कोलकाता, एजेंसियां। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) में जारी राजनीतिक घमासान के बीच मंगलवार को एक नया मोड़ सामने आया। फर्जी हस्ताक्षर विवाद की जांच के सिलसिले में CID की टीम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पहुंची। हालांकि, पार्टी नेताओं ने अभिषेक बनर्जी की गैरमौजूदगी का हवाला देते हुए जांच टीम को परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी। CID अधिकारियों के साथ कालीघाट थाना पुलिस और बड़ी संख्या में महिला पुलिसकर्मी भी मौजूद थीं। जांच एजेंसी उन आरोपों की पड़ताल कर रही है, जिनमें दावा किया गया है कि TMC विधायक दल से जुड़े एक प्रस्ताव पर फर्जी हस्ताक्षर किए गए थे। क्या है पूरा विवाद? बागी विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि नेता विपक्ष बनाए जाने से संबंधित प्रस्ताव पर उनके हस्ताक्षर फर्जी तरीके से किए गए। आरोप सीधे अभिषेक बनर्जी के लेटरहेड से जुड़े दस्तावेजों पर लगाए गए हैं। इसी मामले की जांच के तहत CID लगातार सबूत जुटा रही है। पार्टी में बढ़ी अंदरूनी खींचतान इस विवाद ने TMC के भीतर चल रही गुटबाजी को भी उजागर कर दिया है। शिकायत करने वाले विधायकों ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निष्कासित किया जा चुका है। वहीं, ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाए जाने के फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है, जिसकी सुनवाई जल्द होने वाली है। राजनीतिक असर पर नजर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल फर्जी हस्ताक्षर तक सीमित नहीं है, बल्कि TMC के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर चल रही खींचतान का संकेत भी देता है। अब सबकी नजर CID जांच और अदालत की आगामी सुनवाई पर टिकी हुई है, जो इस मामले की दिशा तय कर सकती है।
नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में एक बार फिर अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आती दिखाई दे रही है। पार्टी की वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया है कि टीएमसी के 20 लोकसभा सांसदों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देने का फैसला किया है। इस दावे के बाद पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। काकोली घोष दस्तीदार ने सोमवार को कहा कि इस संबंध में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक पत्र भी सौंपा गया है। उन्होंने दावा किया कि यह निर्णय कई सांसदों के बीच विस्तृत चर्चा और सहमति के बाद लिया गया है। उन्होंने कहा, “हमने लोकसभा अध्यक्ष को अपने निर्णय से अवगत करा दिया है। यह फैसला सांसदों के बीच विचार-विमर्श के बाद लिया गया है।” दावे से बढ़ी राजनीतिक हलचल काकोली घोष दस्तीदार के अनुसार, इस फैसले के समर्थन में करीब 20 सांसद हैं। टीएमसी के लोकसभा में कुल 28 सांसद हैं, ऐसे में यह दावा पार्टी के भीतर संभावित बड़े बदलाव की ओर संकेत करता है। लोकसभा सचिवालय की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। ऐसे में दावे की वास्तविक स्थिति को लेकर राजनीतिक हलकों में उत्सुकता बनी हुई है। पार्टी नेतृत्व की चुप्पी ने बढ़ाई अटकलें काकोली घोष दस्तीदार के बयान के बाद भी तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी तथा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेतृत्व की चुप्पी ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अटकलों को और बढ़ा दिया है। पहले भी सामने आ चुके हैं असंतोष के संकेत पिछले कुछ समय से तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष और मतभेदों की खबरें सामने आती रही हैं। कई नेताओं द्वारा संगठनात्मक मुद्दों और नेतृत्व शैली को लेकर अलग-अलग मंचों पर अपनी राय रखी गई थी। ऐसे में काकोली घोष दस्तीदार का यह दावा पार्टी के भीतर चल रही हलचलों को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है। विपक्षी राजनीति पर पड़ सकता है असर यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ व्यापक राजनीतिक एकजुटता बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यदि टीएमसी के भीतर बड़े स्तर पर कोई राजनीतिक पुनर्संरचना होती है, तो इसका असर राष्ट्रीय राजनीति और विपक्षी गठबंधन की रणनीतियों पर भी पड़ सकता है। फिलहाल सभी की निगाहें तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व और लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय की ओर हैं, जहां से इस पूरे मामले पर आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की अंदरूनी खींचतान अब अदालत तक पहुंच गई है। पार्टी ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर कर विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें बागी नेता रीतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी गई थी। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति कृष्णा राव की अदालत में होगी। कोर्ट ने इस याचिका को प्राथमिकता के आधार पर सूचीबद्ध करते हुए 11 जून को विस्तृत सुनवाई की तारीख तय की है। विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर कानूनी आपत्ति टीएमसी की ओर से दायर याचिका में विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय को चुनौती दी गई है। पार्टी का तर्क है कि नेता प्रतिपक्ष की मान्यता से जुड़ा फैसला पार्टी की आधिकारिक स्थिति और संगठनात्मक निर्णयों के अनुरूप नहीं है। याचिका में विधानसभा अध्यक्ष को मुख्य प्रतिवादी बनाया गया है। पार्टी का कहना है कि अध्यक्ष के फैसले के कारण विधानसभा के भीतर संवैधानिक और राजनीतिक विवाद पैदा हुआ है। बागी गुट के समर्थन से बढ़ा विवाद विवाद की जड़ टीएमसी विधायकों के भीतर उभरा मतभेद है। विधानसभा चुनाव 2026 के बाद विपक्ष की भूमिका में पहुंची टीएमसी के 80 विधायकों में से बड़ी संख्या ने कथित तौर पर रीतब्रत बनर्जी के समर्थन में रुख अपनाया। इसी समर्थन के आधार पर विधानसभा अध्यक्ष ने रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता प्रदान की थी। पार्टी नेतृत्व इस फैसले को चुनौती दे रहा है और आधिकारिक उम्मीदवार के पक्ष में अपनी दलील रख रहा है। नेता प्रतिपक्ष पद को लेकर बढ़ी राजनीतिक लड़ाई टीएमसी नेतृत्व का दावा है कि पार्टी के संगठनात्मक निर्णयों की अनदेखी कर नेता प्रतिपक्ष के चयन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। वहीं बागी गुट का तर्क है कि उन्हें पर्याप्त विधायकों का समर्थन प्राप्त है और इसी आधार पर उन्हें मान्यता मिली है। इस विवाद ने विधानसभा के भीतर विपक्ष की भूमिका और टीएमसी के आंतरिक नेतृत्व को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विधानसभा में बदला राजनीतिक समीकरण 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर सरकार बनाई, जबकि टीएमसी मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी। चुनाव परिणामों के बाद पार्टी के भीतर उभरे मतभेदों ने उसके सामने नई राजनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। अब सभी की निगाहें 11 जून को होने वाली हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत का फैसला न केवल नेता प्रतिपक्ष के पद की वैधता तय करेगा, बल्कि राज्य की विपक्षी राजनीति और टीएमसी के आंतरिक शक्ति संतुलन पर भी असर डाल सकता है।
कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस (TMC) में कथित अंदरूनी असंतोष और कुछ सांसदों के रुख को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इसी बीच कृष्णानगर से सांसद महुआ मोइत्रा ने पार्टी के कुछ नेताओं और सांसदों पर तीखा हमला बोलते हुए उनकी निष्ठा पर सवाल उठाए हैं। लोकसभा में टीएमसी के कुछ सांसदों द्वारा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के प्रति समर्थन जताने संबंधी चर्चाओं और राजनीतिक अटकलों के बीच महुआ मोइत्रा खुलकर पार्टी नेतृत्व के पक्ष में सामने आई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ सांसद जनता के जनादेश के विपरीत राजनीतिक रुख अपना रहे हैं। यूसुफ पठान पर सीधे सवाल महुआ मोइत्रा ने पूर्व भारतीय क्रिकेटर और बहरमपुर से टीएमसी सांसद यूसुफ पठान का नाम लेते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सवाल उठाए। उन्होंने लिखा कि यदि राजनीतिक दबाव या किसी केंद्रीय नेता के बुलावे पर सांसद अपना रुख बदलते हैं, तो यह मतदाताओं के विश्वास के साथ न्याय नहीं होगा। उन्होंने कहा कि यूसुफ पठान को जनता ने भारी समर्थन देकर संसद भेजा है और उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के भरोसे का सम्मान करना चाहिए। बागी सांसदों को दी खुली चुनौती महुआ मोइत्रा ने कथित रूप से पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाने वाले सांसदों को चुनौती देते हुए कहा कि यदि वे वास्तव में अपने नए राजनीतिक निर्णय को लेकर आश्वस्त हैं, तो उन्हें सांसद पद से इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव मैदान में उतरना चाहिए। उन्होंने कहा कि सांसदों को यह साबित करना चाहिए कि उन्हें व्यक्तिगत लोकप्रियता के आधार पर समर्थन प्राप्त है या फिर वे केवल पार्टी और ममता बनर्जी की राजनीतिक छवि के कारण चुनाव जीतकर आए थे। NDA समर्थन को लेकर बढ़ी सियासी हलचल राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि लोकसभा में टीएमसी के कुछ सांसदों ने NDA के प्रति नरम रुख अपनाया है। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसके बावजूद पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेदों को लेकर चर्चाएं तेज हैं। महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया कि जनता ने टीएमसी उम्मीदवारों को भाजपा या NDA के समर्थन के लिए नहीं चुना था और जनादेश का सम्मान किया जाना चाहिए। चीफ व्हिप पद को लेकर भी विवाद इस राजनीतिक विवाद के बीच लोकसभा में टीएमसी के मुख्य सचेतक (Chief Whip) पद को लेकर भी नया विवाद सामने आया है। काकोली घोष दस्तीदार ने खुद को पार्टी का चीफ व्हिप बताते हुए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपा है। दूसरी ओर टीएमसी नेता कीर्ति आजाद का दावा है कि पार्टी नेतृत्व पहले ही काकोली घोष दस्तीदार को इस पद से हटाकर कल्याण बनर्जी को नई जिम्मेदारी सौंप चुका है। पार्टी के भीतर चल रही इस खींचतान ने टीएमसी की आंतरिक स्थिति को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व की ओर से उठाए जाने वाले कदमों पर सभी की नजर बनी हुई है।
स्पीकर को लेटर लिखा, CM शुभेंदु और बंगाल प्रभारी से मिले, राज्यसभा सांसद का भी इस्तीफा कोलकाता, एजेंसियां। विधायकों के बाद अब तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने भी ममता का साथ छोड़ दिया है। न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, लोकसभा के 28 सांसदों में से 20 ने एनडीए सरकार को समर्थन देने का फैसला किया है। सांसद और TMC की पूर्व नेता काकोली ने भी सोमवार को यही दावा किया। उन्होंने बताया कि 20 सांसदों ने NDA को समर्थन देने का फैसला किया है। इस बारे में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र भी भेज दिया गया है। 11 सांसदों ने मीटिंग की इनमें से 11 सांसदों ने सोमवार दोपहर केंद्रीय मंत्री और BJP के बंगाल प्रभारी भूपेंद्र यादव के घर पर मीटिंग की। इस दौरान सुबह TMC के राज्यसभा सांसद पद से इस्तीफा दे चुके सुखेंदु शेखर रे भी मौजूद रहे। बंगाल CM शुभेंदु अधिकारी भी इनसे मिलने पहुंचे। बैठक में ये रहे शामिल बैठक में लोकसभा सांसद काकोली घोष, शताब्दी रॉय, अबू ताहिर, अरूप चक्रवर्ती, खलीलुर रहमान, शर्मिला सरकार, असित मल, कालीपद सोरेन, जगदीश बसुनिया और प्रसून बनर्जी मौजूद रहे। लोकसभा में TMC के अभी 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं। इससे पहले 3 जून को बंगाल के 80 में से 58 विधायक अलग गुट बना चुके हैं। इस गुट ने ऋतब्रत को अपना नेता बनाया है। बैठक की तस्वीर वायरल न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, टीएमसी के 20 सांसदों की रविवार देर रात दिल्ली के एक अज्ञात स्थान पर अनौपचारिक बैठक भी हुई। इसमें सांसदों ने मौजूदा नेतृत्व व्यवस्था को लेकर असंतोष जताया। सोमवार को इस बैठक की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर सामने आई। कई TMC सांसद एक मेज के आसपास बैठे दिखाई दे रहे हैं। उस समय एक सांसद के फोटो खींचने पर विवाद भी हुआ। सूत्रों का दावा है कि तस्वीर में जितने सांसद दिख रहे हैं, वास्तविक संख्या उससे कहीं अधिक थी। सुखेंदु का दावा- TMC के लोग ममता से नाराज TMC के वरिष्ठ नेता सुखेंदु शेखर ने आज सुबह ही राज्यसभा सांसद पद से इस्तीफा दे दिया और पार्टी भी छोड़ दी। त्यागपत्र में उन्होंने ममता के 15 साल के अराजक शासन को पार्टी की हार का नतीजा बताया और भाजपा की तारीफ की थी। राज्यसभा के चेयरमैन सीपी राधाकृष्णन ने सुखेंदु शेखर का इस्तीफा मंजूर कर लिया है। सुखेंदु ने इस्तीफे के बाद मीडिया से कहा था ममता मनमाने ढंग से पार्टी चला रही थीं, इसी वजह से उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उनका कार्यकाल 2029 तक था। अब सीट खाली हो चुकी है, अब इस पर उपचुनाव कराया जा सकता है। बागी विधायक ऋतब्रत ने सुखेंदु का किया समर्थन सुखेंदु शेखर के इस्तीफे पर बंगाल में TMC के बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि यह सिर्फ सुखेंदु की निजी बात नहीं है। मैंने सुखेंदु से सीधे बात नहीं की है, लेकिन टीवी पर उनके बयान देखे और सुने हैं। मैं उनकी बातों से सहमत हूं। राज्यसभा के कामकाज को लेकर सुखेंदु की बात काफी हद तक सही है। संसद कोई क्विज खेलने की जगह नहीं है। टीमएसी पहुंची हाईकोर्ट उधर, टीएमसी ने बागी नेता रीताब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष (LoP) बनाए जाने के विधानसभा स्पीकर के फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी है। कोर्ट ने तारीख तय नहीं की है। लोकसभा सांसद काकोली घोष भी पार्टी से इस्तीफा दे चुकी काकोली घोष ने दावा किया कि वह अभी भी लोकसभा में पार्टी की मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) हैं। उन्होंने कहा कि यह फैसला साथी सांसदों के साथ विचार-विमर्श के बाद लिया गया है। उन्होंने कहा कि सांसदों ने NDA के साथ जाने का फैसला किया है। उनका मानना है कि यही जनता के जनादेश के अनुरूप है। काकोली ने 27 मई को टीएमसी छोड़ दी है, लेकिन सांसद पद से इस्तीफा नहीं दिया था। प्रदेश अध्यक्ष सुब्रत बख्शी को भेजे लेटर में काकोली ने लिखा था कि मानसिक संघर्ष और लंबे चिंतन के बाद यह फैसला लिया है। 28 साल पुरानी TMC में बगावत तृणमूल कांग्रेस (TMC) में 28 साल के इतिहास में पहली बार औपचारिक तौर पर टूट सामने आई है। बुधवार को 58 बागी विधायकों ने पार्टी से निकाले गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना। विधानसभा स्पीकर रथींद्र बोस को समर्थन पत्र दिया। इसमें मांग की गई कि ऋतब्रत को नेता विपक्ष घोषित किया जाए। स्पीकर ने मंजूरी दे दी।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में जारी राजनीतिक हलचल अब राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचती दिखाई दे रही है. पार्टी के भीतर संभावित बगावत और सांसदों के अलग गुट बनाने की अटकलों के बीच दलबदल-रोधी कानून (Anti-Defection Law) एक बड़ी कानूनी बाधा बनकर सामने आया है. पार्टी नेतृत्व और संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि संसद में अलग समूह बनाने की चर्चा जितनी आसान दिखाई दे रही है, व्यवहार में उतनी ही जटिल और कानूनी चुनौतियों से भरी हुई है. ऐसे किसी भी कदम के लिए सांसदों को कड़े संवैधानिक प्रावधानों का सामना करना पड़ेगा. सांसदों के बीच बढ़ी हलचल टीएमसी के पूर्व नेता रीतब्रत बनर्जी के दावों के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि पार्टी के कुछ सांसद अलग राजनीतिक रास्ता तलाश सकते हैं. सूत्रों के मुताबिक, असंतुष्ट सांसदों के बीच समर्थन जुटाने को लेकर बातचीत भी चल रही है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि संसद में अलग गुट बनाने का कोई सीधा संवैधानिक प्रावधान मौजूद नहीं है और ऐसे प्रयासों को कानूनी रूप से चुनौती दी जा सकती है. दो-तिहाई समर्थन के बिना संभव नहीं टूट दलबदल-रोधी कानून के तहत किसी भी संसदीय दल में वैध विभाजन या विलय के लिए कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है. वर्तमान में लोकसभा में टीएमसी के 28 सांसद हैं. ऐसे में यदि कोई समूह पार्टी से अलग होना चाहता है, तो उसे कम से कम 19 सांसदों का समर्थन जुटाना होगा. इसके बिना अलग होने वाले सांसदों की सदस्यता खतरे में पड़ सकती है. अलग गुट नहीं, केवल विलय का विकल्प कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, दो-तिहाई सांसदों का समर्थन मिलने के बाद भी अलग संसदीय समूह बनाना आसान नहीं होगा. संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत ऐसे सांसदों को किसी अन्य मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में विलय करना होगा. केवल अलग गुट बनाकर स्वतंत्र रूप से काम करने का विकल्प कानून में उपलब्ध नहीं है. संसदीय नेता बदलने का अधिकार किसके पास? राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि असंतुष्ट सांसद लोकसभा अध्यक्ष के माध्यम से संसदीय दल के नेतृत्व में बदलाव की कोशिश कर सकते हैं. पार्टी सूत्रों का कहना है कि संसदीय दल का नेता चुनने का अधिकार मूल राजनीतिक दल के पास होता है. इसलिए टीएमसी संसदीय दल के नेतृत्व में किसी भी बदलाव का अंतिम फैसला पार्टी अध्यक्ष के स्तर पर ही संभव है. INDIA गठबंधन की बैठक से पहले बढ़ी सियासी चर्चा टीएमसी नेताओं का आरोप है कि संभावित टूट की खबरों को ऐसे समय में हवा दी जा रही है, जब विपक्षी गठबंधन INDIA की महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है. पार्टी का मानना है कि इन अटकलों का उद्देश्य विपक्षी एकजुटता से ध्यान हटाना और राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनाना है. दो मॉडल पर हो रही चर्चा राजनीतिक विश्लेषकों के बीच फिलहाल दो संभावित परिदृश्यों पर चर्चा हो रही है. पहला, पश्चिम बंगाल विधानसभा में हाल में हुई राजनीतिक टूट जैसा मॉडल, जहां विधायकों के एक वर्ग ने नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोला था. दूसरा, आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं द्वारा अपनाया गया मॉडल, जिसमें संवैधानिक प्रावधानों का पालन करते हुए राजनीतिक पुनर्संरेखण किया गया था. कानूनी और राजनीतिक तैयारी में जुटी टीएमसी पार्टी नेतृत्व का कहना है कि संसद के आगामी सत्र से पहले किसी भी संभावित बगावत को रोकने के लिए राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर रणनीति तैयार की जा रही है. टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि दलबदल-रोधी कानून के कारण किसी भी असंतुष्ट समूह के लिए पार्टी से अलग होकर स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाना आसान नहीं होगा. ऐसे में आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर की राजनीतिक गतिविधियों पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी.
चेन्नई: तमिलनाडु भाजपा में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई के इस्तीफे के बाद पार्टी में असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। शुक्रवार को भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष कारू नागराजन और राज्य सचिव सुमति वेंकटेश ने भी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। दोनों नेताओं के फैसले ने राज्य इकाई में राजनीतिक हलचल और बढ़ा दी है। अन्नामलाई के नए अभियान के साथ जुड़े कारू नागराजन भाजपा छोड़ने के बाद कारू नागराजन ने स्पष्ट किया कि वह अन्नामलाई के नए राजनीतिक अभियान का समर्थन करेंगे। उन्होंने कहा कि अपने समर्थकों के साथ विचार-विमर्श के बाद उन्होंने यह निर्णय लिया है। मीडिया से बातचीत में नागराजन ने कहा कि उनका उद्देश्य किसी नेता या पार्टी की आलोचना करना नहीं है, बल्कि वे अन्नामलाई की कार्यशैली और नेतृत्व क्षमता से प्रभावित हैं। उनके अनुसार, अन्नामलाई एक ऊर्जावान और जनसरोकारों से जुड़े नेता हैं, जिनके साथ मिलकर वे काम करना चाहते हैं। प्रदेश सचिव सुमति वेंकटेश ने भी दिया इस्तीफा अन्नामलाई के इस्तीफे के कुछ ही समय बाद तमिलनाडु भाजपा की प्रदेश सचिव सुमति वेंकटेश ने भी पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपना इस्तीफा साझा करते हुए प्राथमिक सदस्यता समाप्त करने की जानकारी दी। उनके इस्तीफे को भी राज्य भाजपा में बढ़ते असंतोष और अन्नामलाई के प्रति समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। युवा मोर्चा के नेता ने भी छोड़ा साथ भाजपा युवा मोर्चा की तमिलनाडु इकाई के कानूनी संयोजक अभिलाष गोपीनाथ ने भी पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। अपने त्यागपत्र में उन्होंने कहा कि अन्नामलाई के नेतृत्व, ईमानदारी और सार्वजनिक जीवन के प्रति समर्पण ने उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया था। उन्होंने कहा कि भविष्य में भी वे अन्नामलाई के राजनीतिक विजन और विचारों का समर्थन करते रहेंगे। नई राजनीति का दावा कर रहे हैं अन्नामलाई पूर्व आईपीएस अधिकारी अन्नामलाई ने भाजपा छोड़ने के बाद एक नए राजनीतिक आंदोलन की घोषणा की है। उनका कहना है कि यह पहल व्यक्ति-पूजा, चाटुकारिता और वंशवादी राजनीति से अलग आम लोगों की राजनीति को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू की जा रही है। सोशल मीडिया पर जारी संदेश में उन्होंने कहा कि उनका आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष के इर्द-गिर्द नहीं, बल्कि विचार और सामाजिक परिवर्तन पर आधारित होगा। उन्होंने अपने अभियान का मूल मंत्र “मारुवोम, मातृवोम” (खुद को बदलें, बदलाव लाएं) बताया। किसी दल से टकराव नहीं, वैकल्पिक राजनीति पर जोर अन्नामलाई ने स्पष्ट किया है कि उनका नया राजनीतिक अभियान किसी मौजूदा राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सभी दलों को अपने विचार रखने का अधिकार है और उनका उद्देश्य केवल जनता के सामने एक वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है। उन्होंने कहा कि उचित समय आने पर आंदोलन की नीतियों और कार्यक्रमों की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक की जाएगी। वेबसाइट लॉन्च होते ही हजारों समर्थक जुड़े अपने नए राजनीतिक अभियान को संगठित करने के लिए अन्नामलाई ने एक विशेष वेबसाइट भी लॉन्च की है। उनके अनुसार, वेबसाइट शुरू होने के कुछ ही घंटों के भीतर लगभग 8.9 लाख लोगों ने स्वयंसेवक के रूप में पंजीकरण कराया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा से लगातार हो रहे इस्तीफे और अन्नामलाई के नए अभियान को मिल रहा शुरुआती समर्थन तमिलनाडु की राजनीति में नए समीकरणों का संकेत हो सकता है।
कोलकाता, एजेंसियां। एनआईए की टीम ने बड़ी कार्रवाई करते हुए बम विस्फोट मामले में फरार चल रहे टीएमसी के पूर्व विधायक को गिरफ्तार कर लिया है। एनआईए की टीम ने पश्चिम बंगाल के चर्चित भांगड़ बम विस्फोट मामले में यह कार्रवाई की है। जांच एजेंसी ने मामले के मुख्य संदिग्ध और फरार चल रहे पूर्व विधायक शौकत मोल्ला को दक्षिण 24 परगना जिले से गिरफ्तार किया है। चुनाव से पहले बम बनाते समय हुआ था धमाका एनआईए की जांच के मुताबिक, यह मामला पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले का है। जब अवैध रूप से क्रूड बम (कच्चा बम) बनाने के दौरान एक जोरदार विस्फोट हुआ था। इस धमाके में बम बनाने वाले एक शख्स की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। साजिश रचने और सबूत मिटाने का आरोप शौकत मोल्ला इस पूरे मामले में चौथे आरोपी हैं, जिन्हें गिरफ्तार किया गया है। एनआईए की तफ्तीश में यह बात सामने आई है कि पूर्व विधायक ही इस पूरी साजिश के मुख्य सूत्रधार थे। उन्होंने ही अन्य आरोपियों को बम बनाने के निर्देश दिए थे। यही नहीं, विस्फोट होने के बाद कानून के शिकंजे से बचने के लिए मोल्ला ने आरोपियों को घटनास्थल से सबूत मिटाने और दृश्य के साथ छेड़छाड़ करने का भी आदेश दिया था।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रहे उथल-पुथल भरे दौर के बीच प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को शिक्षक भर्ती मामले में नया नोटिस जारी किया है। बुधवार को ईडी की एक टीम केंद्रीय सुरक्षा बलों के साथ कोलकाता के कालीघाट स्थित उनके आवास पहुंची और कानूनी प्रक्रिया पूरी की। इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीतिक हलचल को और तेज कर दिया है। सुरक्षा व्यवस्था के बीच हुई कार्रवाई जांच एजेंसी के पहुंचने के बाद इलाके में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई। केंद्रीय बलों की मौजूदगी के बीच आवास के आसपास निगरानी रखी गई और स्थिति पर नजर बनाए रखी गई। घटना की जानकारी मिलते ही पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं की आवाजाही भी बढ़ गई। भर्ती मामले की जांच में नए पहलुओं की तलाश ईडी लंबे समय से कथित शिक्षक भर्ती अनियमितताओं से जुड़े वित्तीय पहलुओं की जांच कर रही है। एजेंसी विभिन्न दस्तावेजों, बैंकिंग रिकॉर्ड और डिजिटल साक्ष्यों की समीक्षा कर रही है ताकि मामले से जुड़े आर्थिक लेन-देन की पूरी तस्वीर सामने लाई जा सके। जांच के दौरान कई व्यक्तियों और संस्थाओं की भूमिका भी जांच के दायरे में है। कारोबारी संस्थाओं और वित्तीय नेटवर्क पर नजर सूत्रों के अनुसार, जांच एजेंसियां उन कंपनियों और वित्तीय लेन-देन की भी पड़ताल कर रही हैं जिनका नाम जांच के दौरान सामने आया है। उद्देश्य यह समझना है कि कथित तौर पर धन का प्रवाह किस प्रकार हुआ और उससे जुड़े नेटवर्क कैसे काम कर रहे थे। इसी क्रम में कुछ अतिरिक्त जानकारियां जुटाने के लिए नोटिस जारी किए जा रहे हैं। राजनीतिक संकट के बीच नई चुनौती यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब तृणमूल कांग्रेस पहले से ही संगठनात्मक चुनौतियों और आंतरिक मतभेदों से जूझ रही है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों ने पार्टी के भीतर चर्चा और गतिविधियों को बढ़ा दिया है। ऐसे माहौल में ईडी की यह कार्रवाई राजनीतिक महत्व भी रखती है। आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज जांच एजेंसी की कार्रवाई के बाद राज्य में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। विपक्ष इसे जांच प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा बता रहा है, जबकि तृणमूल कांग्रेस के नेता केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका को लेकर सवाल उठा रहे हैं। इस मुद्दे पर आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है। आगे की कार्रवाई पर टिकी निगाहें अब सभी की नजर इस बात पर है कि जांच एजेंसी की अगली कार्रवाई क्या होगी और पूछताछ या जांच के अगले चरण में कौन-से नए तथ्य सामने आते हैं। शिक्षक भर्ती मामला पहले से ही पश्चिम बंगाल के सबसे चर्चित मामलों में शामिल है और ताजा घटनाक्रम ने इसे एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर लंबे समय से चल रहा असंतोष अब खुलकर सामने आ गया है। पार्टी के 58 विधायकों ने अलग रुख अपनाते हुए रीतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुन लिया है। इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। बागी विधायकों ने पेश किया समर्थन का दावा रीतब्रत बनर्जी और उनके समर्थक विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष अपने समर्थन से जुड़े दस्तावेज जमा किए। बागी खेमे का दावा है कि उनके पास पर्याप्त संख्या बल है और वे विधायक दल के भीतर अपनी वैध स्थिति स्थापित करने में सफल रहे हैं। उनका कहना है कि अधिकांश विधायक उनके साथ हैं और वे विधानसभा में अपनी अलग पहचान के साथ काम करेंगे। नई नेतृत्व टीम की घोषणा बागी गुट ने केवल नेता का चयन ही नहीं किया, बल्कि विधायक दल के लिए नई जिम्मेदारियों का भी ऐलान किया। रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की भूमिका दी गई, जबकि अन्य वरिष्ठ नेताओं को उपनेता और मुख्य सचेतक जैसी जिम्मेदारियां सौंपी गईं। इस कदम को संगठन के भीतर समानांतर नेतृत्व खड़ा करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। कई वरिष्ठ नेता भी आए साथ इस पूरे घटनाक्रम में पार्टी के कई अनुभवी और वरिष्ठ विधायकों के नाम भी सामने आए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बड़े नेताओं की मौजूदगी ने इस बगावत को और अधिक गंभीर बना दिया है। यही वजह है कि इसे केवल सामान्य गुटबाजी नहीं बल्कि संगठन के भीतर बड़े राजनीतिक पुनर्संतुलन के रूप में देखा जा रहा है। ममता के नेतृत्व पर भरोसा, अभिषेक पर सवाल बागी विधायकों ने अपने रुख में स्पष्ट किया है कि वे ममता बनर्जी को पार्टी का सर्वोच्च नेता मानते हैं। विधायक दल के कामकाज में अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर उन्होंने असहमति जताई है। उनका कहना है कि संगठनात्मक फैसलों और विधायक दल की गतिविधियों को लेकर नई व्यवस्था की जरूरत है। पार्टी नेतृत्व ने उठाए कड़े कदम घटनाक्रम के बाद पार्टी नेतृत्व ने पूरे राज्य में संगठनात्मक ढांचे की समीक्षा शुरू कर दी है। विभिन्न समितियों और इकाइयों के पुनर्गठन की प्रक्रिया भी शुरू की गई है। पार्टी का मानना है कि मौजूदा हालात से निपटने के लिए संगठन को नए सिरे से मजबूत करने की जरूरत है। वैधता को लेकर शुरू हुई बहस बागी गुट और आधिकारिक नेतृत्व के बीच सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर है कि विधायक दल से जुड़े फैसले लेने का अधिकार किसके पास है। दोनों पक्ष अपने-अपने दावों को सही ठहरा रहे हैं। इसी वजह से यह मामला केवल राजनीतिक मतभेद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि संगठनात्मक अधिकार और नेतृत्व की वैधता का सवाल भी बन गया है। पुराने विवादों से जुड़ रहे हैं तार जानकारों का मानना है कि यह संकट अचानक पैदा नहीं हुआ। पिछले कुछ समय से विधायक दल के नेतृत्व और संगठनात्मक फैसलों को लेकर असंतोष की खबरें सामने आ रही थीं। अब यह असंतोष खुली राजनीतिक चुनौती में बदलता दिखाई दे रहा है, जिससे पार्टी के भविष्य और नेतृत्व संरचना को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं। बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह घटनाक्रम पश्चिम बंगाल की राजनीति में महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि संगठनात्मक स्तर पर कौन-सा पक्ष अधिक समर्थन जुटा पाता है और पार्टी के भीतर चल रहा यह संघर्ष किस दिशा में आगे बढ़ता है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी उठापटक के बीच तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोमवार को फेसबुक लाइव के जरिए भाजपा और राज्य प्रशासन पर तीखा हमला बोला। पार्टी के कुछ विधायकों के दल बदलने और संगठन में बढ़ती हलचल के बीच ममता ने दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस को तोड़ने की कोशिश की जा रही है, लेकिन यह प्रयास सफल नहीं होगा। अपने संबोधन में ममता बनर्जी ने कहा कि केंद्रीय एजेंसियों, धनबल और प्रशासनिक दबाव के सहारे उनकी पार्टी को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने विरोधियों को चेतावनी देते हुए कहा, "अगर कोई यह खेल खेल रहा है तो उसे बता दूं कि मैं भी बड़ी खिलाड़ी हूं। समय आने पर इसका जवाब जरूर दूंगी।" विधायकों को धमकाने का आरोप ममता बनर्जी ने दावा किया कि उनकी पार्टी के चार विधायकों ने उनसे शिकायत की है कि कुछ पुलिस अधिकारी उन्हें पार्टी की बैठकों में शामिल न होने की चेतावनी दे रहे हैं। उनके अनुसार, विधायकों को कहा गया है कि यदि वे कालीघाट या तृणमूल कांग्रेस की संगठनात्मक बैठकों में हिस्सा लेते हैं तो उनके खिलाफ आर्म्स एक्ट या मादक पदार्थों से जुड़े मामलों में कार्रवाई की जा सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ अधिकारी विधायकों को भाजपा नेताओं के संपर्क में आने की सलाह भी दे रहे हैं। हालांकि इन आरोपों पर सरकार या पुलिस की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पार्टी छोड़ने वालों पर साधा निशाना हाल में पार्टी से निष्कासित नेताओं का नाम लिए बिना ममता बनर्जी ने कहा कि कुछ लोगों की कोई विचारधारा नहीं होती और वे केवल अपने स्वार्थ के लिए राजनीति करते हैं। उन्होंने ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाने पर खेद जताया और जनता से माफी भी मांगी। उन्होंने कहा कि राजनीति में अवसर देने के बावजूद कुछ लोगों ने पार्टी के साथ विश्वासघात किया, जिसका उन्हें अफसोस रहेगा। कार्यकर्ताओं के भरोसे संगठन मजबूत करने का दावा ममता बनर्जी ने कहा कि कुछ नेता दबाव या लालच में आकर पार्टी छोड़ सकते हैं, लेकिन तृणमूल कांग्रेस की असली ताकत उसके जमीनी कार्यकर्ता हैं। उन्होंने दावा किया कि पार्टी का संगठन कार्यकर्ताओं की बदौलत मजबूत बना रहेगा। उन्होंने बताया कि वह स्वयं संगठनात्मक गतिविधियों की निगरानी कर रही हैं और कार्यकर्ताओं की समस्याओं को सीधे सुन रही हैं। जरूरत पड़ने पर पार्टी की ओर से कानूनी सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी। धरने से पहले बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी ममता बनर्जी का यह बयान ऐसे समय आया है जब तृणमूल कांग्रेस 2 जून को कोलकाता में बड़े विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फेसबुक लाइव के जरिए ममता ने अपने समर्थकों को संदेश देने के साथ-साथ भाजपा सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि इन आरोपों पर राज्य सरकार और भाजपा की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है और आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सोनारपुर में हुई हिंसक घटना ने तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना केवल एक सुरक्षा चुनौती नहीं, बल्कि उनके नेतृत्व, जनसंपर्क क्षमता और राजनीतिक परिपक्वता की भी महत्वपूर्ण परीक्षा है। पहली बार खुले जन-विरोध का सामना अब तक अभिषेक बनर्जी की राजनीतिक यात्रा संगठनात्मक मजबूती और सत्ता के प्रभावशाली ढांचे के भीतर आगे बढ़ी है। सोनारपुर में उनके काफिले पर हुए हमले और विरोध प्रदर्शन ने उन्हें पहली बार सीधे सार्वजनिक आक्रोश के सामने ला खड़ा किया है। इस घटना ने राज्य की राजनीति में बढ़ते असंतोष और जनभावनाओं को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। ममता बनर्जी के संघर्षपूर्ण राजनीतिक सफर से तुलना राजनीतिक पर्यवेक्षक इस घटना की तुलना मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के शुरुआती राजनीतिक जीवन से कर रहे हैं। ममता बनर्जी ने विपक्षी राजनीति के दौर में कई आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और हमलों का सामना किया था और अक्सर ऐसे घटनाक्रमों को जनसमर्थन में बदलने में सफल रही थीं। विश्लेषकों का मानना है कि सोनारपुर की घटना अभिषेक बनर्जी के लिए भी वैसा ही निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है। अब यह देखना होगा कि वे इस चुनौती का राजनीतिक रूप से किस प्रकार सामना करते हैं। पुराने संकेतों की याद राजनीतिक विश्लेषक 2023 के कुर्मी आंदोलन का भी उल्लेख कर रहे हैं, जब झाड़ग्राम में आंदोलनकारियों ने अभिषेक बनर्जी के काफिले का विरोध किया था। बाद में कुर्मी बहुल इलाकों में चुनावी परिणामों ने यह संकेत दिया कि स्थानीय असंतोष को नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है। सोनारपुर की घटना को भी कई विशेषज्ञ इसी व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं। विशेषज्ञों की राय पूर्व सांसद जवाहर सरकार का कहना है कि यह अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक जीवन की एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। उनके अनुसार, जिन परिस्थितियों और चुनौतियों का सामना ममता बनर्जी दशकों से करती रही हैं, अभिषेक अब पहली बार उस राजनीतिक वास्तविकता से रूबरू हो रहे हैं। वहीं राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर मैदुल इस्लाम का मानना है कि किसी भी नेता की वास्तविक राजनीतिक पहचान केवल विरासत से नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में उसके व्यवहार और जनता से जुड़ाव से तय होती है। उनके अनुसार, यदि अभिषेक विरोध के बावजूद लोगों के बीच सक्रिय बने रहते हैं, तो यह उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को नई मजबूती दे सकता है। आगे की राह सोनारपुर की घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि तृणमूल कांग्रेस और स्वयं अभिषेक बनर्जी इस घटनाक्रम को किस तरह संभालते हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनकी प्रतिक्रिया और जनता के साथ संवाद की रणनीति ही तय करेगी कि यह घटना उनके लिए नुकसानदेह साबित होगी या फिर एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत बनेगी। फिलहाल इतना तय है कि सोनारपुर की घटना ने अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को नए सिरे से परखने का अवसर और चुनौती दोनों पैदा कर दी है। आने वाले महीनों में इसका प्रभाव पश्चिम बंगाल की राजनीति पर भी देखने को मिल सकता है।
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद राज्य सरकार ने अवैध घुसपैठ के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्य के सभी 23 जिलों में होल्डिंग सेंटर्स बनाने की प्रक्रिया तेज कर दी है। सरकार का कहना है कि इन केंद्रों का उद्देश्य संदिग्ध घुसपैठियों और नागरिकता जांच के दायरे में आये लोगों को अस्थायी रूप से रखना है, ताकि दस्तावेजों का सत्यापन पूरा किया जा सके। जेल नहीं, ‘सुविधा केंद्र’ के तौर पर तैयार किये गये सेंटर राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि होल्डिंग सेंटर्स जेल नहीं हैं। इन्हें ट्रांजिट सुविधा केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां रहने वाले लोगों को भोजन, साफ बिस्तर और चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करायी जायेंगी। सरकार के मुताबिक, इन केंद्रों में किसी भी व्यक्ति को अधिकतम 30 दिनों तक रखा जा सकेगा। इस दौरान उनकी पहचान और दस्तावेजों की जांच की जायेगी। सुरक्षा व्यवस्था के लिए सीसीटीवी कैमरे, पुलिस बल और सिविल डिफेंस कर्मियों की तैनाती की गयी है। मालदा और मुर्शिदाबाद में शुरू हुआ ऑपरेशन सीमावर्ती जिलों में इन केंद्रों ने काम करना भी शुरू कर दिया है। मालदा जिले के इंग्लिश बाजार स्थित एक सरकारी प्रशिक्षण केंद्र की एक मंजिल को होल्डिंग सेंटर में बदला गया है। यहां हाल ही में पकड़े गये 9 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों को रखा गया है। वहीं मुर्शिदाबाद के लालगोला स्थित ‘पद्म भवन’ में दूसरा केंद्र सक्रिय किया गया है। यहां जाली दस्तावेजों के साथ पकड़े गये लोगों को शिफ्ट किया गया है। अधिकारियों के अनुसार, केंद्र में प्रवेश से पहले सभी लोगों का मेडिकल परीक्षण कराया जा रहा है ताकि संक्रमण या बीमारी के खतरे को रोका जा सके। क्या है ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति? राज्य सरकार ने अवैध घुसपैठ के खिलाफ अपनी रणनीति को ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नाम दिया है। डिटेक्ट (Detect) : संदिग्ध घुसपैठियों और फर्जी दस्तावेज रखने वालों की पहचान करना। डिलीट (Delete) : अवैध रूप से वोटर लिस्ट या सरकारी रिकॉर्ड में शामिल लोगों के नाम हटाना। डिपोर्ट (Deport) : दस्तावेज सत्यापन के बाद संबंधित व्यक्तियों को बीएसएफ को सौंपना, ताकि उन्हें उनके देश वापस भेजा जा सके। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा है कि उनकी सरकार घुसपैठ के मामले में ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर काम कर रही है। CAA के तहत अल्पसंख्यकों को राहत सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि 31 दिसंबर 2014 से पहले पड़ोसी देशों से भारत आये हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध और ईसाई शरणार्थियों को घबराने की जरूरत नहीं है। ऐसे लोगों को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के तहत सुरक्षा प्रदान की जायेगी। विपक्ष ने उठाये सवाल जहां बीजेपी सरकार इस अभियान को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कदम बता रही है, वहीं विपक्षी दल टीएमसी ने प्रक्रिया को लेकर चिंता जतायी है। टीएमसी का कहना है कि कार्रवाई के दौरान किसी भी भारतीय नागरिक को परेशान नहीं किया जाना चाहिए। सरकार का दावा है कि यह पूरी प्रक्रिया गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार चलायी जा रही है और इसका उद्देश्य केवल अवैध घुसपैठ पर रोक लगाना है।
Mamata Banerjee और Abhishek Banerjee ने सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे डिजिटल आंदोलन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) को समर्थन देकर सियासी हलचल बढ़ा दी है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में करारी हार के बाद All India Trinamool Congress अब युवाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की नई रणनीति पर काम करती दिख रही है। डेरेक ओब्रायन ने की पुष्टि टीएमसी के राज्यसभा सांसद Derek O'Brien ने सोमवार को कहा कि पार्टी नेतृत्व युवाओं के इस डिजिटल आंदोलन के साथ खड़ा है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, बंगाल चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी युवाओं और सोशल मीडिया की नई राजनीति को गंभीरता से लेने लगी हैं। क्या है ‘कॉकरोच जनता पार्टी’? ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ कोई पारंपरिक राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि एक डिजिटल व्यंग्य आंदोलन है, जिसने सोशल मीडिया पर तेजी से लोकप्रियता हासिल की है। इसकी शुरुआत बोस्टन यूनिवर्सिटी के छात्र Abhijeet Dipke ने की थी। यह आंदोलन कथित तौर पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की एक टिप्पणी के बाद चर्चा में आया, जिसमें ‘कॉकरोच’ शब्द को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। बाद में युवाओं ने इसे बेरोजगारी, परीक्षा घोटालों और सिस्टम के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध में बदल दिया। NEET पेपर लीक के बाद बढ़ी लोकप्रियता CJP ने हाल ही में NEET-UG 2026 पेपर लीक मुद्दे को जोर-शोर से उठाया, जिसके बाद यह मेडिकल छात्रों और युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो गया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर इसके फॉलोअर्स तेजी से बढ़े हैं। बताया जा रहा है कि टीएमसी इस डिजिटल पहुंच का फायदा उठाकर केंद्र सरकार को बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर घेरना चाहती है। सरकार पर अकाउंट ब्लॉक करने का आरोप CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने दावा किया है कि उनके आंदोलन को दबाने की कोशिश की जा रही है। उनके अनुसार, संगठन के आधिकारिक एक्स और इंस्टाग्राम अकाउंट को हैक या ब्लॉक किया गया। वहीं केंद्रीय मंत्री Kiren Rijiju ने बिना नाम लिये इस तरह के आंदोलनों को “विदेशी एजेंडा” और “जॉर्ज सोरोस गैंग” से प्रेरित बताया। हालांकि CJP की ओर से दावा किया गया कि उनके 94 प्रतिशत फॉलोअर्स भारतीय हैं। डिजिटल राजनीति की ओर बढ़ रही TMC राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी अब पारंपरिक राजनीति के साथ-साथ मीम कल्चर, डिजिटल कैंपेन और सोशल मीडिया आधारित आंदोलनों को भी अपनी रणनीति का हिस्सा बना रही है। बीजेपी जहां इसे विपक्ष की नई साजिश बता रही है, वहीं युवाओं के बीच ममता बनर्जी का यह “प्रो-यूथ” रुख चर्चा का विषय बन गया है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। 2026 विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद Mamata Banerjee अब विपक्षी INDIA गठबंधन को फिर से सक्रिय करने की कोशिश में जुट गई हैं। खबर है कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने विपक्षी दलों की एक अहम बैठक बुलाने की पहल की है, जिससे राष्ट्रीय राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। भवानीपुर में हार ने बढ़ाई मुश्किल करीब 15 साल तक West Bengal की सत्ता पर काबिज रहीं ममता बनर्जी इस बार न सिर्फ सरकार गंवा बैठीं, बल्कि अपने पारंपरिक गढ़ भवानीपुर सीट से भी चुनाव हार गईं। उन्हें बीजेपी नेता Suvendu Adhikari ने मात दी। 2021 में 215 सीटें जीतने वाली टीएमसी 2026 में महज 80 सीटों तक सिमट गई। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इस हार के बाद ममता अब राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए विपक्षी दलों से रिश्ते सुधारना चाहती हैं। कांग्रेस ने क्या कहा? पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस के महासचिव Ashutosh Chatterjee ने कहा कि INDIA गठबंधन को लेकर कोई भी अंतिम फैसला All India Congress Committee यानी AICC लेगी। उन्होंने साफ कहा कि प्रदेश स्तर पर निर्णय कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष शुभंकर सरकार की राय से होगा। हालांकि उन्होंने ममता बनर्जी पर तीखा हमला भी बोला। चटर्जी ने आरोप लगाया कि टीएमसी शासन के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं की हत्या हुई, उन्हें झूठे मामलों में फंसाया गया और पंचायत चुनावों में हिंसा हुई। उन्होंने कहा कि विपक्षी एकता की बात करने से पहले ममता बनर्जी को इन सवालों का जवाब देना होगा। INDIA गठबंधन में बढ़ी उलझन ममता बनर्जी की बैठक की अपील के बावजूद गठबंधन के भीतर तालमेल की कमी साफ दिखाई दे रही है। कांग्रेस और Samajwadi Party दोनों ने फिलहाल इस बैठक की जानकारी से इनकार किया है। सूत्रों के मुताबिक, अगर ममता सीधे Akhilesh Yadav से बात करती हैं, तभी जून में बैठक संभव हो सकती है। उधर, चुनाव के दौरान Rahul Gandhi ने ममता पर तीखे हमले किए थे, लेकिन हार के बाद उन्होंने चुनाव नतीजों को बीजेपी और चुनाव आयोग की “वोट चोरी” से जोड़ते हुए ममता के प्रति नरम रुख दिखाया। DMK की नाराजगी ने बढ़ाई टेंशन INDIA गठबंधन के सामने सिर्फ बंगाल की चुनौती नहीं है। दक्षिण भारत से भी गठबंधन के लिए परेशान करने वाली खबर आई है। तमिलनाडु में Dravida Munnetra Kazhagam यानी DMK कांग्रेस से नाराज बताई जा रही है। वजह यह है कि कांग्रेस ने अभिनेता विजय की पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam को समर्थन दिया है। इसके बाद DMK ने संसद में कांग्रेस से अलग बैठने की मांग तक कर दी है। अब सवाल उठ रहा है कि क्या DMK आगे भी INDIA गठबंधन का हिस्सा बनी रहेगी? बीजेपी का डर या विपक्षी मजबूरी? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्षी दलों के बीच भले ही मतभेद बढ़ रहे हों, लेकिन बीजेपी के खिलाफ एकजुट रहने की मजबूरी उन्हें साथ बनाए हुए है। ममता बनर्जी भी इसी रणनीति पर आगे बढ़ती दिख रही हैं। बंगाल में सत्ता गंवाने के बाद अब उनके लिए संसद और राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत उपस्थिति बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसे में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का समर्थन उनके लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
चुनाव बाद हिंसा से जुड़ी याचिका पर खुद करेंगी पैरवी पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख Mamata Banerjee गुरुवार को वकील की पोशाक पहनकर Calcutta High Court पहुंचीं। बताया जा रहा है कि वह विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा से जुड़े एक जनहित याचिका (PIL) मामले में खुद अदालत के सामने दलीलें पेश करेंगी। सूत्रों के मुताबिक यह मामला मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल की बेंच में सूचीबद्ध है, जहां ममता बनर्जी कार्यवाही और जांच से जुड़े कई पहलुओं पर सवाल उठा सकती हैं। अदालत परिसर में उन्हें वकीलों के पारंपरिक काले चोगे में देखा गया, जिसके बाद यह मामला राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बन गया। पहले भी सुप्रीम कोर्ट में पेश कर चुकी हैं दलील यह पहला मौका नहीं है जब ममता बनर्जी अदालत में वकील की भूमिका में नजर आई हों। इससे पहले वह एसआईआर मुद्दे को लेकर Supreme Court of India में भी बतौर अधिवक्ता अपना पक्ष रख चुकी हैं। जानकारी के अनुसार, यह याचिका टीएमसी नेता और वरिष्ठ वकील Kalyan Banerjee के बेटे शीर्षान्या बंदोपाध्याय की ओर से दाखिल की गई थी। ममता बनर्जी ने वर्ष 1982 में जोगेश चंद्र कॉलेज ऑफ लॉ से कानून की पढ़ाई पूरी की थी। बंगाल चुनाव के बाद बढ़ा राजनीतिक तनाव गौरतलब है कि हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। चुनाव में बीजेपी ने 207 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि टीएमसी 80 सीटों तक सिमट गई। इसके बाद राज्य की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया। ममता बनर्जी लगातार आरोप लगाती रही हैं कि बीजेपी ने चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी कर करीब 100 सीटें “छीन” लीं। वहीं, बीजेपी नेता Suvendu Adhikari ने 9 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों से पहले राज्य की राजनीति अपने चरम पर है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी चौथी बार सत्ता में वापसी कर पाएंगी या इस बार बदलाव की हवा ‘नबान्न’ तक पहुंच जाएगी। करीब 15 वर्षों से सत्ता में काबिज तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सामने इस बार बहुस्तरीय चुनौतियां खड़ी हैं, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं। 1. भ्रष्टाचार के आरोप: छवि पर गहरा असर इस चुनाव में टीएमसी सरकार के खिलाफ सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार रहा है। शिक्षक भर्ती घोटाला राशन घोटाला कोयला तस्करी मामला इन मामलों में पार्टी के कई बड़े नेताओं की गिरफ्तारी और प्रवर्तन निदेशालय (ED) व केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की लगातार कार्रवाई ने सरकार की साख को चोट पहुंचाई है। विपक्ष ने इसे “सिस्टमेटिक करप्शन” बताकर जनता के बीच मजबूत नैरेटिव बनाया है। ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। 2. महिला सुरक्षा और संदेशखाली जैसे विवाद महिला वोट बैंक टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत रहा है, लेकिन हालिया घटनाओं ने इस आधार को कमजोर करने की कोशिश की है। संदेशखाली विवाद आरजी कर मेडिकल कॉलेज से जुड़े आरोप इन घटनाओं ने कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाकर टीएमसी पर तीखा हमला बोला है। 3. एंटी-इन्कम्बेंसी: 15 साल की सत्ता का असर लगातार तीन कार्यकाल तक सत्ता में रहने के बाद एंटी-इन्कम्बेंसी का असर साफ दिखाई दे रहा है। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की दबंगई के आरोप ‘सिंडिकेट राज’ की शिकायतें स्थानीय प्रशासन पर भ्रष्टाचार के आरोप हालांकि, राज्य सरकार की योजनाएं–जैसे महिला और गरीब वर्ग के लिए आर्थिक सहायता–अब भी लोकप्रिय हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर असंतोष चुनावी समीकरण बदल सकता है। 4. भाजपा का उभार और बदला राजनीतिक संतुलन पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का तेजी से उभार टीएमसी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। 2011 में मामूली मौजूदगी 2021 में 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्ष बूथ स्तर तक मजबूत संगठन उत्तर बंगाल, जंगलमहल और सीमावर्ती क्षेत्रों में भाजपा की पकड़ मजबूत हुई है। धार्मिक ध्रुवीकरण और हिंदुत्व की राजनीति ने पारंपरिक वोट बैंक को प्रभावित किया है, जिससे मुकाबला और कड़ा हो गया है। 5. युवाओं की नाराजगी और रोजगार संकट भर्ती घोटालों और सीमित रोजगार अवसरों ने युवाओं में निराशा पैदा की है। सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता पर सवाल निजी क्षेत्र में सीमित अवसर औद्योगिक विकास की धीमी रफ्तार हालांकि ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाएं गरीब और महिला मतदाताओं को जोड़ने में सफल रही हैं, लेकिन शिक्षित युवा वर्ग बदलाव की तलाश में नजर आ रहा है। ममता बनर्जी का ‘फाइटर’ फैक्टर इन तमाम चुनौतियों के बावजूद ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत उनकी व्यक्तिगत छवि और जमीनी पकड़ है। संघर्षशील नेता की पहचान सीधे जनता से संवाद कल्याणकारी योजनाओं का व्यापक असर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी आखिरी समय में चुनावी बाजी पलटने की क्षमता रखती हैं। 4 मई का फैसला तय करेगा भविष्य अब नजरें 4 मई पर टिकी हैं, जब चुनावी नतीजे सामने आएंगे। क्या ‘दीदी’ एक बार फिर सत्ता बचा लेंगी? या बंगाल में सत्ता परिवर्तन का नया अध्याय शुरू होगा?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के तहत शनिवार को राज्य के 15 बूथों पर पुनर्मतदान (री-पोल) कराया जा रहा है। इनमें डायमंड हार्बर के 4 और मगरहाट पश्चिम के 11 बूथ शामिल हैं। मतदान सुबह 7 बजे शुरू हुआ और शाम 6 बजे तक जारी रहेगा। EVM खराबी का आरोप, वोटर्स परेशान डायमंड हार्बर के रॉयनगर प्राइमरी स्कूल स्थित बूथ नंबर 243 पर मतदाताओं ने EVM में खराबी की शिकायत की। एक वोटर ने कहा कि मशीन ठीक से काम नहीं कर रही लोगों को आधे घंटे से ज्यादा समय तक लाइन में इंतजार करना पड़ा तकनीकी टीम को मौके पर बुलाया गया हालांकि प्रशासन की ओर से स्थिति को जल्द सामान्य करने का दावा किया गया है। क्यों कराना पड़ा री-पोल? दरअसल, 29 अप्रैल को दूसरे चरण की वोटिंग के दौरान इन बूथों पर: EVM से छेड़छाड़ के आरोप राजनीतिक दलों के बीच झड़प मतदान प्रक्रिया में बाधा जैसी शिकायतें सामने आई थीं। इन घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए भारतीय निर्वाचन आयोग ने दोबारा मतदान कराने का फैसला लिया। दक्षिण 24 परगना के सभी बूथ प्रभावित ये सभी 15 बूथ दक्षिण 24 परगना जिले में स्थित हैं, जिसे चुनाव के लिहाज से संवेदनशील इलाका माना जाता है। यहां सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं और केंद्रीय बलों की तैनाती भी की गई है, ताकि मतदान शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो सके। रिकॉर्ड मतदान ने बढ़ाई सियासी हलचल इस बार पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड स्तर पर मतदान हुआ है: पहले चरण (23 अप्रैल): 93.19% वोटिंग दूसरे चरण (29 अप्रैल): 92.48% वोटिंग कुल 294 सीटों पर औसत मतदान: 92.84% इतने बड़े मतदान प्रतिशत ने राजनीतिक दलों के बीच मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। TMC का BJP पर आरोप री-पोल के बीच शशि पांजा ने बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि BJP ने जानबूझकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की ज्यादा जगहों पर री-पोल कराकर बंगाल की छवि खराब करने की साजिश रची गई TMC ने उकसावे के बावजूद संयम बनाए रखा पांजा ने यह भी दावा किया कि बीजेपी चुनावी तौर पर कमजोर स्थिति में है, इसलिए इस तरह की रणनीति अपना रही है। 4 मई को आएंगे नतीजे पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे। इससे पहले री-पोल और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सियासी माहौल काफी गर्म है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों से ठीक पहले सियासी घमासान अब अदालत तक पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए भारत का सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इस मामले पर शनिवार को विशेष सुनवाई होनी है, जिससे 4 मई को होने वाली मतगणना से पहले सस्पेंस और बढ़ गया है। क्या है पूरा विवाद? विवाद की जड़ चुनाव प्रक्रिया और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े हाईकोर्ट के निर्देश हैं। अदालत ने हाल ही में मतगणना केंद्रों की सुरक्षा, केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती और कुछ याचिकाओं (जैसे पुनर्मतदान) पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं। इससे पहले भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने निर्देश दिया था कि हर काउंटिंग सेंटर पर कम से कम एक केंद्रीय कर्मचारी की मौजूदगी सुनिश्चित की जाएगी। TMC ने इस फैसले का विरोध किया और इसे पक्षपातपूर्ण बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। TMC की दलील क्या है? TMC का कहना है कि चुनाव के अंतिम चरण में इस तरह के निर्देशों से मतगणना प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। पार्टी का आरोप है कि इससे निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो सकते हैं न्यायिक हस्तक्षेप से प्रशासनिक प्रक्रिया जटिल हो सकती है इससे चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है इन्हीं तर्कों के आधार पर पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई क्यों अहम? शनिवार को होने वाली सुनवाई कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अगर सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाता है, तो TMC को बड़ी राहत मिलेगी अगर रोक नहीं लगती, तो हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत ही मतगणना होगी यह मामला चुनाव के दौरान अदालत की भूमिका को लेकर एक नई नजीर भी पेश कर सकता है क्या रुक सकती है मतगणना? फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार मतगणना (4 मई) पर रोक लगने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। आमतौर पर अदालतें चुनाव प्रक्रिया में अंतिम चरण में दखल देने से बचती हैं, जब तक कि कोई गंभीर संवैधानिक या कानूनी समस्या न हो। इसलिए ज्यादा संभावना यही है कि: मतगणना तय समय पर होगी सुप्रीम कोर्ट केवल प्रक्रिया या निर्देशों में बदलाव कर सकता है विपक्ष का क्या कहना है? अन्य राजनीतिक दल, खासकर बीजेपी, TMC के इस कदम को हार के डर से उठाया गया कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि चुनाव परिणाम से पहले कानूनी विवाद खड़ा करना राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। सुरक्षा और हिंसा पर पहले से सख्ती गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने पहले ही चुनाव बाद हिंसा को लेकर कड़े निर्देश दिए हैं। राज्य में सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की भारी तैनाती और निगरानी व्यवस्था लागू की गई है, ताकि मतगणना शांतिपूर्ण तरीके से हो सके।
कोलकाता : पश्चिम बंगाल में मतगणना से पहले सियासी घमासान तेज हो गया है। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के ईवीएम में कथित गड़बड़ी के आरोपों पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखा जवाब दिया है। बीजेपी का पलटवार बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा कि एग्जिट पोल के बाद साफ दिख रहा है कि बंगाल में पहली बार बीजेपी सरकार बन सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी संभावित हार से घबराकर पहले से ही बहाने बना रही है और ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है। वहीं, बीजेपी नेता राम कृपाल यादव ने भी ईवीएम छेड़छाड़ के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि राज्य की जनता ने टीएमसी को नकार दिया है और चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष हुए हैं। उन्होंने भारत निर्वाचन आयोग की तारीफ करते हुए कहा कि उसने पूरी ईमानदारी से चुनाव प्रक्रिया को अंजाम दिया है। ममता बनर्जी ने क्या कहा? इससे पहले ममता बनर्जी ने दक्षिण कोलकाता के सखावत मेमोरियल स्कूल स्थित भवानीपुर स्ट्रॉन्ग रूम का दौरा किया था। वह करीब चार घंटे तक वहां रहीं और रात 12 बजे के बाद बाहर निकलीं। उन्होंने कहा कि मतगणना के दौरान किसी भी तरह की गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। “जनता के वोट पूरी तरह सुरक्षित रहने चाहिए,” उन्होंने कहा। पारदर्शिता की मांग ममता बनर्जी ने सुझाव दिया कि मतगणना केंद्रों पर पारदर्शिता बढ़ाने के लिए मीडिया के लिए सीसीटीवी व्यवस्था की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शुरुआत में केंद्रीय सुरक्षाबलों ने उन्हें अंदर जाने से रोका, हालांकि बाद में उन्हें प्रवेश की अनुमति दे दी गई। 4 मई से पहले बढ़ा सियासी तनाव 4 मई को होने वाली मतगणना से पहले आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। एक ओर टीएमसी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है, वहीं बीजेपी इन आरोपों को बेबुनियाद बता रही है। अब सभी की नजरें नतीजों पर टिकी हैं, जो तय करेंगे कि पश्चिम बंगाल में सत्ता किसके हाथ में जाएगी।
कोलकाता : पश्चिम बंगाल में मतगणना से पहले सियासी तनाव और बढ़ गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दक्षिण कोलकाता के स्ट्रॉन्गरूम का दौरा करने के बाद EVM में कथित गड़बड़ी को लेकर कड़ी चेतावनी दी है। 3 घंटे तक किया निरीक्षण ममता बनर्जी ने सखावत मेमोरियल स्कूल स्थित स्ट्रॉन्गरूम का दौरा किया, जो भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र का वितरण केंद्र है। यहां EVM और मतपत्र सुरक्षित रखे जाते हैं। उन्होंने करीब 3 घंटे से ज्यादा समय तक अंदर रहकर व्यवस्थाओं का जायजा लिया। “जान की बाजी लगाकर लड़ेंगे” स्ट्रॉन्गरूम से बाहर निकलते ही ममता बनर्जी ने कहा, “अगर कोई EVM मशीन चुराने या मतगणना में छेड़छाड़ करने की कोशिश करता है, तो हम जान की बाजी लगाकर लड़ेंगे। मैं पूरी जिंदगी लड़ती रहूंगी।” उन्होंने बताया कि सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद उन्हें शक हुआ, जिसके चलते उन्होंने खुद मौके पर जाकर स्थिति का निरीक्षण किया। ‘हेरफेर’ के आरोप ममता बनर्जी ने दावा किया कि स्ट्रॉन्गरूम सुरक्षित है, लेकिन कुछ जगहों पर गड़बड़ी के संकेत मिले हैं। तृणमूल कांग्रेस ने एक वायरल वीडियो का हवाला देते हुए आरोप लगाया है कि अधिकृत प्रतिनिधियों की मौजूदगी के बिना चुनाव सामग्री को खोला गया, जो नियमों का गंभीर उल्लंघन है। केंद्रीय बलों पर आरोप ममता बनर्जी ने यह भी कहा कि शुरुआत में केंद्रीय सुरक्षा बलों ने उन्हें अंदर जाने से रोका। हालांकि, उन्होंने उम्मीदवार के रूप में अपने अधिकारों का हवाला दिया, जिसके बाद उन्हें प्रवेश की अनुमति मिली। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके पार्टी प्रतिनिधियों के साथ एकतरफा कार्रवाई की जा रही है और कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है। बीजेपी और चुनाव आयोग पर निशाना तृणमूल कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी और भारत निर्वाचन आयोग पर मिलीभगत का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना जरूरी है और किसी भी तरह की अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। काउंटिंग से पहले बढ़ा विवाद 4 मई को होने वाली मतगणना से पहले यह मुद्दा बड़ा राजनीतिक विवाद बनता जा रहा है। एक ओर टीएमसी लगातार सवाल उठा रही है, तो दूसरी ओर बीजेपी इन आरोपों को खारिज कर रही है। अब सबकी नजरें काउंटिंग डे पर टिकी हैं, जहां यह साफ होगा कि आरोपों और दावों के बीच जनता का फैसला किसके पक्ष में जाता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।