारमोनियम की धुनों के बीच युवा “Achyutam Keshavam” और “Raghupati Raghav Raja Ram” जैसे भजन गाते नजर आए। माहौल किसी लाइव कॉन्सर्ट जैसा था, लेकिन केंद्र में आध्यात्मिक संगीत था। आध्यात्म अब सिर्फ परंपरा नहीं, पर्सनल एक्सपीरियंस शामैनिक फैसिलिटेटर Barkha Punjabi के अनुसार, Gen Z अब सिर्फ इसलिए किसी धार्मिक मान्यता को नहीं मानती क्योंकि परिवार मानता है। यह पीढ़ी सवाल पूछती है, प्रयोग करती है और आध्यात्म को अपने अनुभव के हिसाब से समझना चाहती है। यही वजह है कि आज– Bhajan Clubbing Tarot Reading Crystal Healing Kirtan Nights Reiki Sessions जैसी चीजें युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं। कीर्तन अब लिविंग रूम से निकलकर बड़े मंचों तक लंदन के कीर्तन कलाकार Radhika Das, मुंबई आधारित Kirtan Mumbai और Backstage Siblings जैसे प्लेटफॉर्म्स ने कीर्तन को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है। अब ये आयोजन छोटे सत्संगों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि टिकटेड इवेंट्स और बड़े वेन्यू तक पहुंच चुके हैं। “स्पिरिचुअल कॉन्सर्ट” का नया कॉन्सेप्ट Nirvaan Birla का मानना है कि यह बदलाव भक्ति का नया मंच नहीं, बल्कि क्लब कल्चर का आध्यात्म से जुड़ना है। उनके अनुसार, यह ऐसे कॉन्सर्ट्स हैं जहां गाने किसी इंसान के लिए नहीं, बल्कि self-love और divinity के लिए होते हैं। उनका उद्देश्य युवाओं को कुछ देर रुककर खुद से जुड़ने का मौका देना है। अस्थिर दुनिया में “ग्राउंडिंग” की तलाश Meghna Siraj के मुताबिक, आज के युवा सामाजिक, आर्थिक और भावनात्मक अस्थिरता के बीच खुद को खोया हुआ महसूस करते हैं। ऐसे में सामूहिक chanting और rituals उन्हें belongingness और mental grounding का एहसास कराते हैं। जब सैकड़ों लोग एक साथ मंत्र गाते हैं, तो एक सामूहिक ऊर्जा बनती है, जो लोगों को डिजिटल दुनिया से बाहर वास्तविक जुड़ाव का अनुभव देती है। टैरो और क्रिस्टल हीलिंग की तरफ भी बढ़ रहा रुझान आध्यात्म का यह नया रूप सिर्फ संगीत तक सीमित नहीं है। टैरो कार्ड्स, क्रिस्टल्स और ज्योतिष जैसी चीजों में भी Gen Z की दिलचस्पी तेजी से बढ़ रही है। Ishita Bangera बताती हैं कि लगातार डिजिटल दबाव और तुलना के माहौल में Reiki और Tarot जैसे अभ्यास उन्हें खुद से जुड़ने में मदद करते हैं। एक सर्वे के मुताबिक– 16% Gen Z singles अपने love life decisions के लिए Tarot का सहारा लेते हैं 30% लोग डेट से पहले सामने वाले की zodiac sign चेक करते हैं क्या यह आध्यात्म है या सिर्फ ट्रेंड? हालांकि इस नए ट्रेंड को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि भजन और कीर्तन को “क्लबिंग” जैसा रूप देना उनकी पवित्रता को कम कर सकता है। लेकिन आयोजकों का कहना है कि असली फर्क intention यानी भावना का होता है। अगर उद्देश्य भीतर की शांति और जुड़ाव है, तो जगह और प्रस्तुति उतनी मायने नहीं रखती। बदल गया है अंदाज, लेकिन तलाश वही है आज का satsang पहले जैसा नहीं दिखता। अब वहां LED लाइट्स, लाइव बैंड और सोशल मीडिया भी है। लेकिन मूल भावना वही है– जुड़ाव आत्म-खोज शांति belongingness Gen Z शायद आध्यात्म को नया aesthetic दे रही है, लेकिन उसकी तलाश वही पुरानी है– खुद को समझने और भीतर की शांति पाने की।
आज 1 मई, शुक्रवार को वैशाख पूर्णिमा का पावन पर्व मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में इस दिन का विशेष महत्व माना गया है। शास्त्रों के अनुसार वैशाख मास भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय होता है, इसलिए इसे “माधव मास” भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा, दान और भगवान विष्णु के नामों का जाप करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है। क्यों खास है वैशाख पूर्णिमा? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार: इस दिन स्नान, दान और तप का विशेष फल मिलता है भगवान विष्णु की उपासना से सुख-समृद्धि बढ़ती है पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है कहा जाता है कि इस दिन किया गया जप और पुण्य कई गुना फल देता है। 108 नामों के जाप का महत्व भगवान विष्णु के 108 नामों का जाप करना अत्यंत शुभ माना गया है। मन को शांति मिलती है नकारात्मक विचार दूर होते हैं जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि नाम-जप से भगवान नारायण शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। भगवान विष्णु के 108 पवित्र नाम नीचे भगवान विष्णु के 108 नाम दिए जा रहे हैं, जिनका जाप आज के दिन विशेष फलदायी माना गया है: ऊँ श्री विष्णवे नमः ऊँ श्री परमात्मने नमः ऊँ श्री विराट पुरुषाय नमः ऊँ श्री क्षेत्र-क्षेत्रज्ञाय नमः ऊँ श्री केशवाय नमः ऊँ श्री पुरुषोत्तमाय नमः ऊँ श्री ईश्वराय नमः ऊँ श्री हृषीकेशाय नमः ऊँ श्री पद्मनाभाय नमः ऊँ श्री विश्वकर्मणे नमः ऊँ श्री कृष्णाय नमः ऊँ श्री प्रजापतये नमः ऊँ श्री हिरण्यगर्भाय नमः ऊँ श्री सुरेशाय नमः ऊँ श्री सर्वदर्शनाय नमः ऊँ श्री सर्वेश्वराय नमः ऊँ श्री अच्युताय नमः ऊँ श्री वासुदेवाय नमः ऊँ श्री पुण्डरीकाक्षाय नमः ऊँ श्री नर-नारायणाय नमः ऊँ श्री जनार्दनाय नमः ऊँ श्री लोकाध्यक्षाय नमः ऊँ श्री चतुर्भुजाय नमः ऊँ श्री धर्माध्यक्षाय नमः ऊँ श्री उपेन्द्राय नमः ऊँ श्री माधवाय नमः ऊँ श्री महाबलाय नमः ऊँ श्री गोविन्दाय नमः ऊँ श्री प्रजापतये नमः ऊँ श्री विश्वात्मने नमः ऊँ श्री सहस्राक्षाय नमः ऊँ श्री नारायणाय नमः ऊँ श्री सिद्धसंकल्पाय नमः ऊँ श्री महेन्द्राय नमः ऊँ श्री वामनाय नमः ऊँ श्री अनन्तजिते नमः ऊँ श्री महीधराय नमः ऊँ श्री गरुड़ध्वजाय नमः ऊँ श्री लक्ष्मीपतये नमः ऊँ श्री दामोदराय नमः ऊँ श्री कमलापतये नमः ऊँ श्री परमेश्वराय नमः ऊँ श्री धनेश्वराय नमः ऊँ श्री मुकुन्दाय नमः ऊँ श्री आनन्दाय नमः ऊँ श्री सत्यधर्माय नमः ऊँ श्री उपेन्द्राय नमः ऊँ श्री चक्रगदाधराय नमः ऊँ श्री भगवते नमः ऊँ श्री शान्तिदाय नमः ऊँ श्री गोपतये नमः ऊँ श्री श्रीपतये नमः ऊँ श्री श्रीहरये नमः ऊँ श्री श्रीरघुनाथाय नमः ऊँ श्री कपिलेश्वराय नमः ऊँ श्री वाराहाय नमः ऊँ श्री नरसिंहाय नमः ऊँ श्री रामाय नमः ऊँ श्री हयग्रीवाय नमः ऊँ श्री शोकनाशनाय नमः ऊँ श्री विशुद्धात्मने नमः ऊँ श्री केशवाय नमः ऊँ श्री धनंजयाय नमः ऊँ श्री ब्राह्मणप्रियाय नमः ऊँ श्री यदुश्रेष्ठाय नमः ऊँ श्री लोकनाथाय नमः ऊँ श्री भक्तवत्सलाय नमः ऊँ श्री चतुर्मूर्तये नमः ऊँ श्री एकपदे नमः ऊँ श्री सुलोचनाय नमः ऊँ श्री सर्वतोमुखाय नमः ऊँ श्री सप्तवाहनाय नमः ऊँ श्री वंशवर्धनाय नमः ऊँ श्री योगिने नमः ऊँ श्री धनुर्धराय नमः ऊँ श्री प्रीतिवर्धनाय नमः ऊँ श्री प्रीतिवर्धनाय नमः ऊँ श्री अक्रूराय नमः ऊँ श्री दुःस्वप्ननाशनाय नमः ऊँ श्री भूभवे नमः ऊँ श्री प्राणदाय नमः ऊँ श्री देवकीनन्दनाय नमः ऊँ श्री शंखभृते नमः ऊँ श्री सुरेशाय नमः ऊँ श्री कमलनयनाय नमः ऊँ श्री जगतगुरवे नमः ऊँ श्री सनातनाय नमः ऊँ श्री सच्चिदानन्दाय नमः ऊँ श्री द्वारकानाथाय नमः ऊँ श्री दानवेन्द्रविनाशकाय नमः ऊँ श्री दयानिधये नमः ऊँ श्री एकात्मने नमः ऊँ श्री शत्रुजिते नमः ऊँ श्री घनश्यामाय नमः ऊँ श्री लोकाध्यक्षाय नमः ऊँ श्री जरामरणवर्जिताय नमः ऊँ श्री सर्वयज्ञफलप्रदाय नमः ऊँ श्री विराटपुरुषाय नमः ऊँ श्री यशोदानन्दनाय नमः ऊँ श्री परमधार्मिकाय नमः ऊँ श्री गरुड़ध्वजाय नमः ऊँ श्री प्रभवे नमः ऊँ श्री लक्ष्मीकान्ताय नमः ऊँ श्री गगनसदृशाय नमः ऊँ श्री वामनाय नमः ऊँ श्री हंसाय नमः ऊँ श्री व्यासाय नमः ऊँ श्री प्रकटाय नमः
आज श्रद्धा से मनाई जा रही बगलामुखी जयंती आज, 24 अप्रैल 2026 को देशभर में Baglamukhi Jayanti श्रद्धा, भक्ति और विधि-विधान के साथ मनाई जा रही है। धार्मिक मान्यता है कि मां बगलामुखी की आराधना से शत्रु बाधाएं दूर होती हैं, वाणी में शक्ति आती है और जीवन में विजय प्राप्त होती है। दस महाविद्याओं में मां बगलामुखी को आठवां स्थान प्राप्त है। मां बगलामुखी को क्यों कहते हैं पीताम्बरा? मां बगलामुखी को 'पीताम्बरा देवी' के नाम से भी जाना जाता है। 'पीत' यानी पीला और 'अम्बर' यानी वस्त्र। मान्यता है कि देवी को पीला रंग अत्यंत प्रिय है और वे सदैव पीले वस्त्र धारण करती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सतयुग में जब भयंकर तूफान से सृष्टि संकट में पड़ गई थी, तब भगवान विष्णु की तपस्या से प्रसन्न होकर देवी हरिद्रा सरोवर से प्रकट हुई थीं। उस समय उनका स्वरूप स्वर्ण के समान तेजस्वी और पीतवर्ण था। यही कारण है कि उन्हें पीताम्बरा कहा जाता है। पूजा में पीले रंग का विशेष महत्व मां बगलामुखी की आराधना में पीले रंग का विशेष स्थान है। भक्त पूजा के दौरान: पीले वस्त्र धारण करते हैं पीले फूल अर्पित करते हैं हल्दी की माला चढ़ाते हैं पीले नैवेद्य का भोग लगाते हैं धार्मिक मान्यता के अनुसार, पीला रंग ऊर्जा, समृद्धि और शुभता का प्रतीक है। बगलामुखी जयंती 2026 का शुभ मुहूर्त वैशाख शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर मां बगलामुखी का प्राकट्य हुआ था। इस वर्ष तिथि का समय इस प्रकार है: अष्टमी तिथि प्रारंभ: 23 अप्रैल 2026, रात 8:49 बजे अष्टमी तिथि समाप्त: 24 अप्रैल 2026, शाम 7:21 बजे उदया तिथि: 24 अप्रैल 2026 अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:59 बजे से दोपहर 12:50 बजे तक मां बगलामुखी की पूजा से क्या मिलता है? धार्मिक मान्यता है कि मां बगलामुखी की कृपा से शत्रुओं पर विजय मिलती है, नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और व्यक्ति की वाणी प्रभावशाली बनती है। विशेष रूप से न्यायालय, प्रतियोगी परीक्षा और विवादों में सफलता के लिए उनकी पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है।
आज मनाई जा रही है पावन गंगा सप्तमी वैशाख शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि पर मनाया जाने वाला Ganga Saptami इस वर्ष 23 अप्रैल को मनाया जा रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित होकर भगवान Shiva की जटाओं में विराजी थीं। इस दिन गंगा स्नान, पूजा और दान का विशेष महत्व माना जाता है। पूजा और स्नान का शुभ मुहूर्त गंगा सप्तमी के दिन शुभ कार्यों के लिए दो प्रमुख समय बताए गए हैं– ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:20 बजे से 5:04 बजे तक मध्याह्न मुहूर्त: सुबह 11:01 बजे से दोपहर 1:38 बजे तक इन समयों में स्नान, पूजा और दान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। घर पर ऐसे पाएं गंगा स्नान का पुण्य अगर आप गंगा तट पर नहीं जा पा रहे हैं, तो घर पर ही सरल विधि से गंगा स्नान का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं– सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। स्नान के पानी में गंगाजल मिलाएं और ‘हर-हर गंगे’ का उच्चारण करें। ‘गंगे च यमुने चैव…’ मंत्र का जप करते हुए स्नान करने से पवित्रता बढ़ती है। घर के मंदिर में मां गंगा की प्रतिमा या गंगाजल से भरा कलश स्थापित करें। फल, फूल और मिठाई अर्पित कर श्रद्धापूर्वक पूजा करें। ‘गंगा चालीसा’ का पाठ करें और अंत में घी का दीपक जलाकर आरती करें। दान का विशेष महत्व इस दिन दान करना बेहद पुण्यदायी माना गया है। अपनी क्षमता अनुसार– अनाज वस्त्र जल जरूरतमंदों को दान करने से मां गंगा की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। मां गंगा के प्रभावशाली मंत्र पूजा के दौरान इन मंत्रों का जाप करने से मानसिक शांति और पापों से मुक्ति मिलती है– ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नमः गंगा पापं शशी तापं दैन्यं कल्पतरुस्तथा... गंगा सप्तमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और पुण्य कमाने का विशेष अवसर है। यदि आप श्रद्धा और विधि-विधान से पूजा करते हैं, तो घर बैठे भी गंगा स्नान का फल प्राप्त कर सकते हैं। इस दिन किया गया स्नान, जप और दान जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और शांति लेकर आता है।
बगलामुखी जयंती 2026: क्या है खास Baglamukhi Jayanti इस वर्ष 24 अप्रैल को मनाई जाएगी। यह पर्व वैशाख शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को आता है। मां बगलामुखी, दस महाविद्याओं में आठवीं शक्ति मानी जाती हैं और उन्हें ‘पीतांबरा’ के नाम से भी जाना जाता है। उनका स्वरूप बेहद अनोखा है–एक हाथ से वे शत्रु की जीभ पकड़ती हैं और दूसरे हाथ में गदा धारण करती हैं। पौराणिक कथा: जब दुनिया पर आया संकट पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सतयुग में एक भयंकर तूफान ने पूरे ब्रह्मांड को विनाश के कगार पर ला खड़ा किया। देवता भी इस संकट को रोकने में असमर्थ थे। तब Vishnu ने समाधान के लिए तपस्या की। इसी दौरान मदन नाम का एक असुर था, जिसे ‘वाक्-सिद्धि’ का वरदान मिला हुआ था। उसकी वाणी इतनी प्रभावशाली थी कि जो भी वह बोलता, वह सच हो जाता। धीरे-धीरे उसने इस शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और अपने शब्दों से विनाश फैलाने लगा। मां बगलामुखी का प्राकट्य भगवान विष्णु की तपस्या से प्रसन्न होकर हरिद्रा सरोवर से दिव्य शक्ति प्रकट हुई–वह थीं Baglamukhi। उनका स्वरूप पीले रंग से आभामय था, इसलिए उन्हें ‘पीतांबरा’ कहा जाता है। जीभ खींचने के पीछे का रहस्य जब मां बगलामुखी का सामना मदन असुर से हुआ, तो वह अपने अहंकार में अपशब्द और विनाशकारी मंत्र बोलने लगा। तभी मां ने अपनी ‘स्तंभन शक्ति’ का उपयोग किया और उसकी जीभ पकड़कर बाहर खींच ली। जैसे ही उसकी जीभ थमी, उसकी वाणी की शक्ति समाप्त हो गई। इस तरह उसकी सबसे बड़ी ताकत निष्क्रिय हो गई और उसका अंत संभव हो सका। क्या है इसका आध्यात्मिक संदेश? मां बगलामुखी द्वारा जीभ खींचने का अर्थ केवल शत्रु को हराना नहीं है, बल्कि यह एक गहरा आध्यात्मिक संकेत भी देता है– वाणी पर नियंत्रण: जीभ हमारे शब्दों और विचारों का प्रतीक है। झूठ और छल का अंत: मां शत्रु की नकारात्मक वाणी को रोकती हैं। आंतरिक शुद्धि: यह अहंकार, क्रोध और नकारात्मक भावनाओं पर नियंत्रण का संदेश देता है। स्तंभन शक्ति: जीवन में बुरी शक्तियों को रोकने और संतुलन बनाए रखने का प्रतीक। मां बगलामुखी का यह स्वरूप केवल भयावह नहीं, बल्कि अत्यंत गूढ़ और अर्थपूर्ण है। यह हमें सिखाता है कि सही समय पर वाणी और विचारों को नियंत्रित करना ही सबसे बड़ी शक्ति है। उनकी पूजा से न सिर्फ बाहरी शत्रुओं पर विजय मिलती है, बल्कि व्यक्ति अपने अंदर के नकारात्मक भावों पर भी काबू पा सकता है।
आज देशभर में Mahavir Jayanti श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। यह दिन जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर Mahavira के जन्मोत्सव के रूप में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम और मानवता के मूल्यों को भी दर्शाता है। भगवान महावीर के सिद्धांत: जीवन को दिशा देने वाले विचार भगवान महावीर ने अपने जीवन में जिन पांच मूल सिद्धांतों का पालन करने का संदेश दिया, उन्हें ‘पंच महाव्रत’ कहा जाता है। इनमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (संपत्ति का मोह त्यागना) शामिल हैं। ये सिद्धांत आज भी लोगों को नैतिक, शांतिपूर्ण और संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं, खासकर ऐसे समय में जब भौतिकवाद तेजी से बढ़ रहा है। देशभर में धार्मिक आयोजन और शोभायात्राएं महावीर जयंती के अवसर पर जैन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, ध्यान और प्रवचन आयोजित किए जाते हैं। श्रद्धालु भगवान महावीर की प्रतिमा को सुसज्जित रथ में विराजमान कर भव्य शोभायात्राएं निकालते हैं। प्रभात फेरियां, भक्ति गीत और धार्मिक कार्यक्रमों से वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक रंग में रंग जाता है। उपवास, दान और सेवा का महत्व इस दिन श्रद्धालु उपवास रखते हैं, जैन ग्रंथों का पाठ करते हैं और दान-पुण्य के कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। जरूरतमंदों की मदद, पशु-पक्षियों के प्रति करुणा और शाकाहार के प्रचार को विशेष महत्व दिया जाता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि सेवा और करुणा में भी निहित है। शांति और मानवता का संदेश महावीर जयंती केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि समाज को शांति, सहिष्णुता और आत्मअनुशासन का संदेश देने वाला पर्व है। भगवान महावीर के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने हजारों साल पहले थे।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।