न्यूयॉर्क: अमेरिकी निवेशक और बर्कशायर हैथवे के चेयरमैन वॉरेन बफे ने इस वर्ष गेट्स फाउंडेशन को दिया जाने वाला अपना नियमित मध्य-वर्षीय अरबों डॉलर का दान फिलहाल रोक दिया है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार, बफे ने यह फैसला फाउंडेशन और दिवंगत यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन से जुड़े पुराने संबंधों की स्वतंत्र समीक्षा पूरी होने तक टाल दिया है। बाहरी जांच रिपोर्ट का इंतजार रिपोर्ट के मुताबिक, गेट्स फाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) मार्क सुजमैन ने फाउंडेशन और एपस्टीन से जुड़े पुराने संपर्कों की स्वतंत्र बाहरी समीक्षा शुरू कराई है। इस जांच की रिपोर्ट गर्मियों के दौरान आने की उम्मीद है। बताया जा रहा है कि 95 वर्षीय वॉरेन बफे दान को लेकर अंतिम फैसला वर्ष के अंत में, संभवतः अपनी पारंपरिक थैंक्सगिविंग चिट्ठी जारी करने के समय लेंगे। 47 अरब डॉलर से अधिक का दान कर चुके हैं बफे वॉरेन बफे पिछले करीब दो दशकों में बर्कशायर हैथवे के 47 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के शेयर गेट्स फाउंडेशन को दान कर चुके हैं। उनकी परोपकारी प्रतिबद्धता दुनिया की सबसे बड़ी दान पहलों में गिनी जाती है। कैसे शुरू हुआ विवाद? गेट्स फाउंडेशन उस समय विवादों में आया था जब अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा सार्वजनिक किए गए कुछ ईमेल में जेफ्री एपस्टीन और फाउंडेशन के कुछ कर्मचारियों के बीच संवाद का उल्लेख सामने आया। इसके बाद फाउंडेशन ने पुराने संपर्कों की स्वतंत्र समीक्षा कराने का निर्णय लिया। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि समीक्षा में क्या निष्कर्ष सामने आएंगे और इसका बफे के भविष्य के दान पर क्या प्रभाव पड़ेगा। आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, इस मामले पर बर्कशायर हैथवे और गेट्स फाउंडेशन की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। वहीं, रॉयटर्स स्वतंत्र रूप से वॉल स्ट्रीट जर्नल की इस रिपोर्ट की पुष्टि नहीं कर सका है।
US Iran War Cost: अमेरिका और ईरान के बीच 108 दिनों तक चले सैन्य संघर्ष के बाद दोनों देशों ने अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके साथ ही पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव फिलहाल थमता नजर आ रहा है। हालांकि इस युद्ध की कीमत दोनों देशों को भारी चुकानी पड़ी है, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर अमेरिका को भी बड़ा नुकसान झेलना पड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, 28 फरवरी से शुरू होकर 16 जून तक चले इस संघर्ष के दौरान अमेरिका ने केवल सैन्य अभियानों पर ही लगभग 113 अरब डॉलर खर्च किए। वहीं कई विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आर्थिक प्रभावों को जोड़ने पर कुल नुकसान 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। शुरुआती छह दिनों में ही खर्च हुए 11.3 अरब डॉलर अमेरिकी रक्षा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक युद्ध के शुरुआती छह दिनों में ही करीब 11.3 अरब डॉलर खर्च हो चुके थे। इसके बाद प्रतिदिन औसतन लगभग 1 अरब डॉलर (करीब ₹94,475 करोड़) का खर्च दर्ज किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल सैन्य अभियानों का अनुमानित खर्च है। वास्तविक आर्थिक बोझ इससे कहीं अधिक हो सकता है। मिसाइल और सैन्य तैनाती पर भारी खर्च युद्ध के शुरुआती चरण में अमेरिका ने मिसाइलों, गोला-बारूद और रक्षा उपकरणों पर लगभग 25 अरब डॉलर खर्च किए। पैट्रियट मिसाइल की एक यूनिट की कीमत लगभग 40 लाख डॉलर बताई जाती है। खाड़ी क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती और लॉजिस्टिक सपोर्ट पर भी अरबों डॉलर खर्च हुए। ट्रंप प्रशासन ने शुरुआत में इस युद्ध के लिए लगभग 200 अरब डॉलर के बजट की मांग की थी। अमेरिका पर कुल आर्थिक बोझ 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान अर्थशास्त्रियों और कई अमेरिकी नेताओं का मानना है कि युद्ध का असर केवल रक्षा बजट तक सीमित नहीं रहा। युद्ध के कारण: तेल की कीमतों में उछाल आया। ऊर्जा लागत बढ़ी। वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई। अमेरिकी उपभोक्ताओं और कंपनियों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ा। कुछ अनुमानों के मुताबिक अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर कुल प्रभाव 630 अरब डॉलर से लेकर 1 ट्रिलियन डॉलर तक हो सकता है। ईरान के पुनर्निर्माण पर भी भारी खर्च युद्ध में ईरान के कई महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे, तेल रिफाइनरियां और पावर ग्रिड प्रभावित हुए। इनके पुनर्निर्माण के लिए करीब 300 अरब डॉलर की आवश्यकता का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अंतरिम समझौते के तहत अमेरिका ने इस पुनर्निर्माण प्रक्रिया में सहयोग करने पर सहमति जताई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि इस फंडिंग में खाड़ी देशों की भी भूमिका रहेगी। आम लोगों पर भी पड़ा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का असर सीधे आम उपभोक्ताओं पर पड़ा। अनुमान है कि केवल ऊर्जा कीमतों में वृद्धि के कारण अमेरिकी नागरिकों को 40 अरब डॉलर से अधिक का अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ा। हालांकि कई विश्लेषकों का मानना है कि वास्तविक नुकसान इससे कहीं अधिक हो सकता है। प्रमुख आंकड़े एक नजर में युद्ध की अवधि: 108 दिन सैन्य खर्च: लगभग 113 अरब डॉलर शुरुआती 6 दिनों का खर्च: 11.3 अरब डॉलर प्रतिदिन औसत खर्च: लगभग 1 अरब डॉलर ईरान के पुनर्निर्माण की अनुमानित लागत: 300 अरब डॉलर कुल संभावित आर्थिक प्रभाव: 1 ट्रिलियन डॉलर तक
वॉशिंगटन: अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए के एक पूर्व अधिकारी पर करोड़ों डॉलर की कथित धोखाधड़ी का आरोप लगा है। जांच एजेंसियों का दावा है कि पूर्व अधिकारी डेविड रश ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े एक गोपनीय कार्यक्रम का सहारा लेकर सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग किया और करीब 4 करोड़ डॉलर (लगभग 382 करोड़ रुपये) की संपत्ति जुटा ली। मामला तब सुर्खियों में आया जब संघीय जांच एजेंसियों ने उनके घर पर छापेमारी की। अधिकारियों के अनुसार, तलाशी के दौरान बड़ी मात्रा में नकदी, सैकड़ों सोने की ईंटें और कई लग्जरी घड़ियां बरामद की गईं। फर्जी गोपनीय मिशन बनाकर किया कथित खेल अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, डेविड रश पर आरोप है कि उन्होंने एक कथित फर्जी सरकारी कार्यक्रम तैयार किया और उसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अत्यंत संवेदनशील मिशन के रूप में प्रस्तुत किया। जांचकर्ताओं का कहना है कि इस कार्यक्रम को "कंटिन्यूटी ऑफ गवर्नमेंट ऑपरेशंस" से जुड़ा बताया गया था। आमतौर पर इस तरह की योजनाएं युद्ध, बड़े आतंकी हमले, प्राकृतिक आपदा या राष्ट्रीय आपातकाल जैसी परिस्थितियों में सरकार के कामकाज को जारी रखने के लिए बनाई जाती हैं। अधिकारियों का आरोप है कि इसी संवेदनशील व्यवस्था की आड़ लेकर रश ने लंबे समय तक सरकारी संसाधनों और विशेष सुविधाओं तक पहुंच बनाई। छापेमारी में मिला सोने और नकदी का जखीरा संघीय जांच ब्यूरो (FBI) द्वारा वर्जीनिया स्थित आवास पर की गई छापेमारी में चौंकाने वाले खुलासे सामने आए। जांच एजेंसियों के अनुसार, घर से 303 सोने की ईंटें बरामद की गईं। इसके अलावा लगभग 20 लाख डॉलर नकद और कई महंगी लग्जरी घड़ियां भी मिलीं। अधिकारियों का मानना है कि बरामद संपत्ति कथित तौर पर उसी फर्जी कार्यक्रम के जरिए अर्जित की गई हो सकती है। संपत्ति के स्रोत और उससे जुड़े वित्तीय लेनदेन की जांच अभी जारी है। अदालत में 'मास्टर मैनिपुलेटर' बताया गया मामले की सुनवाई के दौरान सरकारी वकीलों ने डेविड रश को "मास्टर मैनिपुलेटर" करार दिया। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि उन्होंने वर्षों तक अपने शैक्षणिक और पेशेवर रिकॉर्ड के बारे में भ्रामक जानकारी देकर विभिन्न सरकारी संस्थानों में प्रभावशाली पद हासिल किए। जांच एजेंसियों का दावा है कि रश ने अपने अनुभव और योग्यता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, जिससे उन्हें ऐसे संवेदनशील कार्यक्रमों तक पहुंच मिली जिनका दुरुपयोग बाद में किया गया। सहयोगियों की भूमिका की भी जांच अधिकारियों के अनुसार, यह भी जांच की जा रही है कि क्या इस कथित योजना में अन्य लोग भी शामिल थे। प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि जिन सहयोगियों को इस कार्यक्रम से जोड़ा गया था, उन्हें कथित धोखाधड़ी की पूरी जानकारी नहीं थी। जांच एजेंसियां अब वित्तीय दस्तावेजों, ईमेल रिकॉर्ड और अन्य संचार माध्यमों की पड़ताल कर रही हैं। CIA की निगरानी व्यवस्था पर उठे सवाल मामले के सामने आने के बाद अमेरिकी खुफिया तंत्र की जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह एक गंभीर संस्थागत विफलता मानी जाएगी। आलोचकों के अनुसार, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गोपनीय ढांचे का उपयोग कथित तौर पर वर्षों तक निजी लाभ के लिए किया जाना चिंताजनक है और इससे निगरानी तंत्र की कमजोरियां उजागर होती हैं। फिलहाल हिरासत में हैं डेविड रश मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, डेविड रश वर्तमान में हिरासत में हैं। अदालत ने उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया है। न्यायाधीश का मानना है कि मामले की गंभीरता और उपलब्ध संसाधनों को देखते हुए उनके फरार होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर उन्हें फिलहाल हिरासत में रखने का आदेश दिया गया है। आगे और बढ़ सकती हैं मुश्किलें जांच एजेंसियों ने संकेत दिया है कि मामले की पड़ताल आगे बढ़ने के साथ डेविड रश पर अतिरिक्त आरोप भी लगाए जा सकते हैं। वित्तीय अनियमितताओं, धोखाधड़ी, सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े नियमों के उल्लंघन जैसे पहलुओं की अलग-अलग जांच की जा रही है। यदि आरोप अदालत में साबित होते हैं, तो यह हाल के वर्षों में अमेरिकी खुफिया तंत्र से जुड़े सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में से एक माना जा सकता है।
अमेरिकी सेना ने पूर्वी प्रशांत महासागर में नशीले पदार्थों की तस्करी में कथित रूप से शामिल एक नाव पर हमला किया है। इस कार्रवाई में तीन लोगों की मौत हो गई। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इस सप्ताह ड्रग्स तस्करी के खिलाफ यह तीसरा सैन्य अभियान है। हालिया कार्रवाई के बाद इन अभियानों में मारे गए लोगों की कुल संख्या 200 के पार पहुंच गई है। ड्रग्स विरोधी अभियान के तहत हुई कार्रवाई अमेरिकी सेना की United States Southern Command (यूएस सदर्न कमांड) ने बताया कि यह कार्रवाई कैरिबियन सागर और पूर्वी प्रशांत महासागर में चल रहे व्यापक ड्रग्स विरोधी अभियान का हिस्सा थी। सेना का दावा है कि जिस नाव को निशाना बनाया गया, उसका इस्तेमाल नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए किया जा रहा था। अधिकारियों ने यह भी कहा कि नाव का संचालन एक घोषित आतंकवादी संगठन से जुड़े तत्व कर रहे थे, इस दावे के समर्थन में कोई स्वतंत्र सबूत सार्वजनिक नहीं किया गया है। हमले का वीडियो भी किया गया जारी अमेरिकी सेना ने हमले का वीडियो भी जारी किया है। वीडियो में समुद्र में चल रही एक छोटी नाव दिखाई देती है, जिस पर मिसाइल या अन्य हथियार से हमला किया जाता है। हमले के बाद नाव आग के गोले में तब्दील होती नजर आती है। वीडियो के अगले हिस्से में जलती हुई नाव और उसके आसपास पानी में तैरते पैकेट दिखाई देते हैं। माना जा रहा है कि ये पैकेट तस्करी से जुड़े सामान या नशीले पदार्थ हो सकते हैं। सितंबर से जारी है सैन्य अभियान अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के मुताबिक, सितंबर की शुरुआत से ड्रग्स तस्करी के खिलाफ लगातार अभियान चलाया जा रहा है। शुक्रवार की कार्रवाई के बाद इस अभियान में मारे गए लोगों की संख्या 202 तक पहुंच गई है। इससे पहले मंगलवार और बुधवार को भी दो अलग-अलग अभियानों में तस्करी से जुड़े जहाजों को निशाना बनाया गया था। ट्रंप प्रशासन का सख्त रुख Donald Trump प्रशासन ने हाल के महीनों में लैटिन अमेरिकी ड्रग कार्टेल के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। प्रशासन का कहना है कि अमेरिका में अवैध मादक पदार्थों की आपूर्ति के पीछे संगठित ड्रग कार्टेल की बड़ी भूमिका है और उनसे निपटने के लिए सैन्य कार्रवाई भी जरूरी हो सकती है। अमेरिकी अधिकारियों ने इन अभियानों को राष्ट्रीय सुरक्षा और मादक पदार्थों की तस्करी रोकने की रणनीति का हिस्सा बताया है। क्यूबा के अधिकारियों से भी हुई मुलाकात यूएस सदर्न कमांड ने बताया कि यह कार्रवाई लैटिन अमेरिका क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य कमांडर General Francis L. Donovan के निर्देश पर की गई। इसी दिन जनरल डोनोवन ने Guantanamo Bay Naval Base के पास क्यूबा के सैन्य अधिकारियों से भी मुलाकात की। बैठक में किन मुद्दों पर चर्चा हुई, इसकी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। अभियानों पर उठ रहे सवाल ड्रग्स तस्करी के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई को लेकर समर्थन और आलोचना दोनों देखने को मिल रही है। समर्थकों का कहना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क पर दबाव बढ़ेगा, जबकि आलोचकों का मानना है कि ऐसे अभियानों में पारदर्शिता और स्वतंत्र जांच की जरूरत है, खासकर तब जब सैन्य कार्रवाई में लोगों की जान जा रही हो।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के प्रशासन ने अवैध प्रवासियों के खिलाफ अपने अभियान को नया रूप देते हुए एक अनोखी वेबसाइट लॉन्च की है। 'Aliens.gov' नाम की इस वेबसाइट को अंतरिक्ष और एलियन थीम पर तैयार किया गया है, जिसका उद्देश्य अमेरिका में बिना वैध दस्तावेजों के रह रहे प्रवासियों से जुड़ी कार्रवाई और गिरफ्तारियों को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना है। साइंस-फिक्शन जैसी थीम ने खींचा ध्यान गुरुवार को शुरू की गई इस वेबसाइट का डिज़ाइन किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा दिखाई देता है। वेबसाइट पर तारों और आकाशगंगाओं की पृष्ठभूमि के साथ नियॉन-हरे रंग के अक्षरों का इस्तेमाल किया गया है। साइट खोलते ही एक संदेश दिखाई देता है— "They are among us" (वे हमारे बीच घूम रहे हैं)। यह संदेश उन अवैध प्रवासियों की ओर संकेत करता है, जिन्हें ट्रंप प्रशासन लंबे समय से कानूनी शब्दावली में "एलियंस" कहकर संबोधित करता रहा है। गिरफ्तारियों को दिखाने के लिए बनाया गया प्लेटफॉर्म 'Aliens.gov' को अमेरिकी आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन एजेंसी (ICE) की कार्रवाई को प्रदर्शित करने के लिए विकसित किया गया है। वेबसाइट पर दावा किया गया है कि वर्षों से ऐसे लोग अमेरिका में रह रहे थे जिनकी कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं थी और अब प्रशासन उनके खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। साइट पर एक लाइव काउंटर भी लगाया गया है, जिसमें प्रवासियों की गिरफ्तारी और कार्रवाई से जुड़े आंकड़े प्रदर्शित किए जा रहे हैं। इंटरैक्टिव मैप से देखी जा सकती है गिरफ्तारी की जानकारी वेबसाइट की सबसे प्रमुख विशेषताओं में एक इंटरैक्टिव डिजिटल मैप शामिल है। इसके जरिए उपयोगकर्ता अमेरिका के किसी भी राज्य या शहर में हुई आव्रजन कार्रवाई की जानकारी देख सकते हैं। मैप पर उपलब्ध जानकारी में गिरफ्तार व्यक्ति का मूल देश, उस पर लगे आरोप और कथित आपराधिक रिकॉर्ड जैसी जानकारियां भी शामिल की गई हैं। इसके अलावा वेबसाइट पर एक रिपोर्टिंग फॉर्म भी दिया गया है, जहां नागरिक संदिग्ध अवैध प्रवासियों की जानकारी साझा कर सकते हैं। पहले UFO से जुड़ी अटकलें लगी थीं इस वेबसाइट के लॉन्च से पहले व्हाइट हाउस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक टीजर वीडियो साझा किया था। वीडियो में खेतों में बने रहस्यमयी निशानों और सर्चलाइट का इस्तेमाल किया गया था, जिससे लोगों ने अनुमान लगाया कि सरकार UFO या दूसरे ग्रहों के जीवों से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने वाली है। बाद में स्पष्ट हो गया कि यह अभियान अवैध प्रवासियों पर केंद्रित था और वेबसाइट का एलियंस से कोई वास्तविक संबंध नहीं है। मानवाधिकार संगठनों ने जताई आपत्ति वेबसाइट लॉन्च होने के बाद कई मानवाधिकार और प्रवासी अधिकार संगठनों ने इसकी आलोचना की है। उनका कहना है कि वेबसाइट पर इस्तेमाल की गई भाषा प्रवासियों को इंसानों की बजाय "एलियन" के रूप में पेश करती है, जिससे समाज में उनके प्रति नकारात्मक धारणा और भेदभाव बढ़ सकता है। आलोचकों का यह भी कहना है कि इस तरह की प्रस्तुति प्रवासियों को अमानवीय रूप में दिखाती है और सामाजिक तनाव को बढ़ावा दे सकती है। ट्रंप प्रशासन अपने फैसले पर कायम विवादों के बावजूद ट्रंप प्रशासन का कहना है कि वेबसाइट का उद्देश्य आव्रजन व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाना और नागरिकों को जानकारी उपलब्ध कराना है। प्रशासन का दावा है कि सीमाओं की सुरक्षा और अवैध प्रवास पर नियंत्रण उसकी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। इस बीच, अमेरिका के कई शहरों में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों और निर्वासन अभियानों को लेकर विरोध प्रदर्शन भी जारी हैं, लेकिन प्रशासन फिलहाल अपने सख्त आव्रजन रुख पर कायम नजर आ रहा है।
अमेरिका के San Diego में स्थित सबसे बड़ी मस्जिद Islamic Center of San Diego के बाहर हुई गोलीबारी की घटना में कुल पांच लोगों की मौत हो गई। घटना के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी और दहशत का माहौल है। स्थानीय पुलिस और Federal Bureau of Investigation (FBI) मामले की संयुक्त जांच कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मस्जिद के पास हुई फायरिंग में तीन लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। बाद में पुलिस को घटनास्थल के करीब खड़े एक वाहन में दो किशोर संदिग्ध मृत अवस्था में मिले। शुरुआती जांच में माना जा रहा है कि दोनों ने खुद को गोली मारी। 17 और 19 साल के थे संदिग्ध सैन डिएगो पुलिस प्रमुख Scott Wahl ने बताया कि मृत पाए गए दोनों युवकों की उम्र 17 और 19 वर्ष थी। उन्होंने कहा कि मस्जिद परिसर में मौजूद बच्चे और अन्य लोग पूरी तरह सुरक्षित हैं। पुलिस के अनुसार, दोनों संदिग्धों की मौत संभवतः आत्मघाती गोलीबारी के कारण हुई है। अधिकारियों ने अभी तक उनकी पहचान सार्वजनिक नहीं की है। FBI ने शुरू की गहन जांच FBI के सैन डिएगो कार्यालय के विशेष एजेंट Mark Remley ने कहा कि घटना के हर पहलू की जांच की जा रही है। उन्होंने बताया कि यह पता लगाया जा रहा है कि हमले के पीछे कोई व्यापक साजिश या अन्य लोग शामिल थे या नहीं। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मारे गए तीन लोगों में मस्जिद का एक सिक्योरिटी गार्ड भी शामिल है। हथियार पर मिले घृणास्पद संदेश जांच एजेंसियों के मुताबिक, संदिग्धों में से एक युवक अपने माता-पिता के घर से हथियार लेकर निकला था। अधिकारियों को एक कथित सुसाइड नोट भी मिला है, जिसमें नस्लीय श्रेष्ठता और घृणा से जुड़े विचार लिखे गए थे। इसके अलावा घटना में इस्तेमाल किए गए एक हथियार पर आपत्तिजनक और नफरत फैलाने वाले शब्द लिखे मिले हैं। इसी वजह से जांच एजेंसियां इस घटना को संभावित “हेट क्राइम” के तौर पर भी देख रही हैं। मस्जिद और आसपास बढ़ाई गई सुरक्षा घटना के बाद मस्जिद और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। पुलिस इलाके की निगरानी कर रही है और लोगों से अफवाहों से बचने की अपील की गई है। अधिकारियों का कहना है कि जांच अभी शुरुआती चरण में है और आने वाले दिनों में मामले से जुड़े और खुलासे हो सकते हैं।
J. D. Vance ने अपनी नई पुस्तक में पत्नी Usha Bala Chilukuri Vance के साथ पहली मुलाकात और प्रेम कहानी का जिक्र किया है। वेंस ने बताया कि येल लॉ स्कूल में ऊषा से मिलने के बाद उन्हें पहली बार “सच्चा प्रेम” महसूस हुआ था। उन्होंने अपने दोस्तों से यहां तक कह दिया था कि “या तो मैं इसी लड़की से शादी करूंगा, या फिर पूरी जिंदगी कुंवारा रहूंगा।” नई किताब में साझा किए निजी अनुभव अपनी नई संस्मरण पुस्तक Communion: Finding My Way Back to Faith में जेडी वेंस ने कॉलेज के दिनों की यादों और निजी जिंदगी के कई पहलुओं का जिक्र किया है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस किताब के कुछ अंश प्रकाशित किए गए हैं, जिनमें वेंस ने लिखा कि वह ऊषा की सुंदरता, बुद्धिमत्ता और आत्मविश्वास से बेहद प्रभावित थे। उन्होंने लिखा: “जब मैं पहली बार ऊषा से मिला, तो उनकी कई बातें मुझे असामान्य लगीं।” वेंस के मुताबिक ऊषा बेहद प्रतिस्पर्धी थीं, लेकिन उनमें ईर्ष्या जैसी भावना नहीं थी। उन्होंने इसे ऊषा के आत्मविश्वास का सबसे बड़ा संकेत बताया। “पारंपरिक भूमिकाओं में दिलचस्पी नहीं थी” जेडी वेंस ने लिखा कि जब उन्होंने ऊषा से पूछा कि वह जीवन में क्या करना चाहती हैं, तो उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि उनका पारंपरिक सामाजिक भूमिकाओं में खास झुकाव नहीं था। वेंस ने बताया कि यही बात उन्हें सबसे अलग और आकर्षक लगी। 2014 में हुई थी शादी जेडी वेंस और ऊषा ने 2014 में शादी की थी। यह दंपत्ति अब अपने चौथे बच्चे का स्वागत करने की तैयारी कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक जुलाई में उनके घर नए बच्चे का जन्म हो सकता है। धर्म और जिंदगी को लेकर भी किए खुलासे वेंस ने अपनी किताब में धार्मिक यात्रा के बारे में भी विस्तार से लिखा है। उन्होंने बताया कि वह पहले ईसाई धर्म को मानते थे, बाद में नास्तिक बन गए और फिर धीरे-धीरे Catholic Church की ओर आकर्षित हुए। उन्होंने 2019 में कैथोलिक धर्म अपनाया। वेंस के मुताबिक इस नए विश्वास ने उन्हें जिंदगी का मकसद दिया, जो उन्हें येल यूनिवर्सिटी की पढ़ाई या वित्तीय क्षेत्र में काम करने से नहीं मिला था। “हिलबिली एलेगी” से मिली थी पहचान जेडी वेंस इससे पहले अपनी चर्चित पुस्तक Hillbilly Elegy के कारण भी सुर्खियों में रहे हैं। इस किताब में उन्होंने अपने बचपन, गरीबी, हिंसा और परिवार की संघर्षपूर्ण परिस्थितियों का जिक्र किया था। यह किताब काफी लोकप्रिय हुई थी और बाद में इस पर फिल्म भी बनाई गई थी।
अमेरिका के कैलिफोर्निया में पढ़ाई कर रहे 26 वर्षीय भारतीय छात्र मोहम्मद कुमेल शेख का ग्रेजुएशन के एक दिन बाद कार्डियक अरेस्ट से निधन हो गया। इस घटना से उनके दोस्तों और परिवार में शोक की लहर है। कुमेल ने एक दिन पहले ही गोल्डन गेट यूनिवर्सिटी से अपना ग्रेजुएशन पूरा किया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मोहम्मद कुमेल शेख आंध्र प्रदेश के कडपा जिले के रहने वाले थे। बताया जा रहा है कि उन्हें नींद में ही हार्ट अटैक आया, जिसके कारण उनकी मौत हो गई। ग्रेजुएशन का जश्न, अगले दिन मातम कुमेल के दोस्त और फंडरेजर अभियान के आयोजक रवि तेजा नन्नापनेनी ने बताया कि एक दिन पहले ही सभी ने उनके साथ ग्रेजुएशन वॉक का जश्न मनाया था। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि यह उनके साथ आखिरी मुलाकात होगी। उन्होंने लिखा कि मोहम्मद बड़े सपने लेकर अमेरिका आए थे और अपने परिवार के बेहतर भविष्य के लिए लगातार मेहनत कर रहे थे। उनके अचानक निधन से उन्हें जानने वाले सभी लोग सदमे में हैं। पार्थिव शरीर भारत लाने के लिए जुटाई जा रही मदद दोस्तों ने कुमेल के पार्थिव शरीर को भारत भेजने और अंतिम संस्कार की व्यवस्था के लिए ऑनलाइन फंडरेजर शुरू किया है। अपील में कहा गया है कि उनका परिवार निम्न-मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि से आता है और पहले से शिक्षा ऋण के बोझ से जूझ रहा है। दोस्तों का कहना है कि आर्थिक मदद से परिवार को अचानक आए खर्चों और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में सहारा मिल सकेगा। दोस्तों ने बताया दयालु और मददगार इंसान रवि तेजा ने कुमेल को बेहद विनम्र, दयालु और मददगार व्यक्ति बताया। उन्होंने कहा कि वह हमेशा अपने दोस्तों के साथ खड़े रहते थे और हर किसी की मदद करने के लिए तैयार रहते थे।
अमेरिका की विमानन कंपनी स्पिरिट एयरलाइंस पर एक डिमेंशिया पीड़ित बुजुर्ग यात्री को एयरपोर्ट पर असहाय छोड़ने का गंभीर आरोप लगा है। परिवार का दावा है कि एयरलाइन की लापरवाही के कारण बुजुर्ग रास्ता भटक गए और बाद में सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई। मामले को लेकर एयरलाइन के खिलाफ मुकदमा दायर किया गया है। मृतक की पहचान 75 वर्षीय मार्कोस हम्बर्टो विंडेल ओसोरियो के रूप में हुई है। वह होंडुरास के पाल्मेरोला इंटरनेशनल एयरपोर्ट से अमेरिका अपने परिवार से मिलने के लिए रवाना हुए थे। उनका विमान टेक्सास के जॉर्ज बुश इंटरकॉन्टिनेंटल एयरपोर्ट पर उतरा था। परिवार के अनुसार, यात्रा से पहले ही एयरलाइन को बता दिया गया था कि ओसोरियो डिमेंशिया से पीड़ित हैं और उन्हें एयरपोर्ट पर विशेष सहायता की जरूरत होगी। इसके बावजूद एयरलाइन ने जरूरी मदद उपलब्ध नहीं कराई। एयरपोर्ट से लापता होने के बाद हाईवे पर मिला शव परिवार एयरपोर्ट के आगमन क्षेत्र में उनका इंतजार करता रहा, लेकिन ओसोरियो वहां तक नहीं पहुंच सके। काफी देर तक संपर्क न होने पर परिवार ने पुलिस को सूचना दी। बाद में उसी रात एयरपोर्ट से करीब आठ मिनट की दूरी पर हाईवे पर उनका शव मिला। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्हें कई वाहनों ने टक्कर मारी थी। परिवार ने एयरलाइन पर लगाया गंभीर आरोप परिवार की ओर से दायर मुकदमे में कहा गया है कि स्पिरिट एयरलाइंस ने वादा किए गए सहयोग की व्यवस्था नहीं की और एक मानसिक रूप से कमजोर बुजुर्ग यात्री को अकेले अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट से बाहर निकलने के लिए छोड़ दिया। परिवार का कहना है कि यही उनकी मौत की मुख्य वजह बनी। मुकदमे में यह भी कहा गया है कि ओसोरियो को हल्का डिमेंशिया था, जो तनावपूर्ण परिस्थितियों में बढ़ जाता था। ऐसे में उन्हें निगरानी और सहायता की जरूरत थी। अमेरिकी कानून क्या कहता है? अमेरिका में एयर कैरियर एक्सेस एक्ट के तहत एयरलाइंस के लिए दिव्यांग या मानसिक बीमारी से पीड़ित यात्रियों को सहायता देना अनिवार्य है। इसमें यात्रियों को गेट तक पहुंचाने, विमान में चढ़ाने और उतरने तक मदद करना शामिल है। अब ओसोरियो का परिवार मानसिक पीड़ा, अंतिम संस्कार के खर्च और अन्य नुकसान के लिए मुआवजे की मांग कर रहा है। मामले की प्रारंभिक सुनवाई 17 जुलाई को होगी।
पत्रकार के दावे से मचा बवाल अमेरिका में एक बड़ा विवाद सामने आया है, जहां एक वरिष्ठ परमाणु अधिकारी को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। अमेरिकी पत्रकार James O'Keefe ने दावा किया है कि न्यूक्लियर वैज्ञानिक Andrew Hugg को पेंटागन से जबरन बाहर निकाल दिया गया है। पत्रकार के अनुसार, उन्हें छुट्टी पर भेज दिया गया है और पूरे मामले की जांच शुरू कर दी गई है। कथित वीडियो से बढ़ा विवाद सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक कथित वीडियो में दावा किया गया है कि एंड्रयू हग्ग एक अंडरकवर व्यक्ति के साथ संवेदनशील जानकारी साझा करते नजर आए। वीडियो में उन्हें अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा, परमाणु हथियारों और अंतरराष्ट्रीय रणनीतियों से जुड़ी गोपनीय बातें करते हुए दिखाया गया है। राष्ट्रीय सुरक्षा पर उठे सवाल दावे के मुताबिक, हग्ग ने कथित तौर पर ईरान से जुड़े मुद्दों, संभावित सैन्य कार्रवाई और अमेरिका की रणनीति पर चर्चा की। इसके साथ ही उन्होंने कथित रूप से यह भी कहा कि जानकारी हासिल करने के लिए “हनी ट्रैप” जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। इन दावों के सामने आने के बाद अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था और गोपनीयता को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। हालांकि, इन दावों की अभी तक किसी आधिकारिक एजेंसी या अमेरिकी सरकार की ओर से पुष्टि नहीं की गई है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि वायरल वीडियो कितना सही है और उसमें किए गए दावे कितने तथ्यात्मक हैं। जांच पर टिकी नजर फिलहाल इस पूरे मामले में जांच की बात कही जा रही है, लेकिन आधिकारिक जानकारी सामने आने का इंतजार है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर मामला हो सकता है।
अमेरिका की राजनीति में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। राष्ट्रपति Donald Trump ने अपनी अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी को पद से हटा दिया है। यह फैसला ऐसे समय लिया गया है, जब उनके कार्यकाल को लेकर लगातार विवाद और असंतोष की खबरें सामने आ रही थीं। करीब 14 महीने पहले नियुक्त की गई बॉन्डी को ट्रंप की करीबी और भरोसेमंद सहयोगी माना जाता था, लेकिन हालात इस कदर बिगड़े कि उन्हें अचानक पद छोड़ना पड़ा। व्हाइट हाउस में टकराव बना टर्निंग पॉइंट रिपोर्ट्स के मुताबिक, व्हाइट हाउस में एक अहम बैठक के दौरान ट्रंप और बॉन्डी के बीच तीखा टकराव हुआ। सूत्रों के अनुसार, ट्रंप ने उन पर “अक्षम्य गलती” करने का आरोप लगाया। बॉन्डी ने पद पर बने रहने की कोशिश की, लेकिन राष्ट्रपति अपने फैसले पर अडिग रहे और तत्काल प्रभाव से उन्हें हटा दिया गया। एपस्टीन फाइल्स विवाद ने बढ़ाई मुश्किलें बॉन्डी की बर्खास्तगी के पीछे सबसे बड़ी वजह चर्चित Jeffrey Epstein से जुड़ा विवाद माना जा रहा है। आरोप है कि इस मामले से संबंधित दस्तावेजों को सही तरीके से हैंडल नहीं किया गया और कुछ अहम नामों को सार्वजनिक नहीं किया गया। इससे ट्रंप प्रशासन की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हुए और बॉन्डी की भूमिका पर गंभीर आरोप लगे। लीक विवाद ने भी बढ़ाया दबाव एक अन्य विवाद में बॉन्डी पर अमेरिकी सांसद Eric Swalwell से जुड़ी संवेदनशील जानकारी लीक करने का आरोप लगा। यह मामला कथित चीनी जासूस क्रिस्टीन फैंग से जुड़े जांच से संबंधित था। इस घटनाक्रम ने व्हाइट हाउस की नाराजगी को और बढ़ा दिया। ट्रंप की नाराजगी: विरोधियों पर कार्रवाई नहीं सूत्रों के अनुसार, ट्रंप इस बात से भी नाराज थे कि बॉन्डी ने उनके राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ अपेक्षित सख्ती नहीं दिखाई। कई मामलों में कानूनी कार्रवाई कमजोर रही, जिसके चलते कोर्ट में केस टिक नहीं पाए। इससे राष्ट्रपति का भरोसा और कमजोर हुआ। विवादों से घिरा रहा कार्यकाल पाम बॉन्डी का पूरा कार्यकाल विवादों में रहा। न्याय विभाग में बड़े पैमाने पर बदलाव, अधिकारियों की छुट्टी, और राजनीतिक एजेंडे को प्राथमिकता देने के आरोप लगातार लगते रहे। इसके अलावा संसदीय सुनवाई के दौरान उनका आक्रामक रवैया भी आलोचना का कारण बना। अब आगे क्या? फिलहाल डिप्टी अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लांश को कार्यवाहक अटॉर्नी जनरल बनाया गया है। स्थायी नियुक्ति के लिए कई नाम चर्चा में हैं, जिनमें Lee Zeldin और Ron DeSantis प्रमुख माने जा रहे हैं। इस बर्खास्तगी के साथ ही यह संकेत भी मिल रहे हैं कि ट्रंप प्रशासन में आगे और बड़े फेरबदल हो सकते हैं, जिससे अमेरिकी राजनीति में अस्थिरता बढ़ने की संभावना है।
अमेरिका में बढ़ती महंगाई के बीच अब डाक सेवाओं की कीमतों में भी इजाफा होने जा रहा है। United States Postal Service (USPS) ने ईंधन की बढ़ती लागत के चलते पैकेज डिलीवरी पर 8% सरचार्ज लगाने का ऐलान किया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में लगातार उछाल देखने को मिल रहा है, जिसका सीधा असर परिवहन लागत पर पड़ रहा है। कब से लागू होगा नया शुल्क? USPS के अनुसार, यह नया सरचार्ज 26 अप्रैल 2026 से लागू होगा और 17 जनवरी 2027 तक जारी रहेगा। यह अतिरिक्त शुल्क कई प्रमुख सेवाओं पर लागू होगा, जिनमें शामिल हैं: Priority Mail Express Priority Mail USPS Ground Advantage Parcel Select इसका मतलब है कि अमेरिका में आम उपभोक्ताओं से लेकर छोटे कारोबारियों तक सभी के लिए पार्सल भेजना अब पहले से महंगा हो जाएगा। 55 साल में पहली बार लिया गया फैसला USPS के इतिहास में यह पहली बार है जब इस तरह का ईंधन-आधारित सरचार्ज लागू किया जा रहा है। पिछले 55 वर्षों में ऐसा कदम नहीं उठाया गया था। यह निर्णय इस बात का संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय संकट किस तरह से घरेलू सेवाओं और रोजमर्रा की लागत को प्रभावित कर रहा है। USPS का पक्ष: प्रतिस्पर्धियों से कम बढ़ोतरी USPS ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा है कि: अन्य निजी कंपनियां पहले ही इससे अधिक सरचार्ज लगा चुकी हैं USPS का यह शुल्क प्रतिस्पर्धियों की तुलना में एक-तिहाई से भी कम है इसके बावजूद उनकी सेवाएं अभी भी दुनिया के विकसित देशों में सबसे किफायती बनी हुई हैं संगठन का कहना है कि यह कदम देशभर में अपनी डिलीवरी नेटवर्क को बनाए रखने के लिए जरूरी है, ताकि सप्ताह में कम से कम छह दिन सेवाएं जारी रखी जा सकें। राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तेज इस फैसले पर अमेरिकी राजनीति में भी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। JB Pritzker ने इस बढ़ोतरी की आलोचना करते हुए इसे “ट्रंप मेल टैक्स” करार दिया। वहीं Raphael Warnock ने भी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि अब डाक सेवाएं भी महंगी हो गई हैं। ईंधन की कीमतों में तेज उछाल पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद से अमेरिका में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगभग 1 डॉलर प्रति गैलन तक की वृद्धि हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर सिर्फ शिपिंग लागत ही नहीं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। तेल आपूर्ति में बाधा और वैश्विक ऊर्जा संकट की आशंका ने चिंता और बढ़ा दी है।
न्यूयॉर्क: ला गार्डिया एयरपोर्ट पर सोमवार को एक दर्दनाक विमान हादसा सामने आया, जब एयर कनाडा एक्सप्रेस का एक यात्री विमान लैंडिंग के दौरान रनवे पर मौजूद फायर ट्रक से टकरा गया। इस भीषण टक्कर में विमान के दोनों पायलटों की मौत हो गई, जबकि 100 से अधिक यात्री घायल बताए जा रहे हैं। कैसे हुआ हादसा प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, मॉन्ट्रियल से आ रहा सीआरजे-900 विमान रनवे-4 पर उतर रहा था, तभी उसकी टक्कर एक आपातकालीन फायर ट्रक से हो गई। टक्कर इतनी जोरदार थी कि विमान बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और एयरपोर्ट पर अफरातफरी मच गई। एयरपोर्ट पर इमरजेंसी और ग्राउंड स्टॉप हादसे के तुरंत बाद फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (FAA) ने पूरे एयरपोर्ट पर ‘ग्राउंड स्टॉप’ लागू कर दिया, जिससे सभी उड़ानों का संचालन अस्थायी रूप से रोक दिया गया। राहत और बचाव दल तुरंत मौके पर पहुंचा और घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया। घायलों की स्थिति रिपोर्ट्स के मुताबिक, विमान में सवार 100 से अधिक यात्रियों को चोटें आई हैं। वहीं न्यूयॉर्क फायर डिपार्टमेंट के कम से कम पांच फायरफाइटर गंभीर रूप से घायल हुए हैं। चेतावनी के बावजूद टक्कर घटना से जुड़े ऑडियो और वीडियो सामने आए हैं, जिनमें एयर ट्रैफिक कंट्रोल द्वारा विमान और ग्राउंड वाहन दोनों को टक्कर से पहले कई बार रुकने के निर्देश दिए जाने की बात सामने आई है। इसके बावजूद यह हादसा हो गया, जिससे सुरक्षा व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जांच शुरू FAA और अन्य एजेंसियों ने हादसे की जांच शुरू कर दी है। शुरुआती फोकस इस बात पर है कि चेतावनी के बावजूद टक्कर कैसे हुई और रनवे पर सुरक्षा प्रोटोकॉल में कहीं चूक तो नहीं हुई।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।