बीजिंग: चीन की ब्रह्मपुत्र नदी (यारलुंग त्सांगपो) पर बन रही दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं। चीनी वैज्ञानिकों की एक ताजा स्टडी में दावा किया गया है कि इस मेगा डैम के नीचे एक सक्रिय भूगर्भीय दरार (एक्टिव फॉल्ट लाइन) मौजूद है, जो भविष्य में परियोजना की सुरक्षा और मजबूती के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। यह परियोजना भारत के अरुणाचल प्रदेश की सीमा के बेहद करीब बनाई जा रही है, इसलिए इस अध्ययन को रणनीतिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रिसर्च में क्या सामने आया? पिछले महीने चीनी जर्नल Sedimentary Geology and Tethyan Geology में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, 'पैझेन फॉल्ट' (Paizhen Fault) नामक भूगर्भीय दरार हिमयुग से लगातार सक्रिय रही है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस क्षेत्र में लगातार भूगर्भीय गतिविधियों के कारण— चट्टानें कमजोर हो चुकी हैं, बड़े बांधों की नींव प्रभावित हो सकती है, सड़क, पुल, सुरंग और जलाशयों जैसी परियोजनाओं की स्थिरता पर खतरा बढ़ सकता है। इस अध्ययन की निगरानी चीन की सरकारी संस्था चाइना जियोलॉजिकल सर्वे ने की है, जिससे रिपोर्ट को विशेष महत्व दिया जा रहा है। बांध की सुरक्षा पर क्यों बढ़ी चिंता? वैज्ञानिकों के अनुसार, जिस इलाके में जलाशय बनाया जा रहा है, वहीं सक्रिय फॉल्ट लाइन मौजूद है। लगातार होने वाली भूगर्भीय हलचल भविष्य में संरचनात्मक जोखिम पैदा कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भूकंप संभावित क्षेत्र में इतनी बड़ी जलविद्युत परियोजना का निर्माण अतिरिक्त इंजीनियरिंग चुनौतियां पैदा करता है। भारत के करीब बन रहा है मेगा डैम चीन यह विशाल बांध तिब्बत में उस स्थान पर बना रहा है, जहां यारलुंग त्सांगपो (ब्रह्मपुत्र) नदी अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करने से पहले एक बड़ा यू-टर्न लेती है। इसके बाद यही नदी भारत में ब्रह्मपुत्र और फिर बांग्लादेश में जमुना नदी के रूप में बहती है। इस भौगोलिक स्थिति के कारण भारत लंबे समय से इस परियोजना पर नजर बनाए हुए है। 167.8 अरब डॉलर की परियोजना चीन ने जुलाई 2025 में इस परियोजना का आधिकारिक निर्माण शुरू किया था। परियोजना की प्रमुख बातें: अनुमानित लागत: 167.8 अरब अमेरिकी डॉलर वार्षिक बिजली उत्पादन: 300 अरब किलोवाट-घंटे से अधिक दावा: 30 करोड़ से अधिक लोगों की बिजली जरूरतें पूरी होंगी यह दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में शामिल मानी जा रही है। भूकंप संभावित क्षेत्र में निर्माण परियोजना पूर्वी हिमालय के उस क्षेत्र में बनाई जा रही है जहां टेक्टोनिक प्लेटों की गतिविधियां लगातार होती रहती हैं। तिब्बती पठार भूकंप के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में वैज्ञानिकों का कहना है कि सक्रिय फॉल्ट लाइन को ध्यान में रखते हुए परियोजना की सुरक्षा और दीर्घकालिक स्थिरता का लगातार वैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक होगा। चीन के दावे पर उठे सवाल चीन पहले दावा कर चुका है कि यह परियोजना क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने में मदद करेगी। हालांकि, नई वैज्ञानिक रिपोर्ट के सामने आने के बाद इस दावे पर सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सक्रिय भूगर्भीय दरार वाले क्षेत्र में इतने बड़े बांध का निर्माण भविष्य में सुरक्षा संबंधी नई चुनौतियां पैदा कर सकता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर चीन के मेगा डैम प्रोजेक्ट ने नई दिल्ली को हाई अलर्ट पर कर दिया है। इस ढांचे से न केवल असम और अरुणाचल प्रदेश में कृत्रिम बाढ़ और सूखे का खतरा पैदा हो गया है, बल्कि यह भारत के लिए एक बड़ी भू-राजनीतिक चुनौती भी है। आधुनिक कूटनीति में अब नदियां और प्राकृतिक संसाधन युद्ध के नए हथियार बनते जा रहे हैं। इसका सबसे ताजा और गंभीर उदाहरण तिब्बत के पठारों से सामने आ रहा है, जहां चीन ने यारलुंग त्सांगपो नदी पर दुनिया के सबसे बड़े बांध का निर्माण शुरू कर दिया है। भारतीय सीमा (अरुणाचल प्रदेश) से मात्र 50 किलोमीटर की दूरी पर आकार ले रहा यह भीमकाय प्रोजेक्ट अब भारत के लिए एक गहरा रणनीतिक और पर्यावरणीय सिरदर्द बन चुका है। पूर्वोत्तर की जीवनरेखा पर 'कंट्रोल' की कोशिश तिब्बत से निकलने वाली यारलुंग त्सांगपो नदी का पानी जैसे ही भारतीय सरजमीं पर दस्तक देता है, यह अरुणाचल प्रदेश में 'सियांग' और असम की घाटियों में पहुंचकर 'ब्रह्मपुत्र' के नाम से जानी जाती है। यह विशाल नदी केवल एक जलस्रोत नहीं है, बल्कि यह पूरे पूर्वोत्तर भारत की अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है। इस नदी के पानी पर लाखों किसानों की आजीविका और लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि निर्भर है। नदी के ऊपरी हिस्से (अपर राइपेरियन क्षेत्र) पर चीन के इस बांध के बनने का सीधा अर्थ है कि नदी के पानी का 'कंट्रोल स्विच' बीजिंग के हाथों में चला जाएगा। बाढ़ और सूखे का दोहरा खतरा इस निर्माण ने एक दोहरे खतरे को जन्म दिया है। जानकारों और इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे बड़ी चिंता जल प्रवाह के अप्रत्याशित नियंत्रण को लेकर है। यदि चीन अपनी जरूरत के हिसाब से पानी रोकता है, तो असम और अरुणाचल में गंभीर जल संकट और सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है, जिससे फसलें बर्बाद हो जाएंगी। इसके विपरीत, अगर मानसून के दौरान या किसी रणनीतिक चाल के तहत अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़ा जाता है, तो पूर्वोत्तर राज्यों में विनाशकारी कृत्रिम बाढ़ आ सकती है। इसके अलावा, प्राकृतिक प्रवाह रुकने से हिमालय के बेहद संवेदनशील जलीय इकोसिस्टम और वनस्पतियों पर भी लंबे समय तक गहरा असर पड़ेगा। चीन की दलील vs सैटेलाइट की गवाही चीन हमेशा से अपने इरादों पर पर्दा डालता आया है। इस बार भी बीजिंग का रटा-रटाया तर्क है कि यह महज एक हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट है जो स्वच्छ ऊर्जा (बिजली उत्पादन) के लिए बनाया जा रहा है। लेकिन, हालिया खुफिया रिपोर्ट्स और सैटेलाइट तस्वीरों ने प्रोजेक्ट की जिस तेज रफ्तार की गवाही दी है, उसने नई दिल्ली को सतर्क कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, सीमा पार बहने वाली नदियों पर बड़े निर्माण से पहले संबंधित देशों के बीच पारदर्शिता और डाटा साझा करना अनिवार्य है, लेकिन चीन इस मोर्चे पर लगातार अपनी जिम्मेदारियों से भागता रहा है। भारत का पलटवार: कूटनीति और जमीनी तैयारी भारत सरकार इस भू-राजनीतिक खतरे को लेकर मूकदर्शक नहीं है। संसद में भी यह स्पष्ट किया जा चुका है कि नई दिल्ली ब्रह्मपुत्र बेसिन की हर हलचल पर पैनी नजर रखे हुए है। भारत की रणनीति दोतरफा है: कूटनीतिक दबाव: भारत ने चीन के समक्ष स्पष्ट मांग रखी है कि वह निचले प्रवाह वाले देशों के साथ जल स्तर और प्रोजेक्ट से जुड़ी पारदर्शी जानकारी नियमित रूप से साझा करे। जमीनी सुरक्षा: किसी भी आपात स्थिति (अचानक बाढ़ या पानी की कमी) से निपटने के लिए भारत ने पूर्वोत्तर राज्यों में अपने तंत्र को मजबूत कर दिया है। आधुनिक तकनीक की मदद से नदियों के प्रवाह की चौबीसों घंटे निगरानी की जा रही है और बाढ़ पूर्वानुमान (Early Warning System) तथा आपदा प्रबंधन ढांचे को और अधिक सुदृढ़ किया जा रहा है। ब्रह्मपुत्र पर बन रहा यह चीनी बांध स्पष्ट करता है कि भविष्य में 'पानी' रणनीतिक कूटनीति का एक अहम हिस्सा होगा। ऐसे में भारत के सामने अपने पूर्वोत्तर राज्यों की जल सुरक्षा और लाखों नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षित रखने की एक बड़ी और लंबी चुनौती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।