बिहार, एजेंसियां। मुजफ्फरपुर गोलीकांड को लेकर बिहार की राजनीति गरमा गई है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव पीड़ित परिवार से मिलने मुजफ्फरपुर पहुंचे और इस घटना को राज्य की बिगड़ती कानून-व्यवस्था का बड़ा उदाहरण बताया। पटना से रवाना होने से पहले पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि बिहार में पुलिस “आउट ऑफ कंट्रोल” हो चुकी है और सरकार का प्रशासन पर से नियंत्रण खत्म होता दिख रहा है। निर्दोषों को निशाना बना रही पुलिस: तेजस्वी तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि बिहार में कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। उन्होंने कहा कि अब अपराधियों के बजाय निर्दोष लोग पुलिस कार्रवाई का शिकार हो रहे हैं। मुजफ्फरपुर की घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों पैदा हो रही है, जहां आम नागरिकों की सुरक्षा ही खतरे में पड़ जाए। ‘क्या नशे में था आरोपी पुलिसकर्मी?’ तेजस्वी ने कहा कि जिस थानेदार या दरोगा पर युवक को गोली मारने का आरोप है, उसके बारे में चर्चा है कि वह शराब के नशे में था। उन्होंने राज्य की शराबबंदी नीति पर तंज कसते हुए पूछा कि अगर बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू है, तो एक पुलिस अधिकारी नशे की हालत में कैसे पाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस मामले में वरिष्ठ अधिकारियों से बात कर आरोपी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करेंगे। महंगाई और एलपीजी संकट पर भी घेरा मुजफ्फरपुर रवाना होने से पहले तेजस्वी ने केंद्र और राज्य सरकार पर महंगाई, पेट्रोल-डीजल और एलपीजी संकट को लेकर भी हमला बोला। उन्होंने कहा कि गलत नीतियों की वजह से आम जनता परेशान है और आने वाले समय में हालात और बिगड़ सकते हैं। ‘यह सिर्फ मुलाकात नहीं, आंदोलन की शुरुआत’ तेजस्वी यादव ने कहा कि उनकी मुजफ्फरपुर यात्रा केवल पीड़ित परिवार से संवेदना जताने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकार के खिलाफ एक बड़े राजनीतिक और जन आंदोलन की शुरुआत भी है।
बिहार में हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव ने सियासी समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। पांच सीटों के लिए हुए इस चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने सभी सीटों पर कब्जा जमा लिया। जहां चार सीटों पर NDA की जीत पहले से तय मानी जा रही थी, वहीं पांचवीं सीट का विपक्ष के हाथ से निकलना कई सवाल खड़े कर गया। इस हार के पीछे कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के कुछ विधायकों की गैरमौजूदगी अहम कारण बनी। खासकर RJD विधायक फैसल रहमान का वोटिंग से दूर रहना पार्टी के लिए बड़ा झटका साबित हुआ। RJD विधायक की ‘चुप्पी वाली बगावत’ ने बढ़ाई परेशानी राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के तीन विधायकों ने मतदान नहीं किया, जिसकी आशंका पहले से जताई जा रही थी। लेकिन RJD के 25 में से एक विधायक फैसल रहमान का वोट न देना अप्रत्याशित रहा। पूर्वी चंपारण के ढाका सीट से विधायक रहमान मतदान के दिन अचानक गायब रहे। देर शाम तक उनका इंतजार होता रहा, लेकिन वे वोट देने नहीं पहुंचे। इस घटना ने पार्टी के भीतर अनुशासन और एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए। बीमारी का बहाना या सियासी रणनीति? फैसल रहमान ने बाद में सफाई देते हुए कहा कि उनकी मां दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती थीं, जिस कारण उन्हें अचानक जाना पड़ा। उन्होंने यह भी दावा किया कि वे पटना आए थे, लेकिन हालात बिगड़ने पर वापस लौट गए। हालांकि, उनकी इस सफाई पर विपक्षी दलों और खुद पार्टी के भीतर भी संदेह जताया जा रहा है। रहमान ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उन्हें खरीदने की किसी की हैसियत नहीं है। तेजस्वी यादव की बढ़ी मुश्किलें इस पूरे घटनाक्रम ने RJD नेता Tejashwi Yadav की स्थिति को असहज बना दिया है। पार्टी उम्मीदवार को वोट न मिलने से उनकी राजनीतिक साख पर असर पड़ा है। सामान्य परिस्थितियों में ऐसे मामले में पार्टी विधायक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर सकती थी, लेकिन इस बार मामला इतना आसान नहीं है। क्यों नहीं कर सकते कोई सख्त कार्रवाई? दरअसल, बिहार विधानसभा में RJD की संख्या बेहद सीमित है। कुल 243 सदस्यीय सदन में पार्टी के पास ठीक 25 विधायक हैं, जो विपक्ष के नेता का पद बनाए रखने के लिए न्यूनतम जरूरी संख्या (10%) है। यदि पार्टी का एक भी विधायक कम होता है, तो Tejashwi Yadav विपक्ष के नेता का दर्जा खो सकते हैं। ऐसे में फैसल रहमान के खिलाफ कार्रवाई करना खुद पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। राजनीतिक मजबूरी में फंसे तेजस्वी फैसल रहमान की गैरमौजूदगी ने RJD को नुकसान तो पहुंचाया, लेकिन अब वे पार्टी के लिए ऐसी ‘गले की हड्डी’ बन गए हैं, जिसे न हटाया जा सकता है और न नजरअंदाज किया जा सकता है। अगर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होती है, तो इसका सीधा असर पार्टी की विधानसभा में स्थिति पर पड़ेगा। यही वजह है कि तमाम नाराजगी के बावजूद नेतृत्व फिलहाल चुप्पी साधे हुए है।
पूर्व सांसद का बड़ा बयान-‘जनता खुश नहीं’, तेजस्वी पर भी साधा निशाना, युवा नेतृत्व की वकालत पटना: पटना समेत पूरे बिहार की राजनीति इन दिनों गरमा गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले ने सियासी हलचल तेज कर दी है। इस फैसले पर पूर्व सांसद आनंद मोहन ने खुलकर नाराजगी जताई है और इसे जनता की भावना के खिलाफ बताया है। ‘जनता खुश नहीं’, फैसले पर उठाए सवाल मीडिया से बातचीत में आनंद मोहन ने साफ कहा कि नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाना जनता को स्वीकार नहीं है। उनके अनुसार, जिस चेहरे पर चुनाव लड़ा गया, अचानक उसका बदल जाना लोगों को निराश कर सकता है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार का यह कदम बिहार की राजनीति में बड़ा असर डालेगा और आने वाले समय में इसके परिणाम देखने को मिलेंगे। मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर बढ़ी चर्चा आनंद मोहन ने यह भी कहा कि विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ा गया था, इसलिए स्वाभाविक रूप से आगे भी उसी आधार पर निर्णय होना चाहिए था। उनके अनुसार, मौजूदा हालात में राज्य की राजनीतिक दिशा बदलती नजर आ रही है। तेजस्वी यादव पर तंज राज्यसभा चुनाव को लेकर तेजस्वी यादव के ‘लोकतंत्र की हत्या’ वाले बयान पर भी आनंद मोहन ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि लगातार चुनावी हार के बाद तेजस्वी के पास अब कोई ठोस मुद्दा नहीं बचा है, इसलिए वे इस तरह के बयान दे रहे हैं। उन्होंने तेजस्वी को सलाह देते हुए कहा कि उन्हें विपक्ष की भूमिका जिम्मेदारी से निभानी चाहिए, क्योंकि जनता ने उन्हें यही जिम्मेदारी दी है। निशांत कुमार की एंट्री पर जताया भरोसा राजनीति में संभावित बदलाव का संकेत देते हुए आनंद मोहन ने निशांत कुमार के सक्रिय राजनीति में आने का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि बिहार को अब युवा नेतृत्व की जरूरत है और निशांत के आने से राजनीति को नई ऊर्जा और दिशा मिल सकती है। बदलाव के दौर में बिहार की सियासत आनंद मोहन के इस बयान को बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि निशांत कुमार राजनीति में सक्रिय होते हैं, तो राज्य की सियासी समीकरणों में बड़ा बदलाव संभव है। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले और उस पर उठ रहे सवालों के बीच बिहार की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है, जहां आने वाले समय में कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
पटना: बिहार में हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव के नतीजों के बाद सियासत गरमा गई है। राजद उम्मीदवार अमरेंद्र धारी सिंह की हार के बाद अब कांग्रेस के भीतर ही मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। वोटिंग से गैरहाजिर रहे तीन कांग्रेस विधायकों में से एक मनोज विश्वास ने मीडिया के सामने आकर बड़ा बयान दिया है। वोटिंग से दूरी पर कांग्रेस विधायक का बड़ा खुलासा 16 मार्च को हुई वोटिंग में कांग्रेस के तीन विधायक-मनिहारी से मनोहर सिंह, फारबिसगंज से मनोज विश्वास और वाल्मीकिनगर से सुरेंद्र कुशवाहा-ने मतदान नहीं किया था। अब मनोज विश्वास ने साफ कहा कि उम्मीदवार चयन में पार्टी के प्रदेश नेतृत्व की अनदेखी की गई, जिसके चलते यह स्थिति बनी। “नेतृत्व का सम्मान नहीं, तो वोट क्यों दें?” विधायक मनोज विश्वास ने आरोप लगाया कि उम्मीदवार चयन में न तो प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका रही और न ही स्थानीय नेताओं को विश्वास में लिया गया। उनका कहना था कि जब पार्टी के नेताओं को ही महत्व नहीं दिया गया, तो विधायकों को वोट देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अंतिम समय में उम्मीदवार बदलने पर नाराजगी उन्होंने दावा किया कि पहले किसी अन्य नाम पर चर्चा चल रही थी, लेकिन अंतिम समय में अचानक अमरेंद्र धारी सिंह को उम्मीदवार बना दिया गया, जिनका राजनीतिक अनुभव सीमित है। इस फैसले से कई विधायकों में असंतोष पैदा हुआ। प्रदेश अध्यक्ष पर ही उठाए सवाल अपने बयान में मनोज विश्वास ने सीधे तौर पर राजेश राम को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान पार्टी के शीर्ष नेताओं को पूरी तरह शामिल नहीं किया गया, जिससे कार्यकर्ताओं और विधायकों में भ्रम की स्थिति बनी रही। “हमें स्वतंत्र निर्णय लेने को कहा गया” विधायक ने यह भी कहा कि पार्टी नेतृत्व की ओर से स्पष्ट निर्देश नहीं मिला, बल्कि विधायकों को अपने विवेक से निर्णय लेने को कहा गया। ऐसे में उन्होंने मतदान से दूरी बनाई। राजद की हार के बाद बढ़ा राजनीतिक दबाव इस पूरे घटनाक्रम के बाद विपक्षी गठबंधन में दरार की चर्चाएं तेज हो गई हैं। तेजस्वी यादव की रणनीति पर भी सवाल उठ रहे हैं कि आखिर उम्मीदवार चयन और सहयोगी दलों के साथ समन्वय में कहां चूक हुई। दल के प्रति निष्ठा पर भी दी सफाई हालांकि, मनोज विश्वास ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने पार्टी के साथ कोई गलत नहीं किया है और आगे भी कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़े रहेंगे। उन्होंने कहा कि पार्टी हमेशा वंचित, अल्पसंख्यक और कमजोर वर्गों की आवाज उठाती रही है, लेकिन उम्मीदवार चयन में इन मूल्यों को नजरअंदाज किया गया। सियासी असर दूर तक संभव बिहार की राजनीति में यह बयान किसी ‘सियासी विस्फोट’ से कम नहीं माना जा रहा है। आने वाले दिनों में इसका असर गठबंधन की रणनीति और आंतरिक समीकरणों पर साफ दिखाई दे सकता है।
बिहार के राज्यसभा चुनाव में सियासी खेल आखिरी वक्त में पूरी तरह पलट गया। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के उम्मीदवार एडी सिंह को हार का सामना करना पड़ा, जबकि NDA ने अप्रत्याशित तरीके से बाजी अपने नाम कर ली। इस हार के पीछे पार्टी के भीतर की रणनीतिक कमजोरी और नेतृत्व की जल्दबाजी को बड़ा कारण माना जा रहा है। नतीजों से पहले ही साफ हो गई थी तस्वीर चुनाव के नतीजे आने से पहले ही यह लगभग तय हो गया था कि तेजस्वी यादव के इकलौते उम्मीदवार की राह मुश्किल हो चुकी है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, जिस तरह से विधायकों का समर्थन टूटता गया, उससे संकेत मिल गए थे कि परिणाम RJD के पक्ष में नहीं जाएगा। रणनीति में चूक और ‘जल्दबाजी’ बनी बड़ी वजह विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी यादव ने चुनाव प्रबंधन में वही गलती दोहराई, जो पहले भी उनके लिए भारी पड़ चुकी है। AIMIM विधायकों का समर्थन मिलने के बाद उन्होंने जीत लगभग तय मान ली थी, लेकिन अंतिम समय में समीकरण बदल गए। इससे पहले भी विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने समय से पहले सरकार बनाने का दावा कर दिया था, जो बाद में उनके खिलाफ गया। इस बार भी कुछ वैसी ही स्थिति देखने को मिली। विधायकों का ‘गच्चा’, RJD को नहीं था अंदाजा RJD को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब उसके अपने एक विधायक और कांग्रेस के तीन विधायकों ने साथ नहीं दिया। पार्टी को इस तरह की अंदरूनी टूट की उम्मीद नहीं थी, जिससे पूरा गणित बिगड़ गया। राजनीतिक गलियारों में इसे NDA की सटीक रणनीति और विपक्ष की कमजोर पकड़ के रूप में देखा जा रहा है। फैसल रहमान की भूमिका पर उठे सवाल ढाका से RJD विधायक फैसल रहमान का समर्थन न मिलना भी चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है। सवाल उठ रहा है कि खुद को मुस्लिम समुदाय का बड़ा चेहरा बताने वाले तेजस्वी यादव अपने ही विधायक को साथ रखने में क्यों असफल रहे। सूत्रों के अनुसार, फैसल रहमान की विधायकी को लेकर कानूनी चुनौती और कम अंतर से जीत जैसे कारण उनके फैसले को प्रभावित कर सकते हैं। कांग्रेस की अनुपस्थिति से बिगड़ा खेल इस चुनाव में कांग्रेस के कुछ विधायकों की गैरहाजिरी भी RJD के लिए भारी पड़ी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गठबंधन के भीतर तालमेल की कमी साफ दिखी, जिससे विपक्ष की पूरी रणनीति कमजोर पड़ गई। NDA की चाल के आगे RJD बेबस जहां RJD अपने समीकरण को लेकर आश्वस्त दिख रही थी, वहीं NDA ने आखिरी वक्त में ऐसी रणनीति अपनाई कि पूरा खेल बदल गया। इसे राजनीतिक ‘चेकमेट’ की तरह देखा जा रहा है, जहां विपक्ष को संभलने का मौका ही नहीं मिला। भविष्य की राजनीति पर असर यह हार सिर्फ एक सीट का नुकसान नहीं, बल्कि RJD की रणनीति और नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल खड़े करती है। आने वाले चुनावों में तेजस्वी यादव के लिए यह एक बड़ी सीख मानी जा रही है कि केवल समर्थन जुटाना ही नहीं, बल्कि उसे अंत तक बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
बिहार की सियासत में बढ़ी हलचल बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों के लिए आज मतदान होना है। वोटिंग से पहले रविवार को राजधानी पटना में राजनीतिक हलचल तेज रही। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपने-अपने विधायकों को एकजुट रखने और जीत सुनिश्चित करने के लिए देर रात तक रणनीति बनाई। सूत्रों के मुताबिक चार सीटों पर NDA उम्मीदवारों की जीत लगभग तय मानी जा रही है, जबकि पांचवीं सीट को लेकर मुकाबला अभी भी दिलचस्प बना हुआ है। इसी वजह से दोनों पक्षों ने रात करीब 11 बजे तक बैठकों का दौर जारी रखा। होटल में महागठबंधन की बैठक रविवार को पटना के एक होटल में विपक्षी गठबंधन की अहम बैठक हुई। इस बैठक की अगुवाई Tejashwi Yadav ने की। बैठक में महागठबंधन के नेताओं के साथ AIMIM और Bahujan Samaj Party के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। करीब तीन घंटे तक चली इस बैठक में राज्यसभा चुनाव को लेकर रणनीति पर चर्चा की गई। हालांकि बैठक के बाद तेजस्वी यादव ने मीडिया से बातचीत में चुनावी रणनीति पर ज्यादा कुछ नहीं कहा। AIMIM से समर्थन की कोशिश बताया जा रहा है कि पांचवीं सीट पर मुकाबला कड़ा होने के कारण महागठबंधन अन्य दलों का समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है। इसी क्रम में तेजस्वी यादव ने All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen (AIMIM) से भी समर्थन मांगा है। रविवार को AIMIM की ओर से आयोजित इफ्तार कार्यक्रम में तेजस्वी यादव पहुंचे थे, जहां उन्होंने पार्टी नेताओं से मुलाकात कर सहयोग की उम्मीद जताई। राजनीतिक गलियारों में AIMIM विधायकों के रुख को लेकर काफी चर्चा हो रही है। कांग्रेस का दावा – सभी विधायक साथ महागठबंधन की बैठक के बाद Akhilesh Singh ने कहा कि उनके सभी विधायक मौजूद हैं और कोई भी गायब नहीं है। उन्होंने दावा किया कि विपक्ष पूरी तरह एकजुट है और महागठबंधन के उम्मीदवार की जीत तय है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि NDA के कुछ विधायक संपर्क में नहीं हैं, जिससे सत्ता पक्ष की चिंता बढ़ गई है। NDA की भी देर रात तक बैठक दूसरी ओर सत्तारूढ़ गठबंधन ने भी देर रात तक रणनीति बैठक की। यह बैठक भाजपा नेता और राज्यसभा उम्मीदवार Nitin Nabin के आवास पर हुई। बैठक में Vijay Sharma, Nityanand Rai और बिहार के उपमुख्यमंत्री Samrat Choudhary समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। नेताओं ने विधायकों को एकजुट रखने और मतदान की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की। वोटिंग के बाद आएगा अंतिम फैसला अब सभी की नजरें आज होने वाली वोटिंग और उसके नतीजों पर टिकी हैं। खासकर पांचवीं सीट को लेकर राजनीतिक मुकाबला काफी दिलचस्प हो गया है। माना जा रहा है कि छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों की भूमिका इस सीट के परिणाम को प्रभावित कर सकती है।
कोर्ट के फैसले से NDA को मिली बड़ी राहत बिहार में होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। मोकामा से विधायक Anant Singh को पटना की विशेष अदालत ने 16 मार्च को होने वाले मतदान में हिस्सा लेने की अनुमति दे दी है। दुलारचंद यादव हत्या मामले में फिलहाल जेल में बंद अनंत सिंह पुलिस सुरक्षा में विधानसभा पहुंचकर वोट डाल सकेंगे। पटना की MP-MLA कोर्ट ने आदेश दिया है कि मतदान के बाद उन्हें तुरंत वापस जेल भेज दिया जाएगा। अदालत के इस फैसले से National Democratic Alliance (NDA) को बड़ी राजनीतिक राहत मिली है। बिहार में 16 मार्च को होगा मतदान बिहार से राज्यसभा की पांच सीटों के लिए 16 मार्च को मतदान होना है। इन सीटों को लेकर सत्तारूढ़ NDA और विपक्षी महागठबंधन के बीच कड़ी राजनीतिक टक्कर देखने को मिल रही है। मोकामा के विधायक अनंत सिंह Janata Dal (United) से जुड़े हैं और उनका वोट NDA के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। पांचवीं सीट के लिए कड़ा गणित बिहार विधानसभा में किसी भी उम्मीदवार को राज्यसभा पहुंचने के लिए कम से कम 41 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है। 243 सदस्यीय विधानसभा में NDA की चार सीटों पर जीत लगभग तय मानी जा रही है, लेकिन पांचवीं सीट के लिए उसे अतिरिक्त समर्थन जुटाना पड़ रहा है। NDA के पास फिलहाल 38 विधायकों का समर्थन है। ऐसे में अनंत सिंह का वोट गठबंधन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। यदि उन्हें मतदान की अनुमति नहीं मिलती, तो NDA को विपक्षी खेमे से ज्यादा क्रॉस वोटिंग की जरूरत पड़ती। पुलिस सुरक्षा में विधानसभा लाए जाएंगे अनंत सिंह अदालत के आदेश के अनुसार अनंत सिंह को Beur Central Jail से पुलिस सुरक्षा में बिहार विधानसभा लाया जाएगा। मतदान पूरा होने के बाद उन्हें वापस जेल भेज दिया जाएगा। राज्यसभा चुनाव में हर वोट की अहमियत को देखते हुए इस फैसले को राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। RJD ने भी उतारा उम्मीदवार इस चुनाव में विपक्षी खेमे की ओर से Tejashwi Yadav के नेतृत्व वाली Rashtriya Janata Dal ने भी उम्मीदवार उतारा है। इससे पांचवीं सीट की लड़ाई और दिलचस्प हो गई है। दोनों गठबंधन अपने-अपने विधायकों को एकजुट रखने और समर्थन सुनिश्चित करने में जुटे हुए हैं। पहले भी जेल से विधानसभा पहुंचे थे अनंत सिंह गौरतलब है कि अनंत सिंह फिलहाल दुलारचंद यादव हत्या मामले में जेल में बंद हैं। इससे पहले भी उन्हें बिहार विधानसभा के बजट सत्र के दौरान विधायक पद की शपथ लेने के लिए जेल से बाहर आने की अनुमति दी गई थी। मतदान के बाद साफ होगी तस्वीर 16 मार्च को होने वाले मतदान के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि NDA बिहार की सभी पांच राज्यसभा सीटों पर जीत दर्ज कर पाता है या फिर महागठबंधन पांचवीं सीट पर कब्जा जमाने में सफल होता है। फिलहाल अनंत सिंह को वोट देने की अनुमति मिलने से सियासी समीकरण जरूर बदल गए हैं।
बिहार में Rajya Sabha Election 2026 को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। सत्तारूढ़ National Democratic Alliance (NDA) और विपक्षी Mahagathbandhan दोनों ही खेमों में लगातार बैठकों का दौर जारी है। इसी कड़ी में पटना में 14 और 15 मार्च को NDA की महत्वपूर्ण रणनीतिक बैठकें होने जा रही हैं, जिनमें राज्यसभा की पांचों सीटों पर जीत का फॉर्मूला तय किया जाएगा। उपेंद्र कुशवाहा और विजय चौधरी के आवास पर बैठक जानकारी के मुताबिक 14 मार्च को बैठक Upendra Kushwaha के आवास पर होगी। कुशवाहा Rashtriya Lok Morcha के अध्यक्ष हैं और NDA के राज्यसभा उम्मीदवार भी हैं। इसके बाद 15 मार्च को अंतिम रणनीतिक बैठक Vijay Kumar Chaudhary के आवास पर होगी। इस बैठक में NDA के विधायक और विधान पार्षद शामिल होंगे और मतदान की रणनीति को अंतिम रूप दिया जाएगा। सभी जनप्रतिनिधियों से कहा गया है कि वे मतदान तक Patna में ही रहें। सम्राट चौधरी के आवास पर पहले ही हो चुकी है बैठक इससे पहले गुरुवार को Samrat Choudhary के आवास पर भी NDA नेताओं की बैठक हुई थी। इस बैठक में Sanjay Saraogi (भाजपा प्रदेश अध्यक्ष) Umesh Singh Kushwaha (जदयू प्रदेश अध्यक्ष) Sanjay Suman (हम नेता) Raju Tiwari (लोजपा-रामविलास प्रदेश अध्यक्ष) सहित कई नेता मौजूद रहे। बैठक में सर्वसम्मति से फैसला लिया गया कि सभी विधायक और पार्षद NDA के पांचों उम्मीदवारों को वोट देकर जीत दिलाएंगे। महागठबंधन भी बना रहा रणनीति दूसरी ओर विपक्षी महागठबंधन भी अपनी रणनीति को मजबूत करने में जुटा है। नेता प्रतिपक्ष Tejashwi Yadav अपने आवास पर सहयोगी दलों के नेताओं के साथ लगातार बैठक कर रहे हैं। हाल ही में Akhtarul Iman ने तेजस्वी यादव से मुलाकात की थी। मुलाकात के बाद उन्होंने बातचीत को सकारात्मक बताते हुए कहा कि अंतिम फैसला Asaduddin Owaisi लेंगे। जीत के लिए चाहिए 41 वोट राज्यसभा की पांचवीं सीट को लेकर मुकाबला दिलचस्प हो गया है। जीत के लिए 41 वोटों की जरूरत है। महागठबंधन के पास फिलहाल 35 विधायक हैं। उसे उम्मीद है कि All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen (AIMIM) के 5 और Bahujan Samaj Party के 1 विधायक का समर्थन मिलने पर उसके उम्मीदवार की जीत संभव हो सकती है।
बिहार में राज्यसभा की पांचवीं सीट को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही अपने-अपने समीकरण साधने में जुटे हुए हैं। इसी कड़ी में बुधवार को AIMIM विधायक दल के नेता अख्तरुल ईमान ने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव से मुलाकात की। मुलाकात के बाद उन्होंने बातचीत को सकारात्मक बताते हुए कहा कि अंतिम फैसला पार्टी प्रमुख असादुदीन ओवैसी के स्तर पर लिया जाएगा. वहीं दूसरी ओर गुरुवार को उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के आवास पर NDA विधायकों की अहम बैठक होने वाली है, जिसमें राज्यसभा की पांचवीं सीट को लेकर रणनीति तय किए जाने की संभावना है. 5वीं सीट पर दिलचस्प राजनीतिक गणित बिहार विधानसभा में राज्यसभा की इस सीट को जीतने के लिए 41 वोटों की जरूरत है। महागठबंधन के पास फिलहाल 35 विधायक हैं. ऐसे में उसे उम्मीद है कि AIMIM के 5 और BSP के 1 विधायक का समर्थन मिलने पर उसके उम्मीदवार की जीत का रास्ता साफ हो सकता है. इसी कारण इस सीट को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है और दोनों गठबंधन अपने-अपने विधायकों को साधने में लगे हुए हैं. तेजस्वी से मुलाकात के बाद ‘पॉजिटिव’ संकेत तेजस्वी यादव के बुलावे पर उनके आवास पहुंचे अख्तरुल ईमान ने कहा कि बातचीत सकारात्मक रही है। उन्होंने कहा कि बिहार में सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ एकजुट होना जरूरी है और इसी दिशा में बातचीत आगे बढ़ी है. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि समर्थन को लेकर अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व और असदुद्दीन ओवैसी के स्तर पर लिया जाएगा. इफ्तार डिप्लोमेसी से बढ़ेगी सियासी नजदीकी सियासी रिश्तों को मजबूत करने के लिए तेजस्वी यादव ने इफ्तार डिप्लोमेसी का सहारा लिया है। उन्होंने घोषणा की है कि वह 15 मार्च को अख्तरुल ईमान की इफ्तार पार्टी में शामिल होंगे। इसे AIMIM को साधने की बड़ी राजनीतिक कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. NDA की रणनीति पर टिकी नजर उधर NDA भी इस सीट को लेकर पूरी तरह सक्रिय है। उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के आवास पर होने वाली बैठक में सभी NDA विधायकों को बुलाया गया है। माना जा रहा है कि इस बैठक में पांचवीं सीट को लेकर अंतिम रणनीति तय की जाएगी. इस बीच RJD और महागठबंधन के नेताओं ने अपने उम्मीदवार की जीत का भरोसा जताया है, जिससे बिहार की राजनीति में इस सीट को लेकर मुकाबला और भी दिलचस्प हो गया है.
बिहार की राजनीति में मंगलवार से हलचल और तेज होने वाली है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज (10 मार्च) से अपनी बहुचर्चित ‘समृद्धि यात्रा’ की शुरुआत करने जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर राज्यसभा चुनाव को लेकर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव भी अपनी पार्टी के विधायकों के साथ अहम बैठक कर रणनीति तय करेंगे। सुपौल के निर्मली से शुरू होगी समृद्धि यात्रा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ‘समृद्धि यात्रा’ का आगाज सुपौल जिले के निर्मली से होगा। इस दौरान सीएम विभिन्न विकास परियोजनाओं का निरीक्षण करेंगे और अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक भी करेंगे। जानकारी के मुताबिक, मुख्यमंत्री निर्मली में बन रहे रिंग बांध का निरीक्षण करेंगे। इसके अलावा सरकारी योजनाओं से जुड़े स्टॉलों का अवलोकन भी करेंगे। कार्यक्रम के दौरान वे कई नई योजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन करने वाले हैं। जनसभा को भी करेंगे संबोधित यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री दोपहर में एक जनसभा को भी संबोधित करेंगे। इस मौके पर वे क्षेत्र के विकास कार्यों की समीक्षा करेंगे और अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश देंगे। माना जा रहा है कि इस यात्रा के जरिए सरकार जमीनी स्तर पर चल रहे विकास कार्यों का आकलन करना चाहती है। राज्यसभा चुनाव को लेकर तेजस्वी की बैठक उधर, राज्यसभा चुनाव को लेकर भी राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। राज्यसभा की पांचवीं सीट को लेकर सियासी समीकरण बन रहे हैं। इसी को देखते हुए नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव आज अपनी पार्टी के विधायकों के साथ बैठक करेंगे। बताया जा रहा है कि इस बैठक में चुनावी रणनीति, वोट मैनेजमेंट और आगे की राजनीतिक योजना पर चर्चा की जाएगी। जनता से संवाद की तैयारी सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा जाने का फैसला कर चुके हैं। ऐसे में बिहार की सक्रिय राजनीति से दूरी बनाने से पहले वे ‘समृद्धि यात्रा’ के जरिए एक बार फिर जनता से सीधा संवाद स्थापित करना चाहते हैं। इस यात्रा के दौरान वे राज्य के विभिन्न जिलों का दौरा कर विकास योजनाओं की प्रगति का जायजा लेंगे और स्थानीय लोगों की समस्याओं को भी सुनेंगे।
बिहार की राजनीति इन दिनों तेजी से बदलते घटनाक्रमों के कारण सुर्खियों में है। एक ओर जहां मुख्यमंत्री Nitish Kumar के बेटे Nishant Kumar ने औपचारिक रूप से Janata Dal (United) में शामिल होकर सक्रिय राजनीति में कदम रखा है, वहीं दूसरी ओर नेता प्रतिपक्ष Tejashwi Yadav ने बदलते राजनीतिक माहौल के बीच Rashtriya Janata Dal और महागठबंधन के नेताओं की एक महत्वपूर्ण बैठक बुला ली है। यह बैठक 10 मार्च को दोपहर 2 बजे पटना स्थित तेजस्वी यादव के सरकारी आवास 1 पोलो रोड पर आयोजित की जाएगी। सूत्रों के अनुसार इस बैठक में महागठबंधन के सभी विधायक (MLA) और विधान पार्षद (MLC) को शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है। माना जा रहा है कि बैठक में आगामी राज्यसभा चुनाव, बिहार के बदलते राजनीतिक समीकरण और हाल के सियासी घटनाक्रमों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। दरअसल, पिछले कुछ दिनों में बिहार की राजनीति में कई बड़े संकेत देखने को मिले हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के संभावित रूप से राज्यसभा जाने की चर्चाओं ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। ऐसे में यह सवाल भी उठने लगा है कि अगर ऐसा होता है तो राज्य की सत्ता में अगला नेतृत्व किसके हाथ में होगा। इसी बीच निशांत कुमार की जेडीयू में एंट्री ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि निशांत कुमार का सक्रिय राजनीति में आना जेडीयू के भीतर संभावित पीढ़ीगत बदलाव का संकेत माना जा रहा है। पटना स्थित पार्टी कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम के दौरान निशांत कुमार ने पार्टी की सदस्यता ग्रहण की और इसे उनके राजनीतिक करियर की औपचारिक शुरुआत माना जा रहा है। इधर विपक्ष भी इन घटनाक्रमों को देखते हुए अपनी रणनीति को मजबूत करने में जुट गया है। तेजस्वी यादव द्वारा बुलाई गई महागठबंधन की बैठक को इसी संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बैठक में इस बात पर भी विचार किया जा सकता है कि राज्यसभा चुनाव के दौरान गठबंधन के वोटों को किस तरह संगठित रखा जाए और विपक्ष किस रणनीति के साथ चुनाव मैदान में उतरे। इसके अलावा मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में विपक्ष की भूमिका, गठबंधन की एकजुटता और आगे के राजनीतिक कार्यक्रमों पर भी चर्चा होने की संभावना है। महागठबंधन के नेताओं के बीच यह भी मंथन हो सकता है कि बदलते राजनीतिक माहौल में जनता के मुद्दों को किस तरह मजबूती से उठाया जाए। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बिहार में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही आगामी राजनीतिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए अपनी-अपनी रणनीति तय कर रहे हैं। एक तरफ जेडीयू में निशांत कुमार की एंट्री से नई राजनीतिक संभावनाएं बनती दिख रही हैं, तो दूसरी तरफ विपक्ष भी खुद को संगठित कर आगामी चुनावी मुकाबलों की तैयारी में जुट गया है। ऐसे में तेजस्वी यादव द्वारा बुलाई गई यह बैठक बिहार की राजनीति में आगे की दिशा तय करने के लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि इस बैठक से क्या राजनीतिक संकेत निकलते हैं और राज्यसभा चुनाव के साथ-साथ आने वाले दिनों में बिहार की सियासत किस दिशा में आगे बढ़ती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।