UPSC Success Story of IPS Pratap Gopendra: कहते हैं कि मेहनत, धैर्य और सही फैसले इंसान की किस्मत बदल सकते हैं। उत्तर प्रदेश कैडर के IPS अधिकारी प्रताप गोपेंद्र की कहानी इसका जीता-जागता उदाहरण है। एक समय ऐसा था जब उन्हें UPSC जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा अपनी पहुंच से बाहर लगती थी, लेकिन संघर्षों से हार मानने के बजाय उन्होंने लगातार मेहनत की और आखिरकार भारतीय पुलिस सेवा (IPS) में जगह बनाई। गाय-भैंस चराते हुए बीता बचपन ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े प्रताप गोपेंद्र का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में गुजरा। उन्होंने आठवीं तक की पढ़ाई बोरी पर बैठकर की। बचपन में वह गाय-भैंस चराते थे और सीमित संसाधनों के बीच अपना जीवन बिताते थे। उस समय उनके सामने कोई बड़ा लक्ष्य नहीं था, लेकिन कठिन परिस्थितियों ने उन्हें मजबूत बनाया। सीमित आय के बावजूद नहीं टूटा हौसला प्रताप गोपेंद्र के पिता एक छोटी डिस्पेंसरी चलाते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन शिक्षा को महत्व दिया जाता था। उन्होंने वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई पूरी की और इसके बाद सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने का फैसला किया। साल 2005 में वह इलाहाबाद (अब प्रयागराज) पहुंचे और UPSC तथा UPPCS की तैयारी शुरू की। एक फैसले ने बदल दी किस्मत शुरुआत में उन्होंने जूलॉजी और बॉटनी विषय चुने, लेकिन इन विषयों में आत्मविश्वास की कमी महसूस हुई। इसके बाद दोस्तों की सलाह पर उन्होंने इतिहास और दर्शनशास्त्र को वैकल्पिक विषय के रूप में चुना। यही फैसला उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। कोचिंग फीस के लिए भी नहीं थे पैसे प्रताप गोपेंद्र के सामने आर्थिक चुनौतियां लगातार बनी रहीं। इतिहास की कोचिंग की फीस 3000 रुपये थी, जो बातचीत के बाद 2500 रुपये कर दी गई। लेकिन एक साथ इतनी रकम देना भी उनके लिए आसान नहीं था। उन्होंने पांच किश्तों में फीस जमा की। इसी दौरान दर्शनशास्त्र के शिक्षक ने उनके उत्तर लेखन की सराहना की, जिससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ा और पहली बार उन्हें लगा कि वह UPSC परीक्षा पास कर सकते हैं। कई असफलताओं के बाद मिली सफलता साल 2008 में उन्होंने पहली बार UPSC प्रीलिम्स और मेन्स परीक्षा पास की, लेकिन इंटरव्यू में चयन नहीं हो सका। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार प्रयास जारी रखा। आखिरकार उन्होंने UPSC परीक्षा में सफलता हासिल की और 2012 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के IPS अधिकारी बने। वर्तमान में DIG के पद पर तैनात आज प्रताप गोपेंद्र पुलिस उप-महानिरीक्षक (DIG) के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उनकी संघर्ष से सफलता तक की कहानी उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं।
देश की सबसे प्रतिष्ठित सरकारी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों उम्मीदवारों के लिए बड़ी अपडेट सामने आई है। Union Public Service Commission यानी UPSC ने साल 2027 का परीक्षा कैलेंडर जारी कर दिया है। आयोग की ओर से जारी इस शेड्यूल में सिविल सर्विस, NDA, CDS, CAPF, इंजीनियरिंग सर्विस और अन्य प्रमुख परीक्षाओं की तारीखें घोषित की गई हैं। अब उम्मीदवार पहले से अपनी तैयारी की रणनीति तय कर सकते हैं और परीक्षा के हिसाब से स्टडी प्लान बना सकते हैं। कब होगी UPSC Civil Services Exam 2027? UPSC Civil Services Examination 2027 की प्रारंभिक परीक्षा 23 मई 2027 को आयोजित की जाएगी। यही परीक्षा IAS, IPS, IFS और अन्य प्रतिष्ठित सेवाओं में चयन का रास्ता खोलती है। वहीं Civil Services Main Examination 20 अगस्त 2027 से शुरू होगी। यह परीक्षा कुल 5 दिनों तक आयोजित की जाएगी। जनवरी में आएगा नोटिफिकेशन UPSC कैलेंडर के मुताबिक सिविल सर्विस परीक्षा 2027 का आधिकारिक नोटिफिकेशन जनवरी 2027 में जारी किया जाएगा। इसके साथ ही आवेदन प्रक्रिया भी शुरू हो जाएगी। NDA और CDS परीक्षा की तारीखें देश की सेना में अधिकारी बनने का सपना देखने वाले युवाओं के लिए NDA और CDS परीक्षा बेहद अहम मानी जाती है। NDA और NA Examination (I) परीक्षा तिथि: 11 अप्रैल 2027 NDA और NA Examination (II) परीक्षा तिथि: 19 सितंबर 2027 इसके अलावा Combined Defence Services Examination यानी CDS परीक्षा का शेड्यूल भी UPSC कैलेंडर में जारी किया गया है। CAPF और अन्य परीक्षाओं की तारीखें भी घोषित CAPF Assistant Commandant Examination 2027 की परीक्षा 4 जुलाई 2027 को आयोजित होगी। इस परीक्षा के जरिए Border Security Force, Central Reserve Police Force, Central Industrial Security Force और Indo-Tibetan Border Police जैसी केंद्रीय सुरक्षा बलों में अधिकारी बनने का मौका मिलता है। इसके अलावा: Combined Geo-Scientist Preliminary Exam – 10 जनवरी 2027 Combined Geo-Scientist Main Exam – 19 जून 2027 ऐसे चेक करें UPSC 2027 Calendar उम्मीदवार UPSC का पूरा कैलेंडर देखने के लिए UPSC Official Website पर विजिट कर सकते हैं। स्टेप्स: वेबसाइट के होमपेज पर जाएं Examination सेक्शन खोलें UPSC 2027 Calendar लिंक पर क्लिक करें स्क्रीन पर पूरा एग्जाम शेड्यूल दिखाई देगा भविष्य के लिए PDF डाउनलोड कर सेव कर लें तैयारी शुरू करने का सही समय UPSC परीक्षाओं को देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में गिना जाता है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि जल्दी तैयारी शुरू करने वाले उम्मीदवारों को बेहतर रणनीति बनाने का फायदा मिलता है।
बैचलर ऑफ आर्ट्स (BA) करने के बाद अक्सर छात्रों के मन में यह सवाल उठता है कि आगे कौन-सा करियर चुना जाए। लेकिन हकीकत यह है कि BA के बाद सरकारी क्षेत्र में कई ऐसे अवसर मौजूद हैं, जो न सिर्फ अच्छी सैलरी देते हैं बल्कि जॉब सिक्योरिटी और सामाजिक सम्मान भी सुनिश्चित करते हैं। सही दिशा में तैयारी और रणनीति अपनाकर इन नौकरियों को हासिल किया जा सकता है। यहां हम आपको ऐसे पांच प्रमुख सरकारी करियर विकल्पों के बारे में बता रहे हैं, जो BA के बाद आपके भविष्य को नई दिशा दे सकते हैं। 1. SSC CGL: स्थिर करियर का मजबूत विकल्प SSC CGL परीक्षा BA ग्रेजुएट्स के बीच सबसे लोकप्रिय विकल्पों में से एक है। इस परीक्षा के माध्यम से इनकम टैक्स ऑफिसर, ऑडिटर और असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर जैसे पदों पर नियुक्ति मिलती है। इसमें आकर्षक वेतन के साथ-साथ नियमित प्रमोशन के अवसर भी मिलते हैं। 2. बैंकिंग सेक्टर: सुरक्षित और संतुलित नौकरी बैंकिंग क्षेत्र में करियर बनाने के लिए IBPS Exam और State Bank of India द्वारा आयोजित परीक्षाएं अहम होती हैं। इन परीक्षाओं के जरिए प्रोबेशनरी ऑफिसर (PO) और क्लर्क पद हासिल किए जा सकते हैं। बैंकिंग नौकरियों में फिक्स वर्किंग आवर्स, अच्छी सैलरी और ग्रोथ के पर्याप्त अवसर होते हैं। 3. UPSC सिविल सर्विस: देश सेवा के साथ प्रतिष्ठा अगर आप प्रशासनिक सेवा में जाना चाहते हैं, तो UPSC Civil Services Examination आपके लिए सबसे बड़ा मंच है। इस परीक्षा के माध्यम से IAS, IPS और IFS जैसे प्रतिष्ठित पदों पर चयन होता है। BA के दौरान पढ़े गए विषय इस परीक्षा की तैयारी में काफी मददगार साबित होते हैं। 4. रेलवे में नौकरी: सुविधाओं के साथ स्थिरता Railway Recruitment Board (RRB) हर साल NTPC, ग्रुप D और क्लर्क जैसे पदों के लिए भर्ती करता है। रेलवे की नौकरियां अपने बेहतरीन भत्तों, जॉब सिक्योरिटी और परिवार के लिए सुविधाओं के कारण बेहद लोकप्रिय हैं। 5. राज्य सरकार की नौकरियां: अपने राज्य में अवसर हर राज्य की Public Service Commission Exams के जरिए विभिन्न प्रशासनिक पदों, पुलिस और राजस्व विभाग में भर्तियां होती हैं। इन परीक्षाओं का सिलेबस BA के विषयों से काफी मेल खाता है, जिससे आर्ट्स के छात्रों को अतिरिक्त फायदा मिलता है। सरकारी नौकरी पाने के लिए सिर्फ डिग्री ही नहीं, बल्कि सही प्लानिंग, नियमित पढ़ाई और समय प्रबंधन भी जरूरी है। यदि आप लक्ष्य तय कर लें और निरंतर मेहनत करें, तो BA के बाद भी आपके पास सफल और सुरक्षित करियर बनाने के कई रास्ते खुले हैं।
सिविल सेवा का सपना पूरा करने के लिए कई लोग अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा देते हैं, लेकिन कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो लाखों युवाओं को नई दिशा देती हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी है Aparajita Singh की, जिन्होंने MBBS डॉक्टर होने के बावजूद डॉक्टरी छोड़कर IAS बनने का सपना पूरा किया। डॉक्टर परिवार से IAS तक का सफर हरियाणा के रोहतक की रहने वाली अपराजिता सिंह का जन्म एक डॉक्टर परिवार में हुआ। उनके माता-पिता और भाई भी मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े हैं। ऐसे माहौल में उनका डॉक्टर बनना तय माना जा रहा था और उन्होंने MBBS की पढ़ाई भी पूरी की। उन्होंने Post Graduate Institute of Medical Sciences Rohtak से MBBS की डिग्री हासिल की और डॉक्टर के रूप में काम करना शुरू कर दिया। डॉक्टर की नौकरी के साथ शुरू की UPSC तैयारी अपराजिता रोज़ाना 8 घंटे की ड्यूटी करती थीं, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने Union Public Service Commission की तैयारी शुरू कर दी। उनका लक्ष्य साफ था-समाज के लिए बड़े स्तर पर काम करना। इसलिए उन्होंने डॉक्टरी छोड़कर पूरी तरह सिविल सेवा की तैयारी में खुद को झोंक दिया। पहली असफलता, फिर भी नहीं मानी हार 2017 में पहला प्रयास - असफलता 2018 में दूसरा प्रयास - सफलता दूसरे प्रयास में उन्होंने ऑल इंडिया रैंक 82 हासिल कर IAS बनने का सपना पूरा किया। यह उनकी मेहनत, अनुशासन और लगातार सुधार का परिणाम था। इंटरव्यू की तैयारी का खास तरीका अपराजिता सिंह की सफलता का एक अनोखा राज था-मिरर प्रैक्टिस (शीशे के सामने अभ्यास) वह रोज़ शीशे के सामने बैठकर इंटरव्यू की तैयारी करती थीं, जिससे: बॉडी लैंग्वेज बेहतर हुई आत्मविश्वास बढ़ा जवाब देने की क्षमता मजबूत हुई इसी तैयारी का नतीजा था कि उन्हें इंटरव्यू में 201 अंक मिले। संघर्ष से मिली प्रेरणा साधारण माहौल में पढ़ाई खराब हैंडराइटिंग जैसी चुनौतियां नौकरी के साथ तैयारी असफलता के बाद भी निरंतर प्रयास इन सबके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपने लक्ष्य तक पहुंचीं। क्यों खास है यह कहानी? यह कहानी बताती है कि: सही दिशा और मेहनत से कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है असफलता सिर्फ एक पड़ाव है, अंत नहीं आत्मविश्वास और निरंतर अभ्यास सफलता की कुंजी है
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।